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Sunday, December 4, 2016

राग खमाज : SWARGOSHTHI – 295 : RAG KHAMAJ



स्वरगोष्ठी – 295 में आज

नौशाद के गीतों में राग-दर्शन – 8 : खमाज की छाया लिये गीत

“चुनरिया कटती जाए रे, उमरिया घटती जाए...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला – “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” की आठवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज के अंक में हम आपसे राग खमाज पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला में हम भारतीय फिल्म संगीत के शिखर पर विराजमान नौशाद अली के व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की विभिन्न कड़ियों में हम आपको फिल्म संगीत के माध्यम से रागों की सुगन्ध बिखेरने वाले अप्रतिम संगीतकार नौशाद अली के कुछ राग-आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इस श्रृंखला का समापन हम आगामी 25 दिसम्बर को नौशाद अली की 98वीं जयन्ती के अवसर पर करेंगे। 25 दिसम्बर, 1919 को सांगीतिक परम्परा से समृद्ध शहर लखनऊ के कन्धारी बाज़ार में एक साधारण परिवार में नौशाद का जन्म हुआ था। नौशाद जब कुछ बड़े हुए तो उनके पिता वाहिद अली घसियारी मण्डी स्थित अपने नए घर में आ गए। यहीं निकट ही मुख्य मार्ग लाटूश रोड (वर्तमान गौतम बुद्ध मार्ग) पर संगीत के वाद्ययंत्र बनाने और बेचने वाली दूकाने थीं। उधर से गुजरते हुए बालक नौशाद घण्टों दूकान में रखे साज़ों को निहारा करते थे। एक बार तो दूकान के मालिक गुरबत अली ने नौशाद को फटकारा भी, लेकिन नौशाद ने उनसे आग्रह किया की वे बिना वेतन के दूकान पर रख लें। नौशाद उस दूकान पर रोज बैठते, साज़ों की झाड़-पोछ करते और दूकान के मालिक का हुक्का तैयार करते। साज़ों की झाड़-पोछ के दौरान उन्हें कभी-कभी बजाने का मौका भी मिल जाता था। उन दिनों मूक फिल्मों का युग था। फिल्म प्रदर्शन के दौरान दृश्य के अनुकूल सजीव संगीत प्रसारित हुआ करता था। लखनऊ के रॉयल सिनेमाघर में फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान एक लद्दन खाँ थे जो हारमोनियम बजाया करते थे। यही लद्दन खाँ साहब नौशाद के पहले गुरु बने। नौशाद के पिता संगीत के सख्त विरोधी थे, अतः घर में बिना किसी को बताए सितार नवाज़ युसुफ अली और गायक बब्बन खाँ की शागिर्दी की। कुछ बड़े हुए तो उस दौर के नाटकों की संगीत मण्डली में भी काम किया। घर वालों की फटकार बदस्तूर जारी रहा। अन्ततः 1937 में एक दिन घर में बिना किसी को बताए माया नगरी बम्बई की ओर रुख किया।



मन्ना  डे 
नौशाद अपने फिल्म संगीत के हर कदम पर नये प्रयोग और प्रणाली के सूत्रपात में अग्रणी रहे हैं। फिल्म ‘आन’ मे सौ सदस्यीय वाद्यवृन्द का उपयोग सबसे पहले उन्होने ही किया था। इसी फिल्म में नौशाद द्वारा पाश्चात्य स्वरलिपि पद्यति का उपयोग किसी संगीतकार द्वारा भारत में किया गया पहला प्रयास था। नौशाद पहले संगीतकार थे जिन्होने फिल्म ‘रतन’ (1944) में ही स्वर और वाद्य के अलग-अलग ट्रैक बनाया और बाद में मिक्सिंग की। बाँसुरी और क्लेरेनेट का संयुक्त प्रयोग तथा सितार और मेंडोलीन का संयुक्त प्रयोग भी नौशाद ने ही शुरू किया था। फिल्म संगीत में पाश्चात्य वाद्य एकॉर्डियन लाने वाले भी वह पहले संगीतकार थे। नौशाद ने रागों का आधार लेकर जिन गीतों की रचना की है, उनमें भी कई प्रयोग स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। 1952 से पहले की फिल्मों में नौशाद के राग आधारित गीतों में रागों का सरल, सुगम रूपान्तरण मिलता है। 1952 की फिल्म ‘बैजू बावरा’ और उसके बाद की फिल्मों में रागों का यथार्थ स्वरूप परिलक्षित होता है। ऐसे गीतों को स्वर देने के लिए उन्होने आवश्यकता पड़ने पर दिग्गज संगीतज्ञों को आमंत्रित करने से भी नहीं चूके। इसके अलावा नौशाद के संगीत का एक पहलू यह भी रहा है कि उनके अनेक गीतों में रागों का स्पर्श करते हुए लोक संगीत का स्वरूप दिया गया है। ऐसे ही गीतों से युक्त 1957 में एक फिल्म ‘मदर इण्डिया’ प्रदर्शित हुई थी, जिसमें नौशाद की प्रतिभा के एक अलग ही रूप का दर्शन हुआ था। महबूब खाँ ने अपनी ही फिल्म ‘औरत’ का ‘रीमेक’ ‘मदर इण्डिया’ नाम से किया था। फिल्म के कथानक की पृष्ठभूमि में ग्रामीण परिवेश है। नौशाद को इस फिल्म का संगीतकार नियुक्त किया गया था। यह फिल्म नरगिस के अविस्मरणीय अभिनय और परिवेश के अनुकूल नौशाद के संगीत के कारण भारतीय फिल्म जगत में कालजयी फिल्म बन चुकी है। फिल्म के प्रायः सभी गीतों में आंचलिक संगीत की झलक है। गीतों को जब ध्यान से सुना जाए तो आंचलिकता के साथ अधिकतर गीतों में विभिन्न रागों का स्पर्श की अनुभूति भी होती है। फिल्म के गीत – “दुःख भरे दिन बीते रे...” में मेघ मल्हार का, विदाई गीत - “पी के घर आज प्यारी चली...” में राग पीलू का, “ओ जाने वाले...” में राग भैरवी का और वैराग्य भाव के गीत – “चुनरिया कटती जाए रे...” में राग खमाज का स्पर्श स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। इन सभी गीतों में रागों का लोक संगीत में सहज रूपान्तरण नौशाद ने किया था। आज हम आपको बहुआयामी पार्श्वगायक मन्ना डे की आवाज़ में इस फिल्म का राग खमाज का स्पर्श करते गीत – “चुनरिया कटती जाए रे...” सुनवाते हैं।

राग खमाज : “चुनरिया कटती जाए रे...” : मन्ना डे : फिल्म – मदर इण्डिया





पण्डित  हरिप्रसाद  चौरसिया 
राग खमाज की स्वर-संरचना खमाज थाट के अन्तर्गत मानी जाती है। यह खमाज थाट का आश्रय राग है। इस राग के आरोह में ऋषभ स्वर वर्जित होता है। अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग किया जाता है। इसीलिए राग खमाज की जाति षाडव-सम्पूर्ण है। इसके आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद स्वर का प्रयोग किया जाता है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद माना जाता है। राग खमाज के गायन-वादन का समय रात्रि का दूसरा प्रहर होता है। यह राग चंचल प्रकृति का है, अतः इस राग में द्रुत खयाल, ठुमरी, टप्पा आदि के गायन-वादन का प्रचलन है। इस राग में प्रायः विलम्बित खयाल गाने का प्रचलन नहीं है। इसी प्रकार वादन में मसीतखानी और रजाखानी अर्थात विलम्बित और द्रुत दोनों प्रकार की गतें बजाई जाती हैं। राग खमाज के आरोह में यद्यपि ऋषभ स्वर वर्जित होता है, किन्तु ठुमरी गाते समय कभी-कभी आरोह में ऋषभ स्वर का प्रयोग कर लिया जाता है। यही नहीं ठुमरी की सौन्दर्य को बढ़ाने के लिए प्रायः अन्य रागों का स्पर्श भी कर लिया जाता है। राग तिलंग, राग खमाज से मिलता-जुलता राग है। राग खमाज का यथार्थ स्वरूप उपस्थित करने के लिए अब हम आपको सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया की सम्मोहक बाँसुरी पर एक रचना प्रस्तुत कर रहे हैं। आप राग खमाज के श्रृंगार पक्ष का रसास्वादन कीजिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग खमाज : बाँसुरी पर मध्य-द्रुत लय की रचना : पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 295वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको लगभग 6 दशक पहले की एक क्लासिक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इस गीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 297 के सम्पन्न होने के उपरान्त जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।






1 – गीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि आपको किस राग की अनुभूति हो रही है?

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – आप इस गीत के गायक-स्वर को पहचान कर उनका नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 10 दिसम्बर, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 297वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 293वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1954 में प्रदर्शित लोकप्रिय फिल्म ‘अमर’ से राग पर केन्द्रित गीत का एक अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – भीमपलासी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है – स्वर – लता मंगेशकर

इस बार की पहेली के प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं, जबलपुर से क्षिति तिवारी, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया। इनके अलावा फेसबुक पर ‘स्वरगोष्ठी’ की एक नियमित संगीत-प्रेमी सदस्य जेसिका मेनेजेस, जिन्होने तीन में से एक प्रश्न का सही उत्तर देकर एक अंक अर्जित किया है। जेसिका जी का हार्दिक स्वागत करते हुए हम आशा करते हैं की आगे भी वे पहेली में भाग लेती रहेंगी, भले ही उन्हें सभी प्रश्नो में से केवल एक ही उत्तर आता हो। सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में अपने सैकड़ों पाठकों के अनुरोध पर जारी हमारी ताज़ा लघु श्रृंखला “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” के इस अंक में हमने आपको सुनवाने के लिए राग खमाज की छाया लिये गीत का चुनाव किया था। इस श्रृंखला के लिए हमने संगीतकार नौशाद के आरम्भिक दो दशकों की फिल्मों के गीत चुने हैं। श्रृंखला का आलेख को तैयार करने में हमने फिल्म संगीत के जाने-माने इतिहासकार और हमारे सहयोगी स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया है। गीतों के चयन के लिए हमने अपने पाठकों की फरमाइश का ध्यान रखा है। यदि आप भी किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, June 29, 2014

सुरीली बाँसुरी के पर्याय पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया




स्वरगोष्ठी – 174 में आज

व्यक्तित्व – 4 : पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया


‘देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए...’ 




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ की चौथी कड़ी में, मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, जारी लघु श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ के अन्तर्गत हम आपसे संगीत के कुछ असाधारण संगीत-साधकों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं, जिन्होंने मंच, विभिन्न प्रसारण माध्यमों अथवा फिल्म संगीत के क्षेत्र में लीक से हट कर उल्लेखनीय योगदान किया है। हमारी आज की कड़ी के व्यक्तित्व हैं, विश्वविख्यात बाँसुरी वादक पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया, जिन्होने एक साधारण सी दिखने वाली बाँस की बाँसुरी के मोहक सुरों के बल पर पूरे विश्व में भारतीय संगीत की विजय-पताका को फहराया है। चौरसिया जी की बाँसुरी ने शास्त्रीय मंचों पर तो संगीत प्रेमियों को सम्मोहित किया ही है, फिल्म संगीत के प्रति भी उनका लगाव बना रहा। उन्होने सुप्रसिद्ध सन्तूर वादक पण्डित शिवकुमार शर्मा के साथ मिलकर शिव-हरि नाम से कई फिल्मों में संगीत निर्देशन भी किया है। आज के अंक में हम आपके लिए चौरसिया जी द्वारा प्रस्तुत राग हंसध्वनि की एक रचना, बंगाल की एक चर्चित लोक धुन और शिव-हरि के रूप में रचे बेहद सफल फिल्म ‘सिलसिला’ का एक गीत भी प्रस्तुत करेंगे। यह भी उल्लेखनीय है कि इसी सप्ताह 1 जुलाई को पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया अपनी आयु के 77 वर्ष पूर्ण कर 78वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार इस महान संगीत-साधक को जन्मदिवस के उपलक्ष्य में शत-शत मंगलकामनाएँ अर्पित करता है।
 



भारतीय संगीत के अनेक साधकों ने विश्व-संगीत के मंच पर अपने संगीत की उत्कृष्ठता को सिद्ध किया है। इन्हीं में एक नाम बाँसुरी वादक पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया का भी शामिल है। बाँसुरी वादक पण्डित पन्नालाल घोष (1911-1960) ने इस वाद्य को लोकमंच से शास्त्रीय संगीत के मंच पर प्रतिष्ठित करने का जो प्रयास किया था, पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया ने उसे पूर्णता दी। यह भी आश्चर्यजनक है कि ऐसी महान प्रतिभा का जन्म संगीतज्ञ या संगीत-प्रेमी परिवार में नहीं हुआ था। हरिप्रसाद जी का जन्म 1 जुलाई, 1938 को इलाहाबाद के एक ऐसे परिवार में हुआ था, जहाँ सभी सदस्य कुश्ती के शौकीन थे। उनके पिता स्वयं कुशल पहलवान थे और चाहते थे कि उनका पुत्र भी कुश्ती के दाँव-पेंच सीखे। बालक हरिप्रसाद पिता के साथ अखाड़ा जाते तो थे किन्तु उनका मन इस कार्य में कभी नहीं लगा। उनका बाल-मन तो सुरीली ध्वनियों की ओर आकर्षित होता था। ईश्वर ने उन्हें सांगीतिक प्रतिभा प्रतिभा से युक्त कर इस धरा पर भेजा था। कुश्ती के अखाड़े के बजाय उनका मन पड़ोस के संगीत शिक्षक पण्डित राजाराम के पास अधिक लगता था। बालक हरिप्रसाद को पण्डित राजाराम ने संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा दी। इसके बाद वाराणसी के सुविख्यात गुरु पण्डित भोलानाथ जी से बाँसुरी वादन की विधिवत शिक्षा प्राप्त की और 19 वर्ष की आयु के होने तक बाँसुरी-वादन में इतने कुशल हो गए कि उनकी नियुक्ति रेडियो में हो गई। 1957 में उनकी पहली तैनाती ओडिसा स्थित कटक केन्द्र पर बाँसुरी-वादक के रूप में हुई। यहाँ वे लगभग तीन वर्ष तक रहे। इस दौरान उन्होने अनेक संगीतज्ञों को सुना और क्षेत्रीय संगीत का अध्ययन भी किया। आइए, यहाँ थोड़ा विराम लेकर पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया का बजाया राग हंसध्वनि में दो रचनाएँ सुनवाते हैं। राग हंसध्वनि अत्यन्त मधुर राग है, जो उत्तर और दक्षिण, दोनों संगीत पद्यतियों में समान रूप से लोकप्रिय है। इस राग में पण्डित जी द्वारा प्रस्तुत पहली मध्य लय की रचना सितारखानी ताल में और दूसरी द्रुत तीनताल में निबद्ध है।


राग हंसध्वनि : मध्यलय सितारखानी और द्रुतलय तीनताल की रचनाएँ : पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया




वर्ष 1960 में हरिप्रसाद जी का स्थानान्तरण रेडियो कटक केन्द्र से मुम्बई केन्द्र पर हो गया। मुम्बई आ जाने के बाद उन्हें अपने संगीत को अभिव्यक्ति देने के लिए और अधिक विस्तृत फ़लक मिल गया और यहाँ आ जाने के बाद संगीत के क्षेत्र में उनकी प्रतिभा को एक नई पहचान मिली। अब उन्हें प्रतिष्ठित संगीत सभाओं में मंच-प्रदर्शन के लिए आमंत्रित किया जाने लगा था। यहीं रहते हुए उनका सम्पर्क मैहर घराने के संस्थापक और सन्त-संगीतज्ञ उस्ताद अलाउद्दीन खाँ की सुपुत्री विदुषी अन्नपूर्णा देवी से हुआ। इनका मार्गदर्शन पाकर हरिप्रसाद जी के वादन में भरपूर निखार आया। उन्होने रागों के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों के लोक-संगीत का भी गहन अध्ययन किया था। आज भी विभिन्न संगीत-समारोहों में अपने बाँसुरी-वादन को विराम देने से पहले वे कोई लोकधुन अवश्य प्रस्तुत करते हैं। आइए, अब हम आपको बाँसुरी पर पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया द्वारा प्रस्तुत बंगाल की अत्यन्त लोकप्रिय भटियाली धुन सुनवाते हैं। पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया द्वारा प्रस्तुत इस भटियाली धुन के साथ तबला संगति पण्डित योगेश समसी ने की है।


भटियाली धुन : पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया : तबला संगति – योगेश समसी




बाँस से बनी बाँसुरी सम्भवतः सबसे प्राचीन स्वर-वाद्य है। महाभारत काल से पहले भी बाँसुरी का उल्लेख मिलता है। विष्णु के कृष्णावतार को तो ‘मुरलीधर’, ‘बंशीधर’, ‘वेणु के बजइया’ आदि नामों से सम्बोधित भी किया गया है। श्रीकृष्ण से जुड़ी तमाम पौराणिक कथाएँ बाँसुरी के गुणगान से भरी पड़ी हैं। यह एक ऐसा सुषिर वाद्य है जो लोक, सुगम से लेकर शास्त्रीय मंचों पर भी सुशोभित है। भारतीय संगीत के क्षेत्र में अनेक बाँसुरी के साधक हुए हैं, जिन्होने इस साधारण से दिखने वाले सुषिर वाद्य को असाधारन गरिमा प्रदान की है। वर्तमान में पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया बाँसुरी के ऐसे साधक हैं जिन्होने देश-विदेश में इस वाद्य को प्रतिष्ठित किया है। देश-विदेश के अनेकानेक सम्मान और पुरस्कारों से अलंकृत पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया ने सुप्रसिद्ध संतूर-वादक पण्डित शिवकुमार शर्मा के साथ जोड़ी बना कर वर्ष 1989 से फिल्मों में भी संगीत देना आरम्भ किया। शिव-हरि के नाम से इन दिग्गज संगीतज्ञों ने चाँदनी, विजय, सिलसिला, लम्हे, डर, फासले आदि फिल्मों में अनेक लोकप्रिय गीत दिये हैं। आज के इस अंक में हम आपको पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया और पण्डित शिवकुमार शर्मा के साथ मिल कर बनी संगीतकार जोड़ी द्वारा चर्चित हिन्दी फिल्म ‘सिलसिला’ का बेहद लोकप्रिय गीत- ‘देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए...’ सुनवाते हैं। गीतकार जावेद अख्तर के लिखे इस गीत को लता मंगेशकर और किशोर कुमार ने स्वर दिया है। इस गीत से रेखांकित करने योग्य एक तथ्य यह भी जुड़ा है कि गीत में मध्यम और निषाद स्वर रहित राग भूपाली के स्वर तो मौजूद हैं, किन्तु राग के स्वरों का चलन राग भूपाली अथवा देशकार के अनुसार नहीं है। लीजिए, अब आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


फिल्म – सिलसिला : ‘देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए...’ : लता मंगेशकर और किशोर कुमार : गीतकार – जावेद अख्तर





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 174वें अंक की पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत में एक रागबद्ध खयाल रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 180वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – खयाल का यह अंश सुन कर राग पहचाइए और हमे राग का नाम बताइए।

2 – गीत का यह अंश सुन कर गायक कलाकार को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 176वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 172वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1959 में प्रदर्शित फिल्म ‘चाचा ज़िन्दाबाद’ के एक गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग ललित और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक मन्ना डे और लता मंगेशकर। इस अंक के दोनों प्रश्नों के सही उत्तर पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, चण्डीगढ़ के हरकीरत सिंह, जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ के अन्तर्गत आज के अंक में हमने आपसे सुप्रसिद्ध बाँसुरी वादक पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा की। इसके साथ ही हमने शास्त्रीय, लोक और फिल्म संगीत के क्षेत्र में किए गए कार्यों को रेखांकित किया। अगले अंक से हम कुछ ऋतु प्रधान रागों का की चर्चा करेंगे। यह अंक आपको कैसा लगा, हमें अवश्य बताइए। आप भी अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश हमें भेज सकते हैं। हमारी अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों की प्रतीक्षा करेंगे।
 




एक आवश्यक सूचना

अपने संगीत-प्रेमी पाठकों और श्रोताओ को कुछ नयेपन का अनुभव कराने के लिए ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के कुछ कार्यक्रमों को हम yourlisten के सहयोग से आडियो रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। हमारा यह प्रयोग आपको कैसा लगा? अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव हमें swargoshthi@gmail.com , radioplaybackindia@live.com अथवा cine.paheli@yahoo.com पर अवश्य लिखें। आपके सुझाव के आधार पर हम अपने कार्यक्रमों को और अधिक बेहतर रूप दे सकेंगे।



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

Sunday, January 20, 2013

दिन के तीसरे प्रहर के कुछ मोहक राग



 

स्वरगोष्ठी-105 में आज
राग और प्रहर – 3

कृष्ण की बाँसुरी और राग वृन्दावनी सारंग 



‘स्वरगोष्ठी’ के 105वें अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इन दिनों आपके इस प्रिय स्तम्भ में लघु श्रृंखला ‘राग और प्रहर’ जारी है। गत सप्ताह हमने आपसे दिन के दूसरे प्रहर के कुछ रागों के बारे में चर्चा की थी। आज दिन के तीसरे प्रहर गाये-बजाये जाने वाले रागों पर चर्चा की बारी है। दिन का तीसरा प्रहर, अर्थात मध्याह्न से लेकर अपराह्न लगभग तीन बजे तक की अवधि के बीच का माना जाता है। इस अवधि में सूर्य की सर्वाधिक ऊर्जा हमे मिलती है और इसी अवधि में मानव का तन-मन अतिरिक्त ऊर्जा संचय भी करता है। आज के अंक में हम आपके लिए तीसरे प्रहर के रागों में से वृन्दावनी सारंग, शुद्ध सारंग, मधुवन्ती और भीमपलासी रागों की कुछ रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे।


सारंग अंग के रागों में वृन्दावनी सारंग और शुद्ध सारंग राग तीसरे प्रहर के प्रमुख राग माने जाते हैं। यह मान्यता है कि श्रीकृष्ण अपनी प्रिय बाँसुरी पर वृन्दावनी सारंग और मेघ राग की अवतारणा किया करते थे। सारंग का अर्थ होता है मयूर और कृष्ण द्वारा दिन के तीसरे प्रहर वृन्दावन के कुंजों में अपने सखाओं के संग इस राग की अवतारणा की परिकल्पना के कारण ही वृन्दावनी सारंग नाम प्रचलन में आया होगा। वर्तमान में राग वृन्दावनी सारंग काफी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। औड़व-औड़व जाति के इस राग के आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद, अर्थात दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। इस राग में गान्धार और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं होता। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किया जाता है। इसका वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। सामान्य परिवेश में इस राग का गायन-वादन दिन के तीसरे प्रहर में ही किया जाता है, परन्तु ग्रीष्म ऋतु की चरम अवस्था और वर्षा ऋतु का आहट देने वाले कजरारे मेघों के एकत्रीकरण के परिवेश का सार्थक चित्रण करने में भी राग वृन्दावनी सारंग पूर्ण समर्थ होता है। अब हम आपको राग वृन्दावनी सारंग में निबद्ध एक मध्य-द्रुत तीनताल की रचना बाँसुरी पर सुनवाते हैं। वादक हैं आश्विन श्रीनिवासन्।

राग वृन्दावनी सारंग : बाँसुरी - मध्य-द्रुत तीनताल की रचना : आश्विन श्रीनिवासन् 


दिन के तीसरे प्रहर अर्थात मध्याह्न से लेकर अपराह्न तक की अवधि का एक और राग है, शुद्ध सारंग। आरोह में पाँच और अवरोह में छह स्वरों, अर्थात औड़व-षाडव जाति के इस राग के आरोह में गान्धार और धैवत स्वर तथा अवरोह में गान्धार स्वर का प्रयोग वर्जित है। साथ ही आरोह में तीव्र मध्यम स्वर तथा अवरोह में शुद्ध मध्यम स्वर का प्रयोग किया जाता है। इस राग को कुछ संगीतकार कल्याण थाट से तो कुछ बिलावल थाट के अन्तर्गत मानते हैं। आपको राग शुद्ध सारंग का एक मनमोहक उदाहरण सुनवाने के लिए एक बार फिर हमने बाँसुरी वाद्य का ही चयन किया है। विश्वविख्यात बाँसुरी-वादक पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया के प्रिय रागों में राग शुद्ध सारंग भी एक राग है। उन्हीं का बजाया राग शुद्ध सारंग का आकर्षक आलाप अब हम आपको सुनवाते हैं।

राग शुद्ध सारंग : बाँसुरी – आलाप : पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया


दिन के तीसरे प्रहर में ही गाया-बजाया जाने वाला एक और मधुर राग है, मधुवन्ती। इस राग के बारे में यह तथ्य प्रचलित है कि मैहर घराने के सुप्रसिद्ध सरोद-वादक उस्ताद अली अकबर खाँ ने कर्नाटक पद्यति के 29वें मेलकर्ता राग धर्मावती के आरोह से ऋषभ और धैवत को हटा कर इस राग को स्वरूप दिया। स्वयं उस्ताद अली अकबर खाँ, पण्डित रविशंकर और इनके शिष्यों ने इस राग को प्रचारित-प्रसारित किया। औड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में ऋषभ और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं होता। आरोह में कोमल गान्धार और तीव्र मध्यम तथा अवरोह में इन स्वरों के साथ शुद्ध धैवत और ऋषभ स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। अब हम आपको राग मधुवन्ती की एक मध्य लय की रचना सरोद पर ही सुनवाते है। वादक हैं, उस्ताद अली अकबर खाँ।

राग मधुवन्ती : सरोद – मध्यलय की गत : उस्ताद अली अकबर खाँ


तीसरे प्रहर में अधिकाधिक प्रयोग किया जाने वाला एक राग भीमपलासी है। काफी थाट के अन्तर्गत माना जाने वाला भीमपलासी, औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग होता है। इसमें गान्धार व निषाद कोमल तथा अन्य स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। इसके आरोह में ऋषभ और धैवत स्वर वर्जित होता है, किन्तु अवरोह में सभी सातों स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर तार सप्तक का षडज होता है। कुछ विद्वान वादी स्वर के रूप में मध्यम का प्रयोग भी करते हैं। आज के इस अंक में अब हम आपको राग भीमपलासी पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। 1966 में सुनील दत्त और साधना अभिनीत एक फिल्म ‘मेरा साया’ का प्रदर्शन हुआ था। इस फिल्म के संगीत निर्देशक मदनमोहन ने राग भीमपलासी के सुरों में गीत- ‘नैनों में बदरा छाए...’ संगीतबद्ध किया था। गीतकार राजा मेंहदी अली खाँ के शब्दों को लता मंगेशकर के स्वरों का साथ मिला था। राग भीमपलासी पर आधारित इस फिल्मी गीत का आप रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग भीमपलासी : फिल्म – मेरा साया : ‘नैनों में बदरा छाए...’ : लता मंगेशकर


आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की 105वीं संगीत पहेली में हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 110वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 107वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 103वें अंक में हमने आपको 1991 में बनी फिल्म ‘लेकिन’ से राग गूजरी अथवा गूर्जरी तोड़ी पर आधारित एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग गूजरी या गूर्जरी तोड़ी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक हृदयनाथ और गायिका लता मंगेशकर। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर एकमात्र जबलपुर की क्षिति तिवारी ने ही दिया है। इन्हें पूरे दो अंक मिलते हैं। लखनऊ के प्रकाश गोविन्द ने दूसरे प्रश्न के आधे भाग का सही उत्तर दिया है, अतः इन्हें मिलते हैं .5 अंक। बैंगलुरु के पंकज मुकेश ने पहले प्रश्न का अधूरा उत्तर दिया है, अतः इन्हें मिलते हैं 1.5 अंक। जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने राग को तो सही पहचाना किन्तु गायक-गायिका को नहीं पहचान सके, अतः इन्हें एक अंक से ही सन्तोष करना होगा। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ।

झरोखा अगले अंक का 

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ पर इन दिनों ‘राग और प्रहर’ शीर्षक से लघु श्रृंखला जारी है। श्रृंखला के आगामी अंक में हम आपके लिए दिन के चौथे प्रहर में गाये-बजाए जाने वाले कुछ आकर्षक रागों की प्रस्तुतियाँ लेकर उपस्थित होंगे। आप हमारे आगामी अंकों के लिए आठवें प्रहर तक के प्रचलित रागों और इन रागों में निबद्ध अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों को पूरा सम्मान देंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9-30 ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सब संगीत-रसिकों की हम प्रतीक्षा करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

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