Skip to main content

सुन सुन जीने वाले जीना है तो....झूमें हंसें सुनकर ऐसे मस्त गीत


यह गीत अपने आप में विविधता लिए हुए है। लता-किशोर की आवाज़ों के साथ साथ ऐनेटे की कन्ट्रास्ट भरी आवाज़ गीत को दूसरे गीतों से अलग करती है। विदेशी उच्चारण में शुद्ध हिन्दी के शब्दों को सुनना भी बड़ा मज़ेदार लगता है। ऐनेटे पिण्टो की आवाज़ सिडक्टिव आवाज़ है और शायद इसी वजह से जब भी संगीतकारों नें उनकी आवाज़ का इस्तेमाल अपने गीतों में किया, अधिकतर गानें वैसे ही किसी सिचुएशन के लिए बने होते थे।



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 813/2011/253

'आओ झूमें गाएं' शृंखला की तीसरी कड़ी में आज एक और जीवन-दर्शन पर आधारित गीत फ़िल्म 'स्वामी दादा' से। १९८२ की देव आनन्द निर्मित व निर्देशित इस फ़िल्म में देव आनन्द के अलावा मुख्य कलाकार थे मिथुन चक्रवर्ती, नसीरुद्दीन शाह, पद्मिनी कोल्हापुरी, क्रिस्टिन ओ'नील, रति अग्निहोत्री प्रमुख। फ़िल्म के गीतकार थे अंजान और संगीतकार राहुल देव बर्मन। आज जिस गीत की हम बात कर रहे हैं, वह है "सुन सुन सुन सुन सुन जीने वाले, जीना है तो, जान ले तू, जीने के गुण, दुख में सुखों के सपने सजा ले, आंसू मे गा ले ख़ुशियों के धुन"। देव आनन्द, रति अग्निहोत्री और क्रिस्टिन पर फ़िल्माये इस गीत में क्रम से पार्श्वगायन किया है किशोर कुमार, लता मंगेशकर और ऐनेटे पिण्टो नें। गीत पर हम अभी आते हैं, उससे पहले इस फ़िल्म की कहानी का पार्श्व बताना चाहेंगे। 'स्वामी दादा' हरि मोहन नामक एक सन्त की कहानी है जो अपने भजनों और प्रवचनों से अपने भक्तों को बहुत ही खुले दिल से और प्यार से सम्बोधित करते हैं। हर कोई प्यार से उन्हें स्वामी दादा बुलाते हैं। उनके अनुयायियों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती चली जाती है। पर एक बात जो किसी को नहीं मालूम वह यह कि हरि मोहन एक बहुत बड़ा चोर है जो मन्दिर के बेशकीमती जवाहरातों को चुराने का प्लैन कर रहा है।

अब आते हैं आज के गीत पर। दोस्तों, यह गीत अपने आप में विविधता लिए हुए है। लता-किशोर की आवाज़ों के साथ साथ ऐनेटे की कन्ट्रास्ट भरी आवाज़ गीत को दूसरे गीतों से अलग करती है। विदेशी उच्चारण में शुद्ध हिन्दी के शब्दों को सुनना भी बड़ा मज़ेदार लगता है। ऐनेटे पिण्टो की आवाज़ सिडक्टिव आवाज़ है और शायद इसी वजह से जब भी संगीतकारों नें उनकी आवाज़ का इस्तेमाल अपने गीतों में किया, अधिकतर गानें वैसे ही किसी सिचुएशन के लिए बने होते थे। बहुत खोज-बीन के बावजूद ऐनेटे के बारे में कोई भी जानकारी नहीं मिल पायी है, जबकि ७० और ८० के दशकों में राहुल देव बर्मन और बप्पी लाहिड़ी नें उनसे कई कई गीत गवाये हैं। कुछ फ़िल्मों के नाम गिनवाता हूँ - दि बर्निंग् ट्रेन, वारदात, ये तो कमाल हो गया, कुदरत, ऊँची उड़ान, वक़्त की पुकार, मिस्टर बॉन्ड, ज़िन्दगानी, टेलीफ़ोन, कभी अजनबी थे, एक दिन बहू का, स्वामी दादा, सत्ते पे सत्ता, शिव चरण, मोर्चा और सुरक्षा। इनके अलावा नर्सरी राइम और कोंकणी भाषा में भी ऐनेटे के गीत गाने का पता चलता है इण्टरनेट पर। उनके बारे में जानकारी प्राप्त करने की मैं पूरी कोशिश करूंगा और भविष्य में सम्भव है उन पर कोई लेख पोस्ट करूँ। फ़िल्हाल उनकी आवाज़ को सुन कर ही उन्हें सलाम करते हैं। सुनते हैं 'स्वामी दादा' का यह बड़ा ही आशावादी गीत जो आपमें नया जोश भर देगा। तो लता जी और ऐनेटे की आवाज़ों का जो कॉन्ट्रस्ट है, उसका आनन्द लिया जाए! वैसे आपको बता दें कि इसी फ़िल्म में एक और जीवन दर्शन आधारित गीत है आशा-किशोर-अमित का गाया हुआ जिसके बोल हैं "ज़िन्दगी यह कैसी है, जैसे जीयो वैसी है"।



मित्रों, ये आपके इस प्रिय कार्यक्रम "ओल्ड इस गोल्ड" की अंतिम शृंखला है, ८०० से भी अधिक एपिसोडों तक चले इस यादगार सफर में हमें आप सबका जी भर प्यार मिला, सच कहें तो आपका ये प्यार ही हमारी प्रेरणा बना और हम इस मुश्किल काम को इस अंजाम तक पहुंचा पाये. बहुत सी ऐसी बातें हैं जिन्हें हम सदा अपनी यादों में सहेज कर रखेंगें. पहले एपिसोड्स से लेकर अब तक कई साथी हमसे जुड़े कुछ बिछड़े भी पर कारवाँ कभी नहीं रुका, पहेलियाँ भी चली और कभी ऐसा नहीं हुआ कि हमें विजेता नहीं मिला हो. इस अंतिम शृंखला में हम अपने सभी नए पुराने साथियों से ये गुजारिश करेंगें कि वो भी इस श्रृखला से जुडी अपनी कुछ यादें हम सब के साथ शेयर करें....हमें वास्तव में अच्छा लगेगा, आप सब के लिखे हुए एक एक शब्द हम संभाल संभाल कर रखेंगें, ये वादा है.

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें admin@radioplaybackindia.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें +91-9811036346 (सजीव सारथी) या +91-9878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Comments

किशोर संपत said…
रेडियो प्लेबैक इंडिया पर आप सबको बहुत बहुत बधाई!

प्रश्न है वार्षिक टॉप टेन के बारेमे - पायदान १०,९,८,७ वगैरह कहाँ से प्राप्त हो सकते है

धन्यवाद

किश
ओट्टावा, कनाडा
Smart Indian said…
सुन्दर कड़ी और एकदम अलग सा गीत, मैने पहले कभी सुना हो, याद नहीं पड़ता।
Sajeev said…
किशोर जी कड़ियाँ रोज अपडेट हो रहीं हैं, २६ दिसंबर को आपके लिए सारे गीत इक साथ पेश कर दिए जायेंगें, धन्येवाद

Popular posts from this blog

भला हुआ मेरी मटकी फूटी.. ज़िन्दगी से छूटने की ख़ुशी मना रहे हैं कबीर... साथ हैं गुलज़ार और आबिदा

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #११३ सू फ़ियों-संतों के यहां मौत का तसव्वुर बडे खूबसूरत रूप लेता है| कभी नैहर छूट जाता है, कभी चोला बदल लेता है| जो मरता है ऊंचा ही उठता है, तरह तरह से अंत-आनन्द की बात करते हैं| कबीर के यहां, ये खयाल कुछ और करवटें भी लेता है, एक बे-तकल्लुफ़ी है मौत से, जो जिन्दगी से कहीं भी नहीं| माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोहे । एक दिन ऐसा आयेगा, मैं रोदुंगी तोहे ॥ माटी का शरीर, माटी का बर्तन, नेकी कर भला कर, भर बरतन मे पाप पुण्य और सर पे ले| आईये हम भी साथ-साथ गुनगुनाएँ "भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे"..: भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे । मैं तो पनिया भरन से छूटी रे ॥ बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलिया कोय । जो दिल खोजा आपणा, तो मुझसा बुरा ना कोय ॥ ये तो घर है प्रेम का, खाला का घर नांहि । सीस उतारे भुँई धरे, तब बैठे घर मांहि ॥ हमन है इश्क़ मस्ताना, हमन को हुशारी क्या । रहे आज़ाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ॥ कहना था सो कह दिया, अब कछु कहा ना जाये । एक गया सो जा रहा, दरिया लहर समाये ॥ लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल । लाली देखन मैं गयी, मैं भी हो गयी लाल ॥ हँस हँस कु...

"जाने कहाँ गए वो दिन...", कौन कौन से थे इस गीत के वो तीन अन्तरे जो जारी नहीं हुए?

एक गीत सौ कहानियाँ - 95 'जाने कहाँ गए वो दिन ...'   रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना  रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।  इसकी 95-वीं कड़ी में आज जानिए 1970 की फ़िल्म ’मेरा नाम जोकर’ के मशहूर गीत "जाने कहाँ गए वो दिन..." के बारे में जिसे मुके...

छम छम नाचत आई बहार....एक ऐसा मधुर गीत जिसे सुनकर कोई भी झूम उठे

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 366/2010/66 "ए क बार फिर बसंत जवान हो गया, जग सारा वृंदावन धाम हो गया, आम बौराई रहा, सरसों भी फूल रहा, खेत खलिहान शृंगार हो गया, पिया के हाथ दुल्हन शृंगार कर रही, आज धूप धरती से प्यार कर रही, बल, सुंदरता के आगे बेकार हो गया, सृष्टि पे यौवन का वार हो गया, रात भी बसंती, प्रभात भी बसंती, बसंती पिया का दीदार हो गया, सोचा था फिर कभी प्यार ना करूँगा, पर 'अंजाना' बसंत पे निसार हो गया, एक बार फिर बसंत जवान हो गया।" अंजाना प्रेम ने अपनी इस कविता में बसंत की सुंदरता को शृंगार रस के साथ मिलाकर का बड़ा ही ख़ूबसूरत नज़ारा प्रस्तुत किया है। दोस्तों, इन दिनों आप 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुन रहे हैं इस रंगीले मौसम को और भी ज़्यादा रंगीन बनानेवाले कुछ रंगीले गीत इस 'गीत रंगीले' शृंखला के अंतर्गत। आज प्रस्तुत है राग बहार पर आधारित लता मंगेशकर की आवाज़ में फ़िल्म 'छाया' का गीत "छम छम नाचत आई बहार"। राजेन्द्र कृष्ण के लिखे इस गीत की तर्ज़ बनाई है सलिल चौधरी ने। १९६१ की यह फ़िल्म ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म थी जिसमें मुख्य कलाकार थे सुनिल...