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Sunday, January 16, 2011

मुश्किल है बहुत मुश्किल चाहत का भुला देना....और भुला पाना उन फनकारों को जिन्होंने हिंदी सिनेमा में सस्पेंस थ्रिलर की नींव रखी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 571/2010/271

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस नए सप्ताह में आप सभी का फिर एक बार हार्दिक स्वागत है। दोस्तों, बचपन में आप सभी ने कभी ना कभी अपनी दादी-नानी से भूत-प्रेत की कहानियाँ तो ज़रूर सुनी होंगी। सर्दी की रातों में खाना खाने के बाद रजाई ओढ़कर मोमबत्ती या लालटेन की रोशनी में दादी-नानी से भूतों की कहानी सुनने का मज़ा ही कुछ अलग होता था, है न? और कभी कभी तो बच्चे अगर ज़िद करे या शैतानी करे तो भी उन्हें भूत-प्रेत का डर दिखाकर सुलाया जाता है, आज भी। लेकिन जब हम धीरे धीरे बड़े होते है, तब हमें अहसास होने लगता है कि ये भूत-प्रेत बस कहानियों में ही वास करते हैं। हक़ीक़त में इनका कोई वजूद नहीं है। लेकिन क्या वाक़ई यह सच है कि आत्मा या भूत-प्रेत का कोई वजूद नहीं, बस इंसान के मन का भ्रम या भय है? दोस्तों, सदियों से सिर्फ़ हमारे देश में ही नही, बल्कि समूचे विश्व में भूत-प्रेत की कहानियाँ तो प्रचलित हैं ही, बहुत सारे क़िस्से ऐसे भी हुए हैं जिनके द्वारा लोगों ने यह साबित करने की कोशिश की है कि भूत-प्रेत और आत्माओं का अस्तित्व है। हर देश में इस तरह के किस्से, इस तरह की घटनाओं का ब्योरा मिलता है। तो हमने भी सोचा कि क्यों ना देश विदेश की ऐसी ही तमाम "सत्य" घटनाओं को संजोकर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में एक लघु शृंखला चलाई जाये, जिसमें हम देश विदेश की इन रोमहर्षक घटनाओं का ज़िक्र तो करेंगे ही, साथ ही यह भी जानने की कोशिश करेंगे कि विज्ञान क्या कहता है इनके बारे में। और लगे हाथ हम कुछ ऐसे गीत भी सुनेंगे जो सपेन्स थ्रिलर या हॊरर फ़िल्मों से चुने हुए होंगे। तो प्रस्तुत है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई लघु शृंखला 'मानो या ना मानो'। आज इसकी पहली कड़ी में हम ज़िक्र करना चाहेंगे आकाशवाणी कोलकाता की। अब आप हैरान हो रहे होंगे कि भूत प्रेत से आकाशवाणी कोलकाता का क्या रिश्ता है! बात ऐसी है कि आकाशवाणी कोलकाता का जो पुराना ऒफ़िस था गार्स्टिन प्लेस नामक जगह में, जो अब परित्यक्त है, ऐसा सुनने में आता है कि यह जगह हौण्टेड है। अभी हाल ही में स्टार आनंद (स्टार टीवी का बंगला चैनल) पर कई कलाकारों के विचार दिखाये गये थे जिन्होंने इस बात की पुष्टि की है, और इनमें से एक गायिका हेमंती शुक्ला भी हैं। हेमंती जी ने बताया कि उन्हें गुज़रे ज़माने के कुछ कलाकारों ने बताया कि उस जगह पर अजीब-ओ-ग़रीब आवाज़ें सुनी जा सकती है। अपने आप ही पियानो के बजने की आवाज़ भी कई लोगों ने सुनी है रात के वक़्त। १ गार्स्टिन प्लेस, जहाँ पर ऒल इण्डिया रेडिओ कोलकाता का जन्म हुआ था, उसके विपरीत अब जॊब चारनॊक की कब्र है, और शायद यह भी एक कारण है लोगों के इस जगह को हौण्टेड मानने का। भले ही आज लोग रात के वक़्त इस जगह के आसपास से गुज़रना पसंद नहीं करते हों, लेकिन वैज्ञानिक तौर पर इस रहस्य के पीछे का कारण पता नहीं चल सका है।

दोस्तों, क्योंकि यह 'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला है, इसलिए चाहे कितनी भी क़िस्से और कहानियाँ आपको सुनवाएँ, घूम फिर कर तो हमें पुराने फ़िल्मी गीतों की तरफ़ मुड़ना ही है। हिंदी फ़िल्मों में सस्पेन्स और हॊरर फ़िल्मों की बात करें तो जिस फ़िल्म की याद हमें सब से पहले आती है, वह है १९४९ की 'महल'। 'बॊम्बे टॊकीज़' बम्बई के मलाड में स्थित था। उसका कैम्पस बहुत बड़ा था, कंपनी में काम करने वालों के बच्चों के लिए स्कूल व अन्य सुविधाएँ भी मौजूद थी वहाँ। एक बार ऐसी बात चल पड़ी कि उस कैम्पस में भूत हैं और यहाँ तक कि हिमांशु राय का जो बंगला है, वह हौण्टेड है। जब दादामुनि अशोक कुमार ने इस बात का ज़िक्र कमाल अमरोही से किया, तो उनके दिमाग़ में पुनर्जनम की एक कहानी सूझी जिसका नतीजा था 'महल'। फ़िल्म की कहानी कुछ इस तरह की थी कि हरिशंकर (अशोक कुमार) अपने पूर्वजों की जायदाद, एक परित्यक्त महल को देखने के लिए जाते हैं। इस 'शबनम महल' का अतीत बहुत ज़्यादा सुखदायी नहीं था। इतने बरसों के बाद उस महल में वो गये और उस वक़्त हैरान रहे गये जब उन्होंने देखा कि उनका ही एक चित्र दीवार पर टंगा हुआ है। महल की देखरेख करने वाले बूढ़े आदमी ने उस चित्र के पीछे की कहानी बताई और बताया कि किस तरह से वहाँ एक प्रेमी का और उसकी प्रेमिका का अंत हुआ था। बाद में हरिशंकर एक लड़की को देखते है गाते हुए, कभी बग़ीचे में झूला झूलते हुए, लेकिन जब भी वो उसके पास जाते हैं, वो ग़ायब हो जाती है। उस बूढ़े चौकीदार और उनका वकील दोस्त श्रीनाथ, दोनों ही उन्हें उस महल से दूर रहने की सलाह देते हैं। हरिशंकर जितना दूर जाने की कोशिश करते हैं, कुछ बात उन्हें और ज़्यादा उस महल के करीब ले जाती है, और वो क्रमश: उस महल में फैली गहरी भूतिया अंधकार में धँसते चले जाते हैं। फ़िल्म का हौण्टिंग् नंबर "आयेगा आनेवाला" हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुनवा चुके हैं। राजकुमारी का भी गाया हुआ "घबरा के जो हम सर को टकराएँ तो अच्छा" भी आपने सुना था इसी महफ़िल में। आइए आज इस फ़िल्म से सुनें लता मंगेशकर की आवाज़ में "मुश्किल है बहुत मुश्किल चाहत का भुला देना"। खेमचंद प्रकाश का संगीत और नक्शब जराचवी के बोल। राग पहाड़ी पर आधारित यह गीत है जो फ़िल्माया गया है मधुबाला पर। किसी भी सस्पेन्स थ्रिलर फ़िल्म की सफलता में पार्श्व संगीत या बकग्राउण्ड म्युज़िक का बहुत बड़ा हाथ होता है और साथ ही बड़ा हाथ होता है छायांकन का। इन दो क्षेत्रों में क्रम से खेमचंद प्रकाश और जोसेफ़ विर्स्चिंग् ने अतुलनीय काम किया, और इस फ़िल्म ने हिंदी सस्पेन्स थ्रिलर की नीव रखी और एक ट्रेण्डसेटर फ़िल्म सिद्ध हुई। तो लीजिए, लता जी के करीयर के शुरुआती दौर का यह यादगार गीत सुनिए और आवाज़ दीजिए उस गुज़रे सुरीले ज़माने को। कल कुछ और दिलचस्प तथ्यों और एक और हौण्टिंग् नंबर के साथ हाज़िर होंगे, नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि किशोर कुमार को पहली बार पार्श्वगायक के रूप में दुनिया के समक्ष प्रस्तुत करने वाले संगीतकार खेमचंद प्रकाश ही थे और वह फ़िल्म थी 'ज़िद्दी' (१९४८)।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 02/शृंखला 08
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - इतना बहुत है इस यादगार गीत को पहचानने के लिए.

सवाल १ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल २ - फिल्म की नायिका जून है - १ अंक
सवाल ३ - संगीतकार कौन हैं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
दोस्तों पिछली शृंखला के परिणाम बताते हुए हमसे एक भूल हुई, अमित जी के कुछ अंक हमसे गलती से छूट गए...दरसअल अमित जी के १२ अंक है शरद जी के १० अंकों की तुलना में, तो इस तरह ७ वीं शृंखला अमित जी ने नाम रही....अमित जी ने हमारा ध्यान इस तरफ़ आकर्षित करवाया, और उन्हीं से हमें पता चला कि उनका पूरा नाम अमित तिवारी है और वो उस अमित जी से अलग हैं जो पहले एक शृंखला जीत चुके हैं. बहरहाल अब की सात श्रृंखलाओं में स्कोर अब इस प्रकार है - श्याम जी -४, शरद जी २, और अमित और अमित तिवारी जी एक एक. असुविधा के लिए क्षमा चाहेंगें. नयी शृंखला में एक बार फिर अमित तिवारी जी ने बढ़त बनाई है २ अंक लेकर शरद जी और प्रतिभा जी पर जिन्हें १-१ अंक मिले हैं.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, September 13, 2010

नन्ही नन्ही बुंदिया जिया लहराए बादल घिर आए...बरसात के मौसम में आनंद लीजिए लता के इस बेहद दुर्लभ गीत का भी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 482/2010/182

'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कल से हमने शुरु की है इस सदी की आवाज़ लता मंगेशकर के गाए कुछ बेहद दुर्लभ और भूले बिसरे गीतों से सजी लघु शृंखला 'लता के दुर्लभ दस'। कल की कड़ी में आपने १९४८ की फ़िल्म 'हीर रांझा' का एक पारम्परिक विदाई गीत सुना था, आइए आज १९४८ की ही एक और फ़िल्म का गीत सुना जाए। यह फ़िल्म है 'मेरी कहानी'। इस फ़िल्म का निर्माण किया था एस. टी. पी प्रोडक्शन्स के बैनर ने, फ़िल्म के निर्देशक थे केकी मिस्त्री। सुरेन्द्र, मुनव्वर सुल्ताना, प्रतिमा देवी, मुराद और लीला कुमारी अभिनीत इस फ़िल्म के संगीतकार थे दत्ता कोरेगाँवकर, जिन्हें हम के. दत्ता के नाम से भी जानते हैं। फ़िल्म में दो गीतकारों ने गीत लिखे - नक्शब जराचवी, यानी कि जे. नक्शब, और अंजुम पीलीभीती। इस फ़िल्म के मुख्य गायक गायिका के रूप में सुरेन्द्र और गीता रॊय को ही लिया गया था। लेकिन उपलब्ध जानकारी के अनुसार लता मंगेशकर से इस फ़िल्म में दो गीत गवाए गए थे, जिनमें से एक तो आज का प्रस्तुत गीत है "नन्ही नन्ही बुंदिया जिया लहराए बादल घिर आए", और दूसरे गीत के बोल थे "दिलवाले दिल का मेल"। उल्लेखनीय बात यह है कि यह जो "दिलवाले दिल का मेल" गीत है, इसकी धुन १९४४ की ब्लॊकबस्टर फ़िल्म 'रतन' के मशहूर गीत "जब तुम ही चले परदेस" से प्रेरित था। गीता-सुरेन्द्र के गाए "दिल की दुनिया में हाँ" और "बुलबुल को मिला" और सुरेन्द्र के गाए "दिल को तुम्हारी याद ने आकर हिला दिया" जैसे सुरीली गीतों के बावजूद के. दत्ता धीरे धीरे पीछे होते चले गए, और फ़िल्म संगीत के बदलते माहौल को अपना ना सके। दोस्तों, के. दत्ता ही वो संगीतकार थे जिन्होंने लता को उनका पहला एकल प्लेबैक्ड गीत "पा लागूँ कर जोरी रे, श्याम मोसे ना खेलो होरी" दिया था १९४७ की फ़िल्म 'आपकी सेवा में' में। और आज के प्रस्तुत गीत के गीतकार जे. नक्शब ने लता को दिया था उनका पहला सुपर डुपर हिट गीत "आएगा आनेवाला" १९४९ की फ़िल्म 'महल' में। तो इस तरह से आज का 'मेरी कहानी' फ़िल्म का यह गीत बेहद ख़ास है क्योंकि इस गीत के गीतकार और संगीतकार का लता के शुरुआती करीयर में बेहद महत्वपूर्ण स्थान रहा है। आज के प्रस्तुत गीत की अगर बात करें तो यह बारिश का गीत है और बड़ी ही चंचल और चुलबुली अंदाज़ में लता जी की कमसिन आवाज़ में इसे गाया गया है। गीत का रीदम सुन कर नूरजहाँ के गाए "जवाँ है मोहब्बत हसी है ज़माना" गीत की भी याद आ जाती है।

दोस्तों, जैसा कि हमने कल कहा था कि इस शृंखला में सुनेंगे तो लता जी के ही गीत, लेकिन चर्चा ज़्यादा करेंगे इन दुर्लभ गीतों से जुड़े कुछ भूले बिसरे फ़नकारों की। ये वो फ़नकार हैं जिनकी यादें भी आज धुंदली होती जा रही हैं। रोज़ मर्रा की ज़िंदगी में हम इन्हें भले याद ना करें, लेकिन इस बात को झुटला भी नहीं सकते कि फ़िल्म संगीत के उस दौर में इन फ़नकारों ने फ़िल्म संगीत के ख़ज़ाने को समृद्ध करने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। आइए आज बात करते हैं के. दत्ता साहब की। दत्ता कोरेगाँवकर ४० और ५० के दशक के एक कमचर्चित संगीतकार थे, जिन्होंने अपने पूरे करीयर में केवल १७ फ़िल्मों में ही संगीत दिया। उनका सफ़र शुरु हुआ था १९३९ की फ़िल्म 'मेरा हक़' से, उसके बाद १९४० में 'अलख निरंजन' और 'गीता' जैसी फ़िल्मों में संगीत दिया लेकिन ये फ़िल्में नहीं चलीं। के. दत्ता ने १९४२ में मज़हर ख़ान निर्देशित फ़िल्म 'याद' में संगीत दिया जिसके गानें मशहूर हुए थे। जी. एम. दुर्रानी और राजकुमारी की आवाज़ों में इस फ़िल्म का एक रोमांटिक डुएट "याद जब बेचैन करती है" ख़ासा लोकप्रिय हुआ था उस ज़माने में। फिर उसके बाद दत्ता साहब का साथ हुआ मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ से। १९४५ में फ़िल्म 'बड़ी माँ' में नूरजहाँ के गाए गीतों ने तहलका मचा दिया था। आज जब लता जी पर केन्द्रित है यह शृंखला, तो यहाँ पर यह बताना ज़रूरी है कि 'बड़ी माँ' में अपने पिता की मृत्यु के बाद घर की आजीविका चलाने को संघर्षरत लता जी को मास्टर विनायक ने एक छोटी सी भूमिका दी थी और अपने उपर फ़िल्माए दो गीतों को भी उन्होंने गाया था। कीर्तन शैली का "माता तेरे चरणों में" और "जननी जन्मभूमि.... तुम माँ हो बड़ी माँ" लता के आरम्भिक गीतों के तौर पर ऐतिहासिक महत्व रखता है। के. दत्ता और लता से संबंधित एक और रोचक जानकारी हम यहाँ आपको देना चाहेंगे जो हमें प्राप्त हुई पंकज राग लिखित 'धुनों की यात्रा' किताब में। 'बड़ी माँ' के समय ही के. दत्ता और फ़िल्म के अन्य सदस्यों के साथ गेटवे ऒफ़ इण्डिया के पास एक दिन शाम को टहलते हुए लता ने "पैग़ाम" शब्द का उच्चारण ग़लत तरीके से बग़ैर नुक्ते के किया। के. दत्ता ने वहीं लता को रोका और स्पष्ट तौर पर समझाया कि यदि लता फ़िल्मों में अपना करीयर बनाना चाहती हैं तो उन्हें उर्दू शब्दों का स्पष्ट उच्चारण सीखना होगा। लता इस सीख को कभी नहीं भूलीं, और उनकी शुद्ध अदायगी में के. दत्ता की इस सीख का कहीं न कहीं हाथ अवश्य रहा है। तो आइए, सुनते हैं फ़िल्म 'मेरी कहानी' का यह गीत जिसके लिए आभार अजय देशपाण्डेय जी का जिन्होंने इस दुर्लभ गीत को हमारे लिए उपलब्ध करवाया.



क्या आप जानते हैं...
कि के. दत्ता स्वरब्द्ध 'बड़ी माँ' का मशहूर गीत "दिया जलाकर आप बुझाया" ओ. पी. नय्यर को इतना पसंद था कि संगीतकार बन कर शोहरत हासिल करने के बाद नय्यर साहब ने दता साहब को ख़ास इस गीत के लिए एक पियानो भेंट किया था।

विशेष सूचना:

लता जी के जनमदिन के उपलक्ष्य पर इस शृंखला के अलावा २५ सितंबर शनिवार को 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ानें' में होगा लता मंगेशकर विशेष। इस लता विशेषांक में आप लता जी को दे सकते हैं जनमदिन की शुभकामनाएँ बस एक ईमेल के बहाने। लता जी के प्रति अपने उदगार, या उनके गाए आपके पसंदीदा १० गीत, या फिर उनके गाए किसी गीत से जुड़ी आपकी कोई ख़ास याद, या उनके लिए आपकी शुभकामनाएँ, इनमें से जो भी आप चाहें एक ईमेल में लिख कर हमें २० सितंबर से पहले oig@hindyugm.com के पते पर भेज दें। हमें आपके ईमेल का इंतज़ार रहेगा।


अजय देशपांडे जी ने लता जी के दुर्लभ गीतों को संगृहीत करने के उद्देश्य से एक वेब साईट का निर्माण किया है, जरूर देखिये यहाँ.

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. यह १९४९ की एक फ़िल्म का गीत है, फ़िल्म के शीर्षक में दो शब्द हैं और दोनों ही अंग्रेज़ी के। फ़िल्म का नाम बताएँ। ३ अंक।
२. युं तो यह लता का गाया एकल गीत है, लेकिन इस फ़िल्म में लता ने शंकर दासगुप्ता के साथ एक युगल गीत भी गाया था। कल बजने वाले गीत का भाव बिलकुल वही है जो भाव लता और मुकेश के गाए उस सदाबहार युगल गीत का भी है जिसे रोशन ने स्वरबद्ध किया था। चलिए कई क्लूज़ दे दिए, अब आप बताइए कल बजने वाले गीत के बोल। ३ अंक।
३. इस फ़िल्म में दो संगीतकार हैं। इनमें से एक वो हैं जिन्होंने लता को यह सिखाया था कि गीत गाते वक़्त सांसों को कैसे नियंत्रित किया जाता है ताकि सांसें सुनाई ना दे। कौन हैं ये महान संगीतकार? २ अंक।
४. गीतकार वो हैं जिनका लिखा एक ग़ैर फ़िल्मी देशभक्ति गीत लता का गाया सब से मशहूर देशभक्ति गीत बन गया है। गीतकार बताएँ। १ अंक।

पिछली पहेली का परिणाम -
केवल अवध जी सही जवाब दे पाए. वैसे हम ये समझ सकते हैं कि ये शृंखला जरा मुश्किल होगी हमारे श्रोताओं के लिए, पर चुनौतियों में ही मज़ा है, है न....स्कोर अब तक - अवध जी है ८१ पर, इंदु जी हैं ५० पर, पवन जी ३५ और प्रतिभा जी ३४ पर हैं. बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, December 16, 2009

घबरा के जो हम सर को टकराएँ तो अच्छा है...दर्द भरा बेहद मशहूर गीत राजकुमारी का गाया

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 292

राग सांकला जी के पसंद का दूसरा गाना है १९४९ की फ़िल्म 'महल' का। जहाँ एक तरफ़ इस फ़िल्म में "आयेगा आनेवाला" गीत गा कर लता मंगेशकर को अपना पहला पहला बड़ा ब्रेक मिला था, वहीं गायिका राजकुमारी ने भी इस फ़िल्म में अपने करीयर का एक बड़ा ही कामयाब गीत गाया था। यह गीत है "घबरा के जो हम सर को टकराएँ तो अच्छा है", जिसे आज हम पराग जी की फ़रमाइश पर सुनने जा रहे हैं। 'महल' बॊम्बे टॊकीज़ की फ़िल्म थी, जिसमें संगीत दिया खेमचंद प्रकाश ने और गानें लिखे नकशब जराचवी ने, जिन्हे हम जे. नकशब के नाम से भी जानते हैं। 'महल' एक सस्पेन्स थ्रिलर फ़िल्म थी, जो एक ट्रेंडसेटर फ़िल्म साबित हुई। हुआ युं था कि बॊम्बे टॊकीज़ मलाड का एक विस्तृत इलाका संजोय हुए था। उस कैम्पस में बहुत से लोग रहते थे, बॊम्बे टॊकीज़ के कर्मचारियों के बच्चों के लिए स्कूल भी उसी कैम्पस के अंदर मौजूद था। एक बार एक ऐसी अफ़वाह उड़ी कि उस कैम्पस में भूत प्रेत बसते हैं, और यहाँ तक भी कहा गया कि स्वर्गीय हिमांशु राय का जो बंगला था, उसमें भी भूत हैं। यह बात जब दादामुनि अशोक कुमार ने कमाल अमरोही साहब से कहे तो कमाल साहब को पुनर्जनम पर एक कहानी सूझी और आख़िरकार फ़िल्म 'महल' के रूप में वह पर्दे पर आ ही गई। अशोक कुमार, मधुबाला और विजयलक्ष्मी ने इस फ़िल्म में मुख्य किरदार निभाए। एक सुपर डुपर हिट म्युज़िकल फ़िल्म है 'महल', जिसे हिंदी सिनेमा का एक लैंडमार्क फ़िल्म माना जाता है।

'महल' में लता जी ने मधुबाला का पार्श्वगायन किया था और राजकुमारी ने गाए विजयलक्ष्मी के लिए। अमीन सायानी को दिए गए एक पुराने इंटरव्यू में राजकुमारी जी ने ख़ास कर इस फ़िल्म के गीतों के बारे में कहा था - "महल में मेरे चार गानें थे, और चारों गानें काफ़ी अच्छे थे और लोगों ने काफ़ी पसंद भी किए। दो अब भी याद है लोगों को। और अभी भी कभी कभी वो महल पिक्चर रिलीज़ होती रहती है। "मैं वह दुल्हन हूँ रास ना आया जिसे सुबह", इसे विजयलक्ष्मी के लिए गाया था।" लेकिन जिस गीत के लिए वो जानी गईं, वह गीत है "घबरा के जो सर को टकराएँ तो अच्छा हो"। यह गीत इतना ज़्यादा हिट हुआ कि उसके बाद राजकुमारी जिस किसी भी पार्टी या जलसे में जातीं, उन्हे इस गीत के लिए फ़रमाइशें ज़रूर आतीं। हक़ीक़त भी यही है कि यह गीत उनके आख़िर के दिनों में उनका आर्थिक सहारा भी बना। राजकुमारी ने सब से ज़्यादा गानें ४० के दशक में गाए, और ५० के दशक के शुरुआती सालों में भी उनके गानें रिकार्ड हुए। जिन फ़िल्मों में उनके हिट गानें रहे, उनके नाम हैं - बाबला, भक्त सूरदास, बाज़ार, नर्स, पन्ना, अनहोनी, महल, बावरे नैन, आसमान, और नौबहार। दोस्तों, अमीन सायानी के उसी इंटरव्यू में जब अमीन भाई ने उनसे पूछा कि उन्होने फ़िल्मों के लिए गाना क्यों छोड़ दिया, तो उसके जवाब में राजकुमारी जी ने अफ़सोस व्यक्त हुए कहा कि "मैनें फ़िल्मों के लिए गाना कब छोड़ा, मैने छोड़ा नहीं, मैने कुछ छोड़ा नहीं, वैसे लोगों ने बुलाना बंद कर दिया। अब यह तो मैं नहीं बता पाउँगी कि क्यों बुलाना बंद कर दिया"। बहुत ही तक़लीफ़ होती है किसी अच्छे कलाकार के मुख से ऐसे शब्द सुनते हुए। ऐसे बहुत से कलाकार हैं जिन्हे बदलते वक़्त ने अपने चपेट में ले लिया और लोगों ने भी उन्हे धीरे धीरे भुला दिया। राजकुमारी एक ऐसी ही गायिका हैं जिन्होने बहुत से सुरीले और कर्णप्रिय गानें गाए हैं, और आज का यह अंक हम उन्ही को समर्पित कर रहे हैं। सुनते हैं फ़िल्म 'महल' का गीत और शुक्रिया पराग जी का इस गीत को चुनने के लिए। सुनिए...



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. इस गीत को गाया है हेमंत कुमार ने.
२. ओ पी दत्ता निर्देशित इस फिल्म में नलनी जयवंत भी थी.
३. मुखड़े में शब्द है "आंसू".

पिछली पहेली का परिणाम -
इंदु जी अब आप मात्र ७ जवाब दूर हैं ५० के आंकडे से....पर आपके पास एपिसोड भी केवल ८ हैं इस लक्ष्य को पाने के लिए, यदि आप ऐसा कर पायीं तो ये ओल्ड इस गोल्ड के इतिहास में एक रिकॉर्ड होगा, सबसे तेज़ अर्धशतक ज़माने का.....हमारी तरफ से अग्रिम बधाई स्वीकार करें, अनुराग जी आपको इस महफ़िल में देख अच्छा लगा

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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