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गुरुवार, 18 अक्तूबर 2012

स्मृतियों के झरोखे से : पार्श्व गायन की शुरुआत "धूप छांव" से


भूली-बिसरी यादें


भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में आयोजित विशेष श्रृंखला ‘स्मृतियों के झरोखे से’ के एक नये अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आपके बीच उपस्थित हूँ और आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज मास का तीसरा गुरुवार है और इस दिन हम आपके लिए मूक और सवाक फिल्मों की कुछ रोचक दास्तान लेकर आते हैं। तो आइए पलटते हैं, भारतीय फिल्म-इतिहास के कुछ सुनहरे पृष्ठों को।

यादें मूक फिल्म-युग की : लन्दन में भी प्रदर्शित हुआ ‘राजा हरिश्चन्द्र’ 

दादा साहब फालके की बनाई पहली भारतीय मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ से ही भारतीय सिनेमा का इतिहास आरम्भ होता है। इस फिल्म का पूर्वावलोकन 21अप्रैल 1913 को और नियमित प्रदर्शन 3मई, 1913 को हुआ था। भारतीय दर्शकों के लिए परदे पर चलती-फिरती तस्वीरें देखना किसी चमत्कार से कम नहीं था। दादा साहब फालके ने इस फिल्म के निर्माण के लिए ‘फालके ऐंड कम्पनी’ की स्थापना बम्बई (अब मुम्बई) में की थी। फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ के प्रदर्शन के बाद फालके ने अपनी अगली फिल्मों का निर्माण नासिक में किया। इसके लिए उन्होने अपना कार्यालय और स्टूडिओ बम्बई से नासिक स्थानान्तरित किया।

प्रथम अभनेत्री कमला बाई 
वर्ष 1913 में ही दादा साहब फालके ने नासिक के स्टूडिओ में अपनी दूसरी फिल्म ‘भष्मासुर मोहिनी’ का निर्माण किया। 3245 फुट लम्बी यह फिल्म एक पौराणिक कथानक पर आधारित थी। यह वही फिल्म थी, जिसमे भारतीय फिल्मों के इतिहास में पहली बार स्त्री भूमिका में एक अभिनेत्री को प्रस्तुत किया गया था। पिछले अंक में हम भारतीय सिनेमा के इतिहास की पहली अभिनेत्री कमला बाई की चर्चा कर चुके हैं। फाल्के द्वारा निर्मित दूसरी फिल्म ‘भष्मासुर मोहिनी’ का प्रदर्शन 27दिसम्बर, 1913 को हुआ था। इसी वर्ष एक ऐसी घटना भी हुई, जिससे भारतीय सिनेमा को दक्षिण भारत में भी स्थायित्व मिला। रघुपति वेंकैया नायडू उन दिनों घुमन्तू (टूरिंग) सिनेमा का व्यावसायिक प्रदर्शन दक्षिण भारत में किया करते थे। ‘राजा हरिश्चन्द्र’ के सफल प्रदर्शन से उत्साहित होकर उन्होने तत्कालीन मद्रास शहर में पहला स्थायी सिनेमाघर बनवाया। अगले वर्ष अर्थात 1914 में जे.एफ. मदान ने दिल्ली में एक स्थायी सिनेमाघर- ‘एल्फ़िस्टन पिक्चर पैलेस’ का निर्माण कराया था। दादा साहब फालके ने वर्ष 1913 में दो मूक फिल्मों का निर्माण कर अपना जो वर्चस्व कायम किया था, वह अगले वर्ष 1914 में भी बना रहा। इस वर्ष फाल्के की तीसरी फिल्म ‘सावित्री-सत्यवान’ का निर्माण और प्रदर्शन हुआ था। 6जून, 1914 को प्रदर्शित यह फिल्म भी एक पौराणिक कथा पर आधारित थी। वर्ष 1914 की एक महत्त्वपूर्ण घटना यह भी थी कि फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ का प्रदर्शन लन्दन में हुआ था।

सवाक युग के धरोहर : पार्श्वगायन परम्परा का सूत्रपात फिल्म ‘धूप छाँव’ से हुआ

भारतीय फिल्मों में आवाज़ का आगमन 1931 में बनी फिल्म ‘आलमआरा’ से हुआ था। इस दौर की फिल्मों में अभिनेता-अभिनेत्रियों को अपने गाने स्वयं गाने पड़ते थे। वर्ष 1935 को हिन्दी सिने-संगीत के इतिहास का एक स्मरणीय वर्ष माना जाएगा। संगीतकार रायचन्द्र बोराल ने, अपने सहायक और संगीतकार पंकज मल्लिक के साथ मिलकर ‘न्यू थिएटर्स’ में प्लेबैक पद्धति, अर्थात पार्श्वगायन की शुरुआत की। पर्दे के बाहर रेकॉर्ड कर बाद में पर्दे पर फ़िल्माया गया पहला गीत था फ़िल्म ‘धूप छाँव’ का। इस फिल्म में के.सी. डे का गाया “तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफ़िर जाग ज़रा...” और “मन की आँखें खोल बाबा...” लोकप्रिय गीतों में था। इन गीतों से पार्श्वगायन की शुरुआत ज़रूर हुई, पर सही मायने में इन्हें प्लेबैक गीत नहीं कहा जा सकता क्योंकि के.सी. डे के गाये इन गीतों को उन्हीं पर फ़िल्माया गया था। इन गीतों को सुन कर साफ़ महसूस होता है कि इससे पहले के गीतों से इन प्री-रेकॉर्डेड गीतों के स्तर में कितना अन्तर है। इस फ़िल्म में सहगल का गाया “अंधे की लाठी तू ही है...” और उमा शशि का गाया “प्रेम कहानी सखी सुनत सुहाये चोर चुराये माल...” तथा पहाड़ी सान्याल व उमा शशि का गाया युगल गीत “मोरी प्रेम की नैया चली जल में...” भी फ़िल्म के चर्चित गाने थे। फिल्म इतिहासकार विजय कुमार बालकृष्णन के अनुसार फिल्म ‘धूप छाँव’ में पहला प्रीरिकार्ड किया गीत, जो फिल्माया गया था, वह के.सी. डे, सुप्रभा सरकार और साथियों का गाया गीत “मेरो घर मोहन आयो...” था। आइए, सुनते हैं इस पहले पार्श्वगायन के रूप में फिल्माए गीत को।

फिल्म धूप छाँव : “मेरो घर मोहन आयो...” : के.सी. डे, सुप्रभा सरकार और साथी


पंकज मल्लिक
फ़िल्म ‘धूप छाँव’ के गीतकार थे पण्डित सुदर्शन। प्लेबैक तकनीक के आने के बाद भी कई वर्षों तक बहुत से अभिनेता स्वयं गीत गाते रहे, फिर धीरे धीरे अभिनेता और गायक की अलग-अलग श्रेणी बन गई। ‘धूप छाँव’ में ही पारुल घोष, सुप्रभा सरकार और हरिमति का गाया एक गीत था “मैं ख़ुश होना चाहूँ, हो न पाऊँ...”, जो सही अर्थ में पहला प्लेबैक गीत था। इस तरह से इन तीन गायिकाओं को फ़िल्म-संगीत की प्रथम पार्श्वगायिकाएँ होने का गौरव प्राप्त है। हरमन्दिर सिंह ‘हमराज़’ को दिए एक साक्षात्कार में सुप्रभा सरकार ने पार्श्वगायन की शुरुआत से सम्बन्धित महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए बताया था – “उन्होंने (सुप्रभा सरकार ने) बताया कि फ़िल्मों में उनका प्रवेश 13 वर्ष की आयु में तत्कालीन अभिनेत्री लीला देसाई के भाई के प्रयत्नों से हुआ था। सन्‍ 1935 में जब ‘न्यू थिएटर्स’ द्वारा ‘जीवन मरण’ (बांग्ला) तथा ‘दुश्मन’ (हिन्दी) का निर्माण शुरु हुआ तब पार्श्वगायन पद्धति का प्रथम उपयोग इसी फ़िल्म में किया जाना था परन्तु फ़िल्म की शूटिंग के समय एक दृश्य में पेड़ से नीचे कूदते समय नायिका लीला देसाई की टाँग टूट गई और फ़िल्म का निर्माण रुक गया। इसी बीच फ़िल्म ‘धूप छाँव’ का निर्माण शुरु हुआ। निर्देशक नितिन बोस ने पहले तो सुप्रभा सरकार की आवाज़ को नामंज़ूर ही कर दिया था, लेकिन एक समूह गीत में सुप्रभा, हरिमती और पारुल घोष की आवाज़ों में रेकॉर्ड किया गया जो कि बाद में प्रथम पार्श्वगीत के रूप में जाना गया।” उधर पंकज मल्लिक ने भी अपनी आत्मकथा में पार्श्वगायन की शुरुआत का दिलचस्प वर्णन किया है। पंकज राग लिखित किताब ‘धुनों की यात्रा’ से प्राप्त जानकारी के अनुसार– “नितिन बोस स्टुडिओ जाते समय अपनी कार से पंकज मल्लिक के घर से उन्हें लेते हुए जाते थे। एक दिन उनके घर के सामने कई बार हार्न देने पर भी पंकज मल्लिक नहीं मिकले, और काफ़ी देर बाद अपने पिता के बताने पर कि नितिन बोस उनकी बाहर कार में प्रतीक्षा कर रहे हैं, वे हड़बड़ाते हुए बाहर आए और देरी का कारण बताते हुए कहा कि वे अपने मनपसंद अंग्रेज़ी गानों का रेकॉर्ड सुनते हुए गा रहे थे, इसी कारण हार्न की आवाज़ नहीं सुन सके। इसी बात पर नितिन बोस को विचार आया कि क्यों न इसी प्रकार पार्श्वगायन लाया जाए। उन्होंने बोराल से चर्चा की और अपने पूरे कौशल के साथ बोराल ने इस विचार को साकार करते हुए इसे ‘धूप छाँव’ में आज़माया।” इस प्रकार भारतीय फिल्मों में पार्श्वगायन की शुरुआत हुई। फिल्म में के.सी. डे के गाये जिन दो गीतों की चर्चा ऊपर की पंक्तियों में की गई है, आइए आपको वही दोनों गीत सुनवाते हैं।

फिल्म धूप छाँव : “बाबा मन की आँखें खोल...” : के.सी. डे

फिल्म धूप छाँव : “तेरी गठरी में लागा चोर...” : के.सी. डे



इसी गीत के साथ आज हम ‘भूली-बिसरी यादें’ के इस अंक को यहीं विराम देते हैं। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल’ के आगामी अंक में बारी है- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ स्तम्भ की। अगला गुरुवार मास का चौथा गुरुवार होगा। इस दिन हम प्रस्तुत करेंगे एक बेहद रोचक संस्मरण। यदि आपने ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता के लिए अभी तक अपना संस्मरण नहीं भेजा है तो हमें तत्काल radioplaybackindia@live.com पर हमें मेल करें।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

“मैंने देखी पहली फिल्म” : आपके लिए एक रोचक प्रतियोगिता
दोस्तों, भारतीय सिनेमा अपने उदगम के 100 वर्ष पूरा करने जा रहा है। फ़िल्में हमारे जीवन में बेहद खास महत्त्व रखती हैं, शायद ही हम में से कोई अपनी पहली देखी हुई फिल्म को भूल सकता है। वो पहली बार थियेटर जाना, वो संगी-साथी, वो सुरीले लम्हें। आपकी इन्हीं सब यादों को हम समेटेगें एक प्रतियोगिता के माध्यम से। 100 से 500 शब्दों में लिख भेजिए अपनी पहली देखी फिल्म का अनुभव radioplaybackindia@live.com पर। मेल के शीर्षक में लिखियेगा ‘मैंने देखी पहली फिल्म’। सर्वश्रेष्ठ तीन आलेखों को 500 रूपए मूल्य की पुस्तकें पुरस्कारस्वरुप प्रदान की जायेगीं। तो देर किस बात की, यादों की खिड़कियों को खोलिए, कीबोर्ड पर उँगलियाँ जमाइए और लिख डालिए अपनी देखी हुई पहली फिल्म का दिलचस्प अनुभव। प्रतियोगिता में आलेख भेजने की अन्तिम तिथि 31अक्टूबर, 2012 है।



गुरुवार, 2 अगस्त 2012

स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल – 8


भूली-बिसरी यादें


भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में आयोजित विशेष श्रृंखला ‘स्मृतियों के झरोखे से’ के एक नये अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने सहयोगी स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी के साथ आपका स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में प्रत्येक मास के पहले और तीसरे गुरुवार को हम आपके लिए लेकर आते हैं, मूक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर के कुछ रोचक तथ्य और दूसरे हिस्से में सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर की कोई उल्लेखनीय संगीत रचना और रचनाकार का परिचय। आज के अंक में हम आपसे इस युग के कुछ रोचक तथ्य साझा करेंगे। 



‘राजा हरिश्चन्द्र’ से पहले : उत्कृष्ट वृत्त-चित्रों से आगे बढ़ा भारतीय फिल्मों का काफिला

भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर में भावी फिल्मों के लिए दिशा की खोज जारी थी। मुहावरे गढ़े जा रहे थे। 3मई, 1913 को भारत में निर्मित पहली कथा-फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ तक पहुँचने में भारतीय फ़िल्मकारों को 17वर्ष लगे। 1896 से 1913 तक की अवधि में भारतीय फ़िल्मकार दो अलग-अलग दिशाओं में सक्रिय रहे। एक वर्ग फिल्म के निर्माण में तो दूसरा वर्ग फिल्म के व्यावसायिक प्रदर्शन के क्षेत्र में सलग्न था। बीसवीं शताब्दी के पहले दशक में कथा-फिल्म की अवधारणा का जन्म तो हुआ परन्तु दिशा की तलाश की जा रही थी। हाँ, इस दौर में कुछ अच्छे वृत्त-चित्र अवश्य बने। 1905 में ज्योतिष सरकार नामक एक स्वप्नदर्शी फ़िल्मकार ने बंग-भंग आन्दोलन के अग्रणी नेता सुरेन्द्रनाथ सेन के व्यक्तित्व और आन्दोलन के औचित्य पर
जे.एफ. मदान
एक प्रभावी वृत्त-चित्र- ‘ग्रेट बेंगाल पार्टीशन मूवमेंट’ का निर्माण किया था। यह भारत में बनाने वाला पहला राजनैतिक वृत्त-चित्र था। इसी प्रकार 1911 में एक ब्रिटिश छायाकर चार्ल्स अर्बन ने ‘दिल्ली दरबार’ का रंगीन फिल्मांकन किया था। चार्ल्स के अलावा दो भारतीय फ़िल्मकारों- हीरालाल सेन और एस.एन. पाटनकर ने भी इस महत्त्वाकांक्षी राजनैतिक समारोह का फिल्मांकन किया था।

फिल्मों के निर्माण के साथ-साथ प्रदर्शन के क्षेत्र में भी प्रयत्न किये जा रहे थे। 1902 में जे.एफ. मदान ने एक फ्रांसीसी कम्पनी से प्रोजेक्टर और फिल्म प्रदर्शन से सम्बन्धित अन्य उपकरण खरीदा और कलकत्ता (अब कोलकाता) के मैदान में अस्थायी सिनेमाघर बना कर फिल्मों का प्रदर्शन आरम्भ किया। मदान ने ही 1907 में बम्बई (अब मुम्बई) में पहला स्थायी सिनेमाघर ‘एल्फ़िल्स्टन पिक्चर पैलेस’ का निर्माण कराया। 1904 में मानेक डी. सेठना ने मुम्बई में ‘टूरिंग सिनेमा कम्पनी’ की स्थापना की और पहली बार नियमित सिनेमा का प्रदर्शन आरम्भ किया। इस नियमित प्रदर्शन का आरम्भ एक विदेशी फिल्म ‘लाइफ ऑफ क्राइस्ट’ के प्रदर्शन से हुआ। उस दौर में फिल्म-निर्माण और प्रदर्शन के क्षेत्र में किये गए ये कुछ ऐसे प्रयास थे जिन्हें फिल्म-इतिहास के पृष्ठों पर सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा।

सवाक युग के धरोहर : 'पूरन भगत' की बातें और के.सी. डे का स्मरण

वाक फ़िल्मों के पहले दौर में जिन कम्पनियों का फ़िल्म निर्माण में सराहनीय योगदान रहा उनमें एक है कलकत्ता का 'न्यू थिएटर्स'। यह वह कम्पनी है जिसने न केवल रुचिकर फ़िल्में बनाई, बल्कि एक से एक महान कलाकार को मंच दिया, ताकि वे अपनी कला को देश-विदेश तक पहुँचा सकें। रुचिकर फ़िल्में अर्थात वो फ़िल्में जो हर कोई देख सकता था। लता मंगेशकर ने एक बार किसी साक्षात्कार में कहा था कि जब वो छोटी थीं तब उनके पिता दीनानाथ जी उन्हें केवल 'न्यू थिएटर्स' की फ़िल्मों को ही देखने की अनुमति दिया करते थे, क्योंकि उनके हिसाब से इस बैनर की फ़िल्में बहुत शालीन होती थीं और गीत-संगीत भी ऊँचे स्तर का होता था। 'न्यू थिएटर्स' की फ़िल्मों में चलताऊ चीज़ें नहीं होती थीं। कलाकारों की बात करें तो कुन्दनलाल सहगल, कानन देवी, रायचन्द्र बोराल, पंकज मल्लिक, तिमिर बरन, पहाड़ी सान्याल और के.सी. डे जैसे कलाकारों ने इसी कम्पनी की छत्र-छाया में रह कर अपनी यात्रा शुरू की थी और नाम कमाया। बी.एन. सरकार द्वारा गठित 'न्यू थिएटर्स', जिसकी स्थापना 10फ़रवरी 1931 को कलकत्ता में हुई, इस कम्पनी ने 1931 से लेकर 1955 तक करीब 150 फ़िल्मों का निर्माण किया, और न केवल फ़िल्मों में, बल्कि फ़िल्म-संगीत की धरोहर को समृद्ध करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। ‘न्यू थिएटर्स’ की फ़िल्मों के गाने इतने उत्कृष्ट हुआ करते थे कि आने वाली पीढ़ियों के बहुत से दिग्गज कलाकार इस कम्पनी के गीतों से प्रेरित होकर ही इस क्षेत्र में आने की बात करते थे। ‘न्यू थिएटर्स’ ने 1932 में जिन तीन फ़िल्मों के माध्यम से संगीतकार रायचन्द्र बोराल और गायक-अभिनेता कुन्दनलाल सहगल को फ़िल्म-संगीत में उतारा, वो हैं– ‘मोहब्बत के आँसू’, ‘सुबह का सितारा’ और ‘जिन्दा लाश’। 1933 में इसकी तीन महत्त्वपूर्ण फ़िल्में आईं– ‘राजरानी मीरा’, ‘यहूदी की लड़की’, और ‘पूरन भगत’। बोराल और सहगल की जोड़ी ने पुन: अपना जादू जगाया, ‘पूरन भगत’ में। राग बिहाग और यमन-कल्याण पर आधारित “राधे रानी दे डारो ना...” हो या “दिन नीके बीते जाते हैं सुमिरन कर पिया राम नाम...”, फ़िल्म के सभी गीत, जो मूलत: भक्तिरस पर आधारित थे, लोकप्रिय हुए। वैसे सहगल इस फ़िल्म में नायक नहीं थे, सिर्फ़ उनके गाये गीत रखने के लिये उन्हें पर्दे पर उतारा गया था। “राधा रानी…” भजन संगीतकार रोशन के मनपसन्द भजनों में से एक है, ऐसा उन्होंने एक रेडियो कार्यक्रम में कहा था।

के.सी. डे
कृष्णचन्द्र डे, जो के.सी. डे के नाम से भी जाने गए, ने इस फ़िल्म में अभिनय और गायन प्रस्तुत किया था। “जाओ जाओ हे मेरे साधु रहो गुरु के संग...” और “क्या कारण है अब रोने का, जाये रात हुई उजियारा...” जैसे गीत उन्हीं के गाये हुए थे। सहगल और के.सी. डे की दो आवाज़ें एक दूसरे से बिल्कुल ही अलग थीं। एक तरफ़ सहगल की कोमल मखमली आवाज़, तो दूसरी तरफ़ के.सी. डे की बुलन्द आवाज़ थी। के.सी. डे के बारे में यह बताना ज़रूरी है कि वो आँखों से अन्धे थे। कुछ लोग कहते हैं कि वो जन्म से ही अन्धे थे, जबकि कई लोगों का कहना है कि कड़ी धूप में पतंगबाज़ी से उनके आँखों की रोशनी जाती रही। उन्हें फिर ‘अन्ध-कवि’ की उपाधि दी गई। पार्श्वगायक मन्ना डे इन्हीं के भतीजे हैं। मन्ना डे ने सहगल और अपने चाचाजी का ज़िक्र एक रेडियो कार्यक्रम में कुछ इस तरह से किया था- ‘सहगल साहब बहुत लोकप्रिय थे। मेरे सारे दोस्त जानते थे कि मेरे चाचा जी, के.सी. डे के साथ उनका रोज़ उठना-बैठना है। इसलिए उनकी फ़रमाइश पर मैंने सहगल साहब के कई गाने एक दफ़ा नहीं, बल्कि कई बार गाये होंगे। 'कॉलेज-उत्सवों में उनके गाये गाने गा कर मैंने कई बार इनाम भी जीते’। के.सी. डे एक गायक और अभिनेता होने के साथ-साथ एक संगीतकार भी थे।

बतौर संगीतकार के.सी. डे की पहली फ़िल्म थी 'आबे-हयात' (1933), पर यह फ़िल्म नहीं चली। संगीतकार के रूप में उनकी पहली उल्लेखनीय फ़िल्म थी 1934 की 'चन्द्रगुप्त'। भले उन्होंने 'न्यू थिएटर्स' की कई फ़िल्मों में गायन और अभिनय किया, लेकिन संगीतकार भी भूमिका उन्होंने 'ईस्ट इण्डिया फ़िल्म कॉर्पोरेशन' की फ़िल्मों में ही निभाई। इन दो फ़िल्मों के अलावा 1934 की ही फिल्म 'किस्मत की कसौटी', 'शहर का जादू', और 'सीता' में भी उनका संगीत था। 'सीता' में सचिनदेव बर्मन का गाया गीत था और यही वह पहली फ़िल्म थी जिसने कोई अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार जीता था। वेनिस में 1935 के तीसरे ‘सिनेमेट्रोग्राफ़िक आर्ट एक्जीबिशन’ में उसे स्वर्ण पदक मिला था। के.सी. डे के स्वरबद्ध कुछ और उल्लेखनीय फ़िल्मों के नाम हैं- 'सुनहरा संसार' (1936), 'मिलाप' (1937), 'आँधी' (1940), 'मेरा गाँव' (1942), 'तमन्ना' (1942), 'बदलती दुनिया' (1943), 'सुनो सुनाता हूँ' (1944), 'देवदासी' (1945), 'दूर चलें' (1946)। फ़िल्म संगीत की पाँचवें दशक के अन्त की बदलती धारा में के.सी. डे के नीतिप्रधान, भक्तिप्रधान गानों की कमी आती गई और वो धीरे-धीरे फ़िल्म जगत से दूर चले गए।

'पूरन भगत' के माध्यम से सहगल और के.सी. डे का उल्लेख इस लेख में हुआ, पर यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि न तो सहगल इस फ़िल्म के नायक थे और न ही के. सी. डे। देवकी बोस निर्देशित इस फ़िल्म के नायक-नायिका थे कुमार और अनवरी। फ़िल्म के गीत GCIL-HMV/ Hindustan-New Theatres Label के रेकॉर्ड्स पर जारी किए गए। ये रहे इस फ़िल्म के कुल 20 गीतों की सूची -

1. मोरे महाराजा के भई सन्तान, कैसी खुशी का आज समय है...

2. दु:ख सुख है सब एक समान, सुख की छाई जग में बदरिया...

3. बात कहूँ मैं मन की कैसे कासी, कैसी यह सुगन्ध है...

4. क्या कारण है अब रोने का काली रात हुई उजियारी.... (के.सी. डे)

5. कैसी चलत पवन मस्तानी, छिटकी हुई है चाँदनी...

6. जगत में प्रेम की बंसी बाजे, जाकी बंसी वही को साजे...

7. काहे करे कोई दु:ख नैनन का, कौन बिचारे दु:खड़ा मन का...

8. हे शम्भू हे विश्वनाथ, कैलाशपति हे भोलानाथ...

9. भज भज मन राम चरण निसदिन सुखदाई...

10. गावो जय जय आज भक्तों, भक्ति दिखाती है शक्ति...

11. भजूँ मैं तो भाव से श्री गिरिधारी हृदय से अब... (सहगल)

12. आज जय गावो मिल सब साधु, आज एक साधु की कुटिया पर...

13. सत प्रेम पर नारी के हँसी न सोहाय...

14. सखी री पिया मिलन की आस, जैन करे जवा में...

15. मानव जीवन प्यारे जग का सिंगार, केवल परीक्षा ही है...

16. प्रीतम मेरी आस न तोड़, अब तो प्रेम की आस लगी है...

17. जाओ-जाओ ऐ मेरे साधो रहो गुरू के संग... (के.सी. डे)

18. दिन नीके बीत जात हैं... (सहगल)

19. अवसर बीतो जाए... (सहगल)

20. राधे रानी दे डारो न बंसरी मोरी रे... (सहगल)

फिल्म ‘पूरन भगत : ‘जाओ-जाओ ऐ मेरे साधो रहो गुरू के संग...’ : के.सी. डे



फिल्म ‘पूरन भगत : ‘क्या कारण है अब रोने का...’ : के.सी. डे 



इसी गीत के साथ इस अंक से हम विराम लेते हैं। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल’ के आगामी अंक में बारी है- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता की। हमारे अगले अंक में जो आलेख शामिल होगा वह प्रतियोगी वर्ग से होगा। आपके आलेख हमें जिस क्रम से प्राप्त हुए हैं, उनका प्रकाशन हम उसी क्रम से कर रहे हैं। यदि आपने ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता के लिए अभी तक अपना संस्मरण नहीं भेजा है तो हमें तत्काल radioplaybackindia@live.com पर मेल करें।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र और सुजॉय चटर्जी

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