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शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2014

आईये घूम आयें बचपन की गलियों में इन ताज़ा गीतों के संग

ताज़ा सुर ताल - 2014 -07 - बचपन विशेष 

जेब (बाएं) और हनिया 
ताज़ा सुर ताल की एक और कड़ी में आपका स्वागत है, आज जो दो नए गीत हम चुनकर लाये हैं वो यक़ीनन आपको आपके बचपन में लौटा ले जायेगें. हाईवे  के संगीत की चर्चा हमने पिछले अंक में भी की थी, आज भी पहला गीत इसी फिल्म से. दोस्तों बचपन की सबसे खूबसूरत यादों में से एक होती है माँ की मीठी मीठी लोरियाँ जिसे सुनते हुए कब बरबस ही नींद आँखों में समा जाती थी पता भी नहीं चलता था. इन दिनों फिल्मों में लोरियाँ लौट सी आई है, तभी तो राऊडी राठोड  जैसी जबरदस्त व्यवसायिक फिल्मों में भी लोरियाँ सुनने को मिल जाती हैं. पर यकीन मानिये हाईवे की ये लोरी अब तक की सुनी हुई सब लोरियों से अल्हदा है, इस गीत में गीतकार इरशाद की मेहनत खास तौर पे कबीले तारीफ है. सुहा यानी लाल, और साहा यानी खरगोश, माँ अपने लाडले को लाल खरगोश कह कर संबोधित कर रही है, शब्दों का सुन्दर मेल इरशाद ने किया है उसका आनंद लेने के लिए आपको गीत बेहद ध्यान से सुनना पड़ेगा. रहमान की धुन ऐसी कि सुन कर उनके कट्टर आलोचक भी भी उनकी तारीफ किये बिना नहीं रह पायेगें. आखिर यूहीं तो नहीं उन्हें देश का सर्वश्रेष्ठ संगीतकार कहा जाता है. एक और आश्चर्य है अलिया भट्ट की मधुर आवाज़, ये नटखट सी दिखने वाली लड़की इतना सुरीला भी गा सकती है यकीन नहीं होता, वैसे गीत में प्रमुख आवाज़ है पाकिस्तानी गायिका जेब की. ज़बुनिषा बंगेश, हनिया असलम के साथ मिलकर एक संगीत बैंड चलाती है, और उनकी आवाज़ की खनक वाकई बेमिसाल है. मैंने तो जब से ये गीत सुना है मेरे मोबाईल पर यही गीत इन दिनों लूप में चलता रहता है, मुझे यकीन है कि आप को भी ये गीत बचपन की बाहों में ले जायेगा, जहाँ माँ की लोरी में दुनिया समाती थी और बेफिक्र नींदों पलकों पे तारी हो जाया करती थी. लीजिए सुनिए - सुहा साहा...  


प्रीतम 
चलिए आगे बढते हैं बचपन के सपनों की तरफ, जो कुछ चुलबुले से होते हैं तो कुछ बवाले से. शादी के साईड एफ्फेक्ट्स  में दो बहुत ही प्रतिभाशाली और लीक से अलग चलने वाले फरहान अख्तर और विध्या बालन एक साथ आ रहे हैं. फिल्म में संगीत है हिट मशीन प्रीतम दा का. गीत लिखे हैं स्वानंद किरकिरे ने. वैसे इस गीत का एक संस्करण मोहित चौहान की आवाज़ में भी है पर हम आपके लिए लेकर आये हैं नन्हीं गायिका डीवा का गाया ये बच्चों वाला संस्करण, जो बहुत ही प्यारा और मधुर है. गीतकार स्वानंद किरकिरे ने हाल में दिए एक साक्षात्कार में बताया है कि इस गीत को लिखते हुए वो खुद भी रो पड़े थे. वैसे स्वानंद और सपनों का रिश्ता यूँ भी पुराना है. बावरा मन फिर से  चला सपने देखने  ... तो लीजिए आनंद लीजिए इस ताज़ा गीत का भी.  

शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

नए साल पर टी सीरीस का एक संगीतमय तोहफा : "आई लव न्यू ईयर"

टी सीरीस के भूषण कुमार संगीतमयी रोमांटिक फिल्मों के सफल निर्माता रहे हैं. चूँकि इन फिल्मों का संगीत भी दमदार रहता है तो उनके लिए दोहरे फायदे का सौदा साबित होता है. इस साल आशिकी २ और नौटंकी साला की जबरदस्त सफलता के बाद वो हैट्रिक लगाने की तैयारी में थे आई लव न्यू ईयर के साथ. मगर फिल्म की प्रदर्शन तिथि, एक के बाद एक कारणों से टलती चली गयी. पहले यमला पगला दीवाना २ के प्रमोशन के चलते फिल्म का प्रदर्शन अप्रैल-मई से टल कर सितम्बर कर दिया गया. फिर भूषण और फिल्म के नायक सन्नी देओल के बीच कुछ धन राशि के भुगतान को लेकर मामला छिड़ गया. अब जाकर फिल्म को दिसंबर के अंतिम सप्ताह में जारी करने की सहमती बनी है. फिल्म के शीर्षक के लिहाज से भी ये एक सही कदम है. पर अभी तक फिल्म का प्रचार ठंडा ही दिखाई दे रहा है. बहरहाल हम फिल्म के संगीत की चर्चा तो कर ही सकते हैं. 

फिल्म में प्रीतम प्रमुख संगीतकार हैं, मगर एक एक गीत फलक शबीर (नौटंकी साला वाले), और अनुपम अमोद के हिस्से भी आया है, साथ ही पंचम द के एक पुराने हिट गीत को भी एल्बम में जोड़ा गया है. गीत मयूर पुरी, सईद कादरी और फलक शबीर ने लिखे हैं. फिल्म के निर्देशक राधिका राव और विनय सप्रू हैं जिनकी पहली फिल्म लकी - नो टाईम फॉर लव बॉक्स ऑफिस पर भी लकी साबित हुई थी, जिसमें सलमान खान की लोकप्रियता और अदनान सामी के संगीत का बड़ा योगदान था. यानी इस निर्देशक जोड़ी को अच्छे संगीत की पहचान निश्चित ही है और जब साथ हो टी सीरीस जैसे बैनर का तो उम्मीदें बढ़ ही जाती है, आईये देखें कि कैसा है आई लव न्यू ईयर  के संगीत एल्बम का हाल.

गुड नाल इश्क मीठा एक पारंपरिक पंजाबी गीत है जो शादी ब्याह और संगीत के मौकों पर अक्सर गाया बजाया जाता है. इसी पारंपरिक धुन को संगीतकार अनुपम अमोद ने बेहद अच्छे टेक्नो रिदम में डाल कर पेश किया है एल्बम के पहले गीत में, और उतने ही मस्त मौजी अंदाज़ में गाया है बेहद प्रतिभाशाली तोचि रैना ने जिनकी आवाज़ को अलग से पहचाना जा सकता है. आज के दौर में जहाँ नए गायकों की भरमार है ये एक बड़ी उपलब्धि है. गीत निश्चित ही कदम थिरकाने वाला है. मयूर पुरी ने 'पंच' को वैसा ही रखा है और उसके आप पास अच्छे शब्द रचे हैं.

तुलसी कुमार और सोनू निगम साथ आये हैं अगले गीत जाने न क्यों/आओ न में. धीमी शुरुआत के बाद गीत अच्छी उड़ान भरता है और एक बार श्रोताओं को अपनी जद में लेने के बाद अपनी पकड़ ढीली नहीं पड़ने देता. रिदम में तबले का सुन्दर प्रयोग है अंतरे से पहले सेक्सोफोन का पीस भी शानदार है. सोनू पूरे फॉर्म में हैं और तुलसी की आवाज़ भी उनका साथ बखूबी देती है. सैयद कादरी के शब्द बेहद अच्छे हैं. बहुत ही खूबसूरत युगल गीत है जो कहीं कहीं प्रीतम के जब वी मेट दिनों की यादें ताज़ा कर देती हैं.

फलक शबीर के बारे में हम पहले भी काफी कुछ कह चुके हैं. उनका लिखा, स्वरबद्ध किया और बहतरीन अंदाज़ में गाया गीत जुदाई एल्बम का खास आकर्षण है. धुन में कुछ खास नयेपन के अभाव में भी गीत टीस से भर देता है. इसे एक ब्रेक अप गीत माना जा सकता है. और शायद एक ब्रेक अप सिचुएशन पर पहली बार कोई गीत बना है. गीत सुनते हुए आप महसूस कर सकते हैं दो छूटते हुए हाथ, चार नम ऑंखें और बहुत सा दर्द. गीत का एक अनप्लग्ड संस्करण भी है जो सुनने लायक है.

तुलसी कुमार एक बार फिर सुनाई देती है, इस बार शान के साथ गीत हल्की हल्की में. ये एक हंसी मजाक वाला गीत है. वास्तव में इस एल्बम के सभी गीत मेरे लिए एक सुखद आश्चर्य ही हैं. हर गीत को सुनने से पहले मेरी उम्मीदें बिलकुल शून्य थी, मगर हर गीत को सुनना एक हैरान करने वाला अनुभव साबित हुआ हर बार. ये भी एक बेहद सुरीला गीत है, जहाँ संयोजन में सधी हुई सटीकता है. दोनों गायकों की परफेक्ट ट्यूनिंग जानदार है और मयूर पुरी के शब्द भी ठीक ठाक है.

पंचम ने फिल्म सागर में जो थीम पीस रचा था, टी सीरिस ने उसी धुन को लेकर एस पी बालासुब्रमण्यम से गवाया था बरसों पहले आज मेरी जान का नाद. इसी रचना को एक बार फिर से जिंदा किया गया है एल्बम में. मौली दवे की नशीली आवाज़ में इस रचना को सुनना पंचम की सुर गंगा में एक बार फिर उतरने जैसा है. खुशी की बात है कि गीत की मूल सरंचना से अधिक छेड छाड नहीं की गयी है.

आई लव न्यू ईयर एक अच्छी एल्बम है जहाँ कोई भी गीत निराश नहीं करता. ये गीत धीरे धीरे आपके दिल में उतर जायगें और लंबे समय तक वहीँ घर बना लेंगें.

एल्बम के बहतरीन गीत - गुड नाल इश्क, जुदाई, आओ न, आजा मेरी जान 
हमारी रेटिंग - ४.४  .   

  

शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

'गन्दी बात' में भी बहुत कुछ अच्छा है प्रीतम दा के साथ


बॉलीवुड में दक्षिण की सफल फिल्मों का रिमेक जोरों पे जारी है. सभी बड़े सुपर स्टार जैसे सलमान, अजय देवगन, अक्षय कुमार आदि इन फिल्मों से सफलता का स्वाद चख चुके हैं, अब शाहिद कपूर भी आ रहे हैं रेम्बो राजकुमार बनकर....ओह माफ कीजियेगा आर...राजकुमार बनकर. फिल्म के नाम में रेम्बो का इस्तेमाल वर्जित (कोपीराईट कारणों से) होने के कारण फिल्म के नाम में ये बदलाव करना पड़ा. फिल्म में संगीत है हिट मशीन प्रीतम का, आईये नज़र डालें इस फिल्म के एल्बम पर, और जानें कि संगीत प्रेमियों के लिए क्या है इस एक्शन कोमेडी फिल्म के गीतों में. 

एल्बम के पहले तीन गीत पूरी तरह से दक्षिण के तेज रिदम वालों गीतों से प्रेरित हैं. इनमें प्रीतम की झलक कम और दक्षिण के संगीतकारों की छवि अधिक झलकती है. पहला गीत गन्दी बात एक मस्त मलंग गीत है जिसकी ताल और धुन इतनी जबरदस्त है कि सुनकर कोई भी खुद को कदम थिरकाने से नहीं रोक पायेगा. अनुपम अमोद के शब्द चटपटे हैं और कुछ पारंपरिक श्रोताओं को आपत्तिजनक भी लग सकते हैं. मिका की आवाज़ इस गीत के लिए एकदम सही चुनाव है पर गीत का सुखद आश्चर्य है कल्पना पटोवरी की जोशीली आवाज़ जिसने मिका को जबरदस्त टक्कर दी है. निश्चित ही एक हिट गीत. 

नए गायक नक्श अज़ीज़ ने खुल कर गाया है अगला गीत साडी के फाल से गायिका अन्तरा मित्रा के साथ. गीत की सरंचना बहुत खूब है, जहाँ गायक के हिस्से में मुखड़े की धुन और अंतरा पूरा का पूरा गायिका ने निभाया है. धुन मधुर है और रिदम भी बहुत ही कैची है. शब्द अच्छे हो सकते थे, पर शायद ही इसकी कमी गीत की लोकप्रियता पर असर डालेगी. हाँ मगर बेहतर शब्द इसे एक यादगार गीत में तब्दील अवश्य कर देते. गीत के अंत में नक्श की हंसी खूब जची है. 

दक्षिण की धुनों से प्रेरित तीसरा गीत मत मारी में कुणाल गांजावाला की आवाज़ सुनाई दी है बहुत समय के बाद, अगर कहें कि ये गीत अगर इतना मस्त बन पाया है तो इसकी सबसे बड़ी वजह कुणाल और गायिका सुनिधि की आवाजें हैं तो गलत नहीं होगा. खास तौर पर सुनिधि ने अपना हिस्सा इतनी खूबी से गाया है कि क्या कहने. कहीं कहीं तो वो हुबहू फिल्म की नायिका सोनाक्षी की ही आवाज़ में ढल गयीं हैं. वाकई जैसे कि गीत में कहा गया है कि मुझे तेरी गाली भी लगती है ताली...सुनिधि ने गलियां भी सुरीले अंदाज़ में गायीं हैं. वैसे गीत के अंत में सोनाक्षी अपने खास अंदाज़ में खामोश भी कहती है, जो गीत का एक और खास आकर्षण बन गया है. इस गीत की भी सफलता तय है. 

अरिजीत सिंह का रोमांटिक अंदाज़ सुनाई देता है अगले गीत धोखा धड़ी में. ये एल्बम का पहला और एकमात्र गीत है जहाँ लगता है कि ये प्रीतम की एल्बम है. गीत में प्रीतम की छाप है, निलेश मिश्रा के शब्द बेहद अच्छे हैं. एल्बम के तेज तड़क गीतों में ये गीत कुछ कम सुना रह जाए तो आश्चर्य नहीं होगा. 

अंतरा मित्रा का एक अलग अंदाज़ नज़र आता है कद्दू कटेगा गीत में. एकबार तो लगेगा कि ये ममता शर्मा हैं मायिक के पीछे. आशीष पंडित का लिखा ये गीत फिर एक बार दक्षिणी गीतों से प्रेरित है, पर एल्बम में शामिल इस श्रेणी के अन्य गीतों के मुकाबले ये गीत बेहद कमजोर है. हाँ इसका फिल्मांकन जरूर धमाल होने वाला है. 

एल्बम के गीत लंबे समय तक बेशक लोगों को याद न रहें, पर इनका हिट फ्लेवर फिल्म को सफलता की राह अवश्य दिखा सकता है. संक्षेप में कहें तो आर...राजकुमार एक मास अपील एल्बम है जो क्लब पार्टियों में तो शूम मचायेगा ही, गली मोहल्लों के उत्सवों में भी जमकर बजेगा. 

एल्बम के सर्वश्रेष्ठ गीत - गन्दी बात, साडी के फाल से, मत मारी, धोखा धड़ी 
हमारी रेटींग - ४.२      

शुक्रवार, 20 मई 2011

दबंग सलमान खान "रेड्डी" हैं प्रीतम के साथ एक और संगीत धमाके के लिए

Taaza Sur Taal (TST) - 13/2011 - REDDY

दोस्तों एक बार फिर से मैं हाज़िर हूँ एक और नयी फिल्म के संगीत पर अपनी राय लेकर. आज हम बात करेंगें "दबंग" सलमान खान की आने वाली फिल्म – रेड्डी की. टी सिर्रिस के भूषण कुमार ने इस फिल्म के लिए विश्वास जताया है अपने दोस्त प्रीतम पर. और जाहिर प्रीतम ने उन्हें निराश नहीं किया है एक बार फिर, बल्कि अपने पेट्ट गायकों को लेकर शायद इस साल की सबसे बड़ी हिट अल्बम देने में भी कामियाब हुए हैं. चलिए बात करते हैं इस अल्बम के गीतों की.

कैरक्टर ढीला अल्बम का पहला गीत है, नीरज श्रीधर और अमृता काक की आवाजों में. अभी हाल ही में अनु मालिक ने इस फूट टेप्पिंग गीत के अंतरे की धुन अपने एक पुराने गीत से मिलता जुलता बताया था. खैर वो ९० का दशक था अनु मालिक का और अब जब प्रीतम की तूती बोल रही हो तो अनु की आवाज़ कौन सुने. खैर गीत का फिल्माकन देख कर लगता है कि सलमान इस गीत के माध्यम से राज कपूर, दिलीप कुमार और धमेन्द्र को टारगेट कर रहे हैं. पर यही तीन कलाकार ही क्यों कोई समझे तो कृपया बताएं. अमिताभ भट्टाचार्य के शब्द कुछ बहत प्रभावी नहीं लगे मुझे पर संगीत बीट्स और संयोजन इतना जबरदस्त है कि आपके कदम खुद बा खुद थिरकने लगेंगें.

अगला गीत अल्बम का सबसे मधुर गीत है, के के और तुलसी कुमार की युगल आवाजों के इस गीत में गजब का सुकून है. एक ट्रेंड की तरह अंग्रेजी पंक्तियाँ का इस्तेमाल यहाँ भी है, जिसे शायद नीरज ने निभाया है. टिपिकल बोलीवुड रोमांटिक गीत है ये, जिसे मेलोडी के कद्रदान अवश्य पसंद करेंगें. अगला गीत "धिन का चिका" जबरदस्त है और जब से इसके प्रोमो छोटे परदे पर दिख रहे हैं इस गीत ने करेक्टर ढीला से भी अधिक लोकप्रियता हासिल कर ली है. और क्यों न हो, इतना जबरदस्त फिल्मांकन किसी भी गीत का बहुत दिनों बाद देखने को मिला है. पूरी तरह से भारतीय अंदाज़ के इस गीत में मिका ने जैसे जान डाल दी है. अमृता काक के लिए उनकी बराबरी करना मुश्किल तो था ही पर फिर भी उन्होंने अच्छा साथ दिया है. ९० के दशक की एक और फिल्म "ख़ामोशी द म्युसिकल" के एक गीत "बाजा" से प्रेरित है ये गीत पर इसमें इसकी अपनी ओरिजेनलिटी भी है और इसके मूल संगीतकार देवी श्री प्रसाद निश्चित ही इस गीत पर फक्र महसूस कर सकते हैं. वैसे मेरी बधाई गीत के कोरियोग्राफ़र को भी जिन्होंने इस गीत इतना शानदार फिल्मांकन दिया. यहाँ बोल लिखे हैं आशीष पंडित ने.

अल्बम का चौथा और अंतिम ओरिजिनल गीत एक पंजाबी शादी वाला है जिसमें राहत साहब की आवाज़ सुनियी देती है, साथ है तुलसी कुमार. गीत एक और टिपिकल बोलीवुड सरीखा पंजाबी गीत है जिसमें बेशक कुछ नयापन नहीं है पर एनर्जी खूब है. कुल मिलकर रेड्डी के संगीत में पकड़ है, मसाला है और एक हिट अल्बम होने के सभी गुण मौजूद हैं. ऊपर से सलमान का एक्स फेक्टर जो किसी भी फिल्म के लिए एक बूस्ट है, आपको याद होगा कि दबंग के गीत भी (मुन्नी के आलावा) फिल्म के प्रदर्शन के बाद अधिक लोकप्रिय हुए थे, और यहाँ भी अगर ऐसा हो तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

श्रेष्ठ गीत – "हमको प्यार हुआ", "धिनका चिका"
आवाज़ रेटिंग – ७.५/१०

फिल्म के गीत आप यहाँ सुन सकते हैं



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

मंगलवार, 4 जनवरी 2011

दिल तो बच्चा है जी.....मधुर भण्डारकर की रोमांटिक कोमेडी में प्रीतम ने भरे चाहत के रंग

Taaza Sur Taal 01/2011 - Dil Toh Bachha Hai ji

'दिल तो बच्चा है जी'...जी हाँ साल २०१० के इस सुपर हिट गीत की पहली पंक्ति है मधुर भंडारकर की नयी फिल्म का शीर्षक भी. मधुर हार्ड कोर संजीदा और वास्तविक विषयों के सशक्त चित्रिकरण के लिए जाने जाते हैं. चांदनी बार, पेज ३, ट्राफिक सिग्नल, फैशन, कोपरेट, और जेल जैसी फ़िल्में बनाने के बाद पहली बार उन्होंने कुछ हल्की फुल्की रोमांटिक कोमेडी पर काम किया है, चूँकि इस फिल्म में संगीत की गुंजाईश उनकी अब तक की फिल्मों से अधिक थी तो उन्होंने संगीतकार चुना प्रीतम को. आईये सुनें कि कैसा है उनके और प्रीतम के मेल से बने इस अल्बम का ज़ायका.

नीलेश मिश्रा के लिखे पहले गीत “अभी कुछ दिनों से” में आपको प्रीतम का चिर परिचित अंदाज़ सुनाई देगा. मोहित चौहान की आवाज़ में ये गीत कुछ नया तो नहीं देता पर अपनी मधुरता और अच्छे शब्दों के चलते आपको पसंद न आये इसके भी आसार कम है. “है दिल पे शक मेरा...” और प्रॉब्लम के लिए “प्रोब” शब्द का प्रयोग ध्यान आकर्षित करता है. दरअसल ये एक सामान्य सी सिचुएशन है हमारी फिल्मों की जहाँ नायक अपने पहली बार प्यार में पड़ने की अनुभूति व्यक्त करता है. संगीत संयोजन काफी अच्छा है और कोरस का सुन्दर इस्तेमाल पंचम के यादगार "प्यार हमें किस मोड पे ले आया" की याद दिला जाता है.

abhi kuch dinon se (dil toh bachha hai ji)



सोनू निगम की आवाज़ में “तेरे बिन” एक और मधुर रोमांटिक गीत है, जो यक़ीनन आपको सोनू के शुरआती दौर में ले जायेगा. कुमार के हैं शब्द जो काफी रोमांटिक है. अगला गीत “ये दिल है नखरे वाला” वाकई एक चौंकाने वाला गीत है. अल्बम के अब तक के फ्लेवर से एकदम अलग ये गीत गुदगुदा जाता है, जैज अंदाज़ का ये गीत है जिसमें कुछ रेट्रो भी है. निलेश ने बहुत ही बढ़िया लिखा है इसे. शेफाली अल्वरिस की आवाज़ जैसे एकदम सटीक बैठती है इस गीत में. ये गीत ‘पिक ऑफ द अल्बम’ है.

tere bin (dil toh bachha hai ji)



ye dil hai nakhre waala (dil toh bachha hai ji)



कुणाल गांजावाला की आवाज़ में अगले २ गीत हैं. “जादूगरी” में उनकी सोलो आवाज़ है तो “बेशुबा” में उनके साथ है अंतरा मित्रा. जहाँ पहला गीत साधारण ही है, दूसरे गीत में जो कि अल्बम का एकलौता युगल गीत है, प्रीतम अपने बहतरीन फॉर्म में है. सईद कादरी से आप उम्मीद रख ही सकते हैं, और वाकई उनके शब्द गीत की जान हैं.

jaadugari (dil toh bachha hai ji)



beshubah (dil toh bachha hai ji)



हमारी राय – साल की शुरूआत के लिए ये नर्मो नाज़ुक रोमांटिक एल्बम एक बढ़िया पिक है. लगभग सभी गीत प्यार मोहब्बत में डूबे हुए हैं. प्रीतम कुछ बहुत नया न देकर भी अपने चिर परिचित अंदाज़ के गीतों से लुभाने में सफल रहे हैं.



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

ऐक्शन रिप्ले के सहारे इरशाद कामिल और प्रीतम ने बाकी गीतकार-संगीतकार जोड़ियों को बड़े हीं जोर का झटका दिया

ताज़ा सुर ताल ४२/२०१०


सुजॊय - 'ताज़ा सुर ताल' की एक और कड़ी के साथ हम हाज़िर हैं, और आप सभी का हार्दिक स्वागत है इस साप्ताहिक स्तंभ में! विश्व दीपक जी, पता है जब भी मैं इस स्तंभ के लिए आप से बातचीत का सिलसिला शुरु करता हूँ तो मुझे क्या याद आता है?

विश्व दीपक - अरे पहले मुझे सभी को नमस्ते तो कह लेने दो! सभी पाठकों व श्रोताओं को मेरा नमस्कार और सुजॊय, आप को भी! हाँ, अब बताइए आप को किस बात की याद आती है।

सुजॊय - जब मैं छोटा था, और गुवाहाटी में रहता था, तो उस ज़माने में तो फ़िल्मी गानें केवल रेडियो पर ही सुनाई देते थे, तभी से मुझे रेडियो सुनने में और ख़ास कर फ़िल्म संगीत में दिलचस्पी हुई। तो आकाशवाणी के गुवाहाटी केन्द्र से द्पहर के वक़्त दो घंटे के लिए सैनिक भाइयों का कार्यक्रम हुआ करता था (आज भी होता है) , जिसके अंतर्गत कई दैनिक, साप्ताहिक और मासिक कार्यक्रम प्रस्तुत होते थे फ़िल्मी गीतों के, कुछ कुछ विविध भारती अंदाज़ के। तो हर शुक्रवार के दिन एक कार्यक्रम आता था 'एक ही फ़िल्म के गीत', जिसमें किसी नए फ़िल्म के सभी गीत बजाए जाते थे। तो गर्मी की छुट्टियों में या कभी भी जब शुक्रवार को स्कूल की छुट्टी हो, उस 'एक ही फ़िल्म के गीत' कार्यक्रम को सुनने के लिए मैं और मेरा बड़े भाई बेसबरी से इंतज़ार करते थे। और कार्यक्रम शुरु होने पर जब उद्‍घोषक कहते कि "आज की फ़िल्म है...", उस वक़्त तो जैसे उत्तेजना चरम सीमा तक पहूँच जाया करती थी कि कौन सी फ़िल्म के गानें बजने वाले हैं। मुझे अब भी याद है कि हम किस तरह से ख़ुश हुए थे जिस दिन 'हीरो' फ़िल्म के गानें हमने पहली बार सुने थे उसी कार्यक्रम में।

विश्व दीपक - बहुत ही ख़ूबसूरत यादें हैं, और मैं भी महसूस कर सकता हूँ। उन दिनों मनोरंजन के साधन केवल रेडियो ही हुआ करता था, जिसकी वजह से रेडियो की लोकप्रियता बहुत ज़्यादा थी। अब बस यही कह सकते हैं कि विज्ञान ने हमें दिया है वेग, पर हमसे छीन लिया है आवेग।

सुजॊय - वाह! क्या बात कही है आपने! हाँ, तो मैं यही कह रहा था कि आज 'ताज़ा सुर ताल' प्रस्तुत करते हुए मुझे ऐसा लगता है कि मैं भी उन्हीं उद्‍घोषकों की तरह किसी नए फ़िल्म के गानें लेकर आता हूँ, कार्यक्रम वही एक ही फ़िल्म का है, लेकिन श्रोता से अब मैं एक प्रस्तुतकर्ता बन गया हूँ। चलिए अब बताया जाये कि आज हम कौन सी नई फ़िल्म के गीत लेकर उपस्थित हुए हैं।

विश्व दीपक - दरअसल, आज हम ज़रा हल्के फुल्के मूड में हैं। इसलिए ना तो आज किसी क़िस्म का सूफ़ी गीत बजेगा, और ना ही कोई दर्शन का गीत। आज तो बस मस्ती भरे अंदाज़ में सुनिए अक्षय कुमार और ऐश्वर्या राय बच्चन की नई नवेली फ़िल्म 'ऐक्शन रीप्ले' के गीत। विपुल शाह निर्देशित इस फ़िल्म में गीतकार - सगीतकार जोड़ी के रूप में हैं इरशाद कामिल और प्रीतम। अन्य मुख्य कलाकारों में शामिल हैं रणधीर कपूर, किरण खेर, ओम पुरी, नेहा धुपिया और आदित्य रॊय कपूर।

सुजॊय - इससे पहले कि गीतों का सिलसिला शुरु करें, मैं यह याद दिलाना चाहूँगा कि विपुल शाह की थोड़ी कम ही चर्चा होती है, लेकिन इन्होंने बहुत सी कामियाब और म्युज़िकल फ़िल्में दी हैं और अपने लिए एक सम्माननीय स्थान इस इण्डस्ट्री में बना लिया है। विपुल शाह और अक्षय कुमार की जोड़ी भी ख़ूब रंग लायी है, जैसे कि 'वक़्त', 'नमस्ते लंदन', 'सिंह इज़ किंग्' और 'लंदन ड्रीम्स' जैसी फ़िल्मों में। विपुल शाह निर्मित और अनीज़ बाज़्मी निर्देशित रोमांटिक कॊमेडी 'सिंह इज़ किंग्' में प्रीतम के सुपरहिट संगीत से ख़ुश होकर विपुल ने अपनी इस अगली रोमांटिक कॊमेडी के संगीत के लिए प्रीतम को चुना है।

विश्व दीपक - फ़िल्म की कहानी के हिसाब से फ़िल्म में ७० के दशक के संगीत की छाया होनी थी। दरअसल इस फ़िल्म की कहानी भी बेहद अजीब-ओ-ग़रीब है। इस फ़िल्म में आदित्य रॊय कपूर अपने माता पिता (ऐश्वर्या और अक्षय), जिनकी एक दूसरे से शादी नहीं हो पायी थी, टाइम मशीन में बैठ कर ७० के दशक में पहूँच जाता है और अपने माता पिता का मिलन करवाता है। तो इतनी जानकारी के बाद आइए अब पहला गीत सुन ही लिया जाए।

गीत - ज़ोर का झटका


सुजॊय - वाक़ई ज़ोर का झटका था! फ़ुल एनर्जी के साथ दलेर मेहंदी और रीचा शर्मा ने इस गीत को गाया है और आजकल यह गीत लोकप्रियता की सीढियाँ चढ़ता जा रहा है। शादी के नुकसानों को लेकर कई हास्य गीत बनें हैं, यह गीत उसी श्रेणी में आता है, और पूरी टीम ने ही अच्छा अंजाम दिया है गीत को।

विश्व दीपक - बड़ा ही संक्रामक रीदम है गीत का। कुछ कुछ "चोर बाज़ारी" गीत की तरह लगता है शुरु शुरु में, लेकिन बाद में प्रीतम ने गीत का रुख़ दूसरी ओर ही मोड़ दिया है। दलेर मेहंदी की गायकी के तो क्या कहने, और रीचा शर्मा के गले की हरकतों से तो सभी वाक़ीफ़ ही हैं। इन दोनों के अलावा मास्टर सलीम ने भी अपनी आवाज़ दी है इस गीत में कुछ और मसाला डालने के लिए।

सुजॊय - इस मस्ती भरे गीत के बाद अब एक रोमांटिक गीत, उस ७० के दशक के स्टाइल का हो जाए! गायिका हैं श्रेया घोषाल।

गीत - ओ बेख़बर


विश्व दीपक - बड़ा ही मीठा, सुरीला गीत था श्रेया की आवाज़ में। प्रीतम के संगीत की विशेषता यही है कि वो पूरी तरह से व्यावसायिक हैं, जिसे कहते हैं 'ट्रुली प्रोफ़ेशनल'। जिस तरह का संगीत आप उनसे माँगेंगे, वो बिलकुल उसी तरह का गीत आपको बनाकर दे देंगे। पीछले साल प्रीतम का ट्रैक रेकॊर्ड सब से उपर था, इस साल भी शायद उनका ही नाम सब से उपर रहेगा। ख़ैर, इस गीत की बात करें तो एक टिपिकल यश चोपड़ा फ़िल्म के गीत की तरह सुनाई देता है, बस लता जी की जगह अब श्रेया घोषाल है।

सुजॊय - मुझे तो इस गीत को सुनते हुए लग रहा था जैसे फूलों भरी वादियों, बर्फ़ीली पहाड़ियों, हरे भरे खेतों और झीलों में यह फ़िल्माया गया होगा। गानें का रंग रूप तो आधुनिक ही है, लेकिन एक उस ज़माने की बात भी कहीं ना कहीं छुपी हुई है। ऐश्वर्या के सौंदर्य को कॊम्प्लीमेण्ट करता यह गीत लोगों के दिलों को छू सकेगा, हम तो ऐसी ही उम्मीद करेंगे। ऐश्वर्या - श्रेया कम्बिनेशन में फ़िल्म 'गुरु' का गीत "बरसो रे मेघा मेघा" जिस तरह से लोकप्रिय हुआ था, इस गीत से भी वह उम्मीद रखी जा सकती है।

विश्व दीपक - चलिए अब बढ़ते हैं तीसरे गीत की ओर। इस बार सेवेंटीज़ के रेट्रो शैली का एक गीत "नखरे", जिसे आप एक कैम्पस छेड़-छाड़ सॊंग् भी कह सकते हैं।

गीत - नखरे


सुजॊय - "लड़की जो बनती प्रेमिका, बैण्ड बजाये चैन का, उड़ जाता सर्कीट ब्रेन का, पटरी पे बैठा आदमी, देखे रास्ता ट्रेन का"। कमाल के ख़यालात हैं इरशाद साहब के, जिनके लेखनी की दाद देनी ही पड़ेगी! और संगीत में प्रीतम ने कमाल तो किया ही है। गाने में आवाज़ फ़्रण्कोयस कास्तलीनो का था, जिन्हें आजकल हिंदी के एल्विस प्रेस्ली कहा जा रहा है। एक फ़ुल्टू रॊक-एन-रोल पार्टी सॊंग जिसे सुन कर झूमने को दिल करता है।

विश्व दीपक - अक्षय कुमार के मशहूर संवाद "आवाज़ नीचे" को गीत के शुरुवाती हिस्से में सुना जा सकता है। गीत के ऒरकेस्ट्रेशन की बात करें तो गीटार और पर्क्युशन का ज़बरदस्त इस्तेमाल प्रीतम ने किया है, और गीत के मूड और स्थान-काल-पात्र के साथ पूरा पोरा न्याय किया है।

सुजॊय - अच्छा विश्व दीपक जी, पिछली बार आपने किसी हिंदी फ़िल्म में होली गीत कब देखी थी याद है कुछ आपको?

विश्व दीपक - मेरा ख़याल है कि विपुल शाह की ही फ़िल्म 'वक़्त' में "डू मी एक फ़ेवर लेट्स प्ले होली" और 'बाग़बान' में "होली खेले रघुवीरा अवध में" ही होने चाहिए। वैसे आप के सवाल से ख़याल आया कि ७० के दशक में जिस तरह से होली गीत फ़िल्मों के लिए बनते थे, और जिस तरह से फ़िल्माये जाते थे, उनमें कुछ और ही बात होती थी। फ़िल्मी गीतों से धीरे धीरे विविधता ख़त्म होती जा रही है, ख़ास कर त्योहारों के गीत को बंद ही हो गये हैं। ख़ैर, होली गीत की बात चली है तो 'ऐक्शन रीप्ले' में भी एक होली गीत की गुंजाइश रखी गई है, आइए उसी गीत को सुन लिया जाए।

गीत - छान के मोहल्ला


सुजॊय - ऐश्वर्या और नेहा धुपिया पर फ़िल्माया गया यह गीत सुनिधि चौहान और ऋतु पाठक की आवाज़ों में था। पूर्णत: देसी फ़्लेवर का गाना था, लेकिन प्रीतम ने इस बात का पूरा पूरा ध्यान रखा कि यह एक आइटम सॊंग् होते हुए भी ऐश्वर्या पर फ़िल्माया जा रहा है, इसलिए एक तरह ही शालीनता भी बरक़रार रखी है।

विश्व दीपक - इरशाद कामिल लगता है गुलज़ार साहब के नक्श-ए-क़दम पर चल निकले हैं इस गीत में, जब वो लिखते हैं कि "जली तो, बुझी ना, क़सम से कोयला हो गई मैं"। इस तरह की उपमाएँ गुलज़ार साहब ही देते आये हैं। देखना यह है कि क्या यह गीत भी "डू मी एक फ़ेवर" की तरह चार्टबस्टर बन पाता है या नहीं।

सुजॊय - चार गानें हमने सुन लिए, और एक बात आपने ग़ौर की होगी कि इनमें ७० के दशक के रंग को लाने की कोशिश तो की गई है, लेकिन हर गीत एक दूसरे से अलग है। हम इस ऐल्बम के करीब करीब बीचो बीच आ पहुँचे हैं, यानी कि ९ गीतों में से ४ गीत सुन चुके हैं। तो आइए बिना कोई कमर्शियल ब्रेक लिए सुनते हैं 'ऐक्शन रीप्ले' का पाँचवाँ गीत।

गीत - तेरा मेरा प्यार


विश्व दीपक - कुल्लू मनाली की स्वर्गीक सुंदरता इस गीत के फ़िल्मांकन की ख़ासीयत है, और इस गीत को सुनने के बाद समझ में आता है कि विपुल शाह ने करीब करीब एक साल तक क्यों इंतेज़ार किया वहाँ के मौसम में सुधार का। पहाड़ी लोक गीत की छाया लिए इस गीत में अगर प्रीतम के भट्ट कैम्प की शैली सुनाई देती है तो कुछ कुछ रहमान का अंदाज़ भी महसूस होता है।

सुजॊय - बिलकुल मुझे भी यह गीत ईमरान हाश्मी टाइप का गीत लगा। कार्तिक, महालक्ष्मी और अंतरा मित्र की आवाज़ों में यह रोमांटिक गीत का भी अपना मज़ा है। और आपने कुल्लू मनाली का ज़िक्र छेड़ कर तो जैसे मुझे रोहतांग पास की पहाड़ियों में वापस ले गए जहाँ पर मैं अपने मम्मी डैडी के साथ दो साल पहले दशहरे के समय गया था। रोहतांग पास के समिट पर ऐसी बर्फ़ीली हवाएँ कि एक मिनट आप खड़े नहीं रह सकते। वहाँ से वापस आने के बाद ऐसा लगा कि जैसे किसी सपनो की दुनिया से घूम कर वापस आ रहे हों। मेरी मम्मी का एक्स्प्रेशन कुछ युं था कि "अब मुझे कहीं और घूमने जाने की चाहत ही नहीं रही"। ऐसा है कुल्लू मनाली।

विश्व दीपक - चलिए अब कुल्लू मनाली से पंजाब की धरती पर आ उतरते हैं, और सुनते हैं मीका की आवाज़ में "धक धक धक"।

गीत - धक धक धक


सुजॊय - प्रीतम के गायक चयन के बारे में हम कुछ दिन पहले ही बात कर चुके हैं। आज फिर से दोहरा रहे हैं कि प्रीतम यह भली भाँति जानते हैं कि कौन सा गीत किस गायक से गवाना है। और जब गीत बनकर बाहर आता है तो हमें यह मानना ही पड़ता है कि इस गीत के लिए चुना हुआ गायक ही सार्थक हैं उस गीत के लिए।

विश्व दीपक - इकतारा की धुनें, उसके बाद फिर धिनचक रीदम, कुल मिलाकर एक मस्ती भरा गीत। इस गीत के लिए भी थम्प्स अप ही देंगे। चलिए अब लुका छुपी का खेल भी खेल लिया जाए। अगर आपको याद हो तो फ़िल्म 'ड्रीम गर्ल' में एक गाना था "छुपा छुपी खेलें आओ", और अमिताभ बच्चन की फ़िल्म 'दो अंजाने' में भी "लुक छुप लुक छुप जाओ ना" गीत था। ये दोनों ही गानें बच्चों को केन्द्र में रख कर लिखे और फ़िल्माये गये थे। लेकिन 'ऐक्शन रीप्ले' का "लुक छुप" एक मस्ती और धमाल से लवरेज़ गीत है जिसे के. के और तुल्सी कुमार ने गाया है, जो आजकल अपने अपने करीयर में पूरे फ़ॊर्म में हैं।

सुजॊय - ७० के दशक के संगीत की बात है तो कुछ हद तक ऋषी कपूर के नृत्य गीतों की छाया इस गीत में पड़ती हुई सी लगती है। चलिए सुनते हैं।

गीत - लुक छुप जाना


विश्व दीपक - आपने ग़ौर किया कि मुखड़े का इस्तेमाल अंतरे में भी हुआ है, और यही चीज़ शायद गीत को भीड़ से अलग करती है। तालियों, सिन्थेसाइज़र, ग्रुंजे गीटार और स्टेडियम रॊक के रम्ग इस गीत में भरे गये हैं। ७० के नहीं, बल्कि मैं यह कहूँगा कि अर्ली से लेके मिड एइटीज़ का प्रभाव है इस गीत के संगीत में।

सुजॊय - रॊक मूड को बरकरार रखते हुए अब बारी है सूरज जगन के आवाज़ की, गीत है "आइ ऐम डॊग गॊन क्रेज़ी"। सूरज जगन आज के अग्रणी रॊक गायकों में से एक हैं, लेकिन इस गीत में ऐसा लगता है कि जैसे उन्होंने आवाज़ को दबाया हुआ है। इस ऐल्बम के हिसाब से मुझे तो यह गीत थोड़ा ढीला लगा, देखते हैं हमारे श्रोताओं के क्या विचार हैं।

विश्व दीपक - ६० और ७० के दशकों में बनने वाले रॊक गीतों का अंदाज़ लाने की कोशिश है इस गीत में। यहाँ पे यह बताना ज़रूरी है कि प्रीतम ही वो संगीतकार हैं जिन्होंने हार्ड रॊक को बैण्ड शोज़ से निकालकर हिंदी फ़िल्म संगीत की मुख्य धारा में शामिल करवाया 'गैंगस्टर' और 'लाइफ़ इन ए मेट्रो' जैसी फ़िल्मों के ज़रिये। आइए सुनते हैं...

गीत - आइ ऐम डॉग गॊन क्रेज़ी


सुजॊय - और अब हम पहूँच गये हैं 'ऐक्शन रीप्ले' फ़िल्म के नौवें और अंतिम गीत पर। श्रेया घोषाल की आवाज़ में नृत्य गीत "बाकी मैं भूल गई" प्यार का इज़हार करने वाले गीतों की श्रेणी में आता है, जिसमें नायिका अपनी दीवानगी ज़ाहिर करती है और उसका इक़रार करती है। प्रीतम विविधता का परिचय देते हुए मुखड़े और अंतरे की रीदम को बिलकुल अलग रखा है।

विश्व दीपक - वैसे इस गीत का प्रेरणा स्रोत हैं एक मिडल-ईस्टर्ण नंबर है, और फ़ीरोज़ ख़ान की फ़िल्मों में इस तरह के संगीत का इस्तेमाल सुना गया है। कुल मिलाकर यही कह सकते हैं कि इस ऐल्बम का एक सुखांत हुआ है। चलिए यह गीत सुन लेते हैं।

गीत - बाकी मैं भूल गई


सुजॊय - इन तमाम गीतों को सुनने के बाद मेरी अदालत यह फ़ैसला देती है कि 'ऐक्शन रीप्ले' के गीतों को बार बार रीप्ले किया जाए और सुना जाए। मेलडी और मस्ती का संगम है 'ऐक्शन रीप्ले' का ऐल्बम। प्रीतम, इरशाद कामिल और तमाम गायक गायिकाओं को मेरी तरफ़ से थम्प अप! 'चुस्त-दुरुस्त गीत' और 'लुंज पुंज गीत' तो विश्व दीपक जी अभी बताएँगे, लेकिन मुझसे अगर पूछा जाए कि वह एक गीत कौन सा है जो इस ऐल्बम का सर्वोत्तम है, तो मेरा वोट "ओ बेख़बर" को ही जाएगा।

विश्व दीपक - आपकी पसंद से हमारी पसंद जुदा कैसे हो सकती है सुजॉय जी। आपने "ओ बेखबर" को वोट दिया है तो मैं उसे हीं आज का "चुस्त-दुरुस्त" गीत घोषित करता हूँ। वैसे इस फिल्म के सभी गाने अच्छे हैं। मज़ेदार बात तो ये है कि इस दिवाली को जिन दो बड़ी फिल्मों में टक्कर है वे हैं "ऐक्शन रिप्ले" और "गोलमाल ३" और दोनों में हीं संगीत प्रीतम दा का है। अगर आप दोनों फिल्मों के गानें सुनें तो आपको लगेगा कि प्रीतम दा ने अपना ज्यादा प्यार "ऐक्शन रिप्ले" को दिया है और "गोलमाल ३" को जल्दी में निपटा-सा दिया है। खैर ये तो निर्माता-निर्देशक पर निर्भर करता है कि वे किसी संगीतकार या गीतकार से किस तरह का काम लेते हैं। मैं तो बस इतना हीं कह सकता हूँ कि विपुल शाह इस काम में सफल साबित हुए हैं। चलिए तो इन्हीं बातों के साथ आज की बैठक समाप्त करते हैं। जाते-जाते सुजॉय जी आपको और सभी मित्रों को दिपावली की अग्रिम शुभकामनाएँ।

आवाज़ की राय में

चुस्त-दुरुस्त गीत: ओ बेख़बर

लुंज-पुंज गीत: आइ ऐम डॉग गॊन क्रेज़ी

मंगलवार, 5 अक्तूबर 2010

"क्रूक" में कुमार के साथ तो "आक्रोश" में इरशाद कामिल के साथ मेलोडी किंग प्रीतम की जोड़ी के क्या कहने!!

ताज़ा सुर ताल ३८/२०१०


सुजॊय - दोस्तों, नमस्कार, स्वागत है आप सभी का इस हफ़्ते के 'ताज़ा सुर ताल' में। विश्व दीपक जी, इस बार के लिए मैंने दो फ़िल्में चुनी हैं, और ये फ़िल्में हैं 'क्रूक' और 'आक्रोश'।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, क्या कोई कारण है इन दोनों को इकट्ठे चुनने के पीछे?

सुजॊय - जी हाँ, मैं बस उसी पे आ रहा था। एक नहीं बल्कि दो दो समानताएँ हैं इन दोनों फ़िल्मों में। एक तो यह कि दोनों के संगीतकार हैं प्रीतम। और उससे भी बड़ी समानता यह है कि इन दोनों की कहानी दो ज्वलंत सामयिक विषयों पर केन्द्रित है। जहाँ एक तरफ़ 'क्रूक' की कहानी आधारित है हाल में ऒस्ट्रेलिया में हुए भारतीयों पर हमले पर, वहीं दूसरी तरफ़ 'आक्रोश' केन्द्रित है हरियाणा में आये दिन हो रहे ऒनर किलिंग्स की घटनाओं पर।

विश्व दीपक - वाक़ई ये दो आज के दौर की दो गम्भीर समस्यायें हैं। तो शुरु किया जाए 'क्रूक' के साथ। मुकेश भट्ट निर्मित और मोहित सूरी निर्देशित 'क्रूक' के मुख्य कलाकार हैं इमरान हाश्मी, अर्जुन बजवा और नेहा शर्मा। प्रीतम का संगीत और कुमार के गीत। पहला गीत सुनते हैं "छल्ला इण्डिया तों आया"। पूरी तरह से पंजाबी फ़्लेवर का गाना है जिसे गाया है बब्बु मान और सुज़ेन डी'मेलो ने। पंजाबी भंगड़ा के साथ वेस्टर्ण फ़्युज़न में प्रीतम को महारथ हासिल है। "मौजा ही मौजा", "नगाड़ा", "दिल बोले हड़िप्पा" के बाद अब "छल्ला"।

सुजॊय - तो आइए इस थिरकन भरे गीत से आज के इस प्रस्तुति की शुरुआत की जाये।

गीत - छल्ला


सुजॊय - 'क्रूक' का दूसरा गीत है "मेरे बिना" जिसे गाया है निखिल डी'सूज़ा ने। अब तक निखिल की आवाज़ कई गायकों वाले गीतों में ही ली गयी थी जिसकी वजह से उनकी आवाज़ को अलग से पहचानने का मौका अब तक हमें नहीं मिल सका था। लेकिन इस गीत में केवल उन्ही की आवाज़ है। जिस तरह से जावेद अली और कार्तिक आजकल कामयाबी के पायदान चढ़ते जा रहे हैं, लगता है निखिल के भी अच्छे दिन उन्हें बाहें पसार कर बुला रहे हैं।

विश्व दीपक - गीत की बात करें तो इस गीत में रॊक इन्फ़्लुएन्स है और एक सॊफ़्ट रोमांटिक नंबर है यह। शुरु शुरु में इस गीत को सुनते हुए कोई ख़ास बात नज़र नहीं आती, लेकिन गीत के ख़तम होते होते थोड़ी सी हमदर्दी होने लगती है इस गीत के साथ। निखिल ने अच्छा गाया है और क्योंकि उनका यह पहला एकल गाना है, तो उन्हें हमें मुबारक़बाद देनी ही चाहिए। वेल डन निखिल!

सुजॊय - वैसे निखिल ने हाल ही में 'अंजाना अंजानी' का शीर्षक गीत भी गाया है। 'उड़ान' और 'आयेशा' में भी गीत गाये हैं। लेकिन यह उनका पहला सोलो ट्रैक है। आइए अब सुनते हैं इस गीत को।

गीत - मेरे बिना


विश्व दीपक - 'क्रूक' भट्ट कैम्प की फ़िल्म है और नायक हैं इमरान हाश्मी। तो ज़ाहिर है कि इसके गानें उसी स्टाइल के होंगे। वही यूथ अपील वाले इमरान टाइप के गानें। पिछले कुछ फ़िल्मों में इमरान ने ऒनस्क्रीन किस करना बंद कर दिया था और वो फ़िल्में कुछ ख़ास नहीं चली (वन्स अपॉन ए टाईम इन मुंबई को छोड़कर) शायद इसलिए वो इस बार 'क्रूक' में अपने उसी सिरियल किसर वाले अवतार में नज़र आयेंगे। ख़ैर, अगले गीत की बात की जाये। इस बार के.के की आवाज़। इमरान हाश्मी के फ़िल्मों में एक गीत के.के की आवाज़ में ज़रूर होता है क्योंकि के.के की आवाज़ में इमरान टाइप के गानें ख़ूब जँचते हैं।

सुजॊय - यह गीत है "तुझी में"। यह भी रॊक शैली में कम्पोज़ किया गाना है, लेकिन निखिल के मुक़ाबले के.के की दमदार आवाज़ को ध्यान में रखते हुए हार्डकोर रॊक का इस्तेमाल किया गया है। ड्रम्स और पियानो का ख़ूबसूरत संगम सुनने को मिलता है इस गीत में। लेकिन जो मुख्य साज़ है वह है १२ स्ट्रिंग वाला गिटार जो पूरे गीत में प्रधानता रखता है।

विश्व दीपक - यह सच है कि इस तरह के गानें प्रीतम पहले भी बना चुके हैं, लेकिन शायद अब तक हम इस अंदाज़ से उबे नहीं हैं, इसलिए अब भी इस तरह के गानें अच्छे लगते हैं। आइए सुनते हैं।

गीत - तुझी में


सुजॊय - और अब एक और गीत 'क्रूक' का हम सुनेंगे, फिर 'आक्रोश' की तरफ़ बढ़ेंगे। यह गीत है मोहित चौहान की आवाज़ में, "तुझको जो पाया"। इस गीत में अकोस्टिक गीटार मुख्य साज़ है, कोई रीदम नहीं है गाने में। मोहित चौहान की दिलकश आवाज़ से गीत में जान आयी है। दरसल यह गीत निखिल के गाये "मेरे बिना" गीत का ही एक दूसरा वर्ज़न है।

विश्व दीपक - इन दोनों की अगर तुलना करें तो मोहित चौहान की आवाज़ में जो गीत है वह ज़्यादा अच्छा सुनाई दे रहा है। मोहित चौहान का ताल्लुख़ हिमाचल की पहाड़ियों से है। और अजीब बात है कि उनकी आवाज़ में भी जैसे पहाड़ों जैसी शांति है, सुकून है। कम से कम साज़ों के इस्तेमाल वाले गीतों में मोहित की शुद्ध आवाज़ को सुन कर वाक़ई दिल को सुकून मिलता है। इस पीढ़ी के पार्श्व गायकों का प्रतिनिधित्व करने वालों में मोहित चौहान का नाम एक आवश्यक नाम है। लीजिए सुनिए इस गीत को।

गीत - तुझको जो पाया


सुजॊय - आइए अब बढ़ा जाये 'आक्रोश' की ओर। क्योंकि इस फ़िल्म की कहानी हरियाणा के ऒनर किलिंग्स पर है (लेकिन मेरे हिसाब से फिल्म यूपी, बिहार के किसी गाँव को ध्यान में रखकर फिल्माई गई है), शायद इसलिए इसका संगीत भी उसी अंदाज़ का है। प्रीतम के स्वरबद्ध इन गीतों को लिखा है इरशाद कामिल ने। अजय देवगन, अक्षय खन्ना और बिपाशा बासु अभिनीत इस फ़िल्म का एक आइटम नंबर आजकल टीवी चैनलों में ख़ूब सुनाई व दिखाई दे रहा है - "तेरे इसक से मीठा कुछ भी नहीं"।

विश्व दीपक - "मुन्नी बदनाम" के बाद अब "इसक से मीठा"। और इस बार ठुमके लगा रही हैं समीरा रेड्डी। लेकिन हाल के आइटम नंबर की बात करें तो अब भी गुलज़ार साहब के "बीड़ी जल‍इ ले" से मीठा कुछ भी नहीं। ख़ैर, आइए हम ख़ुद ही सुन कर यह निर्णय लें, इस गीत को गाया है कल्पना पटोवारी और अजय झिंग्रन ने। कल्पना यूँ तो असम से संबंध रखती है, लेकिन इन्हें प्रसिद्धि मिली भोजपुरी गानों से। "जा तार परदेश बलमुआ" और "ए गो नेमुआ" जैसे सुपरहिट भोजपुरी गानों को गाने वाली यह गायिका हाल में हीं सिंगिंग के एक रियालटी शो में असम का प्रतिनिधित्व करती नज़र आईं थी। जहाँ तक इस गाने की बात है तो यह पूर्णत: एक कमर्शियल आइटम नंबर है और फ़िल्म की कहानी के लिए इसकी ज़रूरत थी भी। तो आइए इस गीत को सुन ही लिया जाये।

गीत - तेरे इसक से मीठा कुछ भी नहीं


सुजॊय - अगला गीत ज़रा हट कर है। प्रीतम ने एक इंटरव्यु में कहा है कि उन्हें वो गानें कम्पोज़ करने में ज़्यादा अच्छे लगते है जिनमें मेलडी होता है। तो साहब इस बार उन्हें मेलडियस कम्पोज़िशन का मौका मिल ही गया। इस गीत में, जिसका शीर्षक है "सौदे बाज़ी", नवोदित गायक अनुपम आमोद ने अपनी आवाज़ दी है। प्रीतम की नये नये गायकों की खोज जारी है और इस बार वे अनुपम को ढूंढ़ लाये हैं। लगता है यह गीत अनुपम को दूर तक लेके जाएगा।

विश्व दीपक - वैसे इसी गीत का एक और वर्ज़न है जिसे जावेद अली से गवाया गया है। लेकिन आज हम अनुपम का स्वागत करते हुए उन्ही का गाया गीत सुनेंगे। पता नहीं इस गीत की धुन को सुनते हुए ऐसा लग रहा है कि जैसे इसी तरह की धुन का कोई और गाना पहले बन चुका है। शायद बाद में याद आ जाए!

सुजॊय - इस गीत की ख़ासियत है इसकी सादगी। भारतीय साज़ों की ध्वनियाँ सुनने को मिलती हैं भले ही सिन्थेसाइज़र पर तय्यार किया गया हो। सुनते हैं अनुपम आमोद की आवाज़।

गीत - सौदे बाज़ी


विश्व दीपक - आज के दौर के एक और गायक जो सूफ़ी गीतों में ख़ूब अपना नाम कमा रहे हैं, वो हैं अपने राहत फ़तेह अली ख़ान साहब। कैलाश खेर ने जो मुक़ाम हासिल किया था, आज वही मुकाम राहत साहब का है। इस फ़िल्म में भी उनका उन्ही के टाइप का एक गाना है "मन की मत पे मत चलियो ये जीते जी मरवा देगा"।

सुजॊय - सचमुच आज हर फ़िल्म में राहत साहब का एक गीत जैसे अनिवार्य हो गया है। क्योंकि आजकल वो 'छोटे उस्ताद' में नज़र आ रहे हैं, मैंने एक बात उनकी नोटिस की है कि वो बहुत ही विनम्र स्वभाव के हैं और बहुत ज़्यादा इमोशनल भी हैं। बात बात पे उनकी आँखों में आँसू आ जाते हैं। और बार बार वो लेजेन्डरी गायकों का ज़िक्र करते रहते हैं। इतनी सफलता के बावजूद उनके अंदर जो विनम्रता है, वो साफ़ झलकती है।

विश्व दीपक - "मन की मत पे मत चलियो", इरशाद कामिल ने यमक अलंकार का क्या ख़ूबसूरत इस्तेमाल किया है "मत" शब्द में। दो जगह "मत" आता है लेकिन अलग अलग अर्थ के साथ।

सुजॊय - ठीक वैसे ही जैसे रवीन्द्र जैन ने लिखा था "सजना है मुझे सजना के लिए" और "जल जो ना होता तो जग जाता जल"। तो आइए सुनते हैं राहत साहब की आवाज़ में "मन की मत"।

गीत - मन की मत पे मत


विश्व दीपक - और अब आज की प्रस्तुति का अंतिम गीत एक भक्ति रचना सुखविंदर सिंह की आवाज़ में "राम कथा", जिसमें रामायण के उस अध्याय का ज़िक्र है जिसमें भगवान राम ने रावण का वध कर सीता को मुक्त करवाया था। एक पौराणिक कथा के रूप में ही इस गीत में उसकी व्याख्या की गई है।

सुजॊय - देखना है कि फ़िल्म में इसका फ़िल्मांकन कैसे किया गया है। तब कहेंगे कि क्या "पल पल है भारी विपदा है आयी" के साथ इसका कोई टक्कर है या नहीं! आइए सुन लेते हैं यह गीत।

गीत - राम कथा


सुजॊय - हाँ तो दोस्तों, कैसे लगे इन दोनों फ़िल्मों के गानें? हमने दोनों फ़िल्मों के चार चार गानें आपको सुनवाये और एक एक गानें छोड़ दिये हैं, लेकिन आपको यकीन दि्ला दें कि उससे आप किसी अच्छे गीत से वंचित नहीं हुए हैं। अगर आप मेरी पसंद की बात करें तो 'क्रूक' का "तुझको जो पाया" (मोहित चौहान) और 'आक्रोश' का "मन की मत पे मत जाना" (राहत फ़तेह अली ख़ान) मुझे सब से ज़्यादा पसंद आये। बाक़ी गानें सो-सो लगे। रेटिंग की बात है तो मेरी तरफ़ से दोनों ऐल्बमों को ३ - ३ अंक।

विश्व दीपक - सुजॉय जी, मैं आपकी टिप्पणियों को सर-आँखों पर रखते हुए मैं आपके द्वारा दिए गए रेटिग्स को बरकरार रखता हूँ। जहाँ तक प्रीतम के संगीत की बात है तो वो हर बार हर फिल्म में ऐसे कुछ गाने जरूर देते हैं, जिन्हें श्रोताओं
का भरपूर प्यार नसीब होता है। दोनों फिल्मों में ऐसे एक्-दो गाने जरूर हैं। संगीत और इन्स्ट्रुमेन्ट्स के बारे में आपने तो लगभग सब कुछ हीं कह दिया है, इसलिए मैं थोड़ा "बोलों" का जिक्र करूँगा। "कुमार" और "इरशाद कामिल" दोनों हीं अलग तरह के गाने लिखने के लिए जाने जाते हैं। फिर भी अगर मुझसे पूछा जाए कि किसके गाने "अन-कन्वेशनल" होते हैं और दिल को ज्यादा छूते हैं तो मैं इरशाद भाई का नाम लूँगा। इरशाद भाई ने जहाँ एक तरफ "तू जाने ना" लिखकर एकतरफा प्यार करने वालों को एक एंथम दिया है, वहीं "न शहद, न शीरा, न शक्कर" लिखकर "नौटंकी" वाले गानों को कुछ नए शब्द मुहैया कराए हैं। मैं उनके शब्द-सामर्थ्य और शब्द-चयन का कायल हूँ। आने वाली फिल्मों में भी मैं उनसे ऐसे हीं नए शब्दों और बोलों की उम्मीद रखता हूँ। चलिए तो इन्हीं बातों के साथ आज की समीक्षा पर विराम लगाते हैं। उससे पहले सभी श्रोताओं के लिए एक सवाल/एक आग्रह/एक अपील: मैं चाहता हूँ कि हम समीक्षा में रेटिंग न दें, बल्कि बस इतना हीं लिख दिया करें कि कौन-सा गाना बहुत अच्छा है और कौन-सा थोड़ा कम। मैंने यह बात सुजॉय जी से भी कही है और उनके जवाब का इंतज़ार कर रहा हूँ। उनके जवाब के साथ-साथ मैं आप सबों की राय भी जानना चाहूँगा।

आवाज़ रेटिंग्स: क्रूक: ***, आक्रोश: ***

पाठको की रूचि में कमी होती देख आज से सवालों का सिलसिला(ट्रिविया) समाप्त किया जाता है.. सीमा जी, हमें मुआफ़ कीजिएगा, लेकिन आपके अलावा कहीं और से जवाब नहीं आता और आप भी पिछली कुछ कड़ियों में नदारद थीं, इसलिए सीने पर पत्थर रखकर हमें यह निर्णय लेना पड़ा :)

TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. 'लम्हा'।
२. "जियो, उठो, बढ़ो, जीतो"।
३. 'तलाश'।

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

सलीम-सुलेमान की आशाएँ ढल गई हैं धीमी गति के प्रेरक गीतों में.. साथ हैं प्रीतम और शिराज़ भी

ताज़ा सुर ताल ३०/२०१०

सुजॊय - 'ताज़ा सुर ताल' के सभी श्रोताओं व पाठकों को हमारा प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, इसे इत्तेफ़ाक़ ही कहिए या कुछ और, हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री में कुछ नायक ऐसे हुए हैं जिनकी फ़िल्मों के गानें हमेशा ही सुपरहिट हुआ करते हैं। जैसे कि राजेश खन्ना की शायद ही कोई फ़िल्म ऐसी होगी जिसके गानें चले ना हों। नए दौर में सलमान ख़ान ऐसे नायक बनें जिनकी फ़िल्मों के गानें बेहद लोकप्रिय होते आए हैं और आज भी होते हैं। ऐसे ही एक और अभिनेता हैं जॊन एब्राहम जिनकी फ़िल्मों का संगीत भी चलता आया है, फिर चाहे फ़िल्म चले या ना चले।

विश्व दीपक - 'जिस्म', 'साया', 'धूम', 'सलाम-ए-इश्क़', 'काल', 'गरम मसाला', 'दोस्ताना', 'गोल', 'न्यू यार्क', 'पाप', 'टैक्सी नंबर ९ २ ११', ये सारी जॉन की फ़िल्में संगीत के लिहाज़ से सफल ही मानी जाएंगी। आज हम जॉन की नई फ़िल्म 'आशाएँ' के गानें लेकर उपस्थित हुए हैं, और इन गीतों को सुनने के बाद हमें और आपको मिलकर यह निर्णय लेना है कि क्या जॉन की पिछली सारी फ़िल्मों के संगीत की तरह इस फ़िल्म के संगीत पर भी 'हिट सुपरहिट' की मोहर लगाई जा सकती है या नहीं।

सुजॊय - सब से पहले तो फ़िल्म के शीर्षक की बात करेंगे। परसेप्ट पिक्चर कंपनी के बैनर तले बनी इस फ़िल्म को लिखा व निर्देशित किया है नागेश कुकुनूर ने। अब आप समझ गए होंगे कि हमने फ़िल्म के शीर्षक का ज़िक्र क्यों किया। जी हाँ, नागेश की मशहूर फ़िल्म 'इक़बाल' के मशहूर गीत "आशाएँ खिले दिल की" से इस फ़िल्म का शीर्षक प्रेरित है।

विश्व दीपक - जॉन एब्राहम के अलावा इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं नवोदित अभिनेत्री सोनल सहगल (जो हिमेश भाई के साथ उनकी फ़िल्म रेडियो में भी दिखी थीं), गिरिश कारनाड, फ़रीदा जलाल, आश्विन चितले, अनिता नायर प्रमुख। श्रेयस तलपडे का भी एक गेस्ट अपीयरेन्स है फ़िल्म में। पॉण्डिचेरी और हैदराबाद के लोकेशन्स पर फ़िल्माये गये इस फ़िल्म के लिए जॉन को १६ किलो का वज़न कम करना पड़ा है ऐसा सुनने में आया है। ये तो थे फ़िल्म से जुड़े कुछ तथ्य, आइए अब गीतों का सिलसिला शुरु किया जाए। फ़िल्म में कुल ८ गीत हैं और ५ रीमिक्स ट्रैक्स।

सुजॊय - 'स्ट्राइकर' और 'राजनीति' की तरह 'आशाएँ' में भी एकाधिक संगीतकार हैं, मुख्य संगीतकार हैं सलीम-सुलेमान, जिन्होंने फ़िल्म का पार्श्व संगीत भी तय्यार किया है। और जो दूसरे संगीतकार हैं, वो हैं प्रीतम (२ गीत) और शिराज़ उप्पल (१ गीत)। गीतकार हैं मीर अली हुसैन, समीर, कुमार और शक़ील सोहैल। तो आइए सुनते हैं पहला गीत नीरज श्रीधर की आवाज़ में। नीरज का नाम देख कर आप समझ ही गए होंगे कि इसके संगीतकार हैं प्रीतम। इस गीत को समीर ने लिखा है।

गीत - मेरा जीना है क्या


विश्व दीपक - नीरज श्रीधर और प्रीतम की जोड़ी जिस तरह के गानें हमें देती आई है आज तक (हरे राम हरे राम, प्रेम की नैय्या, तुम मिले, वगेरह), उससे कुछ अलग हट के है यह गीत। गीत शुरु होता है नर्मोनाज़ुक अंदाज़ में, लेकिन बाद में रॉक शैली आ जाती है। नीरज की आवाज़ अच्छी बैठी है इस गीत में लेकिन यह गीत तो के.के वाला गीत है बिल्कुल। आजकल इस गीत को ख़ूब टीवी पर दिखाया जा रहा है फ़िल्म के प्रोमो में। और नीरज और उस प्रोमो में प्रीतम भी नज़र आ रहे हैं रॉक सिंगर्स की तरह।

सुजॊय - मुझे यह गीत अच्छा ही लगा, लेकिन मेरा भी ख़याल है कि के.के की आवाज़ में गीत और ज़्यादा खुल कर सामने आता। ख़ैर, नीरज ने भी अच्छा निभाया है। आगे बढ़ते हैं दूसरे गीत की तरफ़, और अब की बार गीतकार कुमार के बोल, प्रीतम का ही संगीत, और इसे गाया है शान और तुलसी कुमार ने। एक सुरीले मेलोडियस युगल गीत की उम्मीद हम ज़रूर रख सकते हैं, क्यों? आइए ख़ुद सुनते हैं और फिर निर्णय लेते हैं।

गीत - दिलकश दिलदार दुनिया


सुजॊय - अनुप्रास अलंकार!!! लेकिन जिस तरह के मेलोडियस नर्मोनाज़ुक रोमांटिक युगल गीत की कल्पना मैंने की थी, वैसा नहीं पाया। मैंने तो सोचा था कि "तेरी ओर" और "ख़ुदा जाने" जैसा कुछ सुनने को मिलेगा। लेकिन इस गीत का अंदाज़ कुछ अलग सा है। शान की आवाज़ भी कुछ बदली हुई-सी लगी। तुल्सी कुमार की आवाज़ में तो मुझे कभी कोई ख़ास बात नज़र नहीं आई। ग़लत अर्थ ना निकालें तो मैं यही कहूँगा कि तुलसी कुमार जैसी आवाज़ और गायकी तो हर रियल्टी शो में सुनने को मिल जाती है। इस आवाज़ में ख़ास बात क्या है कोई मुझे समझाए ज़रा!

विश्व दीपक - इस गीत के बारे में इतना ही कहूँगा कि कम्पोजिशन अच्छा है, बीट बेस्ड सॉंग है, ठीक ठाक गीत है। लेकिन प्रीतम से हम कुछ और बेहतर उम्मीद रखते हैं, ख़ास कर रोमांटिक नर्मोनाज़ुक गीतों में। चलिए अब बढ़ते हैं तीसरे गीत की ओर। प्रीतम के बाद अब है शिराज़ उप्पल की बारी। उन्होंने ना केवल इस गीत को स्वरबद्ध किया है, बल्कि शक़ील सोहैल के लिखे इस गीत को ख़ुद गाया भी है। सुनते हैं "रब्बा"।

गीत - रब्बा


विश्व दीपक - गायक-संगीतकार शिराज़ उप्पल पाक़िस्तान से ताल्लुक़ रखते हैं। गाना तो अच्छा ही बना है, धुन भी अच्छी है, गाया भी ठीक-ठाक है, लेकिन पता नहीं क्यों इस गीत ने कोई आस असर नहीं छोड़ा। बस यही कह सकता हूँ कि "रब्बा ये क्या हुआ"।

सुजॊय - यह शायद इसलिए भी हो सकता है कि शिराज़ की आवाज़ में ऊँचे नोट्स वाले गीत ज़्यादा अच्छे लगते हैं। नीचे सुर के गीतों में उनकी आवाज़ खुल के बाहर नहीं आती। इस गीत के बारे में यही कहूँगा कि शक़ील सोहैल ने अच्छा कलम चलाया है।

विश्व दीपक - अच्छा, हमने तीन गीत सुनें, अब से अगले पाँच गीतों में संगीत सलीम सुलेमान का है और गीतकार हैं मीर अली हुसैन। सुनते हैं इस गीतकार-संगीतकार जोड़ी की पहली रचना ज़ुबीन की आवाज़ में।

गीत - अब मुझको जीना


सुजॊय - यह आशावादी और प्रेरणादायक गीत था। ज़ुबीन आसाम से ताल्लुक़ रखते हैं और वहाँ पर ख़ूब लोकप्रिय हैं। हिंदी में प्रीतम ने उनसे फ़िल्म 'गैंगस्टर' में "या अली रहम अली" गवाया था जो बहुत लोकप्रिय हुआ था। इस गीत को भी उन्होंने पूरे जोश के साथ गाया है। ज़ोरदार ऑरकेस्ट्रेशन और क़दमों को थिरकाने वाला गीत है। पिछले तीन गीत भी अच्छे थे लेकिन कुछ ना कुछ कमी लग रही थी उनमें। इस गीत को सुन कर एक ताज़गी जैसी आ गई, बहुत ही खुल कर यह गीत आया है और सही में गीत अच्छा है।

विश्व दीपक - इस गीत की शुरुआत में कुछ कुछ 'Summer of 69' जैसा लगा, फिर गीत ने तेज़ गति पकड़ ली और अपनी अलग राह पकड़ कर अपने मुक़ाम तक पहुँच गई। ज़ुबीन गर्ग की आवाज़ में एक अलग कशिश है और भीड़ से अलग सुनाई देती है। उनसे और भी ज़्यादा गानें संगीतकार गवा सकते हैं। 'आशाएँ' फ़िल्म का पाँचवा गीत है शफ़ाक़त अमानत अली की आवाज़ में, "शुक्रिया ज़िंदगी"। आइए गीत सुनते हैं, फिर बात करते हैं।

गीत - शुक्रिया ज़िंदगी


सुजॊय - ज़िंदगी का शुक्रिया अदा करता हुआ यह गीत सुन कर हम सलीम सुलेमान, मीर अली हुसैन और शफ़ाक़त अमानत अली का शुक्रिया अदा ही कर सकते हैं। "छन के आई तो क्या चांदनी तो मिली" जैसे अन्योक्ति अलंकार में सजकर यह गीत ज़िंदगी के प्रति आशावादी होने की प्रेरणा देती है। मुझे तो यह गीत सुनते हुए फ़िल्म 'सदमा' का वो मशहूर याद गया कि "ऐ ज़िंदगी गले लगा ले, हमने भी तेरे हर एक ग़म को गले से लगाया है, है न"।

विश्व दीपक - बेहद ख़ूबसूरत बोल लिखे हैं मीर अली हुसैन ने। मुझे तो लग रहा है कि अच्छे गीतकारों और अच्छे बोल वाले गीतों का ज़माना वापस आ गया है। पिछले कुछ समय से निम्न स्तर के बोल वाले गानें बहुत ही कम हो गए हैं। क्या फ़िल्म संगीत एक बार फिर से करवट ले रहा है?

सुजॊय - काश ऐसा हो जाए, और फ़िल्म संगीत का एक और सुनहरा दौर आ जाए तो मज़ा आ जाए! शफ़ाक़त अमानत अली के बाद अब बारी है श्रेया घोषाल की सुरीली आवाज़ की। "पल में मिला जहाँ" श्रेया की मधुर आवाज़ में ढलकर बेहद सुरीला सुनाई देता है, आइए सुनते हैं।

गीत - पल में मिला जहां (श्रेया)


विश्व दीपक - श्रेया की नर्म आवाज़ में बिना किसी साज़ के जैसे ही "पल में मिला जहां" शुरु होता है, गीतकार किस ख़ूबसूरती से हर पंक्ति की शुरुआत "पल में" से करके "पल में" पर ही ख़त्म करते हैं, गीत को सुन कर महसूस किया जा सकता है।

पल में मिला जहां, है धुआँ पल में,
पल में यक़ीन था, अब गुमां पल में,
पल में उम्मीद थी, अरमां पल में,
पल में बहार थी, अब ख़िज़ाँ पल में।

सुजॊय - गीत में कम से कम साज़ों का इस्तेमाल हुआ है, जिस वजह से श्रेया को काफ़ी मेहनत करनी पड़ी होगी क्योंकि पूरा दायित्व उनकी गायकी पर आ गया है। गीत तो निस्संदेह उत्कृष्ठ है, लेकिन देखना यह है कि आज के जेनरेशन के कितने लोगों को इस गीत को पूरा सुनने का धैर्य रहेगा। इसी गीत का एक पुरुष संस्करण भी है शंकर महादेवन की आवाज़ में, आइए लगे हाथ इसे भी सुन लिया जाए।

गीत - पल में मिला जहां (शंकर)


विश्व दीपक - इन दोनों संस्करणों को सुन कर कह पाना मुश्किल है कि कौन सा बेहतर है। शंकर ने ज़्यादा ज़ोर डाल कर गाया है। शंकर एक ऐसे गायक और संगीतकार हैं जिन्हे हर संगीतकार पसंद करते हैं, उनकी गायकी के साथ साथ उनके मीठे स्वभाव के कारण भी। तभी तो दूसरे संगीतकार उनसे समय समय पर गवाते रहते हैं। हाल ही में फ़िल्म 'राजनीति' में "धन धन धरती रे" उन्होंने गाया था।

सुजॊय - और आठवें और अंतिम गीत की बारी जिसे गाया है मोहित चौहान ने। एक और धीमी गति वाला गीत जिसमें है रोमांस, लेकिन गभीरता के साथ। "चला आया प्यार" में परक्युशन का सुंदर इस्तेमाल हुआ है।

विश्व दीपक - तबले का भी सुंदर इस्तेमाल सुनाई देता है। आम तौर पर फ़्युज़न गीतों में गीत देसी होता है, सुर देसी होते हैं और बीट्स विदेशी होते हैं; लेकिन इस गीत में गायकी और गीत की धुन आधुनिक है, लेकिन जो रीदम है उसे तबले की थापों पर शास्त्रीय अंदाज़ में तय्यार किया गया है जिससे एक नवीनता आई है गाने में। सुना जाए...

गीत - चला आया प्यार


इन आठ गीतों को सुन कर हमारी तरफ़ से तो थम्प्स अप है। हाँ, गानें ज़रा धीमी लय के और गहरे शब्दों वाले हैं। आख़िर नागेश कुकुनूर की फ़िल्म है, उसमें कुछ गहरी बातें तो होंगी। अभी हाल ही में इस फ़िल्म की टीम (जॉन, सोनल सहगल और नागेश कुकुनूर) इण्डियन आइडल में गेस्ट बन कर आए थे अपनी इस फ़िल्म को प्रोमोट करने के लिए। उसमें इन लोगों ने कहा कि यह फ़िल्म लीक से हट कर है और कम बजट की फ़िल्म है। लेकिन यह लोगों के दिलों को ज़रूर छूएगी। फ़िल्म के गीतों ने तो हमारे दिल को छुआ है, देखना है कि फ़िल्म किस तरह का कमाल दिखाती है। हमारी तरफ़ से इस फिल्म को लाखों दुआएँ!

ढर्रे के अनुसार हमें यह भी तो बताना होगा कि अगली बार हम किस फिल्म की समीक्षा लेकर हाज़िर होने वाले हैं। तो दोस्तों, अभी हमारे सामने दो फिल्में हैं - "वी और फ़ैमिली" और "दबंग"। अब कौन सी फिल्म किस्मत वाली साबित होगी, यह तो वक़्त हीं बताएगा। हाँ, अगर आप इन दोनों में से किसी एक को खासा-पसंद करते हैं तो टिप्पणी में इसका ज़िक्र जरूर कर दें। हम आपकी राय का पूरा ख्याल रखेंगे। वैसे अंतिम निर्णय तो हमारा है काहे कि हम तो ठहरे दबंग :)

आवाज़ रेटिंग्स: आशाएँ: ***१/२

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ८८- ये गुलशन कुमार की सुपुत्री हैं और इस कारण भी संगीत की दुनिया में इनका नाम है। पिछले दिनों आई फिल्म "वन्स अपॉन ए टाईम इन मुंबई" में भी इन्होंने एक गाना गाया था। २००९ में रीलिज हुई इनके डेब्यु एलबम का नाम बताईये।

TST ट्रिविया # ८९- नागेश कुकुनूर की उस फ़िल्म का नाम बताएँ जिसमें दोस्ती को समर्पित एक गाना था। वह गाना किसने गाया था?

TST ट्रिविया # ९०- "फ़ना" के गीत "चाँद सिफ़ारिश" की प्रोग्रामिंग किस संगीतकार (संगीतकार बंधुओं) ने की थी? इसी (इन्हीं) की सलाह पर इस गाने में "शुभान-अल्लाह" डाला गया था।


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. "चरके बोदन चिरबी चकर" का इस्तेमाल हुआ है जो किशोर कुमार ने फ़िल्म 'पड़ोसन' के मशहूर गीत "एक चतुर नार" में किया था।
२. शैल हाडा।
३. "एक तीखी तीखी सी उफ़ करारी से लड़की" (लागा चुनरी में दाग)।

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

महंगाई डायन को दुत्कारकर बाहर किया "पीपलि" वालों ने और "खट्टे-मीठे" पलों को कहा नाना ची टाँग

ताज़ा सुर ताल २८/२०१०

सुजॊय - 'ताज़ा सुर ताल' के सभी श्रोताओं व पाठकों का स्वागत है इस स्तंभ में, और विश्व दीपक जी, आपको भी नमस्कार!

विश्व दीपक - नमस्कार दोस्तों! आज की कड़ी में हम दो फ़िल्मों के गानें सुनने जा रहे हैं। भले ही इन दो फ़िल्मों की कहानी और संगीत में कोई समानता नज़र ना आए, लेकिन इन दो फ़िल्मों में एक समानता ज़रूर है कि इनके निर्माता फ़िल्म जगत के अनूठे फ़िल्मकार के रूप में जाने जाते हैं, और इन दोनों की फ़िल्मों में कुछ अलग हट के बात ज़रूर होती है। अपने अपने तरीके से और अपने अपने मैदानों में ये दोनों ही अपने आप को परफ़ेक्शनिस्ट सिद्ध करते आए हैं। इनमें से एक हैं प्रियदर्शन और दूसरे हैं आमिर ख़ान। जी हाँ, वही अभिनेता आमिर ख़ान जो हाल के समय से निर्माता भी बन गए हैं अपने बैनर 'आमिर ख़ान प्रोडक्शन्स' से ज़रिए।

सुजॊय - प्रियदर्शन की फ़िल्म 'खट्टा-मीठा' और आमिर ख़ान की 'पीपलि लाइव' की संगीत-समीक्षा के साथ हम हाज़िर हैं दोस्तों। पहले कुछ 'खट्टा-मीठा' हो जाए! इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं अक्षय कुमार, त्रिशा कृष्णन और राजपाल यादव। प्रीतम का संगीत है, गानें लिखे हैं इरशाद कामिल, शहज़ाद रॊय और नितिन रायकवार ने। विश्व दीपक जी, आपने इन दो फ़िल्मों की समानता की बात कही तो मुझे ऐसा लगता है, हालाँकि मैं पूरी तरह से श्योर तो नहीं हूँ, कि इन दोनों फ़िल्मों की कहानियों में हास्य रस का अंश शायद ज़्यादा है किसी और पक्ष के मुक़ाबले। कम से कम प्रोमोज़ से तो ऐसा ही लग रहा है!

विश्व दीपक - हो सकता है। 'खट्टा-मीठा' प्रियदर्शन की मलयालम फ़िल्म 'वेल्लानकलुडे नाडु' का रीमेक है। अक्षय कुमार की यह छठी फ़िल्म है प्रियदर्शन के साथ, और त्रिशा कृष्णन का हिंदी फ़िल्मों में यह पदार्पण है। तो आइए सुना जाए 'खट्टा-मीठा' फ़िल्म का पहला गीत "नाना चि टांग"।

गीत - त्याचा नाना चि टांग


सुजॊय - बहुत दिनों के बाद कुणाल गांजावाला की आवाज़ सुनने को मिली। मैं कुछ दिनों से सोच ही रहा था कि कुणाल कहाँ ग़ायब हो गए, और लीजिए वो आ गए वापस! इससे पहले शायद उनकी आवाज़ हमने 'सावरिया' फ़िल्म में सुनी थी। "नाना चि टांग" एक पेप्पी नंबर है जैसा कि हमने अभी अभी सुना। कैची रीदम है और लगता है कि यह चार्ट-बस्टर साबित होगी। गीत के आरंभ में और इंटरल्युड में भी आपने महसूस किया होगा मराठी रैप का जिसे गाया यू.आर.एल ने। हिंदी-मराठी रैप का संगम और उसके साथ रॊक शैली का संगीत, एक बिल्कुल ही नया प्रयोग। प्रीतम, कीप इट अप!

विश्व दीपक - ड्रम्स और गिटार का जम के इस्तेमाल हुआ है और धुन कुछ ऐसी है कि जल्द ही सुनने वाला आकर्षित हो जाता है और तन-मन थिरकने लगता है। कुणाल की आवाज़ बहुत दिनों के बाद एक ताज़े हवा के झोंके की तरह आई है और कोई शक़ नहीं कि यह गीत एक लम्बी पारी खेलने वाला है। अच्छा सुजॊय जी, इस गीत में जिन मराठी शब्दों का प्रयोग हुआ है, वो ग़ैर-मराठी लोगों को समझ कैसे आएगी?

सुजॊय - मुझे ऐसा लगता है कि बहुत ध्यान से अगर सुना जाए तो कुछ कुछ ज़रूर समझ में आ ही जाता है, जैसे कि "जिथे मी जाते तिथे तू दिस्ते, हवात तुझे सुगंध पसरते, मनात तू माझ्या ध्यानात तू, चार दिशाणा तू च तू..."। इसे पढ़ते हुए कोई भी अंदाज़ा लगा सकता है कि इसका अर्थ है कि जहाँ भी मैं जाता हूँ, वहीं तू दिखती है, हवा में तेरी ख़ुशबू है, मेरे मन में तू ही तू है, हर दिशा में तू ही तू है। अब अगले गीत की तरफ़ बढ़ते हैं, सुनते हैं एक प्यारा सा डुएट के.के और सुनिधि चौहान की आवाज़ों में।

गीत - सजदे किए हैं लाखों


विश्व दीपक - जिसे हम कह सकते हैं कि पूरी तरह से इस मिट्टी की ख़ुशबू लिए हुए था यह गीत, और इन दोनों अभिज्ञ गायकों ने अपना अपना कमाल दिखाया। प्रीतम की मेलोडी बरकरार है, इरशाद कामिल ने भी ख़ूबसूरत बोल लिखे हैं इस गीत के लिए। गीत की विशेषता है इसका सादापन, जिसे एक बार सुनते ही दिल अपना बना लेता है और मन ही मन हम दिन भर गुनगुनाने लग पड़ते हैं। पहले गीत के मुक़ाबले बिल्कुल ही अलग अंदाज़। गी की धुन सुन कर ऐसा लग रहा है कि किसी लोक गीत से प्रेरित होगा।

सुजॊय - मेरा भी यही ख़याल है क्योंकि आपको याद होगा राहुल देव बर्मन ने एक गीत बनाया था फ़िल्म 'बरसात की एक रात' फ़िल्म के लिए - "नदिया किनारे पे हमरा बगान, हमरे बगानों में झूमे आसमान"। लताजी के गाए इस गीत की धुन "सजदे किए" से मिलती जुलती है। हो सकता है उत्तर बंगाल के चाय बगानों के किसी लोक धुन पर आधारित होगा! वैसे हमारी यह सोच बेबुनियाद नहीं है, क्योंकि एलबम के सीडी पर इस गाने के लिए किसी पारंपरिक धुन को क्रेडिट दिया गया है। लगता हैं प्रीतम धीरे-धीरे सुधर रहे हैं। इस गीत में हिंदुस्तानी साज़ों जैसे कि बांसुरी, तबला, सितार, और पायल की ध्वनियाँ सुनाई देती है जो गीत को और भी ज़्यादा मधुर बनाते हैं। उम्मीद है यह गीत इस साल के सब से लोकप्रिय युगल गीत की लड़ाई में सशक्त दावेदार सिद्ध होगा। प्रीतम और अक्षय कुमार की जोड़ी की अगर बात करें तो 'सिंह इज़ किंग' में "तेरी ओर" गीत की तरह इस गीत को भी उतनी ही लोकप्रियता हासिल हो, यही हम कामना करते हैं, और सुनते हैं 'खट्टा-मीठा' फ़िल्म का एक और गीत।

गीत - आइ ऐम ऐलर्जिक टू बुल-शिट


विश्व दीपक - भले ही गीत के शीर्षक से गीत के बारे में लोग ग़लत धारणा बना लें, लेकिन गीत को सुनते हुए पता चलता है कि दर-असल यह गीत फ़िल्म का थीम सॉंग है जो राजनीति और सरकारी क्षेत्र में भ्रष्टाचार और घूसखोरी जैसी मुद्दों की तरफ़ व्यंगात्मक उंगली उठाता है। इस गीत को लिखा है शहज़ाद रॉय ने, उन्होने ही गाया है और संगीत तय्यार किया है शनि ने।

सुजॊय - दर-असल इस गीत को सुन कर ही मैंने यह अनुमान लगाया था कि फ़िल्म में कॊमेडी का बहुत बड़ा हाथ होगा। यह एक पूरी तरह से सिचुएशनल गीत है जो लोगों की ज़ुबान पर तो नहीं चढ़ेगा, लेकिन फ़िल्म की नैरेशन में महत्वपूर्ण किरदार अदा करेगा। "मुझे फ़िकर यह नहीं कि देश कैसे चलेगा, मुझे फ़िकर यह है कि ऐसे ही ना चलता रहे", "यहाँ बोलने की आज़ादी तो है, पर बोलने के बाद आज़ादी नहीं है", इस तरह के संवाद आज के राजनीति पर व्यंगात्मक वार करती है। वैसे क्या आपको पता है कि यह गाना "शहज़ाद रॉय" के हीं गानों "लगा रह" और "क़िस्मत अपने हाथ में" गानों का एक रीमेक मात्र है। शनि ने ओरिज़िनल गानों के संगीत में ज्यादा परिवर्त्तन न करते हुए, उसमें बस बॉलीवुड का तड़का डाला है, बाकी का जादू तो शहज़ाद रॉय का है। चलिए अब अगले गीत की ओर रूख करते हैं।

विश्व दीपक - 'खट्टा-मीठा' का चौथा और अंतिम गीत है "आइला रे आइला" दलेर मेहंदी और कल्पना पटोवारी की आवाज़ों में जो एक मराठी उत्सव गीत है। यह एक थिरकता हुआ गीत है नितिन रायकवार का लिखा हुआ। मराठी अंदाज़ का नृत्य गीत है। नितिन ने अपने शब्दों से मराठी माहौल को ज़िंदा कर दिया है तो वहीं दलेर मेंहदी ने यह साबित किया है कि वे बस भांगड़ा के हीं उस्ताद नहीं, बल्कि मराठी गीतों को भी ऐसा गा सकते हैं कि सुनने वाले के मुँह से "आइला" निकल जाए।

गीत- आइला रे आइला


विश्व दीपक - अब हम बढ़ते हैं 'पीपलि लाइव' के संगीत पर। आमिर ख़ान निर्मित इस फ़िल्म की निर्देशिका हैं अनुषा रिज़्वी। फ़िल्म का अनूठा संगीत तैयार किया है इण्डियन ओशन, राम सम्पत, भडवई गाँव मंडली और नगीन तनवीर ने; और गानें लिखे हैं स्वानंद किरकिरे, संजीव शर्मा, नून मीम रशीद और गंगाराम सखेत ने। फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं रघुवीर यादव, ओम्कार दास माणिकपुरी, मलैका शेनोय, नसीरुद्दिन शाह और आमिर बशीर।

सुजॊय - जैसा कि आजकल प्रोमोज़ में दिखाया जा रहा है, उससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि 'पीपलि लाइव' की कहानी ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित है, और इसी वजह से इसका संगीत भी बिल्कुल ग्राम्य है, लोक संगीत की मिठास के साथ साथ एक रूखापन (रॊवनेस) भी है जो फ़िल्म की कहानी और कथानक को और ज़्यादा सजीव बनाता है। सुन लेते हैं फ़िल्म का पहला गीत "देस मेरा रंग्रेज़ ये बाबू", फिर उसके बाद बातचीत को आगे बढ़ाते हैं।

गीत - देस मेरा रंग्रेज़ ये बाबू


विश्व दीपक - इण्डियन ओशन के अपने स्टाइल का गाना था; इस बैण्ड की जानी पहचानी आवाज़ें और साज़ें। इकतारा, तबला, मृदंग, सितार जैसे भारतीय साज़ों के साथ साथ बेस गिटार की भी ध्वनियाँ आपने महसूस की होंगी इस अनोखे गीत में। देश भक्ति गीत होते हुए भी यह बिल्कुल अलग हट के है। इस गीत के लिए संजीव शर्मा और स्वानंद किरकिरे को ही सब से ज़्यादा क्रेडिट मिलना चाहिए क्योंकि इस गीत की जान इसके बोल ही हैं।

सुजॊय - बिलकुल सही! "देस मेरा रंग्रेज़ ये बाबू, घाट घाट यहाँ घटता जादू, कहीं पहाड़ है कंकड़ शंकड़, बात है छोटी बड़ा बतंगड़, इण्डिया सर ये चीज़ धुरंधर, रंग रंगीला परजातंतर"। इसी गीत का एक और वर्ज़न भी है जिसमें थोड़ी कॊमेडी डाली गई है और पहले के मुक़ाबले बोलों में गम्भीरता थोड़ी कम है। फ़िल्म की पृष्ठभूमि के हिसाब से बिलकुल परफ़ेक्ट है यह गीत और इस ग़ैर पारम्परिक फ़िल्मी रचना को सुन कर दिल-ओ-दिमाग़ जैसे ताज़ा हो गया।

विश्व दीपक - अब फ़िल्म का दूसरा गीत "सखी स‍इयाँ तो खूबई कमात है, महँगाई डायन खाए जात है"। यह पूर्णत: एक लोक गीत है रघुवीर यादव और साथियों की आवाज़ों में। भडवई गाँव मंडली ने इस गीत की स्वरबद्ध किया है। पहले गीत का आनंद लीजिए, फिर इस पर और चर्चा करेंगे।

गीत - महँगाई डायन खाए जात है


सुजॊय - बिना कोई मिक्सिंग किए, बिना किसी ऒरकेस्ट्रेशन के इस्तेमाल के, इस गीत को बिलकुल ही लाइव लोक संगीत की तरह रेकोर्ड किया गया है, ठीक वैसे ही जैसे उत्तर मध्य भारत के गाँवों में लोक गीत गाए जाते हैं। रघुवीर यादव की लोक शैली वाली आवाज़ ने गीत में जान डाल दी है। हारमोनियम, ढोलक, और कीर्तन मंडली के साज़ों का वैसे ही इस्तेमाल हुआ है जैसे कि इस तरह की मंडलियाँ लोक गीतों में करती हैं। और एक बार फिर स्वानंद किरकिरे ने अपने शब्दों का लोहा मनवाया है। मनोज कुमार की फ़िल्म 'रोटी कपड़ा और मकान' के गीत "बाकी कुछ बचा तो महँगाई मार गई" की याद भी करा जाता है।

विश्व दीपक - पहले गीत में भी देश के कुछ समस्याओं की तरफ़ इशारा किया गया था, इस गीत में तो आज की सब से बड़ी समस्या, महँगाई की समस्या की तरफ़ आवाज़ उठाया गया है थो़ड़े हल्के फुल्के अंदाज़ में। खड़ी बोली और अवधी भाषा में यह गीत है।

सुजॊय - और सब से बड़ी बात यह कि लता मंगेशकर को यह गीत इतना पसंद आया कि उन्होने ट्विटर पर आमिर ख़ान को ट्वीट भेज कर इस गीत की तारीफ़ें भेजीं और फ़िल्म की सफलता के लिए उन्हे शुभकामनाएँ भी दी हैं। इस मज़ेदार लोक गीत के बाद अब आइए थोड़ा सा सीरियस हो जाएँ और सुनें "ज़िंदगी से डरते हो"।

गीत - ज़िंदगी से डरते हो


विश्व दीपक - इण्डियन ओशन की आवाज़ और संगीत था इस गीत में। रॊक शैली में बना यह गीत एक प्रेरणादायक रचना है जो निकले हैं नून मीम रशीद की कलम से। कुल ७ मिनट के इस गीत को पार्श्व संगीत के रूप में इस्तेमाल किया गया होगा ऐसा लगता है। फ़िल्म 'लगान' में "बार बार हाँ बोलो यार हाँ" गीत की तरह इसमें भी समूह स्वरों का विशेष इस्तेमाल किया गया है।

सुजॊय - और अब फ़िल्म का अंतिम गीत नगीन तनवीर की आवाज़ में सुनवाते हैं - "चोला माटी के राम"। इस गीत को सुनते हुए आपको अंदाज़ा हो जाएगा कि कैसी रूहानी आवाज़ है इस थिएटर आरटिस्ट की। नगीन तनवीर कभी हबीब तनवीर थिएटर ग्रूप की सदस्या हुआ करती थीं। नगीन का नाम हबीब तनवीर से इसलिए भी जुड़ा है, क्योंकि नगीन हबीब तनवीर की सुपुत्री हैं। नगीन लोक गीत गाती हैं और इस गीत को भी क्या अंजाम दिया है उन्होने। गंगाराम सखेत के लिखे इस गीत की भाषा छत्तीसगढ़ी है।

विश्व दीपक - इसकी धुन उत्तर और मध्य भारत के विदाई गीत की तरह है। बांसुरी और इकतारे का क्या सुंदर प्रयोग हुआ है, जिन्हे सुनते हुए हम जैसे किसी सुदूर ग्रामांचल में पहुँच जाते हैं। एक इंटरनेट साइट पर किसी ने लिखा है इस गीत के बारे में - "चोला माटी के राम की भाषा निन्यानवे फ़ीसदी छत्तीसगढी हीं है। इसके संगीत में भी छत्तीसगढ के लोग धुन "करमा" की छाप है। करमा एक लोक-नृत्य है, जो गाँवों में लगने वाले मेलों और उत्सवों का विशेष आकर्षण होता है। इन उत्सवों के दौरान गाँव के सारे मर्द सजते-सँवरते हैं और "लुगरा" धारण करते हैं। फिर गाँव की जनता एक गोल चक्कर बना लेती है, जिसके केंद्र में नर्त्तक अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। ये सारे नर्त्तक "मांदर" (यह छत्तीसढ का खास साज़ है... ढोल-ताशों का एक प्रकार) की धुन पर बिना रूके बिना थके नाचते जाते हैं। ऐसे अवसरों पर कम से कम पाँच या छह मांदरों के बिना तो काम हीं नहीं चलता।"

सुजॊय - यह अच्छी जानकारी थी। इकतारे का जिस तरह का प्रयोग हुआ है, ठीक ऐसा ही प्रयोग बंगाल के बाउल भटियाली गायक भी करते हैं। इसलिए इस गीत को सुनते हुए बंगाल के गाँवों की भी सैर हो जाती है। तो देखिए एक ही गीत है लेकिन कितने प्रदेशों के लोक संगीत से मेल खाती है। इसी को तो हम कहते हैं 'अनेकता मे एकता' और यही इस देश की शक्ति का राज़ है। एक और बात यह कि इसकी धुन जैसा कि आपने कहा विदाई धुन है, तो इस लोक धुन का प्रयोग थोड़े से तेज़ अंदाज़ में कल्याणजी-आनंदजी ने किया था फ़िल्म 'दाता' के गीत "बाबुल का यह घर बहना, कुछ दिन का ठिकाना है" में। तो आइए इस भजन को सुनते हैं।

गीत - चोला माटी के राम


सुजॊय - वाह! नगीन तनवीर की आवाज़ ने तो आँखें नम कर दी। हाँ तो विश्व दीपक जी, आज की दोनों फ़िल्मों के गानें तो हमने सुन लिए, अब बारी है अंतिम विचारों की। जहाँ तक 'खट्टा-मीठा' का सवाल है "नाना चि टांग" और "सजदे किए हैं लाखों", ये दो गीत मुझे पसंद आए और मेरी तरफ़ से इस ऐल्बम को ५ में ३.५ की रेटिंग। और 'पीपलि लाइव', भई इससे पहले कि मैं अपनी रेटिंग दूँ, सब से पहले तो मैं नतमस्तक होकर आमिर ख़ान को सलाम करना चाहूँगा, उन्होने एक बार फिर से साबित किया कि वो अलग हैं, नंबर वन हैं। ग्रामीण पृष्ठभूमि पर और भी तो कई फ़िल्में हाल के सालों में बनी हैं, लेकिन ऐसा जादूई संगीत किसी में भी सुनने को नहीं मिला। आज के फ़िल्मकार अक्सर क्या करते हैं कि जब भी ऐसे किसी लोक गीत की बारी आती है तो लोक गीत के बहाने किसी सस्ते और अश्लील गीत की रचना कर बैठते हैं। 'पीपलि लाइव' के गीतों को सुन कर ऐसा लगा कि अगर हमारे फ़िल्मकार, संगीतकार और गीतकार चाहें तो आज भी फ़िल्म संगीत का सुनहरा दौर वापस आ सकता है। युं तो इस फ़िल्म के सभी गानें मुझे अच्छे लगे लेकिन यह जो अभी अभी हमने "चोला माटी के राम" सुना, इस गीत का तो मैं दीवाना हो गया। नगीन तनवीर की आवाज़ ने दिल को ऐसा छुआ है कि अभी तक उनकी आवाज़ कानों में गूँज रही है। मेरी तरफ़ से 'पीपलि लाइव' को ४.५ की रेटिंग्‍ और ख़ास इस गीत को १० में १०। आमिर ख़ान को ढेरों शुभकामनाएँ कि उनकी यह फ़िल्म सफल हो और वो इसी तरह से फ़िल्मों और फ़िल्म संगीत के ख़ज़ाने को समृद्ध करते रहें।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, मैं क्या कहूँ.. आपने तो सब कुछ हीं कह दिया है। आपने सही कहा कि अगर कोई दूसरा इंसान होता तो पीपलि लाइव का संगीत शायद ऐसा नहीं होता, जैसा अभी सुनने को मिल रहा है। वो कहते हैं ना कि कुछ लोग ऐसे होते हैं जो किसी भी चीज को हाथ में ले तो उसे सोना बनाकर हीं दम लेते हैं। आमिर खान भी वैसे हीं इंसान हैं। एक कम-बज़ट की फिल्म, जिसमें कोई भी पहचान का कलाकार न हो और जिसमें किसी "गंभीर" मुद्दे को उठाया गया हो, उसे कोई भी हाथ में लेना नहीं चाहता। आमिर के आगे आने से ये अच्छा हुआ कि फिल्म को पहचान मिली और फिल्म के गाने भी लोगों की नज़रों में आ गए। निर्माता/निर्देशिका ने गीतकारों, संगीतकारों और गायको का चुनाव बड़े हीं ध्यान से किया है। "रघुवीर यादव" और "नगीन" को सुनने के बाद हर किसी को इस चुनाव की दाद देनी होगी। वैसे हाल में यह फिल्म अपने गाने "सखी सैंया" के कारण विवाद में भी आई थी, जिसका ज़िक्र सजीव जी पहले हीं कर चुके हैं,इसलिए मैं दुहराऊँगा नहीं। जहाँ तक इस एलबम की बात है तो यकीनन "पीपलि लाइव" "खट्टा-मीठा" से "इक्कीस" पड़ती है। "खट्टा-मीठा" चूँकि पूरी तरह से एक मनोरंज़क फिल्म है तो उसमें "पीपलि लाइव" जैसा संगीत देने की कोई गुंजाईश भी नहीं थी। फिर भी प्रीतम और शनि ने हर-संभव कोशिश की है। इसलिए मुझे "खट्टा-मीठा" से कोई शिकायत नहीं। चलिए तो इस तरह दो अच्छे और बेहतर एलबमों को सुनने के बाद इस समीक्षा पर ब्रेक लगाई जाए। अगली बार कौन-सी फिल्म होगी? यही सोच रहे हैं ना? चूँकि पिछली दो समीक्षाओं से हम बताते आ रहे हैं तो इस बार भी राज़ से पर्दा हटा हीं देते हैं। "लफ़ंगे परिंदे" या फिर "दबंग" या फिर दोनों। यह जानने के लिए अगली भेंट तक का इंतज़ार कीजिए।

आवाज़ रेटिंग्स: खट्टा-मीठा: ***१/२, पीपलि लाइव: ****१/२

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ८२- 'भूल भुलै‍या' और 'खट्टा-मीठा' फ़िल्मों में कम से कम तीन समानताएँ बताइए।

TST ट्रिविया # ८३- आपका जन्म २८ नवंबर १९६४ को हुआ था। आप ने पंजाब युनिवर्सिटी चण्डीगढ़ से म्युज़िक की मास्टर डिग्री हासिल की सुलोचना बृहस्पति की निगरानी में। आपकी माँ का नाम मोनिका है। बताइए हम किनकी बात कर रहे हैं।

TST ट्रिविया # ८४- २००९ की एक फ़िल्म में रघुवीर यादव ने अपनी आवाज़ के जल्वे दिखाए थे एक गीत में। बताइए उस फ़िल्म का नाम, गीत के बोल और सहगायकों के नाम।


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. "इकतारा" (वेक अप सिड)।
२. "जा रे, जा रे उड़ जा रे पंछी" (माया)।
३. इस गीत को लिखा था मशहूर शायर मजाज़ लखनवी ने जो जावेद अख़्तर के मामा थे।

सीमा जी आपने दो सवालों के सही जवाब दिए। बधाई स्वीकारें!

मंगलवार, 6 जुलाई 2010

मुंबई है एक बार फिर फिल्म का विषय, और गैंगस्टरों की मारधाड के बीच भी है संगीत में मधुरता

ताज़ा सुर ताल २५/२०१०

सुजॊय - सजीव, बहुत दिनों के बाद आप से इस 'टी.एस.टी' के स्तंभ में मुलाक़ात हो रही है। और बताइए, हाल में आपने कौन कौन सी नई फ़िल्में देखीं और आपके क्या विचार हैं उनके बारे में?

सजीव - सुजॉय मैंने "काईट्स", "रावण" और "राजनीति" देखी. रावण और राजनीति मुझे पैसा वसूल लगी तो काईट्स उबाऊ. रावण बेशक चली नहीं पर जहाँ तक मेरा सवाल है मैं फिल्मों को सिर्फ कहानी के लिए नहीं देखता हूँ, मैं जिस मणि का कायल हूँ निर्देशन के लिए वही मणि "युवा" और "दिल से" के बाद मुझे यहाँ दिखे....जबरदस्त संगीत और छायाकारी है फिल्म की. राजनीति भी रणबीर और कंपनी के शानदार अभिनय के लिए देखी जा सकती है, बस मुझे कर्ण के पास कुंती के जाने वाला एपिसोड निरर्थक लगा, नाना पाटेकर हमेशा की तरह....सोलिड....खैर छोडो ये सब....आज का मेनू बताओ...

सुजॊय - जैसे कि इस साल का सातवाँ महीना शुरु हो गया है, तो ऐसे में अगर हम पिछले ६ महीनों की तरफ़ अपनी नज़र घुमाएँ, तो आपको क्या लगता है कौन कौन से गीत उपरी पायदानों पर चल रहे हैं इस साल? मेरे सीलेक्शन कुछ इस तरह के हैं - सर्वर्श्रेष्ठ गीत - "दिल तो बच्चा है जी" (इश्क़िया), सर्वश्रेष्ठ गायक - के.के ("ज़िंदगी दो पल की" - काइट्स), सर्वश्रेष्ठ गायिका - रेखा भारद्वाज ("कान्हा" - वीर), सर्वश्रेष्ठ गीतकार - गुलज़ार ("दिल तो बच्चा है जी" - इश्क़िया), सर्वश्रेष्ठ संगीतकार - उस्ताद शुजात हुसैन ख़ान (मिस्टर सिंह ऐण्ड मिसेस मेहरा)।

सजीव - अरे वाह सुजॉय, बिलकुल यही सूची मेरी भी है, बस श्रेष्ठ गायिका के लिए मेरा नामांकन रिचा शर्मा के लिए होगा, "फ़रियाद है शिकायत है" गाने के लिए....बहुत ही अच्छा गाया गया है ये.

सुजॊय - सजीव, अभी पिछले ही हफ़्ते मैं विश्व दीपक जी को बता रहा था कि आजकल समानांतर सिनेमा और व्यावसायिक सिनेमा के बीच की दूरी बहुत कम सी हो गई है। आजकल पारम्परिक फ़ॊरमुला फ़िल्में बहुत कम ही बन रही है और फ़िल्मकार नए नए और विविध विषयों पर फ़िल्में बना रहे हैं।

सजीव - बिलकुल सही बात है, पश्चिमी सिनेमा की तरह हमारे देश में भी अब फ़ॊरमुला से हट के फ़िल्में आ रही हैं, जिसके लिए इस पीढ़ी के फ़िल्म निर्माताओं को दाद देनी ही पड़ेगी। तो बताओ कि आज हम किस फ़िल्म के गानें सुनने जा रहे हैं?

सुजॊय - आज हम लेकर आए हैं फ़िल्म 'वन्स अपॊन अ टाइम इन मुंबई' के गीतों को। जैसा कि सुनने में आया है कि यह फ़िल्म रजत अरोड़ा की लिखी कहानी है जो ७० के दशक की पृष्ठभूमि पर आधारित है। इसलिए ज़ाहिर है कि इस फ़िल्म का संगीत भी उसी दौर के मुताबिक़ होनी चाहिए।

सजीव - संगीतकार प्रीतम को इस फ़िल्म के संगीत का ज़िम्मा सौंपा गया था और अब देखना यह है कि उन्होने कितना न्याय किया है फ़िल्म की ज़रूरत के हिसाब से। बातचीत आगे बढ़ाने से पहले सुन लेते हैं फ़िल्म का पहला गीत मोहित चौहान की आवाज़ में। गीत लिखा है इरशाद कामिल ने।

गीत:पी लूँ होठों की सरगम


सुजॊय - यह गीत आजकल ख़ूब बज रहा है एफ़.एम चैनल्स पर। और सुनते सुनते गीत जैसे ज़हन में चढ़ सा गया है इन दिनों। मोहित की आवाज़ में यह रोमांटिक गीत सुनने में अच्छा लगता है। कोरस का इस्तेमाल सूफ़ी और क़व्वाली के अंदाज़ में किया गया है। प्रीतम धीरे धीरे ऐसे संगीतकार बनते जा रहे हैं जिनके गीतों से कुछ ना कुछ उम्मीदें हम ज़रूर रख सकते हैं, और वो निराश नहीं करते। उनके गीतों की लोकप्रियता का मुझे सब से बड़ा कारण यह लगता है कि वो अपनी धुनों में मेलोडी भी बरक़रार रखते हैं और आज की पीढ़ी को पसंद आने वाली मॊडर्ण अंदाज़ भी मिलाते हैं।

सजीव - और दूसरा गीत भी क़व्वाली शैली का ही है जिसे राहत फ़तेह अली ख़ान, तुल्सी कुमार और साथियों ने गाया है। गीत इरशाद कामिल का ही है। इसमें भी वही रूमानीयत भरा अंदाज़, जो पहले गीत के मुक़ाबले और परवान चढ़ती है।

सुजॊय - इस गीत को सुनने से पहले हम बता दें कि 'वन्स अपॊन अ टाइम इन मुंबई' एकता कपूर - शोभा कपूर की फ़िल्म है जिसे निर्देशित किया है मिलन लुथरिया ने। फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं अजय देवगन, ईमरान हाशमी, कंगना रनौत, प्राची देसाई, और रणदीप हूडा। क्योंकि यह फ़िल्म दो पीढ़ी के दो गैंगस्टर की कहानी है, इसमें अजय का नाम है हाजी मस्तान, और ईमरान हाशमी का नाम है दावूद इब्राहिम। और अब सुनिए यह गीत।

गीत: तुम जो आए


सजीव - इस रोमांटिक समा को और भी ज़्यादा पुख़्ता बनाता हुआ अब आ रहा है फ़िल्म का तीसरा गीत "आइ एम इन लव" कार्तिक की आवाज़ में। यह वही कार्तिक हैं जिनकी आवाज़ का इस्तेमाल ए. आर. रहमान भी कर चुके हैं। ख़ैर, इस गीत को लिखा है नीलेश मिश्रा ने। सुना है इस गीत के दो और वर्ज़न हैं, एक के.के. की आवाज़ में और दूसरा एक डान्स वर्ज़न है।

सुजॊय - कार्तिक की आवाज़ में प्लेबैक वाली बात है, अच्छी आवाज़ है लेकिन पता नहीं क्यों उनके गानें ज़्यादा नहीं आते। अगर उनका ट्रैक रिकार्ड देखा जाए तो उन्होने कई हिट गीत गाए हैं जैसे कि फ़िल्म 'गजनी' का "बहका मैं बहका", फ़िल्म 'युवराज' का "शन्नो शन्नो", '१३-बी' का "बड़े से शहर में", 'दिल्ली-६' का "हे काला बंदर" और अभी हाल ही में फ़िल्म 'रावण' में उनका गाया "बहने दे मुझे बहने दे" ख़ूब पसंद किया जा रहा है।

सजीव - दरअसल कार्तिक दक्षिण में आज के दौर अग्रणी गायकों में से एक हैं। भले ही उनके हिंदी गानें ज़्यादा नहीं आए हैं, लेकिन दक्षिण में उनके गानें बेशुमार आ रहे हैं। तो चलो फिर कार्तिक की आवाज़ में यह गीत सुन लेते हैं।

गीत: आइ एम इन लव


सुजॊय - वाह! अच्छी मेलोडी थी इस गाने में। शुरुआती संगीत में पियानो जैसे नोट्स एक मूड बना देता है, और उसके बाद कार्तिक की सूदिंग् आवाज़ में ये नर्मोनाज़ुक बोल, क्या बात है! फिर से वही बात दोहराउँगा कि प्रीतम मेलोडी को बरकरार रखते हुए जो आज की यूथ अपील डालते हैम अपने गानों में, वही बात उनके गीतों को मक़बूल कर देती है। वैसे सजीव, इस गीत को सुनते हुए मुझे के.के. की आवाज़ की भी याद आ रही थी। ऐसा लग रहा था कि जैसे यह के.के टाइप का गीत है।

सजीव - शायद तभी के.के. की आवाज़ में भी यह गीत साउंड ट्रैक में रखा गया है। इस वर्ज़न को हम आज यहाँ तो नहीं सुनेंगे लेकिन उम्मीद है के.के ने भी बढ़िया ही निभाया होगा इस गीत को। चलो अब आगे बढ़ते हैं और एक बिलकुल ही अलग अंदाज़ का गीत सुनते हैं। यह दरअसल एक रीमिक्स नंबर है। ७० के दशक के दो ज़रबरदस्त राहुल देब बर्मन हिट्स "दुनिया में लोगों को" और "मोनिका ओ माइ डारलिंग" को मिलाकर इस गीत का आधार तैयार किया गया है और उसमें नए बोल डाले गए हैं "परदा परदा अपनों से कैसा परदा"।

गीत: परदा परदा


सुजॊय - हम्म्म्म.... वैसे कोई नई चीज़ तो नहीं, लेकिन एक तरह से ट्रिब्यूट सॊंग् माना जा सकता है उस पूरे दशक के नाम। सुनिधि चौहान इस तरह के गीतों को तो ख़ूब अंजाम देती है ही है, लेकिन आर. डी. बर्मन जैसी आवाज़ निकालने वाले गायक राना मजुमदार को भी दाद देनी ही पड़ेगी। सुनिधि गीत में "वो आ गया, देखो वो आ गया" जिस तरह से गाती हैं, हमें यकायक आशा जी वाली अंदाज़ याद आ जाती है।

सजीव - और अब अंतिम गीत अमिताभ भट्टाचार्य की कलम से। मिका की आवाज़ में है यह गीत "बाबूराव मस्त है", जो बाबू राव की शख़सीयत बताता है। शरारती अंदाज़ में लिखा हुआ यह एक तरह से हास्य गीत है।

सुजॊय - इस गीत को ध्यान से सुनिएगा क्योंकि इस गीत की ख़ासीयत ही है इसके बोल। मामला मस्त है!!!!

गीत: बाबूराव


"वंस अपोन अ टाइम इन मुंबई" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***१/२

सुजॊय - हाँ तो क्या ख़याल है सजीव? शुरु में हमने कहा था कि फ़िल्म ७० के दशक की कहानी है। तो क्या संगीत में उसकी छाप नज़र आई? भई, मेरा ख़याल तो यही है कि गानें अच्छे हैं लेकिन ७० के दशक का स्टाइल तो सिवाय "परदा परदा" के किसी और गीत में नज़र नहीं आया। "पी लूँ" और "आइ एम इन लव" मेरे पसंदीदा गानें हैं इस फ़िल्म के। और मेरी तरफ़ से इस ऐल्बम को ३.५ की रेटिंग्।

सजीव - सहमत हूँ आपसे एक बार फिर, बढ़िया गाने हैं....पी लूं अपने फिल्मांकन के लिए चर्चित होगा, और भीगे होंठ तेरे जैसा एक हिट गीत साबित होगा आने वाले दिनों में. पर्दा भी सुनने में कम और देखने में ज्यादा अच्छा होगा ऐसी उम्मीद है, "आई ऍम इन लव" और "तुम आये" मुझे बेहद अच्छे लगे...बाबु राव भी मस्त है :)

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ७३- गायक कार्तिक ने सन् २००२ में आशा भोसले के साथ एक गीत गाया था। बताइए फ़िल्म का नाम और गीत के बोल।

TST ट्रिविया # ७४- 'वन्स अपॊन अ टाइम इन मुंबई', 'ये दिल आशिक़ाना' तथा 'धड़कन' फ़िल्मों में एक गीत ऐसा है जिनमें कम से कम एक समानता है। बताइए क्या समानता है।

TST ट्रिविया # ७५- ईमरान हाशमी अभिनीत वह कौन सी फ़िल्म है जिसमें के.के की आवाज़ में एक बेहद मक़बूल गीत आया था जिसके एक अंतरे में पंक्ति है "कैसे कटे ज़िंदगी मायूसियाँ बेबसी"।


TST ट्रिविया में अब तक -
कमाल है, क्या सवाल बहुत मुश्किल हैं, या फिर हमारे श्रोताओं ने नए संगीत को सुनना छोड़ दिया है....सीमा जी आपकी कमी खल रही है

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