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Saturday, January 14, 2017

चित्रकथा - 2: बिमल रॉय की मृत्यु की अजीबोग़रीब दास्तान


अंक - 2

बिमल रॉय की मृत्यु की अजीबोग़रीब दास्तान

“अमृत कुंभ की खोज में...”



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं है। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। हमारी दिलचस्पी का आलम ऐसा है कि हम केवल फ़िल्में देख कर या गाने सुनने तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखते, बल्कि फ़िल्म संबंधित हर तरह की जानकारियाँ बटोरने का प्रयत्न करते रहते हैं। इसी दिशा में आपके हमसफ़र बन कर हम आते हैं हर शनिवार ’चित्रकथा’ लेकर। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ के दूसरे अंक में आपका हार्दिक स्वागत है।  

फ़िल्मकार बिमल रॉय एक कहानी पर फ़िल्म बना रहे थे। फ़िल्म तो नहीं बनी पर उस कहानी की एक घटना बिमल रॉय के साथ यूं के यूं घट गई। यह उनके जीवन की आख़िरी घटना थी। यह उनकी मृत्यु की घटना थी। आइए आज ’चित्रकथा’ में इसी अजीबोग़रीब घटना के बारे में जाने जिसका उल्लेख गुलज़ार साहब ने उनकी लघुकथाओं की पुस्तक ’रावी पार’ में ’बिमल दा’ नामक लेख में किया है।




कुछ कलाकार ऐसे होते हैं जो एक बहुत ही कम कार्यकाल में या छोटी सी आयु में अपनी कला, लगन और परिश्रम से ऐसा कुछ कर जाते हैं कि फिर वो अमर हो जाते हैं। बिमल रॉय एक ऐसे ही फ़िल्मकार थे जिन्होंने केवल एक दशक में इतने सारे हिट और उच्चस्तरीय फ़िल्में भारतीय सिनेमा को दी है कि उन्हें अगर भारतीय सिनेमा के स्तंभ फ़िल्मकारों में से एक कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। बिमॉल रॉय एक ऐसी संस्था का नाम है जो आज तक प्रेरणास्रोत बनी हुई है। लेकिन आज हम बिमल रॉय की फ़िल्मों की समीक्षा नहीं कर रहे हैं, बल्कि एक ऐसी आश्चर्यजनक घटना से आपका परिचय करवाने जा रहे हैं कि जिसे पढ़ कर आप भी दंग रह जायेंगे। अगर फ़िल्म की कहानी के नायक से साथ घटने वाली घटना ख़ुद फ़िल्मकार के साथ घट जाए, और वह भी उसी दिन जिस दिन कहानी में वह घटना घटने वाली हो, तो फिर इसे आप क्या कहेंगे? सिर्फ़ संजोग या कुछ और?

यह किस्सा है एक अजीब संजोग का। यह संजोग जुड़ा है बिमल रॉय और उनकी फ़िल्म के एक चरित्र
से। बात 1955 की रही होगी जब बिमल रॉय ’देवदास’ बना रहे थे। शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय की इस उपन्यास पर फ़िल्म बनाने के बाद उन्होंने एक और बांगला उपन्यासकार समरेश बसु की एक उपन्यास पढ़ना शुरु किया। उपन्यास पूरी पढ़ डाली। उपन्यास का नाम था "अमृतो कुंभेर संधाने" (अमृत कुंभ की खोज में)। वो इस पर एक बांगला-हिन्दी द्विभाषी फ़िल्म बनाना चाहते थे। हिन्दी संस्करण वाले फ़िल्म का नाम रखा गया ’अमृत कुंभ की खोज में’। समरेश बसु की उपन्यास की कहानी महाकुंभ मेले में होने वाले प्रचलित स्नान पर आधारित थी। ऐसी मान्यता है कि मेले के नौवे दिन, यानी कि जोग-स्नान के दिन प्रयाग के संगम में स्नान करने से व्यक्ति को लम्बी आयु और स्वस्थ जीवन मिलता है। समरेश बसु की उपन्यास के हिसाब से कहानी का मुख्य पात्र बलराम को टी.बी (काली खाँसी) हो जाती है, और वो दिन-ब-दिन कमज़ोर होता जाता है। इस वजह से वो अपनी लम्बी उम्र के लिए इलाहाबाद महाकुंभ के नौवे दिन, यानी कि जोग-स्नान वाले दिन स्नान करने आता है, पर दुर्भाग्य से बलराम पहले ही दिन भगदड़ में मारा जाता है। समरेश बसु की इस कहानी में जिस भगदड़ का पार्श्व रखा गया है, वह हक़ीक़त में 1954 के कुंभ मेले में हुई थी। 3 फ़रवरी के दिन हुई इस भगदड़ में 800 से अधिक लोग मारे गए थे और 2000 बुरी तरह से घायल हुए थे। यह मौनी अमावस्या का स्नान था। इसी भगदड़ का उल्लेख हमें विक्रम सेठ की 1993 की उपन्यास ’A Suitable Boy' में भी मिलता है।

ख़ैर, बिमल रॉय को यह कहानी बहुत पसन्द आई, और उन्हें लगा कि इस कहानी के माध्यम से समाज को एक सशक्त संदेश दिया जा सकता है और साथ ही नाटकीय क्लाइमैक्स की वजह से फ़िल्म आम जनता को भी पसन्द आएगी। मगर कहानी की एक बात उन्हें बहुत खटक रही थी और वह यह कि बलराम का पहले ही दिन मर जाना उन्हें कुछ ठीक नहीं लगा। आख़िर वो एक फ़िल्मकार थे और फ़िल्म बनाना चाह रहे थे। मुख्य नायक के पहले ही दिन मर जाने से वो सहमत नहीं थे। फ़िल्म के फ़्लॉप होने का खतरा उन्हें नज़र आ रहा था। फिर भी उन्होंने इस कहानी पर स्क्रिप्ट लिखने का काम गुलज़ार को दे दिया। यह बात होगी सन् 1959 की। गुलज़ार साहब ने अगले तीन साल तक स्क्रिप्ट पर काम करना जारी रखा। जब जब समय मिलता वो बिमल रॉय से नोट्स लेते और लिखने बैठ जाते। काम अपनी गति से चलने लगा। 

’अमृत कुंभ की खोज में’ के नायक की भूमिका के लिए पहले-पहले दिलीप कुमार का नाम तय हुआ था,
1960  में इलाहाबाद के अर्धकुंभ में फ़िल्माए गए स्टॉक शॉट्स में से एक
पर बाद में सम्भवत: धर्मेन्द्र का नाम फ़ाइनल हुआ था। बिमल रॉय ने योजना बनाई थी 1960 की सर्दियों में जो इलाहाबाद में वार्षिक कुंभ होगा, वो उसमें स्टॉक शॉट्स को शूट करेंगे और उसके दो साल बाद दिसंबर 1964 के महाकुंभ में फ़िल्म की बाकी शूटिंग् करेंगे। लेकिन जब 1960 के वार्षिक कुंभ को शूट करने का समय आया तो दादा बिमल रॉय की तबीयत ख़राब हो गई। वो शूटिंग् पे नहीं जा सके। उन्होंने अपनी जगह गुलज़ार को भेज दिया। काम तो शुरु हो गया पर बिमल दा की तबीयत दिन-ब-दिन बद से बदतर होती चली गई। 
और थोड़े ही दिनों बाद पता चला कि बिमल दा को कैन्सर (कर्कट रोग) है। बीमारी की वजह से धीरे धीरे बिमल रॉय का घर से निकलना बन्द हो गया; उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया। फिर भी वो गुलज़ार को घर बुला कर पूछते रहते थे कि तुम अमृत कुंभ पर काम कर रहे हो ना? उन्होंने गुलज़ार को यह भी अनुदेश दिए कि कहानी का मुख्य नायक बलराम पहले दिन मरना नहीं चाहिए। उसे या तो महाकुंभ के तीसरे दिन या पाँचवे दिन मरना चाहिए। बहुत दिनों के विचार-विमर्श के बाद आख़िरकार यह तय हुआ कि बलराम महाकुंभ के नौवे दिन मरेगा यानी कि ठीक जोग स्नान के दिन। जैसे जैसे शूटिंग् का दिन, यानी 1964 का महाकुंभ नज़दीक आ रहा था, वैसे वैसे बिमल दा की हालत और भी ख़राब होती जा रही थी। लगने लगा था कि वो इस फ़िल्म को शूट नहीं कर पाएँगे। लेकिन फिर भी वो बार-बार गुलज़ार को यह हिदायत दे रहे थे कि हमें यह फ़िल्म महाकुंभ के मेले में ही शूट करनी है। बिमल रॉय की क़िस्मत में यह फ़िल्म शूट करना नहीं लिखा था। उनकी बीमारी की वजह से फ़िल्म की शूटिंग् कैन्सल कर दी गई। बिमल दा का अन्त अब दरवाज़े पर आ गया था। 



1964 का महाकुंभ 31 दिसंबर को शुरु होना था। महाकुंभ शुरु हुआ। और इस हिसाब से जोग स्नान, नौवे दिन, यानी कि 8 जनवरी 1965 को पड़ता। फ़िल्म तो बन्द हो गई पर बिमल रॉय का इस फ़िल्म की कहानी से नाता नहीं टूटा। बिमल रॉय ने जिस दिन अपनी कहानी के नायक बलराम का मरना तय किया था, ठीक उसी दिन, जोग-स्नान के दिन, 8 जनवरी 1965 को, मात्र 56 वर्ष की आयु में बिमल रॉय इस फ़ानी दुनिया को छोड़ कर हमेशा के लिए चले गए। इससे बड़ा संजोग और क्या हो सकता है! यह घटना जैसे एक सिहरन सी पैदा करती है हमारे मन-मस्तिष्क में। कुछ बातें, कुछ घटनाएँ ऐसी घट जाती हैं जिन्हें विज्ञान से समझाया नहीं जा सकता, जिनकी व्याख्या विज्ञान द्वारा संभव नहीं। बिमल दा की मृत्यु की यह घटना भी ऐसी ही एक घटना थी।


1943 में ’Bengal Famine' नामक फ़िल्म से अपना करीयर शुरु करने के बाद पचास के दशक में बिमल रॉय भारतीय सिनेमा के एक स्तंभ फ़िल्मकार बन चुके थे। 1953 में ’परिणीता’, ’दो बिघा ज़मीन’, 1954 में ’बिराज बहू’, ’बाप बेटी’, 1955 में ’देवदास’, 1958 में ’यहूदी’ और ’मधुमती’, 1959 में ’सुजाता’ और 1960 में ’परख’ जैसी फ़िल्में देकर बिमल दा शोहरत की बुलन्दी पर जा पहुँचे थे। पर काल के आगे किसी का बस नहीं चलता। उनके इस सफलता को कोई बुरी नज़र लग गई। इस एक दशक के अन्दर उन्हें 11 फ़िल्मफ़ेअर और 6 राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। उनकी एक और कालजयी फ़िल्म ’बन्दिनी’ उनकी मृत्यु के बाद प्रदर्शित हुई।

’अमृत कुंभ की खोज में’ तो फिर नहीं बन सकी, पर 1960 के इलाहाबाद के अर्धकुंभ में जो शॉट्स लिए गए थे, उन फ़ूटेज को 11 मिनट की एक लघु वृत्तचित्र के रूप में जारी किया गया। दरसल बिमल दा की मृत्यु के बाद यह फ़ूटेज भी खो गई थी, या यूं कहिए कि इस पर किसी का ध्यान नहीं गया। पर तीन दशक बाद, मार्च 1999 में बिमल दा के पुत्र जॉय रॉय को अकस्मात यह फ़ूटेज मिल गई और वह भी उत्तम अवस्था में। उन्हें जैसे कोई अमूल्य ख़ज़ाना मिल गया हो! तब जॉय ने इन फ़ूटेजों को जोड़ कर 11 मिनट का एक लघु वृत्तचित्र तैयार किया ’Images of Kumbh Mela' शीर्षक से। इस दुर्लभ वृत्तचित्र को नीचे दिए गए यू-ट्युब लिंक पर देखा जा सकता है।




आपकी बात

’चित्रकथा’ की पहली कड़ी को आप सभी ने सराहा, जिसके लिए हम आपके आभारी हैं। इस कड़ी की रेडरशिप 13 जनवरी तक 154 आयी है। हमारे एक पाठक श्री सुरजीत सिंह ने यह सुझाव दिया है कि क्यों ना इसे हिन्दी और अंग्रेज़ी, दोनों भाषाओं में प्रकाशित की जाए! सुरजीत जी, आपका सुझाव बहुत ही अच्छा है, लेकिन फ़िलहाल समयाभाव के कारण हम ऐसा कर पाने में असमर्थ हैं। भविष्य में अवकाश मिलने पर हम इस बारे में विचार कर सकते हैं, पर इस वक़्त ऐसा संभव नहीं, इसके लिए हमें खेद है।

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!


शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Thursday, August 20, 2009

अब के बरस भेज भैया को बाबुल....एक अमर गीत एक अमर फिल्म से

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 178

रद तैलंग जी के पसंद पर कल आप ने फ़िल्म 'विद्यापति' का गीत सुना था लता जी की आवाज़ में, आज सुनिए लता जी की बहन आशा जी की आवाज़ में फ़िल्म संगीत के सुनहरे युग का एक और सुनहरा नग़मा। ससुराल में ज़िंदगी बिता रही हर लड़की के दिल की आवाज़ है यह गीत "अब के बरस भेज भ‍इया को बाबुल सावन में लीजो बुलाए रे, लौटेंगी जब मेरे बचपन की सखियाँ, दीजो संदेसा भिजाए रे"। हमारे देश के कई हिस्सों में यह रिवाज है कि सावन के महीने में बहू अपने मायके जाती हैं, ख़ास कर शादी के बाद पहले सावन में। इसी परम्परा को इन ख़ूबसूरत शब्दों में ढाल कर गीतकार शैलेन्द्र ने इस गीत को फ़िल्म संगीत का एक अनमोल नगीना बना दिया है। इस गीत को सुनते हुए हर शादी-शुदा लड़की का दिल भर आता है, बाबुल की यादें, अपने बचपन की यादें एक बार फिर से तर-ओ-ताज़ा हो जाती हैं उनके मन में। देश की हर बहू अपना बचपन देख पाती हैं इस गीत में। फ़िल्म 'बंदिनी' का यह गीत फ़िल्माया गया था नूतन पर। 'बंदिनी' सन् १९६३ की एक नायिका प्रधान फ़िल्म थी जिसका निर्माण व निर्देशन किया था बिमल राय ने। जरासंध की मर्मस्पर्शी कहानी, नबेन्दु घोष की पटकथा, नूतन, अशोक कुमार और धर्मेन्द्र के सशक्त अभिनय, और सचिन देव बर्मन तथा शैलेन्द्र के असरदार गीत-संगीत ने इस फ़िल्म को आज कालजयी बना दिया है। 'बंदिनी' का शुमार आज 'क्लासिक्स' में होता है। 'बंदिनी' कहानी है कल्याणी (नूतन) की, उसके दुखों की, उसकी व्यथा की, उसके त्याग और समर्पण की। किस तरह से एक भारतीय नारी का दृढ़ संकल्प होते हुए भी ज़िंदगी के किसी न किसी मोड़ पर उसे दुर्बल होना ही पड़ता है, इसका इस कहानी में प्रमाण मिलता है। इस फ़िल्म ने उस साल कई फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार जीते, जैसे कि नूतन (सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री), बिमल राय (सर्वश्रेष्ठ निर्देशक), जरासंध (सर्वश्रेष्ठ कहानी), कमल बोस (सर्वश्रेष्ठ सिनेमाटोग्राफ़र), और डी. बिलिमोरिया (सर्वश्रेष्ठ ध्वनि)। यह फ़िल्म आप सभी ने देखी होगी, अगर किसी ने नहीं देख रखी है तो मेरा सुझाव है कि आज ही इसकी सीडी या टेप मँगवाकर इसे देखें क्योंकि हिंदी सिनेमा की एक बेहतरीन फ़िल्म है 'बंदिनी'।

जहाँ तक इस फ़िल्म के गीत संगीत का सवाल है, इस फ़िल्म का कोई भी गीत ऐसा नहीं जो प्रचलित न हुआ हो। सचिन दा और शैलेन्द्र की टीम तो थी ही, साथ ही नये उभरते गीतकार गुलज़ार ने भी एक गीत इस फ़िल्म में लिखा था "मोरा गोरा अंग ल‍इ ले"। लता जी की आवाज़ में इस गीत के अलावा एक दूसरा गीत था "जोगी जब से तू आया मेरे द्वारे"। मुकेश की आवाज़ में "ओ जानेवाले हो सके तो लौट के आना", मन्ना डे की आवाज़ में "मत रो माता लाल तेरे बहुतेरे", बर्मन दादा की आवाज़ में "मेरे साजन हैं उस पार", तथा आशा भोंसले की आवाज़ में "ओ पंछी प्यारे" और आज का यह प्रस्तुत गीत, ये सारे गानें आज सदाबहार नग़मों की फ़ेहरिस्त में दर्ज है। दोस्तों, अभी कुछ १०-१५ दिन पहले मैं विविध भारती पर ग़ैर फ़िल्मी गीतों का कार्यक्रम 'गुल्दस्ता' सुन रहा था। अचानक एक गीत बज उठा सुधा मल्होत्रा का गाया हुआ और संगीतकार का नाम बताया गया शिवराम कृष्ण। गीत कुछ ऐसा था "निम्बुआ तले डोला रख दे मुसाफ़िर, आयी सावन की बहार रे"। अब आप ज़रा इस लाइन को "अब के बरस भेज भ‍इया को बाबुल" की धुन पर गाने की कोशिश कीजिए ज़रा! जी हाँ, उस रात मैं भी चौंक गया था यह सुनकर कि इन दोनों गीतों की धुन हू-ब-हू एक है। मेरे दिल में हलचल होती रही कि कौन सा गीत पहले बना होगा, क्या एक संगीतकार दूसरे संगीतकार की धुन से प्रभावित होकर अपना गीत बनाए होंगे, वगैरह वगैरह। मेरी तफ़तीश अगले दिन समाप्त हुई जब मुझे पता चला कि यह असल में एक पारम्परिक लोक रचना है। यह एक कजरी है जिसे कई कई शास्त्रीय गायकों ने गाया है समय समय पर। सावन की ऋतु पर यह गीत गाँव गाँव में सुनने को मिलता है आज भी। और 'बंदिनी' के इस गीत में भी सावन का ही ज़िक्र है। तो दोस्तों, सावन का महीना भी चल रहा है, ऐसे में यह गीत बड़ा ही उपयुक्त बन पड़ा है हमारी इस महफ़िल के लिए। शरद जी को धन्यवाद देते हैं कि उन्होने इस गीत की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया। सुनिए और इसका आनंद उठाइए, और महिलायें इसे सुनकर अपने बचपन और बाबुल को याद करेंगीं ऐसा हमारा अनुमान है।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. इस गीत में शहनाई का बहुत व्यापक इस्तेमाल हुआ है.
२. गीतकार शम्स लखनवीं ने इस फिल्म की कहानी और संवाद लिखे थे.
३. एक अंतरा खत्म होता है इस शब्द पर -"दुवायें".

पिछली पहेली का परिणाम -
पूर्वी जी १० अंक कमाकर आप पराग जी, दिशा जी, और रोहित जी को जबरदस्त टक्कर दे रही हैं. बधाई. स्वप्न जी काश ऐसा हो पाता कि हम सब अपना श्रम लगाकर इस फिल्म का रीमेक बना पाते...आपकी पसंद कल्याणी के रोल के लिए श्रेष्ठ है. अन्य सभी श्रोताओं का भी आभार.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, August 6, 2009

छोटा सा घर होगा बादलों की छाँव में....सपनों को पंख देती किशोर कुमार की आवाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 163

प्रोफ़. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने कहा है कि "Dream is not something that we see in sleep; Dream is something that does not allow us to sleep"| इस एक लाइन में उन्होने कितनी बड़ी बात कही हैं। सच ही तो है, सपने तभी सच होते हैं जब उसको पूरा करने के लिए हम प्रयास भी करें। केवल स्वप्न देखने से ही वह पूरा नहीं हो जाता। ख़ैर, आप भी सोच रहे होंगे कि मैं किस बात को लेकर बैठ गया। दरअसल इन दिनों आप सुन रहे हैं किशोर कुमार के गीतों से सजी लघु शृंखला 'दस रूप ज़िंदगी के और एक आवाज़', जिसके तहत हम किशोर दा की आवाज़ के ज़रिये ज़िंदगी के दस अलग अलग पहलुओं पर रोशनी डाल रहे हैं, और आजका पहलू है 'सपना'। जी हाँ, वही सपना जो हर इंसान देखता है, कोई सोते हुए देखता है तो कोई जागते हुए। किसी को ज़िंदगी में बड़ा नाम कमाने का सपना होता है, तो किसी को अर्थ कमाने का। आप यूं भी कह सकते हैं कि यह दुनिया सपनों की ही दुनिया है। आज किशोर दा की आवाज़ के ज़रिये हम जो सपना देखने जा रहे हैं वह मेरे ख़याल से हर आम आदमी का सपना है। हर आदमी अपने परिवार को सुखी देखना चाहता है, वह चाहता है अपने परिवार के लिए एक सुंदर सा घर बनायें, छोटी सी प्यारी सी एक दुनिया बसायें, जिसमें हों केवल ख़ुशियाँ ही ख़ुशियाँ, मिलन ही मिलन। जी हाँ, आज ज़िक्र है फ़िल्म 'नौकरी' के गीत का, "छोटा सा घर होगा बादलों की छाँव में, आशा दीवानी मन में बंसुरी बजाए, हम ही हम चमकेंगे तारों के इस गाँव में, आँखों की रोशनी हरदम ये समझाये"।

'दो बीघा ज़मीन' के बाद बिमल राय और सलिल चौधरी का साथ एक बार फिर जमा १९५४ की दो फ़िल्मों में। एक थी 'बिराज बहू' और दूसरी 'नौकरी'। जहाँ 'दो बीघा ज़मीन' की कहानी ग्रामीण समस्या पर आधारित थी, 'नौकरी' का आधार था शहरों में बेरोज़गारी की समस्या। बिमल राय प्रोडक्शन्स के बैनर तले बनी इस फ़िल्म के नायक थे किशोर कुमार, और उनके साथ थे शीला, निरुपा राय एवं बलराज साहनी। दुर्भाग्यवश 'नौकरी' वह कमाल नहीं कर सकी जो कमाल 'दो बीघा ज़मीन' ने दिखाया था। लेकिन सलिल चौधरी के स्वरबद्ध कम से कम एक गीत को श्रोताओं ने कालजयी करार दिया। और वह गीत है आज का प्रस्तुत गीत। गीतकार शैलेन्द्र के सीधे सरल शब्दों की एक और मिसाल यह गीत बड़े ही प्यारे शब्दों में एक आम आदमी के सपनों की बात करता है। पहले अंतरे में भाई अपनी छोटी बहन के लिए चांदी की कुर्सी और बेटा अपनी माँ के लिए सोने के सिंहासन का सपना देखता है, तो दूसरे अंतरे में भाई अपनी बहन की शादी करवाने का सपना देखता है। तथा तीसरे अंतरे में माँ के अपने बेटे का घर बसाने के सपने का ज़िक्र हुआ है। कुल मिलाकर यह गीत एक आम आदमी और एक आम घर परिवार के सपनों का संगम है। गीत के अंत में आप को एक लड़की की आवाज़ भी सुनाई देगी, क्या आप जानते हैं यह किसकी आवाज़ है? यह आवाज़ है लता और आशा की बहन उषा मंगेशकर की। जी हाँ, उनका गाया यह पहला पहला गीत था। इसी साल उन्होने 'चांदनी चौक' व 'सुबह का तारा' में भी गानें गाये और इस तरह से अपनी बड़ी दो बहनों की तरह वो भी फ़िल्म संगीत के क्षेत्र में अपने पाँव बढ़ा ही दिये। दोस्तों, आज का यह गीत सुनने से पहले आप को यह बता दें कि इस गीत का एक सैड वर्ज़न भी है जिसे हेमन्त कुमार ने गाया है, और इस गीत की धुन पर सलिल दा ने एक ग़ैर फ़िल्मी बंगला गीत भी रचा है जिसे उन्ही की बेटी अंतरा चौधरी ने गाया था जिसके बोल हैं "एक जे छिलो राजा होबुचंद्र ताहार नाम..."। हेमन्त दा और अंतरा चौधरी के गाये इन गीतों को आप फिर कभी सुन लीजियेगा दोस्तों, फिलहाल किशोर दा के गाये गीत की बारी। और हाँ, एक और बात, सपने देखिये लेकिन सोती आँखों से नहीं, बल्कि जागती हुई आँखों से। बड़े बड़े सपने देखिये, उन्हे पूरा करने के लिए जी तोड़ मेहनत कीजिये। यकीन मानिए, एक दिन आप को अपनी मेहनत का सिला ज़रूर मिलेगा, और आप भी कहेंगे कि "सच हुए सपने तेरे, झूम ले ओ मन मेरे" !



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. दादा के गाये इस गीत के क्या कहने, शायद ही कोई ऐसा होगा जो इसे सुनकर प्रेरणा से न भर जाए.
2. कल के गीत का थीम है - "प्रेरणा".
3. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से -"नैन".

कौन सा है आपकी पसंद का गीत -
अगले रविवार सुबह की कॉफी के लिए लिख भेजिए (कम से कम ५० शब्दों में ) अपनी पसंद को कोई देशभक्ति गीत और उस ख़ास गीत से जुडी अपनी कोई याद का ब्यौरा. हम आपकी पसंद के गीत आपके संस्मरण के साथ प्रस्तुत करने की कोशिश करेंगें.

पिछली पहेली का परिणाम -
चलिए पराग जी नींद से जागे, और सही जवाब देकर दिशा जी से २ अंकों की बढ़त ले ली..१२ अंकों के लिए बधाई जनाब. मनु जी आपकी कशमकश कब दूर होगी...स्वप्न जी और दिलीप जी आपका भी आभार, शरद जी नहीं दिखे कल :)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, May 25, 2009

हरियाला सावन ढोल बजाता आया....मानसून की आहट पर कान धरे है ये मधुर समूहगान

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 91

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के लिए आज हम एक बड़ा ही अनोखा समूहगान लेकर आये हैं। सन् १९५३ में बिमल राय की एक मशहूर फ़िल्म आयी थी 'दो बीघा ज़मीन'। बिमल राय ने अपना कैरियर कलकत्ते के 'न्यू थियटर्स' में शुरु किया था और उसके बाद मुंबई आकर 'बौम्बे टाकीज़' से जुड़ गये जहाँ पर उन्होने कुछ फ़िल्में निर्देशित की जैसे कि १९५२ में बनी फ़िल्म 'माँ'। उस वक़्त 'बौम्बे टाकीज़' बंद होने के कगार पर थी। इसलिए बिमलदा ने अपनी 'प्रोडक्शन' कंपनी की स्थापना की और अपने कलकत्ते के तीन दोस्त, सलिल चौधरी, नवेन्दु घोष और असित सेन के साथ मिलकर सलिल चौधरी की बंगला उपन्यास 'रिक्शावाला' को आधार बनाकर 'दो बीघा ज़मीन' बनाने की ठानी। सलिलदा की बेटी अंतरा चौधरी ने एक बार बताया था इस फ़िल्म के बारे में, सुनिए उन्ही के शब्दों में - "१९५२ में ऋत्विक घटक बिमलदा को 'रिक्शावाला' दिखाने ले गये। बिमलदा इस फ़िल्म से इतने प्रभावित हुए कि उन्होने मेरे पिताजी को अपनी कंपनी के साथ जुड़ने का न्योता दे बैठे, और इस तरह से बुनियाद पड़ी 'दो बीघा ज़मीन' की। ये दोनो एक दूसरे का बहुत सम्मान करते थे। मुझे अभी भी याद है कि जब बिमलदा बहुत सुबह सुबह हमारे घर आया करते थे और मेरे पिताजी के बिस्तर के पास कुर्सी में बैठकर अख़बार पढ़ते रहते और पिताजी के उठने का इंतज़ार करते। मेरी माँ उन्हे जगाना भी चाहे तो बिमलदा मना कर देते थे।" यह तो थी 'दो बीघा ज़मीन' और 'रिक्शावाला' की बात, लेकिन ऐसा भी कहा गया है कि 'दो बीघा ज़मीन' ख़्वाजा अहमद अब्बास की कहानी पर बनी फ़िल्म 'धरती के लाल' से भी प्रेरित था। यहाँ उल्लेखनीय बात यह है कि अब्बास साहब और सलिलदा, दोनो ही 'इपटा' के सदस्य थे। बलराज साहनी, निरुपा राय और रतन कुमार अभिनीत 'दो बीघा ज़मीन' हिंदी फ़िल्म इतिहास की एक बेहद महत्वपूर्ण फ़िल्म रही है।

सलिल चौधरी के संगीत की एक ख़ास बात यह रही है कि उनके बहुत सारे गीतों में जन-जागरण के सुर झलकते हैं। संगीत उनके लिए एक हथियार की तरह था जिससे वो समाज में क्रांति की लहर पैदा करना चाहते थे। सलिलदा के व्यक्तित्व को जानने के लिए उनके बनाये इस तरह के जोशीले गीतों को सुनना बेहद ज़रूरी हो जाता है। दृढ़ राजनैतिक विचारों और सामाजिक कर्तव्यों के प्रति जागरूक होने की वजह से उनका संगीत उस ज़माने के दूसरे संगीतकारों से बिल्कुल अलग हुआ करता था। फ़िल्म 'दो बीघा ज़मीन' मे भी उन्होने इस तरह के कम से कम दो गीत हमें दिये हैं। एक तो है "धरती कहे पुकार के मौसम बीता जाये" और दूसरा गीत है "हरियाला सावन ढोल बजाता आया", और यही दूसरा गीत आज सुनिए 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में। गीतकार शैलेन्द्र भी 'इपटा' के सक्रीय सदस्य थे। सलिलदा के समाज में क्रांति पैदा करने वाले संगीत को अपने जोशीले असरदार बोलों से इस फ़िल्म में समृद्ध किया शैलेन्द्र ने। मन्ना डे, लता मंगेशकर, और साथियों की आवाज़ों में किसान परिवारों के उत्साह भरे इस गीत को सुनिए और गरमी के इस मौसम में सावन को जल्द से जल्द आने का न्योता दीजिए।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. राज कुमार और माला सिन्हा अभिनीत इस फिल्म में संगीत है सी रामचंद्र का.
२. परवेज़ शम्सी ने लिखा है ये मधुर युगल गीत.
३. मुखड़े में शब्द है - "कहानी".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
बहुत दिनों बाद दिलीप जी के सर बंधा है विजेता का ताज. बधाई हो दिलीप जी और पराग जी आपको भी बधाई सही गीत पहचाना

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Wednesday, March 4, 2009

जब से मिली तोसे अखियाँ जियरा डोले रे...हो डोले...हो डोले...हो डोले...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 13

दोस्तों नमस्कार! 'ओल्ड इस गोल्ड' के एक और कडी के साथ हम हाज़िर हैं. आशा है आप हर रोज़ 'ओल्ड इस गोल्ड' को सुन रहे होंगे और हर रोज़ पूछी गयी पहेली को बूझने का भी प्रयास करते होंगे. हमारा आप से यह अनुरोध है कि अगर आपके जेहन में ऐसा कोई ख़ास गीत है जिसे आप ने बहुत दिनों से नहीं सुना और इस शृंखला के अंतर्गत सुनना चाहते हैं तो हमें ज़रूर लिखिएगा. अगर गीत हमारे पास उपलब्ध होगा तो हम उसे ज़रूर शामिल करेंगे. और आइए अब आते हैं हमारे आज के गीत पर. आज का गीत हमने चुना है 1955 में बनी फिल्म "अमानत" से. यह फिल्म बिमल रॉय प्रोडएक्शन के 'बॅनर' तले बनाई गयी थी. इससे पहले बिमल रॉय "दो बीघा ज़मीन" और "नौकरी" जैसे फिल्मों का निर्माण कर चुके थे. "अमानत" फिल्म का निर्देशन किया अरविंद सेन ने, और इसके मुख्य कलाकार थे भारत भूषण और चाँद उस्मानी. दो बीघा ज़मीन और नौकरी की तरह अमानत में भी सलिल चौधुरी का संगीत था. बिमल-दा और सलिल-दा गहरे दोस्त थे और इन दोनो ने कई फिल्मों में साथ साथ काम किया. गीतकार शैलेंद्रा भी इनके काफ़ी अच्छे दोस्त थे और इन फिल्मों में शैलेंद्रा ने ही गाने लिखे.

अमानत फिल्म का जो गीत हम आपको आज सुनवाने जा रहे हैं उसे हेमंत कुमार और गीता दत्त ने गाया है. "जब से मिली तोसे अखियाँ जियरा डोले रे डोले हो डोले". यह गीत आधारित है बंगाल के एक मशहूर लोक गीत पर, जिसे अपने कंधों पर पालकी खींचने वाले लोग गाते हैं. उस बांग्ला लोक गीत में "हैया हो हैया" को इस हिन्दी गीत में "डोले हो डोले" कर दिया गया है. गीत तो वैसे ही मधुर है, उस पर बाँसुरी की मधुर तान ने इस गीत में एक ऐसा खूबसूरत समा बाँधा है की इस गीत को सुनते हुए अगर आप अपनी आँखें बंद कर लें तो बंगाल के सुदूर गाँवों का नज़ारा आपके नज़रों के सामने आ जाएगा, और वहाँ की मिट्टी की खुश्बू आप महसूस कर पाएँगे. तो लीजिए चल पडिये बंगाल के उसी गाँव की ओर इस गीत पे सवार होकर.




और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. १९६८ में कल्यानजी आनंद जी ने इस फिल्म के लिए रास्ट्रीय पुरस्कार जीता था.
२. इन्दीवर साहब ने शुद्ध हिंदी के शब्दों का इस्तेमाल किया था इस गीत में.
३. मुखड़े में शब्द हैं - "दोष".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
लगा था मुश्किल होगा श्रोताओं के लिए, पर वाकई मानना पड़ेगा तन्हा जी और उज्जवल भाई ने बहुत सही जवाब दिए. उज्जवल जल्दी ही अपने आलेखों के साथ भी आवाज़ पर उपस्थित होंगें, आवाज़ परिवार में आपका स्वागत है उज्जवल. मनु जी आपने सही कहा. अब धोनी और युवराज जम गए हैं. पर सचिन फिर भी सचिन ही रहेंगे :)

प्रस्तुति - सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, December 14, 2008

तू जिन्दा है तो जिंदगी की जीत में यकीन कर

अमर गीतकार और कवि शैलेन्द्र की ४२वीं पुण्यतिथि पर विशेष

"अपने बारे में लिखना कोई सरल काम नही होता. किंतु कोई आदमी फंस जाए तो ! तो लिखना आवश्यक हो जाता है. मैं भी लिखने बैठा हूँ. बाहर बूंदा-बांदी हो रही है. मौसम बड़ा सुहाना है. कभी कभी तेज़ हवा के झोंखों से परदे फड़फड़ा उठते हैं. जैसे उड़ान भरने की कोशिश कर रहें हो ! मेरी कल्पना में अतीत के धुंधले चित्र स्पष्ट होने लगते हैं. पुरानी स्मृतियाँ उममें ऐसा रंग, जो तन मन मिट जाने पर भी ना मिटे...." (कवि और गीतकार शैलेन्द्र की आत्मकथा से)

और आज से ४२ साले पहले, स्मृतियों के आकाश में विचरता वो जन साधारण के मन की बात कहने वाला कवि शरीर रूपी पिंजरा छोड़ हमेशा के लिए कहीं विलुप्त हो गया पर दे गया कुछ ऐसे गीत जो सदियों-सदियों गुनगुनाये जायेंगें, कुछ ऐसे नग्में जो हर आमो-ख़ास के दिल के जज़्बात को जुबाँ देते रहेंगे बरसों बरस. वो जिसने लिखा "दुनिया न भाये मुझे अब तो बुला ले" (बसंत बहार), उसी ने लिखा "पहले मुर्गी हुई कि अंडा" (करोड़पति), वो जिसने लिखा "डस गया पापी बिछुआ" उसी ने लिखा "क्या से क्या हो गया बेवफा तेरे प्यार में". वो जो यूँ ही बैठे-बैठे शब्द बुन लेता था और सिगरेट के डिब्बों पर लिख डालता था. उन्हीं शब्दों को तब पूरा देश गुनगुनाता था. वो जो सरल शब्दों में कहीं गहरे उतर जाता था. ऐसे थे हिन्दी फ़िल्म जगत कामियाब और संवेदनशील गीतकारों में से एक शंकरदास केसरीलाल शैलेन्द्र जिन्हें दुनिया शैलेन्द्र के नाम से जानती है. मशहूर संगीत समीक्षक एम॰ देसाई साहब जो शैलेन्द्र से एक बार मिले थे मरहूम संगीतकार रोशन के घर पर, उन्होंने एक जगह लिखा हैं - "शैलेन्द्र चाहते थे कि उनके गीत सबकी समझ में आए और उन्हें एक अनपढ़ कुली भी उसी मस्ती में गुनगुना सके जिस अंदाज़ में कोई पढ़ा लिखा शहरी. वो चाहते थे कि उनके गीतों को हर उम्र के लोग पसंद करें. अक्सर उनके गीत उनके ख़ुद अपने जीवन से प्रेरित होते थे. रिंकी भट्टाचार्य (स्वर्गीय विमल राय की सुपुत्री और स्वर्गीय बासु भट्टाचार्य की पत्नी) ने भी उनके बारे में कुछ ऐसे ही विचार व्यक्त किया- "वो बहुत भावुक इंसान थे जो अपने आस-पास घटने वाली घटनाओं से इस कदर प्रभावित रहते थे कि उनके रोमांटिक गीतों में भी अगर आप देखें तो आपको दार्शनिकता नज़र आएगी. पर वो गरीबी का महिमा मंडन नही करते थे, न ही दर्द को सहनभूति पाने के लिए बढ़ा-चढ़ा कर जताते थे. उनके गीतों में घोर निराशा भरे अन्धकार में भी जीने की ललक दिखती थी जैसे उनका गीत "तू जिन्दा है तो जिंदगी की जीत पे यकीन कर".

अगस्त १९२३ को रावलपिंडी (अब पाकिस्तान में) में जन्में शैलेन्द्र के पिता सेना में अधिकारी थे. रिश्तेदारी के कलहों के चलते धन संपत्ति का नुक्सान उठाने के बाद उनका परिवार मथुरा आकर बस गया जहाँ उनका बचपन बीता. गरीबी का आलम ये थे कि बच्चों को बीड़ी पीने के लिए उकसाया जाता था ताकि भूख मिट जाए. दोस्तों और अध्यापकों के आर्थिक मदद से पढ़ाई का खर्चा निकला किसी तरह. सेंट्रल रेलवे में मकेनिक की नौकरी लगी तो मुंबई तबादला हो गया. मगर कवि हृदय तो क्लेकिंग मशीन के ताल पर भी गीत गुनने लगा. काम से छूटने के बाद शैलेन्द्र PWA (प्रोग्रेसिव रायटर्स असोसिएशन) में अपना समय बिताते जिसका दफ्तर पृथ्वी राज कपूर के रोयल ओपरा हाउस के बिल्कुल सामने हुआ करता था. हर शाम यहाँ कवि संगोष्ठी हुआ करती थी. एक दिन शैलेन्द्र ने यहीं जब अपनी जोश से भरी "जलता है पंजाब" कविता सुनाई तो एक शख्स उनके पास आकर बोला - "मैं पृथ्वी राज कपूर का बेटा राज कपूर हूँ, बँटवारे की त्रासदी पर एक फ़िल्म बना रहा हूँ. मुझे लगता है कि आप उस फ़िल्म के लिए गीत लिख सकते हैं". शैलेन्द्र ने साफ़ शब्दों में मना कर दिया. महीनों गुजर गए. राज कपूर साहब ने "आग" बनाई. और नई फ़िल्म "बरसात" पर काम जारी था. शैलेन्द्र राज साहब के दफ्तर में पहुंचे और पूछा कि क्या वो राज साहब को याद हैं. राज कपूर हीरों के सच्चे कद्रदान थे, कहाँ भूलने वाले थे. शैलेन्द्र ने उनसे कहा -"मुझे ५०० रुपयों की जरुरत है" राज साहब ने झट निकाल कर दिए और पूछा कि क्या वो अब उनकी फ़िल्म में गीत लिखेंगें. इस बार शैलेन्द्र ने इनकार नहीं किया. तब तक फ़िल्म "बरसात" के दो गीतों को छोड़कर सभी गीत हसरत जयपुरी साहब मुक्कमल कर चुके थे. अन्तिम दो गीत जो शैलेन्द्र ने लिखे वो थे - "बरसात में हम से मिले तुम सजन" और "तिरछी नज़र है पतली कमर है". दोनों ही गीत बेहद मकबूल हुए. और यहीं से राजकपूर की टीम में चार नामों ने सदा के लिए अपना स्थान बना लिया. शंकर जयकिशन, हसरत और शैलेन्द्र. इस चार जन जोड़ी में अंग्रेजी अच्छे से जानने वाले केवल शैलेन्द्र ही थे. यही वजह थी कि सभी कानूनी चीज़ें (अग्रीमेंट आदि) उनके पढ़ने के बाद ही अन्य सदस्यों के दस्तखतों के लिए आगे बढ़ाई जाती थे. शंकर-जयकिशन ने तो यहाँ तक कह दिया थे कि बेशक हसरत और शैलेन्द्र किसी अन्य संगीतकार के साथ काम कर लें पर वो इन्हीं दोनों गीतकारों के साथ काम करेंगे. पर जब "कॉलेज गर्ल" के लिए राजेंद्र कृष्ण के साथ शंकर-जयकिशन ने फ़िल्म साइन की तो शैलेन्द्र बुरा मान गए. और शंकर को एक नोट लिखा "छोटी सी ये दुनिया, पहचाने रास्ते हैं तुम कहीं तो मिलोगे तो पूछेंगे हाल..". उन्होंने संगीतकार जोड़ी के साथ बेरुखी से पेश आना शुरू किया. जिससे दूरियां बढ़ गई. अंत में राज साहब सब को साथ लेकर चौपाटी गए और वहां भेलपुरी खिलाकर आपसी मतभेद दूर किए. बाद में उनके लिखे उन्हीं बोलों पर किशोर कुमार का गाया गीत भी हमारे संगीत प्रेमियों को अवश्य याद आ गया होगा. फ़िल्म "बंदनी" के लिए उनका लिखा गीत "अब के बरस भेज भइया को बाबुल" बिमल दा के सहायक रहे बासु दा को बहुत पसंद था. इसी दौरान उन्होंने बासु दा से फणीश्वर नाथ रेणू की अमर कहानी "मारे गए गुलफाम" पर चर्चा की. बाद में शैलेन्द्र के फ़िल्म निर्माण की पहली और एकलौती कोशिश "तीसरी कसम" जो इसी कहानी पर आधारित थी, को बासु दा ने ही निर्देशित किया. कहते हैं कि इस फ़िल्म की असफलता ही आखिरकार मात्र ४२ साल की उम्र में उनकी मौत का कारण बनी. फ़िल्म की असफलता ने उन कर क़र्ज़ का भार चढ़ा दिया. पर उससे भी बढ़कर उन लोगों से मिले व्यवहार ने उन्हें तोड़ दिया, जिन्हें वो अपना समझते थे. अन्तिम दिनों में वो शराब के आदी हो गए थे. जब उन्हें अस्पताल में भरती करवाया गया तो उन्होंने राज साहब से वादा किया कि वो उनकी फ़िल्म "मेरा नाम जोकर" का अधूरा गीत "जीना यहाँ मरना यहाँ" को अवश्य पूरा करेंगें लौट कर. पर ये न हो सका. राज साहब ने इस गीत को उनके सुपुत्र शैली शैलेन्द्र से पूरा करवाया. हालाँकि "तीसरी कसम' व्यावसायिक दृष्टि से असफल रही पर आज भी सिनेमा प्रेमी इस फ़िल्म की कसमें खाते हैं, और कोई भी संगीत प्रेमी इस फ़िल्म में उनके लिखे गीतों को कभी भी भुला नहीं पायेगा. बाद में इस फ़िल्म को मोस्को अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म समारोह में भारत की अधिकारिक प्रविष्ठी होने का गौरव भी मिला, पर अफ़सोस शैलेन्द्र नहीं रुके इस सफलता को देखने के लिए भी.

उनके बेटे दिनेश उन्हें याद करते हुए बताते हैं कि - "वो मात्र १० साल के रहे होंगें जब पिता की मौत हुई. पर उन्हें याद है कि वो कभी भी घर पर काम लेकर नहीं आते थे, हर शाम वो हम सब बच्चों को लेकर समुद्र किनारे जाते और हम सब दो घंटे वहीं बिताते थे. पिताजी अक्सर ऊँचे पत्थरों पर बैठकर लिखते रहते थे, वापसी में हम जुहू होटल से चाय पीते हुए आते थे, उन्हें क्रोस्वर्ड खेलना बहुत पसंद था और रोटी और अरहड़ की दाल उनका पसंदीदा खाना हुआ करता था. माँ सख्त हुआ करती थी तो हम सब बच्चे पिताजी को ही अपनी ढाल बनाये रखते थे. दरअसल उनकी मौत के बाद जब अखबारों में बड़ी-बड़ी सुर्खियाँ आई तब जाकर हमें उनकी विशालता का एहसास हुआ था, वरना तब तक तो राज कपूर, एस डी बर्मन, मुकेश. शंकर-जयकिशन, सलिल चौधरी जैसी बड़ी हस्तियां भी हमें सबके घरों में आने-जाने वाले मेहमानों से ही लगते थे". दिनेश आगे बताते हैं कि- "अपनी बेटी की मौत के बाद उन्होंने ईश्वर पर विश्वास करना छोड़ दिया था.. उससे पहले वो हर गीत की शुरूआत ईश्वर के नाम से करते थे पर १९४६ में जब हमारी बहन गुजर गयी तब से उन्होंने ऐसा करना छोड़ दिया. पर उन्होंने इस सोच को हममे से किसी पर लादा नहीं. माँ चूँकि बहुत धार्मिक थी, और वो उनके साथ हर धार्मिक पूजा पाठ में शामिल हो जाया करते थे, फिल्मों के लिए भी उन्होंने कुछ बेहतरीन भजन लिखे हैं."

अपने पिता की कुछ और खूबियों का जिक्र करते हुए दिनेश बताते हैं कि -"वो डफली बहुत बढ़िया बजाते थे एक ज़माने में वह शिव मन्दिर के समारोहों में वो ऐसा नियमित करते थे, राज साहब को भी डफली पकड़ना और बजाना उन्हीं ने सिखाया. शंकर-जयकिशन की जोड़ी में भी वो संगीतकार शंकर के अधिक करीब थे. बतौर कवि वो कबीर और टैगोर की दार्शनिकता से बहुत अधिक प्रभावित रहे, और उनके गीतों में उत्तर प्रदेश के लोक गीतों का प्रभाव भी साफ़ देखा जा सकता है." फ़िल्म तीसरी कसम में उन्होंने "चलत मुसाफिर.." "लाली लाली..." जैसे मिटटी की खुशबू वाले गीत लिखे तो मशहूर "नाच" गीतों को भी उन्होंने बेहद सटीक अंदाज़ में "मारे गए गुलफाम..", 'हाय गजब...", और "पान खाए सैया हमार ऽहो..." जैसे गीतों में पेश किया ये वही फ़िल्म है जिसमें उन्होंने "सजन रे झूठ मत बोलो...", "दुनिया बनाने वाले..." और "आ आ भी जा..." जैसे गीत भी लिखे. ये कहना भी अन्याय होगा कि उनका बेहतरीन काम एस जे और राज साहब के साथ आया. एड सी और सलिल दा के साथ भी उन्होंने एक से बढ़कर एक गीत रचे. संगीतकार गुलाम मोहम्मद और रोशन उनके सबसे करीबी मित्रों में से थे. संगीतकार रवि और एस एन त्रिपाठी के आलावा उन्होंने चित्रगुप्त के साथ एक बेहद कामियाब भोजपुरी फ़िल्म के लिए भी काम किया. कल्यानजी आनंदजी (सट्टा बाज़ार) और आर डी बर्मन (छोटे नवाब) ने अपना संगीत सफर उन्हीं के साथ शुरू किया. एल पी के साथ उन्हें "धरती कहे पुकार के" करनी थी, पर फ़िल्म लॉन्च होने से पहले उनका जीवन काल समाप्त हो गया, और सुनने वाले बस यही सुनते रह गए -

"कि मर के भी किसी को याद आएंगें,
किसी की आंसुओं में मुस्कुरायेंगें,
कहेगा फूल हर कली से बार बार-
जीना इसी का नाम है..."

बहुत मुश्किल है शैलेन्द्र के विशाल खजाने से चंद गीतों को चुनना फ़िर भी एक कोशिश है आज उनकी पुण्य तिथि पर उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करने की..सुनते हैं शब्दों के अमर शिल्पी शैलेन्द्र के कुछ यादगार गीत-


छोटी सी ये दुनिया पहचाने रास्ते हैं फिर कहीं तो मिलोगे (फिल्म- रंगोली)
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सजन रे! झूठ मत बोलो (फिल्म- तीसरी कसम)
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तू प्यार का सागर है, तेरी एक बूँद के प्यासे हम (फिल्म- सीमा)
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रमय्या वस्ता वैया (फिल्म- श्री ४२०)
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दिल तड़प-तड़प के दे रहा है ये सदा ( फिल्म- मधुमती)
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Monday, November 24, 2008

सलिल दा के बहाने येसुदास की बात


बीते १९ तारीख को हम सब के प्रिय सलिल दा की ८६ वीं जयंती थी, लगभग १३ साल पहले वो हम सब को छोड़ कर चले गए थे, पर देखा जाए इन्ही १३ सालों में सलिल दा की लोकप्रियता में जबरदस्त इजाफा हुआ है, आज की पीढी को भी उनका संगीत समकालीन लगता है, यही सलिल दा की सबसे बड़ी खासियत है. उनका संगीत कभी बूढा ही नही हुआ.सलिल दा एक कामियाब संगीतकार होने के साथ साथ एक कवि और एक नाटककार भी थे और १९४० में उन्होंने इप्टा से ख़ुद को जोड़ा था. उनके कवि ह्रदय ने सुकांता भट्टाचार्य की कविताओं को स्वरबद्ध किया जिसे हेमंत कुमार ने अपनी आवाज़ से सजाया. लगभग ७५ हिन्दी फिल्मों और २६ मलयालम फिल्मों के अलावा उन्होंने बांग्ला, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, गुजरती, मराठी, असामी और ओडिया फिल्मों में अच्छा खासा काम किया. सलिल दा की पिता डाक्टर ज्ञानेंद्र चौधरी एक डॉक्टर होने के साथ साथ संगीत के बहुत बड़े रसिया भी थे. अपने पिता के वेस्टर्न क्लासिकल संगीत के संकलन को सुन सुन कर सलिल बड़े हुए. असाम के चाय के बागानों में गूंजते लोक गीतों और और बांग्ला संगीत का भी उन पर बहुत प्रभाव रहा. वो ख़ुद भी गाते थे और बांसुरी भी खूब बजा लेते थे. अपने पिता के वो बहुत करीब थे. कहते हैं एक बार एक ब्रिटिश प्रबंधक ने उनके पिता को एक भद्दी गाली दी जिसके जवाब में उनके पिता ने उस प्रबंधक को एक ऐसा घूँसा दिया कि उसके ३ दांत टूट गए. दरअसल उनके पिता ब्रिटिश साम्राज्य के सख्त विरोधी थे और उन्होंने असाम के चाय बागानों में काम कर रहे गरीब और शोषित मजदूरों और कुलियों के साथ मिल कर कुछ नाटकों का भी मंचन किया जो उनका अपना तरीका था, अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने का. यही आक्रोश सलिल दा में भी उपजा, उन्होंने भी बहुत से ballad किए जिसमें उन्होंने संगीत और संवाद के माध्यम से अपने नज़रिए को बहुत सशक्त रूप से सामने रखा.

बांग्ला फ़िल्म "रिक्शावाला" का जब हिन्दी रूपांतरण बना तो विमल दा ने उन्हें मुंबई बुला लिया और बना "दो बीघा ज़मीन" का संगीत. मूल फ़िल्म भी सलिल दा ने ख़ुद लिखी थी और संगीत भी उन्हीं का था. दोनों ही फिल्में बहुत कामियाब रहीं. और यहीं से शुरू हुआ था सलिल दा का सगीत सफर, हिन्दी फ़िल्म जगत में. "जागतेरहो", "काबुलीवाला", "छाया", "आनंद", "छोटी सी बात" जैसी जाने कितनी फिल्में हैं जिनका संगीत सलिल दा के "जीनियस" रचनाकर्म का जीता जागता उदहारण बन कर आज भी संगीत प्रेमियों को हैरान करता है.

१९६५ में एक मलयालम फ़िल्म आई थी जो कि साहित्यिक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित तकजी शिवशंकर पिल्लै के उपन्यास "चेमीन" पर आधारित थी. फ़िल्म का शीर्षक भी यही थी. चेमीन एक किस्म की मछली होती है और ये कहानी भी समुद्र किनारे बसने वाले मछवारे किरदारों के इर्द गिर्द बुनी एक प्रेम त्रिकोण थी. ये उपन्यास इतना लोकप्रिय हुआ था कि सभी भारतीय भाषाओं के अलावा इसका अंग्रेजी, रुसी, जर्मन, इटालियन और फ्रेंच भाषा में भी रूपांतरण हुआ. जाहिर सी बात है कि जब निर्देशक रामू करिआत को इस कहानी पर फ़िल्म बनाने का काम सौंपा गया. तो उन्हें समझ आ गया था कि ये फ़िल्म मलयालम सिनेमा के लिए एक बड़ी शुरुआत होने वाली है. वो सब कुछ इस फ़िल्म के लिए बहतरीन चाहते थे. यह फ़िल्म मलयालम की पहली रंगीन और सिनेमास्कोप फ़िल्म भी थी तो रामू ने मलयालम इंडस्ट्री के बहतरीन कलाकारों को चुनने के साथ साथ बॉलीवुड के गुणी लोगों को भी इस महान प्रोजेक्ट में जोड़ा, ऋषिकेश मुख़र्जी ने संपादन का काम संभाला. तो संगीत का जिम्मा सौंपा गया हमारे सलिल दा को. सलिल दा जानते थे कि उन पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है, पर ये एक ऐसा काम था जिसमें सलिल दा कोई कमी नही छोड़ना चाहते थे. वो मुंबई से अचानक गायब हो गए कोई चार पाँच महीनों के लिए. किसी को नही पता और सलिल दा जा कर बस गए केरल के एक मछवारों की बस्ती में. वो उनके साथ रहे उनके संगीत को और बोलियों को ध्यान से सीखा समझा और इस तरह बने फ़िल्म "चेमीन" के यादगार गीत. इस फ़िल्म के संगीत ने मलयालम संगीत का पैटर्न ही बदल डाला या यूँ कहें कि रास्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित यह फ़िल्म मलयालम फ़िल्म इंडस्ट्री के लिए मील का पत्थर साबित हुई. यहीं सलिल दा को मिला एक बेहद प्रतिभाशाली गायक -येसुदास. पहले फ़िल्म के सभी गीत येसु दा की आवाज़ में रिकॉर्ड हुए, पर सलिल दा को एक गीत "मानसा मयिले वरु" में कुछ कमी सी महसूस हो रही थी, उन्हें लगा कि यदि इस गीत को मन्ना डे गाते तो शायद और बेहतर हो पाता. बहरहाल मन्ना डे ने इस गीत को गाया और इतना खूब गाया कि मन्ना डे ने ख़ुद अपने एक इंटरव्यू में यह माना कि शायद ही उनका कोई प्रोग्राम हुआ हो जिसमें उन्हें ये गीत गाने की फरमाईश नही मिली हो. सुनते है पहले मन्ना दा की आवाज़ में वही गीत.



इस फ़िल्म में ही एक और गीत था "पुथन वलाकरे". इस एक ही गीत में सलिल दा ने बहुत से शेड्स दिए. बीच में एक पंक्ति आती है "चाकरा...चाकरा.." (जब मछुवारों को जाल भर मछलियाँ मिलती है ये उस समय का आह्लाद है) में जो धुन सलिल दा बनाई वो उस धुन को अपने जेहन से निकाल ही नही पा रहे थे. यही कारण था कि १९६५ में ही आई फ़िल्म "चंदा और सूरज" में उन्होंने उसी धुन पर "बाग़ में कली खिली" गीत बनाया. सुनते हैं दोनों गीत, पहले मलयालम गीत का आनंद ले येसुदास और साथियों की आवाज़ में, लिखा है वायलार रवि ने, जिन्होंने अपने सरल गीतों से साहित्य को जन जन तक पहुँचने का अनूठा काम किया. उनका जिक्र फ़िर कभी फिलहाल आनंद लें इस गीत का.



और अब सुनिए फ़िल्म चंदा और सूरज का वो मशहूर गीत आशा जी की आवाज़ में -



यहीं से शुरुआत हुई सलिल दा और येसुदास के संगीत संबंधों की, येसुदास को हिन्दी सिनेमा में लाने वाले भी अपने सलिल दा ही थे. कल हम बात करेंगे येसु दा पर विस्तार से. फिलहाल हम आपको छोड़ते हैं तनूजा पर फिल्माए गए इस गीत के विडियो के साथ जो कि बहुत खूब फिल्माया गया है, देखिये और आनंद लीजिये -




Monday, August 18, 2008

मोरा गोरा अंग लेई ले....- गुलज़ार, एक परिचय

गुलज़ार बस एक कवि हैं और कुछ नही, एक हरफनमौला कवि, जो फिल्में भी लिखता है, निर्देशन भी करता है, और गीत भी रचता है, मगर वो जो भी करता है सब कुछ एक कविता सा एहसास देता है. फ़िल्म इंडस्ट्री में केवल कुछ ही ऐसे फनकार हैं, जिनकी हर अभिव्यक्ति संवेदनाओं को इतनी गहराई से छूने की कुव्वत रखती है, और गुलज़ार उन चुनिन्दा नामों में से एक हैं, जो इंडस्ट्री की गलाकाट प्रतियोगी वातावरण में भी अपना क्लास, अपना स्तर कभी गिरने नही देते.


गुलज़ार का जन्म १९३६ में, एक छोटे से शहर दीना (जो अब पाकिस्तान में है) में हुआ, शायरी, साहित्य और कविता से जुडाव बचपन से ही जुड़ गया था, संगीत में भी गहरी रूचि थी, पंडित रवि शंकर और अली अकबर खान जैसे उस्तादों को सुनने का मौका वो कभी नही छोड़ते थे.
(चित्र में हैं सम्पूरण सिंह यानी आज के गुलज़ार)
गुलज़ार और उनके परिवार ने भी भारत -पाकिस्तान बँटवारे का दर्द बहुत करीब से महसूस किया, जो बाद में उनकी कविताओं में बहुत शिद्दत के साथ उभर कर आया. एक तरफ़ जहाँ उनका परिवार अमृतसर (पंजाब , भारत) आकर बस गया, वहीँ गुलज़ार साब चले आए मुंबई, अपने सपनों के साथ. वोर्ली के एक गेरेज में, बतौर मेकेनिक वो काम करने लगे और खाली समय में कवितायें लिखते. फ़िल्म इंडस्ट्री में उन्होंने बिमल राय, हृषिकेश मुख़र्जी, और हेमंत कुमार के सहायक के तौर पर काम शुरू किया. बिमल राय जो हमेशा नई प्रतिभाओं को आगे बढ़ने का मौका देते थे उनकी फ़िल्म ‘बंदनी’ के लिए गुलज़ार ने अपना पहला गीत लिखा. संगीत था, एस डी बर्मन का. धीरे धीरे गुलज़ार ने फिल्मों के लिए लिखना शुरू किया, हृषी दा और असित सेन के लिए, कुछ बहतरीन फिल्में उन्होंने लिखी जो कालजयी मानी जा सकती हैं, जिनमे आनंद (१९७०), गुड्डी (१९७१), बावर्ची (१९७२), नमक हराम (१९७३), दो दुनी चार (१९६८), खामोशी (१९६९) और सफर (१९७०) जैसी फिल्में शामिल हैं.



१९७१ में ही "मेरे अपने" से उन्होंने बतौर निर्देशक अपना सफर शुरू किया, १९७२ में आयी "परिचय" और "कोशिश" जो एक गूंगे बहरे दम्पति के जीवन पर आधारित कहानी थी, जिसमे अद्भुत काम किया संजीव कुमार और जाया भादुरी ने, इतना संवेदनशील विषय को इतने उत्कृष्ट रूप में परदे पर साकार कर गुलज़ार ने अपने आलोचकों को भी हैरान कर दिया. इस फ़िल्म के बाद शुरुवात हुई गुलज़ार और संजीव कुमार की दोस्ती की, इस दोस्ती ने हमें दीं, आंधी(१९७५), मौसम(1975), अंगूर(१९८१)और नमकीन(१९८२) जैसी नायाब फिल्में, जो यकीनन संजीव कुमार के अभिनय जीवन की बहतरीन फिल्में रहीं हैं. गुलज़ार ने जीतेन्द्र, विनोद खन्ना, हेमा मालिनी, डिम्पल कपाडिया जैसे व्यवसायिक सिनेमा के अभिनेताओं को उनके जीवन के बहतरीन किरदार जीना का मौका दिया, इन्ही फिल्मों की बदौलत इन कलाकारों की असली प्रतिभा जग जाहिर हुई, खुशबू, किनारा, परिचय, मीरा, अचानक, लेकिन जैसी फिल्में भला कौन भूल सकता है.

छोटे परदे पर भी गुलज़ार ने अपनी छाप छोडी, शुरुवात की धारावाहिक "मिर्जा ग़लिब" से, कहते हैं कि इस धारावाहिक के बजट को बनाये रखने के लिए गुलज़ार ने अपना पारिश्रमिक भी लेना छोड़ दिया था. नसीरुद्दीन शाह, ग़लिब बन कर आए, जगजीत सिंह के संगीत ने ग़लिब की शायरी को नया आकाश दे दिया, गुलज़ार ने जैसे अपने पसंदीदा शायर को फ़िर से जिंदा कर दिया. जंगल बुक, और पोटली बाबा की जैसे बहुत से धारावाहिकों में गुलज़ार साब के योगदान याद कीजिये ज़रा.

काफी समय तक गुलज़ार पार्श्व में रहे और लौटे १९९६ में फ़िल्म "माचिस" के साथ. आज भी गुलज़ार का नाम जिस फ़िल्म के साथ जुड़ जाता है, वो ढेरों फिल्मों की भीड़ में भी अलग पहचान बना जाती है.

गुलज़ार को अब तक ५ राष्ट्रीय पुरस्कार जिसमे फ़िल्म "कोशिश" में बहतरीन स्क्रीन प्ले, "मौसम" में सर्वश्रेष्ट निर्देशक, और फ़िल्म "इजाज़त" में सर्वश्रेष्ट गीतकार के लिए शामिल है मिल चुके हैं. १७ फिल्मफयेर पुरस्कार भी हैं खाते में, कहानी संग्रह "धुवाँ" के लिए साहित्य अकेडमी सम्मान, हस्ताक्षर है साहित्य में उनके योगदान का. बच्चों के लिए लिखी उनकी पुस्तक "एकता" को NCERT ने १९८९ में पुरुस्कृत किया. उनकी कविताओं की किताबें हम सब की लाईब्ररी का हिस्सा हैं, भला कैसे कोई बच सकता है इस जादूगर कलमकार से.

आज हम सब के प्रिये गुलज़ार साहब अपना ७२ वां जन्मदिन मना रहें हैं, क्यों न आज हम सुनें उनका वो सबसे पहला गीत जिसका जिक्र हमने उपर किया है, फ़िल्म "बंदनी" में यह गुलज़ार का एकमात्र गीत है, नूतन पर फिल्माया गए इस गीत के बारे में अब हम क्या कहें, बस सुनें देखें और आनंद लें. गीत की पृष्ठभूमि भी है साथ में, फ़िल्म की सिचुअशन के साथ कितना जबरदस्त न्याय किया है, गुलज़ार ने, ख़ुद ही देखिये.



आवाज़ पर हम गुलज़ार साहब पर निरंतर नयी जानकारियां आपके सामने लाते रहेंगे, फिलहाल तो बस इतना ही कहने का मन है कि - जन्मदिन मुबारक हो गुलज़ार साहब.

सोत्र इन्टरनेट, संकलन - सजीव सारथी

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