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Sunday, September 23, 2012

संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला : पं. श्रीकुमार मिश्र से बातचीत (२)



स्वरगोष्ठी ८९ में आज  

परदे वाले गजवाद्यों की मोहक अनुगूँज
 

‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ, मैं कृष्णमोहन मिश्र फिर एक बार आज की महफिल में उपस्थित हूँ और आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ। गत सप्ताह हमारे बीच जाने-माने इसराज और मयूरवीणा-वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र उपस्थित थे, जिन्होने गज-तंत्र वाद्य सारंगी के विषय में हमारे साथ विस्तृत चर्चा की थी। हमारे अनुरोध पर श्रीकुमार जी आज भी हमारे साथ हैं। आज हम उनसे कुछ ऐसे गज-तंत्र वाद्यों का परिचय प्राप्त करेंगे, जिनमें परदे होते हैं।


कृष्णमोहन : श्रीकुमार जी, ‘स्वरगोष्ठी’ के सुरीले मंच पर एक बार पुनः आपका हार्दिक स्वागत है। गत सप्ताह हमने आपसे सारंगी वाद्य के बारे में चर्चा की थी। आज इस श्रृंखला में एक और कड़ी जोड़ते हुए सारंगी के ही एक परिवर्तित रूप के बारे में जानना चाहते हैं। वर्तमान में इसराज, दिलरुबा, तार शहनाई और स्वयं आप द्वारा पुनर्जीवित वाद्य मयूरवीणा ऐसे वाद्य हैं, जो गज से बजाए जाते हैं, किन्तु इनमें सितार की भाँति परदे लगे होते हैं। इन परदे वाले गज-वाद्यों की विकास-यात्रा के बारे में बताएँ।

श्रीकुमार मिश्र : ‘स्वरगोष्ठी’ के संगीत-प्रेमियों को मेरा अभिवादन। संगीत-रत्नाकर, संगीतसार व संगीतराज आदि प्राचीन ग्रन्थों में निःशंकवीणा तथा पिनाकीवीणा का उल्लेख मिलता है। वर्तमान सारंगी इनका ही परिवर्तित और विकसित रूप हैं। परन्तु परदे वाले गज-वाद्यों का आविष्कार इन वाद्यों के बहुत बाद में हुआ। इस सम्बन्ध में प्रोफेसर रामकृष्ण ने ऋषि मतंग को किन्नरीवीणा का आविष्कारक कहा है। मतंग से पूर्व वीणा में परदे नहीं होते थे। उन्होने ही सर्वप्रथम वीणा पर सारिकाओं (परदों) की योजना की थी। डॉ. लालमणि मिश्र के मतानुसार आधुनिक युग के सभी तंत्रीवाद्य, जिन पर परदे हैं, किन्नरीवीणा के ही विकसित रूप हैं।

कृष्णमोहन : वर्तमान में प्रचलित परदे वाले वाद्यों का इतिहास कितना प्राचीन है?

श्रीकुमार मिश्र : यहाँ मैं पुनः डॉ. लालमणि मिश्र की पुस्तक का सन्दर्भ देना चाहूँगा। उनके मतानुसार लगभग दो सौ वर्ष पूर्व, दो प्रमुख कारणों से परदे वाले गज-वाद्यों का प्रचलन आरम्भ हुआ। पहला कारण तो यह था कि सारंगी की उपयोगिता आरम्भ से ही संगति वाद्य के रूप में ही रही। स्वतंत्र वादन के लिए सारंगी में परदे की आवश्यकता हुई। दूसरा कारण बताते हुए डॉ. लालमणि लिखते हैं कि लगभग दो शताब्दी पूर्व सारंगी पर पेशेवर संगीतज्ञों का एकाधिकार था। वे शिष्यों को सारंगी वादन की बारीकियाँ सिखाने से कतराते थे। ऐसे में सारंगी में सितार या सुरबहार की भाँति परदे लगा कर एक नए वाद्य की परिकल्पना की गई। परदायुक्त जो गज-वाद्य पहले प्रचलित हुआ, उसे इसराज नाम दिया गया। आरम्भ में यह वाद्य काफी बड़े आकार का था और इसकी कुण्डी मयूर की आकृति की थी, इसलिए इसे मयूरवीणा, ताऊस या मयूर इसराज नाम से पुकारा जाने लगा। बाद में इसकी कुण्डी और डाँड़ को छोटा कर दिया गया। आकृति में यह परिवर्तन बंगाल में हुआ और यह इसराज नाम से लोकप्रिय हुआ। छोटी कुण्डी वाले इसराज के प्रचलित हो जाने के बाद मयूर की आकृति वाले वाद्य विस्मृत से हो गए।

कृष्णमोहन : पाठकों को हम यह बता देना चाहते हैं कि मयूर की आकृति वाले विस्मृत वाद्य मयूरवीणा का पुनरोद्धार लगभग एक दशक पूर्व श्रीकुमार जी ने ही लखनऊ के वाद्य-निर्माता बादशाह भाई उर्फ बारिक अली के सहयोग से किया था। आइए, यहाँ थोड़ा विराम देकर श्रीकुमार जी का मयूरवीणा-वादन सुनते हैं। राग है मारूबिहाग और तबला संगति की है, भरत मिश्र ने।

मयूरवीणा वादन : राग मारूबिहाग : पं. श्रीकुमार मिश्र


कृष्णमोहन : परदायुक्त गजवाद्यों की विशेषताओं के बारे में भी कुछ बताएँ।

श्रीकुमार मिश्र : इस वर्ग के वाद्यों के निर्माण से स्वतंत्र अथवा एकल वादन के क्षेत्र में गजवाद्यों की सम्भावनाएँ काफी विस्तृत हो गईं। पहले बंगाल में और फिर पंजाब में इसराज बेहद लोकप्रिय हुआ। इस लोकप्रियता का कारण है, इसमें लगे परदे और धातु के तार। परदे और धातु के तारों से उँगलियों के स्पर्श और क्रियाकलापों से उत्पन्न होने वाली कलात्मक लड़ियाँ, कण, गमक, सूत आदि में एक अलग प्रकार की खनक कायम हुई। सुनने में ऐसा लगता है मानो सितार और सारंगी का युगल वादन हो रहा है। इसराज का ही एक लघु रूप दिलरुबा है, जिसका प्रचलन पंजाब में खूब हुआ। दिलरुबा का चलन बढ़ जाने के कारण लगभग एक शताब्दी पूर्व पंजाब में मयूर इसराज या मयूरवीणा की लोकप्रियता समाप्त हो गई थी।

कृष्णमोहन : यहाँ पर एक और विराम लेकर, संगीत-प्रेमियों को हम दिलरुबा-वादन सुनवाते है। उस्ताद रणवीर सिंह प्रस्तुत कर रहे हैं, दिलरुबा पर राग तिलंग का वादन।

दिलरुबा वादन : राग तिलंग : उस्ताद रणवीर सिंह


कृष्णमोहन : इसराज वाद्य की विशेषताओं के बारे में हमारे पाठकों-श्रोताओं को परिचित कराइए।

श्रीकुमार मिश्र : आघात से बजने वाले और गज से बजने वाले, दोनों प्रकार के वाद्यों के गुण एक वाद्य में आ जाने के कारण इसराज, गतकारी का कौशल प्रदर्शित करने के लिए एक आदर्श वाद्य बन गया। बंगाल में यह अत्यन्त प्रतिष्ठित हुआ। पिछले ५०-६० वर्षों में सितार, सरोद, संतूर, वायलिन आदि वाद्यों की लोकप्रियता बढ़ने के कारण इसराज की लोकप्रियता में कमी अवश्य आई है।

कृष्णमोहन : हमारे पास बंगाल के ही चर्चित इसराज वादक पं. बुद्धदेव दास की एक रिकार्डिंग है, जिसे हम अपने पाठकों-श्रोताओं के लिए प्रस्तुत कर रहे है। श्री दास ने इसराज पर राग सिन्धु भैरवी का वादन किया है।

इसराज वादन : राग सिंधु भैरवी : पं. बुद्धदेव दास


कृष्णमोहन : इसी के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक को यहीं विराम देते हैं और पं. श्रीकुमार मिश्र जी के प्रति हृदय से आभार व्यक्त करते हैं।

श्रीकुमार मिश्र : यह मेरा सौभाग्य है कि ‘स्वरगोष्ठी’ के संगीत-प्रेमियों के बीच आने का मुझे अवसर मिला। मैं आप सब पाठकों-श्रोताओं को धन्यवाद देता हूँ।

आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की आज की संगीत-पहेली में हम आपको कण्ठ-संगीत प्रस्तुति का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछेंगे। ९०वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले प्रतिभागी श्रृंखला के विजेता होंगे।



१ - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह रचना किस राग में निबद्ध है?

२ – यह भारतीय संगीत की कौन सी शैली है?
आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ९१वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के ८७वें अंक में हमने आपको सुप्रसिद्ध सारंगी वादक पं. रामनारायण की बजायी एक ठुमरी का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग पीलू और दूसरे का सही उत्तर है- सारंगी वाद्य। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर जबलपुर की क्षिति तिवारी और मीरजापुर (उ.प्र.) के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। दोनों विजेताओं को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का
  
मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के आगामी अंक से हम एक नई लघु श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं, जिसके अन्तर्गत बीते युग के कुछ भूले-बिसरे स्वरों को आप सुनेंगे। यही नहीं इन मूर्धन्य कलासाधकों की पारम्परिक रचनाओं को बाद में भारतीय फिल्मों में भी शामिल किया गया। आपके लिए हम इन रचनाओं के दोनों रूप प्रस्तुत करेंगे। अगले रविवार को प्रातः ९-३० पर आयोजित अपनी इस गोष्ठी में आप अवश्य पधारिए। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।

कृष्णमोहन मिश्र

Sunday, January 22, 2012

‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’ : गीत के बहाने, चर्चा राग- भीमपलासी की


महात्मा गाँधी ने अपने जीवनकाल में एकमात्र फिल्म ‘रामराज्य’ देखी थी। १९४३ में प्रदर्शित इस फिल्म का निर्माण प्रकाश पिक्चर्स ने किया था। इस फिल्म के संगीत निर्देशक अपने समय के जाने-माने संगीतज्ञ पण्डित शंकरराव व्यास थे। बहुमुखी प्रतिभा के धनी, व्यासजी की कुशलता केवल फिल्म संगीत निर्देशन के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि शास्त्रीय गायन, संगीत शिक्षण और ग्रन्थकार के रूप में भी सुरभित हुई। फिल्म ‘रामराज्य’ में पण्डित जी ने राग भीमपलासी के स्वरों में एक गीत संगीतबद्ध किया था। आज हमारी गोष्ठी में यही गीत, राग और इसके रचनाकार, चर्चा के विषय होंगे।
SWARGOSHTHI – 53 – Pandit Shankar Rao Vyas

‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ, मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार फिर इस सांगीतिक बैठक में उपस्थित हूँ। आज हम लगभग सात दशक पहले की एक फिल्म ‘रामराज्य’ के एक गीत- ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’ और इस गीत के संगीतकार पण्डित शंकरराव व्यास के व्यक्तित्व-कृतित्व पर चर्चा करेंगे। कल २३ जनवरी को इस महान संगीतज्ञ की ११३वीं जयन्ती है। इस अवसर के लिए हम आज उन्हें स्वरांजलि अर्पित कर रहे हैं।

कोल्हापुर में २३ जनवरी, १८९८ में पुरोहितों के परिवार में जन्मे शंकरराव व्यास के पिता गणेश पन्त, कथा-वाचक के साथ संगीत-प्रेमी भी थे। संगीत के संस्कार उन्हें अपने पिता से ही प्राप्त हुए। दुर्भाग्यवश जब शंकरराव आठ वर्ष के थे तब उनके पिता का देहान्त हो गया। पिता के देहान्त के बाद वे अपने चाचा श्रीकृष्ण सरस्वती के आश्रित हुए। उन्हीं दिनों पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर भारतीय संगीत की दयनीय स्थिति से उबारने के लिए पूरे महाराष्ट्र में भ्रमण कर रहे थे और उनकी अगली योजना पूरे देश में संगीत के प्रचार-प्रसार की थी। बालक शंकरराव के संगीत-ज्ञान और उत्साह देख कर पलुस्कर जी ने उन्हें अपने साथ ले लिया। पलुस्कर जी द्वारा स्थापित गान्धर्व विद्यालय में ही उन्होने ९ वर्ष तक संगीत शिक्षा प्राप्त की और अहमदाबाद के राष्ट्रीय विद्यालय में संगीत शिक्षक हो गए। इसी बीच पलुस्कर जी ने लाहौर में संगीत विद्यालय की स्थापना की और शंकरराव को वहीं प्रधानाचार्य के पद पर बुला लिया। लाहौर में संगीत विद्यालय विधिवत स्थापित हो जाने और सुचारु रूप से संचालित होने के बाद वे अहमदाबाद आए और यहाँ भी ‘गुजरात संगीत विद्यालय’ की स्थापना भी की। १९३४ में उन्होने गान्धर्व संगीत महाविद्यालय स्थापित किया। इस बीच उन्होने संगीत शिक्षण के साथ-साथ संगीत सम्मेलनों में भाग लेना भी जारी रखा।

१९३८ में ४० वर्ष की आयु में शंकरराव व्यास ने फिल्म संगीत के क्षेत्र में पदार्पण किया। १९३८ में रमणलाल बसन्तलाल के उपन्यास पर बनी फिल्म ‘पूर्णिमा’ में कई गीत गाये थे। गायन के साथ-साथ फिल्मों की संगीत रचना के क्षेत्र में भी उनका वर्चस्व कायम हो चुका था। व्यास जी के संगीतबद्ध, भक्ति प्रधान और नीति पधान गीत गली-गली गूँजने लगे थे। १९४० में ‘सरदार’, ‘नरसी भगत’ और १९४२ में ‘भरतमिलाप’ फिल्मों के गीत लोकप्रियता के शिखर पर थे। इसी समय १९४३ में प्रकाश पिक्चर्स की फिल्म ‘रामराज्य’ प्रदर्शित हुई। भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के दौर में प्रदर्शित फिल्म ‘रामराज्य’ में दर्शकों को गाँधीवादी रामराज्य की परिकल्पना परिलक्षित हो रही थी। इस फिल्म के राग आधारित गीत भी अत्यन्त जनप्रिय हुए थे, विशेष रूप से फिल्म में लव और कुश चरित्रों पर फिल्माया गया गीत ‘भारत की एक सन्नारी की हम कथा सुनाते हैं...’ और राजमहल में फिल्माया गया गीत ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’। पण्डित शंकरराव व्यास ने इन दोनों गीतों को क्रमशः काफी और भीमपलासी के स्वरों में बाँधा था। आज हमारी चर्चा में रमेश चन्द्र गुप्ता के लिखे, शंकरराव व्यास के संगीतबद्ध किए और राग भीमपलासी पर आधारित गीत ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’ ही है। आइए, पहले हम यह गीत सुनते हैं।

फिल्म – रामराज्य : ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’ : स्वर – सरस्वती राणे


राग ‘भीमपलासी’ भारतीय संगीत का एक ऐसा राग है, जिसमें भक्ति और श्रृंगार रस की रचनाएँ खिल उठती है। यह औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात आरोह में पाँच स्वर- सा, , म, प, नि, सां और अवरोह में सात स्वर- सां नि, ध, प, म , रे, सा प्रयोग किए जाते हैं। इस राग में गंधार और निषाद कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। यह काफी थाट का राग है और इसका वादी और संवादी स्वर मध्यम और तार सप्तक का षडज होता है। कभी-कभी वादी स्वर मध्यम के स्थान पर पंचम का प्रयोग भी किया जाता है। ‘भीमपलासी’ के गायन-वादन का समय दिन का चौथा प्रहर होता है। आइए, अब हम आपको विश्वविख्यात सितार-वादक पण्डित रविशंकर का बजाया राग ‘भीमपलासी’ सुनवाते हैं। सितार के स्वरों में आप फिल्म ‘रामराज्य’ के गीत ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’ के स्वरों को खोजने का प्रयास करें।

सितार वादन : राग – भीमपलासी : वादक – पं. रविशंकर


आपने राग ‘भीमपलासी’ की बेहद मधुर प्रस्तुति का आनन्द प्राप्त किया। इस प्रस्तुति में पण्डित रविशंकर ने आलाप, जोड़ और झाला-वादन किया है। कर्नाटक संगीत पद्यति में ‘भीमपलासी’ के समतुल्य राग है ‘आभेरी’। ‘भीमपलासी’ एक ऐसा राग है, जिसमें खयाल-तराना से लेकर भजन-ग़ज़ल की रचनाएँ संगीतबद्ध की जाती हैं। श्रृंगार और भक्ति रस की अभिव्यक्ति के लिए यह वास्तव में एक आदर्श राग है। आइए अब हम आपको इसी राग में कण्ठ संगीत का एक मोहक उदाहरण सुनवाते हैं। पण्डित जसराज वर्तमान में भारतीय संगीत के वरिष्ठ संगीतज्ञों की सूची में शिखर पर हैं। उन्हीं के स्वर में अब हम राग ‘भीमपलासी’ का द्रुत तीनताल में निबद्ध एक खयाल आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसके बोल हैं- ‘जा जा रे अपने मन्दिरवा...’

खयाल गायन : राग भीमपलासी : तीनताल : स्वर – पण्डित जसराज


अब हम आज के अंक को यहीं विराम देते हैं और आपको इस सुरीली संगोष्ठी में सादर आमंत्रित करते हैं। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सब के बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। हम आपके सुझाव, समालोचना, प्रतिक्रिया और फरमाइश की प्रतीक्षा करेंगे और उन्हें पूरा सम्मान देंगे। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा swargoshthi@gmail.com या admin@radioplaybackindia.com पर अपना सन्देश भेज कर हमारी गोष्ठी में शामिल हो सकते हैं। आज हम आपसे यहीं विदा लेते हैं, अगले अंक में हमारी-आपकी पुनः सांगीतिक बैठक आयोजित होगी।

झरोखा अगले अंक का

ब्रिटिश शासन के विरुद्ध चले स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान भारतीय जनमानस में चेतना जगाने और स्वतन्त्रता सेनानियों को शक्ति प्रदान करने के उद्देश्य से अनेक कवियों और गीतकारों ने अपनी रचनाओं से क्रान्ति का अलख जगाया था। ऐसे असंख्य गीतों को तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने जब्त कर प्रतिबन्धित कर दिया था। गणतन्त्र दिवस पर ‘स्वरगोष्ठी’ के विशेष अंक में हम ऐसे ही कुछ दुर्लभ गीतो पर आपसे चर्चा करेंगे। ब्रिटिश काल का एक ऐसा भी प्रतिबन्धित गीत है, जिसका उच्चारण करते हुए असंख्य बलिदानी फाँसी पर झूल गए थे और जिसे स्वतंत्र भारत के संविधान ने सर्वोच्च पद पर प्रतिष्ठित किया है। क्या आप हमें उस गीत का शीर्षक बता सकते हैं? आप हमें इस गीत का शीर्षक बताइए और अगले अंक में हम विजेता के रूप में आपका नाम घोषित करेंगे।

कृष्णमोहन मिश्र

Sunday, October 2, 2011

सुर संगम में आज - इसराज की मोहक ध्वनि और पण्डित श्रीकुमार मिश्र

सुर संगम- 37 – सितार और सारंगी, दोनों के गुण हैं इन वाद्यों में
(दूसरा भाग)


पढ़ें पहला भाग

राग-रस-रंग की सुरीली महफिल ‘सुर संगम’ के एक और नये अंक में कृष्णमोहन मिश्र की ओर से आपका हार्दिक स्वागत है। गत सप्ताह हमने एक ऐसे लुप्तप्राय तंत्रवाद्य 'मयूरी वीणा' पर चर्चा आरम्भ की थी, जिसका चलन लगभग एक शताब्दी पूर्व समाप्त हो चुका था, किन्तु भारतीय संगीत के क्षेत्र में समय-समय पर ऐसे भी संगीतकार हुए हैं, जिन्होने लुप्तप्राय वाद्यों और संगीत-शैलियों का पुनरोद्धार किया है। जाने-माने इसराज-वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र एक ऐसे ही कलासाधक हैं, जिन्होने विभिन्न संगीत-ग्रन्थों का अध्ययन कर लगभग लुप्त हो चुके तंत्रवाद्य 'मयूरी वीणा' का नव-निर्माण किया। पिछले अंक में हमने पंजाब में इस वाद्य के विकास पर आपसे चर्चा की थी। आज के अंक में हम बंगाल में वाद्य के विकास की पंडित श्रीकुमार मिश्र द्वारा दी गई जानकारी आपसे बाँटेंगे।

बंगाल के विष्णुपुर घराने के रामकेशव भट्टाचार्य सुप्रसिद्ध ताऊस अर्थात मयूरी वीणा वादक थे। उन्होने भी इस वाद्य को संक्षिप्त रूप देने के लिए इसकी कुण्डी से मोर की आकृति को हटा दिया और इस नए स्वरूप का नाम 'इसराज' रखा। पंजाब का 'दिलरुबा' और बंगाल का 'इसराज' दरअसल एक ही वाद्य के दो नाम हैं। दोनों की उत्पत्ति 'मयूरी वीणा' से हुई है। इस श्रेणी के वाद्य वर्तमान सितार और सारंगी के मिश्रित रूप है। इसराज या दिलरुबा वाद्यों की उत्पत्ति के बाद ताऊस या मयूरी वीणा का चलन प्रायः बन्द हो गया था। लगभग दो शताब्दी पूर्व इसराज की उत्पत्ति के बाद अनेक ख्यातिप्राप्त इसराज-वादक हुए हैं। रामपुर के सेनिया घराने के सुप्रसिद्ध वादक उस्ताद वज़ीर खाँ कोलकाता में १८९२ से १८९९ तक रहे। इस दौरान उन्होने अमृतलाल दत्त को सुरबहार और इसराज-वादन की शिक्षा दी। उस्ताद अलाउद्दीन खाँ, जो उस्ताद वज़ीर खाँ के शिष्य थे, ने भी कोलकाता में इसराज-वादन की शिक्षा ग्रहण की थी। बंगाल के वादकों में स्वतंत्र वादन की परम्परा भी अत्यन्त लोकप्रिय थी। इसराज पर चमत्कारिक गतकारी शैली का विकास भी बंगाल में ही हुआ।

गया घराने के सूत्रधार हनुमान दास (१८३८-१९३६) कोलकाता में निवास करते थे और स्वतंत्र इसराज-वादन करते थे। हनुमान दास जी के शिष्य थे- कन्हाईलाल ठेडी, हाबू दत्त, कालिदास पाल, अवनीन्द्रनाथ ठाकुर, सुरेन्द्रनाथ, दिनेन्द्रनाथ, ब्रजेन्द्रकिशोर रायचौधरी, प्रकाशचन्द्र सेन, शीतल चन्द्र मुखर्जी आदि। ब्रजेन्द्रकिशोर रायचौधरी और प्रकाशचन्द्र सेन से सेनिया घराने के सितार-वादक इमदाद खाँ ने इसराज-वादन की शिक्षा ग्रहण की थी। कोलकाता में ही मुंशी भृगुनाथ लाल और इनके शिष्य शिवप्रसाद त्रिपाठी ‘गायनाचार्य’ इसराज वादन करते थे। शिवप्रसाद जी के शिष्य थे रामजी मिश्र व्यास। वर्तमान में सक्रिय इसराज-वादक और ‘मयूरी वीणा’ के वर्तमान स्वरूप के अन्वेषक पण्डित श्रीकुमार मिश्र, पं॰ रामजी मिश्र व्यास के पुत्र और शिष्य हैं। अपने पिता से दीक्षा लेने के अलावा इन्होने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से संगीत में स्नातकोत्तर शिक्षा भी ग्रहण की है। ‘ताऊस अर्थात मयूरी वीणा’ से उत्पन्न ‘दिलरुबा’ तथा ‘इसराज’ वाद्य का प्रचलन पंजाब, गुजरात और महाराष्ट्र में अधिक रहा है। सिख समाज और रागी कीर्तन के साथ इस वाद्य का प्रचलन आज भी है। पंजाब के भाई वतन सिंह (निधन-१९६६) प्रसिद्ध दिलरुबा-वादक थे। फिल्म-संगीतकारों में रोशन और एस.डी. बातिश इस वाद्य के कुशल वादक रहे हैं।


गुजरात के नागर दास और उनके शिष्य मास्टर वाडीलाल प्रख्यात दिलरुबा-वादक थे। इनके शिष्य कनकराय त्रिवेदी ने दो उँगलियों की वादन तकनीक का प्रयोग विकसित किया था। त्रिवेदी जी ने इसी तकनीक की शिक्षा श्रीकुमार जी को भी प्रदान की है। वर्तमान में ओमप्रकाश मोहन, चतुर सिंह, और भगत सिंह दिलरुबा के और अलाउद्दीन खाँ तथा विजय चटर्जी इसराज के गुणी कलाकार हैं। श्रीकुमार मिश्र एकमात्र ऐसे कलाकार हैं, जो परम्परागत इसराज के साथ-साथ स्वविकसित ‘मयूरी वीणा’ का भी वादन करते हैं। आइए अब हम आपको सुनवाते हैं पण्डित श्रीकुमार मिश्र का बजाया इसराज पर राग मधुवन्ती। तबला संगति ठाकुर प्रसाद मिश्र ने की है। आप इस सुरीले वाद्य पर मोहक राग का आनन्द लीजिए और मुझे आज यहीं अनुमति दीजिये।

इसराज वादन : राग मधुवन्ती : कलाकार – श्रीकुमार मिश्र


अब समय आ चला है आज के 'सुर-संगम' के अंक को यहीं पर विराम देने का। अगले रविवार को हम एक और शास्त्रीय अथवा लोक कलासाधक के साथ पुनः उपस्थित होंगे। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई होगी। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तम्भ को और रोचक बना सकते हैं! आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६:३० अमित जी द्वारा प्रस्तुत 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!

संलग्न चित्र परिचय

१- इसराज वाद्य
२- तीन तन्त्रवाद्यों का अनूठा संगम (बाएँ से) श्रीकुमार मिश्र (इसराज), विनोद मिश्र (सारंगी) और भानु बनर्जी (वायलिन).
३- सुप्रसिद्ध फिल्म संगीतकार और गायक एस.डी. बातिश दिलरुबा वादन करते हुए : एक दुर्लभ चित्र.



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Sunday, September 25, 2011

मयूरी वीणा के उद्धारक और वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र

सुर संगम- 36 – दो तंत्रवाद्यों का समागम है, मयूरी वीणा, दिलरुबा अथवा इसराज में (पहला भाग)


सुर संगम के एक नये अंक में आप सब संगीतनुरागियों का, मैं कृष्णमोहन मिश्र हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज के अंक में हम आपसे एक ऐसे पारम्परिक तंत्रवाद्य पर चर्चा करेंगे, जिसमें दो वाद्यों के गुण उपस्थित होते हैं। वैदिक काल से ही तंत्रवाद्य के अनेक प्रकार प्रचलन में रहे हैं। प्राचीन काल में गज (Bow) से बजने वाले तंत्रवाद्यों में ‘पिनाकी वीणा’, ‘निःशंक वीणा’, ‘रावणहस्त वीणा’ आदि प्रमुख रूप से प्रचलित थे। आधुनिक समय में इन्हीं वाद्यों का विकसित और परिमार्जित रूप ‘सारंगी’ और ‘वायलिन’ सर्वाधिक लोकप्रिय है। तंत्रवाद्य का एक दूसरा प्रकार है, जिसे गज (Bow) के बजाय तारों पर आघात (Stroke) कर स्वरों की उत्पत्ति की जाती है। प्राचीन काल में इस श्रेणी में ‘रुद्र वीणा’, ‘सरस्वती वीणा’, ‘शततंत्री वीणा’ आदि प्रचलित थे, तो आधुनिक काल में ‘सितार’, ‘सरोद’, ‘संतूर’ आदि आज लोकप्रिय हैं।


इन दोनों प्रकार के प्राचीन वाद्यों की अपनी अलग-अलग विशेषताएँ हैं। प्राचीन गजवाद्यों में नाद पक्ष का गाम्भीर्य उपस्थित रहता है, जबकि आघात से बजने वाले तंत्रवाद्यों में संगीत के चंचल प्रवृत्ति की अधिकता होती है। मध्यकाल में खयाल शैली के विकास के साथ ही कुछ ऐसे वाद्यों का आविष्कार भी हुआ, जिसमें यह दोनों गुण उपस्थित हों। ताऊस (मयूरी वीणा), इसराज अथवा दिलरुबा आदि ऐसे ही वाद्य हैं। इस श्रेणी के वाद्यों की बनावट में सितार और सारंगी का मिश्रित रूप होता है। डाँड (दण्ड) का भाग सितार की तरह होता है जिसमें पर्दे लगे होते हैं, जिस पर उँगलियाँ फिरा कर स्वर-परिवर्तन किया जाता है। इस वाद्य का निचला सिरा अर्थात कुंडी, सारंगी की भाँति होती है, जिस पर खाल मढ़ी होती है। सारंगी अथवा वायलिन की तरह इसे गज से बजाया जाता है। ताऊस अथवा मयूरी वीणा का प्रचलन मुगल काल में मिलता है, किन्तु इसकी उत्पत्ति के विषय कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में पंजाब के कपूरथला घराने के उस्ताद मीर रहमत अली खाँ सुप्रसिद्ध ताऊस वादक थे, जिनके शिष्य महन्त गज़्ज़ा सिंह थे। महन्त जी पंजाब के भटिण्डा ज़िले के पास स्थित गुरुसर ग्राम के निवासी थे और कपूरथला रियासत के दरबारी कलाकार थे। महन्त गज़्ज़ा सिंह प्रख्यात ताऊस वादक थे। उन दिनों ताऊस अथवा मयूरी वीणा का आकार काफी बड़ा हुआ करता था। महन्त जी ने इसका आकार थोड़ा छोटा इस प्रकार से किया कि वाद्य की ध्वनि में विशेष अन्तर न हो। इस प्रयास में उन्होने ताऊस की कुंडी से मयूर की आकृति को अलग कर दिया और वाद्य के इस नये रूप का नाम ‘दिलरुबा’ रख दिया। इसके अलावा पटियाला दरबार के भाई काहन सिंह भी कुशल ताऊस वादक थे। महन्त गज़्ज़ा सिंह द्वारा ताऊस के परिवर्तित रूप ‘दिलरुबा’ का प्रचलन आज भी है। पंजाब के कई संगीतकार इस वाद्य का सफलतापूर्वक प्रयोग कर रहे हैं। पंजाब के कलासाधक रणवीर सिंह, राज एकेडमी में नई पीढ़ी को दिलरुबा वादन की शिक्षा देते हैं। आगे बढ़ने से पहले आइए रणवीर जी का दिलरुबा पर बजाया राग तिलंग की एक रचना सुनवाते हैं।

दिलरुबा वादन : राग तिलंग : कलाकार – रणवीर सिंह


आज हम आपका परिचय तंत्रवाद्य के एक ऐसे कलासाधक से कराते हैं जिन्होने संगीत के प्राचीन और आधुनिक ग्रन्थों में वर्णित मयूरी वीणा का अध्ययन कर वर्तमान मयूरी वीणा का निर्माण कराया। मूलतः इसराज वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र ने इस कार्य को अपनी देख-रेख में लगभग डेढ़ दशक पूर्व कराया था। आज के ताऊस अथवा मयूरी वीणा की संरचना में लखनऊ के संगीत-वाद्यों के निर्माता बारिक अली उर्फ बादशाह भाई का योगदान रहा। वाद्य को नया जन्म देने के बाद श्रीकुमार जी अपने इस मयूरी वीणा का अनेक बार विभिन्न संगीत समारोहों और गोष्ठियों में वादन कर चुके हैं। श्रीकुमार जी के इसराज वादन पर चर्चा हम अगले अंक में जारी रखेंगे। आज के अंक को विराम देने से पहले उनके द्वारा पुनर्जीवित ताऊस अर्थात मयूरी वीणा का वादन सुनवाते हैं। इस रिकॉर्डिंग में श्रीकुमार मिश्र राग रागेश्वरी का वादन कर रहे हैं। तबला संगति पार्थ मुखर्जी ने की है।

मयूरी वीणा वादन : राग रागेश्वरी : कलाकार – पं. श्रीकुमार मिश्र


अब समय आ गया है आज के 'सुर-संगम' के अंक को यहीं पर विराम देने का। अगले रविवार को इस आलेख के दूसरे भाग के साथ हम पुनः उपस्थित होंगे। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई होगी। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तम्भ को और रोचक बना सकते हैं! आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६:३० 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

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