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Sunday, September 11, 2011

उपन्यास में वास्तविक जीवन की प्रतिष्ठा हुई रविन्द्र युग में - माधवी बंधोपाध्याय

सुर संगम - 34 -रवीन्द्रनाथ ठाकुर की सार्द्धशती वर्ष-२०११ पर श्रद्धांजलि (दूसरा भाग)

बांग्ला और हिन्दी साहित्य की विदुषी श्रीमती माधवी बंद्योपाध्याय से कृष्णमोहन मिश्र की रवीन्द्र साहित्य और उसके हिन्दी अनुवाद विषयक चर्चा
पहला भाग पढ़ें
‘सुर संगम’ के आज के अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। दोस्तों, गत सप्ताह के अंक में हमने आपको बांग्ला और हिन्दी साहित्य की विदुषी श्रीमती माधवी बंद्योपाध्याय से रवीन्द्र-साहित्य पर बातचीत की शुरुआत की थी। पिछले अंक में माधवी जी ने रवीन्द्र-साहित्य के विराट स्वरूप का परिचय देते हुए रवीन्द्र-संगीत की विविधता के बारे में चर्चा की थी। आज हम उससे आगे बातचीत का सिलसिला आरम्भ करते हैं।

कृष्णमोहन- माधवी दीदी, नमस्कार और एक बार फिर स्वागत है,"सुर संगम" के मंच पर। पिछले अंक में आपने रवीन्द्र संगीत पर चर्चा आरम्भ की थी और प्रकृतिपरक गीतों की विशेषताओं के बारे में हमें बताया। आज हम आपसे रवीन्द्र संगीत की अन्य विशेषताओं के बारे में जानना चाहते हैं।

माधवी दीदी- सभी पाठकों को नमस्कार करती हुई आज मैं विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर के देशात्मबोधक गीतों पर कुछ चर्चा करना चाहती हूँ। सन् १९०५ में बंगभग आन्दोलन के समय उन्होंने बहुत सारे देशात्मबोधक गीतों की रचना की थी जिसने देशवासियों के मन को देशप्रेम से ओत-प्रोत कर दिया था। केवल यही नहीं उन्होंने दो राष्ट्रों के लिए दो राष्ट्रगीत भी लिखे। भारत के लिए "जन गण मन..." और बांग्लादेश के लिए "ओ आमार देशेर माटि..."।

कृष्णमोहन- माधवी दी’, भारतीय संगीत की विधाओं में रवीन्द्र संगीत को भी महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। हम आपसे यह जानना चाहते हैं कि रवीन्द्र संगीत में रागों का महत्त्व कितना होता है?

माधवी दीदी- रवीन्द्रनाथ, शास्त्रीय संगीत तथा रागों के पूर्ण रूप से ज्ञाता थे। पर उनके संगीत को राग-रागिनी ने एक सीमा तक ही प्रभावित किया। रवीन्द्र संगीत की मर्मवाणी है, भाषा, भाव और रस। रागों को रवीन्द्रनाथ, अपने संगीत में एक सीमा तक व्यवहार करते थे। यह सीमा वहीं तक है कि राग शब्द, भाव और रस पर आरोपित न हो, बल्कि भावभिव्यक्ति में वह सहायक हो। वे कहते थे कि यदि रवीन्द्र संगीत पूर्णतया रागों पर आधारित कर दिया जाय तो संगीत पूर्णतया शास्त्रगत तथा व्याकरण-सम्मत बन जायगा और इसका भाव, रस और सुर-माधुर्य लुप्त हो जायगा। यद्यपि रवीन्द्रनाथ स्वररोपण करते समय अपने सुर के साथ एक नहीं कई रागों का मिश्रण कर देते थे, उसके बावजूद उसमें ऐसा प्राण-संचार होता था कि वह रागाश्रयी होने की जगह भावाश्रयी बनकर कानों में गूँजते हैं और हृदय को स्पर्श करते हैं।

कृष्णमोहन- माधवी जी, आपने रवीन्द्र संगीत के विषय में बहुत अच्छी जानकारी दी। यहाँ थोड़ा रुक कर हम अपने पाठकों/श्रोताओं को रवीन्द्र संगीत का एक ऐसा उदाहरण सुनवाते हैं, जो मूल बांग्ला का हिन्दी काव्यान्तरण है। इस गीत को स्वर दिया है, "विश्वभारती विश्वविद्यालय" के संगीत विभाग के प्राध्यापक मोहन सिंह खंगूरा ने। आइए, सुनते हैं, बांग्ला गीत –"आजि झोरेर राते तोमार अभिसार...." का हिन्दी अनुवाद-

रवीद्र संगीत (हिन्दी अनुवाद) : "आज आँधी की रात..." : स्वर – मोहन सिंह खंगूरा


कृष्णमोहन- माधवी जी, अत्यन्त मधुर गीत सुनने के बाद अब मैं आपसे अनुरोध करूँगा कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर के कथा-साहित्य के विषय में कुछ बताइए।

माधवी दीदी- कृष्णमोहन जी, रवीन्द्रनाथ की विशाल साहित्य-परिधि के विषय में जितना कहा जाय उतना ही कम है। कथा-साहित्य के क्षेत्र में विगत शताब्दी के प्रथमार्द्ध को रवीन्द्र-युग कहा जाता है। बंकिम युग के पश्चात् रवीन्द्रनाथ ने उपन्यास में नये युग की अवतारणा की। उन्होंने उपन्यास में आधुनिक युग की स्थापना की। रवीन्द्र-युग की दो विशेषताएँ है- एक, बंकिमचन्द्र के ऐतिहासिक युग का तिरोभाव और दूसरा- सामाजिक उपन्यास के रूप में एक सूक्ष्मतर और व्यापक वास्तविकता का प्रवर्त्तन। बंकिमचन्द्र का उपन्यास, इतिहास और अपूर्व कल्पनाशक्ति का द्योतक था। उन्होंने इतिहास का सिंहद्वार खोलकर उसमें जान फूँक दिया था। पर रवीन्द्र-युग के उपन्यास में इतिहास और कल्पना हट गई और सामाजिकता तथा वास्तविकता ने सम्पूर्ण रूप से स्थान ग्रहण कर लिया। उपन्यास में वास्तविक जीवन की प्रतिष्ठा हुई। वैसे रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने बहुत सारे उत्कृष्ट उपन्यासो की रचना की है-‘चोखेर बालि’, ‘विषवृक्ष’, घरे बाहिरे, ‘गोरा’, ‘नवनीत’, ‘चार अध्याय’, ‘जोगाजोग’, ‘चतुरंग’, ‘शेषेर कविता’ इत्यादि। पर उनका ‘गोरा’ उपन्यास सर्वश्रेष्ठ है। कल्पना जगत से निकलकर यथार्थवाद को आधार बनाकर जो सर्वश्रेष्ट उपन्यास उन्होंने लिखा, वह है ‘गोरा’। १९०९ में लिखे गए इस उपन्यास का विस्तार और परिधि एक साधारण उपन्यास से बहुत अधिक है। इसमें एक महाकाव्य की विशेषता और महाकाव्य के लक्षण दिखते हैं। इसमें जितने में चरित्र लिये गये हैं, उनकी केवल व्यक्तिगत जीवन की या साधारण जीवन की छवि ही अंकित नहीं की गयी है। उन्हें हम तरह-तरह के आन्दोलन में, धर्मगत् संघर्ष में, राजनैतिक भावनाओं में प्रतिनिधित्व करते हुए पाते हैं। जीवन के ये सारे संघर्ष, उनके जीवन-आदर्श की कहानी उन्हें एक वृहत्तर संस्था के रूप में पाठकों के सामने स्थापित करती हैं।

गोरा, सुचरिता, विनय, ललिता, परेश बाबू, आनन्दमयी, इन सभी के चरित्र-विस्तार में, क्रियाकलाप में, संकल्प से, उस समय के बंगदेश में, उस विशिष्ट्य युग-सन्धिक्षण में फैला हुआ समस्त विक्षोभ, आलोड़ल और चांचल्य की छवि परिस्फुट होती है। उस समय धर्म-विप्लव एक विशेष समस्या के रूप में सामने आया था। इस उपन्यास के चरित्रों के संकल्पों के माध्यम से पता चलता है कि उन दिनों समाज में सनातनपन्थ तथा नवीनपन्थ दो धर्ममार्ग विद्यमान थे। लोग अपने-अपने विचार तथा युक्तितर्क द्वारा उसकी पुष्टि करते थे। इसमें एक भावना को और उजागर किया गया है- मानव का देशात्म-बोध और नारी की जागरूकता। गोरा की जन्म-कथा तो उपन्यास की रूपरेखा है। समस्त धार्मिक विचारों के ऊपर मानव सत्य है। गोरा को एक आइरिसमैन के रूप में अंकित करना रवीन्द्रनाथ ठाकुर का लेखन कौशल ही तो था, जिसके द्वारा उन्होंने साबित किया कि मानव का स्थान सर्वोपरि है।

कृष्णमोहन- माधवी दी’ आज हमें यहीं पर विराम लेना पड़ेगा। परन्तु विराम लेने से पहले हम अपने पाठको/श्रोताओं के लिए रवीन्द्र संगीत का एक अनूठा प्रयोग प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसे हिन्दी फिल्म के संगीतकार सचिनदेव बर्मन ने फिल्म "अभिमान" में शामिल किया था। मूल रवीन्द्र संगीत और उसी धुन पर आधारित फिल्म ‘अभिमान’ का गीत आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं- साशा घोषाल। आप यह गीत सुनिए और माधवी दीदी के साथ मुझे आज यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए। अगले रविवार को प्रातःकाल इस श्रृंखला की तीसरी और समापन कड़ी लेकर हम पुनः उपस्थित होंगे।

रवीद्र संगीत (हिन्दी/बांग्ला) : “तेरे मेरे मिलन की ये रैना.../जोदि तारे नाईं छिलिगो...” : स्वर – साशा घोषाल



संलग्न चित्र परिचय :- माधवी जी की मौलिक बाँग्ला कृति 'गल्पो संकलन' का विमोचन करते हुए तत्कालीन राज्यपाल विष्णुकान्त शास्त्री.

प्रस्तुति - सुमित चक्रवर्ती

आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

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