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Saturday, January 21, 2017

चित्रकथा - 3: महेन्द्र कपूर के गाए देश-भक्ति गीत


अंक - 3

महेन्द्र कपूर के गाए देश-भक्ति गीत


भारत की बात सुनाता हूँ...



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं है। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। हमारी दिलचस्पी का आलम ऐसा है कि हम केवल फ़िल्में देख कर या गाने सुनने तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखते, बल्कि फ़िल्म संबंधित हर तरह की जानकारियाँ बटोरने का प्रयत्न करते रहते हैं। इसी दिशा में आपके हमसफ़र बन कर हम आते हैं हर शनिवार ’चित्रकथा’ लेकर। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ के तीसरे अंक में आपका हार्दिक स्वागत है।  

आगामी 26 जनवरी को राष्ट्र अपना 68-वाँ गणतन्त्र दिवस मनाने जा रहा है। इस शुभवसपर पर हम आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ देते हैं। राष्ट्रीय पर्वों पर फ़िल्मी देश-भक्ति के गीतों का चलन शुरु से ही रहा है। और एक आवाज़ जिनके बिना ये पर्व अधूरे से लगते हैं, वह आवाज़ है गायक महेन्द्र कपूर की। उनकी बुलन्द पर सुरीली आवाज़ पाकर जैसे देश-भक्ति की रचनाएँ जीवन्त हो उठती थीं। आइए आज के इस विशेषांक में महेन्द्र कपूर के गाए फ़िल्मी देश भक्ति गीतों की चर्चा करें।




मारे देश के देशभक्तों और वीर सपूतों ने अपने अपने तरीकों से इस मातृभूमि की सेवा की है। और
इस राह में हमारे फ़िल्मी गीतकार, संगीतकार और गायकों का योगदान सराहनीय रहा है। गायकों की बात करें तो महेन्द्र कपूर ने अपनी बेशकीमती आवाज़ के माध्यम से देशभक्ति का अलख जगाया है जिसका प्रमाण समय-समय पर उनकी आवाज़ में हमें मिला है। भले सुनहरे दौर के शीर्षस्थ गायकों में सहगल, रफ़ी, तलत, किशोर, मुकेश और मन्ना डे के साथ महेन्द्र कपूर का नाम नहीं लिया गया, पर इसमें कोई संदेह नहीं कि देशभक्ति गीत गाने की कला में उनसे ज़्यादा पारदर्शी कोई नहीं। महेन्द्र कपूर की आवाज़ में देशभक्ति रस के गीत इतने जीवन्त, इतने प्रभावशाली लगते हैं कि वतन-परस्ती का जस्बा और बुलन्द हो जाता है। महेन्द्र कपूर की इसी ख़ूबी का कई संगीतकारों ने बख़ूबी इस्तमाल किया है जब जब उन्हें देशभक्ति के गीतों की ज़रूरत पड़ी अपनी फ़िल्मों में। इस देश पर शहीद होने वाले, इस देश की सेवा करने वाले और देशभक्ति की अग्नि प्रज्वलित करने वाले वतन परस्तों के पैग़ाम को आवाज़ तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण काम करती आई है महेन्द्र कपूर की गाई हुई देशभक्ति की कालजयी रचनाएँ।

कुछ समय पहले जब मैंने महेन्द्र कपूर साहब के सुपुत्र रुहान (रोहन) कपूर से उनके पिता के बारे में
बातचीत की, तब उनसे मैंने यह सवाल किया था कि उन्हें कैसा लगता है जब 26 जनवरी और 15 अगस्त को पूरा देश उनके पिता के गाए देशभक्ति गीतों को सुनते हैं, गुनगुनाते हैं, गर्व से सीना चौड़ा हो जाता है और कभी कभी आँखें नम हो जाती हैं, तब उन्हें कैसा लगता है? इसके जवाब में रुहान जी ने कहा, "उनकी आवाज़ को सुनना तो हमेशा ही एक थ्रिलिंग् एक्स्पीरिएन्स रहता है, लेकिन ये दो दिन मेरे लिये बचपन से ही बहुत ख़ास दिन रहे हैं। उनकी जोशिली और बुलंद आवाज़ उनकी मातृभूमि के लिये उनके दिल में अगाध प्रेम और देशभक्ति की भावनाओं को उजागर करते हैं। और उनकी इसी ख़ासियत ने उन्हें 'वॉयस ऑफ़ इण्डिया' का ख़िताब दिलवाया था। वो एक सच्चे देशभक्त थे और मुझे नहीं लगता कि उनमें जितनी देशभक्ति की भावना थी, वो किसी और लीडर में होगी। He was a human par excellence! अगर मैं यह कहूँ कि वो मेरे सब से निकट के दोस्त थे तो ग़लत न होगा। I was more a friend to him than anybody on planet earth। हम दुनिया भर में साथ साथ शोज़ करने जाया करते थे और मेरे ख़याल से हमने एक साथ हज़ारों की संख्या में शोज़ किये होंगे। वो बहुत ही मिलनसार और इमानदार इंसान थे, जिनकी झलक उनके सभी रिश्तों में साफ़ मिलती थी।"

शोज़ की बात चल पड़ी है तो महेन्द्र कपूर ने ’विविध भारती’ के ’जयमाला’ कार्यक्रम में फ़ौजी जवानों को संबोधित करते हुए एक बार कहा था, "हम सब इस देश के निवासी हैं, हम सभी को यह देश बहुत प्यारा है। हमें इस पर मान है और होना भी चाहिए क्योंकि पूरी दुनिया में ऐसा देश और कहीं नहीं है। मैं जब भी बाहर यानी फ़ौरेन जाता हूँ, देश की यादें साथ लेकर जाता हूँ, और इस गाने से हर प्रोग्राम शुरु करता हूँ।" और यह गाना है फ़िल्म ’पूरब और पश्चिम’ का, "है प्रीत जहाँ की रीत सदा, मैं गीत वहाँ के गाता हूँ, भारत का रहने वाला हूँ, भारत की बात सुनाता हूँ"। इस फ़िल्म के इस सर्वाधिक लोकप्रिय गीत के अलावा महेन्द्र कपूर की आवाज़ से सजे दो और देशभक्ति गीत थे, "दुल्हन चली बहन चली तीन रंग की चोली" (लता के साथ) और "पूर्वा सुहानी आई रे" (लता और मनहर के साथ)।

भले हमने पहले ’पूरब और पश्चिम’ की बात कर ली, पर महेन्द्र कपूर, मनोज कुमार और देशभक्ति गीत की तिकड़ी की यह पहली फ़िल्म नहीं थी। इस तिकड़ी की पहली फ़िल्म थी 1965 की ’शहीद’ जिसमें मनोज कुमार ने शहीद भगत सिंह की भूमिका अदा की थी। महेन्द्र कपूर, मुकेश और राजेन्द्र मेहता का गाया "मेरा रंग दे बसन्ती चोला माय रंग दे" अत्यधिक लोकप्रिय हुआ था। बाद में समय समय पर इस गीत के कई संस्करण बने पर ’शहीद’ फ़िल्म के इस गीत का स्थान हमेशा शीर्षस्थ रहा। इसके दो वर्ष बाद मनोज कुमार लेकर आए अपनी अगली फ़िल्म ’उपकार’। इस गीत में महेन्द्र कपूर के गाए "मेरे देश की धरती सोना उगले" ने तो इतिहास रच डाला। इस गीत के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। और फिर आया 1970 जब ’पूरब और पश्चिम’ प्रदर्शित हुई।

70 के दशक में भी मनोज कुमार और महेन्द्र कपूर की जोड़ी बरक़रार रही हालाँकि इस दशक में मनोज कुमार ने देशभक्ति की कोई फ़िल्म नहीं बनाई। 1970 की फ़िल्म ’होली आई रे’ में महेन्द्र कपूर का गाया
"चल चल रे राही चल रे" भले सीधे-सीधे देशभक्ति गीत ना हो, पर देश की उन्नति के लिए सही राह पर चलने का सीख ज़रूर देती है। इसी तरह से 1972 की फ़िल्म ’शोर’ में आंशिक रूप से देशभक्ति गीत "जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह शाम" में मन्ना डे और श्यामा चित्तर के साथ महेन्द्र कपूर ने अपनी जोशिली आवाज़ मिलाई और इस गीत को एक सुमधुर अंजाम दिया। और फिर आया 1981 का साल और प्रादर्शित हुई ’क्रान्ति’। और एक बार फिर से मनोज कुमार और महेन्द्र कपूर ने देशभक्ति गीतों की परम्परा को आगे बढ़ाया। महेन्द्र कपूर की एकल आवाज़ में "अब के बरस तुझे धरती की रानी कर देंगे" ने सिद्ध किया कि 80 के दशक में भी उनसे बेहतर देशभक्ति गीत गाने वाला दूसरा कोई नहीं। इसी फ़िल्म में लता मंगेशकर, मन्ना डे, शैलेन्द्र सिंह और नितिन मुकेश के साथ "दिलवाले तेरा नाम क्या है, क्रान्ति क्रान्ति" गीत में महेन्द्र कपूर की आवाज़ की गूंज दिल को छू गई। ’क्रान्ति’ के बाद मनोज कुमार की देशभक्ति की फ़िल्में दर्शकों के दिलों को छू न सकी और फ़िल्में फ़्लॉप होती गईं। ऐसी ही एक फ़्लॉप फ़िल्म थी 1989 की ’क्लर्क’ जिसमें महेन्द्र कपूर के दो देशभक्ति गीत थे; पहला लता मंगेशकर के साथ "झूम झूम कर गाओ रे, आज पन्द्रह अगस्त है" तथा दूसरा गीत उनकी एकल आवाज़ में था "कदम कदम बढ़ाए जा, ख़ुशी के गीत गाएजा"। इस गीत को भी पहले कई कलाकारों ने गाया होगा, पर महेन्द्र कपूर की बुलन्द आवाज़ ने इस गीत के जस्बे को आसमाँ तक पहुँचा दिया।

महेन्द्र कपूर ने केवल मनोज कुमार ही की फ़िल्मों में देशभक्ति गीत गाए हैं ऐसी बात नहीं है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार महेन्द्र कपूर का गाया पहला फ़िल्मी देशभक्ति गीत आया था 1959 की फ़िल्म ’नवरंग’ में। कहना ज़रूरी है कि ’सोहनी महिवाल’ के बाद ’नवरंग’ ही वह फ़िल्म थी जिसमें महेन्द्र कपूर के गाए गीतों ने उन्हें पहली-पहली बड़ी सफलता दिलाई थी। भरत व्यास के लिखे देशभक्ति गीत "ना राजा रहेगा, ना रानी रहेगी, यह दुनिया है फ़ानी फ़ानी रहेगी, ना जब एक भी ज़िन्दगानी रहेगी, तो माटी सबकी कहानी कहेगी" को गा कर महेन्द्र कपूर ने पहली बार देशभक्ति गीत की उनकी अपार क्षमता का नमूना प्रस्तुत किया था। इस गीत में छत्रपति शिवाजी और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई जैसे वीरों का उल्लेख मिलता है। इस फ़िल्म के बाद 1963 की फ़िल्म ’कण कण में भगवान’ में महेन्द्र कपूर को देशभक्ति गीत गाने का मौका मिला। गीतकार एक बार फिर भरत व्यास। इनका लिखा और शिवराम कृष्ण का स्वरबद्ध किया यह गीत था "भारत भूमि महान है, तीर्थ इसके प्राण, चारों दिशा में चौमुख दीप से इसके चारों धाम है"। 

1965 में ’शहीद’ के अलावा एक और उल्लेखनीय फ़िल्म थी ’सिकन्दर-ए-आज़म’ जिसमें रफ़ी साहब का गाया "वो भारत देश है मेरा" सर्वश्रेष्ठ देशभक्ति गीतों में शामिल होने वाला गीत था। इसी फ़िल्म में महेन्द्र कपूर ने भी एक सुन्दर देशभक्ति गीत गाया "ऐ माँ, तेरे बच्चे कई करोड़..."। अगर रफ़ी साहब के गीत में भारत का गुणगान हुआ है तो राजेन्द्र कृष्ण के लिखे महेन्द्र कपूर के इस गीत में देश के लिए मर मिटने का जोश जगाया गया है। संगीतकार हंसराज बहल का इस गीत के लिए महेन्द्र कपूर की आवाज़ को चुनना उचित निर्णय था। हमारी महान संस्कृति ने हमारी इस धरती को दिए हैं अनगिनत ऐसी संताने जो इस देश पर मत मिट कर हमें भी इसी राह पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। अपनी शौर्य और पराक्रम की गाथा से हमें देश पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने की पाठ पढ़ाते हैं। और ऐसी ही महामानवों की अमर गाथा को अपनी आवाज़ से और ओजस्वी बना दिया है महेन्द्र कपूर ने। 1972 में एक देशभक्ति फ़िल्म बनी थी ’भारत के शहीद’ के शीर्षक से। देशभक्ति गीतों के गुरु प्रेम धवन को गीतकार-संगीतकार के रूप में लिया गया। इस फ़िल्म में यूं तो कई देशभक्ति गीत थे, पर सर्वाधिक लोकप्रिय गीत सिद्ध हुआ महेन्द्र कपूर का गाया "संभालो ऐ वतन वालों, वतन अपना संभालो"। इन्हीं की आवाज़ में इस फ़िल्म के दो और गीत थे "मोहनदास करमचन्द गांधी, परम पुजारी अहिंसा के" और "इधर सरहद पे बहता है लहू अपने जवानों का"। 1975 में युद्ध पर बनी फ़िल्म ’आक्रमण’ में आशा भोसले के साथ मिलकर महेन्द्र कपूर ने एक देशभक्ति क़व्वाली गाई जिसके बोल थे "पंजाबी गाएंगे, गुजराती गाएंगे, आज हम सब मिल कर क़व्वाली गाएंगे"। सीधे-सीधे देशभक्ति गीत ना होते हुए भी राष्ट्रीय एकता की भावना को बढ़ावा देता है यह गीत।

80 के दशक में महेन्द्र कपूर के कई देशभक्ति गीत सुनाई दिए। ’होली आई रे’, ’उपकार’ और ’पूरब और पश्चिम’ में कल्याणजी-आनन्दजी संगीतकार थे तो ’शोर’ और ’क्रान्ति’ में लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल। 80 के दशक में लक्ष्मी-प्यारे ने महेन्द्र कपूर से कई गीत गवाए। 1981 की ’क्रान्ति’ के बाद 1982 की फ़िल्म ’राजपूत’ में मनहर और हेमलता के साथ उनका गाया "सबने देश का नाम लिया, हमने दिल को थाम लिया" गीत था। 1985 की फ़िल्म ’सरफ़रोश’ में भी लक्ष्मी-प्यारे ने कपूर साहब से देशभक्ति गीत गवाए जिसके बोल थे "तन्दाना तन्दाना, याद रखना भूल ना जाना, वीर अमर शहीदों की यह क़ुरबानी, देश भक्त भगत सिंह की यह कहानी"। इस गीत में सुरेश वाडकर ने भी अपनी आवाज़ मिलाई। 1987 की फ़िल्म ’वतन के रखवाले’ में तो एल.पी. ने महेन्द्र कपूर से फ़िल्म का शीर्षक गीत ही गवा डाला, जिसके सुन्दर बोल थे "जिस धरती के अंग अंग पर रंग शहीदों ने डाले, उस धरती को दाग़ लगे ना देख वतन के रखवाले"। ये बोल थे मजरूह सुल्तानपुरी के।

एक और संगीतकार जिनके लिए महेन्द्र कपूर ने बहुत से गाए हैं, वो हैं रवि। फ़िल्म ’हमराज़’ में "ना मुंह छुपा के जियो और ना सर झुका के जियो" को देशभक्ति गीत तो नहीं कहा जा सकता, पर सर उठा कर जीने की सलाह ज़रूर दी गई है। आगे चल कर 80 के दशक में बी. आर. चोपड़ा की फ़िल्मों में रवि साहब के संगीत निर्देशन में महेन्द्र कपूर ने बहुत से गीत गाए जिनमें कुछ देशभक्ति गीत भी थे। 1984 की फ़िल्म ’आज की आवाज़’ में शीर्षक गीत सहित दो देशभक्ति गीत थे। शीर्षक गीत "आज की आवाज़ जाग ऐ इंसान" और दूसरा गीत था "रो रो कर कहता है हिमालय और गंगा का पानी, आज़ादी पा कर भी हमने क़दर ना इसकी जानी, भारत तो है आज़ाद हम आज़ाद कब कहलाएंगे, कभी रामराज के दिन अब आयेंगे कि ना आयेंगे"। गीतकार हसन कमाल। 1987 की फ़िल्म ’आवाम’ में भी रवि का संगीत था जिसमें हसन कमाल ने "रघुपति राघव राजा राम" गीत को आगे बढ़ाते हुए लिखा है "ऐ जननी ऐ हिन्दुस्तान तेरा है हम पर अहसान, तेरी ज़मीं पर जनम लिया जब मैं बढ़ी तब अपनी शान, तन मन धन तुझपे कुरबान कोटी कोटी है तुझको प्रणाम, रघुपति राघव राजा राम"। इस गीत को महेन्द्र कपूर और आशा भोसले ने गाया था।

बी. आर. चोपड़ा ने 1983 में ’मज़दूर’ शीर्षक से एक फ़िल्म बनाई थी जिसके संगीत के लिए राहुल देव बर्मन को साइन करवा कर सभी को आश्चर्यचकित कर दिया था। और पंचम ने भी चोपड़ा साहब की उम्मीदों पर खरा उतरते हुए महेन्द्र कपूर के लिए तैयार किया एक देशभक्ति गीत। एक बार फिर हसन कमाल के लिखे इस गीत ने धूम मचाई। गीत के बोल थे "हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा माँगेंगे, एक बाग़ नहीं एक खेत नहीं हम सारी दुनिया माँगेंगे..."। मज़दूरों की आवाज़ बन कर महेन्द्र कपूर की आवाज़ ऐसी गूंजी कि फ़िल्म के फ़्लॉप होने के बावजूद यह गीत रेडियो पर सालों तक देशभक्ति गीतों के कार्यक्रम में बजता रहा। 1984 में एक कमचर्चित फ़िल्म आई थी ’आज के शोले’ जिसमें सत्यम और कमलकान्त का संगीत था। इस फ़िल्म के शुरुआती सीन में ही महेन्द्र कपूर का गाया एक देशभक्ति गीत था जिसके बोल हैं "वतन की आबरू पर जान देने वाले जागे हैं, हमारे देश के बच्चे ज़माने भर से आगे हैं, लेके सर हथेली पर ये नन्ही नन्ही जाने, आज चली है दुनिया से ये ज़ुल्म का नाम मिटाने"।

इस तरह से महेन्द्र कपूर ने हर दौर के गीतकारों और संगीतकारों के लिए देशभक्ति गीत गाए। सी. रामचन्द्र, शिवराम कृष्ण, हंसराज बहल, प्रेम धवन, कल्याणजी-आनन्दजी, रवि, लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल, राहुल देव बर्मन, उत्तम-जगदीश के संगीत में महेन्द्र कपूर की बुलन्द आवाज़ ने भरत व्यास, प्रेम धवन, मजरूह, इन्दीवर, हसन कमाल, संतोष आनन्द जैसे गीतकारों की रचनाओं को अमर बना दिया। जब जब वतन की आन-बान और यशगाथा के वर्णन करने की बात आती थी किसी गीत में, तब तब महेन्द्र कपूर की आवाज़ जैसे और प्रखर हो उठती थी, और पूरे जोश के साथ निकल पड़ती थी उनकी ज़ुबान से।

आपकी बात

’चित्रकथा’ की पहली कड़ी को आप सभी ने सराहा, जिसके लिए हम आपके आभारी हैं। इस कड़ी की रेडरशिप 13 जनवरी तक 154 आयी है। हमारे एक पाठक श्री सुरजीत सिंह ने यह सुझाव दिया है कि क्यों ना इसे हिन्दी और अंग्रेज़ी, दोनों भाषाओं में प्रकाशित की जाए! सुरजीत जी, आपका सुझाव बहुत ही अच्छा है, लेकिन फ़िलहाल समयाभाव के कारण हम ऐसा कर पाने में असमर्थ हैं। भविष्य में अवकाश मिलने पर हम इस बारे में विचार कर सकते हैं, पर इस वक़्त ऐसा संभव नहीं, इसके लिए हमें खेद है।

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!


शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Tuesday, June 16, 2009

आता है तेरा नाम मेरे नाम से पहले..."निकाह" और "तलाक" के बीच उलझी एक फ़नकारा

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #२१

वैसे देखें तो पहेलियाँ महफ़िल-ए-गज़ल की पहचान बन गई हैं, और इन पहेलियों के कारण हीं हम और आप एक दूसरे से इस तरह जुड़ पाते हैं। लेकिन आज मैं "गज़ल से गुमशुदा शब्द पहचानो" वाली पहेली की बात नहीं कर रहा,बल्कि मैं उस पहेली की बात कर रहा हूँ, जो "फ़नकार" की शिनाख्त करने के लिए अमूमन पहले पैराग्राफ़ में पूछी जाती है|उसी पहेली को एक नए अंदाज में मैं अभी पेश करने जा रहा हूँ। पहेली पूछने से पहले यह बता दूँ कि हम आज जिनकी बात कर रहे हैं, वो एक "फ़नकारा" हैं,एक गज़ल गायिका और हिंदी फ़िल्मों से उनका गहरा ताल्लुक है। पहेली यह है कि नीचे दिए गए दो कथनों (उन्हीं के क़ोट्स) से उन फ़नकारा की शिनाख्त करें:

१.मैं जब नई-नई गायिका हुई थी तो बहुत सारे लोग मुझे मोहतरमा नूरजहाँ की बेटी समझते थे।हम दोनों ने हीं क्लासिकल म्युज़िक में तालीम ली हैं और ऐसी आवाज़ें बाकी की आवाज़ों से ज्यादा खुली हुई होती हैं। मेरी आवाज़ की पिच और क्वालिटी उनकी आवाज़ से बहुत ज्यादा मिलती है। शायद यही कारण है कि लोगों द्वारा हमारे बीच यह रिश्ता करार दिया गया था।

२. मेरी बेटी "ज़ाहरा" की म्युजिक एलबम कुछ हीं दिनों में रिलीज होने वाली है और उसे हिंदी फ़िल्मों में काम करने के कई सारे आफ़र भी मिले हैं। मेरी दादी अनवरी बेगम पारो, दादा रफ़ीक़ गज़नवी, अम्मी ज़रिना और खुद मेरा फ़िल्मों से गहरा नाता रहा है और मेरे लिए खुशी की बात है कि मेरी अगली पीढी भी इसी क्षेत्र में भविष्य आजमाने जा रही है।


तो ये रहे आपके लिए दो सुराग, बूझिये और हमें सुझाईये कि हम किनकी बात कर रहे हैं। वैसे आप ईमानदारी बरतेंगे ,इसका मुझे यकीन है, नहीं तो उन फ़नकारा के नाम की जानकारी इस आलेख के शीर्षक में हीं है।

बात तब की है, जब राज कपूर साहब अपने शहजादे "ऋषि कपूर" और "नीतू सिंह" की शादी के अवसर पर लंदन में एक रिसेप्शन की तैयारी कर रहे थे। इस रिसेप्शन में उन्होंने अपनी चचेरी बहन "ज़रिना" को भी न्योता दिया था। रिसेप्शन में कई सारे जानेमाने निर्देशकों की मंडली मौजूद थी, जिनमें "बी० आर० चोपड़ा" भी एक थे। संयोग की बात यह है कि चोपड़ा साहब ने कुछ हीं दिनों पहले "ज़ीनत अमान" को लेकर "इंसाफ़ की तराज़ू" पूरी की थी और अपनी अगली फ़िल्म के लिए उन्हें किसी मुसलमान नायिका की तलाश थी। यूँ तो "ज़ीनत" भी मुसलमान हीं हैं, लेकिन चोपड़ा साहब के अनुसार उनमें एक शहरीपन झलकता है,जिस कारण वो "नीलोफ़र" के किरदार में सही नहीं रहेंगी। उसी दौरान राज कपूर साहब भी "हिना" बनाने की जुगत में थे और उन्हें भी ऐसी हीं किसी मुसलमान नायिका की तलाश थी,जिन्हें वो "पाकिस्तान" का वाशिंदा दिखा सकें। तो उसी महफ़िल में बातों हीं बातों में राज साहब को अपनी बहन "ज़रिना" की बेटी के बारे में पता चला, जो न सिर्फ़ अच्छा गाती थी, बल्कि अच्छी दिखती भी थी। राज साहब ने अपने दिल की बात "ज़रिना" को बता दी। लेकिन "हिना" बनती , उससे पहले हीं राज साहब की नज़र "ज़ेबा बख्तियार" पर गई और उन्होंने "ज़ेबा" को अपने फ़िल्म के लिए साईन कर लिया। वैसे बदकिस्मती देखिए कि "राज" साहब "हिना" को अपने जीते-जी पूरा भी नहीं कर पाए और फिल्म की बागडोर "रणधीर कपूर" को संभालनी पड़ी। वैसे राज साहब और हिना की बातें आने से पहले हीं देव आनंद साहब ने इन फ़नकारा को लेकर फ़िल्म बनाने की योजना बना डाली थी,लेकिन जैसे हीं उन्हें यह पता चला कि इनकी माँ "ज़रिना" और "राज कपूर" भाई-बहन हैं और राज कपूर इन्हें लेकर "हिना" बनाने वाले हैं तो देव आनंद साहब पीछे हट गए। नियति का यह खेल देखिए कि "हिना" बनी लेकिन इन्हें लेकर नहीं। राज साहब जब इन्हें "हिना" में ले न सके तो उन्होंने "बी० आर० चोपड़ा" पर दवाब डालना शुरू कर दिया ताकि चोपड़ा साहब अपनी आने वाली फ़िल्म "तलाक तलाक तलाक" में इन्हें साईन कर लें। आखिरकार हुआ यही और फ़िल्म उद्योग को मिला एक नया चेहरा । इस फ़िल्म के रीलिज होने से पहले हीं इसके गाने खासे चर्चित हो गए। फ़िल्म अपने नाम के कारण समय पर रीलिज़ न हो सकी और इसके रीलिज की अनुमति तभी मिली जब इसका नाम बदलकर "निकाह" कर दिया गया। "निकाह" सुनने के बाद तो आपको पता चल हीं गया होगा कि हम किनकी बात कर रहे हैं।

"निकाह" बनने से पहले हीं "सलमा आग़ा" जी ने अपनी बहन "सबीना" के साथ मिलकर "एबीबीए एंड आग़ा" नाम से अपनी म्युज़िक एलबम रीलिज की थी। आपकी जानकारी के लिये यह बता दें कि "एबीबीए" एक स्वीडिश पौप म्युज़िक ग्रुप है, जो १९७८ में अपने वजूद में आया था। यूँ तो यह एक ग्रुप का नाम है,लेकिन यह ग्रुप इतना मकबूल हो गया कि आजकल इसे एक संगीत की एक विधा(ज़ौनर) के रूप में स्वीकार कर लिया गया है। "एबीबीए" की खासियत यह है कि इसमें सीधे-सादे बोल और लुभावने और लोकप्रिय संगीत तो होते हीं है,साथ हीं साथ अलग-अलग हार्मोनी में गायिकाओं की आवाज़ की ओवरडबिंग की जाती है,जिसे "वाल औफ़ साउंड" भी कहा जाता है। तो हाँ जब संगीतकारों ने उस एलबम में "सलमा आग़ा" की आवाज़ को सुना तो उन्होंने "निकाह" के गानों को उनसे हीं गवाने का फ़ैसला कर लिया। वैसे एक इंटरव्यू में "चोपड़ा" साहब ने कहा था कि उस फ़िल्म का सबस मशहूर गाना "दिल के अरमां" किसी और गायिका की आवाज़ में रिकार्ड होने वाला था। लेकिन इस बात से "आग़ा" बेहद नाराज़ हो गईं। उनका मानना था कि लोग इस बात को स्वीकार नहीं करेंगे कि मैं एक गायिका होकर भी अपने गाने को नहीं गा रही। आखिरकार "चोपड़ा" साहब को "आग़ा" की जिद्द के आगे झुकना पड़ा और आगे क्या हुआ यह कहने की कोई जरूरत नहीं है। "सलमा आग़ा" के बारे में और भी बहुत सारी बातें कहने की हैं,लेकिन आलेख की लंबाई इज़ाज़त नहीं दे रही,इसलिए बाकी बातें किसी अगले आलेख में। अब हम आज की गज़ल की ओर रूख करते हैं। "वीनस रिकार्ड्स एंड टेप्स" ने १९९८ में "हुस्न" नाम की एक एलबम रीलिज की थी, जिसमें कुल मिलाकर नौ गज़लें थी। संयोग देखिए कि आज की गज़ल को छोड़कर बाकी सारी गज़लों के गज़लगो के नाम की जानकारी मुझे मिल गई, बस यही गज़ल है,जिसे किसने लिखा है मुझे नहीं पता। हाँ संगीत किसका है, यह मुझे पता है। इस गज़ल में संगीत दिया है "बौबी एम०" ने।

तो चलिए हम और आप मिलकर आनंद लेते हैं इस गज़ल का।कहने की ज़रूरत नहीं है कि इस गज़ल में पाश्चात्य वाद्ययंत्रों का भरपूर प्रयोग हुआ है।वैसे जिसने भी बोल लिखे हैं,उसने बड़ा हीं उम्दा काम किया है। हाँ अगर आपको उस शायर की जानकारी है तो हमें इत्तेला ज़रूर कीजिएगा।:

क्या कुछ न कहा था दिल-ए-नाकाम से पहले,
वाकिफ़ थे मोहब्बत के हम अंजाम से पहले।

काटी हैं मोहब्बत में तो हर तरह की रातें,
दिल आज धड़कने लगा क्यों शाम से पहले।

अफ़साना किसी तरह मुकम्मल नहीं होता,
आता है तेरा नाम मेरे नाम से पहले।

नाकामि-ए-उल्फ़त हमें जीने नहीं देगी,
मरना भी नहीं है तेरे पैगाम से पहले।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

कहकहा ___ का बरताव बदल देता है,
हंसने वाले तुझे आंसू नज़र आये कैसे...

आपके विकल्प हैं -
a) चेहरे, b) बात, c) शख्स, d) आँख

इरशाद ....

पिछली महफ़िल के साथी-
पिछली महफिल का सही शब्द था -"लकीरों" और सही शेर कुछ यूं था -

मेरे इन हाथों की चाहो तो तलाशी ले लो,
मेरे इन हाथों में लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं....

सबसे पहले सही जवाब दिया शरद तैलंग जी ने एक बार फिर साथ में अर्ज किया ये शेर भी -

हाथों की लकीरों का भी विश्वास क्य़ा करें
जो खुद उलझ रहीं हैं उनसे आस क्य़ा करें

वाह...
कुलदीप अंजुम जी ने फरमाया -

कहीं मुझसे जुदा न कर दे उसे कोई लकीर,
इस वजह से वो हाथ मेरा देखता न था..

क्या बात है...
सुमित जी भी कूद पड़े महफ़िल में -

जिन के हाथो मे लकीर नही होती,
जरूरी तो नही उनकी तकदीर नही होती ?

सही बात सुमित जी...
मंजू जी, शमिख फ़राज़ जी, मनु जी , तपन जी आप सभी का भी आभार, शोभा जी पीनाज़ की और भी ग़ज़लें आपको ज़रूर सुन्वएंगें, बने रहिये आवाज़ के साथ.

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर सोमवार और गुरूवार दो अनमोल रचनाओं के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Saturday, May 9, 2009

आप आये तो ख़्याल-ए-दिले नाशाद आया....साहिर के टूटे दिल का दर्द-ए-बयां बन कर रह गया ये गीत.

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 75

निर्माता-निर्देशक बी. आर. चोपड़ा अपनी फ़िल्मों के लिए हमेशा ऐसे विषयों को चुनते थे जो उस समय के समाज की दृष्टि से काफ़ी 'बोल्ड' हुआ करते थे। और यही वजह है कि उनकी फ़िल्में आज के समाज में उस समय की तुलना में ज़्यादा सार्थक हैं। हमारी पुरानी फ़िल्मों में नायिका का चरित्र बिल्कुल निष्पाप दिखाया जाता था। तुलसी के पत्ते की तरह पावन और गंगाजल से धुला होता था नायिका का चरित्र। शादी से बाहर किसी ग़ैर पुरुष से संबंध रखने वाली नायिका की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। लेकिन ऐसा ही कुछ कर दिखाया चोपड़ा साहब ने सन १९६३ की फ़िल्म 'गुमराह' में। एक शादी-शुदा औरत (माला सिन्हा) किस तरह से अपने पति (अशोक कुमार) से छुपाकर अपने पहले प्रेमी (सुनिल दत्त) से संबंध रखती है, लेकिन बाद में उसे पता चलता है कि जिस आदमी से वो छुप छुप कर मिल रही है उसकी असल में शादी हो चुकी है (शशीकला से)। इस कहानी को बड़े ही नाटकीय और भावुक अंदाज़ में पेश किया गया है इस फ़िल्म में। अशोक कुमार, सुनिल दत्त, माला सिन्हा और शशीकला के जानदार अभिनय, बी. आर. चोपड़ा के सशक्त निर्देशन, और साहिर-रवि के गीत संगीत ने इस फ़िल्म को कालजयी बना दिया है।

गीतकार साहिर लुधियानवी, संगीतकार रवि, गायक महेन्द्र कपूर और गायिका आशा भोंसले बी. आर. फ़िल्म्स के नियमित सदस्य हुआ करते थे। इस बैनर की कई फ़िल्मों में इस टीम का योगदान रहा है, और 'गुमराह' इन्ही में से एक उल्लेखनीय फ़िल्म है। सुनिल दत्त का किरदार इस फ़िल्म में एक गायक का था और इस वजह से उन पर कई गाने फ़िल्माये भी गये जिन्हें अपनी आवाज़ से नवाज़ा महेन्द्र कपूर ने। इस फ़िल्म के महेन्द्र कपूर के गाये कुछ 'हिट' गानें गिनायें आपको? "चलो एक बार फिर से अजनबी बन जायें हम दोनो", "ये हवा ये हवा..... आ भी जा आ भी जा", "इन हवाओं में इन फिजाओं में तुझको मेरा प्यार पुकारे" जैसे मशहूर गानो ने इस फ़िल्म की शोभा बढ़ाई। इसी फ़िल्म में एक और गीत भी था "आप आये तो ख्याल-ए-दिल-ए-नाशाद आया", महेन्द्र कपूर की आवाज़ में यह गीत सिर्फ़ संगीत की दृष्टि से ही नहीं बल्कि साहिर साहब की बेहतरीन उर्दू शायरी की वजह से भी एक अनमोल नग्मा बन कर रह गया है। "आपके लब पे कभी अपना भी नाम आया था, शोख़ नज़रों से कभी मोहब्बत का सलाम आया था, उम्र भर साथ निभाने का पयाम आया था", अपनी ज़िन्दगी की अनुभवों, निराशाओं, और व्यर्थतायों को साहिर अपने कलम से काग़ज़ पर उतारते चले गये। बचपन में ही उनकी माँ उनके पिता की अय्याशियों से तंग आकर उनसे अलग हो गयीं और साहिर को लेकर घर छोड़ दिया था। और तभी से फूटने लगा साहिर के कोमल मन में विद्रोह का अंकुर। ज़िन्दगी की परेशानियों ने उन्हे तोड़कर रख दिया था। कालेज के पहले असफल प्रेम ने उन्हे एक बार फिर से झकझोर कर रख दिया। बाद में गीतकार बनने के बाद जब भी कभी किसी टूटे हुए दिल की पुकार लिखने की बात आयी तो साहिर ने जैसे अपने दिल की भड़ास, अपना वही पुराना दर्द उड़ेल कर रख दिया। और फ़िल्म 'गुमराह' का यह नग्मा भी कुछ इसी अंदाज़ का है। "रूह में जल उठे बुझती हुई यादों के दिए, कैसे दीवाने थे हम आपको पाने के लिए, यूँ तो कुछ कम नहीं जो आपने अहसान किये, पर जो माँगे से न पाया वो सिला याद आया, कितने भूले हुए जख्मों का पता याद आया"।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. मुकेश का एक दर्द भरा गीत.
२. इसी फिल्म में एक मशहूर "राखी" गीत भी था जो आगे चल कर इस त्यौहार का ही पर्याय बन गया.
३. मुखड़े में शब्द है - "संगदिल".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
पराग जी ने फिर से बाज़ी मारी है आज. अवध जी, फिल्म गुमराह है, हमराज़ नहीं, वैसे हमराज़ के भी सभी गीत लाजवाब हैं और फिल्म भी जबरदस्त. रचना जी आपका भी जवाब सही है. मनु जी आप तो "सेंटी" हो गए...आचार्य जी महफिल की शोभा बढाने के लिए आपका भी आभार

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Tuesday, November 11, 2008

आपके पीछे चलेंगी आपकी परछाईयाँ....

निर्देशक बी आर चोपडा पर विशेष

व्यावसायिक दृष्टि से कहानियाँ चुनकर फिल्में बनाने वाले निर्देशकों से अलग सामाजिक सरोकारों को संबोधित करती हुई फिल्मों के माध्यम से समाज को एक संदेश मनोरंजनात्मक तरीके से कहने की कला बहुत कम निर्देशकों में देखने को मिली है. वी शांताराम ने अपनी फिल्मों से सामाजिक आंदोलनों की शुरुआत की थी, आज के दौर में मधुर भंडारकर को हम इस श्रेणी में रख सकते हैं, पर एक नाम ऐसा भी है जिन्होंने जितनी भी फिल्में बनाई, उनकी हर फ़िल्म समाज में व्याप्त किसी समस्या पर न सिर्फ़ एक प्रश्न उठाती है, बल्कि उस समस्या का कोई न कोई समाधान भी पेश करती है. निर्देशक बी आर चोपडा ने अपनी हर फ़िल्म को भरपूर रिसर्च के बाद बनाया और कहानी को इतने दिलचस्प अंदाज़ में बयां किया हर बार, कि एक पल के लिए देखने वालों के लिए फ़िल्म का कसाव नही टूटता. चाहे बात हो अवैध रिश्तों की (गुमराह), या बलात्कार की शिकार हुई औरत की (इन्साफ का तराजू), मुस्लिम वैवाहिक नियमों पर टिपण्णी हो (निकाह), या वैश्यावृति में फंसी औरतों का मानसिक चित्रण (साधना), या हो एक विधवा के पुनर्विवाह जैसा संवेदनशील विषय (एक ही रास्ता),अपनी फिल्मों से बी आर ने हमेशा ही समाज में एक सकारात्मक हलचल मचाई है, कई ऐसे विषय जिन पर तब तक परदों में रह कर चर्चा होता थी, उन्हें समाज के सामने बेनकाब किया, यही उनकी फिल्मों की वास्तविक कमियाबी रही है, पर जैसा कि हमने बताया गंभीर विषयों पर आधारित होने के बावजूद उनमें मनोरंजन भी भरपूर होता था, जिस कारण बॉक्स ऑफिस पर भी उनकी फिल्में सफलता के नए कीर्तिमान लिखती थी.


बीते बुधवार सुबह बी आर ने हमेशा के लिए संसार को अलविदा कह दिया, और पीछे छोड़ गए कुछ ऐसी फिल्मों की विरासत जिन से वर्तमान और आने वाली फिल्मकारों की पीढी को हमेशा गर्व रहेगा. आज हम उनकी जिस फ़िल्म का यहाँ जिक्र करेंगे वो है १९५७ में आई गोल्डन जुबली हिट फ़िल्म "नया दौर". आज के निर्देशक सईद मिर्जा और अज़ीज़ मिर्जा के वालिद अख्तर मिर्जा की लिखी इस बेहद "हट के" कहानी को महबूब खान, एस मुख़र्जी और एस एस वासन जैसे निर्देशकों ने सिरे से नकार दिया. कहा गया कि यह एक बढ़िया डोक्यूमेंट्री फ़िल्म तो बन सकती है पर एक फीचर फ़िल्म...कभी नही. बी आर ने इसी कहानी पर काम करने का फैसला किया. पर जब उन्होंने दिलीप कुमार के साथ इस फ़िल्म की चर्चा की तो उन्होंने कहानी सुनने से ही इनकार कर दिया. बी आर अगली पसंद, अशोक कुमार के पास पहुंचे. अशोक कुमार का मानना था कि उनका लुक शहरी है और वो इस गाँव के किरदार के लिए वो नही जमेंगें, पर उन्होंने बी आर की तरफ़ से दिलीप कुमार से एक बार फ़िर बात की. इस बार दिलीप साहब राजी हो गए. आधुनिकता की दौड़ में पिसने वाले एक आम ग्रामीण की कहानी को फ़िल्म के परदे पर लेकर आना आसान नही था. कुछ हफ्तों तक कारदार स्टूडियो में शूट करने के बाद लगभग १०० लोगों की टीम को कूच करना था आउट डोर लोकेशन के लिए जो की भोपाल के आस पास था. उन दिनों मधुबाला और दिलीप साहब के प्रेम के चर्चे इंडस्ट्री में मशहूर थे. तो फ़िल्म की नायिका मधुबाला के पिता ने मधुबाला को शूट पर भेजने से इनकार कर दिया, यूँ भी उन दिनों आउट डोर शूट जैसी बातों का चलन नही था. बी आर ने कोर्ट में मुकदमा लड़ा, अपील में तर्क दिया कि फ़िल्म की कहानी के लिए यह आउट डोर बहुत ज़रूरी है. दिलीप ने बी आर के पक्ष में गवाही दी जहाँ उन्होंने मधुबाला से अपने प्यार की बात भी कबूली. मुकदमा तो जीत लिया पर मधुबाला को कानूनी दांव पेचों से बचने के खातिर केस को वापस लेना पड़ा, और इस तरह फ़िल्म में मधुबाला के स्थान पर वैजंतीमाला का आगमन हुआ. महबूब खान की "मदर इंडिया" के लिए लिबर्टी सिनेमा १० हफ्तों के लिए बुक था. पर फ़िल्म तैयार न हो पाने के कारण उन्होंने बी आर की "नया दौर" को अपने बुक किए हुए १० हफ्ते दे दिए, साथ में हिदायत भी दी कि चाहो तो ५ हफ्तों के लिए ले लो, तुम्हारी इस "ताँगे वाले की कहानी" को पता नही दर्शक मिले या न मिले. और यही महबूब खान थे जिन्होनें, जब फ़िल्म "नया दौर" ने अपनी सिल्वर जुबली मनाई तो बी आर को उनकी फ़िल्म के प्रीमियर के लिए मुख्य अतिथि होने का आग्रह किया. चढ़ते सूरज को दुनिया सलाम करती है पर बी आर उन निर्देशकों में थे जिन्हें अपने चुनाव और अपने फैसलों पर हमेशा पूरा विश्वास रहा. उनकी हर फ़िल्म का संगीत पक्ष भी बहुत मजबूत रहा. नया दौर के गीतों को याद कीजिये ज़रा- मांग के साथ तुम्हारा (पार्श्व में चल रही ताँगे की आवाज़ पर गौर कीजिये), आना है तो आ, साथी हाथ बटाना, उडे जब जब जुल्फें तेरी, रेशमी सलवार या फ़िर आज भी हर राष्ट्रीय त्योहारों पर बजने वाला गीत -"ये देश है वीर जवानों का...",हर गीत कहानी से जुडा हुआ, हर गीत में शब्द और संगीत का परफेक्ट तालमेल.

आज की पीढी उन्हें महान धारावाहिक "महाभारत" के निर्देशक के रूप में अधिक जानती है. पर बहुत कम लोग जानते हैं कि बी आर ने फिल्मों में अनूठे प्रयोग किए हैं जिनकी मिसाल आज भी दी जाती है, फ़िल्म "कानून" हिंदुस्तान की अब तक की एक मात्र मुक्कमल उर्दू फ़िल्म मानी जाती है, चूँकि इस फ़िल्म में एक भी शब्द संवाद का हिन्दी में नही था, बी आर ने सेंसर बोर्ड से अपील भी की थी कि इस फ़िल्म को उर्दू में सर्टिफिकेशन दिया जाए. एक और बड़ी खासियत इस फ़िल्म के ये थी कि ये शायद हिंदुस्तान की पहली बिना गीतों की फ़िल्म थी. गुरुदत्त भी इस फ़िल्म के दीवाने थे क्योंकि जो बरसों से गुरुदत्त करना चाहते थे पर अपने जीवन काल में कभी कर नही पाये वो बी आर इस फ़िल्म के माध्यम से कर दिखाया था. आज भी कितने निर्देशक होंगें जो बिना गीतों के कोई हिन्दी फ़िल्म बनने का खतरा उठा सके. बी आर को फिल्मों में उनके अमूल्य योगदान के लिए हमेशा याद किया जाएगा...फ़िल्म इंडस्ट्री ने फिल्मों के माध्यम समाज को आईना दिखने वाला एक बेहतरीन निर्देशक को खो दिया है. हिंद युग्म,आवाज़ दे रहा है बी आर चोपडा को यह संगीतमय श्रद्धाजंली.




Sunday, November 9, 2008

रॉक ऑन के सितारे जुटे बाढ़ राहत कार्य में

आवाज़ ने संगीतप्रेमियों से इस फ़िल्म की सिफारिश की थी, और आज यह फ़िल्म साल की श्रेष्ट फिल्मों में एक मानी जा रही है. फ़िल्म के संगीत का नयापन युवाओं को बेहद भाया. फरहान अख्तर ने बतौर अभिनेता और गायक अपनी पहचान बनाई. बिहार में कोसी नदी में आई बाढ़ के पीडितों के लिए मुंबई में अभी हाल ही में इस फ़िल्म के सितारों और संगीत टीम के सदस्यों ने जबरदस्त शो किया और इस नेक काम के लिए धन अर्जित किया. "मेरी लौंड्री का एक बिल..." गीत जब ऋतिक रोशन थिरके तो दर्शक समूह झूम उठा. "रॉक ऑन" का संगीत वास्तव में रोक्किंग है.


रविन्द्र जैन की वापसी

लंबे समय के बाद सुप्रसिद्ध गीतकार संगीतकार रविन्द्र जैन फ़िल्म संगीत में वापसी कर रहे हैं. ७ नवम्बर को राजश्री प्रोडक्शन के साथ उनकी नई फ़िल्म "एक विवाह ऐसा भी" प्रर्दशित हो रही है. रविन्द्र जी ने राजश्री फ़िल्म्स के साथ लगभग १७ फिल्मों में काम किया है. "अबोध" की असफलता के लगभग २० वर्षों के बाद फ़िल्म "विवाह" से रविन्द्र जी ने बड़जात्या परिवार के साथ अपनी वापसी की थी. अब "एक विवाह ऐसा भी" से भी इसी तरह की सफलता की दर्शकों और श्रोताओं को उम्मीदें हैं.


नदीम श्रवण की जोड़ी दिखायेगी फ़िर से कमाल

आशिकी, दिल है कि मानता नहीं, सड़क, सजन, दीवाना, राजा हिन्दुस्तानी और परदेस जैसी फिल्मों से ९० के दशक में संगीत जगत पर राज करने वाली संगीतकार जोड़ी नदीम-श्रवण २००५ में हुए "स्प्लिट" के बाद अब फ़िर से एक होकर काम करेगी. धर्मेश दर्शन की "बावरा" और डेविड धवन की "डू नोट डिसटर्ब" होंगीं उनकी आने वाली फिल्में, जहाँ एक बार फ़िर क्रेडिट टाइटल में नदीम और श्रवण का नाम एक साथ देखा जाएगा. संगीत प्रेमियों के लिए यह निश्चित ही एक सुखद ख़बर है...उम्मीद करेंगें कि जतिन ललित की जोड़ी भी अपने मतभेद भूलकर एक साथ आयें जल्द ही...


एक दौर समाप्त

भारतीय फ़िल्म जगत के मशहूर निर्माता-निर्देशक बीआर चोपड़ा का लंबी बीमारी के बाद बुधवार सुबह मुंबई में निधन हो गया। फिल्मी दुनिया को 'नया दौर' देने वाले बलदेव राज चोपड़ा का जन्म 22 अप्रैल 1914 को पंजाब के लुधियाना में हुआ था। ‘दादा साहब फाल्के’ पुरस्कार से सम्मानित चोपड़ा ने धूल का फूल’, ‘वक़्त’, ‘नया दौर’, ‘क़ानून’, ‘हमराज’, ‘इंसाफ़ का तराज़ू’ और ‘निकाह’ जैसी कई सफल फ़िल्में बनाई। 'आवाज़' की विनम्र श्रद्धाँजलि!!


पं॰ भीमसेन जोशी को दिया जायेगा भारत-रत्न

सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पंडित भीमसेन जोशी को सरकार ने देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित करने का फ़ैसला किया है. किराना घराने के ८६ वर्षीय भीमसेन ने महज़ १९ वर्ष की उम्र से गाना शुरू किया था। कर्नाटक के गडक ज़िले के एक छोटे से शहर में वर्ष १९२२ में जन्मे और मुख्य रूप से खयाल शैली और भजन के लिए मशहूर पंडित जोशी को वर्ष १९९९ में पद्मबिभूषण, १९८५ में पद्मभूषण और १९७२ में पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है।

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