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Sunday, October 22, 2017

ठुमरी भैरवी : SWARGOSHTHI – 340 : THUMARI BHAIRAVI




स्वरगोष्ठी – 340 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 7 : ठुमरी भैरवी

पण्डित भीमसेन और सहगल के स्वर में लौकिक और आध्यात्मिक भाव का बोध कराती कालजयी ठुमरी – “बाबुल मोरा...”




कुन्दनलाल सहगल
पण्डित भीमसेन जोशी
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” की इस सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी सहयोगी संज्ञा टण्डन के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पिछली श्रृंखला की भाँति इस श्रृंखला में भी हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। गीतों का परिचयात्मक आलेख हम अपने सम्पादक-मण्डल की सदस्य संज्ञा टण्डन की रिकार्ड किये आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा, अवश्य सूचित कीजिएगा। दरअसल यह श्रृंखला पूर्व में प्रकाशित / प्रसारित की गई थी। हमारे पाठकों / श्रोताओं को यह श्रृंखला सम्भवतः कुछ अधिक रुचिकर प्रतीत हुई थी। अनेक संगीत-प्रेमियों ने इसके पुनर्प्रसारण का आग्रह किया है। सभी सम्मानित पाठकों / श्रोताओं के अनुरोध का सम्मान करते हुए और पूर्वप्रकाशित श्रृंखला में थोड़ा परिमार्जन करते हुए यह श्रृंखला हम पुनः प्रस्तुत कर रहे हैं। हमारी नई लघु श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” के शीर्षक से ही यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में शामिल की गई उपशास्त्रीय गायन शैली ठुमरी है। सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से फ़िल्मी गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित पारसी रंगमंच के संगीत और पारम्परिक ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग आरम्भ हो गया था। विशेष रूप से फिल्मों के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता की पूर्ति की थी। चौथे दशक के मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में सैकड़ों ठुमरियों का प्रयोग हुआ है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला में हम आपसे ऐसी ही कुछ चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात करेंगे। आज के अंक हम आपको अवध के नवाब वाजिद अली शाह की सुविख्यात ठुमरी- ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय...’ का गायन पारम्परिक और फिल्मी दोनों रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। राग भैरवी की इस ठुमरी का पारम्परिक गायन पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में और फिल्म ‘स्ट्रीट सिंगर’ मेँ कुन्दनलाल सहगल की आवाज़ में प्रस्तुत किया गया है। 



ठुमरी भैरवी : ‘बाबुल मोरा नैहर छुटो जाए...’ : पण्डित भीमसेन जोशी
ठुमरी भैरवी : ‘बाबुल मोरा नैहर छुटो जाए...’ : कुन्दनलाल सहगल : फिल्म – स्ट्रीट सिंगर





संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 340वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक फिल्मी युगल ठुमरी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। संगीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक ही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – इस ठुमरी रचना का अंश सुन कर बताइए कि आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – इस ठुमरी गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – इस युगल ठुमरी में किस गायक और गायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 28 अक्टूबर, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 342वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 338वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको वर्ष 1962 में प्रदर्शित फिल्म – “सौतेला भाई” से ली गई ठुमरी का अंश सुनवा कर हमने आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग अड़ाना, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – द्रुत एकताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – लता मंगेशकर

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में तीनों प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे प्रतिभागी हैं पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। हमारे तीन पाठकों ने केवल एक प्रश्न का सही उत्तर दिया है। चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, और हमारी एक नई प्रतिभागी अंजलि जोशी को केवल एक-एक अंक ही दिया जाता है। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” की इस सातवीं कड़ी में आपने एक पारम्परिक ठुमरी को राग भैरवी में पण्डित भीमसेन जोशी और फिल्मी रूप का सुविख्यात गायक कुन्दनलाल सहगल के स्वरों में रसास्वादन किया। आपके अनुरोध पर पुनर्प्रसारित इस श्रृंखला के अगले अंक में हम आपको एक और पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी रूप पर चर्चा करेंगे और शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर चर्चा करेंगे और सम्बन्धित रागों तथा संगीत शैली में निबद्ध कुछ रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन   
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, September 10, 2017

ठुमरी झिझोटी : SWARGOSHTHI – 334 : THUMARI JHINJHOTI




स्वरगोष्ठी – 334 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी - 1 : “पिया बिन नाहीं आवत चैन...”

जब सहगल ने उस्ताद अब्दुल करीम खाँ की गायी ठुमरी को अपना स्वर दिया




उस्ताद अब्दुल करीम खाँ
कुन्दनलाल सहगल
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से आरम्भ हो रही श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ की इस पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी सहयोगी संज्ञा टण्डन के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। गीतों का परिचयात्मक आलेख हम अपने सम्पादक-मण्डल की सदस्य संज्ञा टण्डन की रिकार्ड किये आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा, अवश्य सूचित कीजिएगा। दरअसल यह श्रृंखला पूर्व में प्रकाशित / प्रसारित की गई थी। हमारे पाठकों / श्रोताओं को यह श्रृंखला सम्भवतः कुछ अधिक रुचिकर प्रतीत हुई थी। अनेक संगीत-प्रेमियों ने इसके पुनर्प्रसारण का आग्रह किया है। सभी सम्मानित पाठकों / श्रोताओं के अनुरोध का सम्मान करते हुए और पूर्वप्रकाशित श्रृंखला में थोड़ा परिमार्जन करते हुए यह श्रृंखला हम पुनः प्रस्तुत कर रहे हैं। आज से शुरू हो रही हमारी नई लघु श्रृंखला 'फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के शीर्षक से ही यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में शामिल की गई उपशास्त्रीय गायन शैली ठुमरी है। सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से फ़िल्मी गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित पारसी रंगमंच के संगीत और पारम्परिक ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग आरम्भ हो गया था। विशेष रूप से फिल्मों के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता की पूर्ति की थी। चौथे दशक के मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में सैकड़ों ठुमरियों का प्रयोग हुआ है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला में हम आपसे ऐसी ही कुछ चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात करेंगे। आज हम आपके लिए फिल्म देवदास की जिस ठुमरी को लेकर उपस्थित हुए हैं वह 1936 में हिन्दी भाषा में निर्मित फिल्म देवदास की है। राग झिंझोटी की यह ठुमरी 1925 -26 में महाराज कोल्हापुर के राजगायक रहे उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के स्वरों में है। आज के अंक में आप खाँ साहब की आवाज़ में पारम्परिक और हिन्दी फिल्मों के यशस्वी गायक और नायक कुन्दनलाल सहगल की आवाज़ में फिल्मी संस्करण सुनेंगे।


राग - झिंझोटी : ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन...’ : कुन्दनलाल सहगल : फिल्म - देवदास 1936
राग - झिंझोटी : ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन...’ : उस्ताद अब्दुल करीम खाँ : पारम्परिक ठुमरी



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 334वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक फिल्मी ठुमरी अथवा दादरा गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। संगीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक ही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 340वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह कौन सा राग है?

2 – संगीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – यह किस फिल्मी पार्श्वगायक की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 16 सितम्बर, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 336वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 332वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ और साथियों द्वारा शहनाई पर प्रस्तुत एक धुन का अंश सुनवा कर हमने आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, वाद्य – शहनाई, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – दादरा और कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, वादक – उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ और साथी

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे नियमित प्रतिभागी हैं - चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से आरम्भ हो चुकी हमारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” की यह पहली कड़ी थी। आज की इस कड़ी में आपने राग झिंझोटी की ठुमरी का रसास्वादन किया। आपके अनुरोध पर पुनर्प्रसारित इस श्रृंखला के अगले अंक में हम आपको एक और पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी रूप पर चर्चा करेंगे और शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर चर्चा करेंगे और सम्बन्धित रागों तथा संगीत शैली में निबद्ध कुछ रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन   
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Thursday, May 9, 2013

समाज-सुधार का दायित्व निभाती दो फिल्में


भारतीय सिनेमा के सौ साल – 44

कारवाँ सिने-संगीत का
1934 की दो फिल्में : ‘चण्डीदास’ और ‘अमृत मन्थन’


भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘कारवाँ सिने संगीत का’ में आप सभी सिनेमा-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। आज माह का दूसरा गुरुवार है और इस दिन हम ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ स्तम्भ के अन्तर्गत ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल के सदस्य सुजॉय चटर्जी की प्रकाशित पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ से किसी रोचक प्रसंग का उल्लेख करते हैं। आज के अंक में सुजॉय जी 1934 में ‘न्यू थिएटर्स’ की फिल्म ‘चण्डीदास’ और ‘प्रभात’ द्वारा निर्मित फिल्म ‘अमृत मन्थन’ का ज़िक्र कर रहे हैं। इन फिल्मों ने समाज में व्याप्त रूढ़ियों के विरुद्ध जनमानस को प्रेरित करने में अग्रणी भूमिका का निर्वहन किया था। 

सहगल
1934 की सबसे चर्चित फ़िल्म थी ‘न्यू थिएटर्स’ की ‘चण्डीदास’। उमा शशि के साथ सहगल की जोड़ी बनी और इस फ़िल्म ने चारों तरफ़ कामयाबी के परचम लहरा दिए। भले ही सहगल के पहले के गीत भी काफ़ी लोकप्रिय हुए थे, पर सही मायने में सहगल को स्टार ‘चण्डीदास’ ने ही बनाया। इस फ़िल्म को इससे पहले बांगला में 1932 में न्यू थिएटर्स ने ही बनाया था। ‘चण्डीदास’ कहानी है एक वैष्णव पुजारी-कवि की जो एक निम्न जाति की धोबन से प्रेम कर बैठता है। संगीतकार आर. सी. बोराल ने “प्रेम नगर में बनाऊँगी घर मैं” मुखड़े वाला सहगल और उमा शशि से जो युगल गीत गवाया था, वह मेरे ख़याल से फ़िल्म-संगीत के इतिहास का पहला सुपरहिट डुएट था। फ़िल्म के अन्य उल्लेखनीय गीतों में सहगल का “तड़पत बीते दिन रैन” और उमा शशि का “बसंत ऋतु आई आली फूल खिले डाले डाली” थे। पहाड़ी सान्याल ने भी इस फ़िल्म में गीत गाया था “छाई बसंत आई बसंत”। वैसे तो फ़िल्म के अधिकांश गीत भक्ति रस के थे, पर इन गीतों को सुन कर स्पष्ट पता लगता है कि फ़िल्मी गीत की शक्ल बदल रही थी। अब तक के गीत मूलत: शुद्ध शास्त्रीय संगीत या थिएटर संगीत पर आधारित हुआ करते थे, पर ‘चण्डीदास’ का संगीत आधुनिक फ़िल्म संगीत का ऐलान करता सुनाई दिया। ‘चण्डीदास’ के गीतों की ख़ासियत थी मंजीरा, खोल और मृदंग जैसे साज़ों का प्रयोग, जबकि अब तक केवल हारमोनियम और तबला ही सुनाई देते आ रहे थे। आग़ा हश्र कश्मीरी ने फ़िल्म के गीत लिखे। इसी वर्ष बोराल के संगीत में पहाड़ी सान्याल, पृथ्वीराज कपूर, सहगल, हुस्नबानो और उमा शशि अभिनीत ‘न्यू थिएटर्स’ की एक और फ़िल्म आई ‘डाकू मनसूर’। यह फ़िल्म उतनी नहीं चली और ना ही इसके गीत चले जो ज़्यादातर शायराना अंदाज़ के थे। बोराल ने प्रमथेश बरुआ निर्देशित फ़िल्म ‘रूपलेखा’ में भी संगीत दिया जिसमें सहगल का गाया “सब दिन होत न एक समान” बहुत लोकप्रिय हुआ था। लेकिन ‘डाकू मनसूर’ और ‘रूपलेखा’ के गीत ‘चण्डीदास’ के गीतों के आगे टिक न सके। आइए, अब हम आपको फिल्म ‘चण्डीदास’ का सहगल और उमा शशि का गाया सर्वाधिक लोकप्रिय गीत ‘प्रेम नगर में बनाऊँगी घर मैं...’ सुनवाते हैं।


फिल्म ‘चण्डीदास’ : ‘प्रेम नगर में बनाऊँगी घर मैं...’ : कुन्दनलाल सहगल और उमा शशि 



बसन्त देसाई
कोल्हापुर से पूना स्थानांतरित होने के बाद ‘प्रभात’ ने अपना नया ‘साउण्ड-प्रूफ़ स्टुडिओ’ बनाया और 1934 में बनाई ‘अमृत मंथन’। यही वह फ़िल्म थी जिसके संगीत ने गायिका-अभिनेत्री शांता आप्टे और संगीतकार केशवराव भोले को रातों रात कामयाबी के शिखर पर बिठा दिया। हिंदू धर्म के अनैतिक क्रूरता के विरुद्ध आवाज़ उठाती इस फ़िल्म ने बम्बई के ‘कृष्णा टॉकीज़’ में ‘सिलवर जुबिली’ मनाई और लगातार 29 सप्ताह चली। शांता आप्टे की आवाज़ में फ़िल्म के दो यादगार गीत हैं “रात आई है नया रंग जमाने के लिए, लेके आराम का पैग़ाम ज़माने के लिए” और “कमसीनी में दिल पे ग़म का बाढ़ है”। केशवराव का संगीत इस फ़िल्म में प्रयोगधर्मी था। वसंत देसाई, जो आगे चलकर शांताराम के मुख्य संगीतकार बने, इस फ़िल्म में एक गीत गाया था “सखी री श्याम बड़ो ढिठियारो”। वसंत देसाई नायक बनने ‘प्रभात’ में शांताराम के पास आये थे, तो उन्हें फ़िल्म-निर्माण के हर पहलू को जानने और परखने का सुझाव शांताराम ने दिया। उस प्रथम मुलाक़ात के बारे में वसंत देसाई ने एक मशहूर रेडिओ ब्रॉडकास्टर को कुछ इन शब्दों में बताया था– “अजी बस एक दिन यूंही सामने जाके खड़ा हो गया कि मुझे ऐक्टर बनना है। म्युज़िक तब कहाँ आता था? और वैसे भी फ़िल्मों में हर कोई पहले ऐक्टर बनने आता है। फिर बन जाता है टेक्निशियन, तो मैं भी बाल बढ़ाकर पहुँच गया ऐक्टर बनने। मगर एक कमी थी मुझमें, मैं दुबला पतला और छोटे कद का था जब कि वह स्टण्ट का ज़माना था। सब ऊँचे कद के पहलवान जैसे हुआ करते थे, छोटे कद के आदमी का काम नहीं था। शांताराम जी ने पूछा, 'क्या करना चाहते हो?' मैंने गर्दन हिलाकर बल दिखाये और कहा कि ऐक्टर बनना चाहता हूँ। उन्होंने मुझे सर से पाँव तक देखा और सोचा होगा कि लड़का पागल है। फिर मुझ पर तरस आ गया और बोले कि मैं तुम्हे रख लेता हूँ, मगर सब काम करना पड़ेगा, कल से आ जाओ स्टुडिओ में। मैं ऑफ़िस बॉय बन गया, नो पगार, मुफ़्त में 18-18 घंटे का काम। अरे, मालिक ख़ुद काम करते थे हमारे साथ, ॠषी आश्रम के जैसा था 'प्रभात'। उनका हमेशा से ऐसा है कि जैसा कहें वैसा फ़ौरन कर दो। और मैं भी उनकी हर बात मानता था, इसलिए मुझसे वो हमेशा ख़ुश रहते थे। जिस सेक्शन में कमी हो, अन्ना साहब मुझे फ़ौरन भेज देते, चाहे वह कैमरा सेक्शन हो या म्युज़िक डिपार्टमेण्ट। इसलिए आज मैं हर डिपार्टमेण्ट का काम जानता हूँ। मैं उनका ऐसिस्टैण्ट डिरेक्टर तक रहा हूँ। सिनेमा तकनीक में मैं उन्हें गुरु मानता हूँ। एक साल के बाद उन्होंने मेरी तनख्वाह सात रुपये से बढ़ाकर 45 रुपये कर दी, और बाद में तो यह समझ लीजिए, 'प्रभात' में सबसे ज़्यादा तनख्वाह हीरो चंद्रमोहन को और मुझे मिलती थी।" वापस आते हैं ‘अमृत मंथन’ पर, इस फ़िल्म ने व्ही. शांताराम को एक ऐसे सामाजिक फ़िल्मकार का दर्जा दिलवा दिया जो मनोरंजन के साथ साथ समाज की कुप्रथाओं के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है। इसके बाद शांताराम ने अपनी हर फ़िल्म में समाज को कोई न कोई सीख दी है। इस फ़िल्म में शांता आप्टे की उत्कृष्ट अभिनय के चलते फ़िल्म के विज्ञापन में लिखा गया- “Shanta Apte made 200000 persons shed tears at Krishna Talkies”. ‘अमृत मंथन’ का मराठी संस्करण महाराष्ट्र में ख़ूब चला तो इसके हिंदी संस्करण ने उत्तर भारत, पंजाब और लाहौर में धूम मचाई। आइए, अब इसी फिल्म का एक गीत “सखी री श्याम बड़ो ढिठियारो...” बसन्त देसाई के स्वर में सुनते हैं।


फिल्म ‘अमृत मन्थन’ : ‘सखी री श्याम बड़ो ढिठियारो...’ : बसन्त देसाई



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भ ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के अन्तर्गत आज हमने सुजॉय चटर्जी की इसी शीर्षक से प्रकाशित पुस्तक के कुछ पृष्ठ उद्धरित किये हैं। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के आगामी अंक में आपके लिए हम इस पुस्तक के कुछ और रोचक पृष्ठ लेकर उपस्थित होंगे। सुजॉय चटर्जी की पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ प्राप्त करने के लिए तथा अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव के लिए radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेजें।


शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

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