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रविवार, 18 अक्तूबर 2020

राग गान्धारी : SWARGOSHTHI – 484 : RAG GANDHARI




स्वरगोष्ठी – 484 में आज 

आसावरी थाट के राग – 6 : राग - गान्धारी 

प्रोफेसर बी.आर. देवधर से गान्धारी में रागदारी संगीत की रचना और के.एल. सहगल से गैरफिल्मी गीत सुनिए 





प्रोफेसर बी.आर. देवधर 


कुन्दनलाल सहगल 

“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “आसावरी थाट के राग” की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच स्वरों का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से आठवाँ थाट आसावरी है। इस श्रृंखला में हम आसावरी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम आसावरी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की छठी कड़ी में आज हमने आसावरी थाट के जन्य राग गान्धारी का चयन किया है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम आपके लिए षाड़व-सम्पूर्ण जाति के राग गान्धारी का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही सुविख्यात संगीतज्ञ और शिक्षक प्रोफेसर बी.आर. देवधर के स्वरों में राग गान्धारी में निबद्ध एक रागदारी रचना प्रस्तुत कर रहे हैं। इस राग के स्वरों का प्रयोग करने वाला कोई भी फिल्मी गीत नहीं मिला। अतः गायक और अभनेता कुन्दनलाल सहगल की आवाज़ में एक गैरफ़िल्मी गीत सुनवा रहे हैं। इस गीत की रिकार्डिंग का उपयोग 1955 में प्रदर्शित फिल्म "अमर सहगल" में किया गया है। गीत के आरम्भ में राग आसावरी और बाद में राग गान्धारी परिलक्षित होता है। गीत सम्भवतः हज़रत अमीर खुसरो का लिखा हुआ है और स्वयं कुन्दनलाल सहगल द्वारा स्वरबद्ध किया यह गीत कुन्दनलाल सहगल के ही स्वर में प्रस्तुत किया गया है। 



राग गान्धारी की गणना आसावरी थाट के अन्तर्गत की जाती है। इस राग में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल और दोनों ऋषभ स्वरों का प्रयोग किया जाता है। आरोह में गान्धार स्वर वर्जित होता है और अवरोह में सातो स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इसलिए इस राग की जाति षाड़व-सम्पूर्ण होती है। राग गान्धारी का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर कोमल गान्धार माना जाता है। इस राग के गायन अथवा वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय दिन का तीसरा प्रहर होता है। यह एक कम प्रचलित राग है। धैवत स्वर और उत्तरांग प्रधान चलन होने से इस राग की प्रस्तुति में ओज, पुकार और जागृति का भाव उत्पन्न होता है। आरोह में जौनपुरी की छाया परिलक्षित होती है किन्तु भैरवी और आसावरी की स्वर संगतियों के प्रयोग से वह छाया तिरोहित भी हो जाती है। राग में ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किये जाने के कारण यह प्रश्न भी उठ सकता है कि इस राग को भैरवी थाट के अन्तर्गत क्यों न रखा जाय। स्वर की दृष्टि से भैरवी और आसावरी में केवल ऋषभ स्वर का अन्तर है। अतः इसे भैरवी और आसावरी दोनों थाट में रखा जा सकता है। परन्तु राग गान्धारी का चलन आसावरी जैसा होने के कारण इसे आसावरी थाट में रखना अधिक उपयुक्त है। अब हम आपको राग "गान्धारी" की तीनताल में निबद्ध एक दुर्लभ बन्दिश सुनवाते हैं, जिसे गत शताब्दी के सुप्रसिद्ध शास्त्रज्ञ प्रोफेसर बी.आर. देवधर ने प्रस्तुत किया है। 

राग गान्धारी : "जियरा लरजे मोरा..." : प्रोफेसर बी.आर. देवधर 

 

राग गान्धारी उत्तरांग प्रधान राग है। इसका चलन राग जौनपुरी की तरह मध्य सप्तक के उत्तरांग में तथा तार सप्तक में अधिक होता है, किन्तु पूर्वांग में दोनों ऋषभ के प्रयोग से यह राग स्पष्ट हो जाता है और समप्रकृति रागों से अलग हो जाता है। राग गान्धारी पर आधारित किसी फिल्मी गीत को खोजने का हमने काफी प्रयास किया, किन्तु हमें सफलता नहीं मिली। इस खोज को आगे बढ़ाने के लिए हमने अपने मित्र और "फिल्मी गीतों में राग" विषयक शोधकर्ता व "हिन्दी सिने राग इन्साक्लोपीडिया" के लेखक श्री के.एल. पाण्डेय से सम्पर्क किया। श्री पाण्डेय के अनुसार उन्हें राग गान्धारी पर आधारित एक भी फिल्मी गीत नहीं मिला। हाँ, गायक-अभिनेता कुन्दनलाल सहगल कि आवाज़ में एक गैर फिल्मी गीत अवश्य मिला है, जिसमें राग आसावरी और गान्धारी का मेल है। आज हम आपको यही गीत सुनवाते है। फिल्म संगीत के इतिहास के लेखक और शोधकर्ता सुजॉय चटर्जी और सहगल के जीवन पर आधारित 1955 में प्रदर्शित फिल्म "अमर सहगल" के अनुसार यह गीत कुन्दनलाल सहगल ने फिल्मी दुनियाँ में आने से पूर्व गाया था। इस गीत में राग आसावरी के साथ राग गान्धारी का प्रयोग हुआ है। गीतकार के नाम के विषय में श्री चटर्जी ने बताया कि अधिक सम्भावना अमीर खुसरो की है। वर्ष 1932 में यह गीत हिन्दुस्तान ग्रामोफोन कम्पनी ने रिकार्ड किया था। फिल्म "अमर सहगल" में इसी रिकार्ड का प्रयोग किया गया है। गीत के संगीतकार पर भी पर्याप्त मतभेद है। रिकार्ड पर संगीतकार के रूप में सहगल का नाम ही अंकित है, किन्तु कहीं-कहीं आर.सी. बोराल का नाम और कुछ इतिहासकारों के अनुसार अपरेश लाहिड़ी के नाम का अनुमान लगाया गया है। यदि किसी पाठक को इस गीत के विषय में कोई प्रामाणिक जानकारी हो तो कृपया हमें अवश्य सूचित करें। आप यह गैरफिल्मी गीत सुनिए और हमें आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग गान्धारी और आसावरी : "झुलना झुलाओ री..." : स्वर - कुन्दनलाल सहगल : गैरफिल्मी गीत 




संगीत पहेली

"स्वरगोष्ठी" के 483वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित, गैरफिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के चौथे सत्र अर्थात अंक संख्या 490 की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें इस वर्ष के चतुर्थ सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा। 





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है? 

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए। 

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायक के स्वर है? 

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 24 अक्तूबर, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 486 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 482वें अंक में हमने आपको 1952 में प्रदर्शित फिल्म "बैजू बावरा" के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की गई थी। इस गीत के आधार राग को पहचानने में हमारे अधिकतर प्रतिभागी सफल रहे। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग - देसी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर और उस्ताद अमीर खाँ। 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, और शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अब तक हम काफी हद तक हम सफल भी हुए हैं। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “आसावरी थाट के राग” की छठी कड़ी में आज आपने आसावरी थाट के जन्य राग गान्धारी का परिचय प्राप्त किया। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए हमने आपको सुप्रसिद्ध संगीतविद प्रोफेसर बी.आर. देवधर के स्वरों में राग की एक बन्दिश सुनवाया। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार हमने फिल्मी गीतों में राग गान्धारी के प्रयोग को खोजने का पर्याप्त प्रयास किया, परन्तु हमें ऐसा कोई भी गीत नहीं मिला। अन्ततः आज की कड़ी में हम आपको 1932 में रिकार्ड किया और कुन्दनलाल सहगल के स्वर में प्रस्तुत एक गैरफिल्मी गीत प्रस्तुत किया है। इस गीत में राग आसावरी के साथ राग गान्धारी का प्रयोग हुआ है। 

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग गान्धारी : SWARGOSHTHI – 484 : RAG GANDHARI : 18 अक्तूबर, 2020
 


रविवार, 5 अप्रैल 2020

राग बहार : SWARGOSHTHI – 463 : RAG BAHAR







स्वरगोष्ठी – 463 में आज

काफी थाट के राग – 7 : राग बहार

उस्ताद राशिद खाँ से राग बहार में एक खयाल और कुन्दनलाल सहगल के जन्मदिन पर उनसे फिल्मी गीत सुनिए




कुन्दनलाल सहगल
उस्ताद राशिद खाँ
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “काफी थाट के राग” की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच स्वर का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार उस समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से सातवाँ थाट काफी है। इस श्रृंखला में हम काफी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम काफी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। आज के अंक में काफी थाट के जन्य राग बहार पर चर्चा करेंगे। आज श्रृंखला की सातवीं कड़ी में पहले हम आपको सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद राशिद खाँ से राग बहार में निबद्ध खयाल का रसास्वादन करा रहे हैं और फिर इसी राग पर आधारित 1943 में प्रदर्शित फिल्म “तानसेन” से एक गीत कुन्दनलाल सहगल के स्वर में प्रस्तुत करेंगे। इसी सप्ताह 11 अप्रैल को सहगल की जयन्ती है। फिल्म के संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश हैं।


राग बहार का सम्बन्ध काफी थाट से माना जाता है। इस राग के आरोह में ऋषभ स्वर और अवरोह में धैवत स्वर वर्जित होता है। इस राग की जाति षाडव-षाडव होती है। इसमें गान्धार कोमल तथा दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। मध्यरात्रि में राग बहार के गाने-बजाने की परम्परा है। किन्तु यह ऋतु प्रधान राग है। बसन्त ऋतु में यह राग किसी भी समय गाया या बजाया जा सकता है। राग बहार में निबद्ध गीतों में बसन्त ऋतु का वर्णन मिलता है। इस राग का उल्लेख किसी भी प्राचीन ग्रन्थ में नहीं मिलता। वस्तुतः इस राग की रचना मध्यकाल में हुई है। वास्तव में यह राग तीन रागों; बागेश्री, अड़ाना और मियाँ मल्हार के मिश्रण से बना है। स्वयं भातखण्डे जी ने “क्रमिक पुस्तक माला” के चौथे भाग में राग बहार के लक्षण गीत में लिखा है; “बागेश्री, मल्हार सुम्मिलत...सुर अड़ाना बीच चमकत...”। राग बहार उत्तरांग प्रधान राग है। इसका चलन अधिकतर सप्तक के उत्तर अंग में तथा तार सप्तक में होता है। इसके आरोह में पंचम तथा अवरोह में गान्धार स्वर वक्र होते है। इस राग की प्रकृति चंचल है, अतः इसमें बड़ा खयाल तथा मसीतखानी गते कम सुनने को मिलती है। राग बहार के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम आपको उस्ताद राशिद खाँ के स्वर में इस राग में निबद्ध तीन ताल की एक रचना सुनवा रहे हैं, जिसके बोल हैं; “मतवारी कोयलिया डार डार...”। इसे हम "यूट्यूब" के सौजन्य से वीडियो माध्यम में प्रस्तुत कर रहे हैं।

राग बहार : “मतवारी कोयलिया डार डार...” : उस्ताद राशिद खाँ


उपरोक्त रचना में बसन्त ऋतु का चित्रण है। इस सप्ताह 11 अप्रैल को सुविख्यात गायक / अभिनेता कुन्दनलाल सहगल (के.एल. सहगल) की जयन्ती है। उनका जन्म इसी दिन वर्ष 1904 में हुआ था। उन्हीं के गाये गीतों में से राग बहार पर आधारित एक गीत हमने चुना है। इस गीत का चयन करने और उसे उपलब्ध कराने में हमे “फिल्म संगीत में रागों का योगदान” विषयक शोधकर्ता व संगीत के कई पुस्तकों के लेखक कन्हैयालाल पाण्डेय (के.एल. पाण्डेय) का सहयोग प्राप्त हुआ है। 1943 में सहगल के अभिनय और गायकी से सजी एक उल्लेखनीय फिल्म “तानसेन” का प्रदर्शन हुआ था। फिल्म संगीत के सुप्रसिद्ध इतिहासकार सुजॉय चटर्जी लिखते है; “रणजीत मूवीटोन’ के बैनर तले निर्मित ‘तानसेन’ ने न केवल खेमचन्द प्रकाश की प्रतिभा पर स्वर्णमुहर लगायी बल्कि संगीत सम्राट तानसेन के व्यक्तित्व और सुरसाधना को साकार करने में पूरा-पूरा न्याय किया। ध्रुवपद शैली और राजस्थानी लोक-संगीत, इन दोनों का प्रयोग करते हुए खेमचन्द ने इस फ़िल्म के गीतों की रचना की जिनमें राग-रागिनियों की सुमधुर छटा सुनने को मिली। शंकरा, मेघ मल्हार, दीपक, सारंग, दरबारी, तिलक कामोद और मियाँ मल्हार जैसे रागों का प्रयोग कर एक ऐसा सुरीला समा बाँधा जो आज तक बन्धा हुआ है अच्छे संगीत के रसिकों के मन में। तानसेन के किरदार को साकार करने के लिए कुन्दनलाल सहगल से बेहतर उस समय के नायकों में और कौन हो सकता था! एक तरफ़ सहगल तो उनकी नायिका बनीं एक और श्रेष्ठ गायिका-अभिनेत्री ख़ुर्शीद। हालाँकि फ़िल्म में कुल 12 गीत थे, पर केवल एक ही गीत इन दोनों ने युगल स्वरों में गाया। फ़िल्म के गीत लिखे पण्डित इन्द्र और डी. एन. मधोक ने। सहगल के एकल स्वर में गाये राग शंकरा आधारित “रुमझुम रुमझुम चाल तिहारी”, राग दीपक आधारित “दीया जलाओ जगमग जगमग”, राग कल्याण में उस्ताद अल्लादिया ख़ाँ की बन्दिशों पर आधारित “सप्त सुरन तीन ग्राम, साधो सब गुनी जन”, राग पीलू आधारित “काहे गुमान करे री गोरी”, राग बहार पर आधारित “बाग लगा दूँ सजनी तोरे नयनन में” जैसे गीत सर्वसाधारण के होठों पर लम्बे समय तक फिरते रहे। उधर ख़ुर्शीद भी पीछे नहीं थीं। राग मेघ मल्हार आधारित “बरसो रे बरसो रे काले बदरवा”, राग सारंग आधारित “घटा घनघोर मोर मचावे शोर”, “अब राजा भये मोरे बालम” और “हो दुखिया जियरा रोते नैना” जैसे ख़ुर्शीद के गाए गीतों ने भी ख़ूब धूम मचाया। ‘हमराज़ गीत कोश’ में यह जानकारी दी गई है कि संगीतकार बुलो. सी. रानी के अनुसार “हो दुखिया जियरा” की संगीत रचना वास्तव में उन्होंने की थी पर रेकॉर्ड पर उनका नाम नहीं आया। ख़ुर्शीद और सहगल का गाया फ़िल्म का एकमात्र युगल गीत “मोरे बालापन के साथी छैला भूल जैहो ना” भी उतना ही लोकप्रिय हुआ था जो तिलक कामोद पर आधारित था। संगीतकार नौशाद, जो खेमचन्द प्रकाश को अपना गुरु मानते थे, उन्होंने एक बार यह कहा था कि उन्होंने अपनी फ़िल्म ‘बैजू बावरा’ (1952) में ‘तानसेन’ जैसा जादू जगाना चाहा, पर वो उत्कृष्टता की उस ऊँचाई तक नहीं पहुँच सके जहाँ पर उनके गुरु ‘तानसेन’ में पहुँचे थे।” आप सहगल का गाया तीनताल में निबद्ध यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग बहार : “बाग लगा दूँ सजनी...” : कुन्दनलाल सहगल : फिल्म – तानसेन




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 463वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1960 में निर्मित किन्तु अप्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित लोकप्रिय गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के दूसरे सत्र अर्थात 470वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें वर्ष के द्वितीय सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायक के स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 11 अप्रैल, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 465 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 461वें अंक में हमने आपको 1953 में प्रदर्शित फिल्म “अनारकली” से एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – बागेश्री, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – दादरा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – हेमन्त कुमार और लता मंगेशकर।

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; खण्डवा, मध्यप्रदेश से रविचन्द्र जोशी, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ईमेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।

संवाद


मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, कोरोना वायरस से बचाव के लिए स्वैच्छिक लॉकडाउन पर हैं। बस अब कुछ हे दिन शेष बचे हैं। विश्वास कीजिए, हमारे इस अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि लॉकडाउन कि स्थिति में शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में ही सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी’ की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ।

अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “काफी थाट के राग” की सातवीं कड़ी में आज आपने काफी थाट के जन्य राग बहार का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने आज पहले हमने आपको सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ उस्ताद राशिद खाँ से राग बहार में निबद्ध एक खयाल का रसास्वादन कराया और फिर इसी राग पर आधारित 1943 में प्रदर्शित एक फिल्म “तानसेन” से ऋतु प्रधान एक गीत कुन्दनलाल सहगल के स्वर में प्रस्तुत किया। गीतकार पण्डित इन्द्र हैं और फिल्म के संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश हैं। कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
  राग बहार : SWARGOSHTHI – 463 : RAG BAHAR : 5 अप्रैल, 2020 

रविवार, 22 अक्तूबर 2017

ठुमरी भैरवी : SWARGOSHTHI – 340 : THUMARI BHAIRAVI




स्वरगोष्ठी – 340 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 7 : ठुमरी भैरवी

पण्डित भीमसेन और सहगल के स्वर में लौकिक और आध्यात्मिक भाव का बोध कराती कालजयी ठुमरी – “बाबुल मोरा...”




कुन्दनलाल सहगल
पण्डित भीमसेन जोशी
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” की इस सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी सहयोगी संज्ञा टण्डन के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पिछली श्रृंखला की भाँति इस श्रृंखला में भी हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। गीतों का परिचयात्मक आलेख हम अपने सम्पादक-मण्डल की सदस्य संज्ञा टण्डन की रिकार्ड किये आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा, अवश्य सूचित कीजिएगा। दरअसल यह श्रृंखला पूर्व में प्रकाशित / प्रसारित की गई थी। हमारे पाठकों / श्रोताओं को यह श्रृंखला सम्भवतः कुछ अधिक रुचिकर प्रतीत हुई थी। अनेक संगीत-प्रेमियों ने इसके पुनर्प्रसारण का आग्रह किया है। सभी सम्मानित पाठकों / श्रोताओं के अनुरोध का सम्मान करते हुए और पूर्वप्रकाशित श्रृंखला में थोड़ा परिमार्जन करते हुए यह श्रृंखला हम पुनः प्रस्तुत कर रहे हैं। हमारी नई लघु श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” के शीर्षक से ही यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में शामिल की गई उपशास्त्रीय गायन शैली ठुमरी है। सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से फ़िल्मी गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित पारसी रंगमंच के संगीत और पारम्परिक ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग आरम्भ हो गया था। विशेष रूप से फिल्मों के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता की पूर्ति की थी। चौथे दशक के मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में सैकड़ों ठुमरियों का प्रयोग हुआ है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला में हम आपसे ऐसी ही कुछ चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात करेंगे। आज के अंक हम आपको अवध के नवाब वाजिद अली शाह की सुविख्यात ठुमरी- ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय...’ का गायन पारम्परिक और फिल्मी दोनों रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। राग भैरवी की इस ठुमरी का पारम्परिक गायन पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में और फिल्म ‘स्ट्रीट सिंगर’ मेँ कुन्दनलाल सहगल की आवाज़ में प्रस्तुत किया गया है। 



ठुमरी भैरवी : ‘बाबुल मोरा नैहर छुटो जाए...’ : पण्डित भीमसेन जोशी
ठुमरी भैरवी : ‘बाबुल मोरा नैहर छुटो जाए...’ : कुन्दनलाल सहगल : फिल्म – स्ट्रीट सिंगर





संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 340वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक फिल्मी युगल ठुमरी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। संगीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक ही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – इस ठुमरी रचना का अंश सुन कर बताइए कि आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – इस ठुमरी गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – इस युगल ठुमरी में किस गायक और गायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 28 अक्टूबर, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 342वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 338वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको वर्ष 1962 में प्रदर्शित फिल्म – “सौतेला भाई” से ली गई ठुमरी का अंश सुनवा कर हमने आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग अड़ाना, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – द्रुत एकताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – लता मंगेशकर

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में तीनों प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे प्रतिभागी हैं पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। हमारे तीन पाठकों ने केवल एक प्रश्न का सही उत्तर दिया है। चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, और हमारी एक नई प्रतिभागी अंजलि जोशी को केवल एक-एक अंक ही दिया जाता है। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” की इस सातवीं कड़ी में आपने एक पारम्परिक ठुमरी को राग भैरवी में पण्डित भीमसेन जोशी और फिल्मी रूप का सुविख्यात गायक कुन्दनलाल सहगल के स्वरों में रसास्वादन किया। आपके अनुरोध पर पुनर्प्रसारित इस श्रृंखला के अगले अंक में हम आपको एक और पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी रूप पर चर्चा करेंगे और शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर चर्चा करेंगे और सम्बन्धित रागों तथा संगीत शैली में निबद्ध कुछ रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन   
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

रविवार, 10 सितंबर 2017

ठुमरी झिझोटी : SWARGOSHTHI – 334 : THUMARI JHINJHOTI




स्वरगोष्ठी – 334 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी - 1 : “पिया बिन नाहीं आवत चैन...”

जब सहगल ने उस्ताद अब्दुल करीम खाँ की गायी ठुमरी को अपना स्वर दिया




उस्ताद अब्दुल करीम खाँ
कुन्दनलाल सहगल
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से आरम्भ हो रही श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ की इस पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी सहयोगी संज्ञा टण्डन के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। गीतों का परिचयात्मक आलेख हम अपने सम्पादक-मण्डल की सदस्य संज्ञा टण्डन की रिकार्ड किये आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा, अवश्य सूचित कीजिएगा। दरअसल यह श्रृंखला पूर्व में प्रकाशित / प्रसारित की गई थी। हमारे पाठकों / श्रोताओं को यह श्रृंखला सम्भवतः कुछ अधिक रुचिकर प्रतीत हुई थी। अनेक संगीत-प्रेमियों ने इसके पुनर्प्रसारण का आग्रह किया है। सभी सम्मानित पाठकों / श्रोताओं के अनुरोध का सम्मान करते हुए और पूर्वप्रकाशित श्रृंखला में थोड़ा परिमार्जन करते हुए यह श्रृंखला हम पुनः प्रस्तुत कर रहे हैं। आज से शुरू हो रही हमारी नई लघु श्रृंखला 'फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के शीर्षक से ही यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में शामिल की गई उपशास्त्रीय गायन शैली ठुमरी है। सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से फ़िल्मी गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित पारसी रंगमंच के संगीत और पारम्परिक ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग आरम्भ हो गया था। विशेष रूप से फिल्मों के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता की पूर्ति की थी। चौथे दशक के मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में सैकड़ों ठुमरियों का प्रयोग हुआ है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला में हम आपसे ऐसी ही कुछ चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात करेंगे। आज हम आपके लिए फिल्म देवदास की जिस ठुमरी को लेकर उपस्थित हुए हैं वह 1936 में हिन्दी भाषा में निर्मित फिल्म देवदास की है। राग झिंझोटी की यह ठुमरी 1925 -26 में महाराज कोल्हापुर के राजगायक रहे उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के स्वरों में है। आज के अंक में आप खाँ साहब की आवाज़ में पारम्परिक और हिन्दी फिल्मों के यशस्वी गायक और नायक कुन्दनलाल सहगल की आवाज़ में फिल्मी संस्करण सुनेंगे।


राग - झिंझोटी : ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन...’ : कुन्दनलाल सहगल : फिल्म - देवदास 1936
राग - झिंझोटी : ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन...’ : उस्ताद अब्दुल करीम खाँ : पारम्परिक ठुमरी



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 334वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक फिल्मी ठुमरी अथवा दादरा गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। संगीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक ही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 340वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह कौन सा राग है?

2 – संगीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – यह किस फिल्मी पार्श्वगायक की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 16 सितम्बर, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 336वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 332वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ और साथियों द्वारा शहनाई पर प्रस्तुत एक धुन का अंश सुनवा कर हमने आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, वाद्य – शहनाई, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – दादरा और कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, वादक – उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ और साथी

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे नियमित प्रतिभागी हैं - चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से आरम्भ हो चुकी हमारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” की यह पहली कड़ी थी। आज की इस कड़ी में आपने राग झिंझोटी की ठुमरी का रसास्वादन किया। आपके अनुरोध पर पुनर्प्रसारित इस श्रृंखला के अगले अंक में हम आपको एक और पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी रूप पर चर्चा करेंगे और शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर चर्चा करेंगे और सम्बन्धित रागों तथा संगीत शैली में निबद्ध कुछ रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन   
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

गुरुवार, 9 मई 2013

समाज-सुधार का दायित्व निभाती दो फिल्में


भारतीय सिनेमा के सौ साल – 44

कारवाँ सिने-संगीत का
1934 की दो फिल्में : ‘चण्डीदास’ और ‘अमृत मन्थन’


भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘कारवाँ सिने संगीत का’ में आप सभी सिनेमा-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। आज माह का दूसरा गुरुवार है और इस दिन हम ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ स्तम्भ के अन्तर्गत ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल के सदस्य सुजॉय चटर्जी की प्रकाशित पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ से किसी रोचक प्रसंग का उल्लेख करते हैं। आज के अंक में सुजॉय जी 1934 में ‘न्यू थिएटर्स’ की फिल्म ‘चण्डीदास’ और ‘प्रभात’ द्वारा निर्मित फिल्म ‘अमृत मन्थन’ का ज़िक्र कर रहे हैं। इन फिल्मों ने समाज में व्याप्त रूढ़ियों के विरुद्ध जनमानस को प्रेरित करने में अग्रणी भूमिका का निर्वहन किया था। 

सहगल
1934 की सबसे चर्चित फ़िल्म थी ‘न्यू थिएटर्स’ की ‘चण्डीदास’। उमा शशि के साथ सहगल की जोड़ी बनी और इस फ़िल्म ने चारों तरफ़ कामयाबी के परचम लहरा दिए। भले ही सहगल के पहले के गीत भी काफ़ी लोकप्रिय हुए थे, पर सही मायने में सहगल को स्टार ‘चण्डीदास’ ने ही बनाया। इस फ़िल्म को इससे पहले बांगला में 1932 में न्यू थिएटर्स ने ही बनाया था। ‘चण्डीदास’ कहानी है एक वैष्णव पुजारी-कवि की जो एक निम्न जाति की धोबन से प्रेम कर बैठता है। संगीतकार आर. सी. बोराल ने “प्रेम नगर में बनाऊँगी घर मैं” मुखड़े वाला सहगल और उमा शशि से जो युगल गीत गवाया था, वह मेरे ख़याल से फ़िल्म-संगीत के इतिहास का पहला सुपरहिट डुएट था। फ़िल्म के अन्य उल्लेखनीय गीतों में सहगल का “तड़पत बीते दिन रैन” और उमा शशि का “बसंत ऋतु आई आली फूल खिले डाले डाली” थे। पहाड़ी सान्याल ने भी इस फ़िल्म में गीत गाया था “छाई बसंत आई बसंत”। वैसे तो फ़िल्म के अधिकांश गीत भक्ति रस के थे, पर इन गीतों को सुन कर स्पष्ट पता लगता है कि फ़िल्मी गीत की शक्ल बदल रही थी। अब तक के गीत मूलत: शुद्ध शास्त्रीय संगीत या थिएटर संगीत पर आधारित हुआ करते थे, पर ‘चण्डीदास’ का संगीत आधुनिक फ़िल्म संगीत का ऐलान करता सुनाई दिया। ‘चण्डीदास’ के गीतों की ख़ासियत थी मंजीरा, खोल और मृदंग जैसे साज़ों का प्रयोग, जबकि अब तक केवल हारमोनियम और तबला ही सुनाई देते आ रहे थे। आग़ा हश्र कश्मीरी ने फ़िल्म के गीत लिखे। इसी वर्ष बोराल के संगीत में पहाड़ी सान्याल, पृथ्वीराज कपूर, सहगल, हुस्नबानो और उमा शशि अभिनीत ‘न्यू थिएटर्स’ की एक और फ़िल्म आई ‘डाकू मनसूर’। यह फ़िल्म उतनी नहीं चली और ना ही इसके गीत चले जो ज़्यादातर शायराना अंदाज़ के थे। बोराल ने प्रमथेश बरुआ निर्देशित फ़िल्म ‘रूपलेखा’ में भी संगीत दिया जिसमें सहगल का गाया “सब दिन होत न एक समान” बहुत लोकप्रिय हुआ था। लेकिन ‘डाकू मनसूर’ और ‘रूपलेखा’ के गीत ‘चण्डीदास’ के गीतों के आगे टिक न सके। आइए, अब हम आपको फिल्म ‘चण्डीदास’ का सहगल और उमा शशि का गाया सर्वाधिक लोकप्रिय गीत ‘प्रेम नगर में बनाऊँगी घर मैं...’ सुनवाते हैं।


फिल्म ‘चण्डीदास’ : ‘प्रेम नगर में बनाऊँगी घर मैं...’ : कुन्दनलाल सहगल और उमा शशि 



बसन्त देसाई
कोल्हापुर से पूना स्थानांतरित होने के बाद ‘प्रभात’ ने अपना नया ‘साउण्ड-प्रूफ़ स्टुडिओ’ बनाया और 1934 में बनाई ‘अमृत मंथन’। यही वह फ़िल्म थी जिसके संगीत ने गायिका-अभिनेत्री शांता आप्टे और संगीतकार केशवराव भोले को रातों रात कामयाबी के शिखर पर बिठा दिया। हिंदू धर्म के अनैतिक क्रूरता के विरुद्ध आवाज़ उठाती इस फ़िल्म ने बम्बई के ‘कृष्णा टॉकीज़’ में ‘सिलवर जुबिली’ मनाई और लगातार 29 सप्ताह चली। शांता आप्टे की आवाज़ में फ़िल्म के दो यादगार गीत हैं “रात आई है नया रंग जमाने के लिए, लेके आराम का पैग़ाम ज़माने के लिए” और “कमसीनी में दिल पे ग़म का बाढ़ है”। केशवराव का संगीत इस फ़िल्म में प्रयोगधर्मी था। वसंत देसाई, जो आगे चलकर शांताराम के मुख्य संगीतकार बने, इस फ़िल्म में एक गीत गाया था “सखी री श्याम बड़ो ढिठियारो”। वसंत देसाई नायक बनने ‘प्रभात’ में शांताराम के पास आये थे, तो उन्हें फ़िल्म-निर्माण के हर पहलू को जानने और परखने का सुझाव शांताराम ने दिया। उस प्रथम मुलाक़ात के बारे में वसंत देसाई ने एक मशहूर रेडिओ ब्रॉडकास्टर को कुछ इन शब्दों में बताया था– “अजी बस एक दिन यूंही सामने जाके खड़ा हो गया कि मुझे ऐक्टर बनना है। म्युज़िक तब कहाँ आता था? और वैसे भी फ़िल्मों में हर कोई पहले ऐक्टर बनने आता है। फिर बन जाता है टेक्निशियन, तो मैं भी बाल बढ़ाकर पहुँच गया ऐक्टर बनने। मगर एक कमी थी मुझमें, मैं दुबला पतला और छोटे कद का था जब कि वह स्टण्ट का ज़माना था। सब ऊँचे कद के पहलवान जैसे हुआ करते थे, छोटे कद के आदमी का काम नहीं था। शांताराम जी ने पूछा, 'क्या करना चाहते हो?' मैंने गर्दन हिलाकर बल दिखाये और कहा कि ऐक्टर बनना चाहता हूँ। उन्होंने मुझे सर से पाँव तक देखा और सोचा होगा कि लड़का पागल है। फिर मुझ पर तरस आ गया और बोले कि मैं तुम्हे रख लेता हूँ, मगर सब काम करना पड़ेगा, कल से आ जाओ स्टुडिओ में। मैं ऑफ़िस बॉय बन गया, नो पगार, मुफ़्त में 18-18 घंटे का काम। अरे, मालिक ख़ुद काम करते थे हमारे साथ, ॠषी आश्रम के जैसा था 'प्रभात'। उनका हमेशा से ऐसा है कि जैसा कहें वैसा फ़ौरन कर दो। और मैं भी उनकी हर बात मानता था, इसलिए मुझसे वो हमेशा ख़ुश रहते थे। जिस सेक्शन में कमी हो, अन्ना साहब मुझे फ़ौरन भेज देते, चाहे वह कैमरा सेक्शन हो या म्युज़िक डिपार्टमेण्ट। इसलिए आज मैं हर डिपार्टमेण्ट का काम जानता हूँ। मैं उनका ऐसिस्टैण्ट डिरेक्टर तक रहा हूँ। सिनेमा तकनीक में मैं उन्हें गुरु मानता हूँ। एक साल के बाद उन्होंने मेरी तनख्वाह सात रुपये से बढ़ाकर 45 रुपये कर दी, और बाद में तो यह समझ लीजिए, 'प्रभात' में सबसे ज़्यादा तनख्वाह हीरो चंद्रमोहन को और मुझे मिलती थी।" वापस आते हैं ‘अमृत मंथन’ पर, इस फ़िल्म ने व्ही. शांताराम को एक ऐसे सामाजिक फ़िल्मकार का दर्जा दिलवा दिया जो मनोरंजन के साथ साथ समाज की कुप्रथाओं के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है। इसके बाद शांताराम ने अपनी हर फ़िल्म में समाज को कोई न कोई सीख दी है। इस फ़िल्म में शांता आप्टे की उत्कृष्ट अभिनय के चलते फ़िल्म के विज्ञापन में लिखा गया- “Shanta Apte made 200000 persons shed tears at Krishna Talkies”. ‘अमृत मंथन’ का मराठी संस्करण महाराष्ट्र में ख़ूब चला तो इसके हिंदी संस्करण ने उत्तर भारत, पंजाब और लाहौर में धूम मचाई। आइए, अब इसी फिल्म का एक गीत “सखी री श्याम बड़ो ढिठियारो...” बसन्त देसाई के स्वर में सुनते हैं।


फिल्म ‘अमृत मन्थन’ : ‘सखी री श्याम बड़ो ढिठियारो...’ : बसन्त देसाई



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शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

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