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शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

दुम न हिलाओ, कान काट खाओ.....उबलता आक्रोश युवाओं का समेटा वी डी, ऋषि और उन्नी ने इस नए गीत में

Season 3 of new Music, Song # 15

"जला दो अभी फूंक डालो ये दुनिया...", गुरु दत्त के स्वरों में एक सहमा मगर संतुलित आक्रोश था जिसे पूरे देश के युवाओं में समझा. बाद के दशकों में ये स्वर और भी मुखरित हुए, कभी व्यंग बनकर (हाल चाल ठीक ठाक है) कभी गुस्सा (दुनिया माने बुरा तो गोली मारो) तो कभी अंडर करंट आक्रोश (खून चला) बनकर. कुछ ऐसे ही भाव लेकर आये हैं आज के युवा गीतकार विश्व दीपक "तन्हा" अपने इस नए गीत में. ऋषि पर आरोप थे कि उनकी धुनों में नयापन नहीं दिख रहा, पर हम बताना चाहेंगें कि हमारे अब तक के सभी सत्रों में ऋषि के गीत सबसे अधिक बजे हैं, जाहिर है एक संगीतकार के लिहाज से उनका अपना एक स्टाइल है जो अब निखर कर सामने आ रहा है, रही बात विविधता की तो हमें लगता है कि जितने विविध अंदाज़ ऋषि ने आजमाए हैं शायद ही किसी ने किये होंगें. अब आज का ही गीत ले लीजिए, ये उनके अब तक के सभी गीतों से एकदम अलग है. गायक उन्नी का ये दूसरा गीत है इस सत्र में, पर पहला एकल गीत भी है ये उनका. गीत के अंत में कुछ संवाद भी हैं जिन्हें आवाज़ दी है खुद विश्व दीपक ने, बैक अप आवाज़ तो ऋषि की है ही....तो लीजिए सुनिए आज का ये जोश से भरा दनदनाता गीत.

गीत के बोल -

सादी या आधी या पौनी थालियाँ,
भूखे को सारी……. हैं गालियाँ….

झटका ज़रा दो,
फ़टका जमा दो,
हक़ ना मिले तो,
ऐसी की तैसी……

दुम ना हिलाओ,
कान काट खाओ,
हड्डियाँ चबाओ,
ऐसी की तैसी….

भुलावे में जिये अभी तक,
चढावे में दिये उन्हें सब,
मावे की लगी जो हीं लत,
वादों पे लगी चपत…….

झटका ज़रा दो,
फ़टका जमा दो,
हक़ ना मिले तो,
ऐसी की तैसी……

दुम ना हिलाओ,
कान काट खाओ,
हड्डियाँ चबाओ,
ऐसी की तैसी….

लुट के, घुट के, फुट के, रोना क्या?
लुट के, घुट के, फुट के, रोना क्या?
लुट के, घुट के, फुट के, रोना क्या?
लुट के, घुट के, फुट के, रोना क्या?

बढ के गढ ले…. आ जा………. बरछा धर ले…….

ऐसी की तैसी….

मौका है ये
जाने ना दे
कांधे पर से

बेताल फिर डाल पर….

छलावे से छिने हुए घर ,
अलावे जां जमीं मुकद्दर,
दावे से तेरे होंगे सब,
हो ले जो ऐसा अजब…

झटका ज़रा दो,
फ़टका जमा दो,
हक़ ना मिले तो,
ऐसी की तैसी……

दुम ना हिलाओ,
कान काट खाओ,
हड्डियाँ चबाओ,
ऐसी की तैसी….

कचरा हटा दो,
ऐसी की तैसी….
लफ़ड़ा मिटा दो,
ऐसी की तैसी…

तुम्हें बिगड़ा कहे जो,
पिछड़ा कहे जो,
उसकी तो
ऐसी की तैसी…



ऐसी की तैसी - द रीबेल है मुज़ीबु पर भी, जिसे श्रोताओं ने खूब सराहा है... देखिए यहाँ

मेकिंग ऑफ़ "ऐसी की तैसी- द रीबेल" - गीत की टीम द्वारा

ऋषि एस: ये शायद मेरा पहला गाना है जो मेलोडी पर आधारित नहीं है। ऐसे गानों की उम्र कम होती है क्योंकि ५ या १० सालों बाद समकालीन संगीत (contemporary music) का साउंड बदल जाएगा और ऐसे गानों को सुनने में तब मज़ा नहीं आएगा जितना आज आता है। ऐसी हालत में गाने को जीवित रखने वाली बात उसके बोल में होती है, और इस गाने में वीडी ने सामाजिक मुद्दों से जुड़ा विषय चुना है। गाने में जो संदेश है वही इस गाने को समय के साथ बिखरने, बिगड़ने और पुराना होने से बचाएगा और यही संदेश गाने में जो मेलोडी की कमी है उसे पूरा करेगा। इसलिए मुझे इस गाने पर फख्र है। उन्नी के साथ यह मेरा पहला गाना है। भले हीं उन्नी ने इस जौनर का कोई भी गाना पहले नहीं गाया है, लेकिन पहले प्रयास में हीं उन्नी ने इस गाने को बखूबी निभाया है।

उन्नीकृष्णन के बी: ये एक बहुत ही शानदार तजुर्बा रहा मेरे लिए. अमूमन मैं कुछ शास्त्रीय या राग आधारित रोमांटिक गीत गाना अधिक पसंद करता था, पर ये गाना अपने संगीत में, शब्दों में ट्रीटमेंट में हर लिहाज से एकदम अलग था. इसे गाने के लिए मुझे अपने कम्फर्ट जोन से बाहर आना था, ऋषि और वी डी का ये आईडिया था और उन्हें इस पर पूरा विश्वास भी था, संशय था तो बस मुझे था क्योंकि मेरे लिए ये स्टाईल बिलकुल अलग था, पर इन दोनों के निर्देशन में मैंने ये कोशिश की, और मुझे गर्व है जो भी अंतिम परिणाम आया है, इस गीत का हिस्सा मुझे बनाया इसके लिए मैं ऋषि और वी डी का शुक्रगुजार हूँ.

विश्व दीपक तन्हा: बहुत दिनों से मेरी चाहत थी कि ऐसा हीं कुछ लिखूँ, लेकिन सही मौका नहीं मिल पा रहा था। फिर एक दिन ऋषि जी ने इस गाने का ट्युन भेजा। पहली मर्तबा सुनने पर हीं यह जाहिर हो गया कि इसके साथ कुछ अलग किया जा सकता है। लेकिन ऋषि जी ने समय की कमी का हवाला देकर यह कह दिया कि आप जो कुछ भी लिख सकते हो, लिख दो, जरूरी नहीं कि हम कोई ठोस संदेश दे हीं। फिर भी मैंने उन्हें विश्वास दिलाया कि कुछ न कुछ संदेश तो होगा हीं, क्योंकि किसी मस्ती भरे गाने के माध्यम से अगर हम समाज को मैसेज़ देने में कामयाब होते हैं तो इसमें हमारी जीत है। मैने उन्हें यह भी यकीन दिलाया कि मैं इसे लिखने में ज्यादा समय न लूँगा, इसलिए आप मेरी तरफ से निश्चिंत रहें। गाना लिखने के दौरान मैंने एक-दो जगहों पर ट्युन से भी छेड़-छाड़ की, जैसे "बेताल फिर डाल पर" यह पंक्ति कहीं भी फिट नहीं हो रही थी, फिर भी ऋषि जी ने मेरी भावनाओं का सम्मान करते हुए बोल के हिसाब से धुन में परिवर्त्तन कर दिया। गाने के बोल और धुन तैयार हो जाने के बाद गायक की बात आई तो ऋषि जी ने उन्नी के नाम का सुझाव दिया। मैने उन्नी को पहले सुना था और मुझे उनकी आवाज़ पसंद भी आई थी, इसलिए मैंने भी हामी भर दी। मेरे हिसाब से उन्नी ने इस गाने के लिए अच्छी-खासी मेहनत की है और यह मेहनत गाने में दिखती है। हम तीनों ने मिलकर जितना हो सकता था, उतना "आक्रोश" इस गाने में डाला है.. उम्मीद करता हूँ कि आप तक हमारी यह फीलिंग पहूँचेगी। और हाँ, इस गाने के अंतिम ५ या १० सेकंड मेरी आवाज़ में हैं। ऋषि जी कहते हैं कि यह मेरी गायकी की शुरूआत है, आपको भी ऐसा लगता है क्या? :)
उन्नीकृष्णन के बी
उन्नीकृष्णन पेशे से कम्प्यूटर इन्जीनियर हैं लेकिन संगीत का शौक बचपन से ही रखते हैं। कर्नाटक शास्त्रीय संगीत में इन्होंने विधिवत शिक्षा प्राप्त की है तथा स्कूल व कालिज में भी स्टेज पर गाते आये हैं। नौकरी शुरू करने के बाद कुछ समय तक उन्नी संगीत को अपनी दिनचर्या में शामिल नहीं कर पाये मगर पिछले काफी वक्त से वो फिर से नियमित रूप से रियाज़ कर रहे हैं‚ हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ले रहे हैं‚ गाने रिकार्ड कर रहे हैं और आशा करते हैं कि अपनी आवाज़ के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचें।

ऋषि एस
ऋषि एस॰ ने हिन्द-युग्म पर इंटरनेट की जुगलबंदी से संगीतबद्ध गीतों के निर्माण की नींव डाली है। पेशे से इंजीनियर ऋषि ने सजीव सारथी के बोलों (सुबह की ताज़गी) को अक्टूबर 2007 में संगीतबद्ध किया जो हिन्द-युग्म का पहला संगीतबद्ध गीत बना। हिन्द-युग्म के पहले एल्बम 'पहला सुर' में ऋषि के 3 गीत संकलित थे। ऋषि ने हिन्द-युग्म के दूसरे संगीतबद्ध सत्र में भी 5 गीतों में संगीत दिया। हिन्द-युग्म के थीम-गीत को भी संगीतबद्ध करने का श्रेय ऋषि एस॰ को जाता है। इसके अतिरिक्त ऋषि ने भारत-रूस मित्रता गीत 'द्रुजबा' को संगीत किया। मातृ दिवस के उपलक्ष्य में भी एक गीत का निर्माण किया। भारतीय फिल्म संगीत को कुछ नया देने का इरादा रखते हैं।

विश्व दीपक तन्हा
विश्व दीपक हिन्द-युग्म की शुरूआत से ही हिन्द-युग्म से जुड़े हैं। आई आई टी, खड़गपुर से कम्प्यूटर साइंस में बी॰टेक॰ विश्व दीपक इन दिनों पुणे स्थित एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। अपनी विशेष कहन शैली के लिए हिन्द-युग्म के कविताप्रेमियों के बीच लोकप्रिय विश्व दीपक आवाज़ का चर्चित स्तम्भ 'महफिल-ए-ग़ज़ल' के स्तम्भकार हैं। विश्व दीपक ने दूसरे संगीतबद्ध सत्र में दो गीतों की रचना की। इसके अलावा दुनिया भर की माँओं के लिए एक गीत को लिखा जो काफी पसंद किया गया।
Song - Aaissi Kii Taiisi
Voice - Unnikrishnan K B
Backup voice - Rishi S
Music - Rishi S
Lyrics - Vishwa Deepak Tanha
Graphics - samarth garg


Song # 15, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

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शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

सडकें छोटी थीं, दिल बड़े थे, उस शहर के जहाँ इत्तेफ़ाकन मिले थे नितिन, उन्नी और कुहू

Season 3 of new Music, Song # 12

आज बेहद गर्व के साथ हम युग्म के इस मंच पर पेश कर रहे हैं, दो नए फनकारों को, संगीतकार नितिन दुबे संगीत रचेता होने के साथ-साथ एक संवेदनशील गीतकार भी हैं, जिन्होंने अपने जीवन के अनुभवों को शब्दों और सुरों में पिरो कर एक गीत बनाया, जिसे स्वर देने के लिए उतरे आज के दूसरे नए फनकार उन्नीकृष्णन के बी, जिनका साथ दिया है। इस गीत में महिला स्वरों के लिए सब संगीतकारों की पहली पसंद बन चुकी गायिका कुहू गुप्ता। कुहू और उन्नी के स्वरों में ये गीत यक़ीनन आपको संगीत के उस पुराने सुहाने दौर की याद दिला देगा, जब अच्छे शब्द और मधुर संगीत से सजे युगल गीत हर जुबाँ पर चढ़े होते थे. सुनिए और आनंद लीजिए.

गीत के बोल -

एक शहर था जिसके सीने में
सडकें छोटी थीं, दिल बड़े थे
उस शहर से, भरी दोपहर में
मैं अकेला चला था
इस अकेले सफ़र पे

मैं अकेला चला था
इस अकेले सफ़र पे
क्या हसीं इत्तफाक था
बन गए हमसफ़र तुम

मेरे दिल के, एक कोने में
गहरे कोहरे थे, मुद्दतों से
फिर मौसम खुला, तुम दिखे थे
पास आकर रुके थे
साथ मिलकर चले थे

तन्हा ये काफिला था
लम्बे ये फासले थे
क्या हसीं इत्तफाक था
बन गए हमसफ़र तुम

तुमसे पहले मेरी ज़िन्दगी
एक धुंधला सा इतिहास है
मैं जिसके किस्से खुद ही लिख कर
खुद ही भूल चूका हूँ

याद आता नहीं जितना भी सोचूं
क्या वो किस्से थे
क्यों लिखे थे

फिर मौसम खुला, तुम दिखे थे
पास आकर रुके थे
साथ मिलकर चले थे

मैं अकेला चला था
इस अकेले सफ़र पे
क्या हसीं इत्तफाक था
बन गए हमसफ़र तुम

तन्हा ये काफिला था
लम्बे ये फासले थे
क्या हसीं इत्तफाक था
बन गए हमसफ़र तुम



मेकिंग ऑफ़ "क्या हसीन इत्तेफ़ाक" - गीत की टीम द्वारा

नितिन दुबे: जब मैंने इस गाने पर काम करना शुरू किया था तो इसका रूप थोड़ा अलग था। एक पूरा बीच का भाग पहले नहीं था और इसका अन्त भी अलग था। उन्नी और मैं अच्छे दोस्त हैं और कई कवर वर्ज़न्स पर हमने साथ काम किया है। धीरे धीरे हमें लगा कि एक मूल गाना भी हमें एक साथ करना चाहिये। मैं वैसे भी कुछ समय से इस गाने पर धीरे धीरे काम कर ही रहा था। सोचा क्यों न यही गाना साथ करें। मुझे खुशी है जिस तरह उन्नी ने इस गाने को निभाया है। कुहू इस गाने के लिये मेरी पहली और अकेली पसंद थीं। और उन्होंने इसे मेरी आशाओं से बढ़ कर ही गाया है। यह आज के युग में इन्टरनेट का ही कमाल है कि मैं कभी कुहू से मिला भी नहीं हूं मगर इस गाने में एक साथ काम किया है और यह मैं कुहू की प्रतिभा का कमाल कहूंगा कि बिना मेरे साथ सिटिंग किये और बिना मार्गदर्शन के ही उन्होंने गाने का मूड बहुत अच्छी तरह पकड़ा और पेश किया।

उन्नीकृष्णन के बी: “क्या हसीं इत्तेफाक था” एक ऐसा गाना है जो मेरे दिल के बेहद करीब है। जिन दिनों नितिन यह गाना बना रहे थे‚ उन दिनों उन का और मेरा मिलना काफी होता था और इसीलिये मैंने इस गाने को काफी करीब से रूप लेते देखा है। मेरे लिये यह गाना ज़रा कठिन था क्योंकि इस में थोड़ी ग़ज़ल की तरह की गायकी की ज़रूरत है और मेरी मातृभाषा दक्षिण भारतीय है तथा मैंने ग़ज़ल कभी ज़्यादा सुनी भी नहीं। लेकिन मैनें बहुत रियाज़ किया इस गाने के लिये जिसके लिये मुझे नितिन का बहुत मार्गदर्शन भी मिला। और इसके नतीजे से मैं खुश हूं। मुझे लगता है कि मैं इस गाने के मूड को ठीक से पकड़ पाया हूं और इसके लिये मैं नितिन व कुहू का विशेष रूप से शुक्रग़ुज़ार हूं। मैं आशा करता हूं कि भविष्य में भी हम और भी गानों पर साथ काम कर पायेंगे।

कुहू गुप्ता: नितिन की रचनाएं यूं भी मेरी बहुत पसंदीदा थी, मैं खुद उनके साथ कोई गीत करने को उत्सुक थी कि उनका एक मेल आया करीब ४ महीने पहले, वो चाहते थे कि मैं उनके लिए एक रोमांटिक युगल गीत गाऊं. मैंने तो ख़ुशी में गीत बिना सुने ही उन्हें हां कह दिया. क्योंकि मैं जानती थी की ये भी निश्चित ही एक बेमिसाल गीत होगा, और मेरा अंदाजा बिलकुल भी गलत नहीं हुआ यहाँ. गाना बहुत ही सूथिंग था, जिस पर खुद उन्होंने बहुत प्यारे शब्द लिखे थे, ये गीत चूँकि उनके व्यक्तिगत जीवन से प्रेरित था, तो उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण भी था, मैं उम्मीद करती हूँ कि मैंने अपने गायन में उनके जज़्बात ठीक तरह निभाए हैं. मेरे पहले टेक में कुछ कमियां थी जो नितिन ने दूर की. हम दोनों को इंतज़ार था कि पुरुष स्वर पूरे हों और गीत जल्दी से जल्दी मुक्कमल हो, पर तभी दुभाग्यवश बगलोर कार्टलोन दुर्घटना हुई और प्रोजेक्ट में रुकावट आ गयी....हम सब की प्रार्थना थी कि नितिन इन सब से उबर कर गीत को पूरा करें और देखिये किस तरह उन्होंने इस गीत को मिक्स करके वापसी की है. उन्नी ने अपना भाग बहुत खूबी से निभाया है, मैं हमेशा से उनकी आवाज़ की प्रशंसक रही हूँ. और मुझे ख़ुशी है कि इस गीत में हमें एक दूसरे के साथ सुर से सुर मिलाने का मौका मिला।
नितिन दुबे
नितिन संगीतकार भी हैं और एक शायर व गीतकार भी। अपने संगीतबद्ध किये गीतों को वह खुद ही लिखते हैं और उनका यह मानना हैं कि गाने के बोल उतना ही महत्व रखते हैं जितना कि उसकी धुन व संगीत। आर्किटेक्चर और सम्पत्ति विकास के क्षेत्र में विदेश से विशिष्ट शिक्षा प्राप्त करने के बाद नितिन कई वर्षों से व्यवसाय और संगीत के बीच वक्त बांट रहे हैं। अपने गीतों की अलबम ‘उड़ता धुआँ ’ तैयार करने के बाद नितिन अब इस कोशिश में हैं कि इस अलबम को व्यापक रूप से रिलीज़ करें और इसी लिये एक प्रोड्यूसर की खोज में हैं। “उड़ता धुआँ” रिलीज़ होने में चाहे जितना भी वक्त लगे‚ नितिन का कहना है कि वह गाने बनाते रहेंगे क्योंकि संगीत के बिना उन्हें काफी अधूरेपन का अहसास होता है।

उन्नीकृष्णन के बी
उन्नीकृष्णन पेशे से कम्प्यूटर इन्जीनियर हैं लेकिन संगीत का शौक बचपन से ही रखते हैं। कर्नाटक शास्त्रीय संगीत में इन्होंने विधिवत शिक्षा प्राप्त की है तथा स्कूल व कालिज में भी स्टेज पर गाते आये हैं। नौकरी शुरू करने के बाद कुछ समय तक उन्नी संगीत को अपनी दिनचर्या में शामिल नहीं कर पाये मगर पिछले काफी वक्त से वो फिर से नियमित रूप से रियाज़ कर रहे हैं‚ हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ले रहे हैं‚ गाने रिकार्ड कर रहे हैं और आशा करते हैं कि अपनी आवाज़ के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचें।

कुहू गुप्ता
पुणे में रहने वाली कुहू गुप्ता पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। गायकी इनका जज्बा है। ये पिछले 6 वर्षों से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ले रही हैं। इन्होंने राष्ट्रीय स्तर की कई गायन प्रतिस्पर्धाओं में भाग लिया है और इनाम जीते हैं। इन्होंने ज़ी टीवी के प्रचलित कार्यक्रम 'सारेगामा' में भी 2 बार भाग लिया है। जहाँ तक गायकी का सवाल है तो इन्होंने कुछ व्यवसायिक प्रोजेक्ट भी किये हैं। वैसे ये अपनी संतुष्टि के लिए गाना ही अधिक पसंद करती हैं। इंटरनेट पर नये संगीत में रुचि रखने वाले श्रोताओं के बीच कुहू काफी चर्चित हैं। कुहू ने हिन्द-युग्म ताजातरीन एल्बम 'काव्यनाद' में महादेवी वर्मा की कविता 'जो तुम आ जाते एक बार' को गाया है, जो इस एल्बम का सबसे अधिक सराहा गया गीत है। इस संगीत के सत्र में भी यह इनका चौथा गीत है।

Song - Kya Haseen Itteffaq Tha
Voices - Unnikrishnan K B , Kuhoo Gupta
Music - Nitin Dubey
Lyrics - Nitin Dubey
Graphics - Prashen's media


Song # 12, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

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