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Wednesday, February 18, 2009

नौशाद की तीन सर्वश्रेष्ठ फिल्मों के संगीत पर एक चर्चा

(पिछले अंक से आगे ...)


नौशाद अली का संगीत सभी के दिलों पर राज़ करता है। यदि अब तक सभी संगीतकारों का जिक्र होगा तो नौशाद का नाम आर.डी.बर्मन,रहमान आदि के साथ लिया जायेगा। उनका संगीत हमेशा अमर रहेग और ऐसे ही चमकता रहेगा। आज की तारीख का कोई भी संगीतकार मुगल-ए-आज़म जैसी एल्बम तैयार नहीं कर सकता और शायद ऐसा अमर गीत भी कभी नही-



नौशाद ने तमाम फिल्मों में काम किया लेकिन यदि उनकी किन्हीं तीन फिल्मों का जिक्र करना चाहें तो वो शायद ये होंगी:
१. मुगल-ए-आज़म : शायद ही किसी को इस बारे में शक हो कि फिल्मी इतिहास में इस फिल्म का संगीत नौशाद का सर्वोत्तम संगीत रहा है। इस फिल्म के ज्यादातर गाने लता मंगेशकर द्वारा गाये गये हैं। हालाँकि ओर्केस्ट्रा आज के समय की तरह तकनीकी और आधुनिकता से लैस नहीं है लेकिन फिर भी उन गानों की मेलोडी की किसी भी अन्य गीत से तुलना नहीं की जा सकती। लता का गाया हुआ राग गारा में 'मोहे पनघट पे नंद लाल' एक तरह से कव्वाली भी है और उस गाने में हर बात सर्वोत्तम है... उसका ट्रैक..जबर्दस्त उर्दू शब्द...से लेकर लता मंगेशकर के साथ साथ कोरस भी कोई कमी नहीं छोड़ रहा था। नौशाद का संगीत उसमें चार-चाँद लगाता है। उसी फिल्म में रागदरबारी में 'प्यार किया तो डरना क्या..' एक और कव्वाली है जो ये सोचने पर मजबूर कर देती है कि 'मोहे..' और 'प्यार किया..' में से बेहतर कौन है। अगला गाना राग यमन में 'खुदा निगेबान..' में एक बार फिर उर्दू के खूबसुरत बोल हैं, लता की मिठास है और उस पर नौशाद का संगीत...कुल मिलाकर इस एल्बम में नौशाद ने फिल्म की जरुरत के हिसाब से वो जबर्दस्त संगीत दिया है जो उसके बाद से अब तक ५० वर्षॊं से न केवल टिका हुआ बल्कि आधुनिकता और सुविधा-सम्पन्न आज के संगीत को कड़ी टक्कर दे रहा है। आने वाले ५० बरसों में भी यही होगा।



२. दूसरी फिल्म है बैजू बावरा: ये वो फिल्म है जिसके बाद नौशाद की पहचान बनी, वे सब की नजरॊ में आये और उसके बाद ही उन्होंने मुगल-ए-आज़म, मेरे महबूब व बाकि फिल्मों में काम किया। ये फिल्म भारतीय सिनेमा के इतिहास अपना अलग महत्त्व रखती है। इसका मशहूर भजन 'मन तरपत हरि दर्शन..' को आज भी सबसे बढ़िया भक्ति गीतों में शुमार किया जाता है। गौर करने वाली बात यह है कि इस गीत के बोल लिखें हैं मोहम्मद शकील ने, इसको गाया है मोहम्मद रफी ने और धुन बनाई है नौशाद ने..ये तीनों ही मुस्लिम रहे हैं। नौशाद के संगीत और इस गीत ने ये साबित कर दिया है कि संगीत किसी एक धर्म का नहीं है। बाकि मशहूर गानों में 'ओ दुनिया के रखवाले..' जिसे गाया था नौशाद के पसंदीदा गायक रफी ने। "झूले में पवन के", जिसे लता और रफी दोनों ने अपनी आवाज़ दी। इनके गीतों को सुनना अपने आप में एक अलग अनुभव होता है। राग भैरवी में 'तू गंगा की मौज..' को कौन भूल सकता है... जिसके सुंदर बोल,कोरस एफैक्ट और ओर्केस्ट्रा सब मिलकर इस गीत को एक अमर रचना में तब्दील कर देते हैं.



३. कोहिनूर: नौशाद द्वारा संगीतबद्ध एक और फिल्म। यह फिल्म मेलोडी के अलावा भी और कईं कारणॊं से मील का पत्थर रही। 'मधुबन में राधिका नाचे रे..' गाना आज भी पसंद किया जाता है। इस पूर्णतया राग प्रधान गीत के लिये रफी साहब की जितनी तारीफ की जाये उतनी कम है। नौशाद जोखिम उठाने में कभी भी नहीं हिचकिचाते थे। नये नये प्रयोग करना उन्हें अच्छा लगता था। इस फिल्म के निर्देशक थोड़े घबराये हुए थे, क्योंकि यह गाना किसी भी लिहाज से पारंपरिक कव्वाली नहीं था और न ही ये सामान्य गानों की तरह अथवा पाश्चात्य समाये हुए था। फिर भी इस गाने की धुन अपने आप में आधुनिकता समेटे हुए थी जिसको अपनी आवाज़ से रफी साब ने और सुरीला बना दिया था। नौशाद इस गाने को लेकर इतने विश्वास से भरे हुए थे कि वे कोहिनूर के लिये जो भी पैसे उन्हें मिल रहे थे वे भी वापस करने को तैयार थे अगर बॉक्स ऑफिस पर ये गीत पिट जाता। लेकिन जो हुआ वो सब ने देखा और सुना। यह गाना पूरे भारत में अपने शास्त्रीय संगीत और रिद्म की वजह से कामयाब हुआ। इसी फिल्म के अन्य गीत थे 'ढल चुकी शाम-ए-गम...', 'जादूगर कातिल..' 'तन रंग लो जी..'। सभी गानों की खास बात उसका संगीत तो था ही साथ ही बहुत खूबसूरत बोल भी थे।



नौशाद के काम को और भारतीय संगीत में योगदान को इन तीन फिल्मों में कतई नहीं समेटा जा सकता। उनका योगदान निस्संदेह सराहनीय व अतुलनीय है। उनकी आखिरी फिल्म रही अकबर खान की 'ताजमहल'। ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास कमाल नहीं दिखा पाई। नौशाद का खूबसूरत संगीत खराब स्टार कास्ट के कारण लोगों की नजरों में नहीं आ पाया। फिल्म के प्रोमोशन के लिये निर्माता नौशाद के गानों का भी सही इस्तेमाल नहीं कर सके। जबकि ये वो समय था कि इस फिल्म का संगीत उस समय की अन्य फिल्मों के मुकाबले कहीं बेहतर था। ताजमहल के संगीत को नौशाद का बेस्ट तो नहीं कह सकते किन्तु आज के समय के अन्य संगीतकारों हिमेश, प्रीतम व अनु मलिक तथा अन्यों से हजार गुणा अच्छा था। यदि इस फिल्म के गानों को सुनें तो सबसे अच्छा गीत 'अपनी ज़ुल्फें मेरे...' रहा जिसे हरिहरण ने गाया। हरिहरण उन गायकों में से हैं जिन्हें हमेशा ही कम आंका गया है। प्रीति उत्तम और हरिहरण का ही गाया हुआ एक और जबर्दस्त रोमांटिक गीत 'मुमताज़ तुझे देखा...' रहा। संगीत सुनेंगे तो आपको लगेगा ही नहीं कि ८६ वर्ष का कोई बुजुर्ग ये धुन बना रहा होगा। नौशाद के संगीत में हमेशा ताज़गी समाई हुई रहती है।



प्रस्तुति - तपन शर्मा


Tuesday, February 17, 2009

मछलियाँ पकड़ने का शौकीन भी था वो सुरों का चितेरा

(पिछले अंक से आगे ...)

चाहें कोई पिछली पीढ़ी का श्रोता हो या आज की पीढ़ी का युवा वर्ग हर कोई नौशाद के संगीत पर झूमता है। ज़रा कुछ गीतों पर नजर डालिये... मधुबाला का 'प्यार किया तो डरना क्या' जिस पर आज के दौर में रीमिक्स बनाया जाता है... और जब दिलीप कुमार का "नैन लड़ जई हैं तो मनवा मा.." सुन ले तो कदम अपने आप थिरकने लगते हैं। आज ज्यादातर लोग उस दौर से ताल्लुक नहीं रखते पर फिर भी लगता है कि नौशाद फिल्मों में संगीत नहीं देते थे...बल्कि जादू बिखेरते थे। उनके संगीत में लोक संगीत की झलक मिलती है।

लखनऊ में जन्में १८ वर्षीय बालक से जब उसके पिता ने घर और संगीत में से एक को चुनने को कहा तब उसने संगीत को चुना और खूबसूरत सपने और कड़वी सच्चाइयों वाले मुम्बई शहर जा पहुँचा। आँखों में हजारों सपने लिये फुटपाथ को घर बनाये इस शानदार संगीतकार ने सैकड़ों धुनें तैयार कर दी। यदि फिल्मों पर गौर करें तो महल, बैजू बावरा, मदर इंडिया, मुगल-ए-आज़म, दर्द, मेला, संघर्ष, राम और श्याम, मेरे महबूब-जैसी न जाने कितनी ही फिल्में हैं।



नौशाद की बात करें और लता व रफी की बात न हो तो क्या फायदा। मुगल-ए-आज़म के राग दरबारी में 'मोहब्बत की झूठी कहानी पे रोय' से लेकर गंगा जमुना के 'ढूँढो ढूँढो रे साजना' तक यदि किसी संगीतकार ने गीत की जरूरत, उसके बोल और गायिका की आवाज़ को समझा है तो वो नैशाद ही हैं।

रफी की बात करें तो गानों की लाइन लग सकती है पर फिर भी यदि किन्हीं दो गानों को चुनना पड़े तो शायद हर कोई 'ए दुनिया के रखवाले' और राग मालकौस 'मन तड़पत हरि दर्शन को आज' को ही चुनेगा।



लता मंगेशकर कहती हैं, "मैंने नौशाद साहब के साथ कईं महत्त्वपूर्ण गानों में काम किया है। उनकी शास्त्रीय संगीत में पकड़ और नये पॉपुलर संगीत की समझ ने उन्हें उस समय के सदाबहार गानों को कॉम्पोज़ करने का सबसे योग्य उम्मीदवार बना दिया था। वे याद करती हैं और हँसती हैं जब 'प्यार किया तो डरना क्या' गीत रिकॉर्ड हो रहा था तब बीच में आवाज़ में गुंजन पैदा करनी थी। जिसके लिये नौशाद ने उन्हें बाथरूम से गाने को कहा। उस समय आवाज़ को गुँजाने का कोई साधन नहीं था, इसलिये नौशादा साहब ने ये तरीका ईज़ाद किया। वे आगे बताती हैं कि नौशाद अपनी धुनों व आवाज़ में लगातार प्रयोग करते रहते थे जिसके लिये उन्होंने पाश्चात्य ओर्केस्ट्रा का प्रयोग करने में भी नहीम हिचकिचाये। उनके पसंदीदा गीतों में 'उठाये जा उनके सितम' (अंदाज़), 'जाने वाले से मुलाकात', 'न मिलता गम' (अमर), 'मोहे पनघट पे नंदलाल', राग केदार में 'बेकस पे करम' और राग दरबारी में 'प्यार किया तो..' गाने प्रमुख रहे। आज के समय में ऐसा संगीत दिया ही कहाँ जाता है।



जिन कलाकारों ने उनके साथ काम किया वे उन्हें मिश्रित संस्कृति का प्रतीक मानते हैं। जावेद अख्तर कहते हैं कि नौशाद न केवल एक संगीतकार थे बल्कि देश के मिश्रित संस्कृति के ऐसे प्रतीक थे जिन्होंने भारतीय फिल्म संगीत में कईं परिवर्तन लाये व इसको गरिमा प्रदान की। वे बताते हैं कि नौशाद का फिल्म संगीत में योगदान अद्वितीय था। उनका नाम हमेशा ही श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता रहेगा।

जानेमाने निर्देशक महेश भट्ट भी कुछ ऐसा ही कहते हैं। वे कहते हैं कि नौशाद सेक्युलर भारत के प्रतीक थे। उनका सम्गीत संयुक्त सम्स्कृति की प्रतिध्वनि था। जब वे भजन में संगीत दिया करते थे ऐसा लगता था मानो वे हिन्दू हों। उनमें भारतीयता की गहराई थी और यही महान इतिहास व संस्कृति उनके खून में बह रही थी।



नौशाद तेजी से बढ़ते 'रीमिक्स कल्चर' से दूर भागने का प्रयास करते और हमेशा कहते कि हमें समय के साथ आगे बढ़ना तो चाहिये पर अपनी जड़ों के साथ पकड़ हमेशा बना कर रखनी चाहिये।

और अंत में एक ऐसी बात जो शायद बहुत कम लोगों को ही पता होगी। नौशाद साहब को मछली पकड़ने का शौक था। संगीत निर्देशन के अति व्यस्त कार्यक्रम से समय निकाल कर वे "एंग्लिंग" खेलने जाया करते थे। ये एक तरह का मछली पकड़ने का खेल है। उन्होंने १९५९ में महाराष्ट्र स्टेट ऐंग्लिंग एसोसियेशन की सदस्यता प्राप्त की। जब नौशाद युवा थे तो मुम्बई की पोवई झील में गीतकार शकील बदईयुनि और मजरूह सुल्तानपुरी के साथ मछलियाँ पकड़ने जाया करते थे।

नौशाद फिल्मी संगीत के स्वर्णयुग का सबसे अहम संगीतकार थे जिसने शास्त्रीय संगीत में पगे गीतों को लोकप्रिय बनाया और उनके संगीत का जादू ही है जो बैजू बावरा और मुगले आजम का संगीत आज भी ताजातरीन लगता है।



अगले अंक में : नौशाद की तीन बेहतरीन फिल्मों के गाने और मुलाकात उन गीतों से जिनकी धुनें नौशाद साब की आखिरी धुनें थीं

प्रस्तुति- तपन शर्मा


Monday, February 16, 2009

जवाँ है मुहब्बत, हसीं है ज़माना....आज भी नौशाद के संगीत का


"आज पुरानी यादों से कोई मुझे आवाज़ न दे...", नौशाद साहब के इस दर्द भरे नग्में को आवाज़ दी थी मोहम्मद रफी साहब ने, पर नौशाद साहब चाहें या न चाहें संगीत प्रेमी तो उन्हें आवाज़ देते रहेंगें, उनके अमर गीतों को जब सुनेंगें उन्हें याद करते रहेंगे. तपन शर्मा सुना रहें हैं दास्ताने नौशाद, और आज की महफ़िल है उन्हीं की मौसिकी से आबाद.


नौशाद का जन्म २५ दिसम्बर १९१९ में एक ऐसे परिवार में हुआ, जिसका संगीत से दूर दूर तक नाता नहीं था और न ही संगीत में कोई रुचि थी। पर नौशाद शायद जानते थे कि उन्हें क्या करना है। दस साल की उम्र में भी जब वे फिल्म देख कर लौटते तो उनकी डंडे से पिटाई हुआ करती थी। ये उस समय की बातें हैं जब फिल्मों में संगीत नहीं हुआ करता था। और थियेटर में पर्दे के पास बैठे संगीतकार ही संगीत बजा कर फिल्म के दृश्य के हिसाब से तालमेल बिठाया करते थे। वे कहते थे कि वे फिल्म के लिये थियेटर नहीं जाते बल्कि उस ओर्केस्ट्रा को सुनने जाते हैं। उन संगीतकारों को सुनने जो हारमोनियम, पियानो, वायलिन आदि बजाते हुए भी दृश्य की गतिविधियों के आधार पर आपस में संतुलन बनाये रखते हैं। और यही वो पल होते थे जिनमें उन्हें सबसे ज्यादा मज़ा आता था। और वो भी चार-आने वाली पहली कतार में बैठ कर।



नौशाद ने एक वाद्ययंत्र बेचने वाली दुकान पर काम किया और हारमोनियम खरीदा। उनका अगला कदम था स्थानीय ओर्केस्ट्रा में शामिल होना। जाहिर तौर पर यह सब उन्होंने अपने पिता से विपरीत जाते हुए किया। उसके बाद नौशाद एक जूनियर थियेटर क्लब से जुड़ गये। फिर उन्होंने एक नाटक कम्पनी में काम किया जो उस समय लखनऊ गई हुई थी। वे लैला मजनू पर आधारित नाटक कर रहे थे। ये पहली मर्तबा था कि उन्होंने घर में किसी की परवाह नहीं की। वे वहाँ से भाग गये और नाटक कम्पनी के साथ कभी जयपुर, जोधपुर, बरेली और गुजरात गये। विरम्गाम में उनकी कम्पनी फ्लॉप हो गई और वे वापस घर नहीं गये।

१९३७ में हताश नौशाद ने बम्बई में कदम रखा। और तब उनका संघर्ष दोबारा शुरू हुआ। जिस अकेले आदमी को वे बम्बई में जानते थे, वे थे अन्जुमन-ए-इस्लाम हाई स्कूल के हैडमास्टर जिनके साथ उन्होंने कुछ समय बिताया। ये किस्मत की बात थी कि वे हैरी डरोविट्स के सम्पर्क में आये जो समन्दर नाम की एक फिल्म बना रहे थे। नौशाद को मुश्ताक हुसैन के ओर्केस्ट्रा में ४० रूपय प्रतिमाह की तन्ख्वाह पर पियानो बजाने की नौकरी मिली। गुलाम मोहम्मद जो बाद में नौशाद अली के सहायक बने, उस समय ६० रूपये कमाया करते थे। मुश्ताक हुसैन न्यू थियेटर, कोलकाता के मशहूर संगीत निर्देशक थे। बाद में नौशाद अपना हुनर रुसी निर्माता हेनरी डारविज की फिल्म "सुनहरी मकड़ी" में दिखाने में सफल हुए।

जब हरीश्चंद्र बाली ने फिल्म "पति-पत्नी" को छोड़ा तब उस समय नौशाद को पहली बार संगीतकार के तौर पर काम मिला। उन्हें मुश्ताक हुसैन का सहायक बनाया गया लेकिन ये ज्यादा दिन नही चला और फिल्म बंद हो गई। भाग्य ने फिर साथ दिया और वे मनोहर कपूर से मिले। मनोहर उस समय पंजाबी फिल्म "मिरज़ा साहिबान" के लिये संगीत दे रहे थे। नौशाद ने कपूर के साथ काम करना शुरु कर दिया और उन्हें ७५ रू महीने के हिसाब से मिलने लगे। ये फिल्म सभी को पसंद आई और बॉक्स ऑफिस पर जबर्दस्त हिट साबित हुई।



खेमचंद प्रकाश, मदहोक, भवनानी और ग्वालानी आदि की सहायता से नौशाद धीरे धीरे आगे बढ़ने लगे। उन्होंने भवनानी की फिल्म प्रेम नगर में संगीत दिया। उसके बाद उनकी गिनती ऊँचे संगीतकारों में होने लगी और देखते ही देखते वे ६०० रू. से १५०० रू. प्रति फिल्म के कमाने लगे। ए.आर.करदार की फिल्म नई दुनिया (१९४२) ने पहली बार उन्हें संगीत निर्देशक का दर्जा दिलवाया। करदार की फिल्मों में वे लगातार संगीत देने लगे। और फिल्म शारदा में उन्होंने १३ वर्षीय सुरैया के साथ "पंछी जा" गाने के लिये काम किया। रतन(१९४४) वो फिल्म थी जिसने उन्हें ऊँचाई तक पहुँचा दिया और उस समय के हिसाब से उन्हें एक फिल्म के २५००० रू मिलने लगे!!

लखनऊ में उनका परिवार हमेशा संगीत के खिलाफ रहा और नौशाद को उनसे छुपा कर रखना पड़ा कि वे संगीत के क्षेत्र में काम करते हैं। जब नौशाद की शादी हो रही थी तो बैंड उन्हें की सुपारहिट फिल्म रतन('४४) के गाने बजा रहा था। उस समय उनके पिता व ससुर उस संगीतकार को दोष दे रहे थे जिसने वो संगीत दिया... तब नौशाद की सच्चाई बताने की हिम्मत नहीं हुई कि संगीत उनका ही दिया हुआ है।



१९४६ के वर्ष में उन्होंने नूरजहां के साथ "अनमोल घड़ी" और के.एल.सहगल के साथ "शाहजहां" की और दोनों ही फिल्मों का संगीत सुपरहिट रहा। १९४७ में बंटवारा हुआ और हिन्दू मुस्लिम दंगे हुए। मुम्बई से काफी मुस्लिम कलाकार पाकिस्तान चले गये। पर बॉलीवुड में नौशाद जैसे स्थापित कलाकार वहीं रहे। १९४२ से लेकर १९६० के दशक तक वे बॉलीवुड के नामी संगीतकारों में शुमार रहे। उन्होंने अपने जीवनकाल में १०० से भी कम फिल्मों में काम किया लेकिन जितनों में भी किया उनमें से २६ फिल्में सिल्वर जुबली (२५ हफ्ते), ८ गोल्डन जुबली (५० हफ्ते) और ४ ने डायमंड जुबली (६० हफ्ते) बनाई।

नौशाद ने अनेक गीतकारों के साथ काम किया जिनमें शकील बदायूनी, मजरूह सुल्तानपुरी, मदहोक, ज़िया सरहदी और कुमार बर्बंकवी शामिल हैं। मदर इंडिया (१९५७) फिल्म जो ऑस्कर में शामिल हुई थी, उसमें उन्हीं का संगीत था। नौशाद ने गुलाम मोहम्मद की मृत्य होने पर उनकी फिल्म पाकीज़ा (१९७२) का संगीत पूरा किया। गौरतलब है कि गुलाम मोहम्मद उनके सहायक भी रह चुके थे।



१९८१ में उन्हें भारतीय सिनेमा में योगदान के लिये दादा साहेब फाल्के अवार्ड मिला। १९८८ में उन्होंने मलयालम फिल्म "ध्वनि" के लिये काम किया। १९९५ में शाहरुख की फिल्म "गुड्डु" में भी संगीत दिया जिसके कुछ गाने पॉपुलर हुए थे। सन २००४ में जब "मुगल-ए-आज़म" (रंगीन) प्रर्दशित हुई तो नौशाद विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित थे। ८६ वर्ष की आयु में जब उन्होंने फिल्म ताजमहल(२००५) का संगीत निर्देशन दिया तो वे ऐसा करने वाले विश्व के सबसे बुजुर्ग संगीतकार बन गये। उनकी ज़िन्दगी पर आधारित ५ फिल्में भी बनी हैं-नौशाद का संगीत, संगीत का बादशाह, नौशाद पर दूरदर्शन द्वारा प्रसारित एक सीरियल, महल नौशाद और टी.वी सिरियल ज़िन्दा का सफर। उन पर किताबें भी लिखी गईं हैं चाहे मराठी में दास्तान-ए-नौशाद हो या गुजराती में 'आज अवत मन मेरो' हो।

उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री द्वारा रचित रचना 'उनकी याद करें' को भी संगीतबद्ध किया। इसको गाया था ४० कोरस गायकों के साथ ए. हरिहरन ने और निर्माता थे केशव कम्युनिकेशन्स। ये गीत सीमा पर तैनात जवानों के नाम था।
५ मई, २००६ को नौशाद दुनिया को अलविदा कह गये।

(जारी...)
अगले अंक में जानेंगे संगीत के अलावा क्या था नौशाद साहब का शौक और क्या कहती हैं फिल्मी हस्तियाँ मीठी धुनों के इस रचयिता के बारे में...


प्रस्तुति - तपन शर्मा


Wednesday, February 4, 2009

सुनिए मन्ना डे की आवाज़ में मधुशाला के गीत

पिछले दिनों हमने आवाज़ पर मन्ना डे का जिक्र किया था,हमारे कुछ श्रोताओं ने फरमाईश की,कि हम उन्हें मन्ना डे की आवाज़ में प्रस्तुत हरिवंश राय बच्चन रचित मधुशाला की रिकॉर्डिंग सुनवाएं. ये भी एक संयोग ही है कि अभी कुछ दिन पहले ही बच्चन जी पुण्यतिथि पर हमने उनकी एक कविता "क्या भूलों क्या याद करूँ ..." का स्वरबद्ध रूप भी सुनवाया था. तो आज आनंद लीजिये मन्ना डे की गहरी डूबती आवाज़ में मधुशाला के रंगों का.



प्रस्तुति सहयोग - विश्व दीपक "तन्हा"



Tuesday, January 27, 2009

रुक जा सुबह तक कि न हो ये रात आखिरी...- मन्ना डे की गैर फिल्मी ग़ज़लें

सुनिए मन्ना डे की ६ दुर्लभ गैर फिल्मी ग़ज़लें

मन्ना डे को कामयाबी आसानी से नहीं मिली। वे कहते हैं:"मैं लड़ना जानता हूँ,किसी भी हालात से जूझना सीखा है मैंने। मैंने सारी ज़िन्दगी मेहनत करी है और अब भी कर रहा हूँ। मैंने कभी हार नहीं मानी। संघर्ष में सबसे अच्छी बात होती है कि वो पल जब सब कुछ खत्म होता सा दिखाई पड़ता है उस पल ही कहीं से हिम्मत और आत्मविश्वास सा आ जाता है जो मुझे हारने नहीं देता। शास्त्रीय संगीत में रुचि रखने वाले हों या उससे अनभिज्ञ,सभी को मेरे गाने पसंद आते हैं। मेरी मेहनत, ट्रेंनिंग और अनुशासन की वजह से लोग मुझे विश्व भर में जानते हैं और सम्मान देते हैं।"

मन्ना डे को इस बात से दुख नहीं होता कि बाकी गायकों के मुकाबले उन्हें कम मौके मिले। उन्होंने लगभग सभी बड़े संगीतकारों के साथ काम किया है। वे बताते हैं कि कईं बार संगीतकार उनसे गाना गवाना चाहते थे परन्तु हर बार संगीतकार ही निर्णय नहीं लेते। फिल्मी जगत में अभिनेताओं के पसंदीदा गायक हुआ करते हैं और गायक भी उसी कलाकार से पहचाने जाते रहे हैं। जैसे,रफी हमेशा नौशाद की पसंद रहे और उन्होंने दिलीप कुमार के अधिकतर गाने गाये। उसी तरह से राजकपूर के गाने मुकेश,देव आनंद और राजेश खन्ना के गाने किशोर कुमार गाया करते थे। मन्ना डे की अद्वितीय प्रतिभा बेकार नहीं गई और उन्हें हमेशा तारीफ व सम्मान मिला। संगीतकारों ने फिल्म में स्थिति के अनुरूप मन्ना डे के लिये गाने बनाये।

मशहूर गाने "लागा चुनरी में दाग, छुपाऊँ कैसे" के लिये मन्ना डे कहते हैं कि ये मेरे मित्र रोशन द्वारा दिया गया एक बेहतरीन गाना है। ये दुर्लभ गीतों में से एक है। मैं कहीं भी जाऊँ, देश अथवा विदेश, ये गाना जरूर गाता हूँ। यह एक कठिन गीत है जिसमें शास्त्रीय संगीत का माधुर्य छिपा हुआ है। ये गीत मेरे दिल और आत्मा से जुड़ा हुआ है। मैं पिछले ६० बरस से यह गा रहा हूँ और मैंने जब भी गाया है, पूरी ईमानदारी से गाया है।

जब उनसे पूछा गया कि अब तक का सबसे कठिन गाना कौन सा लगा, जिसमें सबसे ज्यादा मेहनत और रियाज़ करना पड़ा। उनका जवाब था फिल्म काबुलीवाला से गाना : "ऐ मेरे प्यारे वतन, ऐ मेरे बिछड़े चमन"। ये गाना मुझे गले के एक ही हिस्से गाना था ताकि मैं इस गीत के द्वारा लोगों के दिलों तक इस गाने के भाव पहुँचा सकूँ।

सच में मन्ना, आप इसमें सफल हुए।
पद्मभूषण मन्ना डे भारतीय संगीत के महानतम व्यक्तित्व हैं। उनका जो योगदान भारतीय संगीत में रहा है उसे कोई नहीं भुला सकता। उनकी प्रसिद्धि केवल भारत में ही नहीं रही बल्कि विश्व के हर देश व स्थान में पहुँची जहाँ कहीं भी भारतीय रहते हैं या फिर भारतीय संगीत को चाहने वाले रहते हैं। लोग न केवल उनके संगीत का आदर करते हैं अपितु जिस तरह से वे मेलोडी और काव्य का मिश्रण करते हैं उसके सब कायल हैं।

मन्ना डे को पद्मष्री और पद्म भूषण जैसे सम्मानों से नवाज़ा गया है। मन्ना डे को दिये गये अन्य सम्मान हैं:

* १९६९ में हिन्दी फिल्म "मेरे हुज़ूर" में सर्वोत्तम पार्श्व गायन का राष्ट्रीय फिल्म अवार्ड
* १९७१ में बंगाली फिल्म "निशि पद्म" में सर्वोत्तम पार्श्व गायन का राष्ट्रीय फिल्म अवार्ड
* १९७१ में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री अवार्ड
* १९८५ में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा लता मंगेशकर अवार्ड
* १९८८ में रेनेसां सांस्कृतिक परिषद,ढाका द्वारा माइकल साहित्यो पुरस्कार
* १९९० में मिथुन फैन एसोसियेशन द्वारा श्यामल मित्र अवार्ड
* १९९१ में श्री खेत्र कला प्रकाशिका, पुरी द्वारा संगीत स्वर्णाचुर्र अवार्ड
* १९९३ में पी.सी चंद्र ग्रुप की ओर से पी.सी. चंद्र अवार्ड
* १९९९ में कमला देवी ग्रुप की ओर से कमला देवी रॉय अवार्ड
* २००१ में आनंद बाज़ार समूह द्वारा की ओर से आनंदलोक लाइफटाइम अवार्ड
* २००२ में स्वरालय येसुदास अवार्ड
* २००३ में प.बंगाल सरकार द्वारा अलाउद्दीन खान अवार्ड
* २००४ केरल सरकार द्वारा राष्ट्रीय सम्मान
* २००५ महाराष्ट्र सरकार द्वारा लाईफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड
* २००५ भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण

आइये ज़रा देखते हैं गानों की वो फेहरिस्त जिसको पढ़ने के बाद आपको लगने लगेगा कि मन्ना डे जैसा विभिन्न शैलियों में गाने वाला कलाकार कोई नहीं है। अगर बड़े बड़े साथी कलाकार उनका सम्मान करते थे और यहाँ तक कह डाला कि यह शख्स किसी भी अन्य गायक के गाने बड़ी आसानी से गा सकता है तो यह कहना अतिश्योक्ति नहीं थी। यहाँ लिखे गानों में शायद ही कोई गाना होगा जो आपने नहीं सुना होगा। उनके द्वारा संगीतबद्ध और गाये हुए कुछ गाने निम्न प्रकाशित हैं:

उन्होंने कव्वाली (ये इश्क इश्क है, ए मेरी ज़ोहरा जबीन, यारी है ईमान मेरा), रोमांटिक (प्यार हुआ इकरार हुआ, आजा सनम मधुर, दिल की गिरह खोल दो,ये रात भीगी भीगी, सोच के ये गगन झूमे,मुड़-मुड़ के न देख,ओ चाँद मुस्कराया, शाम ढ्ले जमुना किनारे,ज़िन्दगी है खेल), शास्त्रीय संगीत में (पूछो न कैसे, सुर न सजे, लागा चुनरी में दाग, लपक झपक तू,नाचे मयूरा, केतकी गुलाब जूही,भय भंजना बंदना, भोर आई गया अँधियारा), इमोशनल(ज़िन्दगी कैसी है पहेली, कस्में वादे,दूर है किनारा, नदिया चले रे धारा) गाने तो दर्शकों को दिये ही बल्कि उस के साथ लोगों लोगों थिरकने पर मजबूर कर देने वाले गाने जैसे आओ ट्विस्ट करें,ज़िन्दगी है खेल कोई पास कोई फेल,दुनिया रंग बिरंगी,एक चतुर नार और चुनरी सम्भाल गोरी भी गाये।

देशभक्ति के गीतों की बात करें तो ऐ मेरे वतन के लोगों, जाने वाले सिपाही से पूछो, होके मजबूर, हिन्दुस्तान की कसम जैसे मशहूर गाने उनके नाम रहे। अन्य कुछ बेहतरीन गाने थे "तू प्यार का सागर है, मेरे सब कुछ मेरे गीत, तू है मेरा प्रेमदेवता, हे राम वगैरह। मेरा नाम जोकर के गाने "ऐ भाई जरा देख कर चलो" के लिये उन्हें फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला।

मन्ना के बहुत से फिल्मी गीत हम आपको इस लेख के पहले अंक में सुनवा चुके हैं और आगे भी सुनवाते रहेंगे, पर मन्ना डे की गायकी का एक और पहलू भी है जिससे बारे में बहुत कम कहा सुना गया है. मन्ना डे के गैर फिल्मी ग़ज़लें अपनी ख़ास अदायगी के चलते अपना एक विशिष्ट ही स्थान रखती है, हमें यकीं है मन्ना की जो ग़ज़लें आज हम आपको सुन्वायेंगें उन्हें सुनकर आप भी यही कहेंगे, तो आनंद लीजिये आवाज़ और अंदाज़ के इस खूबसूरत संगम का -

दर्द उठा फ़िर हल्के हल्के....


हैरान हूँ ऐ सनम...


मेरी भी एक मुमताज़ थी...


मुझे समझाने मेरे...


ओ रंग रजवा रंग दे ऐसी चुनरिया ...


और अंत में सुनिए-
रुक जा सुबह तक न हो ये रात आखिरी...


प्रस्तुति - तपन शर्मा

Friday, January 23, 2009

यादें जी उठी....मन्ना डे के संग


"दिल का हाल सुने दिलवाला..." की मस्ती हो, या "एक चतुर नार..." में किशोर से नटखट अंदाज़ में मुकाबला करती आवाज़ हो, "ऐ भाई ज़रा देख के चलो.." के अट्टहास में छुपी संजीदगी हो, या "पूछो न कैसे मैंने रैन बितायी...", "लागा चुनरी में दाग...", "केतकी गुलाब जूही..." और "आयो कहाँ से घनश्याम..." जैसे राग आधारित गीतों को लोकप्रिय अंदाज़ में प्रस्तुत करना हो, एक मुक्कमल गायक है जो हमेशा एक "परफेक्ट रेंडरिंग" देता है. जी हाँ आपने सही अंदाजा लगाया. हम बात कर रहे हैं, एक और एकलौते मन्ना डे की.


मन्ना डे का जन्म १ मई १९१९ को पूर्णचंद्र और महामाया डे के यहाँ हुआ। अपने माता-पिता के अलावा वे अपने चाचा संगीताचार्य के.सी. डे से बहुत अधिक प्रभावित थे और वे ही उनके प्रेरणास्रोत भी थे। मन्ना ने अपने छुटपन की पढ़ाई एक छोटे से स्कूल "इंदु बाबुर पाठशाला" से हुई। स्कॉटिश चर्च कालिजियेट स्कूल व स्कॉटिश चर्च कॉलेज से पढ़ाई करने के बाद उन्होंने विद्यासागर कॉलेज से स्नातक की शिक्षा पूरी की। अपने बचपन से ही मन्ना को कुश्ती और मुक्केबाजी का शौक रहा और उन्होंने इन दोनों खेलों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। उनका काफी हँसमुख छवि वाला व्यक्तित्व रहा है और अपने दोस्तों व साथियों से के साथ मजाक करते रहते हैं।

अपने स्कॉटिश चर्च कॉलेज के दिनों में उनकी गायकी की प्रतिभा लोगों के सामने आया। तब वे अपने साथ के विद्यार्थियों को गा कर सुनाया करते थे और उनका मनोरंजन किया करते थे। वे अपने अंकल कृष्ण चंद्र डे और उस्ताद दाबिर खान से गायन की शिक्षा लिया करते थे। यही वो समय था जब उन्होंने तीन साल तक लगातार अंतर-महाविद्यालय गायन-प्रतियोगिताओं में प्रथम स्थान पाया।

१९४२ में मन्ना डे, कृष्णचंद्र के साथ मुंबई आये। वहाँ उन्होंने एक सहायक के तौर अपना काम सम्भला। पहले वे के.सी डे के साथ थे फिर बाद में सचिन देव बर्मन के सहायक बने। बाद में उन्होंने और भी कईं संगीत निर्देशकों के साथ काम किया और फिर अकेले ही संगीत निर्देशन करने लगे। कईं फिल्मों में संगीत निर्देशन का काम अकेले करते हुए भी मन्ना डे ने उस्ताद अमान अली और उस्ताद अब्दुल रहमान खान से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लेना जारी रखा।

मन्ना डे ने १९४३ की "तमन्ना" से पार्श्व गायन के क्षेत्र में कदम रखा। संगीत का निर्देशन किया था कॄष्णचंद्र डे ने और मन्ना के साथ थीं सुरैया। १९५० की "मशाल" में उन्होंने एकल गीत "ऊपर गगन विशाल" गाया जिसको संगीत की मधुर धुनों से सजाया था सचिन देव बर्मन ने।१९५२ में मन्ना डे ने बंगाली और मराठी फिल्म में गाना गाया। ये दोनों फिल्म एक ही नाम "अमर भूपाली" और एक ही कहानी पर आधारित थीं। इसके बाद उन्होंने पार्श्वगायन में अपने पैर जमा लिये।

सुनिए -

"उपर गगन विशाल...."


तू प्यार का सागर है...


ऐ भाई ज़रा देख के चलो...


ज़िन्दगी कैसी है पहेली ...


आयो कहाँ से घनश्याम...


मन्ना डे ने महान शास्त्रीय संगीतकार भीमसेन जोशी के साथ मशहूर गाना,"केतकी गुलाब जूही..." गाया। किशोर कुमार के साथ भी अलग अलग शैली के कईं गीत गाये। जिनमें शामिल हैं "ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे (शोले)" व "एक चतुर नार (पड़ोसन)"। मन्ना डे ने गायक/संगीतकार हेमंत कुमार के साथ बंगाली फिल्मों में कईं गाने एक साथ गाये। फिल्म "संख्यबेला" में उन्होंने लता मंगेशकर के साथ मशहूर गीत "के प्रोथोम कच्चे एसेची" गाया। इसमें कोई दो राय नहीं होनी चाहिये अगर हम ये कहें कि मन्ना डे ने ही भारतीय संगीत में एक नई शैली की शुरुआत की जिसमें भारतीय शास्त्रीय संगीत का पॉप संगीत के साथ मिश्रण किया गया। मन्ना की बहुमुखी प्रतिभा रवींद्र संगीत तक फैली।

उनके पाश्चात्य संगीत के साथ किये गये प्रयोगों से कईं न भूलने वाले गीत तैयार हुए हैं। उन्होंने ३५०० से अधिक गाने रिकार्ड किये हैं। १८ दिसम्बर १९५३ को मन्ना डे ने केरल की सुलोचना कुमारन से विवाह किया। इनकी दो बेटियाँ हुईं। शुरोमा का जन्म १९ अक्टूबर १९५६ और सुमिता का २० जून १९५८ को हुआ।

मुम्बई में ५० साल रहने के बाद मन्ना डे आज बंग्लुरु के कल्याणनगर में रहते हैं। आज भी उनका कोलकाता में घर है और वे आज भी विश्व भर में संगीत के कार्यक्रम करते रहते हैं।

वर्ष २००५ में आनंदा प्रकाशन ने बंगाली उनकी आत्मकथा "जिबोनेर जलासोघोरे" प्रकाशित की। उनकी आत्मकथा को अंग्रेज़ी में पैंगुइन बुक्स ने "Memories Alive" के नाम से छापा तो हिन्दी में इसी प्रकाशन की ओर से "यादें जी उठी" के नाम से प्रकाशित की। मराठी संस्करण "जिबोनेर जलासाघोरे" साहित्य प्रसार केंद्र, पुणे द्वारा प्रकाशित किया गया।

मन्ना डे के जीवन पर आधारित "जिबोनेरे जलासोघोरे" नामक एक अंग्रेज़ी वृतचित्र ३० अप्रैल २००८ को नंदन, कोलकाता में रिलीज़ हुआ। इसका निर्माण "मन्ना डे संगीत अकादमी द्वारा" किया गया। इसका निर्देशन किया डा. सारूपा सान्याल और विपणन का काम सम्भाला सा रे ग म (एच.एम.वी) ने।

रफी साहब ने एक बार प्रेस को कहा था: "आप लोग मेरे गाने सुनते हैं, मैं मन्ना डे के गाने सुनता हूँ"। सचिन देव बर्मन और अनिल बिस्वास जैसे संगीतकारों ने कहा था कि मन्ना डे किसी के भी गाये हुए गाने सरलता से गा सकते हैं। फिर चाहें मोहमम्मद रफी हों, किशोर कुमार, मुकेश या फिर तलत महमूद।

उनके बारे में अधिक जानकारी अगले अंक में--- फिलहाल सुनिये और देखिये उनका यह रोमांटिक गीत फिल्म रात और दिन से।
दिल की गिरह खोल दो.....


(जारी...)

प्रस्तुति - तपन शर्मा "चिन्तक"

Monday, December 22, 2008

सुनिए मुकेश के गाये दुर्लभ गैर फिल्मी ग़ज़लों का संकलन


महान गायक मुकेश के बारे में हम आवाज़ पर पहले भी कई बार बात कर चुके हैं. संगीतकार हृदयनाथ मंगेशकर जी का संस्मरण हमने प्रस्तुत किया था, साथ ही मशहूर संगीत विशेषज्ञ संजय पटेल जी ने उन पर एक विशेष प्रस्तुति दी थी, तो तपन शर्मा जी ने आप सब के लिए लेकर आ चुके हैं उनका जीवन परिचय और संगीत सफर की तमाम जानकारियाँ. हमारे कुछ श्रोताओं ने हमसे फरमाईश की, कि हम उन्हें मुकेश जी के गाये कुछ गैर फिल्मी गीतों और ग़ज़लों से भी रूबरू करवायें. तो आज हम अपने श्रोताओं के लिए लेकर आए हैं, मुकेश की गैर फिल्मी ग़ज़लों का एक नायाब गुलदस्ता...

सुनिए और आनंद लीजिये -

Monday, September 29, 2008

लता संगीत पर्व- महीने भर चला संगीत प्रेमियों का उत्सव

आवाज़ पर आयोजित लता संगीत उत्सव पर एक विशेष रिपोर्ट और सुनें लता जी के चुने हुए २० गीत एक साथ.

जब हमने लता संगीत उत्सव की शुरुवात की थी इस माह के पहले सप्ताह में, तब दो उद्देश्य थे, एक भारत रत्न और संगीत के कोहिनूर लता मंगेशकर पर हिन्दी भाषा में कुछ सहेजनीये आलेखों का संग्रह बने और दूसरा लता दी के चाहने वाले इंटरनेटिया श्रोताओं को हम प्रेरित करें की वो लता जी के बारे में हिन्दी भाषा में लिखें. जहाँ तक दूसरे उद्देश्य का सवाल है, हमें बहुत अधिक कमियाबी नही मिल पायी है. कुछ लिखते लिखते रह गए तो कुछ जब तक लिखना सीख पाते समय सीमा खत्म हो चली. प्रतियोगिता की दृष्टि से मात्र एक ही प्रवष्टि हमें मिली जिसे हम आवाज़ पर स्थान दे पाते. नागपुर के २२ वर्षीय अनूप मनचलवार ने अपनी मुक्कम्मल प्रस्तुति से सब का मन मोह लिया, सुंदर तस्वीरें और slide शो से अपने आलेख को और सुंदर बना दिया. हमारे माननीय निर्णायक श्री पंकज सुबीर जी ने अनूप जी को चुना है लता संगीत पर्व के प्रथम और एक मात्र विजेता के रूप में, अनूप जी को मिलेंगीं ५०० रुपए मूल्य की पुस्तकें और "पहला सुर" एल्बम की एक प्रति. अनूप जी का आलेख आप यहाँ पढ़ सकते हैं. अनूप मनचलवार जी को बधाई देते हुए हम आगे बढ़ते हैं, अगर हम अपने पहले उद्देश्य की बात करें तो हम इस आयोजन को एक बहुत बड़ी सफलता कहेंगे. पेश है इस सफर की कुछ झलकियाँ-



किसी भी सफल आयोजन के लिए जरूरी है एक सफल शुरुवात. और ये शुरुवात हमें मिली जब आयोजन के कर्णधार और हमारे प्रिये पंकज सुबीर भाई ने लता जी की आवाज़ में रूह की वादियों में बह रही दिलरुबा नदी से मिलवाया. लता जी की मुंहबोली बहन और स्वर्गीय कवि/गीतकार पंडित नरेन्द्र शर्मा जी की सुपुत्री लावण्या शाह ने जब लता जी के साथ बीते उनके व्यक्तिगत जीवन के कुछ मधुर क्षणों को याद किया तो पाठकों की आँखें सजल हो उठीं.

फ़िर आमद हुई इस आयोजन में संजय पटेल भाई की, जो लाये साथ में लता जी का सुगम संगीत. कुछ ऐसी ग़ज़लें और नगमें जिन्हें सिर्फ़ सुनना काफ़ी नही उन्हें समझना भी जरूरी है, लता जी के गायन की उंचाईयों की झलक पाने के लिए. संजय भाई ने जिस खूबी से इसे अपने पहले और दूसरे आलेख में प्रस्तुत किया उसे पढ़ कर और सुनकर हमरे श्रोताओं ने हमें ढेरों बधाईयाँ भेजीं, जिसे हम सादर संजय भाई को प्रेषित कर रहे हैं. फ़िर लौटे पंकज भाई अपनी शीग्र प्रकाशनीये कहानी में लता जी का जिक्र लेकर. हिंद युग्मी तपन शर्मा ने जानकारीपूर्ण आलेख दिया सुर की देवी के नाम, वहीँ लता जी के जन्मदिवस की पूर्वसंध्या पर संजय भाई ने पेश की माया गोविन्द की एक अद्भुत कविता,स्वर कोकिला को समर्पित. और कल यानी जब लता जी ने अपने परिवार के साथ अपना ७९ वां जन्मदिन मना रही थी, तब यहाँ हिंद युग्म पर संजय भाई ने एलान किया कि प्रलय के बाद भी बचा रहेगा लता मंगेशकर का पावन स्वर. इससे बेहतर भेंट हम संगीत प्रेमी क्या दे सकते थे साक्षात् माँ सरस्वती का रूप लेकर धरती पर आयी इस आवाज़ को, जिसका नाम है लता मंगेशकर. इस सफल आयोजन के लिए हिंद युग्म आवाज़ परिवार आप सब का एक बार फ़िर आभार व्यक्त करता है. चलते चलते संजय भाई ने जो कहा लता जी के लिए उसे दोहरा दें क्योंकि यही हम सब के मन की दुआ है -

आइये भगवान से प्रार्थना करें लताजी दीर्घायु हों और उनकी पाक़ आवाज़ से पूरी क़ायनात सुरीली होती रहे...बरसों बरस.

सुनिए आवाज़ की टीम द्वारा चुने गए २० नायाब गीत लता जी के, एक साथ. हमने कोशिश की है कि लता जी के हर अंदाज़ की एक झलक इन गीतों में आपको मिले, आनंद लें -

Saturday, September 6, 2008

यही वो जगह है - आशा, एक परिचय

बहुमुखी प्रतिभा-यही शब्द हैं जो आशा भोंसले के पूरे कैरियर को अपने में समाहित करते है। और कौन ऐसा है जो गर्व कर सके, जिसने व्यापक तौर पर तीन पीढ़ियों के महान संगीतकारों के साथ काम किया हो। चाहें ५० के दशक में ऒ.पी नय्यर का मधुर संगीत हो या आर.डी.बर्मन के ७० के दशक के पॉप हों या फिर ए.आर.रहमान का लयबद्ध संगीत- आशा जी ने सभी के साथ भरपूर काम किया है। गायन के क्षेत्र में प्रयोग करने की उनकी भूख की वजह से ही उनमें विविधता आ पाई है। उन्होंने १९५० के दशक में हिन्दी सिने जगत के पहले रॉक गीतों में से एक "ईना, मीना, डीका.." गाया। उन्होंने महान गज़ल गायक गुलाम अली व जगजीत सिंह के साथ कईं गज़लों में भी काम किया, और बिद्दू के पॉप व बप्पी लहड़ी के डिस्को गीत भी गाये।

मंगेशकर बहनों में से एक, आशा भोंसले का जन्म ८ सितम्बर १९३३ को महाराष्ट्र के मशहूर अभिनेता व गायक दीनानाथ मंगेशकर के घर छोटे से कस्बे "गोर" में हुआ। अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर की तरह इन्होंने भी बचपन से ही गाना शुरु कर दिया था। परन्तु अपने पिता से शास्त्रीय संगीत सीखने के कारण वे जल्द ही पार्श्व गायन के क्षेत्र में कूद पड़ी। अप्रैल १९४२ में इनके पिताजी का देहांत हो गया जिसके बाद इनका परिवार पुणे से कोल्हापुर और बाद में मुम्बई जा बसा। करीबन १० वर्ष की उम्र में इन्होंने अपना पहला गीत मराठी फिल्म "माझा बाल" के लिये गाया। आशा अपने जन्म-स्थल को आज भी याद करती हैं और कहती हैं-"मैं अब भी संगली में बिताये अपने बचपन के दिन याद करती हूँ क्योंकि मेरी वजह से ही लता दी स्कूल से भागतीं थीं। मैं संगली को कभी नहीं भूल सकती क्योंकि वहाँ मेरा जन्म हुआ था"।

हम सबकीं आशा
आशा ने पार्श्व गायन की शुरुआत १९४८ में फिल्म "चुनरिया" से कर दी थी। किन्तु उन्हें अपनी जगह बनाने में काफी समय लगा। १९४९ का अंत होते होते लाहौर, बरसात, अंदाज़ और महल जैसी फिल्में आईं और लता मंगेशकर संगीतकारों की पहली पसंद बन गईं थीं। आशा, लता दी जितनी ही प्रतिभाशाली होने के बावजूद अपना सही हक नहीं ले पा रहीं थी। ऐसे भी कईं संगीतकार थे जो लता के बाद शमशाद बेगम और गीता दत्त से गवाने के बारे में सोचते थे। जिसकी वजह से फिल्मी जगत में आशा की जगह न के बराबर थी। काफी हल्के बजट की फिल्में या वो फिल्में जिनमें लता न गा पा रहीं हों, वे ही उन्हें मिल पा रहीं थी। मास्टर कृष्ण दयाल, विनोद, हंसराज बहल, बसंत प्रकाश, धनीराम व अन्य संगीतकार थे जिन्होंने आशा जी के शुरुआती दिनों में उन्हें काम दिया। "चुनरिया" के अलावा १९४९ में आईं "लेख" और "खेल" ही ऐसी फिल्में रहीं जिनमें आशा जी ने गाना गाया। "लेख" में उन्होंने मास्टर कृष्ण दयाल के संगीत से सजा एक एकल गीत गाया व मुकेश के साथ एक युगल गीत -'ये काफिला है प्यार का चलता ही जायेगा..." गाया। १९५३ में "अरमान" के बाद ही उन्हें कामयाबी मिलनी शुरु हुई। एस.डी.बर्मन द्वारा संगीतबद्ध मशहूर गाना-"चाहें कितना मुझे तुम बुलावो जी, नहीं बोलूँगी, नहीं बोलूँगी...' गाया। यही गाना उन्होंने तलत महमूद के साथ भी गाया।

उसके बाद रवि ने उन्हें १९५४ में "वचन" में काम दिया। जहाँ उन्होंने मोहम्मद रफी के साथ फिल्म में एकमात्र गीत गाया-"जब लिया हाथ में हाथ..."। ये अकेला गीत ही उन्हें प्रसिद्धि दिला गया और उन्होंने अपने पैर जमाने शुरु कर दिये। लेकिन एक दो तीन (१९५२), मुकद्दर(१९५०), रमन(१०५४), सलोनी (१९५२), बिजली(१९५०), नौलखा हार(१९५४) और जागृति(१९५३) जैसी कुछ फिल्में ही थी जिनमें उन्होंने एक या दो गाने गाये और यही उनके गाते रहने की उम्मीद थी।

१९५७ उनके लिये एक नईं किरण ले कर आया जब ओ.पी नय्यर जी ने उनसे "तुमसा नहीं देखा" और " नया दौर" के गीत गाने को कहा। उसी साल एस.डी.बर्मन और लता के बीच में थोड़ी अनबन हुई। उधर गीता दत्त भी शादी के बाद परेशान थीं और उपलब्ध नहीं रहती थीं। नतीजतन एस.डी.बर्मन ने भी आशा जी को अपनी फिल्म में लेने का निश्चय किया। उससे अगले साल उन्होंने हावड़ा ब्रिज, चलती का नाम गाड़ी और लाजवंती के कईं सुपरहिट गाने गाये। उसके बाद तो १९७० के दशक तक ओ.पी. नय्यर के लिये आशा जी पहली पसंद बनी रहीं। उसके बाद इन दोनों की जोड़ी में दरार आई। १९६० के दशक में ओ.पी नय्यर के संगीत में आशा जी ने एक से बढ़कर एक बढ़िया गाने गाये। १९७० का दशक उन्हें आर.डी. बर्मन के नज़दीक ले कर आया जिन्होंने आशा जी से कईं मस्ती भरे गीत गवाये। पिया तू अब तो आजा(कारवाँ), दम मारो दम(हरे राम हरे कृष्णा) जैसे उत्तेजक और नईं चुनौतियों भरे गाने भी उन्होंने गाये। जवानी दीवानी (१९७२) के गीत "जाने जां...." में तो उन्होंने बड़ी आसानी से ही ऊँचे और नीचे स्केल में गाना गाया। १९८० में तो उन्होंने गज़ल के क्षेत्र में कमाल ही कर दिया। "दिल चीज़ क्या है..", " इन आँखों की मस्ती..", " ये क्या जगह है दोस्तों..", "जुस्तुजू जिसकी थी.." जैसी सदाबहार गज़लें उनकी उम्दा गायकी निशानी भर हैं। इजाज़त (१९८७) में उन्होंने "मेरा कुछ सामान..: गाना गाया, जिसके लिये उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। ये गाना सबसे मुश्किल गानों में से एक गिना जाता है क्योंकि ये पद्य न हो कर गद्य के रूप में है। ९० के दशक में तो आशा ही छाईं रहीं। चाहें पॉप फिल्मी गीत हो, या पाश्चात्य संगीत की एल्बम हो सभी में आशा जी ही दिखाई पड़ती थीं। वैसे तो उन्होंने गाने गाने कम कर दिये हैं पर आज भी उर्मिला या ऐश्वर्या को रंगीला (१९९४) व ताल ('९९) में आशा जी के गानों पर थिरकते हुए देखा जा सकता है।

आज उनकी आवाज़ पहले से बेहतर और विविधता भरी हो गई है। यदि हम उन्हें संदीप चौटा के "कम्बख्त इश्क.." से पहले आर.डी.बर्मन "तेरी मेरी यारी बड़ी पुरानी.." गाते हुए सुन लें तो भी प्रत्यक्ष तौर पर दोनों आवाज़ों में अंतर करना बहुत कठिन होगा.. जबकि दोनों गानों में ३० बरस का अंतर है!!

दो दिन बाद आशा जी अपना ७५ वां जन्मदिन मनायेंगी, इस अवसर पर संजय पटेल का विशेष आलेख अवश्य पढियेगा, फिलहाल सुनते हैं फ़िल्म "ये रात फ़िर न आयेगी" फ़िल्म का ये मधुर गीत आशा जी की आवाज़ में -



जानकारी स्रोत - इन्टनेट
संकलन - तपन शर्मा "चिन्तक"

Wednesday, August 27, 2008

मैं तो दीवाना...दीवाना...दीवाना...मुकेश, एक परिचय

इससे पहले आपने पढ़ा हृदय नाथ मंगेशकर द्वारा लिखित संस्मरण 'ओ जाने वाले हो सके तो॰॰॰' और सुने मुकेश के गाये ९ हिट गीत। संजय पटेल का आलेख 'दर्द को सुरीलेपन की पराकाष्ठा पर ले जाने वाले अमर गायक मुकेश'। अब जानिए मुकेश के बारे में तपन शर्मा से।


मुकेश चंद्र माथुर का जन्म दिल्ली के एक मध्यम-वर्गीय परिवार में जुलाई २२, १९२३ को हुआ। उन्हें अभिनय व गायन का बचपन से ही शौक था और वे के.एल. सहगल के प्रशंसक थे। मात्र दसवीं तक पढ़ने के बावजूद उन्हें लोक निर्माण कार्य में सहायक सर्वेक्षक विभाग में नौकरी मिल गई, जहाँ पर उन्होंने सात महीने तक काम किया। पर भाग्य को कुछ और ही मंजूर था। दिल्ली में उन्होंने चुपके से कईं गैर-फिल्मी गानों की रिकार्डिंग करी। उसके बाद तो वे भाग कर मुम्बई में फिल्म-स्टार बनने के लिये जा पहुँचे। वे अपने रिश्तेदार व प्रसिद्ध कलाकार मोतीलाल के यहाँ ठहरने लगे।

मोतीलाल की मदद से वे फिल्मों में काम करने लगे। एक गायक के तौर पर उनका पहला गीत "निर्दोष" में "दिल ही बुझा हुआ..." रहा, उसके बाद उनका पहला युगल गीत फिल्म "उस पार" में गायिका कुसुम के साथ "ज़रा बोली री हो.." था। फिर उन्होंने फिल्म "मूर्ति" में "बदरिया बरस गई उस पार.." खुर्शीद के साथ गाया। उस समय तक उन्होंने सुनने वालों के मन में अपनी एक जगह बना ली थी। तब उनके जीवन में महत्त्व पूर्ण घटना घटी। साल था १९४५, जब अनिल बिस्वास ने उनसे फिल्म 'पहली नज़र' के लिये 'दिल जलता है तो जलने दे....' गाने के लिये कहा। ये वो गीत था जो मुकेश को पूरी तरह से लोगों की नजरों व प्रसिद्धि में ले आया। वे किंवदंति बन चुके थे और आने वाले कईं दशकों तक उनकी जादुई आवाज़ को पूरे देश ने ‘आग’, ‘अनोखी अदा’ और ‘मेला’ के गानों में सुना।


१९४९ में उन्होंने एक और मील का पत्थर पार किया। वो था उनका राज कपूर और शंकर-जयकिशन के साथ मिलन। राजकपूर उनसे और शंकर-जयकिशन से अपने आर.के. फिल्म्स के लिये गानों की फरमाईश करते रहते। उसके बाद तो 'आवारा' और 'श्री ४२०" जैसी फिल्मों में गाये गये 'आवारा हूँ..' व ' मेरा जूता है जापानी..' से उनकी आवाज़ ने देश ही नहीं विदेश में भी शोहरत पाई। रूस में तो "आवारा हूँ..." सड़कों पर सुनाई देने लगा था। राज कपूर जैसे चतुर निर्देशक व संगीत प्रेमी के साथ काम करने का मुकेश को फायदा मिला। राज कपूर फिल्मों में अच्छे गानों के पक्षधर रहे। शंकर जयकिशन की हर एक धुन को वे सुनते थे व उनके पास करने पर ही वो धुन रिकार्डिंग के लिये जाया करती थी। राज कपूर हर गाने की रिकार्डिंग के वक्त स्टूडियो में ही रहते थे व आर्केस्ट्रा की हौंसला अफजाई करते रहते। उनके संगीत के प्रति इसी समर्पण का असर आने वाली हर पीढी पर दिखा जो जब भी राज कपूर के गाने सुनती है तो हर बार नई ताज़गी सी मिलती है। ‘आह’, ‘आवारा’, ‘बरसात’, ‘श्री ४२०’, ‘अनाड़ी’, ‘जिस देश में गंगा बहती है’, ‘संगम’, ‘मेरा नाम जोकर’ व अन्य कईं फिल्मों के गाने आज भी तरो-ताज़ा से लगते हैं। राज कपूर की सफलता के साथ मुकेश व शंकर जयकिशन की सफलता भी शामिल रही।

लेकिन उनका जीवन हमेशा आसान नहीं रहा। 'आवारा' की सफलता के बाद मुकेश ने दोबारा अभिनय के क्षेत्र में अपने आपको आजमाने का प्रयास किया और अपने गायन के करियर को हाशिये पर धकेल दिया। सुरैया के साथ ‘माशूका’ (१९५३) व ऊषा किरोन के साथ ‘अनुराग’ (१९५६) बहुत बुरी तरह से पिटी। उन्होंने राज कपूर की फिल्म ‘आह’ (१९५३) में एक तांगे वाले की छोटी सी भूमिका निभाई। उसी फिल्म के एक गाने- ‘छोटी सी ज़िन्दगानी’ को उन्होंने गाया भी। कठिन परिस्थितियों को देखते हुए मुकेश ने पार्श्व गायन में दोबारा हाथ आजमाने का निश्चय किया। परन्तु तब उन्हें न के बराबर ही काम मिल रहा था। स्थिति इतनी गम्भीर हो चुकी थी कि उनके दोनों बच्चे नितिन और रितु को स्कूल छोड़ना पड़ा।

आखिरकार उन्होंने ‘यहूदी’ (१९५८) के गाने 'ये मेरा दीवानापन है..' से जोरदार वापसी करी। उसी साल आई ‘मधुमति’, ‘परवरिश’ और ‘फिर सुबह होगी’ के गाने इतने जबर्दस्त थे कि मुकेश ने फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। एस.डी बर्मन जिन्होंने तब तक मुकेश को अपने गानों में मौका नहीं दिया था, उनसे दो उत्कृष्ट गीत गवाये। वे गीत थे- फिल्म 'बम्बई का बाबू' (१९६०) से 'चल री सजनी...' और बन्दिनि (१९६३) से 'ऒ जाने वाले हो सके तो लौट के आना...'। उसके बाद तो मुकेश ६० और ७० के दशक में चमके रहे और उन्होंने 'हिमालय की गोद में'(१९६५) से 'मैं तो एक ख्वाब हूँ...', मेरा नाम जोकर से 'जीना यहाँ मरना यहाँ..' आनंद(१९७०) से 'मैंने तेरे लिये ही सात रंग के..' 'रोटी कपड़ा और मकान' से ' मैं न भूलूँगा..'जैसे असंख्य मधुर और दिल व आत्मा को छू जाने वाले गीत गाये। और उनके ‘कभी कभी’ (१९७६) के दो गानों 'मैं पल दो पल का शायर...' और 'कभी कभी मेरे दिल में..' को कौन भूल सकता है।

अन्य संगीत निर्देशक जिनके लिये मुकेश ने बेहतरीन गाने गाये, वे थे लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, कल्याणजी-आनंदजी, सलिल चौधरी, ऊषा खन्ना, आर.डी.बर्मन वगैरह। फिल्म 'कभी कभी' में तो खय्याम के संगीत, साहिर लुधियानवी के गीत और मुकेश की आवाज़ ने तो जादू बिखेर दिया था।

१९७४ में मुकेश ने सलिल चौधरी द्वारा संगीतबद्ध, फिल्म रजनीगंधा में 'कईं बार यूँ भी देखा है...' गाया जिसके लिये उन्हें उस साल के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 'सत्यम शिवम सुंदरम'(१९७८) का गीत 'चंचल शीतल, कोमल' उनका आखिरी रिकार्ड किया गया गाना था। २७ अगस्त १९७६ में अमरीका के डेट्रोएट में संगीत समारोह के दौरान आये दिल के दौरे से उनका देहांत हो गया। मुकेश आज हमारे बीच नहीं हैं, पर उनकी अमर आवाज़ हमेशा हमेशा संगीत प्रेमियों को अपना दीवाना बनाती रहेगी, आज उनकी पुण्यतिथि पर हम याद करें उस अमर फनकार को, उनके यादगार गीतों को सुनकर, आईये, चलते चलते सुनें एक बार वही गीत जिसके लिए उन्हें रास्ट्रीय पुरस्कार मिला, फ़िल्म 'रजनीगंधा' के इस गीत को लिखा है योगेश ने, और संगीत है सलील दा का, इन दोनों के बारे में हम आगे बात करेंगे, फिलहाल सुनें मुकेश को, जिन्होंने इस गीत को भावनाओं के चरम शिखर पर बिठा दिया है अपनी आवाज़ के जादू से.



जानकारी सोत्र - इन्टरनेट.
संकलन - तपन शर्मा "चिन्तक"



इससे पहले आपने पढ़ा हृदय नाथ मंगेशकर द्वारा लिखित संस्मरण 'ओ जाने वाले हो सके तो॰॰॰' और सुने मुकेश के गाये ९ हिट गीत। संजय पटेल का आलेख 'दर्द को सुरीलेपन की पराकाष्ठा पर ले जाने वाले अमर गायक मुकेश'। अब जानिए मुकेश के बारे में तपन शर्मा से।

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