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Saturday, June 18, 2016

"मधुकर श्याम हमारे चोर...", कैसे इस भजन ने सहगल और पृथ्वीराज कपूर के मनमुटाव को समाप्त किया?


एक गीत सौ कहानियाँ - 84
 

'मधुकर श्याम हमारे चोर...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना
रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।इसकी 84-वीं कड़ी में आज जानिए 1942 की मशहूर फ़िल्म ’भक्त सूरदास’ की प्रसिद्ध भजन "मधुकर श्याम हमारे चोर..." के बारे में जिसे कुन्दन लाल सहगल ने गाया था। मूल पारम्परिक रचना सूरदास की, फ़िल्मी संस्करण डी. एन. मधोक का, और संगीत ज्ञान दत्त का। 


 र्ष 1940-41 के दौरान द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हो गया और कलकत्ता में जातीय दंगे शुरू हो गए। इस
Gramophone Record of "Madhukar Shyam..."
डावांडोल स्थिति में न्यू थिएटर्स धीरे धीरे बन्द होने लगा। ऐसे में इस थिएटर के सबसे सशक्त स्तंभ, कुन्दन लाल सहगल, इसे छोड़ बम्बई आ गए और वहाँ के ’रणजीत स्टुडियोज़’ में शामिल हो गए। ’रणजीत’ में सहगल साहब की पहली फ़िल्म थी ’भक्त सूरदास’ जो बनी थी 1942 में। फ़िल्म में गीत लिखे डी. एन. मधोक ने और संगीत दिया ज्ञान दत्त ने। सहगल की आवाज़ में फ़िल्म के सभी गीत और भजन बेहद सराहे गए और इस फ़िल्म के गाने सहगल साहब के करीअर के सर्वश्रेष्ठ गीतों में माने जाते रहे हैं। राग दरबारी आधारित “नैनहीन को राह दिखा प्रभु”, राग भटियार आधारित “निस दिन बरसत नैन हमारे” और राग भैरवी आधारित “मधुकर श्याम हमारे चोर” फ़िल्म की सर्वाधिक लोकप्रिय सहगल की गाई हुई रचनाएँ थीं। “मधुकर श्याम हमारे चोर” को सुनते हुए 60 के दशक के हिट गीत “अजहूं न आये साजना सावन बीता जाये” से समानता महसूस की जा सकती है। इस भजन की रेकॉर्डिंग् से जुड़ी एक मार्मिक उपाख्यान जुड़ा हुआ है। ’रणजीत’ के अन्य गीतकार किदार शर्मा ने अपनी आत्मकथा में इस भजन के रेकॉर्डिंग् के बारे में बताया है कि सहगल साहब को इसे HMV के स्टुडियो में रेकॉर्ड करना था। सारे म्युज़िशियन्स आ चुके थे, रिहर्सल हो चुकी थी। स्नेहल भाटकर उन कलाकारों में से एक थे। जब सहगल साहब ने स्टुडियो के अन्दर क़दम रखा तो वो लड़खड़ा रहे थे। सब ने सोचा कि रेकॉर्डिंग् का तो अब कोई सवाल ही नहीं है, ज्ञान दत्त घबरा गए। सहगल साहब नशे में धुत दिख रहे थे। लड़खड़ाते हुए सहगल साहब माइक्रोफ़ोन के सामने जा खड़े हुए और नज़दीक रखे एक कुर्सी पर एक पैर रख कर अपने आप को सहारा दिया और कहने लगे, "हाँ, मैं तैयार हूँ, मेरे लड़खड़ाने की तरफ़ ध्यान ना दें, यह मेरा मुर्ख शरीर साथ नहीं देता, पर मैं अपने शरीर से नहीं गाता, मैं अपनी आत्मा से गाता हूँ, इसलिए टेक पर्फ़ेक्ट होगा।" और वाक़ई टेक बिल्कुल ठीक रहा। सहगल ने अपनी आत्मा से ही गाया, यह इस भजन को सुनने पर पता चलता है। इसी फ़िल्म के अन्य गीत “नैनहीन को राह दिखा प्रभु” तो 14 बार में रेकॉर्ड हुआ और फिर भी सहगल साहब को संतुष्टि नहीं हुई। इस गीत की धुन इतनी मार्मिक थी कि रेकॉर्डिंग पूरी होने पर सहगल फूट-फूट कर रो पड़े। 



"मधुकर श्याम हमारे चोर..." भजन के साथ एक और घटना भी जुड़ी हुई है। बात तब की है जब कुन्दनलाल
Saigal & Prithviraj
सहगल और पृथ्वीराज कपूर अपने परिवार सहित माटुंगा बम्बई के एक ही इमारत में रहते थे। दोनों में दोस्ती भी गहरी थी। पर बकौल श्रीमती आशा सहगल, दोनों के बीच किसी बात पर अनबन हो गई। बात यहाँ तक बढ़ गई कि आपस में बोलचाल भी बन्द हो गई। अब इत्तेफ़ाकन सहगल शूटिंग् के निकले तो थोड़ी देर में सीढ़ियाँ चढ़ते, हाँफ़ते, वापस घर लौट आए, और पत्नी आशा से बोले कि मन्दिर से आती हुईं माँ, यानी पृथ्वीराज की माँ मिल गईं थीं, कह रही थीं "कुन्दन, बहुत दिन हो गए तूने कोई भजन नहीं सुनाया!"। बस इसलिए अपना हारमोनियम लेने आया हूँ। और अगले ही पल वो हारमोनियम गले से बाँधे वो सीढ़ियों से नीचे उतर गए और फिर देखते क्या हैं कि वो खड़े-खड़े ही पृथ्वीराज जी की माताजी को भजन सुना रहे हैं "मधुकर श्याम हमारे चोर..."। उनका गाना शुरू ही हुआ था कि वहाँ ना केवल पृथ्वीराज बल्कि और भी सुनने वालों की भीड़ जमा हो गई। भजन जब पूरा हुआ तो पृथ्वीराज ने लपक कर सहगल के गले से हारमोनियम उतारा और लिपट गए अपने भाई से, रोने लगे। कैसा भावुक दृश्य रहा होगा, इसका अन्दाज़ा लगाया जा सकता है! "मैल मलीन सब धोए दियो, लिपटाए गले से सखा को सखा ने"। लीजिए, अब आप वही भजन सुनिए। 


"मधुकर श्याम हमारे चोर..." : कुन्दनलाल सहगल : फिल्म - भक्त सूरदास : संगीत - ज्ञानदत्त




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Thursday, November 12, 2009

हमने खायी है मोहब्बत में जवानी की क़सम....ज्ञान साहब का संगीतबद्ध एक दुर्लभ गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 260

फ़िल्म संगीत के इतिहास में अगर हम झाँकें तो ऐसे कई कई नाम ज़हन में आते हैं, जिन नामों पर जैसे वक़्त की धूल सी चढ़ गई है, और रोज़ मर्रा की ज़िंदगी में जिन्हे हम आज बड़ी मुश्किल से याद करते हैं। लेकिन एक वक़्त ऐसा था जब ये फ़नकार, कम ही सही, लेकिन अपनी प्रतिभा के जौहर से फ़िल्म संगीत के विशाल ख़ज़ाने को अपने अपने अनूठे ढंग से समृद्ध किया था। इनमें शामिल हैं फ़िल्म संगीत के पहली पीढ़ी के कई बड़े बड़े संगीतकार भी, जिन्हे आज की पीढ़ी लगभग भुला ही चुकी है। लेकिन संगीत के सच्चे रसिक आज भी उन्हे याद करते हैं, सम्मान करते हैं। और 'ओल्ड इज़ गोल्ड' एक ऐसा मंच है जो फ़िल्म संगीत के सुनहरे दशकों के हर दौर के कलाकारों को समर्पित है। आज एक ऐसे ही गुणी संगीतकार का ज़िक्र कर रहे हैं, आप हैं फ़िल्म संगीत के पहली पीढ़ी के संगीतकार ज्ञान दत्त। ज्ञान दत्त जी का नाम याद आते ही याद आते हैं सहगल साहब के गाए फ़िल्म 'भक्त सूरदास' के तमाम भजन। 'भक्त सूरदास' और ज्ञान दत्त जैसे एक दूसरे के पर्याय बन गए थे। यह ४० का दौर था। फिर धीरे धीरे बदलते दौर के साथ साथ ज्ञान दत्त भी पीछे पड़ते गए और सन् १९५० में उनकी अंतिम "चर्चित" फ़िल्म आई 'दिलरुबा'। हालाँकि इसके बाद भी उन्होने कुछ फ़िल्मों में संगीत दिए लेकिन वो नहीं चले। आज हम सुनवा रहे हैं फ़िल्म 'दिलरुबा' का एक युगल गीत जिसे गाया है गीता रॉय और जी. एम. दुर्रानी ने। इस फ़िल्म में ज्ञान दत्त के स्वरबद्ध गीतों को लिखे डी. एन. मधोक, बूटाराम शर्मा, नीलकंठ तिवारी, एस. एच, बिहारी और राजेन्द्र कृष्ण जैसे गीतकारों ने। इस फ़िल्म के ज़्यादातर गानें गीता रॉय की आवाज़ में थे, लेकिन दो दुर्लभ युगलगानें भी शामिल है। दुर्लभ इसलिए कि इन गीतों में बहुत ही रेयर आवाज़ें मौजूद हैं। गीता जी ने ये दोनों गानें प्रमोदिनी देसाई और जी. एम. दुर्रनी के साथ गाया है। दुर्रनी साहब वाला गीत आज आपकी नज़र कर रहे हैं जिसके बोल हैं "हमने खाई है मोहब्बत में जवानी की क़सम, न कभी होंगे जुदा हम"।

'दिलरुबा' द्वारका खोसला की फ़िल्म थी जिसमें मुख्य कलाकार थे देव आनंद और रेहाना। आज के प्रस्तुत गीत को लिखा था एस. एच. बिहारी ने। बिहारी साहब का पदार्पण फ़िल्म जगत में १९४९ में हुई थी जब अनिल बिस्वास ने उनसे लिखवाया था फ़िल्म 'लाडली' का एक गीत "मैं एक छोटी सी चिंगारी"। मीना कपूर की आवाज़ में इस गीत को फ़िल्म के खलनायिका पर फ़िल्माया गया था। उसके बाद सन् '५० में ज्ञान दत्त ने उनसे 'दिलरुबा' में यह गीत लिखवाया था। बिहारी साहब ने इसी फ़िल्म में एक और गीत भी लिखा था जिसे शमशाद बेग़म, प्रमोदिनी, गी. एम. दुर्रनी और साथियों ने गाया था और इस गाने की अवधि थी कुल ७ मिनट और ४० सेकन्ड्स। ख़ैर, बात करते हैं आज के प्रस्तुत गीत की। पाश्चात्य संगीत संयोजन से समृद्ध इस हल्के फुल्के युगल गीत में उस ज़माने की पीढ़ी का रोमांस दर्शाया गया है। इस भाव पर असंख्य गानें समय समय पर बने हैं। कुछ बातें हमारे समाज की कभी नहीं बदलती है चाहे उसका अंदाज़ बदल जाए। प्यार में क़समें खाने की परंपरा सदियों पहले भी थी, इस फ़िल्म के समय भी थी, और आज भी है। लेकिन अंदाज़ ज़रूर बदल गया है। कहाँ है वह मासूमियत जो प्यार में हुआ करती थी उस ज़माने में! आज सब कुछ इतना खुला खुला सा हो गया है कि वह शोख़ी, वह नाज़ुकी, वह मासूमियत कहीं ग़ायब हो गई है। लेकिन हम उसी मासूमियत भरे अंदाज़ का मज़ा आज लेंगे इस गीत को सुनते हुए।

इस गीत को सुनने के बाद आपको एक काम यह करना है कि ५० और ६० के दशकों से कम से कम १० गीत ऐसे चुनने हैं जिसमें प्यार में क़सम खाने की बात कही गई है। हो सकता है कि सब से पहले जवाब देने वाले को हम कोई इनाम भी दे दें, तो ज़रूर कोशिश कीजिएगा, और फिलहाल मुझे आज्ञा दीजिए, नमस्कार!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी, स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. कल से शुरू होगी नन्हे मुन्ने बच्चों को समर्पित श्रृंखला -"बचपन के दिन भुला न देना".
२. शैलेन्द्र ने लिखा था इस गीत को.
३. एक अंतरे की पहली पंक्ति में शब्द है -"रेल".

पिछली पहेली का परिणाम -

शरद जी लगता है बाकी सब पीछे हट गए हैं, क्योंकि शेर तो एक ही सकता है जंगल में....बधाई आप ४४ अंकों पर आ चुके हैं...अरे भाई कोई तो इन्हें टक्कर दो....

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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