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गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

मैंने देखी पहली फिल्म : सुमन दीक्षित


स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल –29

जुड़वा बहनों की कहानी से माँ ने मुझे प्रेरित करने का प्रयास किया



भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘स्मृतियों के झरोखे से’ में आप सभी सिनेमा प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। गत जून मास के दूसरे गुरुवार से हमने आपके संस्मरणों पर आधारित प्रतियोगिता ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ का आयोजन किया है। इस स्तम्भ में हमने आपके प्रतियोगी संस्मरण और रेडियो प्लेबैक इण्डिया के संचालक मण्डल के सदस्यों के गैर-प्रतियोगी संस्मरण प्रस्तुत किये हैं। पिछले अंक में प्रस्तुत किये गए प्रतियोगी संस्मरण को हमने इस श्रृंखला का समापन संस्मरण घोषित किया था। परन्तु हमे विलम्ब से हमारी एक श्रोता/पाठक का एक और संस्मरण प्राप्त हो गया। आज के अंक में उसी संस्मरण को प्रस्तुत कर रहे हैं। अब हम इस प्रतियोगिता का परिणाम जनवरी के दूसरे गुरुवार को घोषित करेंगे। ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता के आज के समापन अंक में हम प्रस्तुत कर रहे है, लखनऊ निवासी, एक गृहणी श्रीमती सुमन दीक्षित का संस्मरण। सुमन जी ने बचपन में सबसे पहले फिल्म ‘दो कलियाँ’ देखी थी।


मेरा रुपहले पर्दे का साक्षात्कार पहली बार तब हुआ जब मैं 7 या 8 वर्ष की थी। फिल्म थी ‘दो कलियाँ’। मुझे वह अवसर भी अचानक मिला था, एक आकस्मिक घटना के जैसा। पाँच भाई बहनों में मैं सबसे छोटी थी। मुझसे मात्र एक वर्ष चार माह बड़ी बहन हैं। बचपन में हम दोनों के बीच गजब की प्रतिस्पर्धा हुआ करती थी। हमारे बीच खूब लड़ाई हुआ करती थी। यहाँ तक कि मुहल्ले में हमें ‘गुलाबो-सिताबो’ के खिताब से नवाजा गया था। माता-पिता और घर के और बड़े हमारी इन हरकतों पर कभी डाँटते तो कभी झुँझलाते, किन्तु हम बहनों के बीच का युद्ध बदस्तूर जारी रहता था।

उस समय हमारे ऊपर फिल्में न देखने का कठोर प्रतिबन्ध तो नहीं था, परन्तु हम घर के किसी बड़े सदस्य के साथ केवल चुनी हुई फिल्म ही देख सकते थे। हम दोनों बहनों के बीच प्रायः होने वाले वाद-विवाद से चिन्तित मेरी माँ को एक दिन हमारी एक पड़ोसन ने बताया कि दो जुड़वा बहनों के बिछड़ने और मिलने की कहानी पर बनी एक फिल्म पास के सिनेमाघर में लगी है। इस फिल्म से हमें प्रेरणा मिले और हम दोनों बहनो के बीच के झगड़े दूर हों, इस इरादे से माँ हमें फिल्म ‘दो कलियाँ’ दिखाने ले गई थीं। विश्वजीत और माला सिन्हा अभिनीत यह फिल्म माता-पिता के आपसी मतभेद की कहानी पर आधारित थी। इस अलगाव का बच्चों पर क्या असर पड़ता है, फिल्म की कहानी में इसी बात पर ज़ोर दिया गया था। आगे चलकर दोनॉ जुड़वा बहनें अपने माता-पिता को आपस में मिलाती हैं किन्तु इससे पूर्व अलग-अलग परिवेश में पल रहीं दो हमशक्ल बच्चियाँ इस बात से अनभिज्ञ थीं कि वे आपस में बहनें हैं और ठीक उसी प्रकार आपस में लड़ती रहीं, जिस तरह हम दोनों बहनें बचपन में लड़ती थीं।

फिल्म 'दो कलियाँ' को देखकर हम कुछ शिक्षा लें और आपस में लड़ना बन्द करें इस विचार से हमारी माँ और बड़ी बहन हमें फिल्म दिखाने ले गई थीं। फिल्म के कई भावुक दृश्य भी थे जिन्हें देखकर हमारे भाव तत्काल परिवर्तित भी हुए और सिनेमाघर से बाहर निकलने से पहले ही यह दृढ़ निश्चय कर लिया कि अब हम कभी नहीं लड़ेंगे। हम इतने प्यार में डूब गए कि एक दूसरे का हाथ पकड़कर बाहर निकले और घर पहुँचने तक एक दूसरे का हाथ थामे रहे। पूरा एक दिन हम बड़े प्यार से रहे, मिल-बाँट कर खाते। घर वाले बहुत खु्श हुए कि बच्चियाँ सुधर गई हैं। अब आपस में नहीं लड़ेंगी। परन्तु घरवालो की ये खु्शी ज्यादा समय तक नही रह पाई। कुछ ही समय में हम अपने असली रुप में आ गए और फिर उसी तरह लड़ने-झगड़ने लगे।

कुछ भी हो, बहाना कोई भी हो, पर पहली बार फिल्म देखने का रोमांच अलग ही था जो आज तक चेतना-पटल पर ताज़ा बना हुआ है। पिक्चर हाल में पहली बार जाने का अनुभव, गीत-संगीत सुनना, और हीरो-हीरोइन को देखना हमारे जीवन की एक बड़ी उपलब्धि से कम न थी। फिल्म का एक गाना- 'बच्चे मन के सच्चे...' हम काफी समय तक गुनगुनाते रहे। नीतू सिंह का बचपन उन बच्चियों के रुप में बहुत अच्छी तरह याद है। आज भी नीतू सिंह का नाम याद आते ही या उन्हें टेलीविज़न के परदे पर देखते ही ‘दो कलियाँ’ वाली नीतू सिंह याद आ जाती है और याद आ जाता है, हम बहनों के बचपन का युद्ध।

इतेफाक सें मैं भी दो जुड़वा बेटों का माँ बनी। अब तो दोनों वयस्क हो गए हैं, लेकिन उनके बचपन के दौर में मैं हमेशा सतर्क रहती थी कि हमारे बच्चे वह गलती न दुहराएँ, जो हमने अपने बचपन में की थी।

सुमन जी की देखी पहली और प्रेरक फिल्म ‘दो कलियाँ’ के बारे में अभी आपने उनका संस्मरण पढ़ा। अब हम आपको इस फिल्म के दो गीत सुनवाते हैं, जो सुमन जी को ही नहीं आपको भी पसन्द आएगा। 1968 में प्रदर्शित फिल्म ‘दो कलियाँ’ के संगीतकार हैं रवि और गीत लिखे साहिर लुधियानवी ने।

प्लेयर का पहला गीत - फिल्म – दो कलियाँ : ‘बच्चे मन के सच्चे...’ : लता मंगेशकर


प्लयेर का दूसरा गीत - फिल्म – दो कलियाँ : ‘चितनन्दन आगे नाचूँगी...’: आशा भोसले 



आपको सुमन जी का यह संस्मरण कैसा लगा, हमें अवश्य लिखिएगा। आप अपनी प्रतिक्रिया radioplaybackindia@live.com पर भेज सकते हैं। ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता का यह समापन संस्मरण था। इस प्रतियोगिता का परिणाम और विजेताओं के नाम 10 जनवरी, 2013 के अंक में घोषित करेंगे। नए वर्ष से हम इस स्तम्भ के स्थान पर एक नई श्रृंखला आरम्भ करेंगे। आप अपने सुझाव, संस्मरण और फरमाइश अवश्य भेजें।  

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 


गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

मैंने देखी पहली फिल्म : जब प्रिंसिपल ने हॉल पर छापा मारा


स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल – 27
  
मैंने देखी पहली फ़िल्म 



भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘स्मृतियों के झरोखे से’ में आप सभी सिनेमा प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। गत जून मास के दूसरे गुरुवार से हमने आपके संस्मरणों पर आधारित प्रतियोगिता ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ का आयोजन किया है। इस स्तम्भ में हमने आपके प्रतियोगी संस्मरण और रेडियो प्लेबैक इण्डिया के संचालक मण्डल के सदस्यों के गैर-प्रतियोगी संस्मरण प्रस्तुत किये हैं। आज के अंक में हम उत्तर प्रदेश राज्य के सेवानिवृत्त सूचना अधिकारी सतीश पाण्डेय जी का प्रतियोगी संस्मरण प्रस्तुत कर रहे हैं। सतीश जी ने अपनी पहली देखी फिल्म ‘हक़ीक़त’ की चर्चा की है। यह भारत की पहली युद्ध विषयक फिल्म मानी जाती है।  


पहली फिल्म देखने के दौरान जब प्रिंसिपल ने हॉल पर छापा मारा : सतीश पाण्डेय 

ज जब मेरे सामने यह सवाल उठा कि मेरे जीवन की पहली फिल्म कौन थी, तो इसके जवाब में मैं यही कहना चाहूँगा कि वह ऐतिहासिक फिल्म थी ‘हकीकत’। 1962 में हमारे पड़ोसी देश चीन ने जमीन हथियाने के नापाक इरादे से हमारी सीमाओं पर हमला कर दिया था। हमारी सेना को इस हमले का कोई गुमान न था। तब हमारे बहादुर जवानों ने सीमित साधन और आधी-अधूरी तैयारी के बावजूद हर मोर्चे पर जान की बाजी लगाई थी। भारतीय सेना के त्याग और बलिदान की कुछ सच्ची कथाओं पर फिल्म निर्माता और निर्देशक चेतन आनन्द ने 1964 में फिल्म ‘हकीकत’ बनाई थी। हमारे शहर लखनऊ के निशात सिनेमा हॉल में जब यह फिल्म घटी दरों पर दूसरी बार लगी थी तब मैंने इसे देखा था। उस समय हाईस्कूल पास करके क्वीन्स कालेज में इंटरमीडिएट का छात्र था। एक दिन स्कूल पहुँचने पर पता चला कि केमेस्ट्री के टीचर नहीं आए हैं। बस फिर क्या था, चार-पाँच फिल्म के शौकीन साथियों ने दोपहर के शो का प्रोग्राम बना लिया। उन साथियों ने मुझे भी इस प्रोग्राम में शामिल कर लिया। पहले तो मैंने घरवालों और कालेज के प्रिन्सिपल के डर से ना-नुकुर किया, लेकिन पहली बार फिल्म देखने के रोमांच के कारण साथियों के इस षड्यंत्र में शामिल हो गया। वैसे जेब में पड़ी अठन्नी भी कुलबुला रही थी।

डरते-डरते, अपना चेहरा छुपाते हुए हम सब किसी तरह सिनेमा हॉल पहुँचे। टिकट के लिए जब खिड़की में हाथ डाला तो टिकट के साथ बुकिंग क्लर्क ने हथेली पर एक मूहर भी लगा दी। बाद में साथियों ने बताया कि ब्लैक में टिकट बेचा न जा सके, इसलिए हथेली पर मूहर लगाया गया है। गेटकीपर इसी मूहर को देख कर ही हॉल के अन्दर जाने देता था। अन्दर जाकर देखा कि मेरे कालेज ही अन्य साथी दो-तीन समूहों में पहले से ही विराजमान थे। बहरहाल, फिल्म शुरू हुई और मैं एकाग्र होकर एक-एक फ्रेम में डूबता गया। युद्ध दृश्यों की फोटोग्राफी देखकर मैं चकित था। मेरी एकाग्रता तब टूटी जब इंटरवल से करीब दो मिनट पहले साथियों में खुसुर-पुसुर होने लगी कि कालेज के प्रिन्सिपल ने हॉल पर छापा मारा है। इंटरवल में हमारे प्रिंसिपल धड़धड़ाते हुए हॉल में घुसे और कालेज के हर विद्यार्थी के पास गए, नाम पूछा और अगले दिन अपने आफिस में मिलने का आदेश देकर चले गए। इस आकस्मिक घटना के बाद मेरे दिल की धड़कने बढ़ गई थी। इंटरवल के बाद की फिल्म का तो मजा ही किरकिरा हो गया था। उसी वक्त तय किया कि आगे कभी भी कालेज कट कर फिल्म नहीं देखना है। मन ही मन की गई प्रतिज्ञा को मैंने अपनी विश्वविद्यालय तक की पढ़ाई तक निभाया।

उन दिनों मध्यवर्गीय परिवार के बच्चों का फिल्म देखना अच्छा नहीं माना जाता था, और अकेले फिल्में देखना तो मानो अपराध ही था। बाद में मैं दोस्तों के साथ ही फिल्म देखने जाता था, मगर माँ को बता कर (पिता जी को नहीं) जाया करता था। जब कभी अपनी पहली देखी फिल्म की याद करता हूँ, तब से लेकर आज तक फिल्मों में काफी बदलाव आया है। तकनीक के स्तर पर फिल्मों में खूब विकास हुआ है, लेकिन आज की फिल्में रस और भाव से दूर हैं। यही स्थिति गानों की है। आज देखी फिल्म के गाने अगले दिन भुला दिये जाते हैं। हॉल में जाकर फिल्में देखने की इच्छा ही नहीं होती। वैसे भी लखनऊ के मेरे प्रिय सिनेमा हॉल, जैसे- मेफेयर, बसंत, प्रिंस, निशात, जयहिंद, तुलसी आदि सब बंद हो चुके हैं। अब तो बस अपनी देखी पहली फिल्म ‘हकीकत’ से लेकर ज्यादा से ज्यादा 1980 तक की फिल्मों के गानों को गुनगुना कर जुगाली कर लेता हूँ।

सतीश जी की देखी पहली और यादगार फिल्म ‘हक़ीक़त’ के बारे में अभी आपने उनका संस्मरण पढ़ा। अब हम आपको इस फिल्म के दो गीत सुनवाते हैं, जो सतीश जी को ही नहीं हम सबको बेहद प्रिय है। 1964 में प्रदर्शित फिल्म ‘हक़ीक़त’ के संगीतकार थे मदनमोहन और गीत लिखे थे कैफी आज़मी ने। दूसरा गीत- ‘अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों...’ आज भी प्रत्येक राष्ट्रीय पर्व पर हम अवश्य सुनते हैं।

फिल्म – हक़ीक़त : ‘हो के मजबूर मुझे...’ : मोहम्मद रफी, तलत महमूद, भूपेन्द्र सिंह और मन्ना डे


फिल्म – हक़ीक़त : ‘अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों...’: मोहम्मद रफी




आपको सतीश जी का यह संस्मरण कैसा लगा, हमें अवश्य लिखिएगा। आप अपनी प्रतिक्रिया radioplaybackindia@live.com पर भेज सकते हैं। ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता का यह समापन संस्मरण था। इस प्रतियोगिता का परिणाम और विजेताओं के नाम इस मास के अन्तिम गुरुवार अर्थात 27 दिसम्बर को घोषित करेंगे। नए वर्ष से हम इसके स्थान पर एक नई श्रृंखला आरम्भ करेंगे। आप अपने सुझाव और फरमाइश अवश्य भेजें।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

गुरुवार, 29 नवंबर 2012

कवयित्री सीमा गुप्ता ने देखी फिल्म 'साहब बीवी और गुलाम'


स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल -25

मैंने देखी पहली फिल्म 


भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘स्मृतियों के झरोखे से’ में आप सभी सिनेमा प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। गत जून मास के दूसरे गुरुवार से हमने आपके संस्मरणों पर आधारित प्रतियोगिता ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ का आयोजन किया है। इस स्तम्भ में हमने आपके प्रतियोगी संस्मरण और रेडियो प्लेबैक इण्डिया के संचालक मण्डल के सदस्यों के गैर-प्रतियोगी संस्मरण प्रस्तुत किये हैं। आज के अंक में हम कवयित्री सीमा गुप्ता का प्रतियोगी संस्मरण प्रस्तुत कर रहे हैं। सीमा जी ने अपने बचपन में देखी, भारतीय सिनेमा के इतिहास में स्वर्णाक्षरों से अंकित फिल्म ‘साहब बीवी और गुलाम’ की चर्चा की है।



फिल्म देख कर औरत का दर्द महसूस हुआ जिसे मीनाकुमारी जी ने परदे पर साकार किया

‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता के कारण आज बरसों के बाद बचपन के झरोखों में फिर से जाकर पुरानी धुँधली हो चुकी तस्वीरों से रूबरू होने का मौका मिला है। बचपन कब बीत गया, कब सब पीछे रह गया, पता ही नहीं चला। याद करती हूँ तो, ऐसा लगता है मानो कल की ही बात है। पिताजी की सरकारी नौकरी थी "ग्रेफ" में। सबसे पहले याद है कि हम भूटान में थे, उसके बाद उनका तबादला सिक्किम में हुआ था। मेरी उम्र कोई 6 साल की रही होगी, उस जमाने में आज की तरह सिनेमा हॉल नहीं हुआ करते थे। महीने-छः महीने में एक बार कहीं किसी हॉल में बड़ा सा सफेद पर्दा लगा कर कोई फिल्म प्रोजेक्टर से दिखायी जाती थी। फिल्म देखने जाना एक त्यौहार से कम नहीं होता था। फिल्म देखने जाना बड़ा ही रोमांचकारी होता था। दिल में बड़ी हलचल हुआ करती थी, सफेद परदे पर, इंसानों को बोलते, चलते और गाना गाते देख कर।

पहाड़ों में जहाँ हम रहा करते थे, वहाँ से कोई 20 किलोमीटर की दूरी पर हम फिल्म देखने जाया करते थे, और रिवाज़ ये था की जितने भी ‘ग्रेफ’ के परिवार रहते थे, सब मिल कर दो-तीन गाड़ियों में एक साथ जाया करते थे। याद करती हूँ तो, एक सोमवार को जब घर में पता चला की इस शुक्रवार को फिल्म जैसी कोई चीज़ देखने जाना है तो मन एक अद्भुत रोमांच से भर गया था। कोतुहलवश मम्मी से पुछा कि फिल्म में क्या होता है, मम्मी ने कहा जैसे सर्कस में लोग हमारे सामने खेल दिखाते हैं, वैसे ही खेल परदे पर दिखाया जाता है। फिर सवाल उठा कि परदे पर लोग कैसे खेल दिखाएँगे, वो तो गिर जाएँगे, तरह-तरह के सवालों से मन भरा हुआ था। बहरहाल, जो भी मम्मी ने कहा, यकीन कर लिया। सारे दोस्तों को शोर मचा कर बताया की हम तो परदे पर सर्कस जैसा खेल देखने जाएँगे। आज उस मासूमियत पर हैरत भी है और हँसी भी आ रही है।

शुक्रवार भी आ गया, 4 बजे ही अपने मनपसन्द कपडे पहने, सब दोस्त और मम्मी-पापा तैयार होकर जोंगा जीप में सवार हुए और रवाना हो गए। थोड़ी-थोड़ी देर में, अभी कितनी दूर है… कितनी दूर है… जैसे सवालों से हम बच्चे सबको परेशान करते रहे। एक स्थान पर कुछ ग्राउंड जैसा था, जहाँ हमारो जीप रुकी, देखा, कुछ गुब्बारे वाले, कुछ खाने-पीने के स्टाल, और एक बड़ा सा हॉल जहाँ आगे कुर्सियाँ और पीछे लकड़ी के बेंच रखे थे। सोचा, ये कैसा सर्कस है? खैर, सब लोग कुर्सियों पर बैठ गये। सामने एक दीवार पर बड़ा सा सफेद पर्दा था। हॉल जल्दी ही भर गया था। एकदम से घुप अँधेरा हो गया। सफेद परदे पर एक गोलाकार सी पीली रौशनी नृत्य करने लगी। धीरे-धीरे साँस थामे इन्तज़ार के लम्हे गुजरने लगे। तभी अचानक कुछ काली-सफ़ेद तस्वीर और कुछ शब्द परदे पर नज़र आने लगे। पीछे एक आवाज़ आने लगी। सोचा ये कैसा सर्कस है, यहाँ तो जानवर भी नहीं हैं, रंगीन कपड़ो में नाचने वाले लोग भी नहीं हैं। मम्मी की तरफ देखा तो उन्होंने चुपचाप बैठने का इशारा किया। धीरे-धीरे काले-सफेद लोग और उनकी आवाजे परदे पर दौड़ने लगीं। 


फिल्म का नाम था "साहब बीवी और गुलाम"। उस वक़्त तो फिल्म कुछ ज्यादा समझ में नहीं आई। यूँ लगा जैसे सब कुछ सर के ऊपर से गुज़र गया हो। याद रही तो कुछ तस्वीरे और एक-आध गीत के बोल। एक गीत काफी दिनों तक याद रहा- "मेरी बात रही मेरे मन में, कुछ कह न सकी उलझन में…"। फिल्म देखते वक़्त मासूम मन पर काफी कुछ गुज़रा, ये सवाल कि हिरोइन ने नशा क्यों किया, वो कैसे मर गयी, हीरो तो बहुत गन्दा है, ऐसे होती है परदे वाली सर्कस, और न जाने क्या-क्या। याद है जब हिरोइन की लाश का कुछ हिस्सा और उससे झाँकता एक कंगन जमीन में गडा हुआ दिखाया जाता है। दिल जोर से काँप उठा था, और मम्मी का हाथ जोरों से पकड़ा था। उस वक़्त फिल्म कुछ अजीब सा विषय बन गयी थी। फिल्म खत्म हुई। जब हॉल से बाहर निकले तो हमे प्रोजेक्टर दिखाया गया, हमने फिल्म की कुछ रील के छोटे-छोटे टुकड़े भी समेट लिये थे। 

फिल्म बेहद ही सीरियस किस्म की थी इसलिए मन अनेक सवालों से भर गया था। ये फिल्म बरसों तक याद भी रही तो सिर्फ दो कारणों से, एक तो वो सीन जिसमे मीनाकुमारी की लाश से कंगन दीखते हैं और दूसरा, जिसमे वो नशे की हालत में गाना गाती हैं। उसके बाद हर किस्म की फिल्में देखी, तब फिल्मों के प्रति रूचि बनी। बारहवीं पास करने के बाद फिर मम्मी से आग्रह करके "साहब बीवी और गुलाम" को दोबारा देखा और तब जाकर इस फिल्म की कहानी समझ में आई और औरत का वो दर्द भी, जिसको मीनाकुमारी जी ने परदे पर साकार किया था। आज मेरी सबसे पहली देखी फिल्म और सबसे प्रिय फिल्म यही है।

सीमा जी की देखी पहली और सबसे प्रिय फिल्म ‘साहब बीवी और गुलाम’ के बारे में अभी आपने उनका संस्मरण पढ़ा। अब हम आपको इस फिल्म का वह गीत सुनवाते हैं, जो सीमा जी को सर्वाधिक प्रिय है। 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘साहब बीवी और गुलाम’ का यह गीत आशा भोसले ने गाया है और इसके संगीत निर्देशक हेमन्त कुमार हैं।

फिल्म ‘साहब बीवी और गुलाम’ : ‘मेरी बात रही मेरे मन में...’ : आशा भोसले



आपको सीमा जी की देखी पहली फिल्म 'साहब बीवी और गुलाम' का यह संस्मरण कैसा लगा, हमें अवश्य लिखिएगा। आप अपनी प्रतिक्रिया radioplaybackindia@live.com पर भेज सकते हैं। प्रत्येक गुरुवार को हम आपके लिए इस नियमित स्तम्भ में भारतीय सिनेमा के कुछ ऐतिहासिक प्रसंग लेकर आते हैं। आप अपने सुझाव, संस्मरण और फरमाइश अवश्य भेजें।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र


गुरुवार, 22 नवंबर 2012

स्मृतियों के झरोखे से : अमित तिवारी की देखी पहली फिल्म 'बालिका वधु'


मैंने देखी पहली फ़िल्म : अमित तिवारी


भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान में प्रत्येक गुरुवार को हम आपके लिए सिनेमा के इतिहास पर विविध सामग्री प्रस्तुत कर रहे हैं। माह के दूसरे और चौथे गुरुवार को आपके संस्मरणों पर आधारित ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ स्तम्भ का प्रकाशन करते हैं। आज माह का चौथा गुरुवार है, इसलिए आज बारी है आपकी देखी पहली फिल्म के रोचक संस्मरण की। आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं, एक गैर-प्रतियोगी संस्मरण। आज का यह संस्मरण प्रस्तुत कर रहे हैं, रेडियो प्लेबैक इण्डिया के संचालक-मण्डल के सदस्य अमित तिवारी। 


सचमुच बहुत अच्छा लगता है, 'बालिका वधू' का गीत ‘बड़े अच्छे लगते हैं...’


मुझसे जब पुछा गया कि मेरी देखी पहली फिल्म कौन सी है तो मुझे दिमाग पर ज्यादा जोर डालने की जरूरत नहीं पड़ी। मेरी याद में जो मेरी देखी पहली फिल्म है , वो थी शशि कपूर, प्राण और सुलक्षणा पण्डित के अभिनय से सजी 1978 में प्रदर्शित हुई फिल्म 'फाँसी'। उस समय मैं करीब पाँच साल का था। मुझे इस फिल्म का केवल एक दृश्य याद है, जिसमे ट्रेन धड़धड़ाती दौड़ी जा रही है। परदे पर ट्रेन तिरछी दिखाई जाती है और डाकू उसमे चढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। शायद डाकुओं के जीवन पर आधारित फिल्म थी जिसमें मार-पीट, ढिशुम-ढिशुम की भरमार थी।

बस इस फिल्म का यही एक दृश्य याद है। बाकी कहानी क्या थी, पता नहीं। करीब बीस वर्षों के बाद इस फिल्म को दूरदर्शन पर देखने का मौका मिला, पर आज भी मानस -पटल पर यही एक दृश्य अंकित है और बाकी कहानी भूल चूका हूँ। अब चूँकि आज इसके बारे में लिख रहा हूँ तो कोशिश करूँगा कि इसे दुबारा देख सकूँ। बचपन में फ़िल्में देखना एक सपना हुआ करता था। फ़िल्में देखना अच्छा नहीं माना जाता था और मैं भी और बच्चों की तरह सोचा करता था कि जब बड़ा हो जाऊँगा तो रोजाना ढेर सारी फिल्में देखा करूँगा। और हाँ, मेरी वह सोच सच साबित भी हुई। वैसे भी मैं एक छोटे से कस्बे का रहने वाला था, जहाँ सिनेमा हॉल नहीं था। जब कभी हम ननिहाल छुट्टियों में जाते थे तो सिनेमा हॉल के दर्शन हो जाया करते थे। टेलीविजन भी उस समय शुरु नहीं हुआ था।

1983 में दो और फिल्मे देखने का मौका मिला, और वो थीं- अमोल पालेकर और टीना मुनीम अभिनीत 'बातों बातों में' और अभिताभ के अभिनय से सजी 'अन्धा क़ानून'। नियमित रूप से फिल्मे देखने का मौका मिला 1985 में, जब दूरदर्शन पर रविवार की शाम फिल्म 'बालिका वधू' देखी। एक बेहतरीन फिल्म थी, जिसे अब तक 3-4 बार मैं देख चुका हूँ। तब से अब तक तो अनगिनत फिल्मे देख चुका हूँ, लेकिन मेरी पहली फिल्म तो 'फाँसी' ही रहेगी।

अमित जी को फाँसी फिल्म का कोई भी गाना याद नहीं रहा परन्तु हम आपके साथ अमित जी को भी फिल्म 'फाँसी' का एक लोकप्रिय गीत सुनवाते हैं। इसके साथ ही अमित जी का एक और प्रिय गीत, जो फिल्म 'बालिका बधू' से है, उसे भी हम प्रस्तुत कर रहे हैं।

फिल्म फाँसी : ‘जब आती होगी याद मेरी...’ : मोहम्मद रफी और सुलक्षणा पण्डित


फिल्म बालिका बधू : ‘बड़े अच्छे लगते हैं...’ : अमित कुमार



आपको अमित जी की देखी पहली फिल्म का संस्मरण कैसा लगा? हमें अवश्य लिखिएगा। आप अपनी प्रतिक्रिया radioplaybackindia@live.com पर भेज सकते हैं। रेडियो प्लेबैक इण्डिया के सभी पाठकों-श्रोताओं को हम यह शुभ समाचार देना चाहते हैं कि 1 दिसम्बर को रेडियो प्लेबैक इण्डिया का स्थापना दिवस है। आपके सुझावों के अनुसार दिसम्बर से हम ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ स्तम्भ के स्वरूप में परिवर्तन कर रहे है। दिसम्बर से प्रत्येक दूसरे और चौथे गुरुवार को हम ‘मन्थन’ शीर्षक से एक नया स्तम्भ आरम्भ करेंगे। ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ स्तम्भ को हम आज के इस अंक से विराम दे रहे हैं। अगले गुरुवार को हम ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता का परिणाम घोषित करेंगे। ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता के विजेताओं का नाम जानने के लिए अगले गुरुवार को इस मंच पर आप सादर आमंत्रित हैं।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

गुरुवार, 8 नवंबर 2012

स्मृतियों के झरोखे से : मिकी गोथवाल की पहली देखी फिल्म ‘गजब’ का संस्मरण


मैंने देखी पहली फिल्म 

भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘स्मृतियों के झरोखे से’ में आप सभी सिनेमा प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। आज माह का दूसरा गुरुवार है और आज बारी है- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ की। इस द्विसाप्ताहिक स्तम्भ के पिछले अंक में आपने श्रीमती अंजू पंकज के संस्मरण के साझीदार रहे। आज के अंक में हम प्रस्तुत कर रहे हैं, पेशे से एक मॉडल तथा फिल्म लेखक और निर्देशक बनने के लिए संघर्षरत मिकी गोथवाल की पहली देखी फिल्म ‘गजब’ का संस्मरण। यह प्रतियोगी वर्ग की प्रविष्टि है।


धर्मेन्द्र जी का शारीरिक गठन देख कर मैंने कसरत करनी शुरू की : मिकी गोथवाल

मेरा नाम मिकी गोथवाल है। मैं मूलत: हरियाणा का रहने वाला हूँ। पेशे से एक मॉडल हूँ और इन दिनों मुम्बई फिल्म-जगत में कुछ अलग हटकर कर गुजरने के लिए प्रयासरत हूँ। यूँ तो आमतौर पर हर मॉडल अभिनेता बनना चाहता है, पर मेरा शौक है फ़िल्में लिखना और फ़िल्में निर्देशित करना। मैंने दो फ़िल्में लिखी भी है, और उन्हें निर्देशित भी करना चाहता हूँ। बस अपने इस सपने को हक़ीक़त में बदलने के लिए संघर्षरत हूँ। मैं हरियाणा के जिस जगह से ताल्लुक रखता हूँ उस जगह का नाम है मोहिन्दरगढ़। मेरे पिताजी एक किसान हैं। वहाँ पर रहते मुझे अंग्रेज़ी बोलना नहीं आता था। मैंने वहीं से बी.ए. पास किया है। दो साल पहले मुम्बई आकर सिनेमा विषय में ही एम.एससी. किया और अंग्रेज़ी भी सीखा। अब मुझे अपने आप पर भरोसा हो गया है कि मैं भी अपनी जिन्दगी में एक ऊँचे मुकाम तक पहुँच सकता हूँ।

मेरी देखी पहली फ़िल्म? वही धर्मेन्द्र वाली ‘गज़ब’ थी, जिसमें वो मर कर आत्मा बन जाते हैं। यह उस समय की बात है जब मैं केवल 14 साल का था। हम दोस्त लोग मिलकर पैसा इकट्ठा करके वी.सी.आर. भाड़े पर ले आए और एक एकान्त जगह पर वह फ़िल्म देखी थी हम दोस्तों ने। बहुत मज़ा आया था। अब मैं 25 साल का हूँ, यानी कि मैंने वह फ़िल्म 1993-94 में देखी थी। आप यह सोच रहे होंगे कि 'ग़ज़ब' फ़िल्म तो 80 के दशक की फ़िल्म थी, तो इतने सालों बाद आख़िर यह फ़िल्म ही क्यों और कैसे देखी? दरअसल ग्रामीण इलाके में रहने की वजह से नई फ़िल्में देर से ही आती थीं। पुरानी फ़िल्मों के विडियो कैसेट्स ज़रूर मिल जाया करते। यही कारण था 'ग़ज़ब' फ़िल्म के देखने का। मस्त एक्स्पीरीयन्स था, लगता था कि मैं भी शायद एक दिन ऐसा ही करूँगा। हीरो हमारे लिए भगवान के समान होते थे उस समय। इस फ़िल्म में नायक थे धर्मेन्द्र, और आगे चलकर धर्मेन्द्र ही मेरे फ़ेवरीट नायक बने। वो मेरे प्रेरणास्रोत रहे हैं। वो ही बॉलीवूड के पहले माचो हीरो सिद्ध हुए। उन्हीं के शारीरिक गठन को देख कर मैंने कसरत करनी शुरू की जिसका नतीजा यह हुआ कि मैं एक सफल मॉडल बन गया। धर्मेन्द्र अभिनीत फ़िल्म 'शोले' (गजब के बाद) मेरी सबसे पसंदीदा फ़िल्म रही है।

फिर 90 के दशक के आख़िर में हमारे घर टी.वी. लगा। जब भी दूरदर्शन पर कोई फ़िल्म आती थी, हम वही देखते थे, अगर लाइट होती थी तो, वरना पूरी रात लाइट का इन्तज़ार ही करते रहते। कई बार तो ऐसा भी होता था कि सिगनल वीक होने की वजह से, जब मेरी माँ सीरीयल या और कुछ देखती थीं तो मैं ऐन्टिना पकड़ कर छत पर बैठा रहता। ये सब बातें आज एक याद बन कर रह गई है। मुम्बई की चमक-दमक वाली ज़िन्दगी, मॉडलिंग का ग्लैमरस संसार, यह सब बाहर से बहुत अच्छा लगता है, पर सच पूछिये तो वह ज़माना ही बेहतर था जब दोस्त लोग मिल कर वी.सी.आर. भाड़े पर लाकर फ़िल्में देखते थे या दूरदर्शन पर शनिवार शाम को आने वाली फ़िल्म का बेसब्री से इन्तज़ार करते थे। आज यही गुनगुनाने का मन करता है- ‘कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन...’।

अपनी पहली देखी फ़िल्म 'ग़ज़ब' से अमित कुमार का गाया "जान-ए-मन जान-ए-जिगर जान-ए-तमन्ना जान ले..." गीत सुनना चाहूँगा।


लीजिए मिकी जी, आप अपनी पसन्द का, फिल्म ‘गजब’ का यह गीत अमित कुमार के स्वर में सुनिए। 1982 में प्रदर्शित इस फिल्म के संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल थे और यह गीत आपके हीरो और प्रेरणास्रोत अभिनेता धर्मेन्द्र पर ही फिल्माया गया था। 

फिल्म गजब : "जान-ए-मन जान-ए-जिगर जान-ए-तमन्ना जान ले..." : अमित कुमार
 

आपको मिकी गोथवाल जी का यह संस्मरण कैसा लगा, हमें अवश्य लिखिएगा। आप अपनी प्रतिक्रिया radioplaybackindia@live.com पर भेज सकते हैं। आप भी हमारे इस आयोजन- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ में भाग ले सकते हैं। आपका संस्मरण हम रेडियो प्लेबैक इण्डिया के इस स्तम्भ में प्रकाशित तो करेंगे ही, यदि हमारे निर्णायकों को पसन्द आया तो हम आपको पुरस्कृत भी करेंगे। आज ही अपना आलेख और एक चित्र हमे radioplaybackindia@live.com पर मेल करें। जिन्होने आलेख पहले भेजा है, उन प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपना एक चित्र भी भेज दें। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र


“मैंने देखी पहली फिल्म” : आपके लिए एक रोचक प्रतियोगिता
दोस्तों, भारतीय सिनेमा अपने उदगम के 100 वर्ष पूरा करने जा रहा है। फ़िल्में हमारे जीवन में बेहद खास महत्त्व रखती हैं, शायद ही हम में से कोई अपनी पहली देखी हुई फिल्म को भूल सकता है। वो पहली बार थियेटर जाना, वो संगी-साथी, वो सुरीले लम्हें। आपकी इन्हीं सब यादों को हम समेटेगें एक प्रतियोगिता के माध्यम से। 100 से 500 शब्दों में लिख भेजिए अपनी पहली देखी फिल्म का अनुभव radioplaybackindia@live.com पर। मेल के शीर्षक में लिखियेगा ‘मैंने देखी पहली फिल्म’। सर्वश्रेष्ठ तीन आलेखों को 500 रूपए मूल्य की पुस्तकें पुरस्कारस्वरुप प्रदान की जायेगीं। तो देर किस बात की, यादों की खिड़कियों को खोलिए, कीबोर्ड पर उँगलियाँ जमाइए और लिख डालिए अपनी देखी हुई पहली फिल्म का दिलचस्प अनुभव। प्रतियोगिता में आलेख भेजने की अन्तिम तिथि 30 नवम्बर, 2012 है।








गुरुवार, 25 अक्तूबर 2012

भारतीय सिनेमा के सौ साल - अंजू पंकज की दिव्य प्रेरणा "जय संतोषी माँ"


मैंने देखी पहली फिल्म

भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘स्मृतियों के झरोखे से’ में आप सभी सिनेमा प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। आज माह का चौथा गुरुवार है और आज बारी है- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ की। इस द्विसाप्ताहिक स्तम्भ के पिछले अंक में आपने कवि और पत्रकार निखिल आनन्द गिरि के संस्मरण के साझीदार रहे। आज के अंक में हम प्रस्तुत कर रहे हैं, रेडियो प्लेबैक इण्डिया के नियमित पाठक और शुभचिन्तक पंकज मुकेश की पत्नी अंजू पंकज की पहली देखी फिल्म ‘जय सन्तोषी माँ’ का संस्मरण। यह प्रतियोगी वर्ग की प्रविष्टि है।


फिल्म देख कर सन्तोषी माँ का व्रत करने की इच्छा हुई : अंजू पंकज

मैंने अपने जीवन में सबसे पहली फिल्म देखी -"जय सन्तोषी माँ"। इस फिल्म के बारे में हर एक बात मैं आज तक भूल नहीं पायी। सच में पहली फिल्म कुछ ज्यादा ही यादगार होती है। बात उस समय की हैं जब मैं पाँचवीं कक्षा में पढ़ती थी, महज दस साल कि उम्र थी। दुनियादारी से कहीं दूर एक बच्ची के मन में जो कुछ आता था, उनमें कहीं न कहीं चम्पक, नन्हें सम्राट, चाचा चौधरी, नागराज, सुपर कमांडो ध्रुव, इत्यादि बच्चों की किताबों का असर जरूर होता था। यह फिल्म मैंने अपने पापा-मम्मी और नानी के साथ आगरा के "अंजना टाकीज" में 3 से 6 बजे वाला दूसरा शो देखा था। फिल्म को देखने के बाद मेरे बाल-मन पर जो पहला असर हुआ वो यही था कि सच्चाई की हमेशा जीत होती है, हमें एक अच्छा इन्सान बनाना चाहिए, दैवी शक्तियाँ (सन्तोषी माँ) सबके भले-बुरे कर्म देखती हैं और अन्त में उनके कर्म के अनुसार अच्छा और बुरा फल मिलता है। कितने दुःख की बात है कि एक ही परिवार में जेठानियाँ अपनी ही देवरानी से साथ दण्डनीय बर्ताव करती हैं, तरह-तरह की यातनाएँ उसे सहनी पड़ती है। उसका पति जब काम की तलाश में शहर चला जाता है तो घर के लोग देवरानी को सबका बचा खाना (जूठन) देती हैं खाने को। यह सब फिल्म में देख कर मेरा दिल भर आया था। मन करता था कि अगर मैं घर में होती तो सबको कड़ी से कड़ी सजा देती। तभी कुछ देर में माँ सन्तोषी आती हैं और सारी परेशानी दूर कर देती हैं। मगर उन जेठानियों की हर बार कुछ नई हरकतें सामने आती, और सन्तोषी माँ बार-बार उसकी मदद करतीं। सबसे पहली बार जब ये सब दृश्य देखा था तो बस मेरी स्थिति बिलकुल रोने जैसी हो गई थी। मुझे पता नहीं था की कोई दैवी शक्ति भी बचाने आएगा/आएँगी। मगर जब एक बार सन्तोषी माँ को प्रकट होते और सारी परेशानी दूर करते देखा तो हर अगले दृश्य में मैं मन ही मन आवाज़ लगाती कि ‘सन्तोषी माँ, जल्दी आओ, कहाँ हो, देर मत करो’। फिल्म समाप्त होने पर जब सिनेमाघर की सारी लाइट जली तो मैं जल्दी से नानी से जा लिपटी। लौटते वक़्त रास्ते में मन में तरह-तरह के विचार आ रहे थे कि लोग ऐसा क्यों करते हैं, ऐसा नहीं करना चाहिए, ये अच्छी बात नहीं। बहुत रोका खुद को मगर मैंने पापा से पूछ ही लिया की पापा उन लोगों (जेठानियों) ने ऐसा क्यों किया? ये सब गलत बात है, वो लोग इतनी बड़ी होकर छोटी (देवरानी) को परेशान करते थे, ऐसा नहीं किया होता तो वो भी खुश रहते। पापा ने कहा ये सब कहानी होती है, जैसा तुम किताबों में पढ़ती हो, इस बार तुमने चलती-फिरती तसवीरों के रूप में देखा है, बस इतना ही अन्तर है। पापा के जवाब ने थोड़ी देर के लिए मुझे शान्त तो किया, मगर मन को पूरी तरह सन्तुष्टि नहीं मिली। फिर मेरे मन में ख़याल आता कि पापा ने मुझे छोटी बच्ची समझ कर बहला दिया है। सच वही है जो मैं सोच रही हूँ।

इस फिल्म के सभी गाने मुझे अच्छे लगे। परन्तु- "यहाँ वहाँ जहाँ तहाँ मत पूछो कहाँ कहाँ..." और "मैं तो आरती उतारूँ रे सन्तोषी माता की, जय जय सन्तोषी माता जय जय माँ..." मुझे आज भी बेहद पसन्द है। इस फिल्म को देखने और इसके गाने सुनने के बाद मेरी आस्था और श्रद्धा सन्तोषी माँ के बढ़ गई थी। मेरा भी मन करता था की मैं भी शुक्रवार का व्रत रखूँ। आज जब इस फिल्म के बारे मैं पढ़ती हूँ अखबारों में, इन्टरनेट पर तो मन ही मन अपने बचपन को याद करती हूँ। आज भले ही मैं इसे अपना बचपना समझ कर टाल जाऊँ, परन्तु सच तो यही है कि उन दिनों न जाने कितनी महिलाओं ने इस फिल्म को देखने के बाद सोलह शुक्रवार का व्रत रखना शुरू कर दिया था।

1975 में प्रदर्शित फिल्म ‘जय सन्तोषी माँ’ बॉक्स आफिस पर अत्यन्त सफल धार्मिक फिल्म थी। इस फिल्म का दो गीत, जो अंजू जी को सर्वाधिक पसन्द है, उन्हें हम आपको भी सुनवाते है। इन गीतों के संगीतकार सी. अर्जुन और गीतकार प्रदीप हैं।

फिल्म – जय सन्तोषी माँ : ‘मैं तो आरती उतारूँ रे...’ : ऊषा मंगेशकर और साथी


फिल्म – जय सन्तोषी माँ : ‘यहाँ वहाँ जहाँ तहाँ मत पूछो कहाँ कहाँ...’ : महेन्द्र कपूर और प्रदीप



आपको अंजू जी का यह संस्मरण कैसा लगा, हमें अवश्य लिखिएगा। आप अपनी प्रतिक्रिया और अपने सुझाव हमें  radioplaybackindia@live.com पर भेज सकते हैं। आप भी हमारे इस आयोजन- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ में भाग ले सकते हैं। आपका संस्मरण हम रेडियो प्लेबैक इण्डिया के इस अनुष्ठान में सम्मिलित तो करेंगे ही, यदि हमारे निर्णायकों को पसन्द आया तो हम आपको पुरस्कृत भी करेंगे। आज ही अपना आलेख और एक चित्र हमे radioplaybackindia@live.com पर मेल करें। जिन्होने आलेख पहले भेजा है, उन प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपना एक चित्र भी भेज दें।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र



'मैंने देखी पहली फिल्म' : आपके लिए एक रोचक प्रतियोगिता
दोस्तों, भारतीय सिनेमा अपने उदगम के 100 वर्ष पूरा करने जा रहा है। फ़िल्में हमारे जीवन में बेहद खास महत्त्व रखती हैं, शायद ही हम में से कोई अपनी पहली देखी हुई फिल्म को भूल सकता है। वो पहली बार थियेटर जाना, वो संगी-साथी, वो सुरीले लम्हें। आपकी इन्हीं सब यादों को हम समेटेगें एक प्रतियोगिता के माध्यम से। 100 से 500 शब्दों में लिख भेजिए अपनी पहली देखी फिल्म का अनुभव radioplaybackindia@live.com पर। मेल के शीर्षक में लिखियेगा ‘मैंने देखी पहली फिल्म’। सर्वश्रेष्ठ तीन आलेखों को 500 रूपए मूल्य की पुस्तकें पुरस्कारस्वरुप प्रदान की जायेगीं। तो देर किस बात की, यादों की खिड़कियों को खोलिए, कीबोर्ड पर उँगलियाँ जमाइए और लिख डालिए अपनी देखी हुई पहली फिल्म का दिलचस्प अनुभव। प्रतियोगिता में आलेख भेजने की अन्तिम तिथि 31अक्टूबर, 2012 है।

गुरुवार, 11 अक्तूबर 2012

मैंने देखी पहली फिल्म : पत्रकार कवि निखिल आनंद गिरी


मैंने देखी पहली फिल्म

भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘स्मृतियों के झरोखे से’ में आप सभी सिनेमा प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। आज माह का दूसरा गुरुवार है और आज बारी है- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ की। इस द्विसाप्ताहिक स्तम्भ के पिछले अंक में आपने हमारे संचालक मण्डल के सदस्य अनुराग शर्मा की देखी पहली दो फिल्मों ‘गीत’ और ‘पुष्पांजलि’ के गैरप्रतियोगी संस्मरण के साझीदार रहे। आज निखिल आनन्द गिरि अपनी देखी कुछ ऐसी फिल्मों का जिक्र कर रहे हैं जिन्होने उनके मन पर गहरा प्रभाव छोड़ा। यह प्रतियोगी वर्ग की प्रविष्टि है।



मेरा बचपन बिहार (और झारखण्ड) के अलग-अलग कस्बों में बीता। पिताजी पुलिस अधिकारी रहे हैं तो अलग-अलग थानों में तबादले होते रहे और हम उनके साथ घूमते रहे। इन्हीं में से किसी इलाके में पहली फिल्म देखी होगी, मगर मुझे ठीक से याद नहीं। हाँ, फिल्म देखने जाने के कई खट्टे-मीठे अनुभव याद हैं, जिन्हें बताना पहला अनुभव जानने से कम ज़रूरी नहीं। क्योंकि सिनेमा के सौ साल का सफर उन्हीं सिनेमाघरों में हम और आप जैसे तमाम दर्शकों के होते हुए गुज़रा है।  

मैं शायद छह या सात साल का रहा होऊंगा जब पिताजी के किसी 'इलाके' में 'सूरज' फिल्म लगी थी। हमारे परिवार के लिए फिल्म देखने का मतलब ये होता था कि टिकट पिताजी से लें। मतलब, एक सादी पर्ची (पान के साथ चूना दिये जाने जैसी) पर पिता जी कुछ लिख भर देते थे और हम आराम से हॉल में जाते और हॉल का मैनेजर पर्ची देखते ही पूरे 'सम्मान' से सीट देकर हमें फिल्म देखने देता। मैं तब न तो फिल्म समझता था, न फिल्म देखने के लिए फिल्म देखने जाता था। घर में सबसे छोटा था, तो जो सब करते वही करना ही होता था। ऐसे ही पर्चियों वाली हमने कई फिल्में देखीं। गाइड, मर्दों वाली बात, गंगा-जमुना, गंगा किनारे मोरा गाँव और फिर बाद में मोहरा तक। ये सब वैसे ही पर्ची लिखा-लिखा कर सीधा हॉल में प्रवेश करने वाली फिल्में थीं। हमारी तरफ भोजपुरी फिल्में ख़ूब लगती थीं, और उन फिल्मों के बारे में जानने के लिए हमें किसी ब्लॉग, रिसर्च पेपर या समीक्षा नहीं देखनी पड़ती थी। गाँव भर की बुआ, चाची, दीदी को हर फिल्म में नाम के साथ सब कुछ याद रहता था। भोजपुरी स्टार कुणाल सिंह हमारे बचपन के महानायक थे। वो जितेंद्र से मिलते-जुलते लगते थे तो मुझे जितेंद्र की फिल्में भी अच्छी लगती थीं। लखीसराय का अनुभव सबसे यादगार था, जहाँ एक बार पिक्चर शुरू हो गई और हम बाहर से एक बेंच लाए और फिर पिक्चर देखने बैठे।

तब हमारे घर टीवी नहीं हुआ करता था। रविवार को चार बजे शाम में फिल्म आती थी और हम देखने के लिए पड़ोस में जाते थे। ऐसे देखी गई पहली फिल्मों में से थी 'एक चादर मैली सी', 'एक दिन अचानक' और 'पार्टी'। आप समझ सकते हैं कि 'गंगा किनारे मोरा गाँव' तक से 'पार्टी' तक एक ही बचपन में देखने से सिनेमा कितनी गहराई से भीतर घुस रहा था।

जब राँची में स्कूल के दोस्तों के साथ पहली बार टिकट के पैसे चुकाकर फिल्म देखनी पड़ी तो लगा जैसे कोई गुनाह कर रहे हैं। तब तक 'पुलिसिया पहचान के नाम पर फिल्म देखना बुरा है', समझ आने लगा था। तब शायद पहली देखी फिल्म 'गॉडजिला' थी। बाद में एनाकान्डा, मोहब्बतें, गदर वगैरह-वगैरह। फिर जमशेदपुर गए तो वहाँ बैचलर लाइफ शुरु हुई। एक दोस्त ने पहली बार सुबह वाला 'शो' दिखाया। फिर तो सिनेमा आदत बन गया। हर नई रिलीज़ देखना ही देखना था। जमशेदपुर के बसन्त टॉकीज़ (जो अब नहीं रहा) में पाँच रुपये और ग्यारह रुपये के टिकट हुआ करते थे। पाँच रुपये की टिकट के हिसाब से साल में सौ शो देखने के भी लगभग पाँच सौ रुपये ही खर्च होते थे। इसीलिए सभी 'तरह' की फिल्में अफॉर्ड हो जाती थीं। कला के लिए जागरुक शहर जमशेदपुर में फिल्म महोत्सवों का चस्का लगा, जो अब तक कायम है।

फिर, दिल्ली आए तो पहली फिल्म देखी 'ओंकारा'। जामिया से नेहरु प्लेस तक पैदल चलकर तीस रुपये की टिकट पर। फिर एक महिला-मित्र के साथ मॉल गए, कोई फालतू सी फिल्म देखने। इतना महँगा पड़ा कि साथ देखने से जी भर गया। जमशेदपुर और बचपन बहुत याद आया। फिर देखा कि उन्हीं फिल्मों के 12 बजे से पहले वाले शो सस्ते होते हैं। तो आज तक दिल्ली में सुबह जल्दी उठने का सिर्फ यही मकसद होता है। कभी-कभी जान-बूझ कर देर से उठता हूँ, जब किसी ख़ास के साथ पिक्चर हॉल जाना हो और पॉपकॉर्न खाते हुए पिक्चर देखनी हो।

निखिल जी ने अपने संस्मरण में जिन दो आरम्भिक फिल्मों- सूरज और गाइड का उल्लेख किया है। आपको हम इन दोनों फिल्मों से गीत सुनवा रहे हैं।

फिल्म सूरज : ‘बहारों फूल बरसाओ...’ : मुहम्मद रफी : संगीत – शंकर-जयकिशन



फिल्म गाइड : ‘पिया तोसे नैना लागे रे...’ : लता मंगेशकर : संगीत – सचिनदेव बर्मन



आपको निखिल जी का संस्मरण कैसा लगा? हमें अवश्य लिखिएगा। आप अपनी प्रतिक्रिया radioplaybackindia@live.com पर भेज सकते हैं। आप भी हमारे इस आयोजन- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ में भाग ले सकते हैं। आपका संस्मरण हम रेडियो प्लेबैक इण्डिया के इस अनुष्ठान में सम्मिलित तो करेंगे ही, यदि हमारे निर्णायकों को पसन्द आया तो हम आपको पुरस्कृत भी करेंगे। आज ही अपना आलेख और एक चित्र हमे radioplaybackindia@live.com पर मेल करें। जिन्होने आलेख पहले भेजा है, उन प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपना एक चित्र भी भेज दें।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 



'मैंने देखी पहली फिल्म' : आपके लिए एक रोचक प्रतियोगिता
दोस्तों, भारतीय सिनेमा अपने उदगम के 100 वर्ष पूरा करने जा रहा है। फ़िल्में हमारे जीवन में बेहद खास महत्त्व रखती हैं, शायद ही हम में से कोई अपनी पहली देखी हुई फिल्म को भूल सकता है। वो पहली बार थियेटर जाना, वो संगी-साथी, वो सुरीले लम्हें। आपकी इन्हीं सब यादों को हम समेटेगें एक प्रतियोगिता के माध्यम से। 100 से 500 शब्दों में लिख भेजिए अपनी पहली देखी फिल्म का अनुभव radioplaybackindia@live.com पर। मेल के शीर्षक में लिखियेगा ‘मैंने देखी पहली फिल्म’। सर्वश्रेष्ठ तीन आलेखों को 500 रूपए मूल्य की पुस्तकें पुरस्कारस्वरुप प्रदान की जायेगीं। तो देर किस बात की, यादों की खिड़कियों को खोलिए, कीबोर्ड पर उँगलियाँ जमाइए और लिख डालिए अपनी देखी हुई पहली फिल्म का दिलचस्प अनुभव। प्रतियोगिता में आलेख भेजने की अन्तिम तिथि 31अक्टूबर, 2012 है।

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

मैंने देखी पहली फिल्म : अनुराग शर्मा की यादों से झांकती दो फ़िल्में



मैंने देखी पहली फ़िल्म : अनुराग शर्मा 

भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान में प्रत्येक गुरुवार को हम आपके लिए सिनेमा के इतिहास पर विविध सामग्री प्रस्तुत कर रहे हैं। माह के दूसरे और चौथे गुरुवार को आपके संस्मरणों पर आधारित ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ स्तम्भ का प्रकाशन करते हैं। आज माह का चौथा गुरुवार है, इसलिए आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं, गैर-प्रतियोगी संस्मरण। आज का यह संस्मरण, रेडियो प्लेबैक इण्डिया के संचालक-मण्डल के सदस्य अनुराग शर्मा का है।


‘गीत’ के गीत में फूलों की सुगन्ध है तो ‘पुष्पांजलि’ के गीत में राधा के लिए कृष्ण की व्यग्रता

मेरी आयु चार-पाँच वर्ष की थी जब हम लोग जम्मू के तालाब तिल्लो के एक नये बन रहे इलाक़े में किराये पर रहने आये थे। दिन में स्कूल जाना और शाम को अपने मित्रों के साथ तरह-तरह के खेल खेलना। आस-पास नहरें, खड्डों, पत्थरों और जंगली झाड़ियों की भरमार थी। जल्दी ही मैं आक और लेंटाना के पौधों को पहचानने लगा। छोटे-छोटे लाल बेर हम बच्चों के पसन्दीदा थे, जिन्हें डोगरी में गरने कहा जाता था। हमसे कुछ बड़ी लड़कियाँ शाम को जगमगाते जुगनुओं को अपनी चुन्नी में सम्हालकर ऐसे लपेट लेती थीं कि वे सुरक्षित रहते हुए उन्हें प्रकाशित करते रहें।

शाम को रेडियो पर "रेडियो कश्मीर-जम्मू की आवाज़" सुनते थे। मुंशी अंकल और निक्की की बातचीत सुनकर मज़ा आता था। कभी कभार सुबह को कुन्दनलाल सहगल और रात में हवामहल सुनना भी याद है। रविवार को रेडियो पर किसी हिन्दी फ़िल्म का ऑडियो सुनाया जाता था जिसे सभी बड़े ध्यान से सुनते थे और कई बार हम लोग भी। मुकेश के स्वर में "सावन का महीना" उन गीतों में से एक है जिनकी यादें सबसे पुरानी हैं।

जम्मू से पहले की छिटपुट यादें रामपुर, बदायूँ और बरेली की हैं लेकिन जम्मू के दृश्य लम्बे और अधिक स्पष्ट हैं। रामपुर में घर के बाहर शाम को एक पुलिया पर अपने मित्रों के साथ बैठकर एक सुर में "बम बम भोले" कहने की याद तो है लेकिन मित्रों के नाम नहीं याद। जबकि जम्मू की यादों में पात्रों के चेहरे-मोहरे और व्यक्तित्व के साथ उनके नाम भी अधिकांशतः स्पष्ट हैं। तब से अब तक अनगिनत फ़िल्में देखी होंगी, न जाने कितनी भाषाओं में। लेकिन पीछे जाकर देखता हूँ तो सबसे पहले जम्मू में देखी दो फ़िल्मों के बहुत से सुन्दर दृश्य और गीत याद आते हैं। पहाड़ी नगरी जम्मू में देखी ये दोनों हिन्दी फ़िल्में मैंने अपने माता-पिता के साथ शायद कुछ ही दिनों के अंतराल में देखी थीं। एक फ़िल्म का तो नाम ही "गीत" था। शायद तब उम्र की कमी के कारण या तब से इतना समय ग़ुज़र जाने के कारण फ़िल्म की कथा तो पूरी तरह याद नहीं लेकिन कई गीत और दृश्य अब भी दिल में जगह बनाकर डटे हुए हैं। पहला फ़िल्मी दृश्य जो मुझे अभी भी अच्छी तरह याद है, वह है "आजा तुझको पुकारें मेरे गीत रे..." गीत का दृश्य। ऐसा लगता है कि जब हम हाल में घुसे थे तो फ़िल्म शुरू हो चुकी थी और यह गीत चल रहा था। आइये, एक पल रुककर सुनें यह मधुर गीत-

फिल्म – गीत : ‘आजा तुझको पुकारे मेरे गीत...’ : मुहम्मद रफी


बचपन की दूसरी फ़िल्म थी "पुष्पांजलि"। ठीक से नहीं कह सकता कि ‘गीत’ और ‘पुष्पांजलि’ में से पहले कौन सी फ़िल्म देखी थी। जहाँ ‘गीत’ के जितने भी गीत या दृश्य याद हैं, वे सब हरियाली, सुन्दर फूलों व प्रसन्न करने वाले संगीत में ढले हैं वहीं ‘पुष्पांजलि’ का गीत "दुनिया से जाने वाले जाने चले जाते हैं कहाँ..." सुनते समय आज भी किसी प्रिय के खो जाने की भावना का अनुभव होता है। जीवन में पहली बार शायद इसी फ़िल्म को देखकर मुझे मृत्यु के शाश्वत सत्य का अहसास हुआ था। लगभग उन्हीं दिनों अपनी ही उम्र के उस छोटे से लड़के को देखा जो अपने घर के बाहर खड़ा होकर हर आने-जाने वाले हमउम्र से डोगरी में कहता था, "तेरा भाई मर गया।" पूछताछ करने पर पता लगा कि कुछ दिन पहले ही उसका भाई पास की नहर में बह गया था और फिर उसकी लाश ही वापस आई। कुछ दिन बाद मैं भी उसी नहर में बहते समय अपने मकान मालिक के किशोर पुत्र व उनके साथियों द्वारा बचा लिया गया था। मृत्यु की इन हाड़-कँपाती यादों के बीच देखी गयी इन दो फ़िल्मों का न केवल याद रहना बल्कि मेरे जीवन का अभिन्न अंग बन जाना, अब स्वाभाविक सा ही लगता है। मन्ना डे के मधुर स्वर और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के मधुर संगीत में ढला इसी फ़िल्म का एक अन्य गीत "शाम ढले यमुना किनारे ..." दशकों बाद आज भी मन में बसा हुआ है।

फिल्म – पुष्पांजलि : ‘शाम ढले यमुना किनारे...’ : मन्ना डे और लता मंगेशकर


उसके बाद देखी हुई फ़िल्मों में भुवन शोम, त्रिकाल, चौदहवीं का चाँद, कागज़ के फूल, उमराव जान (पुरानी), जुनून, विजेता और इनके अलावा अनेक फ़िल्में याद हैं मगर इन दो की बात ही कुछ और है।

आपको अनुराग जी की देखी पहली फिल्म का संस्मरण कैसा लगा? हमें अवश्य लिखिएगा। आप अपनी प्रतिक्रिया radioplaybackindia@live.com पर भेज सकते हैं। आप भी हमारे इस आयोजन- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ में भाग ले सकते हैं। आपका संस्मरण हम रेडियो प्लेबैक इण्डिया के इस अनुष्ठान में सम्मिलित तो करेंगे ही, यदि हमारे निर्णायकों को पसन्द आया तो हम आपको पुरस्कृत भी करेंगे। आज ही अपना आलेख और एक चित्र हमे radioplaybackindia@live.com पर मेल करें। जिन्होने आलेख पहले भेजा है, उन प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपना एक चित्र भी भेज दें।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

 
'मैंने देखी पहली फिल्म' : आपके लिए एक रोचक प्रतियोगिता


दोस्तों, भारतीय सिनेमा अपने उदगम के 100 वर्ष पूरा करने जा रहा है। फ़िल्में हमारे जीवन में बेहद खास महत्त्व रखती हैं, शायद ही हम में से कोई अपनी पहली देखी हुई फिल्म को भूल सकता है। वो पहली बार थियेटर जाना, वो संगी-साथी, वो सुरीले लम्हें। आपकी इन्हीं सब यादों को हम समेटेगें एक प्रतियोगिता के माध्यम से। 100 से 500 शब्दों में लिख भेजिए अपनी पहली देखी फिल्म का अनुभव radioplaybackindia@live.com पर। मेल के शीर्षक में लिखियेगा ‘मैंने देखी पहली फिल्म’। सर्वश्रेष्ठ तीन आलेखों को 500 रूपए मूल्य की पुस्तकें पुरस्कारस्वरुप प्रदान की जायेगीं। तो देर किस बात की, यादों की खिड़कियों को खोलिए, कीबोर्ड पर उँगलियाँ जमाइए और लिख डालिए अपनी देखी हुई पहली फिल्म का दिलचस्प अनुभव। प्रतियोगिता में आलेख भेजने की अन्तिम तिथि 31अक्टूबर, 2012 है।




गुरुवार, 13 सितंबर 2012

स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल -14


मैंने देखी पहली फिल्म

भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘स्मृतियों के झरोखे से’ में आप सभी सिनेमा प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। आज माह का दूसरा गुरुवार है और आज बारी है- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ की। इस द्विसाप्ताहिक स्तम्भ के पिछले अंक में आप श्री शिशिर कृष्ण शर्मा की देखी पहली फिल्म ‘बीस साल बाद’ के संस्मरण के साझीदार रहे। आज मनीष कुमार अपने परिवार वालों से अलग अपनी देखी पहली फिल्म ‘परिन्दा’ का संस्मरण प्रस्तुत कर रहे हैं। यह प्रतियोगी वर्ग की प्रविष्टि है। 


दोस्तों के साथ ‘ब्ल्यू लैगून’ देखने का साहस नहीं हुआ : मनीष कुमार


सिनेमा देखना मेरे लिए कभी लत नहीं बना। शायद ही कभी ऍसा हुआ है कि मैंने कोई फिल्म शो के पहले ही दिन जा कर धक्का-मुक्की करते हुए देख ली हो। पर इसका मतलब ये भी नहीं कि हॉल में जाकर फिल्म देखना अच्छा नहीं लगता था। बस दिक्कत मेरे साथ यही है कि मन लायक फिल्म नहीं रहने पर मुझे तीन घण्टे पिक्चर झेल पाना असह्य कार्य लगता है। इसीलिए आजकल काफी तहकीकात करके ही फिल्म देखने जाता हूँ।

पर बचपन की बात दूसरी थी। दरअसल हमारे पिताजी पढ़ाई-लिखाई के साथ परिवार के मनोरंजन का भी खासा ख्याल रखते थे। सो उनकी वजह से हर हफ्ते या फिर दो हफ्तों में एक बार, दो रिक्शों में सवार होकर हमारा पाँच सदस्यों का कुनबा पटना के विभिन्न सिनेमाहॉल- मोना, एलिफिस्टन, अशोक, अप्सरा और वैशाली आदि का चक्कर लगा लेता था। ये सिलसिला तब तक चला, जब तक पापा का तबादला पटना से बाहर नहीं हो गया। १९८३ में रिलीज हुई राजेश खन्ना की अवतार सारे परिवार के साथ देखी गई मेरी आखिरी फिल्म थी।

एक बार दसवीं में लड़कों ने स्कूल में फ्री पीरियड का फायदा उठाकर फिल्म देखने की सोची। योजना ये थी कि फ्री पीरियड्स के समय फिल्म देख ली जाए और फिल्म की समाप्ति तक घर पर हाजिरी भी दे दी जाए। अब फिल्म भी कौन सी... ब्रुक शील्ड की ब्ल्यू लैगून। मन ही मन डर रहे थे कि सही नहीं कर रहे हैं। पर साथियों के जोश दिलाने पर स्कूल से बाहर निकल आए, पर ऐन वक़्त पर मुख्य शहर की ओर जाने वाली बस के पॉयदान पर पैर रखकर वापस खींच लिया। दोस्त बस से पुकारते रहे पर मैं अनमने मन से वापस लौट आया।

उसके बाद फिल्म देखना एक तरह से बन्द ही हो गया। ८९ में इंजीनियरिंग में दाखिला हुआ तो पहली बार घर से निकले। पहले सेमस्टर की शुरुआत में कॉलेज कैंपस से बाहर जाना तो दूर, रैगिंग के डर से हम हॉस्टल के बाहर निकलना भी खतरे से खाली नहीं समझते थे। जाते भी तो कैसे, प्रायः ऐसी कहानियाँ सुनने को मिलती की लोग गए थे फिल्म देखने पर सीनियर्स ने फिरायालाल चौक पर जबरदस्ती का ट्राफिक इंस्पेक्टर बना दिया। यानि खुद का मनोरंजन करने के बजाए दूसरों की हँसी का पात्र बन गए।

खैर, एक महिने के बाद जब रैगिंग का दौर कम हो गया तो हम दोस्तों ने मिलकर एक फिल्म देखने का कार्यक्रम बनाया। पहली बार अकेले किसी फिल्म देखने के आलावा ये मौका छः साल के अन्तराल के बाद सिनेमा हॉल में जाने का था। सीनियर्स से बचने के लिए स्टूडेंट बस की जगह स्टॉफ बस ली और चल दिए, राँची के रतन टॉकीज की ओर। वो फिल्म थी- विधु विनोद चोपड़ा की परिन्दा इतने सालों बाद बड़े पर्दे पर फिल्म देखना बड़ा रोमांचक अनुभव रहा। नाना पाटेकर का कसा हुआ अभिनय और माधुरी दीक्षित की मासूमियत भरी खूबसूरती बहुत दिनों तक स्मृति पटल पर अंकित रही। और साथ में छाया रहा इस फिल्म में आशा भोसले और सुरेश वाडकर के स्वरों में गाया हुआ ये युगल गीत- प्यार के मोड़ पे छोड़ोगे जो बाहें मेरी, तुमको ढूँढेगी ज़माने में निगाहें मेरी...

गाने की जान आशा ताई का गाया ये मुखड़ा ही था जिसके बोल और धुन सहज ही मन को आकर्षित कर लेती थी।ये वो समय था जब फिल्म जगत ने ही आर.डी. बर्मन को एक चुका हुआ संगीतकार मान लिया गया था। कॉलेज की बस में वापस लौटते वक़्त ये गीत जुबान पर यूँ चिपक गया की क्या कहें..।


और अब हम आपको मनीष कुमार की देखी फिल्म ‘परिन्दा’ का उनका सबसे पसन्दीदा गीत- ‘प्यार के मोड़ पे छोड़ोगे जो बाहें मेरी, तुमको ढूँढेगी ज़माने में निगाहें मेरी...’ सुनवाते हैं। इसके संगीतकार राहुलदेव बर्मन हैं और गीत को स्वर दिया है, आशा भोसले और सुरेश वाडकर ने।


  
आपको मनीष जी की अकेले देखी पहली फिल्म का संस्मरण कैसा लगा? हमें अवश्य लिखिएगा। आप अपनी प्रतिक्रिया radioplaybackindia@live.com  पर भेज सकते हैं। आप भी हमारे इस आयोजन- मैंने देखी पहली फिल्म में भाग ले सकते हैं। आपका संस्मरण हम रेडियो प्लेबैक इण्डिया के इस अनुष्ठान में सम्मिलित तो करेंगे ही, यदि हमारे निर्णायकों को पसन्द आया तो हम आपको पुरस्कृत भी करेंगे। आज ही अपना आलेख और एक चित्र हमे radioplaybackindia@live.com पर मेल करें। जिन्होने आलेख पहले भेजा है, उन प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपना एक चित्र भी भेज दें।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

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