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Thursday, November 24, 2016

"सातों बार बोले बंसी" और "जाने दो मुझे जाने दो" जैसे नगीनों से सजी है आज की "गुलज़ार-आशा-पंचम"-मयी महफ़िल



कहकशाँ - 24
गुलज़ार, पंचम और आशा ’दिल पड़ोसी है’ में  
"दिल पड़ोसी है, मगर मेरा तरफ़दार नहीं..."



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है गुलज़ार, राहुल देव बर्मन और आशा भोसले की तिकड़ी के सुरीले संगम से निकले दो नगमें 'दिल पड़ोसी है’ ऐल्बम से।



बाद मुद्दत के फिर मिली हो तुम,
ये जो थोड़ी-सी भर गई हो तुम,
ये वज़न तुम पर अच्छा लगता है..

अभी कुछ दिनों पहले ही भरी-पूरी फिल्मफेयर की ट्रॉफ़ी स्वीकार करते समय गुलज़ार साहब ने जब ये पंक्तियाँ कहीं तो उनकी आँखों में गज़ब का एक आत्म-विश्वास था, लहजे में पिछले ४८ सालों की मेहनत की मणियाँ पिरोई हुई-सी मालूम होती थीं और बालपन वैसा ही जैसे किसी पाँचवे दर्जे के बच्चे को सबसे सुंदर लिखने या सबसे सुंदर कहने के लिए "इन्स्ट्रुमेंट बॉक्स" से नवाज़ा गया हो। उजले कपड़ों में देवदूत-से सजते और जँचते गुलज़ार साहब ने अपनी उम्र का तकाज़ा देते हुए नए-नवेलों को खुद पर गुमान करने का मौका यह कह कर दे दिया कि "अच्छा लगता है, आपके साथ-साथ यहाँ तक चला आया हूँ।" अब उम्र बढ़ गई है तो नज़्म भी पुरानी होंगी साथ-साथ, लेकिन "दिल तो बच्चा है जी", इसलिए हर दौर में वही "छुटभैया" दिल हर बार कुछ नया लेकर हाज़िर हो जाता है। यूँ तो यह दिल गुलज़ार साहब का है, लेकिन इसकी कारगुजारियों का दोष अपने मत्थे नहीं लेते हुए, गुलज़ार साहब "विशाल" पर सारा दोष मथ देते हैं और कहते हैं कि "इस नवजवान के कारण ही मैं अपनी नज़्मों को जवान रख पाता हूँ।" अब इसे गुलज़ार साहब का बड़प्पन कहें या छुटपन, लेकिन जो भी हो, इतना तो मानना पड़ेगा कि लगभग पचास सालों से चल रही इनकी लेखनी अब भी दवात से लबालब है। अब भी दिल पर वही सुंदर-से "हस्ताक्षर" रचती रहती है, वही गोल-गोल अक्षर, गोल-गोल अंडा, मास्टर-जी का डंडा, बकड़ी की पूँछ, मास्टर-जी की मूँछ, और लो बन गया "क"। ऐसे ही प्यारे-प्यारे तरीकों से और कल्पना की उड़ानों के सहारे गुलज़ार साहब हमारे बीच की ही कोई चीज हमें सौंप जाते हैं, जिसका तब तक हमें पता हीं नहीं होता। ८ सितम्बर १९८७ को भी यही बात हुई थी। उस दिन जब गुलज़ार साहब ने हमें "दिल" का अड्डा बताया, तभी हमें मालूम हुआ कि यह नामुराद कोई और नहीं "हमारा पड़ोसी है", यह ऐसा पड़ोसी है जो "हमारे ग़म उठा लेता है, लेकिन हमारे ग़मों को दूर नहीं करता" तभी तो गुलज़ार साहब कहते हैं:

हाँ मेरे ग़म तो उठा लेता है, ग़मख्वार नहीं,
दिल पड़ोसी है, मगर मेरा तरफ़दार नहीं..

("ये जो थोड़ी-सी भर गई हो तुम..." यह सुनकर आपको नहीं लगता कि शायर ने किसी ख़ास के लिए ये अल्फ़ाज़ कहे हैं। अलग बात है कि फिल्मफेयर की ब्लैक-लेडी पर भी ये पंक्तियाँ सटीक बैठती हैं, लेकिन पवन झा जी की मानें तो गुलज़ार साहब ने कुछ सालों पहले "एक ख़ास" के लिए यह नज़्म लिखी थी.. वह ख़ास कौन है? यह पूछने की ज़रूरत भी है क्या? :) )

हाँ तो हम गुलज़ार साहब और "दिल पड़ोसी है" की बातें कर रहे थे। इस एलबम के एक-एक गीत को गुलज़ार साहब ने इतनी शिद्दत से लिखा है (वैसे ये हर गीत को उतनी ही मेहनत, शिद्दत और हसरत से रचते हैं) कि मुझसे अपनी पसंद के एक या दो गाने चुनते नहीं बन रहे। "कोयले से हीरे को ढूँढ निकाला जा सकता है, लेकिन जहाँ हीरे ही हीरे हो वहाँ पारखी का सर घूम न जाए तो कहना।" वैसे मैं अपने आप को पारखी नहीं मानता लेकिन हीरों के बीच बैठा तो ज़रूर हूँ। शायद एक-एक हीरा परखता चलूँ तो कुछ काम बने। अब ज़रा इसे देखिए:

चाँद पेड़ों पे था,
और मैं गिरजे में थी,
तूने लब छू लिए,
जब मैं सजदे में थी,
कैसे भूलूँगी मैं, वो घड़ी गश की थी,
ना तेरे बस की थी, ना मेरे बस की थी.. (रात क्रिसमस की थी)

या फिर इसे:

माँझी रे माँझी, रमैया माँझी,
मोइनी नदी के उस पार जाना है,
उस पार आया है जोगी,
जोगी सुना है बड़ा सयाना है..

शाम ढले तो पानी पे चलके पार जाता है,
रात की ओट में छुपके रसिया मोहे बुलाता है,
सोना सोना, जोगी ने मेरा
जाने कहाँ से नाम जाना है.. (माँझी रे माँझी) 

यहाँ पर माँझी और मोइनी नदी के बहाने "माया-मोह" की दुनिया के उस पार बसे "अलौकिक" संसार की बात बड़े ही खूबसूरत और सूफ़ियाना तरीके से गुलज़ार साहब ने कह दी है। ऐसी ही और भी कई सारी नज़्में हैं इस एलबम में जिसमें गुलज़ार, पंचम और आशा की तिकड़ी की तूती गूँज-गूँज कर बोलती है। जिस तरह हमने पिछली कड़ी में खुद इन दिग्गजों से ही इनकी पसंद-नापसंद और गानों के बनने की कहानी सुनी थी, उसी तरह आज भी क्यों न वह बागडोर इन्हीं को सौंप दी जाए।

आशा: "सातों बार बोले बंसी"

पंचम: इसके बारे में गुलज़ार, तुम बताओ।

गुलज़ार: "सातों बार बोले बंसी, एक हीं बार बोले ना.. तन की लागी सारी बोले, मन की लागी खोले ना".. ये गाने में खास बात ये है कि बांसुरी को "पर्सोनिफ़ाई" करके देखिए आप।

पंचम: कैसे?

गुलज़ार: जितनी फूंक तन पे लगती है, उतनी हीं बार बोलती है लेकिन अंदर की बात नहीं बताती। उसके सुर सात हैं, सातों बोलते हैं, जो चुप रहती है जिस बात पे, वो नहीं बोलती।

आशा: वाह!

गुलज़ार: उसमें खूबसूरत बात ये है कि उसको "पर्सोनिफ़ाई" करके देखिए। किस तरह से वो उठके कृष्णा के मुँह लगती है, मुँह लगी हुई है, मुँह चढी हुई है, और वो सारी बातें कहती है, एक जो उसका अपनापन है, वो चुप है, वो नहीं बोलती, उन सात सुरों के अलावा। उसके सारी "इलस्ट्रेशन" जितनी है, वो बाँसुरी के साथ "पर्सोनिफ़ाई" करके देखिए आप।

पंचम: ये गाने में थोड़ा लयकारी भी किया था, सरगम भी किए थे, बड़ा अच्छा था।

आशा: और उसमें बाँसुरी साथ में बोल रही है, और आवाज़ भी आ रही है, तो समझ में नहीं आ रहा कि बाँसुरी बोल रही है कि राधा बोल रही है।

गुलज़ार: हाँ, वही, उसमें "परसोनिफ़िकेशन" है सारी की सारी। फूंक पे बोलती है और वो फूंक पे हीं बोलती है बाँसुरी।

अब चूँकि गुलज़ार साहब ने इस गाने को बड़ी ही बारीकी से समझा दिया है, इसलिए मुझे नहीं लगता है मुझे कुछ और कहने की ज़रुरत पड़ेगी। तो चलिए पढते और सुनते हैं यह गाना:

सातों बार बोले बंसी,
एक ही बार बोले ना,
तन की लागी सारी बोले,
मन की लागी खोले ना..

चुपके सुर में भेद छुपाये,
फूँक-फूँक बतलाये,
तन की सीधी मन की घुन्नी,
पच्चीस पेंचे खाए,
हो.. हाँ बोले ना बोले ना,
हाँ बोले ना बोले ना..

प्रीत की पीड़ा जाने मुई,
छाती छेद पड़े, 
उठ-उठ के फिर मुँह लगती है,
कान्हा संग लड़े,
हो.. हाँ बोले ना बोले ना,
हाँ बोले ना बोले ना..




नियम से तो हमें बस एक ही गाने तक अपनी महफ़िल को सीमित रखना चाहिए था, लेकिन बात जब इस "स्वर्णिम" तिकड़ी की हो रही हो तो एक से किसका मन भरता है! यूँ भी हम जितना इनके गाने सुनेंगे, उतना ही हमें संगीत की बारीकियाँ जानने को मिलेंगी। पंचम दा की यही तो ख़ासियत रही थी कि वे संगीत को बस "ट्रेडिशनल" एवं "कन्वेशनल" वाद्य-यंत्रों तक घेरकर नहीं रखते थे, बल्कि "बोल" के हिसाब से उसमे "रेलगाड़ी की सीटी", "मुर्गे की बाँग", "जहाज का हॉर्न" तक डाल देते थे। तभी तो सुनने वाला इनके संगीत की ओर खुद-ब-खुद खींचा चला आता था। जहाँ तक आशा ताई की बात है, तो इनके जैसा "रेंज" शायद ही किसी गायिका के पास होगा। ये जितने आराम से "दिल चीज़ क्या है" गाती हैं, उतनी ही सहूलियत से "दम मारो दम" को भी निभा जाती हैं। अब जहाँ ये तीनों अलग-अलग इतने करामाती हैं तो फिर साथ आ जाने पर "क़यामत" तो आनी ही है। आशा जी "दिल पड़ोसी है" को अपना सर्वश्रेष्ठ एलबम मानती है, तभी तो गुलज़ार साहब को उनके जन्मदिवस पर बधाई-संदेश भी इसी के रंग में रंगकर भेज डालती हैं: "भाई जन्म-दिन मुबारक। पंचम, आप और मैं खंडाला में, दिल पड़ोसी है के दिन, मैं जिंदगी में कभी नहीं भूलूंगी।" हम भी इस तिकड़ी को कभी नहीं भूलेंगे। इसी वादे और दावे के साथ चलिए अगली बातचीत और अगले गाने का लुत्फ़ उठाते हैं:

आशा(गाती हैं): "जेते दाओ आमाए डेको ना... "

गुलज़ार: वाह!

पंचम: ये तो आप बंगाली में गा रही हैं.. "प्रोग्राम" का हिन्दी गानों का है।

आशा: हिन्दी हो, पंजाबी हो, चाहे टिम्बकटु की ज़बान हो, गाना सुर जहाँ अच्छे, मतलब जहाँ अच्छा, वो गाना अच्छा होता है।

गुलज़ार: सच में आशा जी, मैंने इसके कई बंगाली गाने चुराए हैं।

आशा: अच्छा?

गुलज़ार: हाँ, बहुत बार। ये पूजा के लिए जो गाने करते हैं, तो मैं पास बैठे हुए, कई बार धुन बहुत अच्छी लगी, जैसे एक, उसके पूरे बंगाली के बोल मुझे याद नहीं, और गौरी दा "फ़ेमस पोयट फ़्रॉम बंगाल"

आशा: गौरी शंकर मजुमदार

गुलज़ार: जी हाँ, और इनके बोल चल रहे थे पूजा के गाने के "आस्थे आमार देरी होबे"

पंचम: आ हा हा

गुलज़ार: उसपे वो गाना लिखा था उस ट्युन पर.. "तेरे बिना ज़िंदगी से कोई शिकवा तो नहीं"

पंचम: ये उसी का गाना?

गुलज़ार: हाँ, आँधी में। और ये भी उसी तरह का गाना इनका, जिसपे आप अभी गा रहीं थीं, "जेते दाव आमाय"

आशा: "दिल पड़ोसी है" में.. (गाती हैं) "जाने दो मुझे जाने दो"।

और ये रहे उस गाने के बोल:

जाने दो मुझे जाने दो
रंजिशें या गिले, वफ़ा के सिले
जो गये जाने दो
जाने दो मुझे जाने दो

थोड़ी ख़लिश होगी, थोड़ा सा ग़म होगा,
तन्हाई तो होगी, अहसास कम होगा
गहरी ख़राशों की गहरी निशानियाँ हैं
चेहरे के नीचे कितनी सारी कहानियाँ हैं
माज़ी के सिलसिले, जा चुके जाने दो 
ना आ आ..

उम्मीद-ओ-शौक़ सारे लौटा रही हूँ मैं,
रुसवाई थोड़ी-सी ले जा रही हूँ मैं
बासी दिलासों की शब तो गुज़ार आये
आँखों से गर्द सारी रोके उतार आये
आँखों के बुलबुले बह गये, जाने दो 
ना आ आ..




’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


खोज और आलेख : विश्वदीपक ’तन्हा’
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Thursday, July 7, 2016

आज की महफ़िल में सुनिए क्यों संगीतकार खय्याम दस वर्ष की छोटी उम्र में घर से भाग गए?

खय्याम 
महफ़िल ए कहकशाँ 8



दोस्तों सुजोय और विश्व दीपक द्वारा संचालित "कहकशां" और "महफिले ग़ज़ल" का ऑडियो स्वरुप लेकर हम हाज़िर हैं, "महफिल ए कहकशां" के रूप में पूजा अनिल और रीतेश खरे  के साथ।  अदब और शायरी की इस महफ़िल में आज सुनिए आशा भोंसले की गाई और खय्याम साहब द्वारा संगीतबद्ध यह ग़ज़ल |


मुख्य स्वर - पूजा अनिल एवं रीतेश खरे 
स्क्रिप्ट - विश्व दीपक एवं सुजॉय चटर्जी





Tuesday, October 9, 2012

"ये गाँव प्यारा-प्यारा...", पर नहीं बसा सकीं वर्षा भोसले अपने सपनों का गाँव

गायिका वर्षा भोसले को श्रद्धांजलि



"ये गाँव प्यारा-प्यारा, ये लवली-लवली गाँव, ये हरियाली पीपल की घनी छाँव, राजा बेटा धरती का प्यारा-प्यारा गाँव...", बरसों बरस पहले जब वर्षा भोसले इस गीत को गाते हुए जिस प्यारे से इस गाँव की कल्पना की होगी, तब शायद ही उन्हें इस बात का इल्म हुआ होगा कि वो कभी अपने सपनों का गाँव नहीं बसा पाएँगी। आज जब वर्षा हमारे बीच नहीं रहीं तो उनका गाया हुआ यही गीत बार-बार मन-मस्तिष्क पर हावी हो रहा है। कल जब तक वो इस दुनिया में थीं तब शायद ही हम में से कोई उन्हें दैनन्दिन जीवन में याद किया होगा, पर उनके जाने के बाद दिल यह सोचने पर ज़रूर मजबूर कर रहा है कि उन्होंने यह भयानक क़दम क्यों उठाया होगा? क्यों मानसिक अवसाद ने उन्हें घेर लिया होगा? होश संभालने से पहले ही पिता से दूर हो जाने का दु:ख उनके कोमल मन को कुरेदा होगा? विश्व की श्रेष्ठ गायिकाओं में से एक आशा भोसले की बेटी होकर भी जीवन में कुछ ख़ास न कर पाने का ग़म सताया होगा? अपनी वैवाहिक जीवन की असफलता ने उनकी बची-खुची आशाओं पर भी पानी फेर दिया होगा? सम्पत्ति को लेकर पारिवारिक अशान्ति से वो तंग आ गई होंगी? अगर इन तमाम सवालों को ज़रा करीब से जानने की कोशिश करें तो शायद हम वर्षा के उस मानसिक दर्द के हमदर्द हो पायेंगे। कल वर्षा भोसले की अत्महत्या की ख़बर सुन कर जैसे दिल दहल गया। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की तरफ़ से वर्षा भोसले को भावभीनी श्रद्धांजलि और आशा जी व समस्त मंगेशकर परिवार के सदस्यों के लिए कामना कि ईश्वर उन्हें इस दर्दनाक स्थिति से गुज़रने में शक्ति प्रदान करें।

वर्षा भोसले का जन्म सन् 1956 में हुआ था। बतौर गायिका उन्होंने कुछ हिन्दी फ़िल्मों तथा भोजपुरी व मराठी फ़िल्मों में गीत गाए। वो कहते हैं न कि विशाल वटवृक्ष के नीचे अन्य पेड़ों का उगना मुश्किल होता है, वैसे ही वर्षा के लिए आशा भोसले की बेटी होना वरदान से ज़्यादा अभिषाप सिद्ध हुई। वो जो भी गातीं, उसकी तुलना आशा जी से होतीं। आलम कुछ ऐसा हुआ कि वर्षा ने तंग आकर गाना ही छोड़ दिया। विविध भारती के 'विशेष जयमाला' कार्यक्रम में अपने संगीतकार बेटे हेमन्त और गायिका बेटी वर्षा का ज़िक्र आशा भोसले ने कुछ इस तरह से किया था -- "कोई कोई क्षण ज़िंदगी के ऐसे होते हैं जो भुलाये नहीं जा सकते, बड़े मज़ेदार होते हैं। मेरा लड़का हेमन्त, आप समझते होंगे माँ के लिए बेटा क्या चीज़ होता है, एक दिन वो म्युज़िक डिरेक्टर बन गया और मेरे पास आकर कहने लगा कि ये मेरा गाना है, तुम गाओ। कैसा लगता है न? जो कल तक इतना सा था, आज वो मुझसे कह रहा है कि मेरा गाना गाओ। फिर उसने अपनी बहन, मेरी बेटी वर्षा से कहने लगा कि तुम्हे भी गाना पड़ेगा। वर्षा बहुत शर्मीली है, उसने कहा कि बड़ी मासी इतना अच्छा गाती है, माँ इतना अच्छा गाती है, मैं नहीं गाऊँगी। लेकिन हेमन्त ने बहुत समझाया और उसका पहला गाना रेकॉर्ड हुआ। मैं स्टुडियो पहुँची तो देखा कि लड़की माइक के सामने खड़ी है और उसका भाई वन-टू बोल रहा है। ये क्षण मैं कभी नहीं भूल सकती। ये गाना सुनिये फ़िल्म 'जादू-टोना' का"



फ़िल्म 'जादू-टोना' में पहली बार गाने के बाद वर्षा भोसले ने कुछ और हिन्दी फ़िल्मों में भी गीत गाये। संगीतकार सोनिक-ओमी के संगीत में फ़िल्म 'भारत के संतान' में दिलराज कौर के साथ "दे दे तू दस पैसे दान", राम लक्ष्मण के संगीत में फ़िल्म 'तराना' में उषा मंगेशकर के साथ "मेरी आँख फ़ड़कती है" और संगीतकार श्यामजी घनश्याम जी के लिए फ़िल्म 'तीन चेहरे' में "हम हैं इस तरह जनाब के लिए जिस तरह जाम है" जैसे गीत गाये जिनमें कोई ख़ास बात न होने की वजह से लोगों ने अनसुने कर दिए। पर दो गीत उन्होंने और ऐसे भी गाये जिनके बोलों पर आज ग़ौर फ़रमाते हैं तो उनकी ज़िंदगी के साथ इनके विरोधाभास का अहसास होता है। एक गीत है किशोर कुमार के साथ फ़िल्म 'लूटमार' का "हँस तू हरदम, ख़ुशियाँ या ग़म, किसी से डरना नहीं, डर डर के जीना नहीं", और दूसरा गीत है अमित कुमार के साथ फ़िल्म 'आख़िरी इंसाफ़' का "यारों कल किसने देखा है, कल को गोली मारो"। और उन्होंने अपने आप को ही गोली मार ली। इन दोनों गीतों में ज़िन्दगी के प्रति आशावादी होने का संदेश है, जबकि वर्षा ने अपनी ज़िंदगी को निराशाओं से घेर लिया।



एक गायिका होने के अलावा वर्षा भोसले एक लेखिका भी थीं। वो लोकप्रिय वेब-पोर्टल 'रेडिफ़' के लिए 1997 से 2003 तक, 'दि संडे ऑबज़र्वर' के लिए 1994 से 1998 तक, और 'जेन्टलमैन' पत्रिका के लिए 1993 में लिखती रहीं। 'दि टाइम्स ऑफ़ इण्डिया' और 'रक्षक' पत्रिका के लिए भी कुछ समय तक लिखीं। उन्होंने एक खेल-लेखक हेमन्त केंकड़े से विवाह किया, पर दुर्भाग्यवश 1998 में उनका तलाक हो गया। 9 सितंबर 2008 (आशा भोसले के जन्मदिन के अगले दिन) वर्षा ने ख़ुदकुशी करने की कोशिश की थी, पर उन्हें बचा लिया गया था। पर इस बार काल के क्रूर हाथों ने उन्हें इस धरती से छीन लिया। आज उनकी मृत्यु की ख़बर "आशा भोसले की बेटी ने आत्महत्या की" के रूप में प्रकाशित हो रहा है। जिस निजी पहचान को न बना पाने की वजह से वो अवसाद से गुज़र रही थीं, वह पहचान उनके जाने के बाद भी दुनिया नहीं दे पा रही हैं। अब भी वो पहले आशा भोसले की बेटी हैं, बाद में वर्षा भोसले। आख़िर क्यों??? 

वर्षा भोसले को यह सुरीली श्रद्धांजलि हम समाप्त करते हैं उनकी और आशा जी की गाई फ़िल्म 'जुनून' के वनराज भाटिया के संगीत में "सावन की आई बहार रे" गीत को सुनते हुए....




खोज और आलेख: सुजॉय चटर्जी

Wednesday, August 10, 2011

फिर किसी शाख ने फेंकी छाँव....और "बहुत देर तक" महकती रही तनहाईयाँ

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 719/2011/159



'एल्ड इज़ गोल्ड' के सभी चाहने वालों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! जैसा कि इन दिनों इस स्तंभ में आप आनंद ले रहे हैं सजीव सारथी की लिखी कविताओं और उन कविताओं पर आधारित फ़िल्मी रचनाओं की लघु शृंखला 'एक पल की उम्र लेकर' में। आज नवी कड़ी के लिए हमने चुनी है कविता 'बहुत देर तक'।



बहुत देर तक

यूँ ही तकता रहा मैं

परिंदों के उड़ते हुए काफ़िलों को

बहुत देर तक

यूँ ही सुनता रहा मैं

सरकते हुए वक़्त की आहटों को



बहुत देर तक

डाल के सूखे पत्ते

भरते रहे रंग आँखों में मेरे

बहुत देर तक

शाम की डूबी किरणें

मिटाती रही ज़िंदगी के अंधेरे



बहुत देर तक

मेरा माँझी मुझको

बचाता रहा भँवर से उलझनों की

बहुत देर तक

वो उदासी को थामे

बैठा रहा दहलीज़ पे धड़कनों की



बहुत देर तक

उसके जाने के बाद भी

ओढ़े रहा मैं उसकी परछाई को

बहुत देर तक

उसके अहसास ने

सहारा दिया मेरी तन्हाई को।




इस कविता में कवि के अंदर की तन्हाई, उसके अकेलेपन का पता चलता है। कभी कभी ज़िंदगी यूं करवट लेती है कि जब हमारा साथी हमसे बिछड़ जाता है। हम लाख कोशिश करें उसके दामन को अपनी ओर खींचे रखने की, पर जिसको जाना होता है, वह चला जाता है, अपनी तमाम यादों के कारवाँ को पीछे छोड़े। उसकी यादें तन्हा रातों का सहारा बनती हैं। फिर एक नई सुबह आती है जब कोई नया साथी मिल जाता है। पहले पहले उस बिछड़े साथी के जगह उसे रख पाना असंभव सा लगता है, पर समय के साथ साथ सब बदल जाता है। अब नया साथी भी जैसे अपना सा लगने लगता है जो इस तन्हा ज़िंदगी में रोशनी की किरण बन कर आया है। और जीवन चक्र चलता रहता है। एक बार फिर। "फिर किसी शाख़ नें फेंकी छाँव, फिर किसी शाख़ नें हाथ हिलाया, फिर किसी मोड़ पे उलझे पाँव, फिर किसी राह नें पास बुलाया"। किसी के लिए ज़िंदगी नहीं रुकती। वक़्त के साथ हर ज़ख़्म भरता नहीं, फिर भी जीते हैं लोग कोई मरता नहीं। तो उस राह नें अपनी तरफ़ उसे बुलाया, और वो उस राह पर चल पड़ा, फिर एक बार। आइए सुना जाये राहुल देव बर्मन के संगीत में फ़िल्म 'लिबास' में लता मंगेशकर की आवाज़, गीत एक बार फिर गुलज़ार साहब का।







और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



और अब वक्त है आपके संगीत ज्ञान को परखने की. अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-



सूत्र १ - ये एक मल्टी स्टारर फिल्म है.

सूत्र २ - फिल्म के निर्देशक आज भी सक्रिय हैं और अपनी नई फिल्म के लिए उन्होंने रहमान को साईन किया है.

सूत्र ३ - एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से - "अनजाने".



अब बताएं -

गीतकार कौन है - ३ अंक

संगीतकार बताएं - २ अंक

फिल्म के निर्देशक बताएं - २ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -

शरद जी और अवध जी बहुत दिनों बाद दिखे, कहाँ रहे जनाब ?



खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, August 8, 2011

कतरा कतरा मिलती है.....खुशी और दर्द के तमाम फूलों को समेट लेता है "वो" आकर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 717/2011/157

'ओल्ड इज़ गोल्ड' स्तंभ के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय और सजीव का प्यार भरा नमस्कार! आज इस सुरीली महफ़िल की शमा जलाते हुए पेश कर रहे हैं सजीव सारथी की लिखी कविता 'वो'। लघु शृंखला 'एक पल की उम्र लेकर' की यह है सातवीं कड़ी।

समय की पृष्ठभूमि पर
बदलते रहे चित्र
कुछ चेहरे बने
कुछ बुझ गए
कुछ कदम साथ चले
कुछ खो गए
पर वो
उसकी ख़ुशबू रही साथ सदा
उसका साया साथ चला मेरे
हमेशा

टूटा कभी जब हौंसला
और छूटे सारे सहारे
उन थके से लम्हों में
डूबी-डूबी तन्हाइयों में
वो पास आकर
ज़ख़्मों को सहलाता रहा
उसके कंधों पर रखता हूँ सर
तो बहने लगता है सारा गुबार
आँखों से

वो समेट लेता है मेरे सारे आँसू
अपने दामन में
फिर प्यार से काँधे पर रख कर हाथ
कहता है - अभी हारना नहीं
अभी हारना नहीं
मगर उसकी उन नूर भरी
चमकती
मुस्कुराती
आँखों में
मैं देख लेता हूँ
अपने दर्द का एक
झिलमिलाता-सा कतरा।


इसमें कोई शक़ नहीं कि उस एक इंसान की आँखों में ही अपनी परछाई दिखती है, अपना दर्द बस उसी की आँखों से बहता है। जिस झिलमिलाते कतरे की बात कवि नें उपर कविता की अंतिम पंक्ति में की है, वह कतरा कभी प्यास बुझाती है तो कभी प्यास और बढ़ा देती है। यह सोचकर दिल को सुकून मिलता है कि कोई तो है जो मेरे दर्द को अपना दर्द समझता है, और दूसरी तरफ़ यह सोचकर मन उदास हो जाता है कि मेरे ग़मों की छाया उस पर भी पड़ रही है, उसे परेशान कर रही है। यह कतरा कभी सुकून बन कर तो कभी परेशानी बनकर बार बार आँखों में झलक दिखा जाता है। और कतरे की बात करें तो यह जीवन भी तो टुकड़ों में, कतरों में ही मिलता है न? शायद ही कोई ऐसा होगा जिसे हमेशा लगातार जीवन में ख़ुशी, सफलता, यश, धन की प्राप्ति होती होगी। समय सदा एक जैसा नहीं रहता। जीवन में हर चीज़ टुकड़ों में मिलती है, और सबको इसी में संतुष्ट भी रहना चाहिए। अगर सबकुछ एक ही पल में, एक साथ मिल जाए फिर ज़िंदगी का मज़ा ही क्या! ज़िंदगी की प्यास हमेशा बनी रहनी चाहिए, तभी इंसान पर ज़िंदगी का नशा चढ़ा रहेगा। फ़िल्म 'इजाज़त' में गुलज़ार साहब नें कतरा कतरा ज़िंदगी की बात कही थी - "कतरा कतरा मिलती है, कतरा कतरा जीने दो, ज़िंदगी है, बहने दो, प्यासी हूँ मैं प्यासी रहने दो"। आशा भोसले का गाया और राहुल देव बर्मन का स्वरबद्ध किया यह गीत 'सुपरिम्पोज़िशन' का एक अनूठा उदाहरण है। आइए सुना जाए!



और अब एक विशेष सूचना:
२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।

और अब वक्त है आपके संगीत ज्ञान को परखने की. अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-

सूत्र १ - ये कलात्मक फिल्म एक विचारणीय मुद्दे पर केंद्रित थी, जो आज भी एक समस्या ही है.
सूत्र २ - फिल्म के सगीतकार ने इस फिल्म के लिए राष्ट्रीय सम्मान जीता था.
सूत्र ३ - इस ग़ज़ल के एक मिसरे में शब्द है -"लौ".

अब बताएं -
शायर बताएं - ३ अंक
संगीतकार बताएं - २ अंक
गायिका कौन है - २ अंक

सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.

पिछली पहेली का परिणाम -
लगता है इस बार अमित जी कोई रोक् नहीं पायेगा....क्षिति जी को भी बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Thursday, June 9, 2011

कुछ दिन पहले एक ताल में....क्लास्सिक कहानी कहने के अंदाज़ में लिखा मजरूह ने इस गीत को

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 675/2011/115

हानी भरे गीतों से सजी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इन दिनो चल रही लघु शृंखला 'एक था गुल और एक थी बुलबुल' में अब तक जिन "कहानीकारों" को हम शामिल कर चुके हैं, वो हैं किदार शर्मा, मुंशी अज़ीज़, क़मर जलालाबादी और हसरत जयपुरी। और इन कहानियों को हमें सुनाया सहगल, शांता आप्टे, सुरैया और लता मंगेशकर नें। आज इस लड़ी में एक और कड़ी को जोड़ते हुए सुनवा रहे हैं मजरूह सुल्तानपुरी की लिखी कहानी आशा भोसले के स्वर में। नर्गिस पर फ़िल्माया यह गीत है १९५८ की फ़िल्म 'लाजवंती' का। मजरूह साहब नें शुद्ध हिंदी के शब्दों का प्रयोग करते हुए इस कहानी रूपी गीत को लिखा है और दादा बर्मन का लाजवाब संगीत है इस गीत में। फ़िल्म का एक और कहानीनुमा गीत "चंदा मामा, मेरे द्वार आना" आप 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर पहले सुन चुके हैं। जैसा कि पिछले अंकों में हमनें बताया था कि फ़िल्मों में अक्सर नायिका अपने जीवन की दुखभरी कहानी को ही किसी बच्चे को लोरी-गीत के रूप में सुनाती है, इस गीत का भाव भी कुछ हद तक वैसा ही है। कहानी है एक बतख के जोड़े की और उनके एक बच्चे की। गीत शुरु ख़ुशमिज़ाज तरीके से होता है, लेकिन कहानी दुखद मोड़ लेती है जब उस जोड़े से उनका बच्चा अलग हो जाता है। कहानी वहीं थम जाती है, नायिका (नर्गिस) आगे नहीं गा पातीं। भले ही फ़िल्म की कहानी में इस गीत का महत्वपूर्ण स्थान रहा होगा, लेकिन यह गीत इतना सुंदर बना है कि फ़िल्म को अलग रखते हुए भी हम अगर इसको सुनें तो उतना ही अच्छा लगता है। यह गीत हमें जैसे एक शांत तालाब में लिये जाता है जहाँ पर दो सफ़ेद हंस तैर रहे हैं अपने नन्हे से बच्चे के साथ। अभी कुछ दिन पहले मैंने यह कहा था कि लता के अभाव नें जहाँ सी.रामचन्द्र की सफलता पर रोक लगा दी थी, वहीं सचिन देव बर्मन पर जैसे कोई प्रभाव ही नहीं पड़ा। इसका कारण तो यही लगता है कि जब दादा नें आशा को गवाना शुरु किया, तब वो गानें भी आशा वाले अंदाज़ के ही बनाये, न कि लता शैली के। और इसलिए आशा द्वारे गाये उनके गीत भी उतने ही लोकप्रिय हुए जितने लता के। इसका उदाहरण है 'लाजवंती' के गीतों की अपार सफलता।

और आइए अब हंस के जोड़े की कहानी भी पढ़ लीजिये...

कुछ दिन पहले एक ताल में कमलकुंज के अंदर
रहता था, एक हंस का जोड़ा।

रोज़ रोज़ भोर होते ही जब खिल जाते कमल,
दूर दूर दूर मोती चुगने को हंस घर से जाता निकल,
संध्या होते घर को आता झूम झूम के।

जब जब जब ढल जाता था दिन तारे जाते थे खिल,
सो जाते हिल-मिल के वो दोनों जैसे लहरों के दिल,
चंदा हँसता दोनों का मुख चूम चूम के।

थी उनकी एक नन्ही सी बेटी छोटी सी हंसिनी,
दोनों के नैनों की वो ज्योति घर की रोशनी,
ममता गाती और मुस्काती झूम झूम के।

फिर एक दिन ऐसा तूफ़ान आया चली ऐसी हवा,
बेचारे हंसा उड़ गये रे होके सबसे जुदा,
सागर सागर रोते हैं अब घूम घूम के।



क्या आप जानते हैं...
कि १९६२ के हेलसिंकी, फ़िनलैण्ड में आयोजित 'अंतर्राष्ट्रीय लोकसंगीत प्रतियोगिता' की जूरी में शामिल थे सचिन देव बर्मन।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 6/शृंखला 18
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - संगीत रवि का है.
सवाल १ - किस अभिनेत्री पर है ये मशहूर गीत - २ अंक
सवाल २ - किस बाल कलाकार ने फिल्म में प्रमुख अभिनेत्री के बेटे की भूमिका की थी, आगे चलकर ये एक मशहूर फिल्म लेखिका बनी - ३ अंक
सवाल ३ - गीतकार कौन है - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अनजाना जी, अमित जी, अविनाश जी और शरद जी को बधाई. पहेली संख्या २ के जवाब को लेकर असमंजस बना हुआ है. हमारे सभी सूत्र मुंशी अज़ीज़ का ही नाम दर्शा रहे हैं, मगर अमित जी हमें फिल्म अर्काईव का सन्दर्भ भेज चुके हैं, ऐसी स्तिथि में जब ये साफ़ नहीं हो पा रहा हमें लगता है कि पहली २ को निरस्त कर देना चाहिए. पहेली २ के स्थान पर हम इस शृंखला के अंतिम प्रश्न के साथ एक बोनस सवाल पूछ लेंगें, ओल्ड इस गोल्ड का समय आज से आधा घंटा पहले कर दिया गया है. आशा है आप सब श्रोता नियमित हिस्सा लेते रहेंगें

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, March 23, 2011

कोमल है कमज़ोर नहीं तू.....जब खुद एक सशक्त महिला के गले से निकला हो ऐसा गीत तो निश्चित ही एक प्रेरणा स्रोत बन जाता है

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 619/2010/319

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार! 'कोमल है कमज़ोर नहीं' शृंखला की कल की कड़ी में हमनें यह कहा था कि पार्श्वगायन को छोड़ कर हिंदी फ़िल्म निर्माण के अन्य सभी क्षेत्रों में पुरुषों का ही शुरु से दबदबा रहा है। दोस्तों, भले ही पार्श्वगायन की तरफ़ महिलाओं ने बहुत पहले से ही क़दम बढ़ा लिया था, लेकिन इस राह पर चलने और सफलता प्राप्त करने के लिए भी गायिकाओं को कड़ी मेहनत करनी पड़ी है। १९३३ में एक बच्ची का जन्म हुआ था जिसने ९ वर्ष की आयु में ही अपने पिता को खो दिया। जब वो १६ वर्ष की हुईं तो एक ३१ वर्षीय आदमी से अपने परिवार के ख़िलाफ़ जाकर प्रेम-विवाह कर लिया। और इस वजह से उनके परिवार ने उनसे रिश्ता तोड़ लिया। और अफ़सोस की बात यह कि ससुराल वालों ने भी उनके साथ दुर्व्यवहार किया। अपने बच्चों को पालने के लिए वो पार्श्वगायन के मैदान में उतरीं। गर्भवती अवस्था में भी उन्हें कड़ी मेहनत करनी पड़ी। आगे चलकर उन्होंने अपने बच्चों को लेकर हमेशा के लिए अपने पति का घर छोड़ दिया। पार्श्वगायन में शुरु शुरु में उन्हें कमचर्चित संगीतकारों के लिए ही गाने के मौके मिलते थे, जिस वजह से सफलता उनसे दूर दूर ही रहती, लेकिन १० वर्षों तक लगातार संघर्ष करने के बाद सफलता आख़िर उनके क़दमों पे आकर गिर ही पड़ीं, और आज 'आशा भोसले' का नाम बच्चे बच्चे की ज़ुबान पर फिरता है। 'कोमल है कमज़ोर नहीं' की नौवीं कड़ी है आशा जी के नाम। आशा जी के बारे में और नया क्या बताऊँ, चलिए आज उनको मिले पुरस्कारों पर एक नज़र डालते हैं। उन्हें फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार से १९६७, १९६८, १९७१, १९७२, १९७३, १९७४, १९७७ और २००० में सम्मानित किया गया है। राष्ट्रीय पुरस्कार उन्हें मिले १९८१ और १९८६ में। अन्य पुरस्कारों में शामिल हैं नाइटिंगेल ऒफ़ एशिया अवार्ड (१९८७), मध्य प्रदेश शासन पदत्त लता मंगेशकर अवार्ड (१९८९), स्क्रीन विडिओकोन अवार्ड (१९९७, २००२), एम.टी.वी अवार्ड (१९९७, २००१), चैनल वी अवार्ड (१९९७), दयावती मोदी अवार्ड (१९९८), महाराष्ट्र शासन प्रदत्त लता मंगेशकर अवार्ड (१९९९), सिंगर ऒफ़ दि मिलेनियम अवार्ड (२०००), ज़ी गोल्ड बॊलीवूड अवार्ड (२०००), बी.बी.सी. लाइफ़टाइम अचीवमेण्ट अवार्ड (२००२), ज़ी सिने अवार्ड (२००२), सैन्सुइ मूवी अवार्ड (२००२), स्वरालय येसुदास अवार्ड (२००२), इण्डियन चेम्बर ऒफ़ कॊमर्स प्रदत्त लिविंग् लिजेण्ड अवार्ड (२००४) आदि। लेकिन इन सब से भी बड़ा पुरस्कार है उनके असंख्य चाहनेवालों का प्यार जो उन्हें बराबर मिलता आया है और आगे भी मिलता रहेगा।

आशा भोसले को सलाम करने के लिए हमने जो गीत चुना है, वह वही गीत है जिसके मुखड़े की पंक्ति से प्रेरीत होकर हमनें इस शृंखला का शीर्षक रखा है "कोमल है कमज़ोर नहीं"। जी हाँ, यह फ़िल्म 'आख़िर क्यों?' का गीत है जो फ़िल्माया गया है स्मिता पाटिल पर। इस फ़िल्म की कहानी कुछ ऐसी थी कि निशा (स्मिता पाटिल) अपने पति कबीर (राकेश रोशन) के साथ ख़ुशी ख़ुशी जीवन बिता रही होती हैं। लेकिन जल्द ही निशा के जीवन में प्रलय आ जाती है जब उन्हें पता चलता है कि कबीर का उसकी की बहन इंदु (टिना मुनीम) के साथ संबंध है। निशा अपनी बेटी को लेकर घर छोड़ देती है और फिर शुरु होता है उसका संघर्ष। वो अपने पैरों पर खड़ी होती है, लड़कियों के एक स्कूल में म्युज़िक टीचर की नौकरी करती है और अपनी बेटी को पालती है। और इस सफ़र में उसका हमसफ़र बनने के लिए उसके जीवन में आता है लेखक आलोक (राजेश खन्ना)। जे. ओम प्रकाश निर्देशित १९८५ की फ़िल्म 'आख़िर क्यों?' की पटकथा व संवाद लिखीं डॊ. अचला नागर नें। राजेश रोशन का संगीत था तथा इंदीवर के लिखे इस फ़िल्म के गीतों को ख़ूब लोकप्रियता मिली थी। "दुश्मन न करे दोस्त ने वो काम किया है", "एक अंधेरा लाख सितारे", "सात रंग में खेल रही है दिलवालों की टोली रे" और "शाम हुई चढ़ आयी रे बदरिया" जैसे कामयाब गीतों के साथ साथ आज का प्रस्तुत गीत भी काफ़ी सुना गया। आज का यह गीत इस शृंखला के लिए बहुत ही सटीक है, इसके एक एक शब्द से नारी-शक्ति की ख़ुशबू आती है। कविता की शैली में लिखा यह गीत सुनने से पहले पढ़िए इसके बोल...

कोमल है कमज़ोर नहीं तू,
शक्ति का नाम ही नारी है,
जग को जीवन देनेवाली,
मौत भी तुझसे हारी है।

सतियों के नाम पे तुझे जलाया,
मीरा के नाम पे ज़हर पिलाया,
सीता जैसी अग्नि-परीक्षा
जग में अब तक जारी है।

इल्म हुनर में दिल दिमाग में
किसी बात में कम तू नहीं,
पुरुषों वाले सारे ही
अधिकारों की अधिकारी है।

बहुत हो चुका अब मत सहना,
तुझे इतिहास बदलना है,
नारी को कोई कह ना पाये
अबला है बेचारी है।

'कोमल है कमज़ोर नहीं' का यह अंक समर्पित है आशा भोसले स्मिता पाटिल और डॊ. अचला नागर के नाम!



क्या आप जानते हैं...
कि आशा भोसले नें भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेज़ी, रूसी और मलय भाषाओं में भी गीत गाये हैं।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 10/शृंखला 12
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - महान लता को समर्पित है ये अंक, तो चंद सवाल उन्हीं के बारे में आज.

सवाल १ - लता ने अपना पहला पार्श्वगायन किस संगीतकार के लिए किया था - २ अंक
सवाल २ - उनके सबसे पहले गाये गीत "मैं खिली खिली" में किसने उनका साथ दिया था यानी आवाज़ मिलाई थी - ३ अंक
सवाल ३ - प्रस्तुत गीत के संगीतकार ने एक मराठी फिल्म में चारों मंगेशकर बहनों को एक साथ गवाया था, क्या है उस मराठी फिल्म का नाम - ४ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अंजाना जी आज आखिरी मौका है, कुछ कर गुजरिये....

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, March 2, 2011

मुकाबला हमसे न करो....कभी कभी खिलाड़ी अपने जोश में इस तरह का दावा भी कर बैठते हैं

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 604/2010/304

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार और स्वागत है आप सभी का इस स्तंभ में। तो कहिए दोस्तों, कैसा चल रहा है आपका क्रिकेट विश्वकप दर्शन? आपको क्या लगता है कौन है फ़ेवरीट इस बार? क्या भारत जीत पायेगा २०११ क्रिकेट विश्वकप? किन खिलाड़ियों से है ज़्यादा उम्मीदें? ये सब सवाल हम सब इन दिनों एक दूसरे से पूछ भी रहे हैं और ख़ुद भी अंदाज़ा लगाने की कोशिशें रहे हैं। लेकिन हक़ीक़त सामने आयेगी २ अप्रैल की रात जब विश्वकप पर किसी एक देश का आधिपत्य हो जायेगा। पर जैसा कि पहली कड़ी में ही हमने कहा था, जीत ज़रूरी है, लेकिन उससे भी जो बड़ी बात है, वह है पार्टिसिपेशन और स्पोर्ट्समैन-स्पिरिट। इसी बात पर आइए आज एक बार फिर कुछ रोचक तथ्य विश्वकप क्रिकेट से संबंधित हो जाए!

• पहला विश्वकप मैच जो जनता के असभ्य व्यवहार की वजह से बीच में ही रोक देना पड़ा था, वह था १९९६ में कलकत्ते का भारत-श्रीलंका सेमी-फ़ाइनल मैच।
• १९९६ में श्रीलंका पहली टीम थी जिसने बाद में बैटिंग कर विश्वकप फ़ाइनल मैच जीता।
• २००३ विश्वकप में पाकिस्तान के शोएब अख़्तर ने क्रिकेट इतिहास में पहली बार १०० माइल प्रति घण्टे की रफ़्तार से गेंद डाली इंगलैण्ड के निक नाइट के ख़िलाफ़।
• २००३ विश्वकप में कनाडा के जॊन डेविसन ने ६७ गेंदों में शतक लगाई वेस्ट इंडीज़ के ख़िलाफ़, जो विश्वकप इतिहास का 'फ़ास्टेस्ट' शतक था।
• सचिन तेन्दुलकर विश्वकप में कुल आठ बार 'मैन ऒफ़ दि मैच' बनें; उनके बाद विवियन रिचार्ड्स पाँच बार, ब्रायन लारा चार बार और गॊर्डन ग्रीनिज तीन बार इस ख़िताब को जीता।
• २००२/२००३ विश्वकप में केवल १७ वर्ष और ७ दिन की उम्र में खेलने वाले बंगलादेश के तल्हा ज़ुबैर विश्वकप क्रिकेट इतिहास के सब से कम उम्र के खिलाड़ी हुए।
• १९९५/१९९६ में नेदरलैण्ड्स के एन.ई. क्लार्क विश्वकप के इतिहास के सब से प्रवीण खिलाड़ी थे, उस वक़्त उनकी आयु थी ४७ वर्ष और २५७ दिन।

इस 'खेल खेल में' शृंखला की कल की कड़ी में आपने सुना था "आ देखें ज़रा, किसमें कितना है हम", यानी कि चैलेंज से लवरेज़ एक जोशिला गीत। किसी को चैलेंज करने में कोई बुराई नहीं जब तक इंसान में आत्मविश्वास है, साहस है, कॊन्फ़िडेन्स है। लेकिन जब कॊन्फ़िडेन्स ओवर-कॊन्फ़िडेन्स में बदल जाता है, और साहस दुस्साहस में, तो ज़रा मुश्किल वाली बात हो सकती है, मंज़िल करीब आते आते दूर ही रह जाती है। आज हम जिस गीत को सुनवाने के लिए ले आये हैं, उससे भी ओवर-कॊन्फ़िडेन्स की थोड़ी सी बू जैसी आ रही है। १९६९ की फ़िल्म 'प्रिंस' का यह गीत है "मुक़ाबला हमसे ना करो, मुक़ाबला हमसे ना करो, हम तुम्हे अपने रंग में रंग डालेंगे एक ही पल में"। पर्दे पर तीन ज़बरदस्त डान्सर्स - शम्मी कपूर, वैजयंतीमाला और हेलेन, और उनके प्लेबैक के लिए तीन लेजेंडरी आवाज़ें - मोहम्मद रफ़ी, लता मंगेशकर और आशा भोसले। शंकर जयकिशन का धमाकेदार संगीत और सिचुएशन के मुताबिक पुर-असर अल्फ़ाज़ हसरत जयपुरी साहब के। कुल मिलाकर प्रतियोगितामूलक गीतों के जौनर का एक मीलस्तंभ गीत। तो आइए २०११ विश्वकप क्रिकेट के उत्साह और जोश को थोड़ा सा और बढ़ावा देते हैं इस जोशीले नग़मे के ज़रिए।



क्या आप जानते हैं...
कि लता मंगेशकर और आशा भोसले के किसी तीसरे गायक के साथ गाये गीतों की फ़ेहरिस्त में आख़िरी गाना था फ़िल्म 'आइना' का शीर्षक गीत "आइना है मेरा चेहरा" जिसे मंगेशकर बहनों ने सुरेश वाडकर के साथ मिलकर गाया था।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 05/शृंखला 11
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - एक आवाज़ है लता जी की.

सवाल १ - फिल्म के निर्देशक कौन है - ३ अंक
सवाल २ - सह गायक कौन हैं - २ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
क्या बात है तीन नाम लगभग एक मिनट से भी पहले बता दिए गए, दोनों योद्धाओं के द्वारा....कमाल है...बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, February 28, 2011

जिंदगी है खेल कोई पास कोई फेल....भई कोई जीतेगा तो किसी की हार भी निश्चित है, जीवन दर्शन ही तो है ये खेल भी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 602/2010/302

क्रिकेट-फ़ीवर से आक्रांत सभी दोस्तों को हमारा नमस्कार, और बहुत स्वागत है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में। २०११ विश्वकप क्रिकेट जारी है इन दिनों और हम भी इस महफ़िल में बातें कर रहे हैं क्रिकेट विश्वकप की लघु शृंखला 'खेल खेल में' के माध्यम से। आइए आज विश्वकप से जुड़े कुछ रोचक तथ्य आपको बताएँ।

• १९९९ विश्वकप में बंगलादेश ने एक मैच में पाकिस्तान को हराकर पूरे विश्व को चकित कर दिया था। ५ मार्च को नॊर्थम्प्टन में यह मैच खेला गया था। इसके अगले संस्करण में बांग्लादेश के भारत को पछाड कर हमारे कप के अभियान को मिट्टी में मिला दिया था, विश्व कप में अक्सर छोटी टीमें इस तरह के चमत्कार कर रोमाच बनाये रखती है, और यहीं से ये छोटी टीमें ताकतवर टीमों में तब्दील होती रहीं है, गौरतलब है कि १९८३ में भारत की गिनती भी एक कमजोर
टीम में होती थी, मगर भारत का करिश्मा एक मैच तक नहीं वरन विश्व कप जीतने तक जारी रहा.
• विश्वकप में अब तक सर्वश्रेष्ठ बोलिंग रेकॊर्ड रहा है वेस्ट-ईंडीज़ के विन्स्टन डेविस का, जिन्होंने १९८३ के विश्वकप में ऒस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ ५१ रन देकर ७ विकेट लिए थे।
• ऒस्ट्रेलिया के डॆविड बून एक ऐसे विकेट-कीपर हैं जिन्होंने पहली और आख़िरी बार १९९२ के विश्वकप में भारत के ख़िलाफ़ एक मैच में विकेट-कीपिंग की थी।
• लीजेण्डरी प्लेयर सर गारफ़ील्ड सोबर्स १९७५ के विश्वकप में चोट की वजह से नहीं खेल पाये और उनकी जगह ली रोहन कन्हाई ने। ज़रूरी बात यह कि सोबर्स ने अपनी पूरी क्रिकेट करीयर में केवल एक एक-दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय मैच खेला है सन् १९७३ में।
• जिम्बावे ने अपनी विश्वकप का सफ़र १९८३ में शुरु किया था और पहले ही मैच में ऒस्ट्रेलिया को हराकर दुनिया को चकित कर दिया था। लेकिन उसके बाद १९९२ तक ज़िमबाबवे को कोई जीत नसीब नहीं हुई। १९९२ में उसने इंगलैण्ड पर विजय प्राप्त की।

'खेल खेल में' शृंखला की दूसरी कड़ी के लिए आज हमने जो गीत चुना है, उसमें भी जीवन का एक दर्शन छुपा हुआ है। दोस्तों, अक्सर हम यह देखते हैं कि कोई बहुत अच्छा खिलाड़ी भी कभी कभी मात खा जाता है। सचिन भी शून्य पर आउट होता है कभी कभी। हर खिलाड़ी के लिए हर दिन एक समान नहीं होता। और यही बात लागू होती है हमारी ज़िंदगी के खेल के लिए भी। सुख-दुख, हार-जीत, उतार-चढ़ाव, धूप-छाँव, ये सब जोड़ी में ही ज़िंदगी में आते हैं, और एक के बिना दूसरे का भी मज़ा नहीं आता। ज़िंदगी का यह खेल बड़ा निराला है, इसमें कभी कोई खिलाड़ी है तो कभी वही अनाड़ी भी सिद्ध होता है। लेकिन हार से कभी हार न मानें, बल्कि उससे सबक लेकर दोबारा प्रयास कर उस हार को जीत में बदलें, शायद यही संदेश इन सब बातों से हम निकाल सकते हैं। फ़िल्म 'सीता और गीता' का हास्य रंग में ढला आशा भोसले और मन्ना डे का गाया गीत "ज़िंदगी है खेल, कोई पास कोई फ़ेल" एक लोकप्रिय गीत रहा है, और अक्सर 'विविध भारती' के जीवन दर्शन पर आधारित कार्यक्रम 'त्रिवेणी' का भी हिस्सा बनता है। और आज से यह गीत हिस्सा है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का भी। राहुल देव बर्मन का संगीत, आनंद बक्शी का गीत, १९७२ की यह फ़िल्म, और यह गीत फ़िल्माया गया है धर्मेन्द्र और हेमा मालिनी पर। आइए इस चुलबुले लेकिन दार्शनिक गीत का हम सब मिल कर आनंद लें और साथ ही विश्वकप खेलने वाले सभी खिलाड़ियों को एक बार फिर 'best of luck' कहें।



क्या आप जानते हैं...
कि रमेश सिप्पी की फ़िल्म 'सीता और गीता' में हेमा मालिनी के डबल रोल वाले किरदारों से ही प्रभावित होकर दक्षिण के निर्माता पूर्नचन्द्रराव अतलुरी ने १९८९ में 'चालबाज़' फ़िल्म बनाई जिसमें ये किरदार निभाये श्रीदेवी ने।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 03/शृंखला 11
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -खुद संगीतकार की भी आवाज़ है गीत में.

सवाल १ - गीत में एक कलाकार खुद अपना ही किरदार निभाते हुए नज़र आते हैं जिनकी अतिथि भूमिका है इस फिल्म के इस खास गीत में, कौन हैं ये - ३ अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - गीतकार बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
एक बार फिर मुकाबला बराबरी पर है देखते हैं कौन पहले बढ़त बनाता है....शरद जी अब जब आपको तगड़े खिलाड़ी मिले हैं तो आप पीछे हट रहे हैं...ये तो गलत है सर

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, February 9, 2011

"सातों बार बोले बंसी" और "जाने दो मुझे जाने दो" जैसे नगीनों से सजी है आज की "गुलज़ार-आशा-पंचम"-मयी महफ़िल

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #११०

बाद मुद्दत के फिर मिली हो तुम,
ये जो थोड़ी-सी भर गई हो तुम,
ये वज़न तुम पर अच्छा लगता है..

अभी कुछ दिनों पहले हीं भरी-पूरी फिल्मफेयर की ट्रॉफ़ी स्वीकार करते समय गुलज़ार साहब ने जब ये पंक्तियाँ कहीं तो उनकी आँखों में गज़ब का एक आत्म-विश्वास था, लहजे में पिछले ४८ सालों की मेहनत की मणियाँ पिरोई हुई-सी मालूम होती थीं और बालपन वैसा हीं जैसे किसी पाँचवे दर्ज़े के बच्चे को सबसे सुंदर लिखने या सबसे सुंदर कहने के लिए "इन्स्ट्रुमेंट बॉक्स" से नवाज़ा गया हो। उजले कपड़ों में देवदूत-से सजते और जँचते गुलज़ार साहब ने अपनी उम्र का तकाज़ा देते हुए नए-नवेलों को खुद पर गुमान करने का मौका यह कह कर दे दिया कि "अच्छा लगता है, आपके साथ-साथ यहाँ तक चला आया हूँ।" अब उम्र बढ गई है तो नज़्म भी पुरानी होंगी साथ-साथ, लेकिन "दिल तो बच्चा है जी", इसलिए हर दौर में वही "छुटभैया" दिल हर बार कुछ नया लेकर हाज़िर हो जाता है। यूँ तो यह दिल गुलज़ार साहब का है, लेकिन इसकी कारगुजारियों का दोष अपने मत्थे नहीं लेते हुए, गुलज़ार साहब "विशाल" पर सारा दोष मथ देते हैं और कहते हैं कि "इस नवजवान के कारण हीं मैं अपनी नज़्मों को जवान रख पाता हूँ।" अब इसे गुलज़ार साहब का बड़प्पन कहें या छुटपन.. लेकिन जो भी हो, इतना तो मानना पड़ेगा कि लगभग पचास सालों से चल रही इनकी लेखनी अब भी दवात से लबालब है.. अब भी दिल पर वही सुंदर-से "हस्ताक्षर" रचती रहती है.. वही गोल-गोल अक्षर.. गोल-गोल अंडा, मास्टर-जी का डंडा, बकड़ी की पूँछ, मास्टर-जी की मूँछ... और लो बन गया "क".. ऐसे हीं प्यारे-प्यारे तरीकों से और कल्पना की उड़ानों के सहारे गुलज़ार साहब हमारे बीच की हीं कोई चीज हमें सौंप जाते हैं, जिसका तब तक हमें पता हीं नहीं होता। ८ सितम्बर १९८७ को भी यही बात हुई थी। उस दिन जब गुलज़ार साहब ने हमें "दिल" का अड्डा बताया, तभी हमें मालूम हुआ कि यह नामुराद कोई और नहीं "हमारा पड़ोसी है", यह ऐसा पड़ोसी है जो "हमारे ग़म उठा लेता है, लेकिन हमारे ग़मों को दूर नहीं करता" तभी तो गुलज़ार साहब कहते हैं:

हाँ मेरे ग़म तो उठा लेता है, ग़मख्वार नहीं,
दिल पड़ोसी है, मगर मेरा तरफ़दार नहीं..


("ये जो थोड़ी-सी भर गई हो तुम..." यह सुनकर आपको नहीं लगता कि शायर ने किसी खास के लिए ये अल्फ़ाज़ कहे हैं। अलग बात है कि फिल्मफेयर की बलैक-लेडी पर भी ये पंक्तियाँ सटीक बैठती हैं, लेकिन पवन झा जी की मानें तो गुलज़ार साहब ने कुछ सालों पहले "एक खास" के लिए यह नज़्म लिखी थी.. वह खास कौन है? यह पूछने की ज़रूरत भी है क्या? :) )

हाँ तो हम गुलज़ार साहब और "दिल पड़ोसी है" की बातें कर रहे थे। इस एलबम के एक-एक गीत को गुलज़ार साहब ने इतनी शिद्दत से लिखा है (वैसे ये हर गीत को उतनी हीं मेहनत, शिद्दत और हसरत से रचते हैं) कि मुझसे अपनी पसंद के एक या दो गाने चुनते नहीं बन रहे। "कोयले से हीरे को ढूँढ निकाला जा सकता है, लेकिन जहाँ हीरे हीं हीरे हो वहाँ पारखी का सर घूम न जाए तो कहना।" वैसे मैं अपने आप को पारखी नहीं मानता लेकिन हीरों के बीच बैठा तो ज़रूर हूँ।.... शायद एक-एक हीरा परखता चलूँ तो कुछ काम बने। अब ज़रा इसे देखिए:

चाँद पेड़ों पे था,
और मैं गिरजे में थी,
तूने लब छू लिए,
जब मैं सजदे में थी,
कैसे भूलूँगी मैं, वो घड़ी गश की थी,
ना तेरे बस की थी, ना मेरे बस की थी..
(रात क्रिसमस की थी)

या फिर इसे:

माँझी रे माँझी, रमैया माँझी,
मोइनी नदी के उस पार जाना है,
उस पार आया है जोगी,
जोगी सुना है बड़ा सयाना है..

शाम ढले तो पानी पे चलके पार जाता है,
रात की ओट में छुपके रसिया मोहे बुलाता है,
सोना सोना, जोगी ने मेरा
जाने कहाँ से नाम जाना है..
(माँझी रे माँझी)

यहाँ पर माँझी और मोइनी नदी के बहाने "माया-मोह" की दुनिया के उस पार बसे "अलौकिक" संसार की बात बड़े हीं खूबसूरत और सूफ़ियाना तरीके से गुलज़ार साहब ने कह दी है। ऐसी हीं और भी कई सारी नज़्में हैं इस एलबम में जिसमें गुलज़ार, पंचम और आशा की तिकड़ी की तूती गूँज-गूँज कर बोलती है। जिस तरह हमने पिछली कड़ी में खुद इन दिग्गजों से हीं इनकी पसंद-नापसंद और गानों के बनने की कहानी सुनी थी, उसी तरह आज भी क्यों न वह बागडोर इन्हीं को सौंप दी जाए। (साभार: सजीव जी एवं सुजॉय जी)

आशा: "सातों बार बोले बंसी"

पंचम: इसके बारे में गुलज़ार, तुम बताओ।

गुलज़ार: "सातों बार बोले बंसी, एक हीं बार बोले ना.. तन की लागी सारी बोले, मन की लागी खोले ना".. ये गाने में खास बात ये है कि बांसुरी को "पर्सोनिफ़ाई" करके देखिए आप।

पंचम: कैसे?

गुलज़ार: जितनी फूंक तन पे लगती है, उतनी हीं बार बोलती है लेकिन अंदर की बात नहीं बताती। उसके सुर सात हैं, सातों बोलते हैं, जो चुप रहती है जिस बात पे, वो नहीं बोलती।

आशा: वाह!

गुलज़ार: उसमें खूबसूरत बात ये है कि उसको "पर्सोनिफ़ाई" करके देखिए। किस तरह से वो उठके कृष्णा के मुँह लगती है, मुँह लगी हुई है, मुँह चढी हुई है, और वो सारी बातें कहती है, एक जो उसका अपनापन है, वो चुप है, वो नहीं बोलती, उन सात सुरों के अलावा। उसके सारी "इलस्ट्रेशन" जितनी है, वो बाँसुरी के साथ "पर्सोनिफ़ाई" करके देखिए आप।

पंचम: ये गाने में थोड़ा लयकारी भी किया था, सरगम भी किए थे, बड़ा अच्छा था।

आशा: और उसमें बाँसुरी साथ में बोल रही है, और आवाज़ भी आ रही है, तो समझ में नहीं आ रहा कि बाँसुरी बोल रही है कि राधा बोल रही है।

गुलज़ार: हाँ, वही, उसमें "परसोनिफ़िकेशन" है सारी की सारी। फूंक पे बोलती है और वो फूंक पे हीं बोलती है बाँसुरी।

अब चूँकि गुलज़ार साहब ने इस गाने को बड़ी हीं बारीकी से समझा दिया है, इसलिए मुझे नहीं लगता है मुझे कुछ और कहने की ज़रुरत पड़ेगी। तो चलिए पढते और सुनते हैं यह गाना:

सातों बार बोले बंसी,
एक ही बार बोले ना,
तन की लागी सारी बोले,
मन की लागी खोले ना..

चुपके सुर में भेद छुपाये,
फूँक-फूँक बतलाये,
तन की सीधी मन की घुन्नी,
पच्चीस पेंचे खाए,
हो.. हाँ बोले ना बोले ना,
हाँ बोले ना बोले ना..

प्रीत की पीड़ा जाने मुई,
छाती छेद पड़े,
उठ-उठ के फिर मुँह लगती है,
कान्हा संग लड़े,
हो.. हाँ बोले ना बोले ना,
हाँ बोले ना बोले ना..




नियम से तो हमें बस एक हीं गाने तक अपनी महफ़िल को सीमित रखना चाहिए था, लेकिन बात जब इस "स्वर्णिम" तिकड़ी की हो रही हो तो एक से किसका मन भरता है! यूँ भी हम जितना इनके गाने सुनेंगे, उतना हीं हमें संगीत की बारीकियाँ जानने को मिलेंगी। पंचम दा की यही तो खासियत रही थी कि वे संगीत को बस "ट्रेडिशनल" एवं "कन्वेशनल" वाद्य-यंत्रों तक घेरकर नहीं रखते थे, बल्कि "बोल" के हिसाब से उसमे "रेलगाड़ी की सीटी", "मुर्गे की बाँग", "जहाज का हॉर्न" तक डाल देते थे। तभी तो सुनने वाला इनके संगीत की ओर खुद-ब-खुद खींचा चला आता था। जहाँ तक आशा ताई की बात है, तो इनके जैसा "रेंज" शायद हीं किसी गायिका के पास होगा। ये जितने आराम से "दिल चीज़ क्या है" गाती हैं, उतनी हीं सहूलियत से "दम मारो दम" को भी निभा जाती हैं। अब जहाँ ये तीनों अलग-अलग इतने करामाती हैं तो फिर साथ आ जाने पर "क़यामत" तो आनी हीं है। आशा जी "दिल पड़ोसी है" को अपना सर्वश्रेष्ठ एलबम मानती है.. तभी तो गुलज़ार साहब को उनके जन्मदिवस पर बधाई-संदेश भी इसी के रंग में रंगकर भेज डालती हैं: "भाई जन्म-दिन मुबारक। पंचम, आप और मैं खंडाला में, दिल पड़ोसी है के दिन, मैं जिंदगी में कभी नहीं भूलूंगी।" हम भी इस तिकड़ी को कभी नहीं भूलेंगे। इसी वादे और दावे के साथ चलिए अगली बातचीत और अगले गाने का लुत्फ़ उठाते हैं:

आशा(गाती हैं): "जेते दाओ आमाए डेको ना... "

गुलज़ार: वाह!

पंचम: ये तो आप बंगाली में गा रही हैं.. "प्रोग्राम" का हिन्दी गानों का है।

आशा: हिन्दी हो, पंजाबी हो, चाहे टिम्बकटु की ज़बान हो, गाना सुर जहाँ अच्छे, मतलब जहाँ अच्छा, वो गाना अच्छा होता है।

गुलज़ार: सच में आशा जी, मैंने इसके कई बंगाली गाने चुराए हैं।

आशा: अच्छा?

गुलज़ार: हाँ, बहुत बार। ये पूजा के लिए जो गाने करते हैं, तो मैं पास बैठे हुए, कई बार धुन बहुत अच्छी लगी, जैसे एक, उसके पूरे बंगाली के बोल मुझे याद नहीं, और गौरी दा "फ़ेमस पोयट फ़्रॉम बंगाल"

आशा: गौरी शंकर मजुमदार

गुलज़ार: जी हाँ, और इनके बोल चल रहे थे पूजा के गाने के "आस्थे आमार देरी होबे"

पंचम: आ हा हा

गुलज़ार: उसपे वो गाना लिखा था उस ट्युन पर.. "तेरे बिना ज़िंदगी से कोई शिकवा तो नहीं"

पंचम: ये उसी का गाना?

गुलज़ार: हाँ, आँधी में। और ये भी उसी तरह का गाना इनका, जिसपे आप अभी गा रहीं थीं, "जेते दाव आमाय"

आशा: "दिल पड़ोसी है" में.. (गाती हैं) "जाने दो मुझे जाने दो"।

और ये रहे उस गाने के बोल:

जाने दो मुझे जाने दो
रंजिशें या गिले, वफ़ा के सिले
जो गये जाने दो
जाने दो मुझे जाने दो

थोड़ी ख़लिश होगी, थोड़ा सा ग़म होगा,
तन्हाई तो होगी, _______ कम होगा
गहरी ख़राशों की गहरी निशानियाँ हैं
चेहरे के नीचे कितनी सारी कहानियाँ हैं
माज़ी के सिलसिले, जा चुके जाने दो
ना आ आ..

उम्मीद-ओ-शौक़ सारे लौटा रही हूँ मैं,
रुसवाई थोड़ी-सी ले जा रही हूँ मैं
बासी दिलासों की शब तो गुज़ार आये
आँखों से गर्द सारी रोके उतार आये
आँखों के बुलबुले बह गये, जाने दो
ना आ आ..




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल/नज़्म हमने पेश की है, उसके एक शेर/उसकी एक पंक्ति में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल/नज़्म को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "आँगन" और मिसरे कुछ यूँ थे-

ओस धुले मुख पोछे सारे
आँगन लेप गई उजियारे

इस शब्द पर ये सारे शेर/रूबाईयाँ/नज़्म महफ़िल में कहे गए:

आँगन में चहकें गौरैयाँ छत पर बैठा काग
जाड़ों की धूप सलोनी उस पर तेरा ये राग. - शन्नो जी

जिस आँगन में सजन संग हुए फेरे ,
अपनों का सुहाना मंजर याद आए रे - मंजु जी

कोई हँसता है तो तुमसा लगता है
दिल धड़कता है तो तुमसा लगता है
किसी सुबह मेरे आंगन मैं ओस से भीगा
कोई जब फूल खिलता है तो तुमसा लगता है - अवनींद्र जी

बहुत याद आती है
आँगन में लेटी हुई ,
कहानी सुनाती हुई वो मेरी
अम्मा (दादी ) - नीलम जी

डॉक्टर साहब महफ़िल की शुरूआत आपकी टिप्पणी से हुई, मेरे लिए इससे बड़ी बात क्या होगी। आपने सही कहा कि पंचम के गुजरने के बाद अकेले पड़े गुलज़ार के लिए विशाल भारद्वाज राहत की साँस की तरह आए हैं। वैसे बीच-बीच में "भूपिंदर" भी ऑक्सीजन की झलक दिखाते रहते हैं। लेकिन गुलज़ार तो गुलज़ार हैं। इन्हें कहीं एक छोटी-सी चिनगी भी दिख गई तो ये उसे आग में तब्दील करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। इसलिए हमें फ़िक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं है। हम तो बस उन पढते और लिखते जाएँगे, बस आप ऐसे हीं हमारा हौसला-आफ़ज़ाई करते रहें। शन्नो जी, घर छोड़कर कहाँ जाएँगीं आप.. आखिरकार लौटकर तो यहीं आना है :) सुजॉय जी, लीजिए हमने आज आपकी फ़रमाईश पूरी कर दी.. आप भी क्या याद करेंगे! मंजु जी, अवनींद्र जी एवं नीलम जी, आपकी स्वरचित पंक्तियों ने महफ़िल के सूनेपन को समाप्त करने में हमारी सहायता की। इसके लिए हम आपके तह-ए-दिल से आभारी हैं। पूजा जी, दिलीप जी से हमारा परिचय कराने के लिए आपका धन्यवाद! लेकिन यह क्या.. शेर किधर हैं? अगली बार ध्यान रखिएगा।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, January 26, 2011

अपने पडो़सी दिल से भीनी-भीनी भोर की माँग कर बैठे गोटेदार गुलज़ार साहब, आशा जी एवं राग तोड़ी वाले पंचम दा

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #१०९

गुलज़ार और पंचम - ये दो नाम दो होते हुए भी एक से लगते हैं और जब भी इन दोनों का नाम साथ में आता है तो सुनने वालों को मालूम हो जाता है कि कुछ नया कुछ अलबेला पक के आने वाला है बाहर.. अभी-अभी पतीला खुलेगा और कोई मीठी-सी नज़्म छलकते हुए हमारे कानों तक पहुँच जाएगी। ये दोनों फ़नकार एक-दूसरे के पूरक-से हो चले थे। कैसी भी घुमावदार सोच हो, किसी भी मोड़ पर बिन कहे मुड़ने वाले मिसरे हों या फिर किसी अखबार की सुर्खियाँ हीं क्यों न हो.. गुलज़ार के हरेक शब्द-नुमा ईंट का जवाब पंचम अपने सुरों के पत्थर (अजीब उपमा है.. यूँ होना तो फूल चाहिए, लेकिन मुहावरा बनाने वाले ने हमारे पास कम हीं विकल्प छोड़े हैं) से दिया करते थे... और जवाब ऐसा कि "साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे".. गुलज़ार के शब्द जहाँ शिखर पर हीं मौजूद रहें, वहीं उसी के इर्द-गिर्द पंचम अपनी पताका भी लहरा आएँ... तभी तो दोनों की जोड़ी आजतक प्यार और गुमान से याद की जाती है।

लेकिन यह जोड़ी ज्यादा दिनों तक रह नहीं पाई। गुलज़ार को राह में अकेले छोड़कर पंचम दुसरी दुनिया में निकल लिए। पंचम के गुजरने का असर गुलज़ार पर किस हद तक पड़ा, इसका अंदाजा पंचम की याद में लिखे गुलज़ार के इस नज़्म से लगाया जा सकता है:

याद है बारिशों का दिन, पंचम

याद है जब पहाड़ी के नीचे वादी में
धुंध से झांककर निकलती हुई
रेल की पटरियां गुज़रती थीं
धुंध में ऐसे लग रहे थे हम
जैसे दो पौधे पास बैठे हों
हम बहुत देर तक वहां बैठे
उस मुसाफिर का जिक्र करते रहे
जिसको आना था पिछली शब, लेकिन
उसकी आमद का वक्‍त टलता रहा
देर तक पटरियों पर बैठे हुए
रेल का इंतज़ार करते रहे
रेल आई ना उसका वक्‍त हुआ
और तुम, यूं ही दो क़दम चलकर
धुंध पर पांव रखके चल भी दिए

मैं अकेला हूं धुंध में 'पंचम'...


पंचम की क्षति अपूर्णीय है.. जितना गुलज़ार के लिए उतना हीं संगीत के अन्य साधकों के लिए भी... पंचम के गए पूरे सत्रह बरस हो गए, गए ४ जनवरी को उनकी पुण्य-तिथि थी। मैंने जब यह "आलेख" लिखना शुरू किया था तो यह सोचा नहीं था कि मेरी लेखनी पंचम को याद करने में डूब जाएगी, लेकिन भावनाओं का वह सैलाब बह निकला कि न मैं खुद को रोक पाया, न अपनी लेखनी को। बात जब गुलज़ार और पंचम की हो रही है तो क्यों न आज अपनी महफ़िल को इन्हीं दोनों की एक नज़्म से सजाया जाए।

हम आज की नज़्म तक पहुँचें, इससे पहले एक और फ़नकार से आपका परिचय कराना लाजिमी हो जाता है... मुआफ़ कीजिएगा, फ़नकार नहीं.. फ़नकारा। इन फ़नकारा के बिना गुलज़ार-पंचम की जोड़ी में उतनी जान नहीं, जोकि इनकी तिकड़ी में है। यह फ़नकारा कोई और नहीं, बल्कि पंचम दा की अर्धांगिनी आशा भोसले जी हैं, जिन्हें सारी दुनिया आशा ताई के नाम से पुकारती है। गुलज़ार साहब, पंचम दा और आशा ताई की तिकड़ी ने फिल्मों में एक से बढकर एक गीत दिए है। चंद नाम यहाँ पेश किए देता हूँ: --'क़तरा क़तरा‍ मिलती है', 'मेरा कुछ सामान', 'आंकी चली बांकी चली', 'आऊंगी एक दिन आज जाऊं' 'बड़ी देर से मेघा बरसा', 'बेचारा दिल क्‍या करे', 'छोटी सी कहानी से'... यह फेहरिश्त और भी बहुत लंबी है, लेकिन मेरे हिसाब से इतने उदाहरण हीं काफी हैं।

न सिर्फ़ फिल्मों में बल्कि इनकी तिकड़ी का कमाल "एलबमों" में भी नज़र आता है। "एलबमों" की बात करने पर जिस एलबम की याद सबसे पहले आती है, वह है "दिल पड़ोसी है"। इस एलबम को आशा ताई के जन्मदिन पर यानि कि ८ सितम्बर को १९८७ में रीलिज किया गया था। इसमें में कुल चौदह गाने थे(हैं)। आज आपको हम इस एलबम से "भीनी भीनी भोर आई" सुनवाने जा रहे हैं। अगली कड़ी में हम एलबम के बाकी गानों से रूबरू होंगे। इस गाने के बारे में हम कुछ कहें, इससे अच्छा होगा कि क्यों न इसके कारीगरों से हीं इसके बनने की कहानी सुन लें। "संगीत सरिता" कार्यक्रम के अंतर्गत "मेरी संगीत यात्रा" लेकर आ रहे हैं "गुलज़ार साहब, पंचम दा एवं आशा ताई" (सौजन्य: सजीव जी, सुजॉय जी)

पंचम दा: आशा जी, आपको याद है कोई गीत जो आपने काफ़ी मेहनत से गाया होगा?

आशा जी: हाँ, एक गीत आपने राग तोड़ी में बनाया था। वैसे तोड़ी में "धा" से पंचम लगाना चाहिए, पर फिल्मी गीत में अगर पूरा का पूरा राग वैसे हीं रख दिया जाए तो उस राग पर आधारित सभी गीत एक जैसे हीं लगेंगे। थोड़ी-बहुत चेंज करके अगर गीतों को ढाला जाए तो एक नयापन भी आता है और सुनने में भी अच्छा लगता है।

गुलज़ार साहब: हाँ सही बात है, अगर "क्लासिकल म्युज़िक" को मिसाल बनाकर कोई फिल्म बन रही है तब अलग बात है।

पंचम दा: गुलज़ार, आप को याद है "भीनी भीनी भोर".. "दिल पड़ोसी है" एलबम का ये पहला गाना रखा था हमने?

आशा जी: गुलज़ार भाई, आपने इस गाने में "गोटा" शब्द का बहुत खूबसूरत इस्तेमाल किया था।

गुलज़ार साहब: सोने की चमक की "उपमा" हमारे फिल्मी गीतों में काफ़ी पाई जाती है, कभी आग से, कभी धूप से। लेकिन हर चीज़ जो चमकती है वह सोना नहीं होती (तीनों हँसते हैं), हमारे यहाँ शादी में गोटेदार चुनरी देखने को मिलती है, तो उसी से मैंने यह लिया था।

आशा जी: लेकिन आपने तो बादल को गोटा लगाया था ना?

गुलज़ार साहब: मुझे लगता था कि गोटे की जो चुनरी है वो बहुत हीं खूबसूरत है। आशा जी, आपने कहा कि पंचम ने तोड़ी का "चलन" बदला, मुझे तो हमेशा हीं इसके चाल-चलने पर शक़ रहा है (तीनों ठहाका लगाते हैं), आपने कहा कि इन्होंने अपना चलन बदला! (हँसी ज़ारी है)

पंचम दा: यह सुबह का गाना था, इसमें हमने मुर्गियों की आवाज़ डाली थी, बहुत सारे "साउंड इफ़ेक्ट्स" थे कि जिससे सुबह का "वातावरण" सामने आए, एक आदत हो चुकी थी, अब आप इसे चलन कहिये, ऐसे कोई राग बन जाता हओ, "मूड" बन जाता है।

तो आपने देखा कि माहौल कितना खुशगवार हो जाता था, जब ये तीनों एक जगह आ जुटते थे। जब बातचीत इतनी सुरीली है तो संगीत के बारे में क्या कहा जाए! चलिए तो फिर हम भी राग तोड़ी में मुर्गिर्यों की बांग के बीच गुलज़ार साहब के "गोटे" का मज़ा लेते हैं और इस तिकड़ी को फिर से याद करते हैं (वैसे अगली कड़ी भी इसी तिकड़ी और इसी एलबम को समर्पित है):

भिनी भिनी भोर आई
भिनी भिनी भोर आई
रूप रूप पर छिडके सोना
स्वर्ण कलश चमकाती आई
भिनी भिनी भोर भोर आई ...

माथे सुनहरी टीका लगाये
पात पात पर गोटा लगाये
गोटा लगाई
सात रंग की जाई आई
भिनी भिनी भोर आई...

ओस धुले मुख पोछे सारे
_____ लेप गई उजियारे
उजियारे उजियारे
सा रे ग मा धा नि
जागो जगर की बेला आई
भिनी भिनी भोर आई...

भिनी भिनी भोर आई
रूप रूप पर छिडके सोना
रूप रूप पर छिडके सोना
स्वर्ण कलश चमकाती आई
भिनी भिनी भोर आई
भिनी भिनी भोर आई.....




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल/नज़्म हमने पेश की है, उसके एक शेर/उसकी एक पंक्ति में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल/नज़्म को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "ऊँगली" और मिसरे कुछ यूँ थे-

नज़र नीची किए दाँतों में ऊँगली को दबाती हो,
इसी को प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं।

इस शब्द पर ये सारे शेर/रूबाईयाँ/नज़्म महफ़िल में कहे गए:

उँगली उठाना बड़ा आसां होता है किसी पे
लोग अपनी कमियों की बात करते नहीं हैं. - शन्नो जी ( इशारा किसकी तरफ़ है? :) )

उसका अँगुली पकडना गजब ढा गया ,
उसका प्रेम का इजहार गजब ढा गया - मंजु जी (ये पंक्तियाँ शेर बनते-बनते रह गई.. कुछ कमी है कहीं न कहीं)

वो चीरता रहा मेरे हृदय को,
मैं देखता रहा फिर भी समय को
ऊँगली उठा रहा था वो मेरी तरफ मगर,
छुपा रहा था शायद वो अपने भय को - अवनींद्र जी (इस बार आपका चिरपरिचित जादू कहीं गायब मालूम पड़ता है)

उँगलिया उठेगी सुखे हुए बालो की तरफ,
एक नजर डालेंगें बीते हुए सालो की तरफ - कफ़ील आज़र.. हमने इनपर पूरी की पूरी एक कड़ी लिख डाली थी (जगजीत सिंह जी तो बस गुलुकार हैं, हमें तो ग़ज़लगो के नाम की दरकार है)

डूब गयी जब कलम हमारी प्यार के गहरे सागर मे..
दर्द की उंगली थामे थामे, उसे उबरते देखा है -दिलीप तिवारी (पूजा जी, इनके बारे में कुछ और जानकारी कहीं से हासिल होगी? )

पिछली महफ़िल में सबसे पहले हाज़िरी लगाई अवध जी ने, लेकिन कोई भी शब्द गायब न पाकर आप फिर से आने का वादा करके रवाना हो लिए, लेकिन यह क्या, एक बार फिर आपने वादाखिलाफ़ी की.. ये अच्छी बात नहीं :) आपके बाद आकर शन्नो जी ने न सिर्फ़ गायब शब्द पहचाना बल्कि उसपर एक-दो शेर भी कहे। इसलिए नियम से शन्नो जी हीं "शान-ए-महफ़िल" बनीं। प्रतीक जी, आपने हमारे प्रयास को सराहा, इसके लिए आपका तह-ए-दिल से आभार! मंजु जी एवं अवनींद्र जी, महफ़िल में स्वरचित शेरों के दौर को आप दोनों ने आगे बढाया। शुक्रिया! सुमित जी, अगली बार से शायर का नाम भूल मत आईयेगा कहीं :) नीलम जी, आपके आने को आना समझूँ या नहीं, आपने शेर कहने की बजाय शन्नो जी को शांत कराना हीं जरूरी समझा.. ऐसा क्यों? :) पूजा जी, दिलीप जी का शेर है तो काबिल-ए-तारीफ़, लेकिन हम इनकी तारीफ़ भी जानना चाहेंगे। इस बार याद रखिएगा :)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Sunday, January 9, 2011

कारी कारी कारी अंधियारी सी रात.....सावन की रिमझिम जैसी ठडक है अन्ना के संगीत में भी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 566/2010/266

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक नई सप्ताह के साथ हम हाज़िर हैं दोस्तों। फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के गीतों को सुनने और उनके बारे में जानने का सिलसिला जारी है। इन दिनों हम करीब से जान रहे हैं सी. रामचन्द्र को जिनके स्वरबद्ध और गाये हुए गानें हम शामिल कर रहे हैं उन पर केन्द्रित शृंखला 'कितना हसीं है मौसम' में। दोस्तों, युं तो सी. रामचन्द्र ने ज़्यादातर युगल गानें लता जी के साथ ही गाये थे, लेकिन एक वक़्त ऐसा भी आया कि जब उन दोनों के बीच अनबन हो गई और लता जी ने उनके लिए गाना बंद कर दिया। इसके बारे में विस्तार से हम कल की कड़ी में चर्चा करेंगे, आज बस इतना कहते हैं कि लता का विकल्प आशा बनीं और ५० के दशक के आख़िर के कुछ सालों में अन्नासाहब ने आशा भोसले से कई गीत गवाये। तो आइए आज उन चंद सालों में सी. रामचन्द्र और आशा भोसले के संगम से उत्पन्न गीतों की बात करें। इन फ़िल्मों में जो नाम सब से उपर आता है, वह है १९५८ की फ़िल्म 'नवरंग'। आज इसी फ़िल्म से एक गीत आपको सुनवाने जा रहे हैं। वैसे इस फ़िल्म के दो गीत हम आपको सुनवा चुके हैं - "तू छुपी है कहाँ" (आशा-मन्ना) और "आधा है चन्द्रमा" (आशा-महेन्द्र)। लेकिन आज हम सुनेंगे आशा और चितलकर यानी सी. रामचन्द्र की आवाज़ों में एक बड़ा ही अद्भुत गीत "कारी कारी कारी अंधियारी सी रात"। इस गीत में चितलकर काव्य शैली में बोल गाते हैं, और उसके बाद आशा शास्त्रीय संगीत पर उन्हीं बोलों को गा उठती हैं और एक अलग ही समा सा बंध जाता है। सावन पर बहुत सारे, ढेर सारे फ़िल्मी गीत बनें हैं, लेकिन अगर उत्कृष्ट गीतों को इस लम्बी फ़ेहरिस्त से छाँटा जाये तो इस गीत को निश्चित रूप से उसमें स्थान मिलेगा। इस गीत से सी. रामचन्द्र के ना केवल संगीतकार के रूप में महानता का पता चलता है, बल्कि एक बेहतरीन और प्रतिभाशाली गायक होने का भी आभास दिलाता है। भरत व्यास के काव्यात्मक शब्दों ने गीत की सुंदरता में चार चांद लगा दिया है, और आशा भोसले की आवाज़ तो सोने पे सुहागा का काम करती है। गीत के संगीत संयोजन में अन्य साज़ों के बीच में शहनाई भी सुनाई देती है जिसे रामलाल ने बजाया था। जी हाँ, वही रामलाल जो 'सेहरा' और 'गीत गाया पत्थरों ने' जैसी फ़िल्मों में संगीत दिया था।

हम बात कर रहे थे चितलकर और आशा भोसले के गाये गीतों की। 'नवरंग' के गीतों का लेखक पंकज राग ने अपनी किताब 'धुनों की यात्रा' में जिन शब्दों में वर्णन किया है, वो इस प्रकार है - "नवरंग के लोकप्रिय गीतों में आशा और महेन्द्र का वर्चस्व रहा। पर मालकौंस पर आधारित "आधा है चन्द्रमा" और "तू छुपी है कहाँ" जैसे हिट गीतों हों, अभिनेत्री संध्या की शैली के अनुरूप अनूठे इठलाते अंदाज़ में गाया "आ दिल से दिल मिला ले" या प्रणय को एक पवित्र भाव से प्रस्तुत करता "तुम मेरे मैं तेरी" हों, सौंदर्य का एक कोमल संगीतात्मक वर्णन करता "श्यामल श्यामल वरण" हो, कवि-सम्मेलन की शैली का "कविराजा कविता के मत कान मरोड़ो" या पहाड़ी के सुरों को लेकर बनाये गये होली गीत "जा रे हट नटखट" का आह्लाद हो, लोकप्रियता के बावजूद इन गीतों की शैली सी. रामचन्द्र वाली कम और वी. शांताराम के प्रभाववाली अधिक लगती है।" ठीक ही तो कहा है पंकज जी ने, भले ही ये गानें चले हों, लेकिन इनमें निस्संदेह वो बात नहीं आई जो लता के लिए बनाये उनके गीतों में आते थे। १९५९ की फ़िल्म 'पैगाम' में भी आशा की आवाज़ थी और १९६० में 'आँचल' में आशा-महेन्द्र का गाया "गा रही है ज़िंदगी" और सुमन ने लता की शैली में "सांवरिया रे अपनी मीरा को भूल ना जाना" गाया, लेकिन ये तमाम गानें ज़्यादा चले नहीं। १९६० में ही आशा और चितलकर ने फ़िल्म 'सरहद' में "नाचो घूम घूम घूम के" गाया जो पश्चिमी रिदम पर था। इसी फ़िल्म में आशा और साथियों का गाया "आजा रे लागे न मोरा जिया" में सी. रामचन्द्र का विशिष्ट प्रभाव कम ही नज़र आया। प्रभु दयाल निर्देशित १९६१ की फ़िल्म 'अमर रहे यह प्यार' में आशा की गाई "मेरे अंधेरे घर में चाँद कोई छाया" की सफलता भी सीमित ही रही। १९६१ में ही लता और सी. रामचन्द्र का एक बार फिर साथ हुआ शांताराम की ही फ़िल्म 'स्त्री' में। तो आइए अब आज का गीत सुना जाये। आशा भोसले और चितलकर रामचंद्र की आवाज़ में फ़िल्म 'नवरंग' की यह सुंदर रचना।



क्या आप जानते हैं...
कि सी. रामचन्द्र अपनी धुनों के नोटेशन्स एक पॊकेट डायरी में लिखा करते थे। एक दिन वह डायरी फोकेट्मार हो गई और उन्हें बहुत नुकसान हुआ। इस क़िस्से का ज़िक्र गायिका ललिता देवूलकर से करते वक़्त वो रो पड़े थे।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 07/शृंखला 07
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -इतना सुनने के बाद गीत पहचानना मुश्किल नहीं.

सवाल १ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - आवाज़ पहचाने - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह अमित जी, बहुत बधाई....दीपा जी और हिन्दुस्तानी जी को भी सही जवाब की बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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