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रविवार, 19 अप्रैल 2009

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत (3)

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीतों की सौगात लेकर हम फिर से हाज़िर हैं. आज आपके लिए कुछ ख़ास लेकर आये हैं हम सबके प्रिय पंकज सुबीर जी. हमें उम्मीद ही नहीं यकीन है कि पंकज जी का ये नायाब नजराना आप सब को खूब पसंद आएगा.

असमिया संगीतकार और गायक श्री भूपेन हजारिका का गीत "ओ गंगा बहती हो क्‍यों" जब आया तो संगीत प्रेमियों के मानस में पैठता चला गया । हालंकि भूपेन दा काफी पहले से हिंदी फिल्‍मों में संगीत देते आ रहे हैं किन्‍तु उनको हिंदी संगीत प्रेमियों ने इस गाने के बाद हाथों हाथ लिया । यद्यपि 1974 में आई फिल्‍म "आरोप" जिसके निर्देशक श्री आत्‍माराम थे तथा जिसमें विनोद खन्‍ना और सायरा बानो मुख्‍य भूमिकाओं में थे उस फिल्‍म का एक गीत जो लता जी तथा किशोर दा ने गाया था वो काफी लोकप्रिय हुआ था । गीत था- "नैनों में दर्पण है दर्पण में कोई देखूं जिसे सुबहो शाम" । इस फिल्‍म के संगीतकार भी भूपेन दा ही थे । भूपेन दा और गुलजार साहब ने मिलकर जब "रुदाली" का गीत संगीत रचा तो धूम ही मच गई । रुदाली में इस जादुई जोड़ी के साथ त्रिवेणी के रूप में आकर मिली लता जी की आवाज । और फिर श्रोताओं को मिले दिल हूम हूम करे, समय ओ धीरे चलो जैसे कई सारे अमर गीत । रुदाली का संगीत बहुत पापुलर संगीत है और वो उस दौर का संगीत है जब "माया मेमसाब", "लेकिन", "रुदाली" जैसी फिल्‍मों में हट कर संगीत आ रहा था । किन्‍तु आज हम बात करेंगें एक ऐसी फिल्‍म की जिसमें यही टीम थी और संगीत भी ऐसा ही अद्भुत था लेकिन किसी कारण से न तो फिल्‍म को कोई महत्‍व मिला और संगीत भी उसी प्रकार से आकर चुपचाप ही चला गया । यहां तक कि रुदाली फिल्‍म की निर्देशिका कल्‍पना लाजमी ही इस फिल्‍म "एक पल" की भी निर्देशिका थीं । किन्‍तु जहां रुदाली आई थी 1993 में तो एक पल आई थी 1985 में । अर्थात लगभग आठ साल पहले ।

तो आइये बात करते हैं एक पल की और सुनते हैं उसके वे अद्भुत गीत ।
1985 में आई एक पल में शबाना आजमी, नसीरुद्दीन शाह और फारुख शेख जैसे कलाकार थे । जाहिर सी बात है कि ये एक आफ बीट फिल्‍म थी । 1985 में मार धाड़ की फिल्‍मों का दौर चल रहा था और शायद इसीलिये ये फिल्‍म और इसके गीत कुछ अनसुने से होकर गुज़र गये थे । संगीत भूपेन दा का था और गीत लिखे थे कैफी आजमी साहब और गुलजार साहब ने मिलकर ।

यदि अपनी बात कहूं तो मुझे लता जी का गाया तथा गुलजार सा‍हब का लिखा गीत 'जाने क्‍या है जी डरता है, रो देने को जी करता है, अपने आप से डर लगता है ' सबसे पसंद है । जाने किस मानसिकता में लिखा गया है ये गीत । शब्‍द ऐसे कि लगता है मानो किसी ने हमारे ही भावों को अभिव्‍यक्ति दे दी है । उस पर लता जी ने जिस हांटिंग स्‍वर में गाया है, ऐसा लगता है कि बार बार सुनते रहो इस गीत को ।

जाने क्‍या है जी डरता है


एक और गीत है जो लता जी, भूपेन दा तथा गुलजार साहब की ही त्रिवेणी ने रचा है । शब्‍द देखें 'चुपके चुपके हम पलकों में कितनी सदियों से रहते हैं, आ डूब के देखें नीले से सागर में कैसे बहते हैं, आ जाना डूब के देखेंगें' ये गीत भी एक ऐसा गीत है जिसे रात की ख़ामोशी में सुन लो तो नशा ही छा जाये ।' जो सोचा है वो झूठ नहीं महसूस किया वो पाप नहीं, हम रूह की आग में जलते हैं ये जिस्‍म का झूठा ताप नहीं' जैस्‍ो शब्‍दों का जादू देर तक सर पर चढ़ा रहता है ।

चुपके चुपके


कैफी आजमी साहब का लिखा हुआ एक गीत है जो कि दो स्‍वरों में है भूपेंद्र तथा आशा भौंसले जी ने अलग अलग इस गीत को अपनी तरह से गाया है । 'आने वाली है बहार सूने चमन में, कोई फूल खिलेगा प्‍यारा सा कोमल तन में' ये गीत दोनों ही बार आनंद देता है । आशा जी की खनकदार आवाज़ जो गीतों में प्राण फूंक देती है उसने इस गीत को अमर कर दिया है । भूपेंद्र ने गीत का सेड वर्शन गाया है । जाहिर सी बात है उसमें संगीत भी वैसा ही है ।

आने वाली है बहार


आने वाली है बहार (आशा)


एक और गीत जो मुझे हांट करता है वो लता जी और भूपेन दा के स्‍वरों में है तथा गुलजार साहब ने लिखा है । गीत के बोल हैं 'मैं तो संग जाऊं बनवास, स्‍वामी न करना निरास, पग पग संग जाऊं, जाऊं बनवास हे' गीत के बोल ही बता रहे हैं कि राम के बनवास गमन पर गीत है । जिसमें लता जी बनवास ग वन गमन की जिद कर रहे हैं और भूपेन दा रोकने के लिये अपनी बात कर रहे हैं । 'जंगल बन में घूमे हाथी भालू शेर और हिरना, नारी हो तुम डर जाओगी न जाओ बनवास हे '' । अनोखा सा गीत है ये ।

मैं तो संग


गुलजार साहब के एक और गीत को झूम कर गाया है नितिन मुकेश, भूपेन दा और भूपेंद्र ने । 'फूले दाना दाना फूले डालियां भंवराता आया बैसाख' इस गीत में असम के बीहू की ध्‍वनियां भूपेन दा ने उपयोग की हैं ।'बाजरे की बाली सी छोरिया, गेहूं जैसी गोरिया, रात को लागे चांदनी, ऐसी ला दे जोरुआ' । मुझे नहीं मालूम असम में बैसाख कैसा आता है किन्‍तु इस गीत में तो अद्भुत मस्‍ती है बैसाख की । और अंत में जब गीत तेज होता है तो वो पंक्तियां 'पूर्णिमा अगनी जल गई रजनी, जल्‍दी करा दे रे मंगनी, हो मैया करा दे रे' गीत देर तक मस्‍ती देता रहता है । बीच बीच में भूपेन दा का स्‍वर किसी जादू की तरह आता है ।

फूले दानादाना


गुलज़ार साहब का एक और गीत है जो दो बार है एक बार सेड है और एक हैप्‍पी है । सेड में केवल भूपेंद्र ने गाया है और हैप्‍पी वर्शन में भूपेन दा, भूपेंद्र, उषा मंगेशकर तथा हेमंती शुक्‍ला ने इसे गाया है । विवाह गीत है ये 'जरा धीरे जरा धीमे ले के जइहो डोरी, बड़ी नाज़ुक मेरी जाई मेरी बहना भोली' । गीत में भी लोक संगीत की ध्‍वनियां हैं और भरपूर हैं ।

जरा धीरे


तो ये है संगीत फिल्‍म 'एक पल' का जिसे निर्देशित किया था कल्‍पना लाजमी ने । फिल्‍म भले ही यूंही आकर यूंही चली गई हो किन्‍तु इसका संगीत अमर है । ये लोक का संगीत है ।

प्रस्तुति - पंकज सुबीर

पिछले अंक में विकास शुक्ल जी ने हमसे लता जी के गाये एक गीत की फरमाईश की थी, हमने एक बार फिर अजय जी का दरवाज़ा खटखटाया और उन्होंने ढूंढ निकला वह दुर्लभ गीत जिसे विकास जी ढूंढ रहे थे. आप भी सुनिए फिल्म "गजरे" से ये गीत "बरस बरस बदरी बिखर गयी...", संगीत है अनिल बिस्वास का -





"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

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