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Sunday, December 20, 2015

सारंगी के पर्याय पण्डित रामनारायण : SWARGOSHTHI – 249 : SARANGI AND PANDIT RAMNARAYAN





स्वरगोष्ठी – 249 में आज

संगीत के शिखर पर – 10 : पण्डित रामनारायण

संगीत के सौ रंग बिखेरती पण्डित रामनारायण की सारंगी



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी सुरीली श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की दसवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व का उल्लेख और उनकी कृतियों के कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। आज श्रृंखला की दसवीं कड़ी में हम आपको मानव-कण्ठ के सर्वाधिक निकट तंत्रवाद्य सारंगी और इस वाद्य कुशल वादक पण्डित रामनारायण के बारे में चर्चा कर रहे हैं। आपको हम यह भी अवगत कराना चाहते हैं कि 25 दिसम्बर को पण्डित रामनारायण जी का 89वाँ जन्मदिन है। इस अवसर पर हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक में पण्डित जी का सारंगी पर बजाया राग मारवा का आलाप और राग दरबारी में एक आकर्षक गत प्रस्तुत करेंगे। पण्डित रामनारायण आरम्भिक दशकों में फिल्म संगीत से भी जुड़े थे। आज के अंक में हम आपको 1953 की फिल्म ‘हमदर्द’ का एक गीत सुनवाएँगे, जिसमें पण्डित जी की सारंगी का वादन किया गया था। इस फिल्मी गीत में आपको राग जोगिया और राग बहार का स्पर्श मिलेगा।


ज-तंत्र वाद्यों में वर्तमान भारतीय वाद्य सारंगी, सर्वाधिक प्राचीन है। शास्त्रीय मंचों पर प्रचलित सारंगी, विविध रूपों और विविध नामों से लोक संगीत से भी जुड़ी है। प्राचीन ग्रन्थों में यह उल्लेख मिलता है कि लंका के राजा रावण का यह सर्वप्रिय वाद्य था। ऐसी मान्यता है कि रावण ने ही इस वाद्य का आविष्कार किया था। इसी कारण इसका एक प्राचीन नाम ‘रावण हत्था’ का उल्लेख भी मिलता है। आज के अंक में हम सारंगी और इस वाद्य के अप्रतिम वादक पण्डित रामनारायण के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। सारंगी एक ऐसा वाद्य है जो मानव कण्ठ के सर्वाधिक निकट है। एक कुशल सारंगी वादक गले की शत-प्रतिशत विशेषताओं को अपने वाद्य पर बजा सकता है। सम्भवतः इसीलिए इस वाद्य को ‘सौ-रंगी’ अर्थात सारंगी कहा गया। 25 दिसम्बर, 1927 को उदयपुर, राजस्थान के एक सांगीतिक परिवार में एक ऐसे प्रतिभावान बालक का जन्म हुआ, जिसे आज हम सब विख्यात सारंगी वादक पण्डित रामनारायण के रूप में जानते हैं। भारतीय संगीत जगत में इस महान संगीतज्ञ का योगदान कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। आज के अंक में हम उनके इस योगदान पर चर्चा करेंगे। फरवरी, 1994 में उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के अभिलेखागार के लिए मुझे पण्डित रामनारायण जी से एक लम्बे साक्षात्कार का सुअवसर मिला था। उस बातचीत के कुछ अंश हम आपके लिए इस अंक में भी प्रस्तुत करेंगे, किन्तु उससे पहले आपको सुनवाते हैं, पण्डित रामनारायण का बजाया उनका सर्वप्रिय राग मारवा में मनमोहक आलाप।


राग मारवा : सारंगी पर आलाप : पण्डित रामनारायण




पण्डित रामनारायण के प्रपितामह, दानजी वियावत उदयपुर महाराणा के दरबारी गायक थे। पितामह हरिलाल वियावत भी उच्चकोटि के गायक थे, जबकि पिता नाथूजी वियावत ने दिलरुबा वाद्य को अपनाया। छः वर्ष की आयु में रामनारायण जी के हाथ एक सारंगी लगी और इसी वाद्य पर पिता की देख-रेख में अभ्यास आरम्भ हो गया। 10 वर्ष की आयु में उन्होने उस्ताद अल्लाबंदे और उस्ताद जाकिरुद्दीन डागर से ध्रुवपद की शिक्षा ग्रहण की। इसके साथ ही जयपुर के सुविख्यात सारंगी वादक उस्ताद महबूब खाँ से भी मार्गदर्शन प्राप्त किया। 1944 में रामनारायण जी की नियुक्ति सारंगी संगतिकार के रूप रेडियो लाहौर में हुई, जहाँ तत्कालीन जाने-माने गायक-वादकों के साथ उन्होने सारंगी की संगति कर कम आयु में ही ख्याति अर्जित की। 1947 में देश विभाजन के समय उन्हें लाहौर से दिल्ली केन्द्र पर स्थानान्तरित किया गया। अब तक रामनारायण के सारंगी वादन में इतनी परिपक्वता आ गई कि तत्कालीन सारंगी वादकों में उनकी एक अलग शैली के रूप में पहचानी जाने लगी। इसके बावजूद उनका मन इस बात से हमेशा खिन्न रहा करता था कि संगीत के मंच पर संगतिकारों को वह दर्जा नहीं मिलता था, जिसके वो हकदार थे। मुख्य गायक कलाकारों के साथ, इसी बात पर प्रायः नोक-झोंक हो जाती थी। उनका मानना था कि संगतिकारों को भी प्रदर्शन के दौरान अपनी बात कहने का अवसर मिलना चाहिए। 1956 में पण्डित रामनारायण ने मुम्बई के एक संगीत समारोह में एकल सारंगी वादन किया। संगीत-प्रेमियों के लिए यह एक दुर्लभ क्षण था। किसी शास्त्रीय मंच पर पहली बार सदियों से संगति वाद्य के रूप में प्रचलित सारंगी को स्वतंत्र वादन का सम्मान प्राप्त हुआ था। इस दिन संगीत के सुनहरे पृष्ठों पर पण्डित रामनारायन का नाम सारंगी को प्रतिष्ठित करने में दर्ज़ हो चुका था। आइए यहाँ थोड़ा रुक कर सुनते हैं, पण्डित रामनारायण जी का सारंगी पर बजाया राग दरबारी में एक मनमोहक गत।


राग दरबारी : सारंगी पर गत का वादन : पण्डित रामनारायण




सारंगी वादन की अपनी एक अलग शैली विकसित करते हुए पण्डित रामनारायण का मन स्वतंत्र सारंगी वादन के लिए बेचैन होने लगा। रेडियो की नौकरी में रहते हुए उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो पा रही थी, अतः 1949 में उन्होने रेडियो की नौकरी छोड़ कर मुम्बई (तत्कालीन बम्बई) पहुँच गये। मुम्बई में स्वयं को स्थापित करने की लालसा ने उन्हें फिल्म-जगत में पहुँचा दिया। उस दौर के फिल्म संगीतकारों ने पण्डित रामनारायण को सर-आँखों पर बिठाया। सारंगी के सुरों से सजी उनकी कुछ प्रमुख फिल्में हैं- हमदर्द 1953, अदालत 1958, मुगल-ए-आजम 1960, गंगा जमुना 1961, कश्मीर की कली 1964, मिलन और नूरजहाँ 1967। संगीतकार ओ.पी. नैयर के तो वे सर्वप्रिय रहे। हमदर्द, अदालत, गंगा जमुना और मिलन फिल्म में तो उन्होने कई गीतों की धुनें भी बनाई। अब हम आपको उनके फिल्मी गीतों में से चुन कर हमने फिल्म ‘हमदर्द’ का एक राग आधारित गीत लिया है। इस गीत के चार अन्तरे हैं। पहला अन्तरा राग गौड़ सारंग, दूसरा अन्तरा राग गौड़ मल्हार, तीसरा अन्तरा राग जोगिया और चौथा अन्तरा राग बहार के सुरों में निबद्ध है। अब हम आपको गीत का तीसरा और चौथा अन्तरा सुनवा रहे हैं। फिल्म के संगीत निर्देशक हैं अनिल विश्वास और गायक हैं, मन्ना डे और लता मंगेशकर। आइए सुनते हैं, राग जोगिया और राग बहार के स्वरो से सुसज्जित यह गीत।


राग जोगिया और बहार : ‘पी बिन सब सूना...’ और ‘आई मधु ऋतु...’ : मन्ना डे और लता मंगेशकर





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 249वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको फिल्म में शामिल की गई एक ठुमरी रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इस संगीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 250 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) के विजेता का सम्मान मिलेगा। साथ ही पहेली के वार्षिक विजेताओं की घोषणा ‘स्वरगोष्ठी’ के 252वें अंक में की जाएगी।



1 – इस गीतांश में आपको किस राग की अनुभूति हो रही है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – यह किस गायिका की आवाज़ है? उनका नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 26 दिसम्बर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का हल भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 251वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ के 247वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको पण्डित रघुनाथ सेठ की बाँसुरी वादन का एक अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – शुद्ध सारंग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – द्रुत तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- वाद्य – बाँसुरी

इस बार की पहेली के सही उत्तर देने वाले प्रतिभागियों में एक नये प्रतिभागी शामिल हुए हैं। यह नये प्रतिभागी हैं, पनवेल, महाराष्ट्र के शिरीष ओक। शिरीष जी, ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आपका हार्दिक स्वागत है। पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे अन्य विजेता हैं, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल (एन.जे.) से प्रफुल्ल पटेल और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी छः प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ के आज के अंक में हमने आपसे सारंगी के अप्रतिम साधक पण्डित रामनारायन के व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में कुछ चर्चा की। अगले अंक में एक अन्य विधा के शिखर पर प्रतिष्ठित व्यक्तित्व पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला को हमारे अनेक पाठकों ने पसन्द किया है। हम उन सबके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   




Sunday, June 23, 2013

चर्चा राग कल्याण अथवा यमन की

  
स्वरगोष्ठी – 125 में आज

भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति – 5

‘आँसू भरी है ये जीवन की राहें...’ राग यमन के सच्चे स्वरों का गीत 

‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति’ की यह पाँचवीं कड़ी है और इस कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज हमारी चर्चा का विषय होगा, राग यमन पर आधारित एक सदाबहार गीत- ‘आँसू भरी है ये जीवन की राहें...’। 1958 में प्रदर्शित फिल्म ‘परिवरिश’ के इस कालजयी गीत के संगीतकार दत्ताराम वाडेकर थे, जिनके बारे में वर्तमान पीढ़ी शायद परिचित हो। इसके साथ ही आज के अंक में हम राग यमन पर चर्चा करेंगे और आपको सुप्रसिद्ध सारंगी वादक उस्ताद सुल्तान खाँ का बजाया, राग यमन का भावपूर्ण आलाप भी सुनवाएँगे। 


दत्ताराम
संगीतकार दत्ताराम की पहचान एक स्वतंत्र संगीतकार के रूप में कम, परन्तु सुप्रसिद्ध संगीतकार शंकर-जयकिशन के सहायक के रूप में अधिक हुई। इसके अलावा लोक-तालवाद्य ढप बजाने में वे सिद्धहस्त थे। फिल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ के गीत ‘मेरा नाम राजू घराना अनाम...’ में उनका बजाया ढप सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ था। ढप के अलावा अन्य ताल-वाद्यों, तबला, ढोलक आदि के वादन में भी वे अत्यन्त कुशल थे। फिल्म ‘बेगुनाह’ के गीत ‘गोरी गोरी मैं पारियों की छोरी...’ और फिल्म ‘अब दिल्ली दूर नहीं’ के बाल गीत ‘चूँ चूँ करती आई चिड़िया...’ में उनका ढोलक वादन श्रोताओं को मचलने पर विवश करता है। दत्ताराम की संगीत-शिक्षा तबला वादन के क्षेत्र में ही हुई थी। पाँचवें दशक में वो मुम्बई आए और शंकर-जयकिशन के सहायक बन गए। उनकी पहली फिल्म ‘नगीना’ थी। स्वतंत्र संगीतकार के रूप में दत्ताराम ने 1957 में प्रदर्शित राज कपूर की फिल्म ‘अब दिल्ली दूर नहीं’ में अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से अपने मधुर सम्बन्धों के कारण राज कपूर ने फिल्म ‘अब दिल्ली दूर नहीं’ का निर्माण किया था। फिल्म के संगीत के लिए राज कपूर ने शंकर-जयकिशन के इस प्रतिभावान सहायक को चुना। यह फिल्म तो नहीं चली, किन्तु इसके गीत खूब लोकप्रिय हुए। ऊपर जिस बाल गीत की चर्चा हुई है, वह तो आज भी बच्चों का सर्वप्रिय गीत बना हुआ है।

मुकेश
दत्ताराम को संगीत निर्देशन का दूसरा अवसर 1958 में प्रदर्शित फिल्म ‘परिवरिश’ में मिला। राज कपूर इस फिल्म के नायक थे। फिल्म के निर्माता-निर्देशक ने राज कपूर के आग्रह पर ही दत्ताराम को इस फिल्म के संगीत निर्देशक का दायित्व सौंपा था। इस फिल्म में दत्ताराम ने मुकेश, मन्ना डे और लता मंगेशकर की आवाज़ों में कई मधुर गीत रचे, किन्तु जो लोकप्रियता मुकेश के गाये गीत- ‘आँसू भरी है ये जीवन की राहें...’ को मिली वह अपने आप में कीर्तिमान है। मुकेश को दर्द भरे गीतों का महान गायक माना जाता है। आज भी यह गीत दर्द भरे गीतों की सूची में सिरमौर है। इस गीत पर राग यमन की छाया है। फिल्म संगीत के इतिहासकार पंकज राग ने अपनी पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ में इस गीत की रिकार्डिंग से जुड़े एक रोचक तथ्य का उल्लेख किया है। हुआ यह कि जिस दिन इस गीत को रिकार्ड करना था, उस दिन साजिन्दों की हड़ताल थी। उस समय स्टुडियो में सारंगी वादक ज़हूर अहमद, गायक मुकेश और दत्ताराम स्वयं तबला के साथ उपस्थित थे। इन्हीं साधनों के साथ गीत की अनौपचारिक रिकार्डिंग की गई। यूँतो इसे गीत का पूर्वाभ्यास माना गया किन्तु इस रिकार्डिंग को राज कपूर समेत अन्य लोगों ने जब सुना तो सभी अभिभूत हो गए। आज भी यह गीत मुकेश के गाये गीतों में शीर्ष स्थान पर है। लीजिए, पहले आप इस बहुचर्चित गीत को सुनिए।


राग यमन : फिल्म परिवरिश : ‘आँसू भरी है ये जीवन की राहें...’ : संगीत – दत्ताराम




फिल्म ‘परिवरिश’ के इस गीत राग यमन का स्पष्ट आधार है। राग यमन गोधूलि बेला अर्थात रात्रि के प्रथम प्रहर के आरम्भ के समय का राग है। तीव्र मध्यम के साथ सभी शुद्ध स्वरों वाले सम्पूर्ण जाति का यह राग कल्याण थाट का आश्रय राग माना जाता है। प्राचीन ग्रन्थों में राग का नाम कल्याण ही बताया गया है। 


उस्ताद सुल्तान खाँ
विद्वानों के अनुसार प्राचीन काल में भारत से यह राग पर्शिया पहुँचा, जहाँ इसे यमन नाम मिला। मुगलकाल से इसका यमन अथवा इमन नाम प्रचलित हुआ। दक्षिण भारतीय पद्यति में यह राग कल्याणी नाम से जाना जाता है। राग यमन अथवा कल्याण के आरोह में षडज और पंचम का प्रयोग बहुत प्रबल नहीं होता। निषाद स्वर प्रबल होने और ऋषभ स्वर शुद्ध होने से पुकार का भाव और करुण रस की सहज अभिव्यक्ति होती है। जैसा कि उल्लेख किया गया कि इस राग में तीव्र मध्यम के साथ शेष सभी शुद्ध स्वरों का प्रयोग किया जाता है। परन्तु यदि तीव्र मध्यम के स्थान पर शुद्ध मध्यम का प्रयोग किया जाए तो यह राग बिलावल हो जाता है। अवरोह में यदि दोनों मध्यम का प्रयोग कर दिया जाए तो यह यमन कल्याण राग हो जाता है। यदि राग यमन के शुद्ध निषाद के स्थान पर कोमल निषाद का प्रयोग कर दिया जाए तो राग वाचस्पति की अनुभूति कराता है। राग यमन की स्वर-रचना के कारण ही फिल्म ‘परिवरिश’ के गीत- ‘आँसू भरी है ये जीवन की राहें...’ में करुण रस की गहरी अनुभूति होती है। राग यमन की अधिक स्पष्ट अनुभूति कराने का लिए अब हम आपको सारंगी पर इस राग का आलाप सुनवाते हैं। वादक हैं सुविख्यात सारंगी वादक उस्ताद सुल्तान खाँ। आप फिल्मी गीत के स्वरों को इस सार्थक आलाप में खोजने का प्रयास कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग यमन : सारंगी पर आलाप : उस्ताद सुल्तान खाँ 




आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की 125वीं संगीत पहेली में हम आपको छठें दशक की एक फिल्म के राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 130वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – संगीत के इस अंश में प्रयुक्त ताल का नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 127वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 123वें अंक में हमने आपको 1953 में प्रदर्शित फिल्म 'लड़की' के राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल तीनताल। दोनों प्रश्नो के उत्तर हमारे नियमित प्रतिभागी, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जबलपुर की क्षिति तिवारी और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति’ के अगले अंक में हम आपको एक और भूले-बिसरे संगीतकार का परिचय देते हुए उनका संगीतबद्ध एक मोहक गीत लेकर उपस्थित होंगे। आप भी हमारी आगामी कड़ियों के लिए भारतीय शास्त्रीय, लोक अथवा फिल्म संगीत से जुड़े नये विषयों, रागों और अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9-30 ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Sunday, December 25, 2011

सुर संगम में आज- संगीत के सौ रंग बिखेरती पण्डित रामनारायण की सारंगी

गज-तंत्र वाद्यों में वर्तमान भारतीय वाद्य सारंगी, सर्वाधिक प्राचीन है। शास्त्रीय मंचों पर प्रचलित सारंगी, विविध रूपों और विविध नामों से लोक संगीत से भी जुड़ी है। प्राचीन ग्रन्थों में यह उल्लेख मिलता है कि लंका के राजा रावण का यह सर्वप्रिय वाद्य था। ऐसी मान्यता है कि रावण ने ही इस वाद्य का आविष्कार किया था। इसी कारण इसका एक प्राचीन नाम ‘रावण हत्था’ का उल्लेख भी मिलता है। आज के अंक में हम सारंगी और इस वाद्य के अप्रतिम वादक पण्डित रामनारायण के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा करेंगे।

Saturday, December 3, 2011

विशेष - सिने-संगीत के कलाकारों के लिए उस्ताद सुल्तान ख़ाँ का योगदान

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 70
एक बार सुल्तान ख़ाँ साहब नें कहा था कि जो कलाकार संगत करते हैं उन्हें अपने अहम को त्याग कर मुख्य कलाकार से थोड़ा कम कम बजाना चाहिए। उन्होंने बड़ा अच्छा उदाहरण दिया था कि अगर आप बाराती बन के जा रहे हो किसी शादी में तो आपकी साज-सज्जा दुल्हे से बेहतर तो नहीं होगी न! पूरे बारात में दुल्हा ही केन्द्रमणि होता है। ठीक उसी तरह, संगत देने वाले कलाकार को भी (चाहे वो कितना भी बड़ा कलाकार हो) मुख्य कलाकार के साथ सहयोग देना चाहिए।

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