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Monday, September 18, 2017

फ़िल्मी चक्र समीर गोस्वामी के साथ || एपिसोड ०७ || ऋषिकेश मुखर्जी

Filmy Chakra

With Sameer Goswami 
Episode 07
Hrishikesh Mukherjee

फ़िल्मी चक्र कार्यक्रम में आप सुनते हैं मशहूर फिल्म और संगीत से जुडी शख्सियतों के जीवन और फ़िल्मी सफ़र से जुडी दिलचस्प कहानियां समीर गोस्वामी के साथ, लीजिये आज इस कार्यक्रम के छठे एपिसोड में सुनिए कहानी अद्भुत ऋषिकेश मुख़र्जी की...प्ले पर क्लिक करें और सुनें....



फिल्मी चक्र में सुनिए इन महान कलाकारों के सफ़र की कहानियां भी -
किशोर कुमार
शैलेन्द्र 
संजीव कुमार 
आनंद बक्षी
सलिल चौधरी 
नूतन 

Saturday, August 26, 2017

चित्रकथा - 33: ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्मों में मुकेश के गाए गीत

अंक - 33

ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्मों में मुकेश के गाए गीत


"ऊपर जाकर याद आई नीचे की बातें.." 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 



कल 27 अगस्त फ़िल्म जगत की दो महान हस्तियों की पुण्यतिथि है। सदाबहार फ़िल्मों के सुप्रसिद्ध निर्देशक और निर्माता ॠषिकेश मुखर्जी, तथा सुनहरे दौर के महान पार्श्वगायक मुकेश, दोनों ने इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कहा था 27 अगस्त के दिन; मुकेश 1976 में और ऋषी दा 2006 में। अपनी अपनी विधा के इन दो महान कलाकारों को एक साथ याद करने के लिए आज के ’चित्रकथा’ में प्रस्तुत है उन गीतों की बातें जिन्हें मुकेश ने ॠषिकेश मुखर्जी की फ़िल्मों में गाया है। आज के ’चित्रकथा’ का यह अंक समर्पित है इन दो महान फ़नकारों की याद को।




30 सितंबर 1922 को जन्मे ॠषिकेश मुखर्जी ने अपने पूरे फ़िल्मी सफ़र में 42 फ़िल्में निर्देशित की और कई फ़िल्मों का निर्माण भी किया। 40 के दशक के अन्त में कलकत्ता में बी. एन. सरकार के ’न्यु थिएटर्स’ में एक कैमरामैन के रूप में अपना फ़िल्मी सफ़र शुरु करने के बाद वो बम्बई चले आए और बिमल रॉय के साथ फ़िल्म एडिटर व सहायक निर्देशक के रूप में अपना नया सफ़र शुरु किया। बिमल रॉय की कालजयी फ़िल्मों, ’दो बिघा ज़मीन’ और ’देवदास’, में ऋषी दा का भी महत्वपूर्ण योगदान था। 1957 में ऋषी दा ने स्वतन्त्र रूप से अपनी पहली फ़िल्म ’मुसाफ़िर’ का निर्माण व निर्देशन किया। फ़िल्म तो कुछ ख़ास नहीं चली पर फ़िल्म निर्माण में उनकी दक्षता को सब ने देखा और स्वीकारा। नतीजा यह हुआ कि 1959 की बी. लछमन की फ़िल्म ’अनाड़ी’ को निर्देशित करने का मौका उन्हें मिल गया। राज कपूर - नूतन अभिनीत यह फ़िल्म ज़बरदस्त हिट हुई। उधर गायक मुकेश राज कपूर का स्क्रीन वॉयस थे और इस फ़िल्म से मुकेश और ऋषी दा का साथ भी शुरु हुआ। और मज़े की बात देखिए कि इसी फ़िल्म के गीत "सबकुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी" के लिए मुकेश को अपना पहला फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड मिला। और उधर ऋषी दा को भी इस फ़िल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कारों के तहत माननीय राष्ट्रपति के हाथों रजत मेडल मिला। इस फ़िल्म में मुकेश के गाए तीन गीत थे। शीर्षक गीत का उल्लेख कर चुके हैं, अन्य दो गीत हैं "किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार... जीना इसी का नाम है" और लता मंगेशकर के साथ गाया "दिल की नज़र से, नज़रों की दिल से..."। शंकर-जयकिशन के संगीत में शैलेन्द्र के सहज-सरल शब्दों में लिखे ये सभी गीत आज कालजयी बन चुके हैं। फ़िल्म-संगीत के इतिहास में ये गीत मील के पत्थर की तरह हैं और मुकेश के गाए गीतों में ये अहम जगह रखते हैं। 

’अनाड़ी’ के बाद मुकेश और ऋषिकेश मुखर्जी का एक बार फिर साथ हुआ 1961 की ऋषी दा निर्मित व निर्देशित फ़िल्म ’मेम दीदी’ में। फ़िल्म के संगीतकार थे सलिल चौधरी और गीत लिखे एक बार फिर शैलेन्द्र ने। सलिल दा के संगीत में मुकेश ने समय-समय पर एक से बढ़ कर एक गीत गाए हैं जिनमें से कई गीत ऋषी दा की फ़िल्मों के लिए हैं। ’मेम दीदी’ मुकेश-सलिल-ऋषी की तिकड़ी की पहली फ़िल्म है। इस फ़िल्म में कुल छह गीत हैं, लेकिन मुकेश की आवाज़ बस एक ही गीत में है लता मंगेशकर के साथ "मैं जानती हूँ तुम झूठ बोलते हो..."। केसी मेहरा और तनुजा पर फ़िल्माया यह गीत ज़्यादा लोकप्रिय नहीं हुआ, इसकी वजह शायद फ़िल्म का फ़्लॉप होना है। लेकिन इसी साल ए. वी. मय्यप्पम निर्मित और ऋषीकेश मुखर्जी निर्देशित फ़िल्म आई ’छाया’ जिसके गीतों ने लोकप्रियता की सारी सीमाएँ पार कर दी। सलिल चौधरी के संगीत में राजेन्द्र कृष्ण के लिखे गीत हर रेडियो स्टेशन से बजने लगे। हालाँकि लता और तलत महमूद का गाया "इतना ना मुझसे तू प्यार बढ़ा" फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत रहा, पर लता और मुकेश का गाया "दिल से दिल की डोर बांधे चोरी चोरी जाने हम तुम तुम हम संग संग चले आज कहाँ" भी ख़ूब सुना गया। इस गीत की धुन पर बनने वाला मूल बांग्ला गीत "दुरन्तो गुर्निर एइ लेगेछे पाक" हेमन्त मुखर्जी (हेमन्त कुमार) ने गाया था।


1962 में ऋषि दा को विजय किशोर दुबे व बनी रिउबेन निर्मित फ़िल्म ’आशिक़’ को निर्देशित करने का मौक़ा मिला। राज कपूर, पद्मिनी और नन्दा अभिनीत इस फ़िल्म के गीत-संगीत का भार शैलेन्द्र-हसरत-शंकर-जयकिशन पर था। लता और मुकेश ने फ़िल्म के गीतों को अंजाम दिया जो बेहद चर्चित हुए। मुकेश की एकल आवाज़ में कुल चार गीत थे - "तुम जो हमारे मीत न होते, गीत ये मेरे गीत न होते", "तुम आज मेरे संग हँस लो", "ये तो कहो कौन हो तुम", और फ़िल्म का शीर्षक गीत "मैं आशिक़ हूँ बहारों का, फ़िज़ाओं का, नज़ारों का..."। और लता मंगेशकर के साथ इस फ़िल्म में मुकेश के गाए दो गीत थे - "ओ शमा मुझे फूंक दे" और "महताब तेरा चेहरा किस ख़्वाब में देखा था"। ये सभी गीत अपने ज़माने के मशहूर नग़में रहे हैं और आज भी आए दिन रेडियो पर सुनने को मिल जाते हैं। इस फ़िल्म के बाद ऋषी दा और मुकेश जी का साथ कई बरसों के बाद हुआ। 1966 की फ़िल्म ’बीवी और मकान’ का निर्माण किया था गायक-संगीतकार हेमन्त कुमार ने। ज़ाहिर सी बात है कि फ़िल्म का संगीत उन्होंने स्वयम् ही तैयार किया तथा फ़िल्म के निर्देशन के लिए ऋषीकेश मुखर्जी को साइन किया और फ़िल्म में गीत लिखवाए नवोदित गीतकार गुलज़ार से। फ़िल्म में कुल ग्यारह गीत थे और फ़िल्म के चरित्रों को ध्यान में रखते हुए कई गायक-गायिकाओं ने फ़िल्म के गीत गाए। मुकेश की आवाज़ फ़िल्म के दो गीत में थी। पहला गीत है "अनहोनी बात थी हो गई है, बस मुझको मोहब्बत हो गई है", इसमें मुकेश के साथ तलत महमूद, मन्ना डे, हेमन्त कुमार और जोगिन्दर की आवाज़ें भी शामिल हैं। यह एक हास्य गीत है जिसमें मुकेश ने आशिष कुमार का प्लेबैक किया है और मन्ना डे ने महमूद का। औरत बने बिस्वजीत और बद्री प्रसाद का पार्श्वगायन किया जोगिन्दर और हेमन्त कुमार ने। मुकेश इसमें अपने पहले गीत "दिल जलता है तो जलने दो" की लाइन भी गाई। और दूसरा गीत भी एक हास्य गीत है "आ था जब जनम लिया था पी होके मर गई" जिसमें मुकेश, हेमन्त कुमार और मन्ना डे की आवाज़ें हैं। समय के साथ-साथ फ़िल्मों और फ़िल्म-संगीत की धाराएँ भी बदलीं और नई नई धाराएँ इसमें मिलती चली गईं। 60 के दशक के अन्तिम सालों में संगीतकार लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल तेज़ी से उपर चढ़ रहे थे। 1969 की ऋषीकेश मुखर्जी निर्देशित फ़िल्म ’सत्यकाम’ में एल.पी का संगीत था और फ़िल्म के तीनों गीत लिखे कैफ़ी आज़मी ने। दो गीत लता की एकल आवाज़ में और तीसरा गीत है मुकेश, किशोर कुमार और महेन्द्र कपूर की आवाज़ों में एक जीवन दर्शन आधारित ख़ुशमिज़ाज गीत जिसे बस में सवार दोस्तों की टोली गाता है। "ज़िन्दगी है क्या बोलो" गीत में धर्मेन्द्र का पार्श्वगायन किया है मुकेश ने जबकि किशोर कुमार बने असरानी की आवाज़। महेन्द्र कपूर ने अन्य कलाकारों का प्लेबैक दिया।

1971, ऋषि दा के करीअर का शायद सबसे महत्वपूर्ण फ़िल्म, ’आनन्द’। ऋषी दा द्वारा निर्मित व निर्देशित ’आनन्द’ ने इतिहास रचा तथा राजेश खन्ना व अमिताभ बच्चन के फ़िल्मी सफ़र के भी मील के पत्थर सिद्ध हुए। फ़िल्म के सभी चार गीत सदाबहार नग़में हैं; मुकेश के गाए दो गीत "कहीं दूर जब दिन ढल जाए" (योगेश) और "मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने" (गुलज़ार) उनके गाए 70 के दशक की दो बेहद महत्वपूर्ण रचनाएँ हैं। "कहीं दूर जब दिन ढल जाये, सांझ की दुल्हन बदन चुराये, चुपके से आये, मेरे ख़यालों के आंगन में कोई सपनों के दीप जलाये, दीप जलाये" - योगेश, सलिल चौधरी और मुकेश की तिकड़ी ने कई बार साथ में अच्छा काम किया है, पर शायद यह गीत इस तिकड़ी की सबसे लोकप्रिय रचना है। इस गीत से जुड़ा सबसे रोचक तथ्य यह है कि यह गीत इस सिचुएशन के लिए तो क्या बल्कि इस फ़िल्म तक के लिए नहीं लिखा गया था, लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि इस गीत में फ़िल्म 'आनन्द' का पूरा सार छुपा हुआ है। इस गीत को गाने वाला आनन्द नाम का युवक यह जानता है कि मौत उसके घर के दरवाज़े पर दस्तक देने ही वाला है, आज नहीं तो बहुत जल्द, और दुनिया की कोई भी दवा उसे नहीं बचा सकती। फिर भी वो अपनी बची-खुची ज़िन्दगी का हर एक दिन, हर एक लम्हा पूरे जोश और उल्लास के साथ जीना चाहता है, और उसके आसपास के लोगों में भी ख़ुशियाँ लुटाना चाहता है। आनन्द अपनी प्रेमिका के जीवन से बाहर निकल जाता है क्योंकि वो नहीं चाहता कि उसकी मौत के बाद वो रोये। मौत के इतने नज़दीक होकर भी अपनों के प्रति प्यार लुटाना और आसपास के नये लोगों से उसकी दोस्ती को दर्शाता है "कहीं दूर जब दिन ढल जाये"। इस गीत के बोलों को पहली बार सुनते हुए समझ पाना बेहद मुश्किल है। हर एक पंक्ति, हर एक शब्द अपने आप में गहरा भाव छुपाये हुए है, और गीत को बार-बार सुनने पर ही इसके तह तक पहुँचा जा सकता है। यह गीत दरसल 1972 की फ़िल्म 'अन्नदाता' के लिए योगेश ने लिखा था। 'अन्नदाता' के निर्माता थे एल. बी. लछमन। 'अन्नदाता' के संगीतकार सलिल दा ही थे। एक दिन सलिल दा के यहाँ फ़िल्म 'अन्नदाता' के लिए इसी गीत की सिटिंग्‍ हो रही थी। एल. बी. लछमन, योगेश, सलिल चौधरी और मुकेश मौजूद थे। उसी दिन वहाँ फ़िल्म 'आनन्द' के लिए भी सिटिंग्‍ होनी थी। पहली सिटिंग्‍ चल ही रही थी कि 'आनन्द' की टीम आ पहुँची। निर्माता-निर्देशक ॠषिकेश मुखर्जी तो थे ही, साथ में राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन भी। जैसे ही इन तीनों ने यह गीत सुना, गीत इन्हें पसन्द आ गई। ऋषी दा ने लछमन साहब का हाथ पकड़ कर कहा कि यह गीत आप मुझे दे दीजिए! लछमन जी तो चौंक गए कि ये यह क्या माँग रहे हैं। अपनी फ़िल्म के लिए बन रहा गीत किसी अन्य निर्माता तो वो कैसे दे देते? उन्होंने ऋषी दा को मना कर दिया और माफ़ी माँग ली। पर ऋषी दा और राजेश खन्ना आसानी से कहाँ छोड़ने वाले थे? वो अनुरोध करते रहे, करते ही रहे। ऋषी दा ने यह भी कहा कि इस गीत के बोल उनकी फ़िल्म 'आनन्द' के एक सिचुएशन के लिए बिल्कुल सटीक है। इतने अनुनय विनय को देख कर न चाहते हुए भी लछमन जी ने कहा कि पहले आप मुझे वह सिचुएशन समझाइये जिसके लिए आप इस गीत को लेना चाहते हैं, अगर मुझे ठीक लगा तो ही मैं यह गीत आपको दे दूँगा। ऋषी दा ने इतनी सुन्दरता से सिचुएशन को लछमन साहब की आँखों के सामने उतारा कि लछमन जी काबू हो गये और उन्होंने यह गीत ऋषी दा को दे दी यह कहते हुए कि वाकई यह गीत आप ही की फ़िल्म में होनी चाहिए। यह बहुत बड़ी बात थी। दो निर्माताओं के बीच में साधारणत: प्रतियोगिता रहती है, ऐसे में लछमन साहब का ऋषी दा को अपना इतना सुन्दर गीत दे देना वाकई उनका बड़प्पन था। गीत तो 'अन्नदाता' की झोली से निकल कर 'आनन्द' की झोली में आ गया, पर लछमन साहब ने भी योगेश और सलिल चौधरी के सामने यह शर्त रख दी कि बिल्कुल ऐसा ही एक ख़ूबसूरत गीत वो 'अन्न्दाता' के लिए भी दोबारा लिख दें। कुछ-कुछ इसी भाव को बरकरार रखते हुए योगेश ने फ़िल्म 'अन्नदाता' के लिए फिर से गीत लिखा - "नैन हमारे सांझ सकारे, देखें लाखों सपने, सच ये कहीं होंगे या नहीं, कोई जाने ना, कोई जाने ना, यहाँ"। इन दोनों गीतों के भावों का अगर तुलनात्मक विश्लेषण किया जाये तो दोनों में समानता महसूस की जा सकती है।


’आनन्द’ के बाद मुकेश और ऋषी दा का अगला साथ हुआ 1974 की फ़िल्म ’फिर कब मिलोगी’ में जिसमें संगीतकार थे राहुल देव बर्मन। इस फ़िल्म में मुकेश ने बस एक गीत गाया लता के साथ "कहीं करती होगी वो मेरा इन्तज़ार..."। यह फ़िल्म फ़्लॉप थी और फ़िल्म के अन्य गीत भी ख़ास नहीं चले, पर इस गीत को काफ़ी मक़बूलियत मिली और आगे चल कर इस गीत का गायिका अनामिका ने रीमिक्स वर्ज़न भी बनाया और यह रीमिक्स वर्ज़न भी हिट हुआ। 1975 में ऋषी दा ने ’चुपके चुपके’ फ़िल्म का निर्माण किया। इसमें उन्होंने संगीत का भार सचिन देव बर्मन को दिया। फ़िल्म के कुल चार गीतों में एक गीत मुकेश और लता की युगल स्वरों में था - "बाग़ों में कैसे ये फूल खिलते हैं" जो धर्मेन्द्र और शर्मिला टैगोर पर फ़िल्माया गया था। 1976 में अचानक मुकेश की मृत्यु हो जाने से ऋषीकेश मुखर्जी की आने वाली फ़िल्मों से उनके गीत ग़ायब हो गए। लेकिन एक गीत जो पहले रेकॉर्ड हो चुका था, उसे 1978 की फ़िल्म ’नौकरी’ में शामिल किया गया और फ़िल्म की नामावली में "लेट मुकेश" लिखा गया। फ़िल्म के नायक थे राजेश खन्ना जिनका प्लेबैक दिया किशोर कुमार ने जबकि राज कपूर का प्लेबैक दिया मुकेश ने, शायद आख़िरी बार के लिए। आश्चर्य की बात है कि इस अन्तिम गीत का मुखड़ा था "उपर जाकर याद आई नीचे की बातें, होठों पे आई दिल के पीछे की बातें"। गीत को सुनते हुए ऐसा लगता है कि जैसे मुकेश उपर जा कर अपने अज़ीम दोस्त राज कपूर के लिए यह गीत गा रहे हैं, और परदे पर भी इसे राज कपूर ही अदा कर रहे हैं। इसी गीत के साथ मुकेश का साथ राज कपूर और ऋषीकेश मुखर्जी से ख़त्म होता है। कल 27 अगस्त, मुकेश और ऋषीकेश मुखर्जी की याद का दिन है, और यह दिन हमें याद दिलाती है उन तमाम गीतों की जो इन दोनों के संगम से उत्पन्न हुई थी। मुकेश और ऋषीकेश मुखर्जी को सलाम करती है ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’।


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, October 18, 2009

महताब तेरा चेहरा किस ख्वाब में देखा था....लता मुकेश की मखमली आवाज़ में एक सुरीला नगमा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 235

दोस्तों, एक के बाद एक तीन गीत हम आपको सुनवा रहें हैं शंकर जयकिशन के स्वरबद्ध किए हुए, और मौका है शंकर जी के जन्म दिवस का जो था १५ अक्तुबर को। कल की तरह आज का गीत भी शैलेन्द्र का ही लिखा हुआ है। फ़िल्म 'आशिक़' का युगल गीत है मुकेश और लता मंगेशकर की आवाज़ों में "महताब तेरा चेहरा किस ख़्वाब में देखा था, ऐ हुस्न-ए-जहाँ बतला तू कौन मैं कौन हूँ"। 'आशिक़' १९६२ की फ़िल्म थी जिसके निर्माता थे विजय किशोर दुबे और बनी रूबेन। ऋषीकेश मुकर्जी ने फ़िल्म को निर्देशित किया और इसके मुख्य कलाकार थे राज कपूर, नंदा और पद्मिनी। जहाँ तक म्युज़िक डिपार्ट्मेंट की बात है, तो शंकर जयकिशन के अलावा जिनका फ़िल्म के संगीत में योगदान रहा वे हैं मिनू कात्रक (रिकार्डिस्ट), डी. ओ. भंसाली (सहायक रिकार्डिस्ट), दत्ताराम वाडकर (संगीत सहायक), और सेबास्टियन डी' सूज़ा (संगीत सहायक)। गीतों में आवाज़ें लता जी और मुकेश जी के थे। आज के प्रस्तुत गीत के अलावा इस फ़िल्म का एक और युगल गीत "ओ शमा मुझे फूँक दे, मैं ना मैं रहूँ तू ना तू रहे" भी लोकप्रिय हुआ था। और मुकेश की एकल आवाज़ में "तुम जो हमारे मीत ना होते, गीत हमारे गीत ना होते" भी शैलेन्द्र की एक चर्चित रचना है। दशकों बाद इसी तरह का एक गीत बना था फ़िल्म 'गीत' के लिए, "आप जो मेरे मीत ना होते, होठों पे मेरे गीत ना होते"। ख़ैर, आज तो हम "महताब तेरा चेहरा" की ही बातें करेंगे। इस गीत में रोमांटिसिज़्म के शायराना अंदाज़ फूट पड़े हैं शैलेन्द्र की क़लम से। दोस्तों, ध्यान देनेवाली बात है कि ऋषिकेश मुखर्जी की निर्देशित यह फ़िल्म थी और एक पर्फ़ेक्ट फ़िल्मकार की तरह वो अपनी फ़िल्मों में ऐसा कोई गीत नहीं डालते थे जो कहानी के प्रवाह के आगे रुकावट बनकर खड़ा हो जाए। राज कपूर के साथ उनकी घनिष्ठता की वजह से उनकी शंकर जयकिशन के साथ भी दोस्ती हुई, और बिमल राय के ज़रिए शैलेन्द्र से।

शंकर जयकिशन ने ऋषि दा के जिन फ़िल्मों में संगीत दिया था उनके नाम हैं 'अनाड़ी', 'असली नक़ली', 'आशिक़', 'गोदान', और 'सांझ और सवेरा'। गीतकारों में आनंद बक्शी और शैलेन्द्र ने ऋषि दा के साथ आठ आठ फ़िल्मों में गानें लिखे। हसरत जयपुरी, कैफ़ी आज़्मी, योगेश, मजरूह और गुलज़ार ने भी ऋषि दा के कई फ़िल्मों में गीत लिखे हैं। दोस्तों, ऋषि दा के साथ शंकर जयकिशन और शैलेन्द्र के साथ का ज़िक्र तो हमने किया, लेकिन यह भी एक आश्चर्य की ही बात है हम कह सकते हैं कि मुकेश इस दुनिया से २७ अगस्त १९७६ को हमेशा के लिए चले गए थे, और इसके ठीक ३० साल बाद, यानी कि २७ अगस्त २००६ को ऋषि दा हमें अल्विदा कहा था। शंकर जयकिशन और सलिल चौधरी को अगर हम अलग रखें तो मुकेश ने ऋषि दा के फ़िल्मों में उन संगीतकारों के लिए गीत गाए हैं जिनके लिए उन्होने बहुत कम गाए हैं। कुछ उदाहरण दें आपको? आर. डी. बर्मन (फिर कब मिलोगी), हेमन्त कुमार (बीवी और मकान), एस. डी. बर्मन (चुपके चुपके)। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने मुकेश से ऋषि दा की फ़िल्म 'सत्यकाम' में मुकेश से गीत गवाया था। तो दोस्तों, आइए अब सुनते हैं "महताब तेरा चेहरा"। आज का यह अंक एक साथ समर्पित है ऋषिकेश मुखर्जी, शंकर जयकिशन, शैलेन्द्र और मुकेश की स्मृति को!



मुकेश :
मेहताब तेरा चेहरा,
किस ख्वाब में देखा था
ए हुस्ने जहाँ बतला ,
तू कौन मैं कौन हूँ ।
लता :
ख्वाबों में मिले अक्सर
इक राह चले मिल कर
फिर भी है यही बेहतर
मत पूछ मैं कौन हूँ ।
मुकेश :
मेह्ताब तेरा चेहरा
लता :
हुस्नो इश्क है तेरे जहाँ
दिल की धड़कनें तेरी जु़बां
आज ज़िन्दगी तुझसे जवां
मुकेश :
आगाज़ है क्या मेरा
अंजाम है क्या मेरा
है मेरा मुकद्दर क्या
बतला के मैं कौन हूँ । मेहताब ..
लता :
क्यूं घिरी घटा तू ही बता
क्यूं हंसी फ़िजा तू ही बता
फ़ूल क्यूं खिला तू ही बता
मुकेश :
किस राह पे चलना है
किस गाम पे रुकना है
किस काम को करना है
बतला के मैं कौन हूँ । मेह्ताब तेरा चेहरा
लता :
ज़िन्दगी को तू गीत बना
दिल के साज़ पे झूम के गा
इस जहान को तू प्यार सिखा
मुकेश :
मुकेश :
मेहताब तेरा चेहरा,
किस ख्वाब में देखा था
ए हुस्ने जहाँ बतला ,
तू कौन मैं कौन हूँ ।
लता :
ख्वाबों में मिले अक्सर
इक राह चले मिल कर
फिर भी है यही बेहतर
मत पूछ मैं कौन हूँ ।
मुकेश :
मेह्ताब तेरा चेहरा...

और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. इस फिल्म के शीर्षक में दो रंगों के नाम हैं.
२. चित्रगुप्त के संगीत से सजा एक बेहद चुलबुला गीत, जिसे सुनते ही मन नाच उठता है.
३. एक अंतरा इस शब्द से शुरू होता है -"जान".

पिछली पहेली का परिणाम -

सबसे पहले तो दीपावली पर्व की आप सब को ढेरों शुभकामनाएँ, शरद जी ने दो अंक और जोड़े अपने खाते में. पूर्वी जी जल्दी कीजिये विजेता बनिए और अपनी पसंद के गीतों की सूची भी तैयार कर भेज दीजिये....दीपो का ये त्यौहार आप सबके जीवन में भी ढेरों रोशनी, और अनगिनत खुशियाँ लेकर आये इसी दुआ के साथ इजाज़त लेते है...

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Saturday, July 4, 2009

कहीं दूर जब जब दिन ढल जाए....ऐसे मधुर गीत होठों पे आये....

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 131

ल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आप ने १९६१ में बनी फ़िल्म 'प्यासे पंछी' का गीत सुना था। आइये आज एक लम्बी छलांग लगा कर १० साल आगे को निकल आते हैं। यानी कि सन् १९७१ में। दोस्तों, यही वह साल था जिसमें बनी थी ऋषिकेश मुखर्जी की कालजयी फ़िल्म 'आनंद'। इस फ़िल्म ने लोगों के दिलों पर कुछ इस क़दर छाप छोड़ी है कि आज लगभग ४ दशक बाद भी जब यह फ़िल्म टी.वी. पर आती है तो लोग उसे बड़े प्यार और भावुकता से देखते हैं। 'आनंद' कहानी है आनंद सहगल (राजेश खन्ना) की, जो एक कैंसर का मरीज़ हैं, और यह जानते हुए भी कि वह यहाँ पर चंद रोज़ का ही मेहमान है, न केवल अपनी बची हुई ज़िंदगी को पूरे जोश और आनंद से जीता है बल्कि दूसरों को भी उतना ही आनंद प्रदान करता है। ठीक विपरीत स्वभाव के हैं भास्कर बैनर्जी (अमिताभ बच्चन), जो उनके डौक्टर हैं, जो देश की दुरवस्था को देख कर हमेशा नाराज़ रहते हैं। आनंद से रोज़ रोज़ की मुलाक़ातें और नोंक-झोंक डा. भास्कर को ज़िंदगी के दुख तक़लीफ़ों के पीछे छुपी हुई ख़ुशियों के रंगों से अवगत कराती है। अपनी चारों तरफ़ ढेर सारी ख़ुशियाँ बिखेर कर, अपने आस पास के कई ज़िंदगियों को आबाद कर, आनंद इस दुनिया को छोड़ जाता है, जो डा. भास्कर को उस पर एक क़िताब लिखने की प्रेरणा देता है। 'आनंद' की मूल कहानी को लिखा था ख़ुद ऋषिकेश मुखर्जी ने, और फ़िल्म के लिये विस्तृत लेखन का काम किया था बिमल दत्त, डी. एन. मुखर्जी, बीरेन त्रिपाठी और गुलज़ार ने। फ़िल्म का निर्माण एन. सी. सिप्पी और ऋषि दा ने मिलकर किया था। फ़िल्म के संगीतकार थे सलिल दा, यानी कि सलिल चौधरी। फ़िल्म की कहानी कुछ ऐसी थी कि इसमें ज़्यादा गीतों की गुंजाइश नहीं थी। ज़बरदस्ती अगर गानें डाले जाते तो वह फ़िल्म के हित में नहीं होते। इसलिए ऋषि दा ने फ़िल्म में केवल चार गानें रखे, और उल्लेखनीय बात यह है कि इन चारों गीतों ने अपार लोकप्रियता हासिल की। ये चारों गानें ऐसे हैं कि इन्हे लोकप्रियता या गुणवत्ता की दृष्टि से क्रम नहीं दिया जा सकता। तो जनाब, आज के लिए हमें इस फ़िल्म का एक गीत चुनना था, तो हम ने चुना, उम्मीद है आप भी शायद इसी गीत को सुनना चाह रहे होंगे।

"कहीं दूर जब दिन ढल जाये, चाँद सी दुल्हन बदन चुराये चुपके से आये"। मुकेश की आवाज़ में यह गीत लिखा था गीतकार योगेश ने। शुद्ध हिंदी में गीत लिखने में माहिर गीतकारों की बात करें तो जो परम्परा कवि प्रदीप, पं. नरेन्द्र शर्मा, जी. एस. नेपाली और भरत व्यास जैसे गीतकारों ने शुरु की थी, आगे चलकर योगेश ने भी वही राह अपनाई। वैसे 'आनंद' फ़िल्म के जो दो गीत उन्होने लिखे (दूसरा गीत था "ना जिया लागे ना"), उनमें शुद्ध हिंदी का क्यों प्रयोग हुआ, वह बात योगेश जी ने विविध भारती के एक पुराने कार्यक्रम में कहा था, उन्ही के शब्दों में पढ़िये - "सलिल दा के जो काम्पोसिशन्स होते थे, उनमें उर्दू के शब्दों की गुंजाइश नहीं होती थी। उनकी धुनें ऐसी होती थीं कि उर्दू के शब्द उसमें फ़िट नहीं हो सकते। पहले वहाँ शैलेन्द्र जी लिखते थे, जो सीधे सरल शब्दों में गहरी बात कह जाते थे। एक और बात, मैं तो सलिल दा से यह कह चुका हूँ कि अगर वे संगीत के बजाये लेखन की तरफ़ ध्यान देते तो रबींद्रनाथ ठाकुर के बाद उन्ही की कवितायें जगह जगह गूँजते।" दोस्तों, प्रस्तुत गीत भी किसी ख़ूबसूरत कविता से कम नहीं है। इसके बारे में और ज़्यादा कुछ कहने से बेहतर यही है कि इसे तुरंत सुना जाये!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. गिनी चुनी महिला संगीतकारों में से एक उषा खन्ना का स्वरबद्ध है ये गीत.
2. बहुत खूबसूरत लिखा है इसे जावेद अनवर ने.
3. एक अंतरे की पहली चार पंक्तियों में ये दो शब्द हैं - "तस्कीन" और "जिन्दगी".

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी 34 अंकों के लिए एक बार फिर बधाई. एकदम सही जवाब. स्वप्न जी बस जरा सा पीछे रह गयी. आज महिला संगीतकार की बात है आज देखते हैं कौन बाज़ी मारता है. मुकाबला बहुत दिलचस्प हो चुका है. दिशा जी, पराग जी, संगीता जी, और मनु जी आप सब को भी बधाईयाँ.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, September 11, 2008

जिन्होंने सजाये यहाँ मेले...कुछ यादें अमर संगीतकार सलिल दा की

आज आवाज़ पर, हमारे स्थायी श्रोता, और गजब के संगीत प्रेमी, इंदौर के दिलीप दिलीप कवठेकर लेकर आए हैं महान संगीतकार सलिल चौधरी के दो अदभुत गीतों से जुड़ी कुछ अनमोल यादें.

अपनी कहानी छोड़ जा, कुछ तो निशानी छोड़ जा..

सलिल चौधरी- इस क्रान्तिकारी और प्रयोगवादी संगीतकार को जब हम पुण्यतिथि पर याद करते हैं तो अनायास ही ये बोल जेहन में उभरते है, और साथ में कई यादें ताज़ा होती हैं. अपने विविध रंगों में रचे गानों के रूप में जो निशानी वो छोड गये हैं, उन्हें याद करने का और कराने का जो उपक्रम हम सुर-जगत के साथी कर लेते हैं, वह उनके प्रति हमारी छोटी सी श्रद्धांजली ही तो है.


गीतकार योगेश लिख गये है- जिन्होंने सजाये यहां मेले, सुख-दुख संग-संग झेले, वही चुन कर खामोशी, यूँ चले जाये अकेले कहां?

आनंद के इस गीत के आशय को सार्थक करते हुए यह प्रतिभाशाली गुलुकार महज चालीस साल की अपने संगीतयात्रा को सजाकर अकेले कहीं दूर निकल गया.

गीतकार योगेश की बात चल पड़ी है तो आयें, कुछ उनके संस्मरण सुनें, जो हमें शायद सलिलदा के और करीब ले जाये.

आनंद फ़िल्म में योगेश को पहले सिर्फ़ एक ही गीत दिया गया था, सलिलदा के आग्रह पर- कहीं दूर जब दिन ढल जाये. उसके बाद, एक दिन दादा ने एक बंगाली गीत की रिकॉर्ड योगेश के हाथ में रखी, और उसपर बोल लिखने को कहा. यह उस प्रसिद्ध गीत का मूल बंगाली संस्करण था - ना, जिया लागे ना.. योगेश के पास तो ग्रमोफ़ोन तक नहीं था. खैर, कुछ जुगाड़ कर उन्होंने यह मूल गीत सुना और बैठ गये बोल बिठाने.

उधर एक और ग़फ़लत हो गयी थी. फ़िल्म के निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी ने यह गीत गुलज़ार को भी लिखने दे दिया. उन्होंने लिखा - ना ,जिया लागे ना, और योगेश ने लिखा - ना, ना रो अखियां. संयोग से गुलज़ार का गीत रिकॉर्ड हो गया, योगेश का गीत रह ही गया.

एक दिन हृषिकेश दा ने उन्हें बुलाकर उनके हाथ में चेक रख दिया. योगेश ने अचंभित हो कहा- कहीं दूर के तो पैसे मिल गये है. ये फिर किसके लिये? 'ये ना, ना रो अंखियां के पैसे' हृषि दा बोले। "यदि गाना रिकॉर्ड होता तो पैसे ले लेता , मगर यूँ लेना अच्छा नहीं लगता." योगेश ने संकोचवश कहा. अब दादा तो मान नहीं रहे थे, तो सलिलदा ने एक उपाय सुझाया. हम लोग फ़िल्म के टाईटल गीत के लिये एक गाना और लिखवा लेते है योगेश से, तो कैसा रहेगा. योगेश मान गये, और तैयार हुई एक कालजयी, आसमान से भी उत्तुंग संगीत रचना-

ज़िंदगी , कैसी है पहेली हाये, कभी तो हंसाये, कभी ये रुलाये....

जब बाद में राजेश खन्ना ने यह गीत सुना तो उन्होंने हृषि दा को मनाया के यह गीत इतना अच्छा बन पड़ा है तो इसे टाईटल पर जाया ना करें, मगर उन पर पिक्चराईज़ करें. हृषि दा बोले, सिच्युएशन कहां है इस गीत के लिये. राजेश खन्ना ने हठ नहीं छोड़ा, कहा "पैदा कीजिये" . वैसे इस गाने को सिर्फ़ एक दिन में ही चित्रित कर लिया गया.

यहां सलिल दा ने कोरस का जो प्रयोग किया है, उसके बारे में भी आर.डी. बर्मन बोले थे - झकास... ऐसे प्रयोग शंकर जयकिशन ने भी कहीं किये थे. सलिलदा ने उससे भी आगे जा कर एक अलग शैली विकसित की, जिसकी बानगी मिलेगी इन गीतों में -

मेरे मन के दिये (परख), जाने वाले सिपाही से पूछो ( उसने कहा था), ए दिल कहां तेरी मंज़िल (माया), न जाने क्यूं होता है ये (छोटी सी बात), जागो मोहन प्यारे (जागते रहो)

तो यूँ हुआ उस बेहतरीन गीत का आगमन हमारे दिल में. आईये सुनते है:



इसी तरह रजनीगंधा फ़िल्म के प्रसिद्ध गीत 'रजनी गंधा फूल हमारे, यूँ ही महके जीवन में ' लिखने के बाद जब ध्वनिमुद्रित किया गया तो सुन कर फ़िल्म के निर्देशक बासु चटर्जी बोले, सलिल दा, इस गाने को थोड़ा १०-१५ सेकंड छोटा करो. सलील दा को समझ नहीं आया . उन्होंने कहा- तो शूटिंग थोड़ी ज्यादा कर लेना. तो बासु दा बोले - दादा, यह गाना तो पहले ही शूट हो चुका है. दरसल यह गाना बैकग्राऊंड में था!!!

पूरी रिकॉर्डिंग फिर से करने का निश्चय किया गया. मगर एक अंतरे में कुछ अलग बोल थे, जो गाने के सिचुयेशन से मेल नहीं खाते थे. योगेश ने लिखा था-

अपना उनको क्या दूं परिचय
पिछले जन्मों के नाते हैं,
हर बार बदल कर ये काया,
हम दोनो मिलने आते है..
धरती के इस आंगन में.....


फ़िल्म के रशेस देखकर सलिल दा को लगा की नायिका के मन के अंतर्द्वंद का, दो नायकों के बीच फ़ंसी हुई उसकी मनस्थिती का यहां वर्णन जम नहीं रहा है. उन्होंने योगेश से फ़िर लिखने को कहा, और बना यह अंतरा..

हर पल मेरी इन आंखों में
अब रहते है सपने उनके ,
मन कहता है कि मै रंगूँ
एक प्यार भरी बदली बन के,
बरसूं उनके आंगन में....

तो यह गीत भी सुनें, सुरों की सिम्फ़नी के बागा़नों से छन कर आती हुई खुशबू का लुत्फ़ उठाएं-



चलते चलते एक पहेली-
माया फ़िल्म का गीत - ऐ दिल! कहां तेरी मंज़िल, ना कोई दीपक है ,ना कोई तारा है, गु़म है ज़मीं, दूर आसमां.. गीत किसने गाया है?

हमें लगता है दिलीप जी का ये सवाल हमारे संगीत प्रेमियों के लिए बेहद आसान होगा, तो जल्दी से लिख भेजिए हमें, अपने जवाब टिप्पणियों के माध्यम से.

प्रस्तुति - दिलीप कवठेकर
चित्र "रजनीगंधा फूल तुम्हारे" गीत की रिकॉर्डिंग के दौरान का है

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