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शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

रेखा भारद्वाज का स्नेह निमंत्रण ओर अरिजीत की रुमानियत भरी नई गुहार

ताज़ा सुर ताल - 2014 -04 

हमें फिल्म संगीत का आभार मानना चाहिए कि समय समय पर हमारे संगीतकार हमारी भूली हुई विरासत ओर नई पीढ़ी के बीच की दूरी को कुछ इस तरह पाट देते हैं कि समय का लंबा अंतराल भी जैसे सिमट गया सा लगता है. मेरी उम्र के बहुत से श्रोताओं ने इस ठुमरी को बेगम अख्तर की आवाज़ में अवश्य सुना होगा, पर यक़ीनन उनसे पहले भी लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह के दरबार से निकली इस अवधी ठुमरी को बहुत से गुणी कलाकारों ने अपनी आवाज़ में ढाला होगा. लीजिए २०१४ में स्वागत कीजिये इसके एक ओर नए संस्करण का जिसे तराशा संवारा है विशाल -गुलज़ार के अनुभवी हाथों ने ओर आवाज़ के सुरमे से महकाया है रेखा भारद्वाज की सुरमई आवाज़ ने. मशहूर अभिनेत्री ओर कत्थक में निपुण माधुरी दीक्षित नेने एक बार फिर इस फिल्म से वापसी कर रही हैं रुपहले परदे पर. जी हाँ आपने सही पहचाना, देढ इश्किया  का ये गीत फिर एक बार ठुमरी को सिने संगीत में लौटा लाया है, हिंदी फिल्मों के ठुमरी गीतों पर कृष्णमोहन जी रचित पूरी सीरीस का आनंद हमारे श्रोता उठा चुके हैं. आईये सुनते हैं रेखा का ये खास अंदाज़....शब्द देखिये आजा गिलौरी खिलाय दूँ खिमामी, लाल पे लाली तनिक हो जाए....


काफी समय तक संघर्ष करने के बाद संगीतकार सोहेल सेन की काबिलियत पर भरोसा दिखाया सलमान खान ने ओर बने "एक था टाईगर" के हिट गीत, आज आलम ये है कि सोहेल को पूरी फिल्म का दायित्व भी भरोसे के साथ सौंपा जा रहा है. यश राज की आने वाली फिल्म "गुण्डे" में सोहेल ने जोड़ी बनायीं है इरशाद कामिल के साथ. यानी शब्द यक़ीनन बढ़िया ही होंगें. रामलीला की सफलता के बाद अभिनेता रणबीर सिंह पूरे फॉर्म में है, फिल्म में उनके साथ हैं अर्जुन कपूर ओर प्रियंका चोपड़ा. फिल्म का संगीत पक्ष बहुत ही बढ़िया है. सभी गीत अलग अलग जोनर के हैं ओर श्रोताओं को पसंद आ रहे हैं, विशेषकर ये गीत जो आज हम आपको सुना रहे हैं बेहद खास है. रोमानियत के पर्याय बन चुके अरिजीत सिंह की इश्को-मोहब्बत में डूबी आवाज़ में है ये गीत. जिसका संगीत संयोजन भी बेहद जबरदस्त है. धीमी धीमी रिदम से उठकर ये गीत जब सुर ओर स्वर के सही मिश्रण पर पहुँचता है तो एक नशा सा तारी हो जाता है जो गीत खत्म होने के बाद भी श्रोताओं को अपनी कसावट में बांधे रखता है. लीजिए आनंद लीजिए जिया  मैं न जिया  का ओर दीजिए हमें इज़ाज़त.    

मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

आधुनिकता और पारंपरिक अंदाज़ का मधुर मिश्रण है विशाल की संगीत दुनिया

पंचम दा के बाद अगर गुलज़ार साहब के शब्दों का मर्म कोई समझ पाया है तो वो हैं संगीतकार विशाल भारद्वाज. विशाल मौसिकी तक ही सीमित नहीं हैं, वो एक बहतरीन लेखक, स्क्रीन लेखक, और निर्देशक भी हैं. आज हमारे पॉडकास्टर सुनील चिप्दे के साथ आईये हमसफ़र बनें विशाल के अब तक के संगीत सफर की.  

स्वर : सुनील चिप्डे 

प्रस्तुति : संज्ञा टंडन 


सोमवार, 18 जनवरी 2010

"इश्किया" विशाल और गुलज़ार ने दिया नया संगीतमय तोहफा

ताज़ा सुर ताल ०३/ २०१०

सुजॊय - सजीव, यह इस साल के पहले महीने जनवरी का तीसरा 'ताज़ा सुर ताल' है। हमने अब तक इस महीने 'दुल्हा मिल गया', और वीर फ़िल्मों के संगीत की चर्चा की है। इनमें से 'दुल्हा मिल गया' रिलीज़ हो चुकी है, लेकिन फ़िल्म अब तक रफ़्तार नहीं पकड़ पाई है शाहरुख़ ख़ान के होने के बावजूद।

सजीव - और सुजॊय, इसी महीने 'प्यार इम्पॊसिबल' और 'चांस पे डांस' भी प्रदर्शित हो चुकी है, लेकिन बहुत ज़्यादा उम्मीदें इनमें भी नज़र नहीं आ रही। बता सकते हो क्या कारण हो सकता है?

सुजॊय - मुझे तो यही लगता है कि 'अवतार' और '३ इडियट्स' का नशा अभी तक लोगों के ज़हन से उतरा नहीं है। क्या होता है न कि हब कोई फ़िल्म बहुत ज़्यादा हिट हो जाती है, तो उसके ठीक बाद रिलीज़ होने वाली फ़िल्में कुछ हद तक उसकी चपेट में आ ही जाते हैं। अच्छा सजीव, इससे पहले कि हम आज के फ़िल्म की बातें शुरु करें, क्यों न आप जल्दी जल्दी 'प्यार इम्पॊसिबल' और 'चांस पे डांस' के म्युज़िक के बारे में हमारे पाठकों को एक हल्का सा आभास करा दें!

सजीव - ज़रूर! देखो सुजॊय, जहाँ तक 'चांस पे डांस' के म्युज़िक का सवाल है, करीब करीब सभी गानें वेस्टर्ण डांस और फ़्युज़न डांस को आधार बनाकर ही तैयार किए गए हैं। बहुत ज़्यादा फ़ूट टैपरिंग् नंबर्स हैं जो डिस्कोज़ में काफ़ी कामयाब रहेंगे। "ढैन टे नैन" के बाद अब बारी है "पें पें पेपें" के साथ झूमने की। लेकिन इस बार विशाल भारद्वाज नहीं, बल्कि प्रीतम हैं संगीतकार। इस गीत को लोग पसंद कर रहे हैं, शहनाई और पाश्चात्य संगीत का अच्छा फ़्युज़न है इस गीत में।

सुजॊय - सजीव, मेरे पास उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान साहब के शहनाई का एक कैसेट था किसी ज़माने में, उसमें यह धुन थी, और यह कैसेट उस ज़माने में शादियों के रिसेप्शन में अक्सर बजते रहते थे। अच्छा, 'प्यार इम्पॊसिबल' में "टेन ऒन टेन" और "प्यार इम्पॊसिबल" गीतों के अलावा तो कोई गीत सुनने को ही नहीं मिला कहीं पर। मेरा ख़याल है कि इस फ़िल्म के संगीत में चर्चा करने लायक कोई भी ख़ास बात नहीं है। उदय चोपड़ा और प्रियंका चोपड़ा की जोड़ी को भी लोग पचा नहीं पाए।

सजीव - ख़ैर, आओ अब आते हैं आज की फ़िल्म पर जिसके गानें हम सुनेंगे भी और चर्चा भी करेंगे। पहला गाना पहले सुनों और बताओ कि आज किस फ़िल्म के संगीत को लेकर मैं हाज़िर हुआ हूँ।

गीत: दिल तो बच्चा है...Dil to bachha hai (ishqiya)


सुजॊय - वाह वाह, आज आप 'इश्किया' लेकर आए हैं। मैं भी कल सोच ही रहा था कि कब हम इस फ़िल्म को शामिल करेंगे। बेहद ख़ास फ़िल्म होने वाली है यह। और जहाँ तक इस गीत का सवाल है, राहत फ़तेह अली ख़ान का गाया हुआ, एक अलग ही अंदाज़ का और लीग से हट कर गाना है। और हम इस मंच पर ख़ास तौर पे उन फ़िल्मों को ही शामिल करते हैं जिनके संगीत में कुछ अहम बात दिखाई दे, क्यों सजीव?

सजीव - बिल्कुल सही कहा। और पता है इस फ़िल्म के गानें क्यों लीग से हट के है? क्यों कि इन्हे लिखा है गुलज़ार साहब ने। उनके ग़ैर पारम्परिक लेखनी जारी है और "दिल तो बच्चा है जी" में भी उन्होने उसी अंदाज़ का परिचय दिया है।

सुजॊय - 'माचिस', 'ओमकारा', और 'कमीने' जैसी कामयाब फ़िल्मों के बाद गुलज़ार साहब और विशाल भारद्वाज एक बार फिर से गीतकार संगीतकार जोड़ी के रूप में इस फ़िल्म में सामने आए हैं। अच्छा अभी हाल के कुछ सालों में राहत फ़तेह अली ख़ान ने कई लोकप्रिय गानें गाए हैं, ख़ास कर प्रीतम और साजिद वाजिद जैसे संगीतकारों के लिए। अब देखिए इस फ़िल्म में विशाल ने भी उनसे गाना लिया और क्या ख़ूब सुफ़ीयाना अंदाज़ का प्रदर्शन किया है राहत साहब ने!

सजीव - इस गीत में जो गीटार का इस्तेमाल हुआ सुनाई देता है, उसमें एक स्पनिश फ़ील सी आई है, और विशाल साहब तो भली भांति जानते हैं कि किस तरह से भारतीय और वेस्टर्ण म्युज़िक को मिक्स किया जाता है। कुल मिलाकर एक बेहद फ़्रेश गीत सुना हमने। मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि यह गीत लोगों की जुबान से जल्द हटने वाला नहीं। हर कोई अपने दिल को बच्चा करार देने पर लगा है। चलो अब बारी है दूसरे गीत की। तो सुन लेते हैं यह गीत।

गीत: इब्न-ए-बतूता बगल में जूता...ibn-e-batuta (ishqkiya)


सुजॊय - फ़ुर्‍र्‍र्‍र‍र्‍र्‍ चुर्‍र्‍र्‍र‍र्‍र्‍ फ़ुर्‍र्‍र्‍र‍र्‍र्‍ चुर्‍र्‍र्‍र‍र्‍र्‍

सजीव - अरे अरे अरे ये क्या कर रहे हो?

सुजॊय - ओ हो सॊरी, गाना ख़तम हो गया? मैं तो बस गीत का मज़ा ले रहा था! बहुत दिनों के बाद कुछ अलग हट के गानें सुनने को मिले हैं ना तो इसलिए मैं उनमें बह सा गया था। जैसा संगीत भी मज़ेदार है, बोल तो और भी लाजवाब! गुलज़ार साहब अगैन ऐट हिज़ बेस्ट!

सजीव - बिल्कुल, और सुखविंदर सिंह और मिका की मस्ती भरी आवाज़ों ने और फ़ूट टैपरिंग् रीदम ने गाने को एक पेप्पी फ़ीलिंग् दी है। यह गीत ना हमें केवल किसी गाँव के खेतों की हरियाली में खींच ले जाते हैं, बल्कि एक हास्य रस का आभास भी कराते है। "थोड़ा आगे गतिरोधक है" जैसे बोल गुलज़ार साहब के कलम से ही निकलते रहे हैं।

सुजॊय - अब इससे पहले की अगले गीत की तरफ़ हम बढ़ें, आइए कुछ जानकारी हम अपने श्रोताओं व पाठकों को दे दें इस फ़िल्म के बारे में। विशाल भारद्वाज की फ़िल्म है और निर्देशक हैं अभिशेक चौबे। फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं नसीरुद्दिन शाह, अरशद वारसी और विद्या बालन प्रमुख। गीतकार संगीतकार तो बता ही चुके हैं। दरसल 'इश्किया' बॊलीवुड की कोई फ़ॊर्मुला फ़िल्म नहीं है। इस बात का अंदाज़ा तो कोई भी इस बात से लगा ही सकता है कि फ़िल्म में नसीरुद्दिन शाह मुख्य भूमिका में हैं। यह फ़िल्म है दो गैंग्स्टर्स (हूलीगन्स) और एक आकर्षक गाँव की लड़की की। अब इस फ़िल्म की कहानी के बारे में पहले से ही बताने की ग़ुस्ताख़ी मैं नहीं करूँगा, वरना अगली बार से पाठक हमें पढ़ना ही बंद कर देंगे।

सजीव- हाँ, और फ़िल्मों का मज़ा तो थियटर में जाकर ख़ुद देखने में ही है। चलो अब तीसरा गाना सुनते हैं रेखा भारद्वाज की आवाज़ में। और इसमें है गुलज़ार साहब की शायरी। इस ग़ज़ालनुमा गीत में रेखा जी ने एक बार फिर से साबित किया है कि आज की दौर में उनकी गायकी एक बहुत ही ख़ास मुक़ाम रखती है।

सुजॊय - यह गीत टूटे सपनों के बारे में है, जीवन के प्यास के बारे में है, क़रार के बारे में है। अब और ज़्यादा कहने की ज़रूरत नहीं, सीधे सुनते हैं इस गीत को।

गीत: अब मुझे कोई इंतज़ार कहाँ...Ab mujhe koi intezaar (ishiqiya)


सजीव- वाह! मज़ा आ गया है! और अब रेखा जी की ही आवाज़ में एक और गीत जो मेरा इस ऐल्बम का सब से फ़ेवरीट गीत है। "बड़ी धीरे जली रैना, धुआँ धुआँ नैना"। फ़िल्म 'वीर' में "कान्हा" गाने के बाद एक बार फिर से कुछ शास्त्रीय अंदाज़ में रेखा की आवाज़ इस गीत को एक अलग ही मुक़म तक लेके गई हैं। गीत तो वैसे फ़्युज़न ही है, बीट्स वेस्टर्ण है, लेकिन कुल मिलाकर यह गीत बिल्कुल इस मिट्टी से जुड़ा हुआ है। पर्क्युशन का सही इस्तेमाल किया है विशाल ने।

सुजॊय - एक और ख़ास बात क्या है इन सभी गीतों में पता है? ये गानें अपने आप में इतने सशक्त हैं कि इन्हे सुनते हुए हम इस बात को अपने दिमाग़ में भी लाए कि ये गानें किन कलाकारों पर फ़िल्माए गए होंगे! ये ख़ुद ही अपनी पहचान रखते हैं और ये किसी तरह के फ़िल्मांकन की मोहताज नहीं बनेंगे, ऐसा मेरा ख़याल है। अब लग रहा है कि २०१० के दशक में फ़िल्म संगीत में क्रांति की नई लहर आएगी और एक अलग ही सुरीला दौर एक बार फिर से जी उठेगा। चलिए सुनते हैं यह गीत।

गीत: बड़ी धीरे जली रैना...badi dhiire jali (ishiqiya)


"इश्किया" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****१/२
इस जोड़ी से हमेशा ही उम्मीद रहती है, दिल तो बच्चा है के बोल बेहद मजेदार हैं, और धुन में राज कपूर एरा का रेट्रो अंदाज़ खूब जमता है, इब्ने-बतूता एकदम तरोताज़ा है और जिस अंदाज़ से "फुर्र्र" बोला जाता है देर तक कानों में गूंजता रह जाता है, रेखा के गाये दोनों ही गीत गुलज़ार की चिर परिचित ग्लूमी अंदाज़ के हैं, बड़ी धीरे जली में लाइव वाध्यों का सुन्दर इस्तेमाल हुआ है, अन्तरो के बीच बजते संगीत में गजब का आकर्षण है, इन्हें सुनते हुए आप पूरा दिन बिता सकते हैं फिर भी ऊब नहीं पायेगें...इस वर्ष की बहुत अच्छी संगीतमयी शुरुआत हुई है इशिकिया और कुछ हद तक वीर के संगीत के चलते...इश्किया को आवाज़ ने दिए साढ़े चार तारों की रेटिंग...

अब पेश है आज के तीन सवाल-

TST ट्रिविया # 07-सन् १९६२ में सम्पूरण सिंह एक मशहूर फ़िम निर्माता-निर्देशक के सहायक बने थे। बताइए उस निर्माता-निर्देशक का नाम।

TST ट्रिविया # 08-"दिल में ऐसे संभलते हैं ग़म जैसे कोई ज़ेवर संभालता है। टूट गए, नाराज़ हो गए, अंगूठी उतारी, वापस कर दिए। कंगन उतारे, सात फेरों के साथ वापस कर दिए। पर बाक़ी ज़ेवर जो दिल में रख लिए उनका क्या होगा?" ये अल्फ़ाज़ कहे थे गुलज़ार साहब ने विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में। इन अल्फ़ाज़ों को पढ़कर आपको क्या लगता है कि गुलज़ार साहब ने इसके बाद कौन सा अपना गाना बजाया होगा?

TST ट्रिविया # 09-'जुर्म और सज़ा' तथा 'ज़िंदगी और तूफ़ान' जैसी फ़िल्मों को आप विशाल भारद्वाज के साथ कैसे जोड़ सकते हैं?


TST ट्रिविया में अब तक -
सीमा जी एक बार आगे बड़ी चली जा रही हैं ३ में से २ सही जवाब देकर आपने कमाए ४ और अंक, बधाई...

गुरुवार, 13 अगस्त 2009

ये बरकत उन हज़रत की है....मोहित चौहान ने किया कबूल गुलज़ार के शब्दों में

ताजा सुर ताल (14)

जीव - नमस्कार दोस्तों, मैं हूँ सजीव और मेरे साथ है, आवाज़ के हमकदम सुजॉय...

सुजॉय - सभी दोस्तों को मेरा नमस्कार...

सजीव - सुजॉय लगता है ताज़ा सुर ताल धीरे धीरे अपने उद्देश्य में कामियाब हो रहा है. बिलकुल वैसे ही जैसे ओल्ड इस गोल्ड का उद्देश्य आज की पीढी को पुराने गीतों से जोड़ना था, ताज़ा सुर ताल का लक्ष्य संगीत की दुनिया में उभरते नये नामों से बीती पीढी को मिलवाना है और देखिये पिछले अंक में शरद जी ने हमें लिखा कि उन्होंने मोहित चौहान का नाम उस दिन पहली बार सुना था हमें यकीं है शरद जी अब कभी इस नाम को नहीं भूलेंगे...

सुजॉय - हाँ सजीव, ये स्वाभाविक ही है. जैसा कि उन्होंने खुद भी लिखा कि जिन दिग्गजों को वो सुनते आ रहे हैं उनके समक्ष उन्हें इन गायकों में वो दम नज़र नहीं आता. पर ये भी सच है कि आज की पीढी इन्हीं नए कलाकारों की मुरीद है तो संगीत तो बहता ही रहेगा...फनकार आते जाते रहेंगें...

सजीव - बिलकुल सही....इसलिए ये भी ज़रूरी है कि हम समझें आज के इस नए दौर के युवाओं के दिलों पर राज़ कर रहे फनकारों को भी. तो सुजॉय जैसा कि हमने वादा किया था कि हम मोहित के दो गीत एक के बाद एक सुनवायेंगे, तो आज कौन सा गीत लेकर आये हैं आप मोहित का...कहीं ये वो तो नहीं जो इन दिनों हर किसी की जुबां पर है ?

सुजॉय - बिलकुल सही पहचाना....पहले प्यार का पहला पहला नजराना...

सजीव - पहले प्यार की बहुत अहमियत है जीवन में....कहते हैं प्यार बस एक ही बार होता है....यानी जो पहला है वही आखिरी भी....क्या मैं सही कह रहा हूँ ?

सुजॉय - १९९३ में जब "हम आपके हैं कौन" प्रर्दशित हुई थी तो उसका एक गीत "पहला पहला प्यार है..." इतना लोकप्रिय हो गया था कि युवा दिलों का एक एंथम जैसा बन गया था...कुछ वैसा ही अब है २००९ में आये फिल्म "कमीने" के इस गीत की बात. बहुत कुछ इस दरमियाँ बदल गया बस नहीं बदला तो यही पहला पहला प्यार....जहाँ अब ये मोहर भी लग गयी है कि यही आखिरी प्यार भी है....

सजीव - इस पहले और आखिरी प्यार को अभिव्यक्ति दी है गुलज़ार साहब ने....उनका लेखन सबसे अलहदा है -

याद है पीपल कि जिसके घने साए थे,
हमने गिलहरी के झूठे मटर खाए थे,
ये बरकत उन हज़रत की है...

सुजॉय - हाँ "ख्वाब के बोझ से....पलकों का कंपकपाना" भी बहुत खूब है, एक बात और ये जो शब्द है "टीपना" (गाल पे), ये बंगला में हम लोग बहुत इस्तेमाल करते हैं, पर हिंदी में इस शब्द का अधिक इस्तेमाल नहीं होता, पर गुलज़ार साहब ने यहाँ बहुत बढ़िया ढंग से पिरोया है गाने में.

सजीव - अब कोई ऐसे शब्द लिखे तो हम तारीफ कैसे न करें भाई....पर जितने सुंदर शब्द है उतना ही सूथिंग और मन लुभावना संगीत है विशाल का और इस तरह के गीत मोहित के फोर्टे हैं जैसा कि हम पहले भी बता चुके हैं. पिछली बार हमने श्रोताओं से पुछा था कि मोहित का सबसे पहला गीत कौन सा था.....हमें सही जवाब नहीं मिला....सुजॉय आप बताएं कि सही जवाब क्या था.

सुजॉय - फ़िल्म संगीत में मोहित चौहान ने क़दम रखा एक 'लो बजट' फ़िल्म 'लेट्स एंजोय' में एक गीत गा कर, जिसके शुरूआती बोल थे "सब से पीछे"। इस गीत ने भले ही उन्हे सब से आगे ला कर खड़ा नहीं किया लेकिन उनकी गाड़ी चल पड़ी थी। थोड़े ही समय में उन्होने फ़िल्म 'रोड' का मशहूर गीत "पहली नज़र में करी थी" गा कर रातों रात सब की नज़र में आ गये। उसके बाद तो जे. ओम प्रकाश मेहरा की क्रांतिकारी फ़िल्म 'रंग दे बसंती' में रहमान ने उनसे गवाया ऐसा गीत जिसने बॉलीवुड के पार्श्वगायक समुदाय में हलचल पैदा कर दी। जी हाँ, वह गीत था "ख़ून चला"। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि मोहित चौहान को किसी तरह की संघर्ष नहीं करना पड़ा, उन्होने इस संगीत की दुनिया में कई कई बार वापसी की और फिर से गुमनामी में खो गये। लेकिन पिछले कुछ महीनों में उनके गाये हुए गीतों को सुनकर अब ऐसा लगने लगा है कि मोहित भाई साहब यहाँ एक लम्बी पारी खेलने वाले हैं।

सजीव - हाँ बिलकुल, वैसे मुझे उनका गाया फिल्म "मैं मेरी पत्नी और वोह" का "गुंचा कोई" सबसे अधिक पसंद है. पर कमीने का ये गीत भी दोस्तों कुछ कम नहीं है. हालाँकि शुरू के बोलों को सुन कर कुछ कुछ "माँ" गीत जो कि फिल्म "तारे ज़मीन पर" का है उसकी याद आती है पर बाद में गीत का अपना एक मोल्ड बन जाता है. आवाज़ की टीम ने इस गीत को भी दिए हैं ४ अंक ५ में से. अब आप सुनें और बतायें कि आपके हिसाब से इस ताज़ा गीत को कितने अंक मिलने चाहिए.

सुजॉय - हाँ बोल कुछ इस प्रकार हैं -

थोड़े भीगे भीगे से थोड़े नम हैं हम,
कल से सोये वोए भी कम हैं हम,
दिल ने कैसी हरकत की है,
पहली बार मोहब्बत की है...
आखिरी बार मोहब्बत की है....

ऑंखें - डूबी डूबी सी सुरमई मध्यम...
झीलें - पानी पानी बस तुम और हम....
बात बड़ी हैरत की है....
पहली बार.....

ख्वाब के बोझ से कंपकपाती हुई,
हल्की पलकें तेरी, याद आता है सब,
तुझे गुदगुदाना, सताना,
यूहीं सोते हुए,
गाल पे टीपना, मीचना ,
बेवजह, बेसबब...
याद है पीपल कि जिसके घने साए थे,
हमें गिलहरी के झूठे मटर खाए थे...
ये बरकत उन हज़रत की है...
पहली बार....



आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 4 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

क्या आप जानते हैं ?
आप नए संगीत को कितना समझते हैं चलिए इसे ज़रा यूं परखते हैं. गीतकार पियूष मिश्रा ने गुलाल के बाद एक ताजा तरीन फिल्म में एक दिग्गज संगीतकार के साथ काम किया है, कौन सी है ये फिल्म और कौन हैं वो संगीतकार ? बताईये और हाँ जवाब के साथ साथ प्रस्तुत गीत को अपनी रेटिंग भी अवश्य दीजियेगा.

पिछले सवाल का सही जवाब हम दे ही चुके हैं, हमारे श्रोताओं में से कोई इसे सही नहीं पकड़ पाया. पर ख़ुशी इस बात की है कि लगभग सभी श्रोताओं ने रेटिंग देकर हमारा हौंसला बढाया है. जमे रहिये आवाज़ के सगीत सफ़र में यूहीं....


अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

गुरुवार, 23 जुलाई 2009

एक दिल से दोस्ती थी ये हुज़ूर भी कमीने...विशाल भारद्वाज का इकरारनामा

ताजा सुर ताल (12)

त्मावलोकन यानी खुद के रूबरू होकर बीती जिंदगी का हिसाब किताब करना, हम सभी करते हैं ये कभी न कभी अपने जीवन में और जब हमारे फ़िल्मी किरदार भी किसी ऐसी अवस्था से दोचार होते हैं तो उनके ज़ज्बात बयां करते कुछ गीत भी बने हैं हमारी फिल्मों में, अक्सर नतीजा ये निकलता है कि कभी किस्मत को दगाबाज़ कहा जाता है तो कभी हालतों पर दोष मढ़ दिया जाता है कभी दूसरों को कटघरे में खडा किया जाता है तो कभी खुद को ही जिम्मेदार मान कर इमानदारी बरती जाती है. रेट्रोस्पेक्शन या कन्फेशन का ही एक ताजा उदाहरण है फिल्म "कमीने" का शीर्षक गीत. फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ जिंदगी को तो बा-इज्ज़त बरी कर दिया है और दोष सारा बेचारे दिल पर डाल दिया गया है, देखिये इन शब्दों को -

क्या करें जिंदगी, इसको हम जो मिले,
इसकी जाँ खा गए रात दिन के गिले....
रात दिन गिले....
मेरी आरजू कामिनी, मेरे ख्वाब भी कमीने,
एक दिल से दोस्ती थी, ये हुज़ूर भी कमीने...


शुरू में ये इजहार सुनकर लगता है कि नहीं ये हमारी दास्तान नहीं हो सकती, पर जैसे जैसे गीत आगे बढता है सच आइना लिए सामने आ खडा हो जाता है और कहीं न कहीं हम सब इस "कमीनेपन" के फलसफे में खुद को घिरा हुआ पाते हैं -

कभी जिंदगी से माँगा,
पिंजरे में चाँद ला दो,
कभी लालटेन देकर,
कहा आसमान पे टांगों.
जीने के सब करीने,
थे हमेशा से कमीने,
कमीने...कमीने....
मेरी दास्ताँ कमीनी,
मेरे रास्ते कमीने,
एक दिल से दोस्ती थी, ये हुज़ूर भी कमीने...

शायद ही किसी हिंदी गीत में "कमीने" शब्द इस तरह से प्रयोग हुआ हो, शायद ही किसी ने कभी गीत जिंदगी का इतना बोल्ड अवलोकन किया हो. इस डार्क टेक्सचर के गीत में तीन बातें है जो गीत को सफल बनाते है. विशाल ने इस गीत के जो पार्श्व बीट्स का इस्तेमाल किया है वो एकदम परफेक्ट है गीत के मूड पर, अक्सर स्वावलोकन में जिंदगी बेक गिअर में भागती है, कई किरदार कई, किस्से और संगीत संयोजन शब्दों के साथ साथ एक अनूठा सफ़र तय करता है, दूसरा प्लस है विशाल की खुद अपनी ही आवाज़ जो एक दम तटस्थ रहती है भावों के हर उतार चढावों में भी इस आवाज़ में दर्द भी है और गीत के "पन्च" शब्द 'कमीने' को गरिमापूर्ण रूप से उभारने का माद्दा भी और तीसरा जाहिर है गुलज़ार साहब के बोल, जो दूसरे अंतरे तक आते आते अधिक व्यक्तिगत से हो जाते हैं -

जिसका भी चेहरा छीला,
अन्दर से और निकला,
मासूम सा कबूतर,
नाचा तो मोर निकला,
कभी हम कमीने निकले,
कभी दूसरे कमीने,
मेरी दोस्ती कमीनी,
मेरे यार भी कमीने...
एक दिल से दोस्ती थी,
ये हुज़ूर भी कमीने....

अब हमारा अवलोकन किस हद तक सही है ये तो आप गीत सुनकर ही बता पायेंगें.चलिए अब बिना देर किये सुन डालिए ताजा सुर ताल में फिल्म "कमीने" का ये गीत -



आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 4 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

क्या आप जानते हैं ?
आप नए संगीत को कितना समझते हैं चलिए इसे ज़रा यूं परखते हैं. फिल्म "ओमकारा" में भी संगीतकार विशाल ने एक युगल गीत को आवाज़ दी थी, कौन सा था वो गीत, बताईये और हाँ जवाब के साथ साथ प्रस्तुत गीत को अपनी रेटिंग भी अवश्य दीजियेगा.

पिछले सवाल का सही जवाब था अध्ययन सुमन जो कि टेलीविजन ऐक्टर शेखर सुमन के बेटे हैं. दिशा जी ने एकदम सही जवाब दिया जी हाँ उन्होंने फिल्म राज़ (द मिस्ट्री) में भी काम किया था, और तभी से महेश भट्ट कैम्प के स्थायी सदस्य बन चुके हैं. तनहा जी ने फिल्म "हाले-ए- दिल" का भी जिक्र किया. त्रुटि सुधार के लिए आप दोनों का धन्येवाद. मंजू जी, मनीष जी, निर्मला जी, प्रज्ञा जी ने भी गीत को पसंद किया. मनु जी रेटिंग आपने लिख कर बतानी है जैसे 5 में से 3, २ या १ इस तरह.:) वर्ना हम कैसे जान पायेंगें कि आपकी रेटिंग क्या है.


अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

बुधवार, 15 जुलाई 2009

आजा आजा दिल निचोड़े....लौट आई है गुलज़ार और विशाल की जोड़ी इस जबरदस्त गीत के साथ

ताजा सुर ताल (9)

रसों पहले मनोज कुमार की फिल्म आई थी- "रोटी कपडा और मकान", यदि आपको ये फिल्म याद हो तो यकीनन वो गीत भी याद होगा जो जीनत अमान पर फिल्माया गया था- "हाय हाय ये मजबूरी...". लक्ष्मीकांत प्यारेलाल थे संगीतकार और इस गीत की खासियत थी वो सेक्सोफोन का हौन्टिंग पीस जो गीत की मादकता को और बढा देता है. उसी पीस को आवाज़ के माध्यम से इस्तेमाल किया है विशाल भारद्वाज ने फिल्म "कमीने" के 'धन ताना न" गीत में जो बज रहा है हमारे ताजा सुर ताल के आज के अंक में. पर जो भी समानता है उपरोक्त गीत के साथ वो बस यहीं तक खत्म हो जाती है. जैसे ही बीट्स शुरू होती है एक नए गीत का सृजन हो जाता है. गीत थीम और मूड के हिसाब से भी उस पुराने गीत के बेहद अलग है. दरअसल ये धुन हम सब के लिए जानी पहचानी यूं भी है कि आम जीवन में भी जब हमें किसी को हैरत में डालना हो या फिर किसी बड़े राज़ से पर्दा हटाना हो, या किसी को कोई सरप्राईस रुपी तोहफा देना हो, तो हम भी इस धुन का इस्तेमाल करते है, हमारी हिंदी फिल्मों में ये पार्श्व संगीत की तरह खूब इस्तेमाल हुआ है, शायद यही वजह है कि इस धुन के बजते ही हम स्वाभाविक रूप से गीत से जुड़ जाते हैं. "ओमकारा" और "नो स्मोकिंग" के बाद विशाल भारद्वाज और गुलज़ार साहब की हिट जोड़ी लौटी है इस गीत के साथ -

आजा आजा दिल निचोड़े,
रात की मटकी फोडें,
कोई गुड लक् निकालें,
आज गुल्लक तो फोडें...


सुखविंदर की ऊर्जा से भरी हुई आवाज़ को सुनकर यूं भी जोश आ जाता है, साथ में जो गायक हैं उनका चयन एक सुखद आश्चर्य है, ये हैं विशाल शेखर जोड़ी के विशाल दादलानी. जब एक संगीतकार किसी दूसरे संगीतकार की आवाज़ का इस्तेमाल अपने गीत के लिए करे तो ये एक अच्छा चिन्ह है.

दिल दिलदारा मेरा तेली का तेल,
कौडी कौडी पैसा पैसा पैसे का खेल....
धन ताना ताना न न.....


गुलज़ार साहब अपने शब्द चयन से आपको कभी निराश नहीं करते, बातों ही बातों में कई बड़े राज़ भी खोल जाते हैं वो जिन्दगी के. गौर फरमाएं -

आजा कि वन वे है ये जिन्दगी की गली
एक ही चांस है....
आगे हवा ही हवा है अगर सांस है तो ये रोमांस है....
यही कहते हैं यही सुनते हैं....
जो भी जाता है जाता है, वो फिर से आता नहीं....

आजा आजा....

संगीत संयोजन विशाल का अद्भुत है जो पूरे गाने में आपको चूकने नहीं देता. बेस गीटार की उठती हुई धुन, और ताल का अनोखा संयोजन गीत को ऐसी गति देता है जो उसके मूड को पूरी तरह जचता है -

कोई चाल ऐसी चलो यार अब कि समुन्दर भी
पुल पे चले,
फिर मैं चलूँ उसपे या तू चले शहर हो अपने पैरों तले...
कई खबरें हैं, कहीं कब्रे हैं,
जो भी सोये हैं कब्रों में उनको जगाना नहीं.....

आजा आजा....


शहर की रात और सपनों की उठान, मस्ती और जीने की तेज़ तड़प, बहुत कम समय में बहुत कुछ पाने की ललक, ये गीत इस सभी जज्बातों को एकदम सटीक अभिव्यक्ति देता है. आर डी बर्मन साहब के बाद यदि कोई संवेदनात्मक तरीके गुलज़ार साहब की काव्यात्मक लेखनी को परवाज़ दे सकता है तो वो सिर्फ और सिर्फ विशाल भारद्वाज ही हैं. ख़ुशी की बात ये है कि फिल्म "कमीने" के संगीत ने इस जोड़ी की सफलता में एक पृष्ठ और जोड़ दिया है, अन्य गीतों का जिक्र आगे, अभी सुनते हैं फिल्म "कमीने" से ये दमदार गीत.



आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 4 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

क्या आप जानते हैं ?
आप नए संगीत को कितना समझते हैं चलिए इसे ज़रा यूं परखते हैं. विशाल के संगीत निर्देशन में एक सूफी गीत दिलेर मेहंदी ने गाया है, गुलज़ार साहब का लिखा. क्या याद है आपको वो गीत ? और हाँ जवाब के साथ साथ प्रस्तुत गीत को अपनी रेटिंग भी अवश्य दीजियेगा.



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

गुरुवार, 17 जुलाई 2008

"बटाटा वड़ा...ये समुन्दर...संगीत...तुम्हे इन छोटी छोटी चीज़ों में कितनी खुशी मिलती है..."

आवाज़ पर आज दिन है - Music video of the month का, हमारी टीम आपके लिए चुन कर लाएगी -एक गीत जो सुनने में तो कर्णप्रिय हो ही, साथ ही उसका विडियो भी एक शानदार प्रस्तुति हो, यानि कि ऐसा गीत जो पांचों इन्द्रियों को संतृप्त करें, हमारी टीम की पसंद आपको किस हद तक पसंद आएगी, ये तो आपकी टिप्पणियां ही हमें बतायेंगीं.

आज हम जिस गीत का विडियो लेकर उपस्थित हैं, वो गीत है फ़िल्म "सत्या" का, सत्या को राम गोपाल वर्मा, एक Hard Core Realistic फ़िल्म बनाना चाहते थे, तो जाहिर है, गीत संगीत के लिए, उसमें कोई स्थान नही था, पर जब फ़िल्म बन कर तैयार हुई, तो निर्माता जिद करने लेगे फ़िल्म में गीत डाले जायें ताकि फ़िल्म की लम्बाई बढ़े और Audio प्रचार भी मिल सके, अन्तता रामू जी को अपनी जिद छोडनी पड़ी, उन दिनों माचिस के गीतों से हिट हुई जोड़ी, विशाल भारद्वाज और गुलज़ार, को चुना गया इस काम के लिए, पटकथा में परिस्थियाँ निकाली गयीं और आनन फानन में ५ गीत रिकॉर्ड हुए और फिल्माए गए, फ़िल्म बेहद कामियाब रही, और संगीत ने लोगों के दिलों में अपनी खास जगह बनाई, "सपने में मिलती है" और "गोली मार भेजे में" आदि गीत अधिक चले, पर आज आपके लिए, जो गीत हम चुन कर लाये हैं इस फ़िल्म का, वो कुछ ख़ास है, इसकी हर बात निराली है, हालाँकि बहुत अधिक मशहूर नही हुआ, पर गुलज़ार साब के बेहतरीन गीतों में से एक है - यह गीत. इसमें इनकी विशिष्ट शैली खूब जम कर झलकती है, बानगी देखिये -

बादलों से काट काट कर,
कागजों पे नाम जोड़ना,
डोरियों से बाँध बाँध कर,
रात भर चाँद तोड़ना, और...
जामुनों की नर्म डाल पर,
नाखूनों से नाम खोदना.....


विशाल का संगीत, गीत को मूड को पूरी तरह से स्थापित करता है, Guitar का पीस सुनने लायक है, इस गीत से लंबे अरसे बाद Playback Singing में वापसी की, गायक भूपेंद्र ने, गुलज़ार के कोमल शब्दों को बहुत सलीके से अपनी रेशमी आवाज़ में उतारते रहें हैं भूपेंद्र, हमेशा से,और यह गीत भी अपवाद नही रहा इस मामले में.

अब बात करें चित्रांकन की. तो इसमे कोई शक नहीं कि इस मुलायम से गीत को बेहद उन्दा तरीके से परदे पर उतरा है, निर्देशक ने.

नायक एक Angry Young Man है जो मुंबई शहर में ख़ुद को बहुत सहज महसूस करता है, वह चुप चुप रहता है ख़ुद में दबा दबा, संवेदनाएं मर चुकी हैं, और कंक्रीट के शहर में तो बस जीते जाना भी जैसे, एक उपलब्धि है, मगर जब वो नायिका को देखता है तो उसे लगता है, कि वो किसी और ही दुनिया की है,और उसे दिखता है- गुनगुनाता एक आबशार.

गाने के बीच में कुछ संवाद भी है -

नायक - "तुम्हे इन छोटी छोटी चीज़ों में कितनी खुशी मिलती है,…बटाटा वड़ा, ये समुन्दर, संगीत, ये सब...."

नायिका - "हाँ... मगर यही तो जिन्दगी है..."

नायक - "मुझे पहली बार महसूस हो रहा है"


इस छोटे से संवाद में महानगरीय जीवन की तमाम पीडा झलकती है, जहाँ हर खुशी है दामन में, बस जीने के लिए वक्त नही है...लगभग पूरा गीत Outdoor Shoot हुआ है, और पार्श्व में दिख रहा मुंबई महानगर भी एक किरदार बन कर उभर कर आता है, यूँ तो दोनों कलाकारों ने बेहतरीन काम किया है, पर उर्मिला मातोंडकर अपनी नैसर्गिग सुन्दरता और उत्कृष्ट अभिनय से पूरे गीत पर छायी हुई लगती है, कैमरा के सुंदर प्रयोग ने. हर फ्रेम में जैसे जान डाल दी है.

आप भी देखिये और सुनिए ये लाजावाब गीत, और अपनी राय से हमें अवगत कराएँ -



Series - Music Video of the Month Episode 1
Song - Badalon Se...
Album/ Film - Satya
Lyrics - Gulzaar
Music - Vishal Bhardwaj
Singer - Bhupendra
Director - Ram Gopal Verma
Artists - Chakraborthy, Urmila Matondkar, and Mumbai City

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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