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Friday, March 13, 2009

"इन हाथों की ताज़ीम करो..."- अली सरदार जाफरी के बोल और शुभम् का संगीत

आवाज़ पर इस सप्ताह हमने आपको मिलवाया कुछ ऐसे फनकारों से जो यूँ तो आवाज़ और हिंद युग्म से काफी लम्बे समय से जुड़े हुए हैं पर किसी न किसी कारणवश मुख्य धारा से नहीं जुड़ पाए. इसी कड़ी में आज मिलिए -
दिल्ली के शुभम् अग्रवाल से




संगीतकार शुभम् अग्रवाल युग्म से उन दिनों से जुड़े हैं जब युग्म की पहली एल्बम "पहला सुर" पर काम चल रहा था. शुभम् कुछ सरल मगर गहरे अर्थों वाले गीत तलाश रहे थे, पर बहुत गीत भेजने के बावजूद उन्हें कुछ जच नहीं रहा था. फिर तय हुआ कि उनकी किसी धुन पर लिखा जाए. बहरहाल गीत लिखा गया और इस बार उन्हें पसंद भी आ गया. वो गीत अपनी अंतिम चरण में था पर तभी उन्हें लगा कि उनकी गायकी, गीत के बोल और धुन का सही ताल मेल नहीं बैठ पा रहा है. "पहला सुर" को प्रकाशित करने का समय नजदीक आ चुका था, और शुभम् उलझन में थे. उन दिनों वो मेरठ में थे, फिर दिल्ली आ गए. दूसरे सत्र के शुरू होने तक दिल्ली आकर शुभम् बेहद व्यस्त हो गए. पर निरंतर संपर्क में रहे. यहाँ उन्होंने अपनी नयी कंपनी के लिए एक जिंगल भी बनाया. वो आवाज़ से जुड़ना चाहते थे और युग्म भी अपने इस प्रतिभाशाली संगीतकार/गायक को अपने माध्यम से आप सब तक पहुँचने को बेताब था. इसी उद्देश्य से आज हम पहली बार आपके समुख लेकर आये हैं, शुभम् अग्रवाल के संगीत और गायिकी का एक नमूना जहाँ उन्होंने साहित्य अकादमी से सम्मानित मशहूर उर्दू शायर अली सरदार जाफ़री की एक उन्दा ग़ज़ल को अपने सुरों और आवाज़ से सजाया है. तो आनंद लीजिये इस ग़ज़ल का -






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