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बुधवार, 31 दिसंबर 2014

नववर्ष विशेष: 1934 से 2014 -- 9 दशक, 9 गीत



नववर्ष विशेष

बीते नौ दशकों के नौ चुनिन्दा गीत और उनसे जुड़ी कुछ यादें

विदा 2014



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, आज साल 2014 का अंतिम दिन है। एक और साल बीत गया और एक और नया साल दरवाज़े पर दस्तक देने के लिए बेताब हो रहा है। फ़िल्म संगीत के इतिहास में आज जब हम पीछे मुड़ कर देखते हैं तो ध्यान आता है कि आठ दशक तो पूरे हो ही चुके हैं, नवे दशक के भी चार साल बीत चुके हैं। इस दशकों में फ़िल्म संगीत अनेक दौर से गुजरता गया और एक स्वरूप से दूसरे स्वरूप में ढलता गया। 2014 से पीछे की तरफ़ चलें तो 2004, 1994, 1984, 1974.... से लेकर 1934 तक के नौ दशकों का यह सुरीला सफ़र बड़ा ही सुहाना रहा। तो आज इस विशेष दिन के अवसर पर क्यों ना पिछले 9 दशकों के इन 9 सालों से 9 गीत चुन कर उनके साथ जुड़ी कुछ स्मृतियों को आपके सामने रखे जायें। तो आनन्द लीजिये आज की इस नववर्ष विशेष प्रस्तुति का, और साथ ही स्वीकार कीजिए नववर्ष की हमारी हार्दिक शुभकामनायें। 


1934: "प्रेम नगर में बनाऊंगी घर मैं" (चण्डीदास)

उमा शशि और कुन्दनलाल सहगल का गाया फ़िल्म 'चण्डीदास' का यह युगल गीत शायद फ़िल्म-संगीत इतिहास का पहला-पहला लोकप्रिय युगल गीत रहा। सहगल साहब के बारे में समय समय पर कई कलाकारों ने अपने अपने विचार व्यक्त किये हैं। उन्हीं में से एक हैं गायक तलत महमूद। सहगल साहब से अपनी मुलाक़ात को याद करते हुए तलत साहब ने कहा था - "मैं क्या बताऊँ आपको, मैं इस क़दर दीवाना था उनका अपने स्कूल के ज़माने में, अपने कॉलेज के ज़माने में, हमेशा उनके गाने गाता था, कभी ख़याल भी नहीं था कि कभी उनसे मुलाक़ात होगी। लेकिन जब 'न्यू थिएटर्स' में 1945 में मेरा दो साल का कॉनट्रैक्ट हुआ तो उनकी पिक्चर बन रही थी 'माइ सिस्टर'। तकरीबन उसके सारे गाने मेरे सामने पिक्चराइज़ हुए। कुछ तो काम था ही नहीं, सुबह से, उस ज़माने में स्टुडियो 9:15 बजे जाइये और 5 बजे आइये, जैसे ऑफ़िस का टाइम होता था। तो हम लोग स्टुडियो में होते थे, जब भी कोई गाना वगेरह होता था तो हम लोग वहाँ रहते थे, और मेरी ज़िन्दगी की सबसे हसीन-तरीन यादगार वह मुलाक़ात है सहगल साहब से जो मैं सोच भी नहीं सकता, आज भी मुझे यकीन नहीं आता है कि उनसे मेरी मुलाक़ात हुई थी क्योंकि वाक़ई उनको हम एक अजूबा समझते थे, और उनके साथ, ख़याल कीजियेगा, उनके साथ हमेशा पार्टियों में जाते थे, उनके घर पे जाते थे, बहुत पुर-मज़ाकयात भी थे और पार्टी की जान थे बिल्कुल! मगर यह होता था कि जब खाना वाना खा चुके होते थे तो औरतों को भेज दिया करते थे कि आप लोगों के लायक ये लतीफ़े नहीं हैं। तो औरतों को हमेशा एक तरफ़ कर देते थे, फिर मर्दों की पार्टी जमती थी। और फिर आप देखिये कि उसमें वाक़ई इस क़दर ख़ुशमिज़ाज आदमी थे, इतने नर्म-दिल कि अगर ज़रा सी भी तक़लीफ़ हो आपको तो सब काम करने को तैयार रहते थे। जो कुछ भी मैंने उनको देखा था थोड़े से अरसे में, उस से अंदाज़ा हो गया कि बेहतरीन क़िस्म के आदमी थे वो, और जिस वक़्त गाते थे ऐसा लगता था कि नूर की बारिश हो रही है।" तो आइये अब सुनते हैं उमा शशि और सहगल साहब का गाया 1934 का यह गीत-



1944: "अखियाँ मिलाके जिया भरमाके चले नहीं जाना" (रतन)

1944 का साल संगीतकार नौशाद के करीयर का ‘टर्निंग पॉयण्ट ईयर’ साबित हुआ। ‘जेमिनी पिक्चर्स’ के बैनर तले डी. एन. मधोक ने बनाई ‘रतन’ जिसके प्रदर्शित होते ही चारों तरफ़ धूम मच गई और नौशाद उस दौर के प्रथम श्रेणी के संगीतकारों में शामिल हो गए। नौशाद ने इस फ़िल्म में ज़ोहराबाई अम्बालेवाली से “अखियाँ मिलाके जिया भरमाके चले नहीं जाना” गवाकर चारों तरफ़ तहल्का मचा दिया। नौशाद अपने परिवार के ख़िलाफ़ जाकर संगीत में अपनी क़िस्मत आज़माने बम्बई आ गए थे। उनके संगीतकार बन जाने के बाद और सफलता हासिल कर लेने के बाद भी उनकी इस कामयाबी को सामाजिक कारणों से अच्छी निगाहों से नहीं देखा गया। उन्हीं के शब्दों में एक मज़ेदार क़िस्से का आनन्द लीजिए यहाँ पर – “ख़ैर, माँ का पैग़ाम आया कि शादी के लिए लड़की तय हो गई है, मैं घर आ जाऊँ। उस वक़्त मैं नौशाद बन चुका था। माँ ने कहा कि लड़की वाले सूफ़ी लोग हैं, इसलिए उनसे उन्होंने (नौशाद के पिता ने) यह नहीं कहा कि तुम संगीत का काम करते हो, बल्कि तुम दर्ज़ी का काम करते हो। मैंने सोचा कि संगीतकार से दर्ज़ी की इज़्ज़त ज़्यादा हो गई है! तो शादी में शामियाना लगाया गया, और बैण्ड वाले मेरे ही गाने बजाए जा रहे हैं और मैं दर्ज़ी बना बैठा हूँ। किसी ने फिर कहीं से कहा कि कौन ये सब बजा रहा है, सबको ख़राब कर रहा है? उस समय यही सब गाने चल रहे थे, “सावन के बादलों”, “अखियाँ मिलाके” वगैरह।”  चलिए अब आप भी आनन्द लीजिये इसी गीत का।



1954: "नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाये न बने" (मिर्ज़ा ग़ालिब)

1950 के आसपास 40 के दशक की सिंगिंग्‍ सुपरस्टार सुरैया की शोहरत में कुछ कमी आने लगी ही थी कि सोहराब मोदी की फ़िल्म 'मिर्ज़ा ग़ालिब' ने एक बार फिर उन्हें सोहरत की बुलन्दी पर पहुँचा दिया। इस फ़िल्म में उन्होंने मिर्ज़ा ग़ालिब की मेहबूबा चौधवीं बेग़म का रोल अदा किया था। शायराना अन्दाज़ वाले पंडित नेहरु ने सुरैया को इस फ़िल्म के लिए शाबाशी दिया था। यह वह फ़िल्म है जिसकी पेशानी पर राष्ट्रपति पुरस्कार का तिलक लगाया गया था। इस ख़ूबसूरत मुहुर्त को याद करते हुए सुरैया ने कहा था - "ज़िन्दगी में कुछ मौक़े ऐसे आते हैं जिनपे इंसान सदा नाज़ करता है। मेरी ज़िन्दगी में भी एक मौक़ा ऐसा आया था जब फ़िल्म 'मिर्ज़ा ग़ालिब' को प्रेसिडेण्ट अवार्ड मिला और उस फ़िल्म का एक ख़ास शो राष्ट्रपति भवन में हुआ जहाँ हमने पंडित नेहरु जी के साथ यह फ़िल्म देखी थी। पंडित नेहरु हर सीन में मेरी तारीफ़ करते और मैं फूली न समाती। इस वक़्त पंडित जी की याद के साथ मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़ल पेश है "नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाये न बने, क्या बने बात जहाँ बात बनाये न बने"।



1964: "कर चले हम फ़िदा जान-ओ-तन साथियों" (हक़ीक़त)

संगीतकार मदन मोहन के ऑफ़िशिअल वेबसाइट से 'हक़ीक़त' से जुड़ी कुछ बातें जानने को मिलती हैं। उस समय की एक और महत्वपूर्ण फ़िल्म थी 'हक़ीक़त'। युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनने वाली इस फ़िल्म में गीत-संगीत के लिए बहुत कम ही जगह थी। लेकिन "मैं यह सोच कर उसके दर से उठा था", "ज़रा सी आहट होती है", "खेलो ना मेरे दिल से", "होके मजबूर उसने मुझे बुलाया होगा" और "अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों" जैसे कैफ़ी आज़्मी के लिखे गीतों को रच कर मदन मोहन ने अपने आप को सिद्ध किया। 'हक़ीक़त' ही वह फ़िल्म थी जिसने मदन मोहन में फिर एक बार अभिनय करने की लालसा उत्पन्न की। फ़िल्म 'परदा' के बन्द हो जाने पर मदन मोहन को अभिनय से दिलचस्पी चली गई थी। केवल 'मुनीमजी' और 'आँसू' में उन्होंने थोड़ा बहुत अभिनय किया। लेकिन जब चेतन आनन्द ने उन्हें 'हक़ीक़त' में एक रोल निभाने का मौका दिया तो वो उत्साहित हो उठे। उन्हीं के शब्दों में - "मैं इस ऑफ़र से इतना उत्साहित हुआ कि मैं दर्जनो उलझने एक तरफ़ रख कर, सारे काम जल्दी जल्दी निपटा कर दिल्ली के लिए प्लेन से रवाना हो गया। बाकी यूनिट उस समय लदाख के लिए निकल चुकी थी।" पहले ख़ुद आर्मी रह चुके मदन मोहन के दिल में फिर एक बार आर्मी यूनिफ़ॉर्म पहन कर आर्मी सोलजर का रोल निभाने का लालच था। लेकिन उनका यह सपना हक़ीक़त न हो सका। श्रीनगर में करीब करीब एक सप्ताह इन्तज़ार करने के बाद भी जब मौसम साफ़ नहीं हुआ, तो निराश होकर उन्हें बम्बई वापस लौटना पड़ा। "मैंने सोचा था कि इस ट्रिप से मैं कुछ यादगार लम्हे सहेज कर लाऊंगा, पर मेरे साथ वापस आया कुछ ऊनी कपड़े जिन्हें मैंने दिल्ली से खरीदा था उस सफ़र के लिए।"



1974: "मेरा जीवन कोरा कागज़ कोरा ही रह गया" (कोरा कागज़)

"यह गाना मेरी ज़िन्दगी का भी आइना है। मेरे साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ। और शायद किशोर कुमार के साथ भी यही हुआ हो! क्योंकि इस गाने के रेकॉर्डिंग्‍ के दौरान उनकी आँखें आंसुओं से भीगे हुए थे। जब तक हम इस ज़िन्दगी को समझ पाते हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है और ज़िन्दगी ही गुज़र जाती है।" ये शब्द थे इस गीत के गीतकार एम. जी. हशमत के। और इसी गीत के निर्माण से जुड़ा हुआ एक मज़ेदार क़िस्से का ज़िक्र एक बार आनदजी भाई ने किया था। किशोर कुमार इस फ़िल्म की मूल कहानी को बांगला में पढ़ चुके थे, उन्हें फ़िल्म का अन्त मालूम था कि नायक-नायिका में मिलन हो जाता है। इसलिए किशोर दा ने फ़िल्म के निर्देशक अनिल गांगुली के सामने यह प्रश्न रख दिया कि क्या फ़िल्म के अन्तिम सीन में "मेरा जीवन कोरा कागज़" ही बजेगा या कुछ और सोचा है? अनिल दा हक्के-बक्के होकर कल्याणजी-आनन्दजी के पास गये और पूछा कि क्या करना चाहिये। सुझाव आया कि इंस्ट्रुमेण्टल बजा दिया जाये। उस पर किशोर दा बोले कि इंस्ट्रुमेण्टल भी तो "मेरा जीवन कोरा कागज़" का ही बजेगा न? वहाँ मौजूद गीतकार हशमत साहब ने कहा कि कुछ करते हैं इस पर। तो किशोर दा ने कहा कि बाद में आऊंगा तो फिर पैसे लूंगा अलग से। आनदजी के पास जाकर मज़े लेते हुए किशोर दा बोले कि 'महाराज, देखा फसाया ना! किशोरिया ने कैसे पकड़ा तुम को! बड़े वन-टू वन-टू करते हो न, अब करो वन-टू'। आनन्द जी के शब्दों में - "हम लोग हशमत जी से बात कर रहे थे, तो वो सोच रहे थे कि 'मेरा जीवन...' को चेंज कर पाना मुश्किल है। तो हमने कहा कि आप अन्तरे पे जाओ, कुछ नई बात करते हैं। मैंने कहा कि पहले एक कोटेशन दो, कि ऐसा-ऐसा होता है, उदाहरण दो, फिर उसके फ़ाइनल रेज़ल्ट पे आयेंगे कि इसमें यह होता है। हम ये सब काम कर रहे थे और किशोर दा आ आ कर डिस्टर्ब कर रहे थे कि कुछ लिखा महाराज? फस गये न? मेरा जीवन टुंग्‍ टुंग्‍ टुंग्‍...। मैंने कहा कि दादा प्लीज़। बोले, अभी क्यों प्लीज़? तो मैं उनको (एम. जी. हशमत को) लेके बाहर गया, बोला उदाहरण क्या देंगे कि जब डेलिवरी करती है तो माँ को तकलीफ़ होती है; बोले कि हाँ होती है। तो लिखो 'दुख के अन्दर सुख की ज्योति, और दुख ही सुख का ज्ञान'। ऐसा करते करते बन गया कि 'दर्द सहते जनम लेता हर कोई इंसान'। रेज़ल्ट देना है कि फ़ाइनल क्या है, 'वह सुखी है जो दर्द सह गया'। उसका रेज़ल्ट क्या है, 'सुख का सागर बन के रह गया'। अब ये सब कम्प्लीट हो गया, तब किशोर बोले कि चलो लिखो, हो गया? हाँ हो गया। वज़न में तो है? हाँ, वज़न में भी है, बेवज़न में भी है। उनको हमने कहा कि थैंक-यू दादा, आपकी वजह से यह पूरा हो गया, पूरी बात हो गई। और आज तीस साल हो गये इस गाने को।"



1984: "जाने क्या बात है, नींद नहीं आती" (सनी)

फ़िल्म 'सनी' में इस ख़ूबसूरत ग़ज़लनुमा गीत को लता मंगेशकर ने गाया था। वैसे तो राहुल देव बर्मन की ट्यूनिंग्‍ गुलज़ार के साथ बेहतरीन जमती थी, पर इस गीत में आनन्द बक्शी के साथ भी क्या कमाल किया है उन्होंने! इसी गीत का बांगला संस्करण पंचम ने आशा भोसले से गवाया था जिसके बोल थे "चोखे नामे बृष्टि"। लता जी के साथ साथ आशा जी को भी यह गीत और यह धुन इतनी पसन्द थी कि आशा जी ने अपने 74 वर्ष की आयु में पंचम को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए अपने ऐल्बम 'Asha Reveals Real RD' में गाया था। लता और आशा के चाहनेवाले अक्सर लता और आशा के संस्करणों की तुलना करते हैं। पर दोनो सुनने के बाद यह बताना मुश्किल हो जाता है कि कौन किससे बेहतर है। यही ख़ास बात है लता की आवाज़ की सागदी में और आशा की आवाज़ की शोख़ी में! एक बार पंचम, आशा और गुलज़ार एक कार्यक्रम में एकत्रित हुए थे और उसमें आशा जी ने अपने पति पर यह आरोप लगाया था कि सारी सुन्दर तर्ज़ें वो उनकी बड़ी बहन को दे देते हैं। इस पर पंचम और गुलज़ार आशा को समझाते हुए अपना अपना तर्क देते हैं। पंचम के अनुसार यह आरोप ग़लत है क्योंकि उन्होंने आशा को भी एक से एक बेहतरीन गाने दिये हैं गाने के लिए। गुलज़ार ने भी पंचम का साथ देते हुए कहा कि 'ख़ुशबू' में जब "घर जायेगी तर जायेगी" कम्पोज़ हुआ था तब उन्होंने पंचम से कहा था कि यह गाना  आशा जी गायेंगी। उन्होंने आशा जी को याद भी दिलाया कि जब यह गाना उन्होंने आशा जी से गवाने की बात की तो आशा जी ने ही प्रश्न किया था कि यह तो हीरोइन का गाना है, यह गाना आप मुझे कैसे दे सकते हैं? गुलज़ार ने आगे कहा कि "आपको चुप रहना होगा आशा जी, क्योंकि सिर्फ़ 'ख़ुशबू' के ही नहीं, 'इजाज़त' के तमाम गाने भी आप ने गाये हुए हैं, और 'नमकीन' के भी। इसलिए ऐसा नहीं है कि सारे गाने लता जी को ही देते हैं।" इतने पर आशा जी ने कहा कि मैं तो मज़ाक कर रही थी। पर गुलज़ार साहब रुके नहीं, कहने लगे, "आप दोनो का मैं बताऊँ क्या है, आशा जी, आपको पता है चाँद पर किसने सबसे पहले क़दम रखा है? नील आर्मस्ट्रॉंग्। उनके बाद एडविन ने दूसरा क़दम रखा। बस, एक स्टेप से वो पीछे थे, और देखिये सभी आर्मस्ट्रॉंग् की ही बात करते हैं। एडविन, जो उनके पीछे ही थे, उनको किसी ने याद नहीं रखा। एडविन ने भी वही किया जो आर्मस्ट्रॉंग् ने किया; आपकी अचीवमेण्ट बिल्कुल वैसी ही है, उतनी ही है जितनी दीदी की, पर छोटी हैं तो छोटी हैं, क्या किया जाये! यह तो फ़क़्र की बात है कि वो आपकी बड़ी बहन हैं।" तो चलिए, दोनो सुर-साम्राज्ञियों को सलाम करते हुए फ़िल्म 'सनी' का यह गीत सुनें।



1994: "एक ऐसी लड़की थी जिसे मैं प्यार करता था" (दिलवाले)

क्या ख़ूब चला था यह गीत उस ज़माने में। हर दूसरे दिन फ़रमाइशी कार्यक्रमों में बज उठता था रेडियो पर। और फ़ौजी जवानों को तो ख़ास पसन्द था यह गीत! तो क्यों न इस गीत को सुनने से पहले इस गीत के संगीतकार जोड़ी नदीम-श्रवण के श्रवण राठौड़ का संदेश सुन लेते हैं जो उन्होंने फ़ौजी जवानों को कहे थे अपनी 'विशेष जयमाला' कार्यक्रम में। "जयमाला सुनने वाले सभी फ़ौजी भाइयों को श्रवण का, यानी कि नदीम-श्रवण का नमस्कार! मैं जानता हूँ कि आप बम्बई से कितनी दूर रह कर हमारे देश हिन्दुस्तान की रक्षा कर रहे होंगे, जहाँ पर अगर बर्फ़ है तो बर्फ़ के सिवा कुछ भी नहीं, रेगिस्तान है तो रेत के सिवा कुछ भी नहीं, और पहाड़ है तो पहाड़ों के सिवा कुछ नहीं। आप जिस निष्ठा और संकल्प से अपना काम कर रहे हैं, मेरे पास तो क्या किसी के भी पास कोई शब्द नहीं। हमारी पहली हिट फ़िल्म थी 'आशिक़ी' जिससे नदीम-श्रवण नदीम-श्रवण बने। इससे पहले हमने 17 साल कड़ी संघर्ष की, और 17 साल बाद ईश्वर ने हमें फल दिया। 1980 में जब हम स्ट्रगल कर रहे थे, काफ़ी सारे प्रोड्युसर्स को अपनी धुने सुनाया करते थे। उनमें से एक थे ताहिर हुसैन साहब, जो आमिर ख़ान के पिताजी हैं। हम उनके पास गये और कहा कि 'सर, हमें चांस दे दीजिये'। हमने उनको बहुत सारे गीतों की धुने सुनाई, पहला गीत जो हमने सुनाया वह कौन सा था यह मैं आपको थोड़ी देर बाद बताऊंगा, तो हम लोग दो तीन घंटों तक उनको धुने सुनाते गये। दूसरे दिन जब हम उनके पास गये तो उन्होंने कहा कि म्युज़िक अच्छा है लेकिन मैचुरिटी की कमी है। हम अपसेट हो गये कि ताहिर साहब ने यह क्या कह दिया, हमने इतनी मेहनत की थी इन धुनो पर। ख़ैर, बीस साल बाद जब हमारी 'आशिक़ी', 'दिल है कि मानता नहीं', और 'सड़क' हिट हो गई, तो ताहिर साहब ने हमें बुलाया और कहा कि एक फ़िल्म साथ में करते हैं और कहा कि उन्हें एक हिट गाना चाहिये। तो यह वही गाना है जो हमने बीस साल पहले सबसे पहले उनको सुनाया था। और यह गाना था "घुंघट की आढ़ से दिलबर का"। इस गीत से अलका यागनिक को फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड मिला और ताहिर साहब भी बहुत ख़ुश हुए। इस वाक्या से हमें यह मोरल मिला कि हिम्मत कभी नहीं हारनी चाहिये, एक ना एक दिन कामयाबी ज़रूर मिलेगी।" तो इसी सीख को अपनाते हुए सुनते हैं फ़िल्म 'दिलवाले' का गीत कुमार सानू और अलका यागनिक की आवाज़ों में।



2004: "ये जो देस है तेरा, स्वदेस है तेरा" (स्वदेस)

हिन्दी सिनेमा संगीत के इतिहास में पाँच संगीतकारों को क्रान्तिकारी संगीतकार होने का ख़िताब हासिल है। ये हैं मास्टर ग़ुलाम हैदर, सी. रामचन्द्र, ओ. पी. नय्यर, राहुल देव बर्मन और पाँचवा नाम है ए. आर. रहमान का। रहमान की अनोखी प्रतिभा और अनोखा संगीत उन्हें भीड़ से अलग करता है। ए. आर. रहमान बहुत कम बोलते हैं, और साक्षात्कार भी बड़ी मुश्किल से ही देते हैं। और न ही विविध भारती के पास उनका कोई साक्षात्कार या जयमाला मौजूद है। इसलिए रहमान साहब के अपने शब्द तो यहाँ प्रस्तुत नहीं कर पाये, पर 'स्वदेस' फ़िल्म की एक अन्य गीत के बारे में बता रहे हैं इस फ़िल्म के गीतकार जावेद अख़्तर साहब - "स्वदेस फ़िल्म ने तो मुझे हार्ट-अटैक होने के मोड़ पर ले गया था जब मुझसे यह कहा गया कि मुझे लोकेशन पर ही एक गीत लिखना है और वहीं रेकॉर्ड करना है, और वह भी गीत रामलीला का एक पार्ट है। हम सब उस समय वाई में थे, मेरे पास कोई रेफ़रेन्स नहीं था और वो मुझसे सीता और रावण के बीच अशोकवाटिका का एक सीन लिखवाना चाहते थे। मैंने उनसे कहा कि आप जानते हैं कि आप मुझसे क्या कह रहे हैं? मुझे इसके लिए तुलसीदास का रामचरितमानस पढ़ना पड़ेगा और इसके लिए मुझे कम से कम दस दिन चाहिये। आशुतोष ने कहा कि ए. आर. रहमान अगले दिन ही निकल रहे हैं तीन महीने के लिए और इसलिए गाना कल ही रेकॉर्ड करना पड़ेगा। मैं डर गया, मैं हमेशा इस दिन के आने से डरता था कि मुझे एक सिचुएशन बताया जायेगा और मैं उस पर लिख नहीं पाऊँगा। उस दिन मैं जल्दी सो गया और अगली सुबह 5 बजे उठ गया और लिखने बैठ गया, सोचा कि कोशिश करके देख लिया जाये। और "पल पल है भारी विपदा है आयी" सूरज उगले से पहले तैयार हो गया। मैंने कैसे लिखा आज तक समझ नहीं पाया।" इस गीत को हम फिर कभी सुनेंगे, चलिए आज सुनते हैं फ़िल्म 'स्वदेस' का शीर्षक गीत ए. आर. रहमान के स्वर में।



2014: "मैं तैनु समझावाँ कि, ना तेरे बिना" (हम्पटी शर्मा की दुल्हनिया)

2010 के इस वर्तमान दशक में फ़िल्मी गीतों पर पंजाबी बोलों और सूफ़ी शैली के संगीत की प्रचूरता पायी जा रही है। हर दौर का अपना एक अलग अंदाज़ होता है, एक चलन होता है, एक ऑडियन्स होता है; इन्हीं के बल पर गीतों की सफलता टिकी होती है। 2014 में रिलीज़ होने वाली फ़िल्मों और उनके गीतों को ग़ौर से सुनने के बाद मुझे जो गीत सबसे ज़्यादा पसन्द आया वह है अरिजीत सिंह और श्रेया घोषाल का गाया फ़िल्म 'हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया' का "मैं तैनु समझावाँ कि, ना तेरे बिना लगदा जी...", जिसे लोगों ने भी ख़ूब सराहा और इस साल का एक चार्टबस्टर गीत सिद्ध हुआ। यह गीत दरसल एक पुनर्निर्मित गीत (recreated song) है जिसका मूल गीत पंजाबी फ़िल्म 'वीरसा' का है राहत फ़तेह अली ख़ान और फ़रहा अनवर की आवाज़ों में, और उस मूल गीत के संगीतकार हैं जावेद अहमद। 'हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया' के लिए इसे रि-क्रीएट किया शरीब-तोशी ने। इसी तरह से मूल गीतकार हैं अहमद अनीस और हिन्दी फ़िल्मी वर्ज़न में गीतकार कुमार ने अपनी तरफ़ से कुछ बोल डाले हैं। कुछ लोगों का कहना था कि अगर राहत साहब की आवाज़ को ही रखी जाती तो बेहतर होता, पर कुछ लोगों को अरिजीत का अंदाज़ भी अच्छा लगा। ख़ैर, हिन्दी फ़िल्म संगीत का नौ-वाँ दशक चल रहा है, संगीत की यह धारा एक बहुत ही लम्बा रास्ता तय करती आई है और आगे भी बहुत दूर तक जाएगी इसमें कोई संदेह नहीं है। इन नौ गीतों को सुन कर मन में विश्वास पैदा होती है कि अच्छा संगीत अभी भी ख़त्म नहीं हुआ है। अगर सुनने वालों की रुचि अच्छी हो, तो बनाने वाले भी अच्छा ही संगीत रचेंगे, अच्छे और अर्थपूर्ण बोल लिखे जायेंगे। इसी आशा के साथ और आप सभी को नववर्ष 2015 की अग्रिम शुभकामनाएँ देते हुए मैं, सुजॉय चटर्जी, आप से आज विदा लेता हूँ, नमस्कार! आप सुनिए साल 2014 का यह सुन्दर गीत...




कल यानी 1 जनवरी को ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की एक और नववर्ष विशेष प्रस्तुति को पढ़ना/सुनना ना भूलिएगा



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र

शुक्रवार, 10 जुलाई 2009

मैं ये सोच कर उसके दर से उठा था...रफी साहब के गाये बहतरीन नज्मों में से एक

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 137

'ओल्ड इज़ गोल्ड' में इन दिनों हम उस सुर साधक की बातें कर रहे हैं जिनका अंदाज़ था सब से जुदा, जिनका संगीत कानों से होते हुए सीधे रूह में समा जाता है। वह संगीत, जो कभी प्रेम, कभी विरह, कभी पीड़ा, तो कभी प्यार में समर्पण की भावना जगाती है। अपने संगीत से श्रोताओं को बेसुध कर देनेवाले उस सुर-गंधर्व को हम और आप मदन मोहन के नाम से जानते हैं। 'मदन मोहन विशेष' के तीसरे अंक में आज हम उनके संगीत के जिस रंग को लेकर आये हैं वह रंग है अपनी महबूबा से बिछड़ने की घड़ी में दिल से निकलती पुकार, कि काश वो एक बार हमें जाने से रोक ले। छुट्टी पर आये सैनिक को अचानक तार मिलता है कि पड़ोसी मुल्क ने हमारे देश पर हमला बोल दिया है और उसे तुरंत सीमा पर पहुँचना है। ऐसे में एक दम से महबूबा से जुदा होने का ख़याल सैनिक के दिल को दहलाकर रख देता है। क्या पता कि फिर कभी उन से इस ज़िंदगी में मुलाक़ात हो, ना हो! १९६४ में बनी चेतन आनंद की फ़िल्म 'हक़ीक़त' की हम बात कर रहे हैं, जिसके मुख्य कलाकार थे चेतन आनंद और प्रिया राजवंश। १९६२ के 'इंडो-चायना वार' पर आधारित इस फ़िल्म की कहानी बहुत ही मार्मिक थी। चेतन आनंद को इस फ़िल्म के लिए भरपूर सराहना तो मिली ही, ऐसी युद्ध वाली फ़िल्म में भी बेहद सुरीला संगीत देकर मदन मोहन साहब ने उस से भी ज़्यादा प्रशंसा बटोरी। यूं तो युद्ध की पृष्ठभूमी पर केन्द्रित कई फ़िल्में बनीं हैं और उनमें वीर रस के कई गानें भी शामिल हुए हैं, लेकिन 'हक़ीक़त' के रफ़ी साहब का गाया "कर चले हम फ़िदा जान-ओ-तन साथियों" को सुनकर एक अजीब सी अनुभूती होती है। न चाहते हुए भी आँखें भर आती हैं हर बार, रोंगटें खड़े हो जाते हैं, यह गीत उन जाँबाज़ सैनिकों के लिए हमें अपना सर श्रद्धा से झुकाने पर विवश कर देती है। लेकिन रफ़ी साहब की ही आवाज़ में आज का प्रस्तुत गीत भले ही वीर रस से ओत प्रोत न हो, लेकिन उसमें भी कुछ ऐसी बात है कि यकायक आँखें नम सी हो जाती हैं। मैने पहले भी दो एक बार कहा है कि कुछ गानें ऐसे होते हैं कि जिनके बारे में ज़्यादा कहना नहीं चाहिए बल्कि सिर्फ़ उसे सुनकर दिल से महसूस करनी चाहिए, यह गीत भी इसी श्रेणी में आता है। इस फ़िल्म के गीतों में मदन साहब का जितना योगदान है, उतना ही योगदान है गीतकार और शायर कैफ़ी आज़्मी का, जिनके कलेजा चीर कर रख देने वाले बोलों ने फ़िल्म के गीतों को अमर बना दिया है।

यह तो आप को पता ही होगा कि लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी के प्यारेलाल-जी शुरु शुरु में वायलिन बजाया करते थे। कई संगीतकारों के लिए उन्होने बजाया और उनमें से एक मदन मोहन भी थी। स्वतंत्र संगीतकार बन जाने के बाद भी कुछ समय तक उन्होने दूसरे संगीतकारों के गीतों में अपने वायलिन के जलवे दिखाये हैं, और फ़िल्म 'हक़ीक़त' का प्रस्तुत नग़मा इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। आइए जानते हैं इस गीत मे प्यारेलाल जी के योगदान के बारे में ख़ुद उन्ही के शब्दों में, जो उन्होने विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' शृंखला में कहे थे - "एक गाना मैं आप को, एक हादसा बताऊँ मैं आप को, कि 'हक़ीक़त' पिक्चर के अंदर मदन मोहन जी का "मैं यह सोचकर उसके दर से", तो यह गाना रिकार्ड हो रहा था महबूब स्टुडियोज़ के अंदर। इस गीत में पहले 'फ़्ल्युट सोलो' था, और 'पियानो सोलो' था, लेकिन बाद में, मुझे मालूम नहीं क्यों, मदन जी बाहर आये और बात की सोनिक जी से। सोनिक-ओमी, तो सोनिक जी से बात की कि 'भई कुछ चेंज करना है', और ऐसा था कि जो शुरु से लेकर आख़िर तक आप सिर्फ़ 'वायलिन' सुनेंगे, और एंड में जाकर पियानो आता है।" दोस्तों, कहने का तात्पर्य यह है कि पहले इस गीत के लिए बाँसुरी और पियानो की धुन रखी गयी थी, लेकिन बाद में पूरे गीत में केवल प्यारेलाल जी का वायलिन रखा गया। गीत में बस यही एक साज़ मुख्य रूप से सुनायी देता है, और बिछड़ने के दर्द भरे पल को और भी ज़्यादा सजीव बनानें में वायलिन जो कमाल दिखा सकता है वह कोई और साज़ नहीं दिखा सकता तो लीजिये, मदन मोहन, कैफ़ी आज़्मी, मोहम्मद रफ़ी, प्यारेलाल और चेतन आनंद को सलामी देते हुए सुनते हैं आज का यह दिल को छू लेनेवाला गीत।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. मदन साहब ने बेहद खूबसूरत गीत दिए थे इस फिल्म में.
2. आशा -रफी के युगल स्वर है इस गीत में.
3. पहला अंतरा शुरू होता है इन शब्दों से -"ऐ रात..."

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी एक बार फिर बाज़ी मार गए, ४२ अंकों के लिए बधाई जनाब. सवाल आसान था, पर स्वप्न जी का कंप्यूटर धोखा दे गया. मनु जी, रचना जी, सुमित जी, मीत जी और दिलीप जी उम्मीद है आप सब मदन मोहन साहब पर प्रस्तुत इस श्रृंखला का भरपूर आनंद ले रहे होंगें.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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