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Showing posts from February, 2012

"नादान परिन्दे घर आजा" - अर्थपूर्ण गीत आज भी बनते हैं फ़िल्मों के लिए

२०१२ के फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ गीतकार का ख़िताब दिया गया है इरशाद कामिल को फ़िल्म 'रॉकस्टार' के गीत "नादान परिन्दे" के लिए। साथ ही सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का ख़िताब दिया गया है ए. आर. रहमान को इसी फ़िल्म के लिए। आइए आज करें इसी गीत की चर्चा 'एक गीत सौ कहानियाँ' की नौवीं कड़ी में, सुजॉय चटर्जी के साथ... एक गीत सौ कहानियाँ # 9 अक्सर हम लोगों को यह चर्चा करते हुए पाते हैं कि पहले की तुलना में फ़िल्मी गीतों का स्तर गिर गया है, अब वह बात नहीं रही फ़िल्मी गीत-संगीत में। काफ़ी हद तक यह बात सच भी है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि इसमें केवल कलाकारों का दोष नहीं। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत समाज का ही आइना होता है, जो समय चल रहा है, जो दौर जारी है, समाज की जो रुचि है, वही सब कुछ फ़िल्मों और फ़िल्मी गीतों में नज़र आते हैं। और यह भी उतना ही सच है कि अगर कलाकार चाहे तो तमाम पाबन्दियों, तमाम दायरों में बंधकर भी अच्छा काम किया जा सकता है। ख़ास तौर से गीतकारों की बात करें तो गुलज़ार और जावेद अख़्तर जैसे गीतकार आज भी कामयाबी के शिखर पर हैं अपने ऊँचे स्तर को गिरा

२९ फरवरी - आज का गाना

गाना:  तुम्हीं हो माता, पिता तुम्ही हो चित्रपट: मैं चुप रहूँगी संगीतकार: चित्रगुप्त गीतकार: राजिंदर कृशन गायिका: लता मंगेशकर तुम्हीं हो माता, पिता तुम्ही हो, तुम्ही हो बंधु सखा तुम्ही हो तुम्ही हो साथी तुम्ही सहारे, कोई न अपना सिवा तुम्हारे तुम्ही हो नय्या तुम्ही खिवय्या, तुम्ही हो बंधु सखा तुम्ही हो जो खिल सके ना वो फूल हम हैं, तुम्हारे चरनों की धूल हम हैं दया की दृष्टि सदा ही रखना, तुम्ही हो बंधु सखा तुम्ही हो

रश्मि प्रभा के साथ आज ब्लोग्गेर्स चोईस में हैं मशहूर ब्लॉगर यशवंत माथुर

आज अपनी पसंद के गीतों के साथ हमारे वक़्त में योगदान दे रहे हैं यशवंत माथुर. गीत तो वही होते हैं, पर पसंद और असर अलग अलग होते हैं. बमुश्किल गीतों के समंदर की गहराई से इन गीतों को चुना है और मैं उन्हें यहाँ पिरो रही हूँ ...कहते हैं इन गीतों के लिए यशवंत जी, कि इन गीतों का जीवन से यही संबंध हैं कि इन्हें सुन कर मन मे एक अलग ही उत्साह की भावना आती है और कभी कभी आने वाली निराशा में यह गाने मुझे एक सच्चे दोस्त की तरह प्रेरित करते हैं। साथ ही इन गानों को सुन कर कुछ लिखने के लिये भी मूड बन जाता है। ...आप आनंद उठाइए इन गीतों का, और मैं भी जरा अब इन्हें सुनूँ रुक जाना नहीं तू कभी हार के (किशोर कुमार) लक्ष्य को हर हाल मे पाना है (फिल्म लक्ष्य का टाइटिल ट्रैक) बादल पे पाँव है (चक दे इंडिया) धूप निकलती है जहां से (फिल्म -क्रिश) कैसी है ये रुत थी जिसमें फूल बन के दिल खिले (फिल्म दिल चाहता है) यशवंत माथुर 

२८ फरवरी - आज का गाना

गाना:  रे मन सुर में गा चित्रपट: लाल पत्थर संगीतकार: शंकर - जयकिशन गीतकार: नीरज गायक, गायिका: आशा भोसले, मन्ना डे रे मन सुर में गा कोई तार बेसुर न बोले, न बोले रे मन सुर में गा ... जीवन है सुख दुःख का संगम मध्यम के संग जैसे पंचम दोनों को एक बना रे मन सुर में गा ... दिल जो धड़के ताल बजे रे ताल ताल में समय चले रे समय के संग हो जा रे मन सुर में गा ... जग है गीतों की रजधानी सुर है राजा लय है रन्नी साज़ रूप बन जा रे मन सुर में गा ...

सिने-पहेली # 9

सिने-पहेली # 9 (27 फ़रवरी 2012) 'सिने पहेली' की एक और कड़ी के साथ मैं, आपका ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी, हाज़िर हूँ 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर। दोस्तों, अब बस दो कड़ियाँ शेष हैं 'सिने पहेली' के पहले सेगमेण्ट के पूरे होने में। यानी कि दो अंकों के बाद पहले 'दस का दम' विजेता घोषित कर दिया जाएगा। आठवीं कड़ी के अंकों को जोड़ने के बाद किन चार प्रतिभागियों के सर्वाधिक स्कोर हुए हैं, यह हम अभी थोड़ी देर में आपको बतायेंगे, फ़िल्हाल शुरु करते हैं 'सिने पहेली # 9' के सवालों का सिलसिला। ********************************************* सवाल-1: गोल्डन वॉयस गोल्डन वॉयस में आज हम आपको सुनवाने जा रहे हैं गुज़रे ज़माने की एक आवाज़। सुन कर बताइए यह किस गायक की आवाज़ है? सवाल-2: पहचान कौन! दूसरे सवाल के रूप में आपको हल करने हैं एक चित्र पहेली का। नीचे दिए गए चित्र को ध्यान से देखिए। 1930 के दशक का एक बेहद बेहद बेहद मशहूर और लोकप्रियतम गीतों में से एक है यह गीत जिसका यह दृश्य है। बता सकते हैं गीत का मुखड़ा? सवाल-3: सुनिये तो... कुछ संवाद ऐसे होते हैं जो इत

२७ फरवरी - आज का गाना

गाना:  मेरे घर आई एक नन्ही परी चित्रपट: कभी कभी संगीतकार: खय्याम गीतकार: साहिर गायिका: लता मंगेशकर मेरे घर आई एक नन्ही परी, एक नन्ही परी चांदनी के हसीन रथ पे सवार मेरे घर आई ... उसकी बातों में शहद जैसी मिठास उसकी सासों में इतर की महकास होंठ जैसे के भीगे\-भीगे गुलाब गाल जैसे के बहके\-बहके अनार मेरे घर आई ... उसके आने से मेरे आंगन में खिल उठे फूल गुनगुनायी बहार देख कर उसको जी नहीं भरता चाहे देखूँ उसे हज़ारों बार (२) मेरे घर आई ... मैने पूछा उसे के कौन है तू हंसके बोली के मैं हूँ तेरा प्यार मैं तेरे दिल में थी हमेशा से घर में आई हूँ आज पहली बार मेरे घर आई ...

स्वरगोष्ठी में आज- विवाह-पूर्व के संस्कार गीत

February 26, 2012 स्वरगोष्ठी – ५९ में आज ‘हमरी बन्नी के गोरे गोरे हाथ, मेंहदी खूब रचे...’ भारतीय समाज में विवाह एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण संस्कार माना जाता है। एक पर्व की तरह यह संस्कार उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस अवसर पर हर धर्मावलम्बी अपने-अपने धार्मिक रीति-रिवाजो के के साथ-साथ लोकाचारों का पालन भी करते हैं। उल्लेखनीय है कि इन लोकाचारों में काफी समानता भी होती है। आपको स्मरण ही होगा कि ‘स्वरगोष्ठी’ में हमने निश्चय किया था कि प्रत्येक मास में कम से कम एक अंक हम लोक संगीत को समर्पित करेंगे। हमारा आज का अंक लोक संगीत पर केन्द्रित है। लो क संगीत से अनुराग करने वाले ‘स्वरगोष्ठी’ के सभी पाठको-श्रोताओं को कृष्णमोहन मिश्र का नमस्कार और स्वागत है। इस स्तम्भ की ५२ वीं कड़ी में हमने आपसे संस्कार गीत के अन्तर्गत विवाह पूर्व गाये जाने वाले बन्ना और बन्नी गीतों पर चर्चा की थी। वर और बधू का श्रृंगारपूर्ण वर्णन, विवाह से पूर्व के अन्य कई अवसरों पर किया जाता है, जैसे- हल्दी, मेंहदी, लगन चढ़ाना, सेहरा आदि। इनमें मेंहदी और सेहरा के गीत मुस्लिम समाज में भी प्रचलित है। इन सभी अवसरों

२६ फरवरी - आज का गाना

गाना:  न जाने आज किधर मेरी नाव चली रे चित्रपट: झूला संगीतकार: सरस्वती देवी गीतकार: प्रदीप गायक: अशोक कुमार न जाने किधर आज मेरी नाव चली रे न जाने किधर आज मेरी नाव चली रे चली रे चली रे मेरी नाव चली रे चली रे चली रे मेरी नाव चली रे कोई कहे यहाँ चली कोई कहे वहाँ चली कोई कहे यहाँ चली कोई कहे वहाँ चली मन ने कहा पिया के गाँव चली रे पिया के गाँव चली रे चली रे चली रे मेरी नाव चली रे मन के मीत मेरे मिल जा जळी दुनिया के सागर में नाव मेरी चल दी मन के मीत मेरे मिल जा जळी दुनिया के सागर में नाव मेरी चल दी बिलकुल अकेली, बिलकुल अकेली अकेली चली रे चली रे चली रे मेरी नाव चली रे न जाने किधर आज मेरी नाव चली रे चली रे चली रे मेरी नाव चली रे ऊँची नीची लहरों पे नाव मेरी डोले मन में प्रीत मेरी पिहू पिहू बोले ऊँची नीची लहरों पे नाव मेरी डोले मन में प्रीत मेरी पिहू पिहू बोले मेरे मन मुझ को बता, मेरी मंज़िल का पता मेरे मन मुझ को बता, मेरी मंज़िल का पता बोल मेरे साजन की कौन गली रे बोल मेरे साजन की कौन गली रे चली रे चली रे मेरी नाव चली रे न जाने किधर...

२५ फरवरी - आज का गाना

गाना:  आना मेरी जान मेरी जान संडे के संडे चित्रपट: शहनाई संगीतकार: सी. रामचंद्र गीतकार: प्यारे लाल संतोषी गायक, गायिका: चितलकर, मीना कपूर चि: आना मेरी जान, मेरी जान, संडे के संडे आना मेरी जान, मेरी जान,  संडे के संडे चि: आई लव यू मी: भाग यहाँ से दूर चि: आई लव यू मी: भाग यहाँ से दूर चि: तुझे पैरिस दिखाऊँ, तुझे लन्दन घूमाऊँ तुझे ब्रैन्डी पिलाऊँ, व्हिस्की पिलाऊँ और खिलाऊँ खिलाऊँ मुर्गी के,  मुर्गी  के, अण्डे, अण्डे आना मेरी जान, मेरी जान,  संडे के संडे मी: मैं धरम करम की नारी तू नीच अधम व्यभिचारी मामा हैं गंगा पुजारी बाबा काशी के, काशी के, पण्डे, पण्डे चि: आना मेरी जान, मेरी जान,  संडे के संडे चि: आओ, हाथों में हाथ ले वॉक करें हम आओ, स्वीट  स्वीट  आपस में टाक करें हम मी: आरे हट! सैंय्या मेरा पहलवान है, मारे दण्ड हज़ार सैंय्या मेरा पहलवान है, मारे दण्ड हज़ार भाग जाओगे तुम बन्दर देगा जो ललकार मारे गिन गिन के, गिन गिन के, डण्डे, डण्डे चि: आना मेरी जान, मेरी जान,  संडे के संडे मी: ओ माई  साब, कम,  कम , कम तुम रोमियो, जूलियट हम ओ डिअर,

बोलती कहानियाँ - आखिर बेटा हूँ तेरा

'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने  अनुराग शर्मा   की आवाज़ में  प्रसिद्ध कथाकार पंकज सुबीर   की कहानी   " एक रात "   का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं समीर लाल   की कहानी " आखिर बेटा हूं तेरा ", जिसको स्वर दिया है अर्चना चावजी   ने।  कहानी "आखिर बेटा हूँ तेरा" का कुल प्रसारण समय 4 मिनट 48 सेकंड है। इस बार हमने इस प्रसारण  में कुछ नये प्रयोग किये हैं। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।  यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें। ऐसा नहीं कि मेरे पास शब्द न थे मगर बेहतर शब्दों की तलाश में भटकता रहा और लोग रचते चले गये।  मेरे भाव किसी और की कलम से शब्द पा गये।  ~  समीर लाल हर शुक्रवार को सुनें  एक नयी कहानी उसे 5 बजे बसुआ को उठाकर चाय नाश्ता देना होता था। फिर उसके लिये दो

२४ फरवरी - आज का गाना

गाना:  मुहब्बत ऐसी धड़कन है चित्रपट: अनारकली संगीतकार: सी. रामचंद्र गीतकार: राजिंदर कृशन गायिका: लता मंगेशकर इस इंतेज़ार\-ए\-शौक को जनमों की प्यास है इक शमा जल रही है, तो वो भी उदास है मुहब्बत ऐसी धड़कन है, (जो समझाई नहीं जाती) \- २ ज़ुबां पर दिल की बेचैनी, (कभी लाई नहीं जाती) \- २ मुहब्बत ऐसी धड़कन है चले आओ, चले आओ, तक़ाज़ा है निगाहों का \- २ तक़ाज़ा है निगाहों का किसी की आर्ज़ू ऐसे, (तो ठुकराई नहीं जाती) \- २ मुहब्बत ऐसी धड़कन है, (जो समझाई नहीं जाती) \- २ मुहब्बत ऐसी धड़कन है (मेरे दिल ने बिछाए हैं सजदे आज राहों में) \- २ सजदे आज राहों में जो हालत आशिक़ी की है, (वो बतलाई नहीं जाती) \- २ मुहब्बत ऐसी धड़कन है, (जो समझाई नहीं जाती) \- २ मुहब्बत ऐसी धड़कन है

आर्टिस्ट ऑफ द मंथ - गीतकार सजीव सारथी

सजीव सारथी का नाम इंटरनेट पर कलाकारों की जुगलबंदी करने के तौर पर भी लिया जाता है. वर्चुएल-स्पेस में गीत-संगीत निर्माण की नई और अनूठी परम्परा की शुरूआत करने का श्रेय सजीव सारथी को दिया जा सकता है. मात्र बतौर एक गीतकार ही नहीं, बल्कि अपने गीत संगीत अनुभव से उन्होंने "पहला सुर", "काव्यनाद" और "सुनो कहानी" जैसी अलबमों और अनेकों संगीत आधारित योजनाओं के निर्माण में भी रचनात्मक सहयोग दिया, और हिंदी की सबसे लोकप्रिय संगीत वेब साईटों (आवाज़, और रेडियो प्लेबैक इंडिया) का कुशल संचालन भी किया. अपने ५ वर्षों के सफर में सजीव ने इन्टरनेट पर सक्रिय बहुत से कलाकारों के साथ जुगलबंदी की हैं. आज सुनिए उन्हीं की जुबानी उनके अब तक के संगीत सफर की दास्तान, उन्हें के रचे गीतों की चाशनी में लिपटी...

२३ फरवरी - आज का गाना

गाना:  तुम संग लागे पिया मोरे नैना चित्रपट: ताज संगीतकार: हेमंत कुमार गीतकार: राजिंदर कृशन गायिका: लता तुम संग लागे पिया मोरे नैना इक पल चैन न आये पापी मन मोरी बात न माने कौन इसे आये समझाने मचल मचल रह जाये तुम संग लागे ... मन में समायी मोरे श्याम सुरतिया किस दिस भूलू मैं पी की मूरतिया बात समझ नहीं आये तुम संग लागे ...

"हम चुप हैं कि दिल सुन रहे हैं..." - पर हमेशा के लिए चुप हो गए शहरयार!

१३ फ़रवरी २०१२ को जानेमाने शायर शहरयार का इन्तकाल हो गया। कुछ फ़िल्मों के लिए उन्होंने गीत व ग़ज़लें भी लिखे जिनका स्तर आम फ़िल्मी रचनाओं से बहुत उपर है। 'उमरावजान', 'गमन', 'फ़ासले', 'अंजुमन' जैसी फ़िल्मों की ग़ज़लों और गीतों को सुनने का एक अलग ही मज़ा है। उन्हें श्रद्धांजली स्वरूप फ़िल्म 'फ़ासले' के एक लोकप्रिय युगल गीत की चर्चा आज 'एक गीत सौ कहानियाँ' की आठवीं कड़ी में, सुजॉय चटर्जी के साथ... एक गीत सौ कहानियाँ # 8 यूं तो फ़िल्मी गीतकारों की अपनी अलग टोली है, पर समय समय पर साहित्य जगत के जानेमाने कवियों और शायरों ने फ़िल्मों में अपना स्तरीय योगदान दिया है, जिनके लिए फ़िल्म जगत उनका आभारी हैं। ऐसे अज़ीम कवियों और शायरों के लिखे गीतों व ग़ज़लों ने फ़िल्म संगीत को न केवल समृद्ध किया, बल्कि सुनने वालों को अमूल्य उपहार दिया। ऐसे ही एक मशहूर शायर रहे शहरयार, जिनका हाल ही में देहान्त हो गया। अख़लक़ मुहम्मद ख़ान के नाम से जन्मे शहरयार को भारत का सर्वोच्च साहित्य सम्मान 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' से साल २००८ में सम्मानित किया गया था। ७५-वर्

२२ फरवरी - आज का गाना

गाना:  आज मेरे मन में सखी बाँसुरी बजाए कोई चित्रपट: आन संगीतकार: नौशाद अली गीतकार: शकील गायिका: लता ल: आ हा हा... आज मेरे मन में सखी बाँसुरी बजाए कोई आज मेरे मन में... आज मेरे मन में सखी बाँसुरी बजाए कोई प्यार भरे गीत सखी बार\-बार गाए कोई बाँसुरी बजाए... बाँसुरी बजाए, सखी गाए सखी रे, कोई छैलवा हो को: कोई अलबेलवा हो, कोई छैलवा हो ल: रँग मेरी जवानी का किए झूमता घर आया है सावन को: रँग मेरी जवानी का किए झूमता घर आया है सावन ल: आ हा हा... हो सखी, हो रे सखी, आया है सावन को: मेरे नैनों में है साजन ल: इन ऊँदी घटाओं में, हवाओं में सखी, नाचे मेरा मन हो सखी, नाचे मेरा मन को: हो आँगन में सावन मन\-भावन हो जी ल: हो, इन ऊँदी घटाओं में, हवाओं में सखी, नाचे मेरा मन को: लल्ला लाला ला लाला ल: दिल के हिंडोले पे मोहे झूले न झुलाए कोई को: प्यार भरे गीत सखी, बार\-बार गाए कोई ल: बाँसुरी बजाए सखी गाए सखी रे कोई छैलवा हो को: कोई अलबेलवा हो, कोई छैलवा हो ल: कहता है इशारों में कोई आ मोहे अम्बुआ के तले मिल को: भला वो कौन है घायल कहता है इशारों में कोई आ मोहे अम

ब्लोग्गेर्स चोईस में रश्मि जी लायी हैं, शिखा वार्ष्णेय की पसंद के ५ गीत

शिखा वार्ष्णेय से जब मैंने गीत मांगे, तो सुना और भूल गईं. छोटी बहन ने सोचा - अरे यह रश्मि दी की आदत है, कभी ये लिखो, वो दो, ये करो .... हुंह. मैंने भी रहने दिया. पर अचानक जब उसने समीर जी की पसंद को सुना तो बोली - मैं भी...मैं भी.... हाहा, कौन नहीं चाहेगा कि हमारी पसंद से निकले ५ गीतों को हमें चाहनेवाले सुनें! तो शिखा की बड़ी बड़ी बातों से अलग आकर इस बहुत जाननेवाली की पसंद सुनिए उसके शब्दों में लिपटे - रोज की आप धापी से कुछ लम्हें खुद के लिए बचाकर कर रख सर को नरम तकिये पर मूँद कर पलकों को कुछ पल सिर्फ एहसास के जब दरकार हों . यही गीत याद आते हैं. और सुकून दे जाते हैं. आप यूँ फासलों से गुजरते रहे मेरा कुछ सामान - (इजाजत) यह दिल और उनकी निगाहों के साये. होटों से छू लो तुम (प्रेम गीत) दिल तो है दिल .(मुकद्दर का सिकंदर.)

२१ फरवरी - आज का गाना

गाना:  ले तो आये हो हमें सपनों की गाँव में चित्रपट: दुल्हन वही जो पिया मन भाये संगीतकार: रवीन्द्र जैन गीतकार: रवीन्द्र जैन गायिका: हेमलता ले तो आये हो हमें सपनों की गाँव में प्यार की छाँव में बिठाये रखना सजना ओ सजना ... तुमने छुआ तो तार बज उठे मन के तुम जैसा चाहो रहे वैसे ही बन के तुम से शुरू, तुम्हीं पे कहानी खत्म करे दूजा न आये कोई नैनो के गाँव में ले तो आये हो हमें ... छोटा सा घर हो अपना, प्यारा सा जग हो कोई किसी से पल भर न अलग हो इसके सिवा अब दूजी कोई चाह नहीं हँसते रहे हम दोनों फूलों के गाँव में ले तो आये हो हमें ...

सिने-पहेली # 8

सिने-पहेली # 8 (20 फ़रवरी 2012) रेडियो प्लेबैक इण्डिया के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार! दोस्तों, 'सिने-पहेली' की आठवीं कड़ी लेकर मैं हाज़िर हूँ। दोस्तों, जैसा कि पिछले सप्ताह हमने यह घोषित किया कि इस प्रतियोगिता को दस-दस अंकों में विभाजित किया जा रहा है, तो पहले सेगमेण्ट के ७ अंक प्रस्तुत हो चुके हैं और आज आठवा अंक है। तो क्यों न जल्दी से नज़र दौड़ा ली जाए चार अग्रणी प्रतियोगियों के नामों पर। इस वक़्त जो चार प्रतियोगी सबसे उपर चल रहे हैं, वो हैं --- प्रकाश गोविन्द, लखनऊ - 27 अंक पंकज मुकेश, बेंगलुरु - 23 अंक रीतेश खरे, मुंबई - 16 अंक क्षिति तिवारी, इन्दौर - 15 अंक भई वाह, इसे कहते हैं कांटे का टक्कर! देखते हैं कि क्या प्रकाश जी बनने वाले हैं पहला 'दस का दम' विजेता? या फिर पंकज मुकेश उन्हें पार कर जायेंगे अगले तीन अंकों में? या कि रीतेश या क्षिति कोई करामात दिखा जायेंगे? यह सब तो वक़्त आने पर ही पता चलेगा, फ़िल्हाल शुरु किया जाए 'सिने पहेली # 8'। ********************************************* सवाल-1: गोल्डन वॉयस गोल्डन वॉयस म

२० फरवरी - आज का गाना

गाना:  अगर साज़ छेड़ा तराने बनेंगे चित्रपट: जवानी दीवानी संगीतकार: राहुलदेव बर्मन गीतकार: आनंद बक्षी गायक: किशोर कुमार अगर साज़ छेड़ा तराने बनेंगे तराने बनेंगे फ़साने बनेंगे तराने बने तो, फ़साने बने तो फ़साने बने तो दीवाने बनेंगे अगर साज़ छेड़ा तराने बनेंगे ... फ़साने बने तो सुनेगी ये महफ़िल सुनेगी ये महफ़िल बड़ी होगी मुशकिल रुसवाइयों के बहाने बनेंगे अगर साज़ छेड़ा तराने बनेंगे ... बहानों से फिर तो मुलाक़ात होगी यूँही दिन कटेगा बसर रात होगी नये दोस्त इक दिन पुराने बनेंगे अगर साज़ छेड़ा तराने बनेंगे ... दीवनों पे हँसता है सारा ज़माना ज़माना मुहब्बत का दुशमन पुराना दीवाने नहीं हम सयाने बनेंगे सयाने नहीं हम सयाने नहीं हम दीवाने बनेंगे अगर साज़ छेड़ा तराने बनेंगे ...

मधुमास के परिवेश को चित्रित करता राग बसन्त-बहार

स्वरगोष्ठी – ५८ में आज ‘फूल रही वन वन में सरसों, आई बसन्त बहार रे...’ दो रागों के मेल से निर्मित रागों की श्रृंखला में बसन्त बहार अत्यन्त मनमोहक राग है। राग के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है यह बसन्त और बहार, दोनों रागों के मेल से बना है। इस राग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी प्रस्तुति में दोनों रागों की छाया परिलक्षित होती है। स मस्त संगीतानुरागियों का आज की ‘स्वरगोष्ठी’ के नवीन अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः स्वागत करता हूँ। इन दिनों हम बसन्त ऋतु में गाये-बजाये जाने वाले कुछ प्रमुख रागों पर आपसे चर्चा कर रहे हैं। आज हमारी चर्चा का विषय है, राग ‘बसन्त बहार’। परन्तु इस राग पर चर्चा करने से पहले हम दो ऐसे फिल्मी गीतों के विषय में आपसे ज़िक्र करेंगे, जो राग ‘बसन्त बहार’ पर आधारित है। हम सब यह पहले ही जान चुके हैं कि राग ‘बसन्त बहार’ दो स्वतंत्र रागों- बसन्त और बहार के मेल से बनता है। दोनों रागों के सन्तुलित प्रयोग से राग ‘बसन्त बहार’ का वास्तविक सौन्दर्य निखरता है। कभी-कभी समर्थ कलासाधक प्रयुक्त दोनों रागों में से किसी एक को प्रधान बना कर दूसरे का स्पर्श देकर प्रस्तु