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Sunday, November 23, 2014

‘प्रेम जोगन बन के...’ : SWARGOSHTHI – 195 : RAG SOHANI



स्वरगोष्ठी – 195 में आज

शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत – 4 : राग सोहनी

एक बड़े मानदेय के एवज में उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ ने रचे मुगल-ए-आजम के मनोहारी गीत




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है, हमारी लघु श्रृंखला, ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत’। फिल्म संगीत के क्षेत्र में चौथे से लेकर आठवें दशक के बीच शास्त्रीय संगीत के कई विद्वानों और विदुषियों ने अपना योगदान किया है। इस श्रृंखला में हमने कुछ ऐसे ही फिल्मी गीतों का चुनाव किया है, जिन्हें रागदारी संगीत के प्रयोक्ताओं और विशेषज्ञों ने रचा है। इन रचनाओं में राग के स्पष्ट स्वरूप की उपस्थिति मिलती है। श्रृंखला के चौथे अंक में आज हम आपसे 1956 में प्रदर्शित, भारतीय फिल्म जगत की उल्लेखनीय फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ के एक गीत- ‘प्रेम जोगन बन के...’ पर चर्चा करेंगे। फिल्म के इस गीत में राग सोहनी के स्वरों का भावपूर्ण उपयोग किया गया है। भारतीय संगीत के शीर्षस्थ साधक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ ने इस गीत को स्वर दिया था। खाँ साहब ने अपने पूरे सांगीतिक जीवनकाल में एकमात्र फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ में ही दो गीत गाये थे। इन्हीं दो गीतों में से एक गीत राग सोहनी के स्वरों में पगा हुआ है। आज की गोष्ठी में हम इसी गीत पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही राग ‘सोहनी’ के मिजाज को समझने के लिए हम आपके लिए सुविख्यात संगीतज्ञ उस्ताद राशिद खाँ के स्वरों में इस राग की एक बन्दिश भी प्रस्तुत करेंगे। 
 


उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ
मारे कई संगीत-प्रेमियों ने फिल्म संगीत में पटियाला कसूर घराने के विख्यात गायक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के योगदान पर चर्चा करने का आग्रह किया था। आज का यह अंक हम उन्हीं की फरमाइश पर प्रस्तुत कर रहे हैं। पटियाला कसूर घराने के सिरमौर, उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ पिछली शताब्दी के बेमिसाल गायक थे। अपनी बुलन्द गायकी के बल पर संगीत-मंचों पर लगभग आधी शताब्दी तक उन्होने अपनी बादशाहत को कायम रखा। पंजाब अंग की ठुमरियों के वे अप्रतिम गायक थे। संगीत-प्रेमियों को उन्होने संगीत की हर विधाओं से मुग्ध किया, किन्तु फिल्म संगीत से उन्हें परहेज रहा। एकमात्र फिल्म- ‘मुगल-ए-आजम’ में उनके गाये दो गीत हैं। आज की ‘स्वरगोष्ठी’ में हम इनमें से एक गीत पर चर्चा करेंगे।

भारतीय फिल्मों के इतिहास में 1960 में प्रदर्शित, बेहद महत्त्वाकांक्षी फिल्म- ‘मुगल-ए-आजम’, एक भव्य कृति थी। इसके निर्माता-निर्देशक के. आसिफ ने फिल्म की गुणबत्ता से कोई समझौता नहीं किया था। फिल्म के संगीत के लिए उन्होने पहले गोविन्द राम और फिर अनिल विश्वास को दायित्व दिया, परन्तु फिल्म-निर्माण में लगने वाले सम्भावित अधिक समय के कारण बात बनी नहीं। अन्ततः संगीतकार नौशाद तैयार हुए। नौशाद ने फिल्म में मुगल-सल्तनत के वैभव को उभारने के लिए तत्कालीन दरबारी संगीत की झलक दिखाने का हर सम्भव प्रयत्न किया। नौशाद और के. आसिफ ने तय किया कि अकबर के नवरत्न तानसेन की मौजूदगी का अनुभव भी फिल्म में कराया जाए। नौशाद की दृष्टि विख्यात गायक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ पर थी, किन्तु फिल्म में गाने के लिए उन्हें मनाना सरल नहीं था। पहले तो खाँ साहब ने फिल्म में गाने से साफ मना कर दिया, परन्तु जब दबाव बढ़ा तो टालने के इरादे से, एक गीत के लिए 25 हजार रुपये की माँग की। खाँ साहब ने सोचा कि एक गीत के लिए इतनी बड़ी धनराशि देने के लिए निर्माता तैयार नहीं होंगे। यह उस समय की एक बड़ी धनराशि थी, परन्तु के. आसिफ ने तत्काल हामी भर दी। नौशाद ने शकील बदायूनी से प्रसंग के अनुकूल गीत लिखने को कहा। गीत तैयार हो जाने पर नौशाद ने खाँ साहब को गीत सौंप दिया। उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ ने ठुमरी अंग की गायकी में अधिक प्रयोग किए जाने वाले राग सोहनी, दीपचन्दी ताल में निबद्ध कर गीत- ‘प्रेम जोगन बन के...’ को रिकार्ड कराया। रिकार्डिंग से पहले खाँ साहब ने वह दृश्य देखने की इच्छा भी जताई, जिस पर इस गीत को शामिल करना था। मधुबाला और दिलीप कुमार के उन प्रसंगों को देख कर उन्होने गायन में कुछ परिवर्तन भी किये। इस प्रकार भारतीय फिल्म-संगीत-इतिहास में राग सोहनी के स्वरों में ढला एक अनूठा गीत शामिल हुआ। आइए पहले आपको यह गीत सुनवाते हैं-


राग – सोहनी : फिल्म – मुगल-ए-आजम : ‘प्रेम जोगन बन के...’ : उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ : ताल – दीपचन्दी




उस्ताद राशिद खाँ 
उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ द्वारा राग सोहनी के स्वरों में पिरोया यह गीत के. आसिफ को इतना पसन्द आया कि उन्होने खाँ साहब को दोबारा 25 हजार रुपये भेंट करते हुए एक और गीत गाने का अनुरोध किया। खाँ साहब का फिल्म में गाया राग रागेश्री, तीनताल में निबद्ध दूसरा गीत है- ‘शुभ दिन आयो राजदुलारा...’। ये दोनों गीत फिल्म संगीत के इतिहास के सर्वाधिक उल्लेखनीय किन्तु सबसे खर्चीले गीत सिद्ध हुए।

आइए, खाँ साहब के गाये, राग सोहनी में निबद्ध इस गीत के बहाने थोड़ी चर्चा राग सोहनी के बारे में करते हैं। हम ऊपर यह चर्चा कर चुके हैं कि राग सोहनी का प्रयोग खयाल और ठुमरी, दोनों प्रकार की गायकी में किया जाता है। ठुमरी अंग में इस राग का प्रयोग अधिक होता है। यह राग मारवा थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग पंचम स्वर का प्रयोग वर्जित होता है। आरोह में कोमल ऋषभ स्वर पूर्णतः वर्जित नहीं होता, बल्कि अल्प परिमाण में प्रयोग किया जाता है। राग सोहनी में उन्हीं स्वरों का प्रयोग होता है, जिनका राग पूरिया और मारवा में भी किया जाता है। किन्तु इसके प्रभाव और भावाभिव्यक्ति में पर्याप्त अन्तर हो जाता है। राग सोहनी का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। धैवत पीड़ा की अभिव्यक्ति करने में समर्थ होता है। ‘नी सां रें (कोमल) सां’ की स्वर संगति से तीव्र पुकार का वातावरण निर्मित होता है। संवादी गान्धार कुछ देर के लिए इस उत्तेजना को शान्त कर सुकून देता है। वास्तव में वादी और संवादी स्वर राग के प्राणतत्त्व होते हैं, जिनसे रागों के भावों का सृजन होता है। रात्रि के तीसरे प्रहर में राग सोहनी के भाव अधिक स्पष्ट होते हैं। इस राग में मींड़ एवं गमक को कसे हुए ढंग से मध्यलय में प्रस्तुत करने से राग का भाव अधिक मुखरित होता है। राग सोहनी का चलन कुछ इस प्रकार से किया जाता है- ग s म(तीव्र) ध नी सां s नी ध नी ध, म(तीव्र) ग, ग म(तीव्र) ध ग म(तीव्र) ग, रे(कोमल) सा। यह चंचल प्रवृत्ति का राग है। श्रृंगार के विरह पक्ष की सार्थक अनुभूति कराने में यह राग समर्थ है। राग सोहनी, कर्नाटक पद्यति के राग हंसनन्दी के समतुल्य है। यदि राग हंसनन्दी में शुद्ध ऋषभ का प्रयोग किया जाए तो यह ठुमरी अंग के राग सोहनी की अनुभूति कराता है। तंत्रवाद्य पर राग मारवा, पूरिया और सोहनी का वादन अपेक्षाकृत कम किया जाता है।

राग सोहनी के खयाल और ठुमरी अंग की अनुभूति के लिए अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, युवा संगीतज्ञ उस्ताद राशिद खाँ के स्वरों में एक कर्णप्रिय रचना प्रस्तुत करेंगे। उस्ताद राशिद खाँ रामपुर सहसवान घराने की गायकी के संवाहक हैं। उस्ताद राशिद खाँ इस घराने के संस्थापक उस्ताद इनायत हुसैन खाँ के प्रपौत्र हैं। उन्होने अपने नाना उस्ताद निसार हुसैन खाँ से गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत संगीत की विधिवत शिक्षा ग्रहण की है। आइए, प्रतिभा के धनी गायक उस्ताद राशिद खाँ से सुनते हैं, राग सोहनी की यह आकर्षक रचना। आप राग सोहनी का आनन्द लीजिए और मुझे आज इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग – सोहनी : ‘देख वेख मोरा जिया ललचाए....’ : उस्ताद राशिद खाँ : ताल - तीनताल





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 195वें अंक की पहेली में आज हम आपको फिर एक बार लगभग छः दशक पुरानी एक फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 200वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का और सभी पाँच श्रृंखलाओं में सर्वाधिक अंक पाने वाले प्रतिभागी को वर्ष 2014 का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की झलक है?

2 – यह रचना किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 29 नवम्बर, 2014 को मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 197वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 193वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1953 में प्रदर्शित फिल्म ‘बसन्त बहार’ के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग बसन्त बहार और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल द्रुत एकताल। इस बार की पहेली में पूछे गए दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हम भारतीय शास्त्रीय संगीत के विद्वानों द्वारा फिल्मों के लिए गाये गए गीतों पर चर्चा कर रहे हैं। वर्ष 2015 से ‘स्वरगोष्ठी’ की श्रृंखलाओं के बारे में हमे अनेक पाठकों और श्रोताओ के बहुमूल्य सुझाव प्राप्त हो रहे हैं। इन सभी सुझाव पर विचार-विमर्श कर हम नये वर्ष से अपनी प्रस्तुतियों में आवश्यक संशोधन करने जा रहे हैं। यदि आपने अभी तक अपने सुझाव और फरमाइश नहीं भेजी हैं तो आविलम्ब हमें भेज दें। अगले रविवार 30 नवम्बर, 2014 को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

Sunday, March 3, 2013

भोर की लाली का आह्वान करते आठवें प्रहर के राग


स्वरगोष्ठी – 110 में आज


राग और प्रहर – 8 / समापन कड़ी

‘देख वेख मन ललचाय...’ : सोहनी, भटियार, ललित और कलिंगड़ा रागों के रंग



आज एक बार फिर मैं कृष्णमोहन मिश्र ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ संगीत-प्रेमियों की इस गोष्ठी में उपस्थित हूँ। पिछली सात कड़ियों में हमने दिन और रात के सात प्रहरों में गाये-बजाये जाने वाले रागों पर चर्चा की है। आज इस श्रृंखला की समापन कड़ी है और इस कड़ी में हम आपसे आठवें प्रहर अर्थात रात्रि के चौथे प्रहर के कुछ रागों की चर्चा करेंगे। आठवाँ प्रहर रात्रि के लगभग तीन बजे से लेकर सूर्योदय की लाली फूटने तक की अवधि को माना जाता है। इस अवधि में प्रस्तुत किये जाने वाले रागों में उजाले का आह्वान, रात की कालिमा व्यतीत होने की कामना और कुछ अलसाए भावों की अभिव्यक्ति होती है। श्रृंखला की समापन कड़ी में आज हम आपसे राग सोहनी, भटियार, ललित और कलिंगड़ा की संक्षिप्त चर्चा करेंगे और इन रागों में कुछ चुनी हुई रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। 




ठवें प्रहर अर्थात रात्रि के अन्तिम प्रहर में गाये-बजाये जाने वाले रागों में आज सबसे पहले हम आपको राग सोहनी सुनवाएँगे और उसका संक्षिप्त परिचय भी प्रस्तुत करेंगे। राग सोहनी का नामोल्लेख कहीं-कहीं शोभिनी या शोभनी भी किया गया है। यह कर्नाटक संगीत के राग हंसनंदिनी के समतुल्य है। यह राग मारवा थाट के अन्तर्गत माना जाता है। औड़व-षाड़व जाति के इस राग के आरोह और अवरोह, दोनों में पंचम स्वर प्रयोग नहीं किया जाता। धैवत स्वर इस राग का वादी और गान्धार स्वर संवादी होता है। यद्यपि सोहनी रात्रि के अन्तिम प्रहर में खूब निखरता है, तथापि विद्वान रात्रि के तीसरे प्रहर में भी इसका गायन-वादन करते हैं। उत्तरांग प्रधान राग सोहनी चंचल प्रकृति का राग है, जिसके गायन-वादन से श्रृंगार का विरह भाव भलीभाँति सम्प्रेषित होता है। इस राग में ठुमरी और खयाल दोनों की प्रस्तुति का प्रचलन है। आज की गोष्ठी में हम आपको उस्ताद राशिद खान के स्वरों में राग सोहनी में निबद्ध, खयाल अंग की, श्रृंगार रस की चाशनी में पगी, द्रुत तीनताल की, एक रचना सुनवाते हैं।


राग सोहनी : ‘देख वेख मन ललचाय...’ : उस्ताद राशिद खाँ 


रात्रि के अन्तिम प्रहर में प्रस्तुत किये जाने वाले रागों में अब हम आपसे राग भटियार की चर्चा कर रहे हैं। उत्तर भारतीय संगीत के कई राग ऐसे हैं, जिनके बारे में यह माना जाता है कि इनकी उत्पत्ति लोकधुनों से हुई है। राग भटियार के बारे में ऐसा ही माना जाता है। एक दूसरी मान्यता के अनुसार पाँचवीं शताब्दी में उज्जैन के राजा भर्तृहरि ने इस राग का सृजन किया था। इस राग के स्वर-समूह ऐसे हैं कि इसे किसी एक थाट से सम्बद्ध करना कठिन है। कुछ विद्वान इसे विलावल थाट से कुछ इसे खमाज थाट का राग मानते हैं। विदुषी पद्मा तलवलकर के अनुसार इसे मारवा थाट से सम्बद्ध किया जा सकता है, जबकि सुप्रसिद्ध इसराज और मयूर वीणा वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र का मत है कि यह थाटविहीन राग है। राग भटियार में शुद्ध मध्यम का प्रयोग अधिकतर और तीव्र मध्यम का प्रयोग कभी-कभी किया जाता है। इस राग में कोमल ऋषभ और शेष सभी शुद्ध स्वरों का प्रयोग किया जाता है। अवरोह के स्वर वक्रगति से लगाए जाते हैं। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर निषाद होता है। उत्तरांग प्रधान इस राग को सुनते समय कहीं-कहीं राग माँड की झलक भी मिलती है। आइए, अब सुनते हैं, राग भटियार में एक छोटा खयाल- ‘पिया मिलन को जाऊँ सखी री...’। द्रुत तीनताल में यह रचना प्रस्तुत कर रहे है, विश्वविख्यात गायक पण्डित जसराज के शिष्य पण्डित संजीव अभ्यंकर। इस प्रस्तुति में हारमोनियम संगति प्रमोद मराठे ने और तबला संगति भरत कामत ने की है।


राग भटियार : ‘पिया मिलन को जाऊँ सखी री...’ ; पण्डित संजीव अभ्यंकर


आज ‘राग और प्रहर’ श्रृंखला की समापन कड़ी में हम आपके साथ आठवें प्रहर के कुछ रागों पर चर्चा कर रहे हैं। इस प्रहर का एक अत्यन्त लोकप्रिय राग है, ललित। पूर्वी थाट के अन्तर्गत माना जाने वाला यह राग षाड़व-षाड़व जाति का होता है। राग ललित में पंचम स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। गान्धार इस राग का प्रमुख स्वर होता है। आलाप और तान में शुद्ध मध्यम स्वर पर न्यास किया जाता है। राग का वादी स्वर शुद्ध मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। पंचम स्वर की अनुपस्थिति सूर्य के प्रकाश की अनुपस्थिति का भाव भलीभाँति स्पष्ट करता है। आइए, अब हम आपको राग ललित पर आधारित एक फिल्मी रचना सुनवाते हैं। 1959 में एक फिल्म ‘चाचा जिन्दाबाद’, प्रदर्शित हुई थी, जिसके संगीतकार मदनमोहन थे। उन्होने फिल्म का एक गीत- ‘प्रीतम दरस दिखाओ...’ राग ललित के स्वरों का आधार बना कर स्वरबद्ध किया था। तीनताल के ठेके पर यह गीत मन्ना डे और लता मंगेशकर ने गाया है। लीजिए, यह गीत आप भी सुनिए।


फिल्म चाचा जिन्दाबाद : ‘प्रीतम दरस दिखाओ...’ : राग ललित : मन्ना डे और लता मंगेशकर


‘राग और प्रहर’ श्रृंखला की आज की कड़ी के अन्त में अब हम आपसे राग कलिंगड़ा के विषय में थोड़ी चर्चा करेंगे। राग कलिंगड़ा, भैरव थाट के स्वरों के अनुकूल होता है। प्राचीन काल में इस राग का प्रयोग सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति के रूप में होता था, किन्तु वर्तमान में षाड़व-सम्पूर्ण जाति के रूप में प्रयोग किया जाता है। इस राग के आरोह में ऋषभ स्वर नहीं लगता। कोमल ऋषभ और कोमल धैवत स्वरॉ का आन्दोलन न करने से यह राग भैरव से भिन्न हो जाता है। शुद्ध गान्धार और शुद्ध निषाद पर न्यास, इस राग का प्रमुख गुण है। राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। सूर्योदय से ठीक पहले राग कलिंगड़ा, ठुमरी अंग में खूब निखरता है। इस राग के उदाहरणस्वरूप अब हम आपको एक ठुमरी ही सुनवाते हैं। पटियाला, कसूर गायकी के सिद्ध कलासाधक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के अनुज उस्ताद बरकत अली खाँ के स्वरों में राग कलिंगड़ा की यह ठुमरी प्रस्तुत है।


राग कलिंगड़ा : ठुमरी- ‘पिया मन मन्दिर में आन बसो...’ : उस्ताद बरकत अली खाँ 


आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 110वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के इस अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – यह गीत किस फिल्म से लिया गया है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 112वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से या swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 108वें अंक में हमने आपको 1955 में बनी फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ के राग आधारित शीर्षक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग अड़ाना और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक उस्ताद अमीर खाँ। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर बैंगलुरु के पंकज मुकेश, जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द और जबलपुर से क्षिति तिवारी ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ पर पिछले आठ अंकों की इस लघु श्रृंखला ‘राग और प्रहर’ के अन्तर्गत आपने दिन और रात के आठो प्रहरों में प्रस्तुत किए जाने वाले कुछ प्रमुख रागों का संक्षिप्त परिचय प्राप्त किया और इन रागों के उदाहरण भी सुने। आज के अंक में प्रस्तुत किये गए रागों के साथ ही हम इस लघु श्रृंखला को यहीं विराम देते हैं। अगले अंक के लिए हमने एक अनोखा विषय चुना है जिसका विषय है, ‘रागमाला’। आगामी अंक में हम आपके साथ होंगे। प्रत्येक रविवार को प्रातः साढ़े नौ बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ उपस्थित होते हैं। आप सब संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि इस सांगीतिक अनुष्ठान में आप भी हमारे सहभागी बनें। आपके सुझाव और सहयोग से हम इस स्तम्भ को और अधिक उपयोगी स्वरूप प्रदान कर सकते हैं। 

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

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