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Monday, August 3, 2009

ये दूरियाँ ....मिटा रहा है कमियाबी से मोहित चौहान की दूरियाँ

ताजा सुर ताल (13)

ताजा सुर ताल की इस नयी कड़ी में आप सब का स्वागत है. आज से हम इस श्रृंखला के रूप रंग में में थोडा सा बदलाव कर रहे हैं. आज से मुझे यानी सजीव सारथी के साथ होंगें आपके प्रिय होस्ट सुजॉय चट्टर्जी भी. हम दोनों एक दिन पहले प्रस्तुत होने वाले गीत पर दूरभाष से चर्चा करेंगें और फिर उसी चर्चा को यहाँ गीत की भूमिका के रूप में प्रस्तुत करेंगें. उम्मीद है आप इस आयोजन अब और अधिक लुफ्त उठा पायेंगें. तो सुजोय स्वागत है आपका....

सुजॉय- नमस्कार सजीव और नमस्कार सभी दोस्तों को...तो सजीव आज हम कौन सा नया गीत सुनवाने जा रहे हैं ये बताएं...

सजीव - सुजॉय दरअसल योजना है कि श्रोताओं की एक के बाद एक दो गीत आज के बेहद तेजी से लोकप्रिय होते गायक मोहित चौहान के सुनवाये जाएँ...

सुजॉय - अरे वाह सजीव, हाँ आपने सही कहा....इन दिनों फ़िल्म सगीत जगत में नये नये पार्श्वगायकों की जो पौध उगी है, उसमें कई नाम ऐसे हैं जो धीरे धीरे कामयाबी की सीढ़ी पर पायदान दर पायदान उपर चढ़ते जा रहे हैं। वैसा ही एक ज़रूरी नाम है मोहित चौहान। अपनी आवाज़ और ख़ास अदायगी से मोहित चौहान आज एक व्यस्त पार्श्वगायक बन गये हैं जिनके गाने इन दिनों ख़ूब बज भी रहे हैं और लोग पसंद भी कर रहे हैं। जवाँ दिलों पर एक तरह से वो राज़ कर रहे हैं इन दिनों। हिमाचल की पहाड़ियों से उतर कर मोहित चौहान पहले दिल्ली आये जहाँ वे दस साल रहे। लेकिन सगीत की बीज उन सुरीले पहाड़ों में भी बोयी जा चुकी थी और कुछ उन्हे पारिवारिक तौर पे मिला। यह संयोग की बात ही कहिए कि दिल्ली के उन दस सालों को समर्पित करने का उन्हे मौका भी मिल गया। मेरा मतलब है 'दिल्ली ६' का वह मशहूर गीत "मसक्कली", जो कुछ दिन पहले हर 'काउंट-डाउन' पर नंबर-१ पर था।

सजीव - हाँ बिलकुल, दरअसल मैं भी समझता था कि मोहित केवल धीमे रोमांटिक गीतों में ही अच्छा कर सकते हैं, पर मसकली ने मुझे चौंका दिया. वाकई बहुत बढ़िया गाया है इसे मोहित ने, आप कुछ बता रहे थे उनके बारे में...

सुजॉय - ग़ैर फ़िल्म संगीत और पॉप अल्बम्स की जो लोग जानकारी रखते हैं, उन्हे पता होगा कि मोहित चौहान मशहूर बैंड 'सिल्क रूट' के 'लीड वोकलिस्ट' हुआ करते थे। याद है न वह हिट गीत "डूबा डूबा रहता है आँखों में तेरी", जो आयी थी 'बूँदें' अल्बम के तहत। यह अल्बम 'सिल्क रूट' की पहली अल्बम थी। यह अल्बम बेहद कामयाब रही और नयी पीढ़ी ने खुले दिल से इसे ग्रहण किया। इस बैंड का दूसरा अल्बम आया था 'पहचान', जिसे उतनी कामयाबी नहीं मिली। और दुर्भाग्यवश इसके बाद यह बैंड भी टूट गया। कहते हैं कि जो होता है अच्छे के लिए ही होता है, शायद मोहित चौहान के लिए ज़िंदगी ने कुछ और ही सोच रखा था! कुछ और भी बेहतर! अब तक के उनके म्युज़िकोग्राफ़ी को देख कर तो कुछ ऐसा ही लगता है दोस्तों कि मोहित भाई सही राह पर ही चल रहे हैं।

सजीव - उस मशहूर गीत "डूबा डूबा" को लिखा था प्रसून ने, वो भी आज एक बड़े गीतकार का दर्जा रखते हैं, पर आज हम श्रोताओं के लिए लाये हैं मोहित का गाया वो गीत जिसे एक और अच्छे गीतकार इरषद कामिल ने लिखा है. आप समझ गए होंगें मैं किस गीत की बात कर रहा हूँ...

सुजॉय- हाँ सजीव बिलकुल....ये गीत है फिल्म "लव आजकल" का ये दूरियां....

सजीव - गीत शुरू होता है, एक सीटी की धुन से जो पूरे गीत में बजता ही रहता है. मोहित की आवाज़ शुरू होते ही गीत एक सम्मोहन से बांध देता है सुनने वालों को...प्रीतम का संगीत संयोजन उत्कृष्ट है....सीटी वाली धुन कई रूपों में बीच बीच में बजाने का प्रयोग तो कमाल ही है. पहले अंतरे से पहले संगीत का रुकना और फिर बोलों से शुरू करना भी गीत के स्तर को ऊंचा करता है. गीटार का तो बहुत ही सुंदर इस्तेमाल हुआ है गीत में. पर गीत के मुख्य आकर्षण तो मोहित के स्वर ही हैं. दरअसल इस तरह के धीमे रोंन्टिक गीतों में तो अब मोहित महारत ही हासिल कर चुके हैं. इरषद ने बोलों से बहुत बढ़िया निखारा है गीत को. सुजॉय मैं आपको बताऊँ कि कल ही मैंने ये फिल्म देखी है. और जिस तरह के रुझान मैंने देखे दर्शकों के उससे कह सकता हूँ कि ये फिल्म इस साल की बड़ी हिट साबित होने वाली है, और चूँकि फिल्म का संगीत फिल्म की जान है, तो अब फिल्म प्रदर्शन के बाद तो उसके गीत और अधिक मशहूर होंगे, खासकर ये गीत तो फिल्म की रीढ़ है, कई बार कई रूपों में ये गीत बजता है....और गीतकार ने शब्दों से हर सिचुअशन के साथ न्याय किया है. फिल्म में नायक नायिका जिस उहा पोह से गुजर रहे हैं, जिस समझदारी भरी नासमझी में उलझे हैं उनका बयां है ये गीत. कहते हैं फिल्म का शूट इसी गीत से आरंभ हुआ था और ख़तम भी इसी गीत पर...

सुजॉय- अच्छा यानी कुल मिलकार ये गीत भी मोहित के संगीत सफ़र में एक नया अध्याय बन कर जुड़ने वाला है...तो ये बताएं कि आवाज़ की टीम ने इस गीत को कितने अंक दिए हैं ५ में से.

सजीव - आवाज़ की टीम ने दिए ४ अंक ५ में से....पिछली बार स्वप्न जी ने एक सवाल किया था कि फिल्म कमीने के गीत को ४ अंक क्यों दिए क्या इसलिए कि इसे गुलज़ार साहब ने लिखा है ? मैं कहना चाहूँगा कि ऐसा बिलकुल नहीं है, आवाज़ की टीम के लिए सबसे जरूरी घटक है गीत की ओरिजनालिटी. नयापन जिस गीत में अधिक होगा उसे अच्छे अंक मिलेंगें पर हमारी रेटिंग तो बस एक पक्ष है, असल निर्णय तो आप सब के वोटिंग से ही होगा....सालाना संगीत चार्ट में हम आपकी रेटिंग को ही प्राथमिकता देंगें. निश्चिंत रहें...तो चलिए अब आप रेटिंग दीजिये आज के गीत को. शब्द कुछ यूं है -

ये दूरियां....ये दूरियां...
इन राहों की दूरियां,
निगाहों की दूरियां
हम राहों की दूरियां,
फ़ना हो सभी दूरियां,
क्यों कोई पास है,
दूर है क्यों कोई
जाने न कोई यहाँ पे...
आ रहा पास या,
दूर मैं जा रहा
जानूँ न मैं हूँ कहाँ पे......(वाह... कशमकश हो तो ऐसी)
ये दूरियां.....

कभी हुआ ये भी,
खाली राहों मैं भी,
तू था मेरे साथ,
कभी तुझे मिलके,
लौटा मेरा दिल ये,
खाली खाली हाथ...
ये भी हुआ कभी,
जैसे हुआ अभी,
तुझको सभी में पा लिया....
हैराँ मुझे कर जाती है दूरियां,
सताती है दूरियां,
तरसाती है दूरियां,
फ़ना हो सभी दूरियां...

कहा भी न मैंने,
नहीं जीना मैंने
तू जो न मिला
तुझे भूले से भी,
बोला न मैं ये भी
चाहूं फासला...
बस फासला रहे,
बन के कसक जो कहे,
हो और चाहत ये जवाँ
तेरी मेरी मिट जानी है दूरियां,
बेगानी है दूरियां,
हट जानी है दूरियां,
फ़ना हो सभी दूरियां...

ये दूरियां.....


तो सुजॉय सुन लिया जाए ये गीत

सुजॉय - हाँ तो लीजिये श्रोताओं सुनिए..."ये दूरियां..." फिल्म लव आजकल से ....



आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 4 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

क्या आप जानते हैं ?
आप नए संगीत को कितना समझते हैं चलिए इसे ज़रा यूं परखते हैं. मोहित का गाया सबसे पहला फ़िल्मी गीत कौन सा था ? बताईये और हाँ जवाब के साथ साथ प्रस्तुत गीत को अपनी रेटिंग भी अवश्य दीजियेगा.

पिछले सवाल का सही जवाब था गीत "ओ साथी रे" फिल्म ओमकारा का और सबसे पहले सही जवाब दिया दिशा जी ने...बधाई....और सबसे अच्छी बात कि आप सब ने जम कर रेटिंग दी. वाह मोगेम्बो खुश हुआ...:) उम्मीद है आज भी ये सिलसिला जारी रहेगा...


अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Monday, January 26, 2009

२७ गीतों ने पार किया समीक्षा के पहले चरण का विशाल समुन्दर

दोस्तों, दूसरे सत्र में प्रकाशित हमारे २७ गीतों ने आज अपनी समीक्षा के पहले चरण का पड़ाव पार कर लिया है. अर्थात् ५ समीक्षकों में से ३ ने अपने अंक दे दिए हैं. इस पहले चरण के बाद सभी गीतों की जो अब तक की स्थिति है उसका ब्यौरा आज हम यहाँ प्रस्तुत करने जा रहे हैं. समीक्षा का दूसरा और अन्तिम चरण अभी जारी है. जिसके बाद हम उदघोषणा करेंगें हमारे टॉप १० गीतों का और उनमें से एक होगा हमारा सरताज गीत. आज हम दिसम्बर के दिग्गज गीतों की, तीनों समीक्षकों की समीक्षाएं और अन्तिम अंक तालिका यहाँ प्रस्तुत करने जा रहे हैं पर उससे पहले नवम्बर के नम्बरदार गीतों की जो तीसरी समीक्षा छूट गई थी, पहले उस पर एक नज़र डाल लें.

तीसरे समीक्षक ने नवम्बर के नम्बरदार गीतों के बारे में कुछ यूँ राय रखी है -

गीत # १९. उड़ता परिंदा
गीत अच्‍छा लिखा गया है । संगीत बढिया है । पर गायकी कमज़ोर लगी । एक और बात । उच्‍चारण दोष सुधारना गायकों के लिए बहुत ज़रूरी है । दीवार को दिवार और ख़त को खत कहा है । जिससे रस-भंग हो जाता है ।
गीत--४, धुन और संगीत संयोजन-४, गायकी और आवाज़-३, ओवारोल प्रस्तुति-४, कुल - १५/२०=७.५/१०.
पहले चरण के कुल अंक - २१/३०.

गीत # २० - गीत-वो बुतख़ाना ये मयख़ाना

गीत, गायकी और संगीत सभी बढिया । कहीं कहीं गायकी कमज़ोर लगी ।
गीत--५, धुन और संगीत संयोजन-५, गायकी और आवाज़-४, ओवारोल प्रस्तुति-५, कुल - १९ /२०=९.५/१०.
पहले चरण के कुल अंक - २५.५/३०.

गीत # २१, माहिया -
गीत बहुत अधिक प्रभावित नही करता.
गीत--४, धुन और संगीत संयोजन-३, गायकी और आवाज़-३, ओवारोल प्रस्तुति-३, कुल - १३/२०=६.५/१०.
पहले चरण के कुल अंक - १८.५ /३०.

गीत # २२, - तू रूबरू
गीत के बोल बहुत बढिया हैं । धुन मिक्सिंग अच्‍छी लगी । कहीं कहीं उच्‍चारण की दिक्क़त यहां भी दिखी । पर कुल मिलाकर एक प्रभावी गीत । गायक में बहुत संभावनाएं हैं । बेहद युवा और आकर्षक स्‍वर ।
गीत--५, धुन और संगीत संयोजन-४, गायकी और आवाज़-४, ओवारोल प्रस्तुति-४, कुल - १७/२०=८.५/१०.
पहले चरण के कुल अंक - २४/३०.

चलिए अब बढ़ते हैं दिसम्बर के दिग्गज गीतों की तरफ़, टिपण्णी किसी एक समीक्षक की दे रहे हैं पर अंक तीनों के अलग अलग दिए जा रहे हैं-

गीत # २३, वन वर्ल्ड -हमारी एक सभ्यता

वन वर्ल्‍ड बहुत अच्‍छा लिखा और कंपोज़ किया गया है । बस एक ही कसर रह गयी है । कहीं कहीं क्‍लेरिटी/स्‍पष्‍टता का अभाव है । यही वजह है कि अगर इबारत ना देखें तो कई जगहों पर आते । काश कि इस गाने में स्‍पष्‍टता का ख्‍याल रखा गया होता तो ये एक बेहतर जनगीत का दरजा हासिल कर सकता था ।
पहले समीक्षक - १९/२०
दूसरे समीक्षक - १४.५/२०.
तीसरे समीक्षक - १९/२०.
कुल अंक - २६.५/३०.

गीत # २४, चाँद का आँगन

इस बार के गीत बोलों के मामले में बहुत आगे हैं। इस गीत के बोल कविता जैसे हैं। ऐसे बोलों को स्वरबद्ध करना बहुत ही मुश्किल काम है। लेकिन कुमार आदित्य ने जैसा संगीत दिया है, उसमें बेहतर संयोजन का आभाव होने बावज़ूद बार-बार सुनने का मन होता है। पूरे गीत में बेसिक धुन ही बजती रहती है, फिर भी संगीत को बार-बार सुनना कानों को नहीं थकाता। कुमार आदित्य की आवाज़ बहुत रूखी है, फिर भी इस गीत पर फब रही है।
पहले समीक्षक - २०/२०
दूसरे समीक्षक - १५/२०.
तीसरे समीक्षक - १८/२०.
कुल अंक - २६.५/३०.

गीत # २५, जिस्म कमाने निकल गया है

इस ग़ज़ल के शे'र कमाल के हैं। नाज़िम नक़वी की जितनी तारीफ़ की जाय वह कम है। आदित्य विक्रम का संगीत बढ़िया है। राहत देता ह, लेकिन गायक वह जान नहीं डाल पाया है, वह ट्रीटमेंट नहीं दे पाया है, जिसकी आवश्यकता इस ग़ज़ल को थी। इस ग़ज़ल को सुनने में वह आनंद नहीं है, जो इसे पढ़ने में आता है।
पहले समीक्षक - २०/२०
दूसरे समीक्षक - १५.५/२०.
तीसरे समीक्षक - १४/२०.
कुल अंक - २४.५/३०.

गीत # २६, मुझे वक्त दे मेरी जिंदगी

इस गीत का सबसे मज़बूत पक्ष इसका संगीत और उसका संयोजन है, लेकिन उस स्तर की गायकी नहीं है। हालाँकि गायिका ने इस गीत का संगीत भी दिया है, उस हिसाब के संगीत का मूड उन्हीं भली-भाँति पता था, शायद रियाज़ की कमी हो। गीतकार ने सम मात्राओं का ध्यान नहीं दिया है, तभी गायिका को 'कि ना रेत' को 'किनारेत' की तरह गाना पड़ा है।
पहले समीक्षक - १८/२०
दूसरे समीक्षक - १७/२०.
तीसरे समीक्षक - १६/२०.
कुल अंक - २५.५/३०.

गीत # २७, जो शजर

यह ग़ज़ल इस महीने की सबसे उम्दा प्रस्तुति है। दौर सैफ़ी के शे'रो का तो कोई जवाब ही नहीं। दिल को छू देने वाले शे'रों को जब रफीक़ शेख़ की आवाज़ मिली है तो ग़ज़ल मुकम्मल बन पड़ी है। इस पर क्या कहना, बस सुनते रहें...
पहले समीक्षक - १६/२०
दूसरे समीक्षक - १७/२०.
तीसरे समीक्षक - २०/२०.
कुल अंक - २६.५/३०.

तो लीजिये, अब जानिए कि पहले चरण के बाद किस किस पायदान पर हैं हमारे दूसरे सत्र के २७ नगीने गीत-

तेरा दीवाना हूँ - २७/३०.
वन वर्ल्ड -हमारी एक सभ्यता - २६.५/३०
जो शजर - २६.५/३०
चाँद का आंगन - २६.५/३०
मुझे वक्त दे मेरी जिंदगी- २५.५/३०
हुस्न - २५.५/३०
खुशमिजाज़ मिटटी - २५/३०.
जीत के गीत - २४.५/३०.
सच बोलता है - २४.५/३०.
जिस्म कमाने निकल गया है - २४.५/३०
संगीत दिलों का उत्सव है - २४/३०.
आवारा दिल - २४/३०.
ओ साहिबा - २४/३०
ऐसा नही - २४/३०.
तू रूबरू - २४/३०
सूरज चाँद और सितारे - २२.५/३०.
चले जाना - २१.५/३०.
तेरे चहरे पे - २१/३०.
उड़ता परिंदा - २१/३०
डरना झुकना - २०.५/३०.
बेइंतेहा प्यार - २०.५/३०.
बढे चलो - २०/३०.
ओ मुनिया - १९.५/३०.
मैं नदी - १९/३०.
माहिया - १८.५/३०
राहतें सारी - १८/३०.
मेरे सरकार - १६.५/३०.


Tuesday, December 23, 2008

जब अक्टूबर के अजय वीर गीत दूसरी बार भिडे...

किन्हीं कारणों वश हम अपनी समीक्षाओं की प्रस्तुति में कुछ पीछे छूट गए थे. पर कोशिश हमारी रहेगी कि जनवरी के पहले सप्ताह के अंत तक हम इस सत्र के सभी गीतों की पहले चरण की समीक्षा और अंक तालिका आपके समुख रख सकें. तो सबसे पहले नज़र करें कि क्या कहते हैं हमारे दूसरे समीक्षक अक्टूबर के अजय वीर गीतों के बारे में -

डरना झुकना छोड दे, सारे बंधन तोड दे..

इस अच्छे गीत की शुरुआत में ही गायकों से हारमोनी के सुरों में गडबड हो गयी है.सुरों की पकड किसी भी सूरत में स्थिर हो नही पाती, जिसकी वजह से आगे चल कर भी गीत प्रभाव नहीं छोड़ पा रहा है. जोगी सुरिंदर और अमनदीप का गला तरल ज़रूर है, मगर इस गफ़लत की वजह से पेरुब द्वारा रचे गये सुरों के इस अज़ीम शाहकार में बॆलेंस नहीं रह पाता.

इसी वजह से पंजाबी तडके में भी स्वाद में उतना जायका नही ले पाता सुनने वाला श्रोता, जो आगे चलकर थोडा सुरीला ज़रूर हो जाता है.मगर कर्णप्रिय या लोकप्रिय होना याने गुणवता में उच्च कोटी का होना यह समीकरण नहीं है, कम से कम मेरे विचार से.सुर और ताल किसी भी गाने के मूल तत्व हैं, और इसमें कमी-बेशी पूरे गीत के स्ट्रक्चर को विकलांग बनाता है.

यूं नहीं की इसमें कोई अच्छाई नहीं है. शुरुआत की संयोजन में हुई कमी के बावजूद गायको के वोईस थ्रो और उर्जा का भंडार असीमित लगता है.गायकों में उम्मीद की किरण नज़र आती है.

मगर एक बात की तारीफ़ किये बगैर समीक्षा पूर्ण नही होगी. सजीव सारथी द्वारा लिखे इस गीत के बोलों में जो आग का, चेतना का प्रस्फ़ुटन हुआ है, उसकी वजह से युवा मन के विद्रोह के स्वर और जोश के तूफ़ान की अभिव्यक्ति अचूक हो पाई है.इस तरह के गीतों से रसोत्पत्ति के माध्यम -संगीत और स्वर का शुद्ध समन्वय हमें सुनने को मिलता है.

इसीलिये,यह गीत खत्म होने के बाद भी मन के पीछे याद के किसी कोने में सहज कर रखा गया और बाद में भी किसी दूसरे कार्य के बीच जुगाली की तरह हमारे कानों के इंद्रियों के समक्ष रिकॊल हो जाता है. चलो ये भी क्या कम है.

गीत - 3.5, धुन व् संगीत संयोजन - 3.5, गायकी - 3.5, प्रस्तुति - 4, कुल - 14.5 ; 7.5/10,
कुल अंक अब तक (दो समीक्षाओं के बाद) - 10.5/20

ऐसा नही के आज मुझे चांद चाहिये..

शिवानी द्वारा लिखा गया यह गीत बेहद श्रवणीय बन पडा है, इसका पूरा श्रेय संगीतकार ऋषि को जाता है. इस गीत के हर शब्द में छिपी हुई वेदना को प्रतिष्ठा की मासूमियत भरी आवाज़ नें अच्छी तरह से उभारा है.

मगर उनकी आवाज़ के लोच और माधुर्य के साथ साथ स्वर नियंत्रण और सुरों पर ठहरने चलने की सरगम यात्रा का एक सुर से दूसरे पर जाने का सफ़र थोडा़ और सुरीला होता तो इस प्रस्तुति को अधिक अंक मिल सकते थे.गीत को कालजयी बनने में इन सभी का योगदान होता है, तब कहीं जाकर गीत आपके जेहन में हमेशा के लिये कैद हो जाता है.

फ़िर भी ऋषि के स्वरों के और वाद्यों के चयन, इंटरल्युड में हारमोनी के पुट की वजह से मैं तो इसे बार बार सुन रहा हूं, और नारी हृदय के भावों में मन की निश्छलता प्रतिष्ठा जी की आवाज़ से निकल कर सीधे आपके मन की गहराई में जाती है, और आप उसके सुख दुख में एकाकार हो जाते है. चांद की ख्वाहिश ना रख कर विश्वास को प्राधान्यता देना अपने आप में एक बडी बात कह जाती है इस गीत का भावार्थ, जिसके लिये गीतकार को साधुवाद.

गीत - 4, धुन व् संगीत संयोजन - 4, गायकी - 3.5, प्रस्तुति - 4, कुल - 15.5 ; 7.5/10,
कुल अंक अब तक (दो समीक्षाओं के बाद) - 15/२०

सूरज चांद और सितारे

कृष्णा पंडित और साथियों द्वारा यह गीत बडे ही जोश और जुनून से गाया है. इस रॊक गीत की शुरुआत से ही जो रिदम की उर्जा का स्रोत फूट पडा है, वह गीत के बोलों को समर्थन करते हुए युवा स्पंदन का प्रतिनिधित्व करता है.

गीत के बोल जिस तरह इस धुन में संजय द्विवेदी नें पिरोये है,या जिस तरह से संगीतकार चैतन्य भट्ट नें इन नई पीढी की भावनाओं के प्रतिबिंब गीतों के बोलों को अपनी गतिवान धुन से चैतन्य बनाया है, दोनो ही बधाई के पात्र है.

मगर गायक समूह इतने प्रतिभाशाली होते हुए भी इस द्रुत लय के गीत में टेम्पो पकडने में कहीं कहीं पिछड़ जाते है,या फ़िर कहीं कहीं समय पर सम पर पहुंचने के लिये शब्दों को अस्पष्ट या जल्द डिलेवर कर जाते है.

फिर भी धुन की आकर्षकता और ऑवरोल प्रस्तुती इसे पार पहूंचा देती है,और यादगार भी बना देती है.

गीत - 4, धुन व् संगीत संयोजन - 3.5, गायकी - 4, प्रस्तुति - 3.5, कुल - 15; 7.5/10,
कुल अंक अब तक (दो समीक्षाओं के बाद) - 15/20.

आखरी बार बस.

प्रस्तुत गीत के हर पहलू में एक उत्तमता , उत्तुंगता और गहराई के दीदार होते है, इसमें कोई शक नहीं. मोईन नज़र नें लिखे इस प्रसिद्ध गज़ल के हर शब्द का अपना खुद का वज़्न और सौंदर्य है, जो विरह की इन्तेहां का खूब बयां करता है, साथ ही एक उम्मीद का शेड़ दिखा जाता है. ऐसी गज़ल कृति को स्वर बद्ध कर पाना और निभा जाना कठिन है, जो संगीतकार रफ़ीक शेख़ नें सहजता से और बखूबी निभाया है.

साथ ही उनका गायन गीत को और मेलोडियस,श्रव्य एवं सुकून भरा बना जाता है. उनकी जादुई आवाज़ सधी, नियंत्रित , गज़ल गाने को पूरी तरह मुआफ़िक और मॊड्युलेशन के कणों से भरपूर है. फ़िल्मी संगीत या रेकोर्डेड नॊन फ़िल्मी गीत या गज़ल की सारी खूबियां अपनें में समाये हुए इस गीत की रिपीट वॆल्यु भी साबित होती है जब मन इस गज़ल को सुनने को फिर मांग उठता है.

वैसे इस तरह की तर्ज़ काफ़ी परिभाषित लगती है, और किसी आश्चर्य या अनूठेपन से मरहूम होने से युवाओं के आज की पीढी की मान्यताओं और मांगों को शायद ही पूर्ण कर पायेगी. मगर फ़िर वही बात- कर्णप्रियता या मधुरता में कोई ट्विस्ट की दरकार नही हो सकती. शायद इसीलिये, ऐसी धुनें काल के थपेडों को भी झेल जाती है, और लंबी दूरी का घोडा़ साबित होती है.यकीन ना हो तो फ़िल्मी गीतों का इतिहास पलट कर चेक कर लिजिये.

गीत - 4, धुन व् संगीत संयोजन - 4, गायकी - 4.5, प्रस्तुति - 4.5, कुल - 17; 8.5/10,
कुल अंक अब तक (दो समीक्षाओं के बाद) - 17.5/20

ओ साहिबा

विश्वजीत एक अच्छे गायक है, और इस गीत में अलग अंदाज़ में अलग जॊनर का गीत बखूबी गाया है. इस गीत का यु एस पी भी यही मुख्त़लिफ़ अंदाज़े बयां है. थोडा और परिश्रम कर स्वरों के ठहराव पर ज़्यादा ध्यान देते तो और चार चांद लग जाते.

सजीव सारथी हमेशा की तरह यहां एक मुख्त़लिफ़ सा विचार लेकर निराला माहौल रचते है. उनके तरकश में शब्दों के तीर भरे हुए है,और सही जगह सही और उचित शब्दों को रखनें में महारत हासिल कर चुके है. उनके बोलों में क्लिष्टता के अभाव की वजह से,और मीटर में घड़न होने की वजह से गेत के गेय बनने के कारण, इस फ़्रंट पर गीत के गायक और संगीतकार को बंदिश में सरलता और तरलता दोनो का लाभ दे जाती है. दिन के जलने का और रात के बुझने का मौलिक खयाल मन मोह लेता है .(कब जले दिन यहां और कब बुझे रातें...) बहूत खूब.

यही बात सुभोजित के बारे में भी कही जा सकती है.गाने के संगीत का एक अपना रिदम है,चैतन्य है.उन्होनें अपनी तरफ़ से से कहीं भी गाने को सुरों द्वारा या वाद्यों द्वारा लाऊड़ नहीं होने दिया है. बेकरारी और खुमारी का चित्रण सुरों के ब्रश से स्ट्रोक देकर रंगा गया है. मन की उहापोह की स्थिति ज़रूर ग्रुप वायोलीन (सिन्थेसाईज़र) के घुमावदार सरगम की मदत से दिखाया है, मगर वह भी नियंत्रित.

गीत - 4, धुन व् संगीत संयोजन - 4, गायकी - 4, प्रस्तुति - 4.5, कुल - 16.5 ; 8.5/10,
कुल अंक अब तक (दो समीक्षाओं के बाद) - 17.5/२०

Wednesday, November 12, 2008

आधे सत्र के गीतों ने पार किया समीक्षा का पहला चरण

सितम्बर के सिकंदरों की पहले चरण की अन्तिम समीक्षा, और तीन महीनों में प्रकाशित १३ गीतों की पहले चरण की समीक्षा के बाद का स्कोरकार्ड

समीक्षक की व्यस्तता के चलते हम सितम्बर के गीतों की पहले चरण की अन्तिम समीक्षा को प्रस्तुत करने में कुछ विलंब हुआ. तो लीजिये पहले इस समीक्षा का ही अवलोकन कर लें.


खुशमिजाज़ मिटटी
बढ़िया गीत होते हुए पर भी पता नहीं क्या कमी है, गीत दिल को छू नहीं पाता। ठीक संगीत, गीत बढ़िया और गायकी भी ठीकठाक। गायक को अभिजीत की शैली अपनाने की बजाय खुद की शैली विकसित करनी चाहिये।
गीत: ३, संगीत 3, गायकी ३, प्रस्तुति ३, कुल १२/२०, पहले चरण में कुल अंक २५ / ३०.

राहतें सारी
एक बार सुन लेने लायक गीत, बोल सुंदर परन्तु संगीत ठीक है। वैसे संगीतकार की उम्र बहुत कम है उस हिसाब से बढ़िया कहा जायेगा, क्यों कि बड़े बड़े संगीतकार भी इस उम्र में इतने बढ़िया संगीत नहीं रच पाये हैं।
गीत ३.५, संगीत ३.५ गायकी ३ प्रस्तुति 3 कुल १३/२०, पहले चरण में कुल अंक १८ / ३०.

ओ मुनिया
बढ़िया गीत को संगीत और प्रस्तुति के जरिये कैसे बिगाड़ा जाता है उसका बेहद शानदार नमूना, एक पंक्ति भी सुनने लायक नहीं, जबरन एक दो लाइनें सुनी। हिन्द युग्म पर प्रकाशित गीतों में अब तक का सबसे सामान्य गीत। हिन्द युग्म को ऐसे गीतों से बचना चाहिये। सिर्फ वर्चूअल स्पेस भरने के लिये ऐसी रचनायें प्रकाशित करने का कोई फायदा नहीं।
गीत 5, संगीत ०, गायकी ०, प्रस्तुति ० कुल ५/२०, पहले चरण में कुल अंक १९.५ / ३०.

सच बोलता हैएक बार फिर सुन्दर गज़ल, गायकी और संगीत प्रस्तुति एकदम बढ़िया होते हुए भी गीत को एक बार सुन लेने के बाद सुनने का मन नहीं होता। कुछ चीजों में कमी दिखाई नहीं देती, उसको वर्णित नहीं किय़ा जा सकता कि इस गीत में यह कमी है पर वो कमी अखरती रहती है, मन में कसक सी रहती है। इस गीत को सुनने के बाद भी सिसा ही महसूस होता है।
गायक की आवाज में मो. रफी साहब की आवाज की झलक दिखती (सुनाई देती) है।
गीत ४, संगीत ४.५, गायकी ३, प्रस्तुति ४.५ कुल १६/२०, पहले चरण में कुल अंक २४.५ / ३०.

सितम्बर माह की समाप्ति के साथ ही हमारे वर्तमान सत्र का आधा सफर पूरा हो गया. हालाँकि बीते शुक्रवार तक हम १९ नए गीत प्रकाशित कर चुके हैं, पर सितम्बर तक प्रकाशित सभी १३ गीत अपनी पहले चरण की समीक्षा का समर पार चुके हैं. आईये देखते हैं इन १३ गीतों में कौन है अब तक सबसे आगे. अब तक का स्कोर कार्ड इस प्रकार है.

खुशमिजाज़ मिटटी - २५ / ३०.
जीत के गीत - २४.५ / ३०.
सच बोलता है - २४.५ / ३०.
संगीत दिलों का उत्सव है - २४ / ३०.
आवारा दिल - २४ / ३०.
चले जाना - २१.५ / ३०.
तेरे चहरे पे - २१ / ३०.
बेइंतेहा प्यार - २०.५ / ३०.
बढे चलो - २० / ३०.
ओ मुनिया - १९.५ / ३०.
मैं नदी - १९ / ३०.
राहतें सारी - १८ / ३०.
मेरे सरकार - १६.५ / ३०.

हम आपको याद दिला दें कि कुल अंक ५० में से दिए जायेंगे, यानी अन्तिम दो निर्णायकों के पास २० अंक हैं, अन्तिम चरण की रेंकिंग जनवरी में होगी, जिसके बाद ही अन्तिम फैसला होगा, सरताज गीत का और टॉप १० का भी, फिलहाल हम मिलेंगे आने वाले रविवार को, अक्टूबर के अजयवीर गीतों की पहली समीक्षा लेकर.

हिंद युग्म, आवाज़ द्वारा संगीत के क्षेत्र में हो रहे इस महाप्रयास के लिए अपना बेशकीमती समय निकल कर, युवा कलाकारों को प्रोत्साहन/ मार्गदर्शन देने के उद्देश्य से आगे आए हमारे समीक्षकों के प्रति हिंद युग्म की पूरी टीम अपना आभार व्यक्त करती है.


Sunday, October 19, 2008

पहले चरण की दूसरी समीक्षा में कांटे की टक्कर, सितम्बर के सिकंदरों की

सितम्बर के सिकंदर गीत समीक्षा की पहली परीक्षा से गुजर चुके हैं, आईये जानें हमारे दूसरे समीक्षक की क्या राय है इनके बारे में -

पहला गीत खुशमिज़ा़ज मिट्टी

मेरा मानना है कि ये गीत अब तक के सबसे संपूर्ण गीतों में से एक है । इस पर बहस की कोई गुंजाईश ही नहीं है । गायक संगीतकार ने इसके बोलों को बहुत ही संवेदनशीलता के साथ निभाया है । सुबोध साठे को बधाई । गौरव के बोल एक पके हुए गीतकार की कलम से निकले लगते हैं । आवाज़ के सबसे अच्‍छे गीतों में से एक है ये ।

गीत- 5, धुन और संगीत संयोजन—5, गायकी और आवाज़—5, ओवारोल प्रस्तुति—5
कुल अंक 20 / 20 यानी 10 / 10, कुल अंक अब तक (पहली और दूसरी समीक्षा को मिला कर)= 19 /20

दूसरा गीत—राहतें सारी

मुझे लगता है कि इस गाने से किसी भी पक्ष में पूरा न्‍याय नहीं हुआ है । मोहिंदर जी के इस गीत के पहले दो अंतरे अच्‍छे हैं । पर आखिरी दो अंतरे कमजोर लगे । उनमें ‘गेय तत्‍त्‍व’ की कमी नज़र आई । कृष्‍ण राज कुमार ने कोशिश की है कि इस गाने को बहुत ही नाजुक-सा बनाया जाये । पर मुझे लगता है कि इस आग्रह की वजह से गाने के प्रभाव पर बहुत बुरा असर पड़ा है । इस गाने को और चमकाया जा सकता है ।

गीत- 3 धुन और संयोजन- 3 गायकी और आवाज-4 ओवरऑल प्रस्‍तुति- 3
कुल अंक 13 /20 यानी 6.5 / 10, कुल अंक अब तक (पहली और दूसरी समीक्षा को मिला कर)= 11.5 / 20

तीसरा गीत-- ओ मुनिया मेरी गुडिया---

इससे पहले मैं जे एम सोरेन को सुना नहीं था । पर इस गाने को सुनकर मुझे लगा कि वो सही मायनों में रॉक स्‍टार हैं । एक सच्‍चा रॉक स्‍टार सरोकार वाले गीतों की कुशल प्रस्‍तुति करता है । और सोरेन ने यही किया है । एकदम हार्ड म्‍यूजिक के बावजूद इस गाने की संवदेना दबी नहीं है । सजीव का ये गीत उनके बाक़ी गीतों से बेहतर है और एकदम अलग तरह का भी ।

गीत- 5 धुन और संयोजन- 4 गायकी और आवाज़- 4 ओवरॉल प्रस्‍तुति- 5
कुल अंक 18 / 20 यानी 09 / 10, कुल अंक अब तक (पहली और दूसरी समीक्षा को मिला कर)= 17 / 20

चौथा गीत/ग़ज़ल—सच बोलता है

अजीम नवाज़ राही की इस ग़ज़ल के सारे शेर अच्‍छे हैं । एक भी कमज़ोर शेर नहीं है । इसके लिए शायर बधाई का पात्र है । इस ग़ज़ल में इंटरल्‍यूड पर कोरस का प्रयोग अच्‍छा लगा । कुल मिलाकर एक अच्‍छी कंपोज़ीशन और अच्‍छी गायकी ।

रचना- 5 धुन और संयोजन- 4 गायकी और आवाज़- 4 ओवरऑल- 5
कुल अंक 18 / 20 यानी 9 / 10, कुल अंक अब तक (पहली और दूसरी समीक्षा को मिला कर)= 16.5 / 20

चलते चलते -

खुशमिजाज़ मिटटी में दूसरे सप्ताह भी अपनी बढ़त मजबूत रखी है. ओ मुनिया और सच बोलता है भी कसौटी पर खरे उतरे हैं. सितम्बर के सिअकंदेरों की तीसरे और पहले दौर की अन्तिम समीक्षा के साथ हम जल्द ही उपस्थित होंगे.

Sunday, October 5, 2008

सितम्बर के सिकंदरों को पहली भिडंत, समीक्षा के अखाडे में...

सितम्बर के सिकंदरों की पहली समीक्षा -

समीक्षा (खुशमिजाज़ मिटटी )

सितम्बर माह का पहला गीत आया है सुबोध साठे की आवाज़ में "खुशमिजाज़ मिट्टी"। गीत लिखा है गौरव सोलंकी ने और संगीतकार खुद सुबोध साठे हैं। गीत के बोल अच्छी तरह से पिरोये गये हैं। गीत की शुरुआत जिस तरह से टुकड़ों में होती है, उसी तरह संगीतकार ने मेहनत करके टुकड़ों में ही शुरुआत दी है। धीमी शुरुआत के बावजूद सुबोध साठे के स्वर मजबूती से जमे हुए नज़र आते हैं। वे एक परिपक्व संगीतकार की तरह गीत की "स्पीड" को "मेण्टेन" करते हुए चलते हैं। असल में गीत का दूसरा और तीसरा अन्तरा अधिक प्रभावशाली बन पड़ा है, बनिस्बत पहले अन्तरे के, क्योंकि दूसरा अन्तरा आते-आते गीत अपनी पूरी रवानी पर आ जाता है। ध्वनि और संगीत संयोजन तो बेहतरीन बन पड़ा ही है इसका वीडियो संस्करण भी अच्छा बना है। कुल मिलाकर एक पूर्ण-परिपक्व और बेहतरीन प्रस्तुति है। गीत के लिये 4 अंक (एक अंक काटने की वजह यह कि गीत की शुरुआत और भी बेहतर हो सकती थी), आवाज और गायकी के लिये 5 अंक (गीत की सीमाओं को देखते हुए शानदार प्रयास के लिये), ध्वनि संयोजन और संगीत के लिये 4 अंक और कुल मिलाकर देखा जाये तो प्रस्तुति को 5 में से पूरे 5 अंक देता हूँ। गौरव सोलंकी और सुबोध साठे का भविष्य बेहद उज्जवल नज़र आता है।

कुल अंक १८/२० यानी ९ / १०

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समीक्षा (राहतें सारी...)



सितम्बर माह का दूसरा गीत है "राहतें सारी…" लिखा है मोहिन्दर कुमार ने और गाया तथा संगीतबद्ध किया है नये गायक कृष्ण कुमार ने। परिचय में बताया गया है कि कृष्ण कुमार पिछले 14 सालों से कर्नाटक संगीत की शिक्षा ले रहे हैं, लेकिन यह नहीं पता चला कि उन्होंने अब तक कितने गीतों को संगीतबद्ध किया है। गीत को आवाज़ देना और उसे ध्वनि संयोजन करना और संगीत देना दोनों अलग-अलग विधाऐं हैं, यह ज़रूरी नहीं कि जो अच्छा गायक हो वह अच्छा संगीतकार भी हो, और ठीक इसके उलट भी यही नियम लागू होता है। भारतीय फ़िल्म संगीत में ऐसे अनेकों उदाहरण भरे पड़े हैं, जिसमें गायकों ने संगीतकार बनने की कोशिश की लेकिन जल्दी ही उनकी समझ में आ गया कि यह उनका क्षेत्र नहीं है, और यही कुछ संगीतकारों के साथ भी हुआ है, जो गायक बनना चाहते थे। इस गीत में कृष्ण कुमार लगभग इसी "ऊहापोह" (Dilema) में फ़ँसे हुए दिखते हैं। मोहिन्दर कुमार की कविता तो उम्दा स्तर की है, यहाँ तक कि गायक की आवाज़ भी ठीक-ठाक लगती है, लेकिन सर्वाधिक निराश किया है संगीत संयोजन और ध्वन्यांकन ने। शुरु से आखिर तक गीत एक अस्पष्ट सी "श्रवणबद्धता" (Audibility) में चलता है। संगीत के पीछे आवाज़ बहुत दबी हुई आती है, कृष्ण कुमार चाहते तो संगीत का कम उपयोग करके आवाज़ को (माइक पास लाकर) थोड़ा खुला हुआ कर सकते थे, लेकिन ऐसा नहीं किया गया और समूचा गीत बेहद अस्पष्ट सा लगा। कृष्ण कुमार अभी बहुत युवा हैं, उनकी संगीत दीक्षा भी चल रही है, उन्हें सिर्फ़ अपने गायकी पर ध्यान देना उचित होगा। कोई अन्य गुणी संगीतकार उनकी आवाज़ का और भी बेहतरीन उपयोग कर सकेगा, क्योंकि शास्त्रीय "बेस" तो उनकी आवाज़ में मौजूद है ही। इस गीत में बोल के लिये 4 अंक, संगीत संयोजन के लिये 2 अंक और आवाज़ और उच्चारण के लिये मैं सिर्फ़ 2 अंक दूँगा,यदि "ओवर-ऑल" अंक दिये जायें तो इस गीत को 5 में से 2 अंक ही देना उचित होगा। आवाज़ और संगीत शिक्षा को देखते हुए कृष्ण कुमार से और भी उम्मीदें हैं, लेकिन इस गीत ने निराश ही किया है।

कुल अंक १०/२० यानी ५ / १०

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समीक्षा (ओ मुनिया )

माह का तीसरा गीत है "ओ मुनिया…" गाया और संगीतबद्ध किया है सोरेन ने और लिखा है सजीव ने…
एक प्रोफ़ेशनल गीत कैसा होना चाहिये यह इसका उत्तम उदाहरण है। तेज संगीत, गीत की तेज गति, स्टूडियो में की गई बेहतर रिकॉर्डिंग और स्पष्ट आवाज़ के कारण यह गीत एकदम शानदार बन पड़ा है। गीत के बोल सजीव ने उम्दा लिखे हैं जिसमें "मुनिया" को आधुनिक ज़माने की नसीहत है ही, साथ में उसके प्रति "केयर" और "आत्मीय प्यार" भी गीत में छलकता है। साईट पर गीत के लिये प्रस्तुत ग्राफ़िक में बम विस्फ़ोट में घायल हुए व्यक्ति और विलाप करती हुई माँ की तस्वीर दिखाई देती है, इसकी कोई आवश्यकता नहीं नज़र आती। यह चित्र इस गीत की मूल भावना से मेल नहीं खाते। बहरहाल, गीत की धुन "कैची" है, युवाओं की पसन्द की है, तत्काल ज़बान पर चढ़ने वाली है। सोरेन की आवाज़ और उच्चारण में स्पष्टता है। चूँकि यह गीत तेज़ गति के संगीत के साथ चलता है, इसलिये इसमें गायक को सिर्फ़ साथ में बहते जाना था, जो कि सोरेन ने बखूबी किया है। अब देखना यह होगा कि किसी शान्त गीत में जिसमें "क्लासिकल" का बेस हो, सोरेन किस तरह का प्रस्तुतीकरण दे पाते हैं… फ़िलहाल इस गीत के बोलों के लिये 5 में से 4, संगीत संयोजन के लिये भी 5 में से साढ़े 3, आवाज़ और ध्वन्यांकन के लिये (ज़ाहिर है कि इसमें तकनीक का साथ भी शामिल है) साढ़े 4 अंक देता हूँ, इस प्रकार यदि गीत का ओवर-ऑल परफ़ॉर्मेंस देखा जाये तो इस अच्छे गीत को 5 में से 4.25 अंक दिये जा सकते हैं।

कुल अंक १६/२० यानी ८ / १०

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समीक्षा 4 (सच बोलता है )

अज़ीम जी लिखी हुई यह गज़ल बेहतरीन अश्आर का एक नमूना है, साथ ही इसे मखमली आवाज़ देने वाले रफ़ीक शेख भी एक जानी-पहचानी आवाज़ बन चुके हैं। समीक्षा के लिये प्रस्तुत गज़ल में यदि एक अंतरा (तीसरा वाला) कम भी होता तो चल जाता, बल्कि गज़ल और अधिक प्रभावशाली हो जाती, क्योंकि इसका आखिरी पैरा "जानलेवा" है। इसी प्रकार रफ़ीक शेख की आवाज़ मोहम्मद अज़ीज़ से मिलती-जुलती लगी, उन्होंने इस गज़ल को बिलकुल प्रोफ़ेशनल तरीके से गाया है, संगीत में अंतरे के बीच का इंटरल्यूड कुछ खास प्रभावित नहीं करता, बल्कि कहीं-कहीं तो वह बेहद सादा सा लगता है। गज़ल के मूड को गायक ने तो बेहतरीन तरीके से निभाया लेकिन संगीत ने उसे थोड़ा कमज़ोर सा कर दिया है। रफ़ीक की आवाज़ बेहतरीन है और यही इस गज़ल का सबसे सशक्त पहलू बनकर उभरी है। गीत पक्ष को 5 में से साढ़े तीन, संगीत पक्ष को 5 में से 3 और गायकी पक्ष को 5 में से साढ़े 4 अंक दिये जा सकते हैं। इस प्रकार ओवरऑल परफ़ॉरमेंस के हिसाब से यह गज़ल "अच्छी"(४.५ /५) की श्रेणी में रखी जाना चाहिये।

कुल अंक १५/२० यानी ७.५ / १०

चलते चलते

खुशमिजाज़ मिटटी की टीम को बधाई, देखना दिलचस्प होगा कि यह गीत आने वाले हफ्तों में भी यह बढ़त बना कर रख पायेगा या नही. ओ मुनिया और सच बोलता है भी कम पीछे नही है हैं दौड़ में...फिलहाल के लिए इतना ही.

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