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Sunday, March 6, 2016

राग भटियार : SWARGOSHTHI – 260 : RAG BHATIYAR



स्वरगोष्ठी – 260 में आज

दोनों मध्यम स्वर वाले राग – 8 : राग भटियार

पण्डित रविशंकर और पण्डित राजन मिश्र का भटियार





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला – ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ की आठवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का एक बार पुनः हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों की चर्चा कर रहे हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। संगीत के सात स्वरों में ‘मध्यम’ एक महत्त्वपूर्ण स्वर होता है। हमारे संगीत में मध्यम स्वर के दो रूप प्रयोग किये जाते हैं। स्वर का पहला रूप शुद्ध मध्यम कहलाता है। 22 श्रुतियों में दसवाँ श्रुति स्थान शुद्ध मध्यम का होता है। मध्यम का दूसरा रूप तीव्र या विकृत मध्यम कहलाता है, जिसका स्थान बारहवीं श्रुति पर होता है। शास्त्रकारों ने रागों के समय-निर्धारण के लिए कुछ सिद्धान्त निश्चित किये हैं। इन्हीं में से एक सिद्धान्त है, “अध्वदर्शक स्वर”। इस सिद्धान्त के अनुसार राग का मध्यम स्वर महत्त्वपूर्ण हो जाता है। अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार राग में यदि तीव्र मध्यम स्वर की उपस्थिति हो तो वह राग दिन और रात्रि के पूर्वार्द्ध में गाया-बजाया जाएगा। अर्थात, तीव्र मध्यम स्वर वाले राग 12 बजे दिन से रात्रि 12 बजे के बीच ही गाये-बजाए जा सकते हैं। इसी प्रकार राग में यदि शुद्ध मध्यम स्वर हो तो वह राग रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच का अर्थात उत्तरार्द्ध का राग माना गया। कुछ राग ऐसे भी हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वर प्रयोग होते हैं। इस श्रृंखला में हम ऐसे ही रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की आठवीं कड़ी में आज हम राग भटियार के स्वरूप की चर्चा करेंगे। साथ ही सबसे पहले हम आपको विश्वविख्यात संगीतज्ञ पण्डित रविशंकर के सितार पर राग भटियार के स्वर गूँजेंगे। इसके साथ ही लक्ष्मीकान्त – प्यारेलाल का संगीतबद्ध किया फिल्म ‘सुर संगम’ का इसी राग पर आधारित गीत पण्डित राजन मिश्र और एस. जानकी से सुनेगे।



आरोही नी अल्प ले, मध्यम दोऊ सम्हार,
रे कोमल, संवाद म स, क़हत राग भटियार।

पं. रविशंकर
अर्थात इस राग में कोमल ऋषभ और दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। आरोह में निषाद स्वर का अल्प प्रयोग किया जाता है। यह मारवा थाट का सम्पूर्ण जाति का राग है। अधिकतर विद्वान इस राग को बिलावल थाट के अन्तर्गत मानते हैं। बिलावल थाट का राग मानने का कारण है कि इस राग में शुद्ध मध्यम स्वर प्रधान होता है, जबकि राग मारवा में शुद्ध मध्यम का प्रयोग होता ही नहीं। स्वरूप की दृष्टि से भी यह मारवा के निकट भी नहीं है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। यह रात्रि के अन्तिम प्रहर विशेष रूप से प्रातःकालीन सन्धिप्रकाश काल में गाया-बजाया जाने वाला राग है। प्रातःकालीन सन्धिप्रकाश रागों में कोमल ऋषभ और शुद्ध गान्धार के साथ-साथ शुद्ध मध्यम स्वर का प्रयोग भी किया जाता है। तीव्र मध्यम स्वर का भी प्रयोग होता है, किन्तु अल्प। अवरोह के स्वर वक्रगति से लिये जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि यह पाँचवीं शताब्दी के राजा भर्तृहरि की राग रचना है। उत्तरांग प्रधान यह राग भंखार के काफी निकट होता है। राग भंखार में पंचम स्वर पर ठहराव दिया जाता है, जबकि राग भटियार में शुद्ध मध्यम पर। राग भटियार वक्र जाति का राग है। इसमें षडज स्वर से सीधे धैवत पर जाते हैं, जो अत्यन्त मनोहारी होता है। यह राग गम्भीर, दार्शनिक भाव और जीवन के उल्लास की अभिव्यक्ति देने में पूर्ण समर्थ है। राग भटियार का एक शास्त्रोक्त और प्रयोगधर्मी स्वरूप का अनुभव कराने के लिए अब हम आपको विश्वविख्यात संगीतज्ञ पण्डित रविशंकर से सितार पर दो रचनाएँ सुनवा रहे हैं। पहली रचना मध्यलय तीनताल में और दूसरी द्रुत एकताल में निबद्ध है। तबला संगति पण्डित कुमार बोस ने की है।


राग भटियार : सितार पर मध्यलय तीनताल और द्रुत एकताल की दो रचनाएँ : पण्डित रविशंकर 




लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल
आठवें दशक से ही फिल्म संगीत की प्रवृत्तियों में काफी बदलाव आ चुका था। नौवें दशक के फिल्म संगीत में रागदारी संगीत का समावेश एक उल्लेखनीय घटना मानी जाने लगी थी। ऐसे ही माहौल में 1985 में ‘सुर संगम’ और ‘उत्सव’, दो फिल्में बनीं जिसके संगीत में रागों का सहारा लिया गया था। यह भी उल्लेखनीय है कि इन दोनों फिल्मों के संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल थे। फिल्मों में लम्बे समय तक लोकप्रिय संगीत देने के लिए लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल का योगदान सराहनीय रहा है। 1963 में फिल्म ‘पारसमणि’ से फिल्म संगीतकार के रूप में पदार्पण करने वाली इस संगीतकार जोड़ी ने शुरुआती दौर की निम्नस्तरीय स्टंट फिल्मों में भी राग आधारित धुनें बना कर अपनी पैठ बनाई थी। उस दौर में उनकी फिल्में भले ही न चली हो, किन्तु उसका संगीत खूब लोकप्रिय हुआ। इसके बाद उनकी फिल्मों में लोक संगीत और लोकप्रिय सुगम संगीत के साथ-साथ राग आधारित धुनों का भी सहारा लिया गया था। 1985 में प्रदर्शित फिल्म ‘सुर संगम’ में उन्होने तत्कालीन प्रचलित फिल्म संगीत की प्रवृत्तियों के विपरीत संगीत दिया था। इस फिल्म के प्रायः सभी गीत विभिन्न रागों का आधार लिये हुए थे। यही नहीं फिल्म में मुख्य चरित्र के लिए उन्होने किसी फिल्मी पार्श्वगायक को नहीं बल्कि सुप्रसिद्ध शास्त्रीय युगल गायक पण्डित राजन और साजन मिश्र बन्धुओं में से एक राजन मिश्र का सहयोग लिया। फिल्म ‘सुर संगम’ में राग आधारित संगीत देना एक अनिवार्यता थी। दरअसल यह फिल्म दक्षिण भारतीय फिल्म ‘शंकराभरणम्’ का हिन्दी रूपान्तरण थी। फिल्म में मुख्य चरित्र संगीतज्ञ पण्डित शिवशंकर शास्त्री थे, जो संगीत की शुचिता और मर्यादा के प्रबल पक्षधर थे। अपने इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए शास्त्री जी मानव-मानव में कोई भेद नहीं मानते थे। ऐसे विषय के लिए राग आधारित संगीत की आवश्यकता थी। फिल्म में राग मालकौंस पर आधारित गीत- ‘आए सुर के पंछी आए...’, राग भूपाली और देशकार पर आधारित गीत- ‘जाऊँ तोरे चरणकमल पर वारी...’, राग भैरवी के सुरों में- ‘धन्यभाग सेवा का अवसर पाया...’ जैसे आकर्षक गीत पण्डित राजन मिश्र की आवाज़ में थे। परन्तु इस फिल्म का जो गीत लेकर आज हम उपस्थित हुए हैं, वह राग भटियार के सुरों में पिरोया गीत- ‘आयो प्रभात सब मिल गाओ...’ है। इस गीत में पण्डित राजन मिश्र के साथ दक्षिण भारत की सुप्रसिद्ध गायिका एस. जानकी के स्वर भी शामिल हैं। गीतकार बसन्त देव का लिखा यह गीत संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने सितारखानी ताल में निबद्ध किया है। आप इस अनूठे फिल्मी गीत में राग का अनुभव कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति प्रदान कीजिए।


राग भटियार : ‘आयो प्रभात सब मिल गाओ...’ : पण्डित राजन मिश्र और एस. जानकी





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 260वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको राग पर आधारित एक और फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत के गायक और गायिका के नाम हमे बता सकते हैं?

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 12 मार्च, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 262वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 258 की संगीत पहेली में हमने आपको 1966 में प्रदर्शित फिल्म ‘मेरा साया’ से राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – नन्द, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायिका – लता मंगेशकर

इस बार की पहेली में कुल छः प्रतिभागियों ने सही उत्तर दिया है। नागपुर, महाराष्ट्र से पुष्पा राठी ने ‘स्वरगोष्ठी’ की पहेली में पहली बार भाग लिया है। संगीत-प्रेमियों के इस परिवार में पुष्पा जी को शामिल करते हुए हम उनका हार्दिक स्वागत करते हैं। हमारे अन्य नियमित विजेता प्रतिभागी हैं- चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया। सभी छः प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आप हमारी श्रृंखला ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ का रसास्वादन कर रहे हैं। श्रृंखला के आठवें अंक में हमने आपसे राग भटियार पर चर्चा की। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। ‘स्वरगोष्ठी’ पर आप भी अपने सुझाव और फरमाइश हमें शीघ्र भेज सकते है। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




Sunday, December 21, 2014

‘आयो प्रभात सब मिल गाओ...’ : SWARGOSHTHI – 199 : RAG BHATIYAR


स्वरगोष्ठी – 199 में आज

शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत – 8 : राग भटियार


पण्डित राजन मिश्र ने एस. जानकी के साथ भटियार के स्वरों में गाया- 'आयो प्रभात सब मिल गाओ...'



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है, हमारी लघु श्रृंखला, ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत’। अब हम इस लघु श्रृंखला के समापन की ओर बढ़ रहे हैं। इस श्रृंखला में अभी तक आपने 1943 से 1960 के बीच में बनी कुछ फिल्मों के ऐसे गीत सुने जो रागों पर आधारित थे और इन्हें किसी फिल्मी पार्श्वगायक या गायिका ने नहीं बल्कि समर्थ शास्त्रीय गायक या गायिका ने गाया था। छठे दशक के बाद अब हम आपको सीधे नौवें दशक में ले चलते है। इस दशक में भी फिल्मी गीतों में रागदारी संगीत का हल्का-फुल्का प्रयास किया गया था। ऐसा ही एक प्रयास संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने 1985 की फिल्म ‘सुर संगम’ में किया था। इस फिल्म के मुख्य चरित्र के लिए उन्होने सुविख्यात गायक पण्डित राजन मिश्र (युगल गायक पण्डित राजन और साजन मिश्र में से एक) से पार्श्वगायन कराया था। आज के अंक में हम आपको इसी फिल्म से पण्डित राजन मिश्र की आवाज़ में राग भटियार के स्वरों में पिरोया एक गीत सुनवा रहे हैं। राग भटियार का एक अलग प्रयोगधर्मी स्वरूप का अनुभव करने के लिए सुप्रसिद्ध गायक पण्डित कुमार गन्धर्व के स्वरों में इस राग की एक आकर्षक रचना भी हम सुनेंगे। 


पण्डित राजन मिश्र
ठवें दशक से ही फिल्म संगीत की प्रवृत्तियों में काफी बदलाव आ चुका था। नौवें दशक के फिल्म संगीत में रागदारी संगीत का समावेश एक उल्लेखनीय घटना मानी जाएगी। ऐसे ही माहौल में 1985 में ‘सुर संगम’ और ‘उत्सव’, दो फिल्में बनीं जिसके संगीत में रागों का सहारा लिया गया था। यह भी उल्लेखनीय है कि इन दोनों फिल्मों के संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल थे। फिल्मों में लम्बे समय तक लोकप्रिय संगीत देने के लिए लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल का योगदान सराहनीय रहा है। 1963 में फिल्म ‘पारसमणि’ से फिल्म संगीतकार के रूप में पदार्पण करने वाली इस संगीतकार जोड़ी ने शुरुआती दौर की निम्नस्तरीय स्टंट फिल्मों में भी राग आधारित धुनें बना कर अपनी पैठ बनाई थी। उस दौर में उनकी फिल्में भले ही न चली हो, किन्तु उसका संगीत खूब लोकप्रिय हुआ। उनकी फिल्मों में लोक संगीत और लोकप्रिय सुगम संगीत के साथ-साथ राग आधारित धुनों का भी सहारा लिया गया था। 1985 में प्रदर्शित फिल्म ‘सुर संगम’ में उन्होने तत्कालीन प्रचलित फिल्म संगीत की प्रवृत्तियों के विपरीत संगीत दिया था। इस फिल्म के प्रायः सभी गीत विभिन्न रागों का आधार लिये हुए थे। यही नहीं फिल्म में मुख्य चरित्र के लिए उन्होने किसी फिल्मी पार्श्वगायक को नहीं बल्कि सुप्रसिद्ध शास्त्रीय युगल गायक पण्डित राजन और साजन मिश्र बन्धुओं में से एक राजन मिश्र का सहयोग लिया।

विदुषी एस. जानकी 
फिल्म ‘सुर संगम’ में राग आधारित संगीत देना एक अनिवार्यता थी। दरअसल यह फिल्म दक्षिण भारतीय फिल्म ‘शंकराभरणम्’ का हिन्दी रूपान्तरण थी। फिल्म में मुख्य चरित्र संगीतज्ञ पण्डित शिवशंकर शास्त्री थे, जो संगीत की शुचिता और मर्यादा के प्रबल पक्षधर थे। अपने इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए शास्त्री जी मानव-मानव में कोई भेद नहीं मानता थे। ऐसे विषय के लिए राग आधारित संगीत की आवश्यकता थी। फिल्म में राग मालकौंस पर आधारित गीत- ‘आए सुर के पंछी आए...’, राग भूपाली और देशकार पर आधारित गीत- ‘जाऊँ तोरे चरणकमल पर वारी...’, राग भैरवी के सुरों में- ‘धन्यभाग सेवा का अवसर पाया...’ जैसे आकर्षक गीत पण्डित राजन मिश्र की आवाज़ में थे। परन्तु इस फिल्म का जो गीत लेकर आज हम उपस्थित हुए हैं, वह राग भटियार के सुरों में पिरोया गीत- ‘आयो प्रभात सब मिल गाओ...’ है। इस गीत में पण्डित राजन मिश्र के साथ दक्षिण भारत की सुप्रसिद्ध गायिका एस. जानकी के स्वर भी शामिल हैं। गीतकार बसन्त देव का लिखा यह गीत संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने सितारखानी ताल में निबद्ध किया है। इस गीत के अन्य पक्ष पर चर्चा जारी रहेगी, आइए पहले यह गीत सुनते हैं।


राग भटियार : ‘आयो प्रभात सब मिल गाओ...’ : पण्डित राजन मिश्र  और एस. जानकी : फिल्म - सुर संगम : संगीत - लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल : गीत - बसन्त देव



आरोही नी अल्प ले, मध्यम दोऊ सम्हार,
रे कोमल, संवाद म स, क़हत राग भटियार।

अर्थात, इस राग में कोमल ऋषभ और दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। आरोह में निषाद स्वर का अल्प प्रयोग किया जाता है। यह मारवा थाट का सम्पूर्ण जाति का राग है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। यह रात्रि के अन्तिम प्रहर विशेष रूप से सन्धिप्रकाश काल में गाया-बजाया जाने वाला राग है। अवरोह के स्वर वक्रगति से लिये जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि यह पाँचवीं शताब्दी के राजा भर्तृहरि की राग रचना है। उत्तरांग प्रधान यह राग भंखार के काफी निकट होता है। राग भंखार में पंचम स्वर प ठहराव दिया जाता है, जबकि राग भटियार में शुद्ध मध्यम पर। यह राग गम्भीर, दार्शनिक भाव और जीवन के उल्लास की अभिव्यक्ति देने में पूर्ण समर्थ है। फिल्म ‘सुर संगम’ का यह गीत इन्हीं भावों की अभिव्यक्ति करता है। राग भटियार का एक शास्त्रोक्त और प्रयोगधर्मी स्वरूप का अनुभव कराने के लिए अब हम आपको पण्डित कुमार गन्धर्व की आवाज़ में इसी राग में एक खयाल रचना भी सुनवाएँगे।

पण्डित कुमार गन्धर्व 
पण्डित कुमार गन्धर्व भारतीय संगीत की एक नई प्रवृत्ति और नई प्रक्रिया के पहले कलासाधक थे। घरानों की पारम्परिक गायकी की अनेक शताब्दी पुरानी जो प्रथा थी उसमें संगीत तो जीवित रहता था, किन्तु संगीतकार के व्यक्तित्व और प्रतिभा का विसर्जन हो जाता था। कुमार गन्धर्व ने पारम्परिक संगीत के कठोर अनुशासन के अन्तर्गत ही कलासाधक की सम्भावना को स्थापित किया। 8 अप्रैल 1924 को बेलगाम, कर्नाटक के पास सुलेभवी नामक स्थान में एक संगीत प्रेमी परिवार में उनका जन्म हुआ था। माता-पिता ने नाम तो रखा था शिवपुत्र सिद्धरामय्या कोमकलीमठ, किन्तु आगे चल कर संगीत जगत में उन्हें कुमार गन्धर्व के नाम से प्रसिद्धि मिली। जिन दिनों कुमार गन्धर्व ने संगीत जगत में पदार्पण किया, उन दिनों भारतीय संगीत दरबारी जड़ता से प्रभावित था। कुमार गन्धर्व, पूर्णनिष्ठा और स्वर संवेदना के साथ एकाकी ही सक्रिय हुए। उन्होने अपनी एक निजी गायन शैली विकसित की जो हमें भक्तिपदों के आत्मविस्मरणकारी गायकी का स्मरण कराती है। वे मात्र एक साधक ही नहीं अन्वेषक भी थे। उनकी अन्वेषण प्रतिभा ही उन्हें भारतीय संगीत का कबीर बनाती है। उनका संगीत इसलिए भी रेखांकित किया जाएगा कि वह लोकोन्मुख रहा है। आइए, अब हम आपको पण्डित कुमार गन्धर्व के स्वर में राग भटियार, तीनताल में निबद्ध एक खयाल सुनवाते हैं। आप इस कृति का रसास्वादन कीजिए और इसी के साथ आज के इस अंक से विराम लेने की हमें अनुमति दीजिए।


राग भटियार : ‘दिन गए बीत दुःख के...’ : पण्डित कुमार गन्धर्व : तीनताल





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 199वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। फिल्म के इस गीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं।वर्ष 2014 की 200वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर बताइए कि आपको इसमें किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – यह रचना किस गायिका की आवाज़ में है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 27 दिसम्बर, 2014 को मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 201वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 197वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1960 में प्रदर्शित बाँग्ला फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ के एक राग आधारित गीत अथवा खयाल का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग बागेश्री और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल मध्य लय तीनताल। इस बार की पहेली में पूछे गए दोनों प्रश्नो के सही उत्तर पूर्व की भाँति जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हम भारतीय शास्त्रीय संगीत के विद्वानों द्वारा फिल्मों के लिए गाये गए गीतों पर चर्चा कर रहे हैं। अब हम इस लघु श्रृंखला के समापन की ओर बढ़ रहे हैं। वर्ष 2015 से ‘स्वरगोष्ठी’ की श्रृंखलाओं के बारे में हमे अनेक पाठकों और श्रोताओ के बहुमूल्य सुझाव प्राप्त हो रहे हैं। इन सभी सुझाव पर विचार-विमर्श कर हम नये वर्ष से अपनी प्रस्तुतियों में आवश्यक संशोधन करने जा रहे हैं। यदि आपने अभी तक अपने सुझाव और फरमाइश नहीं भेजी हैं तो आविलम्ब हमें भेज दें। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Wednesday, February 19, 2014

फिल्म 'सौ साल बाद' का रागमाला गीत







प्लेबैक इण्डिया ब्रोडकास्ट




रागो के रंग, रागमाला गीत के संग – 6




राग भटियार, आभोगी, मेघ मल्हार और बसन्त बहार में पिरोया गया रागमाला गीत


‘एक ऋतु आए एक ऋतु जाए...’



फिल्म : सौ साल बाद (1966)
गायक : लता मंगेशकर और मन्ना डे
गीतकार : आनन्द बक्शी
संगीतकार : लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल
आलेख : कृष्णमोहन मिश्र

स्वर एवं प्रस्तुति : संज्ञा टण्डन





 
आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी? अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव से हमें radioplaybackindia@live.com पर अवश्य अवगत कराएँ। 

Sunday, May 12, 2013

चार रागों का मेल हैं इस रागमाला गीत में


स्वरगोष्ठी – 120 में आज

रागों के रंग रागमाला गीत के संग – 6

‘एक ऋतु आए एक ऋतु जाए...’



संगीत-प्रेमियों की साप्ताहिक महफिल ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नये अंक का साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र पुनः उपस्थित हूँ। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी है लघु श्रृंखला ‘रागों के रंग रागमाला गीत के संग’। आज हम आपके लिए जो रागमाला गीत प्रस्तुत कर रहे हैं, उसे हमने 1966 में प्रदर्शित फिल्म ‘सौ साल बाद’ से लिया है। इस गीत में चार रागों- भटियार, आभोगी कान्हड़ा, मेघ मल्हार और बसन्त बहार का प्रयोग हुआ है। गीत के चार अन्तरे हैं और इन अन्तरों में क्रमशः स्वतंत्र रूप से इन्हीं रागों का प्रयोग किया गया है। इसके गीतकार आनन्द बक्शी और संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल हैं।


स श्रृंखला के पिछले अंकों में आपने कुछ ऐसे रागमाला गीतों का आनन्द लिया था, जिनमें रागों का प्रयोग प्रहर के क्रम से था या ऋतुओं के क्रम से हुआ था। परन्तु आज के रागमाला गीत में रागों का क्रम प्रहर अथवा ऋतु के क्रम में नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि फिल्म ‘सौ साल बाद’ के इस रागमाला गीत में रागों का प्रयोग फिल्म के अलग-अलग प्रसंगों के अनुसार किया गया है। इस रागमाला गीत का संगीत-निर्देशन लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने किया था। यह फिल्म इस संगीतकार जोड़ी के प्रारम्भिक वर्षों की फिल्मों में से एक थी। 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘पारसमणि’ से संगीतकार के रूप में धमाकेदार शुरुआत करने वाले लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल सातवें, आठवें और नौवें दशक में शिखर पर थे। फिल्म ‘पारसमणि’ यद्यपि एक फेण्टेसी फिल्म थी, इसके बावजूद इसका हर गीत बेहद लोकप्रिय हुआ। दरअसल इस संगीतकार जोड़ी में कर्णप्रियता के साथ-साथ संगीत की वह दुर्लभ पकड़ थी, जो गीतों को न केवल गुणबत्ता की दृष्टि से बल्कि श्रोताओं की पसन्द को ध्यान में रख कर व्यावसायिक दृष्टि से भी लोकप्रिय और सफल बनाती है। इस संगीतकार जोड़ी को शुरुआती दौर में छोटे बैनर की धार्मिक और स्टंट फिल्में ही मिली। परन्तु इन फिल्मों में भी मधुर और लोकप्रिय संगीत देकर उस समय फिल्म संगीत पर अपना प्रभुत्व कायम कर लेने वाले संगीतकार शंकर-जयकिशन तक को चुनौती दे दी थी।

लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल अपने संगीत में लोक और रागदारी संगीत का कर्णप्रिय रूपान्तरण करने में दक्ष थे। 1966 में प्रदर्शित फिल्म ‘सौ साल बाद’ के कई गीतों में रागों का मोहक आधार था। यद्यपि व्यावसायिक दृष्टि से यह फिल्म बहुत अधिक सफल नहीं थी, परन्तु इसके गीत गुणबत्ता की दृष्टि से बेहद सफल हुए थे। इन्हीं गीतों में से एक रागमाला गीत भी था। इस गीत के चार अन्तरे, हैं जिसे मन्ना डे और लता मंगेशकर ने स्वर दिया है। गीत के आरम्भिक बोल हैं- ‘एक ऋतु आए एक ऋतु जाए...’। गीत के इस भाग में राग भटियार की छाया है। राग भटियार के गायन-वादन का समय दिन का पहला प्रहर अर्थात प्रातःकाल माना गया है। अगला अन्तरा- ‘जिया नाहीं लागे का करूँ...’, जिसे राग आभोगी का आधार दिया गया है। यह अन्तरा लता मंगेशकर की एकल आवाज़ में है। चूँकि यह रात्रि के दूसरे प्रहर का राग माना जाता है, इसलिए गीत के पहले दो रागों में प्रहर का क्रम भी नहीं है। गीत में प्रयुक्त अगले दो राग ऋतु प्रधान हैं और उनमें भी कोई सामंजस्य नहीं है। गीत के अगले अन्तरे के बोल हैं- ‘घिर आई कारी कारी बदरिया...’, जिसमें संगीतकार जोड़ी ने राग मेघ मल्हार के स्वरों का प्रयोग किया है। गीत का यह अंश मन्ना डे और लता मंगेशकर के युगल स्वरों में है। गीत का चौथा राग भी ऋतु प्रधान राग बसन्त बहार है। इस अन्तरे के बोल हैं- ‘खिल गईं कलियाँ नैना ढूँढे साजन की गलियाँ...’, जिसे दोनों गायक कलाकारों ने युगल स्वरों में प्रस्तुत किया है। इस रागमाला गीत में रागों का कोई सार्थक क्रम न होने के बावजूद पूरा गीत बेहद आकर्षक है। आप यह गीत सुनिए और आज के अंक को यहीं विराम देने के लिए हमे अनुमति दीजिए।


रागमाला गीत : फिल्म सौ साल बाद : ‘एक ऋतु आए एक ऋतु जाए...’ : लता मंगेशकर और मन्ना डे



आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 120वें अंक की पहेली में आज हम आपको पाँचवें दशक के आरम्भिक वर्षों में बनी एक फिल्म के राग आधारित एक गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। इस अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध किया गया है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 122वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से या swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 118वें अंक में हमने आपको 1981 में प्रदर्शित फिल्म ‘चश्मेबद्दूर’ से लिये गए रागमाला गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मालकौंस और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- द्रुत तीनताल। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर एकमात्र प्रतिभागी जबलपुर से क्षिति तिवारी ने ही दिया है। लखनऊ के प्रकाश गोविन्द का एक उत्तर ही सही हुआ, अतः उन्हें इस बार एक अंक मिलेगा। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज हमने लघु श्रृंखला ‘रागों के रंग रागमाला गीत के संग’ की छठी कड़ी प्रस्तुत की। इस श्रृंखला को अब हम यहीं विराम देते हैं। अगले अंक से हम एक नई श्रृंखला प्रस्तुत करेंगे। इसका शीर्षक है- ‘एक कालजयी गीत जिसने संगीतकार को अमर बना दिया’। अगले अंक में हम इस नई श्रृंखला के पहले अंक के साथ आपके बीच होंगे। रविवार को प्रातः 9-30 ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी। 

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Sunday, March 3, 2013

भोर की लाली का आह्वान करते आठवें प्रहर के राग


स्वरगोष्ठी – 110 में आज


राग और प्रहर – 8 / समापन कड़ी

‘देख वेख मन ललचाय...’ : सोहनी, भटियार, ललित और कलिंगड़ा रागों के रंग



आज एक बार फिर मैं कृष्णमोहन मिश्र ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ संगीत-प्रेमियों की इस गोष्ठी में उपस्थित हूँ। पिछली सात कड़ियों में हमने दिन और रात के सात प्रहरों में गाये-बजाये जाने वाले रागों पर चर्चा की है। आज इस श्रृंखला की समापन कड़ी है और इस कड़ी में हम आपसे आठवें प्रहर अर्थात रात्रि के चौथे प्रहर के कुछ रागों की चर्चा करेंगे। आठवाँ प्रहर रात्रि के लगभग तीन बजे से लेकर सूर्योदय की लाली फूटने तक की अवधि को माना जाता है। इस अवधि में प्रस्तुत किये जाने वाले रागों में उजाले का आह्वान, रात की कालिमा व्यतीत होने की कामना और कुछ अलसाए भावों की अभिव्यक्ति होती है। श्रृंखला की समापन कड़ी में आज हम आपसे राग सोहनी, भटियार, ललित और कलिंगड़ा की संक्षिप्त चर्चा करेंगे और इन रागों में कुछ चुनी हुई रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। 




ठवें प्रहर अर्थात रात्रि के अन्तिम प्रहर में गाये-बजाये जाने वाले रागों में आज सबसे पहले हम आपको राग सोहनी सुनवाएँगे और उसका संक्षिप्त परिचय भी प्रस्तुत करेंगे। राग सोहनी का नामोल्लेख कहीं-कहीं शोभिनी या शोभनी भी किया गया है। यह कर्नाटक संगीत के राग हंसनंदिनी के समतुल्य है। यह राग मारवा थाट के अन्तर्गत माना जाता है। औड़व-षाड़व जाति के इस राग के आरोह और अवरोह, दोनों में पंचम स्वर प्रयोग नहीं किया जाता। धैवत स्वर इस राग का वादी और गान्धार स्वर संवादी होता है। यद्यपि सोहनी रात्रि के अन्तिम प्रहर में खूब निखरता है, तथापि विद्वान रात्रि के तीसरे प्रहर में भी इसका गायन-वादन करते हैं। उत्तरांग प्रधान राग सोहनी चंचल प्रकृति का राग है, जिसके गायन-वादन से श्रृंगार का विरह भाव भलीभाँति सम्प्रेषित होता है। इस राग में ठुमरी और खयाल दोनों की प्रस्तुति का प्रचलन है। आज की गोष्ठी में हम आपको उस्ताद राशिद खान के स्वरों में राग सोहनी में निबद्ध, खयाल अंग की, श्रृंगार रस की चाशनी में पगी, द्रुत तीनताल की, एक रचना सुनवाते हैं।


राग सोहनी : ‘देख वेख मन ललचाय...’ : उस्ताद राशिद खाँ 


रात्रि के अन्तिम प्रहर में प्रस्तुत किये जाने वाले रागों में अब हम आपसे राग भटियार की चर्चा कर रहे हैं। उत्तर भारतीय संगीत के कई राग ऐसे हैं, जिनके बारे में यह माना जाता है कि इनकी उत्पत्ति लोकधुनों से हुई है। राग भटियार के बारे में ऐसा ही माना जाता है। एक दूसरी मान्यता के अनुसार पाँचवीं शताब्दी में उज्जैन के राजा भर्तृहरि ने इस राग का सृजन किया था। इस राग के स्वर-समूह ऐसे हैं कि इसे किसी एक थाट से सम्बद्ध करना कठिन है। कुछ विद्वान इसे विलावल थाट से कुछ इसे खमाज थाट का राग मानते हैं। विदुषी पद्मा तलवलकर के अनुसार इसे मारवा थाट से सम्बद्ध किया जा सकता है, जबकि सुप्रसिद्ध इसराज और मयूर वीणा वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र का मत है कि यह थाटविहीन राग है। राग भटियार में शुद्ध मध्यम का प्रयोग अधिकतर और तीव्र मध्यम का प्रयोग कभी-कभी किया जाता है। इस राग में कोमल ऋषभ और शेष सभी शुद्ध स्वरों का प्रयोग किया जाता है। अवरोह के स्वर वक्रगति से लगाए जाते हैं। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर निषाद होता है। उत्तरांग प्रधान इस राग को सुनते समय कहीं-कहीं राग माँड की झलक भी मिलती है। आइए, अब सुनते हैं, राग भटियार में एक छोटा खयाल- ‘पिया मिलन को जाऊँ सखी री...’। द्रुत तीनताल में यह रचना प्रस्तुत कर रहे है, विश्वविख्यात गायक पण्डित जसराज के शिष्य पण्डित संजीव अभ्यंकर। इस प्रस्तुति में हारमोनियम संगति प्रमोद मराठे ने और तबला संगति भरत कामत ने की है।


राग भटियार : ‘पिया मिलन को जाऊँ सखी री...’ ; पण्डित संजीव अभ्यंकर


आज ‘राग और प्रहर’ श्रृंखला की समापन कड़ी में हम आपके साथ आठवें प्रहर के कुछ रागों पर चर्चा कर रहे हैं। इस प्रहर का एक अत्यन्त लोकप्रिय राग है, ललित। पूर्वी थाट के अन्तर्गत माना जाने वाला यह राग षाड़व-षाड़व जाति का होता है। राग ललित में पंचम स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। गान्धार इस राग का प्रमुख स्वर होता है। आलाप और तान में शुद्ध मध्यम स्वर पर न्यास किया जाता है। राग का वादी स्वर शुद्ध मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। पंचम स्वर की अनुपस्थिति सूर्य के प्रकाश की अनुपस्थिति का भाव भलीभाँति स्पष्ट करता है। आइए, अब हम आपको राग ललित पर आधारित एक फिल्मी रचना सुनवाते हैं। 1959 में एक फिल्म ‘चाचा जिन्दाबाद’, प्रदर्शित हुई थी, जिसके संगीतकार मदनमोहन थे। उन्होने फिल्म का एक गीत- ‘प्रीतम दरस दिखाओ...’ राग ललित के स्वरों का आधार बना कर स्वरबद्ध किया था। तीनताल के ठेके पर यह गीत मन्ना डे और लता मंगेशकर ने गाया है। लीजिए, यह गीत आप भी सुनिए।


फिल्म चाचा जिन्दाबाद : ‘प्रीतम दरस दिखाओ...’ : राग ललित : मन्ना डे और लता मंगेशकर


‘राग और प्रहर’ श्रृंखला की आज की कड़ी के अन्त में अब हम आपसे राग कलिंगड़ा के विषय में थोड़ी चर्चा करेंगे। राग कलिंगड़ा, भैरव थाट के स्वरों के अनुकूल होता है। प्राचीन काल में इस राग का प्रयोग सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति के रूप में होता था, किन्तु वर्तमान में षाड़व-सम्पूर्ण जाति के रूप में प्रयोग किया जाता है। इस राग के आरोह में ऋषभ स्वर नहीं लगता। कोमल ऋषभ और कोमल धैवत स्वरॉ का आन्दोलन न करने से यह राग भैरव से भिन्न हो जाता है। शुद्ध गान्धार और शुद्ध निषाद पर न्यास, इस राग का प्रमुख गुण है। राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। सूर्योदय से ठीक पहले राग कलिंगड़ा, ठुमरी अंग में खूब निखरता है। इस राग के उदाहरणस्वरूप अब हम आपको एक ठुमरी ही सुनवाते हैं। पटियाला, कसूर गायकी के सिद्ध कलासाधक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के अनुज उस्ताद बरकत अली खाँ के स्वरों में राग कलिंगड़ा की यह ठुमरी प्रस्तुत है।


राग कलिंगड़ा : ठुमरी- ‘पिया मन मन्दिर में आन बसो...’ : उस्ताद बरकत अली खाँ 


आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 110वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के इस अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – यह गीत किस फिल्म से लिया गया है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 112वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से या swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 108वें अंक में हमने आपको 1955 में बनी फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ के राग आधारित शीर्षक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग अड़ाना और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक उस्ताद अमीर खाँ। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर बैंगलुरु के पंकज मुकेश, जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द और जबलपुर से क्षिति तिवारी ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ पर पिछले आठ अंकों की इस लघु श्रृंखला ‘राग और प्रहर’ के अन्तर्गत आपने दिन और रात के आठो प्रहरों में प्रस्तुत किए जाने वाले कुछ प्रमुख रागों का संक्षिप्त परिचय प्राप्त किया और इन रागों के उदाहरण भी सुने। आज के अंक में प्रस्तुत किये गए रागों के साथ ही हम इस लघु श्रृंखला को यहीं विराम देते हैं। अगले अंक के लिए हमने एक अनोखा विषय चुना है जिसका विषय है, ‘रागमाला’। आगामी अंक में हम आपके साथ होंगे। प्रत्येक रविवार को प्रातः साढ़े नौ बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ उपस्थित होते हैं। आप सब संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि इस सांगीतिक अनुष्ठान में आप भी हमारे सहभागी बनें। आपके सुझाव और सहयोग से हम इस स्तम्भ को और अधिक उपयोगी स्वरूप प्रदान कर सकते हैं। 

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

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