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Monday, May 6, 2013

'पाकीज़ा' गीतों में पाश्चात्य स्वरों के मेल भी और देसी मिटटी की महक भी


प्लेबैक वाणी -44 - संगीत समीक्षा - पाकीजा (जुबीन गर्ग)


जोहाट, आसाम से निकली इस बेमिसाल आवाज़ ने देश भर के संगीत प्रेमियों पर अपना जादू चलाया है. बेहद प्रतिभाशाली जुबीन गर्ग ढोल, गिटार, मेंडोलिन जैसे ढेरों साजों पर भी अपनी पकड़ रखते हैं. हिंदी फ़िल्मी गीतों के शौकीनों ने उन्हें सुना था फिल्म कांटे के दमदार जाने क्या होगा रामा रे में, मगर गैंगस्टर के या अली के बाद तो वो घर घर पहचाने जाने लगे थे. ये खुशी की बात है कि आज के दौर में जब सोलो एलबम्स के लिए बाजार में बहुत अधिक संभावनाएं नज़र नहीं आती, टाईम्स संगीत जैसी बड़ी कंपनी जुबीन की गैर फ़िल्मी एल्बम को ज़ारी करने का साहस करती है. संगीत प्रेमियों के लिए बाजारू चलन से हट कर कुछ सुनने की तड़प और जुबीन का आवाज़ की कशिश ही है ये जो इस तरह के प्रयोगों को ज़मीन देती है.


एल्बम का शीर्षक गीत बहुत ही जबरदस्त है, संगीत संयोजन कुछ हैरत करने वाला है. पर शब्द, धुन और जुबीन की आवाज़ का नशा गीत को एक अलग ही आसमाँ दे देता है. एक रोक्क् सोलिड गीत जो संगीत प्रेमियों जम कर रास आएगा. मीना कुमारी अभिनीत क्लास्सिक फिल्म पाकीज़ा जो कि जुबीन की सबसे पसंदीदा फिल्म भी है, वही इस गीत की प्रेरणा है   


अगला गीत न बीते न को सुनते हुए आप एक अलग ही दुनिया में पहुँच जाते हैं. शब्दों का खेल सुरीला है, गीत के थीम अनुरूप जुबीन की आवाज़ का समर्पण एकदम सटीक सुनाई देता है. यहाँ संगीत संयोजन भी अपेक्षानुरूप है.


मुझमें तू ही तू, मुझमें मैं नहीं....सुनने में एक प्रेम गीत बेशक लगता है पर वास्तव में ये एक सूफी रोक्क् गीत अधिक है जहाँ अंग्रेजी शब्दों का भी सुन्दर इस्तेमाल किया है जुबीन ने.


बाँसुरी की मधुर तान से उठता है काफूर. रिदम परफेक्ट है. काफूर शब्द का पहली बार किसी गीत के मुखड़े में इस तरह प्रयोग हुआ होगा. मधुरता, अपनापन, सादगी और बेफिक्री की लाजवाब लयकारी है ये गीत. अंतरे की धुन बेहद प्यारी सुनाई देती है..शब्द भी बढ़िया हैं, बस व्याकरण में कहीं कहीं हल्की कमी महसूस होती है.


असामी लोक संगीत की झलक यूँ तो लगभग हर गीत में ही है, कहकशा में इसका मिलन है अरेबिक रिदम के साथ. एक सुन्दर तजुर्बा, एक बार फिर जुबीन यहाँ या अली वाले फ्लेवर में मिलेगें श्रोताओं से.


अगला गीत पिया मोरे कुछ दर्द भरा है, जुबीन की आवाज़ में दर्द की एक टीस यूँ भी महसूस की जा सकती है. धुन बेहद डूबो देने वाली है, और संयोजन में गजब की विविधता भरी है, एक एक स्वर एक नई अनुभूति है. एक और सुरीला गीत.


पाश्चात्य ताल पर भी जुबीन के गीतों में मिटटी की मदभरी महक है. और अगले गीत चलते चलो रे एक क्लास्सिक मांझी गीत जैसा लगता है. जीवन को एक नई दृष्टि से सराबोर करते शब्द गीत की जान हैं.


अंतिम गीत रामा रामा एक मुक्तलिफ़ फ्लेवर का गीत है. ये गायक के सामाजिक दायित्व का निर्वाह भी करता है. देश में इन दिनों जो हालात हैं उस पर एक तीखी टिपण्णी है ये गीत जो हमारी दोहरी मानसिकता की पोल खोल के रख देता है. जुबीन के ये स्वर नितांत ही अनसुना है. शब्द रचेता को विशेष बधाई.


एल्बम के इस ढलते दौर में जुबीन का ये एल्बम एक नई उम्मीद जगाता है. संगीत प्रेमियों को ये अनूठा प्रयोग यक़ीनन पसंद आना चाहिए. रेडियो प्लेबैक दे रहा है इसे ४.३ की रेटिंग. अवश्य सुनें.

संगीत समीक्षा
 - सजीव सारथी
आवाज़ - अमित तिवारी
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Monday, March 11, 2013

बंद कमरे की राजनीति में संगीत का तडका

प्लेबैक वाणी -36 - संगीत समीक्षा - साहेब बीबी और गैंगस्टर रिटर्न्स


तिग्मांशु धुलिया की सफल साहेब बीवी और गैंगस्टर में शयनकक्ष के भीतर का जिस्मानी खेल कैमरे की जद में था, और संगीत के नाम पर एक जुगनी का ही जोर था. खैर एक बार फिर तिग्मांशु लौटे है और वापसी हुई है गैंगस्टर की, नए संस्करण में गैंगस्टर बने हैं इरफ़ान. आजकल बॉलीवुड में पुरानी फिल्मों के रिमेक और ताज़ा हिट फिल्मों में द्रितीय तृतीय संस्करणों के अलावा शायद कुछ नही हो रहा है...खैर आज बात करते हैं साहेब बीबी और गैंगस्टर रिटर्न्स के संगीत के बारे में.

जहाँ पहले संस्करण में संगीतकारों की लंबी फ़ौज मौजूद थी नए संस्करण का पूरा जिम्मा बेहद प्रतिभाशाली संदीप चौठा ने उठाया है. शुद्ध हिंदी और कुछ संस्कृत शब्दों को जड़ कर रचा गया हैछल कपट गीत. जिसे गाया है पियूष मिश्रा ने. पियूष का ये  नाटकीय अंदाज़ एक अलग जोनर बनकर आजकल फिल्मों में छाया हुआ है. गुलाल और गैंग्स ऑफ वासेपुर की ही तरह यहाँ भी शब्दों की प्रमुखता अधिक है, धुन और संयोजन के मामले में कोई खास नयापन नहीं है. शब्द निश्चित ही अच्छे हैं और कपट और स्वार्थ की जटिलताओं को बेहद उत्कृष्ट रूप से उजागर करता है.

इधर गिरे एक क्लब नंबर है जो परिणीता के कैसी पहेली गीत की याद दिला देता है सोम्या रूह की आवाज़ में वो जरूरी तत्व हैं जो इस गीत को पर्याप्त सेंशुअल अंदाज़ प्रदान कर देता है, कौसर मुनीर के शब्द सटीक हैं. सेक्सोफोन का प्रयोग इस तरह के गीतों में लाजमी रहता है. पर गीत कुछ ऐसे नहीं है जो इसे अलग सी मकबूलियत प्रदान कर सके.

जुगनी का एक नया संस्करण यहाँ भी उपलब्ध है. जैजी बी की आवाज़ का जोश और तेज रिदम का कमाल कदम अवश्य थिरकाते हैं पर एक बार फिर संगीत प्रेमियों के लिए कुछ चौंकाने वाली बात यहाँ नहीं है.

एल्बम का सबसे बढ़िया गीत इसका आईटम गीत खुले आम कह दूं ही बनकर सामने आता है. परोमा दासगुप्ता की आवाज़ में लचीलापन है और उत्तेजना भी. संदीप नाथ के शब्द नए तेवर के साथ राजनीति और मीडिया के रिश्तों की पोल खोलते हैं, अंतरे खास तौर पे देसी अंदाज़ के चलते प्रभावित करते हैं.

देवीकी पंडित की आवाज़ में मखमली गज़लें सबने सुनीं होंगीं, एल्बम के अंतिम गीत में उनकी आवाज़ में गीत है कोना कोना दिल का. गीत की खासियत है इसका संयोजन जहाँ एक बीट स्किप कर स्वर के साथ जोड़ा गया है, ये प्रयोग ख़ासा लुभावना है, दूसरे अंतरे से पहले वेस्टर्न ओपरा का स्पर्श गीत को और भी खास बना देता है. ये गीत एक धीमे नशे की तरह है जिसे बार बार सुनकर भी आप को लुफ्त आएगा.

बहरहाल एल्बम में कुछ बहुत नया नहीं है संगीत प्रेमियों के लिए, और ऐसा भी कुछ नहीं जो आम श्रोता को आकर्षित कर सके. रेडियो प्लेबैक दे रहा एल्बम को ३.२ की रेटिंग.       

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Monday, February 11, 2013

एनी बडी कैन डांस - इसका संगीत है ही नाचने के लिए

प्लेबैक वाणी -33 -संगीत समीक्षा - ए बी सी डी - एनी बडी कैन डांस



विश्व सिनेमा में डांस म्युसिकल्स की पारंपरिक श्रृखलाएं रहीं हैं जो बेहद कामियाब भी साबित हुई है. भारत में इस ट्रेंड को बहुत अधिक परखा नहीं गया कभी. पर अब रेमो डीसूजा प्रभु देवा के साथ मिलकर अपने इस ख्वाब रुपी फिल्म को अमली जामा पहना चुके हैं, फिल्म थ्री डी में है इसमें देश के सबसे उन्दा डांसर्स दर्शकों को एक साथ नज़र आयेंगें. चलिए आज बात करते हैं इसी संगीतमय फिल्म के संगीत की, जिसे संवारा है सचिन जिगर ने.

शंकर महादेवन और विशाल दादलानी के स्वरों में शभु सुतया से बेहतर और क्या शुरुआत हो सकती थी एल्बम की. पारंपरिक ढोल रिदम के साथ ये नृत्य प्रार्थना कहीं कहीं शिव के नटराज रूप की भी झलक देती है. गीत के अंतिम हिस्से में शंकर अपने चिर परिचित अंदाज़ में श्रोताओं का दिल जीत ले जाते हैं.

बेजुबान एक नृत्य प्रेमी की भावनाओं को स्वर देता गीत है, जिसमें सफलता से दूर रहने की कुंठा और हर हाल में कामियाब होने की लगन दोनों बखूबी झलकते हैं. मोहित चौहान के साथ ढेरों अन्य गायक भी हैं पर मोहित की आवाज़ ही इस गीत की जान है. गीतकारा प्रीती पंचाल की भी आवाज़ है गीत में. एक शानदार ट्रेक जो लंबे समय तक श्रोताओं को याद रहेगा.

अगला गीत सायिको रे एक मस्त अंदाज़ का गीत है. दक्षिण भारतीय शहनाई के फ्लेवर में मिका के पंजाबी तडके का जबरदस्त कोकटेल है ये गीत. उदित नारायण बहुत दिनों बाद फॉर्म में सुनाई दिये हैं. बीच बीच में रैप और संवाद भी दिलचस्प हैं.

अनुष्का मनचंदा की आवाज़ में है मन बसियो संवारियो. गायिकी को छोड़ दिया जाए तो गीत कुछ खास प्रभावी नहीं है. शब्द भी सामान्य हैं.

गायकों की एक फ़ौज है अगले गीत चंदू की गर्लफ्रेंड में. ये गीत देखने में बढ़िया लग सकता है पर सुनने में कुछ खास असरदायक नहीं है. इस ढर्रे के बहुत से गीत बन चुके हैं और ये गीत विशेष कुछ खास पेश नहीं करता.

माधव कृष्णा की दमदार आवाज़ में अगला गीत दुहाई है बेहद जबरदस्त है, बेजुबान की ही तरह ये गीत भी एक कलाकार के सफर और सफलता की अंधी दौड में आती धूप छांव को सहेजता से रेखांकित करता है ये नगमा. शब्द और गायिकी में भी गीत अन्य गीतों पर भारी है, एल्बम का एक बहतरीन ट्रेक.

अपने बीट्स और तेज रिदम के कारण अगला गीत सॉरी सॉरी सुनने लायक बन गया है. शब्द दिलचस्प हैं और पंजाबी अंदाज़ का संगीत संयोजन गीत को लोकप्रिय बना सकता है.

सूरज जगन की आवाज़ है कर जा रे या मर जा रे में. शायद ये फिल्म का क्लाईमेक्स गीत है. बहुत ऊर्जा है गीत में. यक़ीनन ये गीत परदे पर बहुत रंग जामने वाला है. गा गा गा गणपति को हार्ड कोर ने एक सोलिड बेस दिया है. एक और धमाकेदार गीत. कुल १० गीतों से सजी इस संगीतमय एल्बम को रेडियो प्लेबैक दे रहा है ४.१ की रेटिंग.                   

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Monday, October 29, 2012

पैप्पी और कदम थिरकाता 'अजब गजब लव'


प्लेबैक वाणी - संगीत समीक्षा - अजब गजब लव 

निर्माता वाशु भगनानी के बेटे जैकी भगनानी नए जोश खरोश के साथ लौटे रहे हैं तेलुगु हिट फिल्म के रिमेक के साथ. फिल्म का नाम है अजब गजब लव, अलबम में संगीत है साजिद वाजिद का, और गीतकारों में हैं प्रिया पांचाल, कौसर मुनीर, और सुखजीत थांडी. आईये नज़र डालें अल्बम में संकलित ४ गीतों पर.
अल्बम की शुरुआत बहुत ही धमाकेदार तरीके से होती है. जबरदस्त रिदम के साथ उठता है गीतबूम बूम बूम. मिका सिंह की दमदार आवाज़ खूब जमती है गीत पर. बीट्स थिरकने पर मजबूर करने वाले हैं. प्रिया के शब्द गीत के अनुरूप ही हैं. निश्चित ही एक चार्ट बस्टर साबित होगा ये गीत.

पहले गीत में ही बढ़िया माहौल बनाने के बाद साजिद वाजिद अपने चिर परिचित रोमांटिक टोन में लौटते हैं गीत तू के साथ. मोहित चौहान की आवाज़ का पीछा करती  वोइलेन की स्वर लहरियाँ बहुत सुहाती है, धुन और आवाज़ की मधुरता के मुकाबले में शब्दों का चुनाव और बेहतर हो सकता था.

गिटार के सुरीले सुरों के खुलता है गीत सुन सोणिये, जिसे इरफ़ान और अंतरा मित्रा ने बहुत खूबसूरती से निभाया है. रियलिटी शो से निकली अंतरा को अब कुछ अच्छे गीत मिलने लगे हैं. कौसर मुनीर के शब्द अच्छे हैं. ऐसे गीत आप लंबी ड्राईव पर चलते हुए अपनी गाडी में आराम से सुन सकते हैं. बहुत बढ़िया साजिद वाजिद.

दविंदर सिंह की आवाज़ में नाच्दे पंजाबी एक सामान्य ढोल बीट का गाना है. अल्बम का शायद सबसे कमजोर गीत. कुल मिलाकर अजब गजब लव में कम गीत हैं मगर दिलचस्प हैं...रेडियो प्लेबैक दे रहा है अल्बम को ३.४ की रेटिंग.

एक सवाल  जैकी बगनानी अब तक कितनी फिल्मों में दिख चुके हैं, बताएँ अपनी टिप्पणियों में हमें....

Monday, October 22, 2012

जवां रिदम पर पुरानी तान छेड़ता स्टूडेंट ऑफ द ईअर का संगीत


प्लेबैक वाणी 

एक अरसे के बाद निर्देशन में उतरे हैं करण जौहर, और उनकी नयी फिल्म में न शाहरुख, न हृतिक, न काजोल, न रानी मुखर्जी. यानी बड़े सितारों से अलग उन्होंने चुने हैं एकदम नए नौजवान सितारे, अब देखना है कि इन नए घोड़ों के कन्धों पर करण एक और बड़ी हिट दे पायेंगें या नहीं. उनकी फिल्मों की सफलता का एक बड़ा श्रेय संगीत का रहा है. अब तक की उनकी हर फिल्म संगीत के लिहाज से जबरदस्त रही है. आईये देखें स्टूडेंट ऑफ द ईयर के संगीत का हाल, हमारी आज की चर्चा में.

अल्बम में संगीत है विशाल शेखर का और गीत लिखें हैं अन्विता दस गुप्तन ने. अल्बम की शुरुआत होती है ८० के दशक के यादगार हिट डिस्को दीवाने के रीमिक्स से. जैसे कि हमारे श्रोता वाकिफ होंगें कि किस तरह नाजिया हसन का ये लाजवाब डिस्को गीत एक दौर में हर जवां दिल की धडकन हुआ करता था. नाज़िया हसन के सफर का जिक्र हम अपनी सिरीस अधूरी रही जिनकी कहानियाँ में कर चुके हैं. किसी पुराने गीत को नए दौर के लिए कैसे फिर से जिंदा किया जा सकता है ये कोई विशाल शेखर से सीखे. डिस्को दीवाने का ये संस्करण बेहद ऊर्जात्मक है मगर फिर भी इसमें ८० के उस पुराने चार्म का स्वाद भी है. सुनिधि की आवाज़ नाज़िया की याद दिला देती है. बेनी ने उनका अच्छा साथ दिया है. डिस्को दीवाने कहे जाने के बाद वोइलन का वो रेवेर्स स्ट्रोक गजब लगता है. पुरानी यादों से सराबोर एक दमदार गीत जो दो पीढ़ियों को एक साथ जोड़ रहा है.

करण का मानना है कि बिना एक मेलोडियस रोमांटिक गीत के कोई भी अल्बम अधूरी ही रहती है. तो अगला गीत है इश्क वाला लव. मजरूह के लिखे पहला नशा गीत जैसी मासूमियत भरी है अन्विता ने इस गीत में. बेहद खूबसूरत शब्द और उसकी एक सरल मधुर धुन. युवा दिलों की धडकनें क्यों न धडकने लगे इसे सुनकर. शेखर, नीति और सलीम की आवाजों में इस मीठा मीठा सा गीत एक चितचोर है...

कुक्कड गीत शाहिद मल्लया की आवाज़ में है, जिन्होंने मौसम का खूबसूरत रोमांटिक गीत गाया था, ये गीत पारंपरिक पंजाबी गीतों जैसी ही है. कुछ नयापन इसमें नहीं है, पर छेड़ छाड से भरा होने के कारण अल्बम के बाकी गीतों से कुछ अलग अवश्य है.

अगला गीत राधा अल्बम के सबसे बेहतर गीतों में से एक है, राधा कृष्ण की रासलीला का एक नया ही अंदाज़ है यहाँ. बस डर इस बात का है कि कहीं धर्म के ठेकेदार राधा और कृष्ण के इस रूपांतरण को स्वीकार न कर पाए तो दिक्कत पेश आ सकती है. श्रेया की मस्त आवाज़ के साथ यहाँ है विशाल और शेखर भी, तो बहुत दिनों बाद सुरीली बयार लेकर आते हैं उदित नारायण भी. एक खिलखिलाता गीत जो हर उम्र के श्रोताओं को लुभा सकता है.

वेले गीत में विशाल और शेखर न सिर्फ संगीतकार है बल्कि मायिक के पीछे भी उन्हीं के स्वर हैं. एक और हिप हॉप और कदम थिरकाने वाला गीत, जो युवाओं को खास पसंद आएगा.

तो कुल मिलाकर करण अपनी तमाम पुरानी फिल्मों की तरह यहाँ भी संगीत के मामले में अव्वल साबित हुए हैं. फिल्म का संगीत विविधताओं से भरा है, और यहाँ सुरों के बेहद मुक्तलिफ़ रंग बिखरे हैं, युवाओं को लक्षित कर रचे इन गीतों में सुरीलापन भी है और आज के दौर की रिदमिक झनकार भी. रेडियो प्लेबैक दे रहा है इस अल्बम को ४.१ की रेटिंग



एक सवाल : क्या आप जानते हैं कि मूल डिस्को दीवाने में नाज़िया के साथ कौन गायक थे और वो नाजिया से किस तरह सम्बंधित थे ? बताईये टिप्पणियों के माध्यम से 

Monday, October 15, 2012

प्लेबैक इंडिया वाणी (२०) आइय्या , और आपकी बात-- बोल्ड थीम के अनुरूप ही बोल्ड है "आइय्या" का संगीत


संगीत समीक्षा -  आइय्या

दोस्तों पिछले सप्ताह हमने बात की थी अमित त्रिवेदी के “इंग्लिश विन्गलिश” की और हमने अमित को आज का पंचम कहा था. अमित दरअसल वो कर सकते हैं जो एक श्रोता के लिहाज से शायद हम उनसे उम्मीद भी न करें. उन्होंने हमें कई बार चौंकाया है. लीजिए तैयार हो जाईये एक बार फिर हैरान होने के लिए.

जी हाँ आज हम चर्चा कर रहे उनकी एक और नयी फिल्म “आइय्या” का, जिसमें वो लौटे हैं अपने प्रिय गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य के साथ. मुझे लगता है कि अमिताभ भी अमित के साथ जब मिलते हैं तो अपने श्रेष्ठ दे पाते हैं. आईये जानें की क्या है आइय्या के संगीत में आपके लिए.

हाँ वैधानिक चेतावनी एक जरूरी है. दोस्तों ये संगीत ऐसा नहीं है कि आप पूरे परिवार के साथ बैठ कर सुन सकें. हाँ मगर अकेले में आप इसका भरपूर आनंद ले सकते हैं. वैसे बताना हमारा फ़र्ज़ था बाकी आप बेहतर जानते हैं.

खैर बढते हैं अल्बम के पहले गीत की तरफ. ८० के डिस्को साउंड के साथ शुरू होता है “ड्रीमम वेकपम” गीत, जो जल्दी ही दक्षिण के रिदम में ढल जाता है. पारंपरिक नागास्वरम और मृदंग मिलकर एक पूरा माहौल ही रच डालते हैं. ये गीत आपको हँसता भी है गुदगुदाता भी है और कुछ श्रोता ऐसे भी होंगें जो इसे सुनकर सर पीट लेंगें. पर हमारी राय में तो ये गीत बहुत सुनियोजित तरीके से रचा गया है जिसका उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन है. शब्दों में जम कर जम्पिन्गम- पम्पिन्गम किया है अमिताभ ने. गायिका सौम्या राव की आवाज़ और अदायगी जबरदस्त है. यकीनन तारीफ के लायक. शरारती शब्द, जबरदस्ती गायकी और उत्कृष्ट संगीत संयोजन इस गीत को तमाम अटकलों के बावजूद एक खास पहचान देते हैं.

अगला गीत सवा डॉलर कुछ हद तक शालीन है, इसे आप अपने बच्चों के साथ बैठकर भी सुन सकते हैं...पर देखा जाए तो ये अल्बम का सबसे “आम” गीत लगता है, सरल लावनी धुन पर थिरकती सुनिधि की आवाज़. “ड्रीमम वेक्पम” के अनूठे अंदाज़ के बाद ये अच्छा और साफ़ सुथरा गीत कुछ कमजोर सा लगता है.

अगले ही गीत से अमित – अमिताभ की ये जोड़ी पूरे जोश खरोश के साथ अपने शरारतों में लौट आते हैं. ये फिल्म का शीर्षक गीत है. फिर एक बार चेता दें बच्चों से दूर रखें इस गीत को....मगर दोस्तों क्या जबरदस्त संयोजन है अमित त्रिवेदी का. एक एक पीस सुनने लायक है. “अगा बाई” गीत में न सिर्फ अमिताभ के शब्द चौंकते हैं, श्यामली खोलगडे और मोनाली ठाकुर की आवाजों में गजब की ऊर्जा और उत्तेजना है जो अश्लील नहीं लगती कहीं भी. निश्चित ही ये गायिकाएं श्रेया और सुनिधि को जबरदस्त टकर देने वाली हैं. अगा बाई एक मस्त मस्त गीत है...एकदम लाजवाब.

अगला गीत “महक भी” में अमित लाये शहनाई के स्वर. गीत शुरू होने से पहले ही अपने सुन्दर वाध्य संरचना से आपको खुद से बाँध लेते हैं. श्रेया की मखमली आवाज़ और पार्श्व में बजती शहनाई...वाह एक बेहद खूबसूरत गीत, मधुर और सुरीला.

 अब देखिये, फिर एक बार सुरीली फुहार के बाद लौटते हैं अमित और अमिताभ अपने शरारत भरी एक और रचना लेकर. यक़ीनन इसे सुनकर आप हँसते हँसते पेट पकड़ लेंगें. इस गीत में कुछ अश्लील सी कोमेडी है, स्नेह कंवलकर और खुद अमिताभ भट्टाचार्य ने बेहद चुटीले अंदाज़ में निभाया है इस गीत को. अब आप को लिज्जत पापड़ के विज्ञापन को देखकर हँसी आये तो इल्जाम दीजियेगा इस गीत को. और क्या कहें.... 

“वाकडा” अलबम का अंतिम गीत है जो दक्षिण के दुल्हे और महाराष्ट्रीयन दुल्हन के मेल के आंकड़े का वाकडा समझा रहा है. गीत सामान्य है मगर शब्द सुनने को प्रेरित करते हैं अमिताभ के. कुल मिलकर “आइय्या” का संगीत बेहद अलग किस्म का है. या तो आप इसे बेहद पसदं करेंगें या बिल्कुल नहीं.

रेडियो प्लेबैक इंडिया इसे इसके नयेपन के लिए दे रहा है ४.३ की रेटिंग.


एक सवाल - गीत "व्हाट टू डू" की थीम पर कुछ वर्षों पहले एक और गीत आया था, वो भी काफी हिलेरियस था, रितेश देखमुख पर फिल्माया वो गीत कौन सा था याद है आपको ? बताईये हमें अपनी टिप्पणियों में 

और अंत में आपकी बात- अमित तिवारी के साथ

Monday, October 1, 2012

प्लेबैक इंडिया वाणी (१८) ओह माई गॉड, और आपकी बात

संगीत समीक्षा  ओह माई गॉड




प्रेरणा बॉलीवुड का सबसे लोकप्रिय शब्द है...कोई अंग्रेजी फिल्मों से प्रेरित होता है, कोई दक्षिण की फिल्मों की नक़ल घोल कर करोड़ों कमा लेता है. कभी कभार कोई निर्माता अभिनेता साहित्य या थियटर से भी प्रेरित हो जाता है. ऐसे ही एक मंचित नाटक का फ़िल्मी रूपांतरण है “ओह माई गोड”. फिल्म में संगीत है हिमेश रेशमिया का, जो सिर्फ “हिट” गीत देने में विश्वास रखते हैं, चाहे प्रेरणा कहीं से भी ली जाए. आईये देखें “ओह माई गोड” के संगीत के लिए उनकी प्रेरणा कहाँ से आई है. 

बरसों पहले कल्याण जी आनंद जी  का रचा “गोविदा आला रे” गीत पूरे महाराष्ट्र में जन्माष्टमी के दौरान आयोजित होने वाले दही हांडी प्रतियोगिताओं के लिए एक सिग्नेचर धुन बन चुका था, हिमेश ने इसी धुन को बेहद सफाई से इस्तेमाल किया है “गो गो गोविंदा” गीत के लिए. इस साल जन्माष्टमी से कुछ दिन पहले ये गीत एक सिंगल की तरह श्रोताओं के बीच उतरा गया, और इसके लाजवाब नृत्य संयोजन ने इसे रातों रात एक हिट गीत में बदल दिया. इस साल लगभग सभी दही हांडी समारोहों में ये गीत जम कर बजा, और इस तरह फिल्म के प्रदर्शन से दो महीने पहले ही फिल्म को एक जबरदस्त हिट गीत मिला गया. इसमें निर्माता की समझ बूझ तो है ही, पर हिमेश के जबरदस्त संगीत संयोजन की भी तारीफ करनी पड़ेगी. पूरे गीत में उत्सव की धूम और उस माहौल को बखूबी उभरा है. मिका सिंह हमेशा की ही तरह जोशीले हैं यहाँ तो श्रेया भी अपनी उर्जात्मक आवाज़ में कुछ कम नहीं रही. ये गीत इस अल्बम का ही नहीं बल्कि शायद फिल्म की सफलता में भी कारगर सिद्ध होगा ऐसे पूरी उम्मीद है.

 अगला गीत “डोंट वरी (हे राम)” में पंचम के क्लास्सिक “दम मारो दम” की सिग्नेचर गिटार की धुन उठा ली गयी है. हो सकता है कि संगीतकार को अपनी धुन पर बहुत अधिक आत्मविश्वास न रहा हो, इसलिए ऐसा किया गया. गीत की धुन और शब्द सरंचना दोनों ही कमजोर हैं और हिमेश की आवाज़ गीत में बिल्कुल नहीं जमी है. “गो गो गोविंदा” की ऊर्जा के सामने एक बेहद कमतर गीत.

“मेरे निशाँ” कैलाश खेर की आवाज़ में है. यहाँ इश्वर धरती पर आकर यहाँ के लोगों में अपने निशाँ ढूंढ रहा है, जो नदारद है. थीम बहुत अच्छा है मगर एक बार फिर गीत कुछ असर नहीं छोड़ता. धुन में न कोई नयापन है न गायकी में कुछ अलग बात. गीत जरुरत से ज्यादा लंबा भी है और किसी अनूठी बात के अभाव में उबाऊ भी लगता है सुनते हुए...मेरे निशाँ गीत में एक शाब्दिक गलती भी है, "जज़्बात" स्वयं में बहुवचन है, ऐसे में "जज्बातों" शब्द का प्रयोग गलत है. 

“तू ही तू” गीत के कई संस्करण है अल्बम में और वो भी अलग अलग आवाजों में. वास्तव में ये एक भजन ही है जो शायद मोहमद इरफ़ान की आवाज़ में सबसे अच्छा लगा है. तेज रिदम के साथ “हरे रामा हरे कृष्णा” सुनना अच्छा लगता है...धुन मधुर है, और शब्बीर के शब्द भी ठीक ठाक हैं.

अल्बम में एक सुन्दर बांसुरी का वाध्य टुकड़ा भी है, जो बहुत मधुर है. जबकि अल्बम का अंतिम गीत “हरी बोल” भी प्रभावी गीत नहीं है. कुल मिलाकर हिमेश ने उत्सवी रगों से सजाने की कोशिश की है इस अलबम को लेकिन “गो गो गोविंदा’ को छोड़कर कोई भी अन्य गीत उनकी प्रतिभा और लोकप्रियता की कसौटी को छू नहीं पाता, रेडियो प्लेबैक इस अल्बम को दे रहा है २.३ की रेटिंग.    

और अंत में आपकी बात- अमित तिवारी के साथ

Saturday, June 16, 2012

प्लेबैक वाणी (3) -शंघाई, टोला और आपकी बात

संगीत समीक्षा - शंघाई



खोंसला का घोंसला हो या ओए लकी लकी ओए हो, दिबाकर की फिल्मों में संगीत हटकर अवश्य होता है. उनका अधिक रुझान लोक संगीत और कम लोकप्रिय देसिया गीतों को प्रमुख धारा में लाने का होता है. इस मामले में ओए लकी का संगीत शानदार था, तू राजा की राजदुलारी और जुगनी संगीत प्रेमियों के जेहन में हमेशा ताज़े रहेंगें जाहिर है उनकी नयी फिल्म शंघाई से भी श्रोताओं को उम्मीद अवश्य रहेगी. अल्बम की शुरुआत ही बेहद विवादस्पद मगर दिलचस्प गीत से होती है जिसे खुद दिबाकर ने लिखा है. भारत माता की जय एक सटायर है जिसमें भारत के आज के सन्दर्भों पर तीखी टिपण्णी की गयी है. सोने की चिड़िया कब और कैसे डेंगू मलेरिया में तब्दील हो गयी ये एक सवाल है जिसका जवाब कहीं न कहीं फिल्म की कहानी में छुपा हो सकता है, विशाल शेखर का संगीत और पार्श्व संयोजन काफी लाउड है जो टपोरी किस्म के डांस को सप्पोर्ट करती है. विशाल ददलानी ने मायिक के पीछे जम कर अपनी कुंठा निकाली है. अल्बम का दूसरा गीत एक आइटम नंबर है मगर जरा हटके. यहाँ इशारों इशारों में एक बार फिर व्यंगात्मक टिप्पणियाँ की गयी है, जिसे समझ कर भरपूर एन्जॉय किया जा सकता है.  इम्पोर्टेड कमरिया का नौटकी नुमा अंदाज़ श्रोताओं को रास आ सकता है. गीतकार कुमार ने अच्छे शब्द बुने हैं दुआ गीत के लिए वहीँ नंदनी श्रीकर की आवाज़ अच्छी जमी है भरे नैना गीत में. खुदाया अल्बम का सर्वश्रेष्ठ गीत प्रतीत होता है. इस सूफी अंदाज़ के गीत में श्रोताओं को काफी गहराई नज़र आएगी. मोर्चा गीत संभवता फिल्म के क्लाईमेक्स में आता होगा जहाँ, क्रांति का बिगुल है और अन्याय के खिलाफ उठ खड़े होने का जज्बा दिखाता रोष है, ये गीत अन्ना और उनकी टीम को निश्चित ही प्रेरित करेगा. भगवान विष्णु के १००० नामों की ध्वनि है मंत्र विष्णु सहस्र्नामम में, जिसको प्रमुख धारा की एक बॉलीवुड अल्बम में शामिल करना वाकई हिम्मत का काम है. विशाल शेखर यहाँ कहानी वाला जादू तो यहाँ नहीं रच पाए मगर निराश भी नहीं करते. कुल मिलाकर शंघाई के संगीत को रेडियो प्लेबैक की और से दी जा रही है २.८ की रेटिंग  


पुस्तक चर्चा - टोला




पिकरेस्क (picaresque) यानी कि स्लमडोग मिलेनियर सरीखी कहानियों का चलन हर भाषा के साहित्य में मिलता है. ऐसा ही एक उपन्यास है रमेश दत्त दुबे लिखित "टोला". यहाँ ये कहानी इस श्रेणी की अन्य कहानियों जैसे निराला की "बिल्लेसुर बकरिहा" और "कुल्लीभाट" या फिर केदारनाथ अग्रवाल की "पतिया" जैसे उपन्यासों से अलग इस मामले में भी है कि ये व्यक्ति केंद्रित न होकर समूह केंद्रित अधिक है. बकौल कांति कुमार जैन रमेश के टोले में रहने वाले वो लोग हैं जो समाज के सबसे निचले स्तर पर है या कहें कि हाशिए पर हैं, उनके होने न होने से किसी को कुछ फरक नहीं पड़ता, वो बीडी और अवैध शराब बनाते हैं, गर्भपात करवाते हैं, स्त्रियां जंगल से लकड़ी बीन कर लाने, देह व्यापार करने, लड़ने झगडने और पति की मार खाने के लिए ही जन्म लेती है यहाँ. बाढ़, सूखा और महामारी में कभी पूरा का पूरा टोला खतम हो जाता है मगर कुछ दिनों बाद फिर से बस भी जाता है. किसी बेहतर जीवन का न कोई वादा, न कोई यकीं, न कोई उम्मीद...मगर लेखक इन घुप्प अंधेरों में भी कहीं मानवीय संवेदना तलाश रहा है. दमयंती और मर्दन के प्रेम में जैसे कोई दबी हुई आस टिमटिमा रही है. लेखक ने अपने रियलिस्टिक अप्रोच से पाठकों को बाँध कर रखा है. पृथ्वी का टुकड़ा और गांव का कोई इतिहास नहीं होता जैसे काव्य संग्रह रचने वाले रमेश दत्त दुबे का ये उपन्यास अँधेरी गलियों में जिंदगी के सहर की तलाश है, जो कुछ अलग किस्म का साहित्य पढ़ने को इच्छुक पाठकों को पसंद आ सकती है. उपन्यास के प्रकाशक हैं राधाकृष्ण प्रकाशन और कुल १०७ पृष्ठों की इस उपन्यास की कीमत है १५० रूपए मात्र    


और अंत में आपकी बात, अमित और दीपा तिवारी के साथ

 

Wednesday, May 30, 2012

प्लेबैक इंडिया वाणी (1) -इश्क्जादे और बंद कमरा

संगीत समीक्षा 
अल्बम - इश्क्जादे 
संगीत - अमित त्रिवेदी






पुस्तक चर्चा 
पुस्तक - बंद कमरा 
मूल लेखिका - सरोजिनी साहू
अनुवाद - दिनेश माली 






आपकी बात - अमित तिवारी के साथ 




Saturday, March 17, 2012

"कहानी" में गूंथे मधुर गीत अन्विता दास और विशाल शेखर ने

रेडियो प्लेबैक की राय में कैसा है विध्या बालन अभिनीत "कहानी" का संगीत, सुनिए इस अल्बम रिव्यू में -

Tuesday, May 31, 2011

गुरूदेव की "नौका डूबी" को "कशमकश" में तब्दील करके लाए हैं संजॉय-राजा..शब्दों का साथ दिया है गुलज़ार ने

Taaza Sur Taal (TST) - 15/2011 - KASHMAKASH (NAUKA DOOBI)

कभी-कभार कुछ ऐसी फिल्में बन जाती हैं, कुछ ऐसे गीत तैयार हो जाते हैं, जिनके बारे में आप लिखना तो बहुत चाहते हैं, लेकिन अपने आप को इस लायक नहीं समझते कि थोड़ा भी विश्लेषण कर सकें। आपके मन में हमेशा यह डर समाया रहता है कि अपनी नासमझी की वज़ह से कहीं आप उन्हें कमतर न आंक जाएँ। फिर आप उन फिल्मों या गीतों पर शोध शुरू करते हैं और कोशिश करते हैं कि जितनी ज्यादा जानकारी जमा हो सके इकट्ठा कर लें, ताकि आपके पास कही गई बातों का समर्थन करने के लिए कुछ तो हो। इन मौकों पर अमूमन ऐसा भी होता है कि आपकी पसंद अगर सही मुकाम पर पहुँच न पा रही हो तो भी आप पसंद को एक जोड़ का धक्का देते हैं और नकारात्मक सोच-विचार को बाहर का रास्ता दिखा देते हैं। अंतत: या तो आप संतुष्ट होकर लौटते हैं या फिर एक खलिश-सी दिल में रह जाती है कि इस चीज़ को सही से समझ नहीं पाया।

आज की फिल्म भी कुछ वैसी है.. गुरूदेव रवींद्रनाथ टैगोर की लिखी कहानी "नौका डूबी" पर उसी नाम से बनाई गई बांग्ला फिल्म का हिंदी रूपांतरण है "कशमकश"। इस फिल्म के सभी गाने रवींद्र-संगीत पर आधारित हैं। फिल्म में ४ हिन्दी गाने हैं जिन्हें लिखा है गुलज़ार साहब ने और पाँचवां गाना एक सुप्रसिद्ध बांग्ला गाना है, जिसे अब तक कई सारे फ़नकार अपनी आवाज़ दे चुके हैं। फिल्म में संगीत दिया है संजॉय दास और राजा नारायण देब की जोड़ी ने। इन दोनों ने चिर-परिचित रवींद्र संगीत में अपनी कला का मिश्रण कर गानों को नए रूप में ढालने की यथा=संभव सफ़ल कोशिश की है। चलिए तो सीधे-सीधे गानों की ओर रुख करते हैं।

फिल्म का पहला गना है "मनवा भागे रे"। "सौ-सौ तागे रे".. ऐसी पंक्तियों को सुनकर हीं गुलज़ार साहब के होने का बोध हो जाता है। ऊपर से श्रेया घोषाल की सुमधुर आवाज़, जिसका कोई तोड़ नहीं है। पवन झा जी से मालूम हुआ है कि यह गाना रवींद्र संगीत के मूल गीत "खेलाघर बांधते लेगेची" पर आधारित है। वाद्य-संयोजन बेहतरीन है। बोल कैसे हैं.. आप खुद देख लें:

मनवा आगे भागे रे,
बाँधूं सौ-सौ तागे रे,
ख्वाबों से खेल रहा है,
सोए जागे रे..

दिन गया जैसे रूठा-रूठा,
शाम है अंजानी,
पुराने पल जी रहा है,
आँखें पानी-पानी..


दूसरा गाना है हरिहरण की आवाज़ में "खोया क्या जो पाया हीं नहीं।" आजतक लोग यही कहते आए हैं कि हाथों की लकीरों में किस्मत की कहानी गढी जाती है, लेकिन यहाँ पर गुलज़ार साहन निराशा का ऐसा माहौल गढते हैं कि अब तक की सारी दलीलों को नकार देते हैं। वे सीधे-सीधे इस बात का ऐलान करते हैं कि हथेलियों पर फ़क़त लकीरें हैं और कुछ नहीं, इन पर कुदरत की कोई कारीगरी नहीं। अपनी बात के समर्थन में वे भगवदगीता की उस पंक्ति का सहारा लेते हैं, जिसमें कहा गया है कि "तुमने क्या पाया था, जो तुमने खो दिया।" हरिहरण अपनी आवाज़ से इस दर्द को और भी ज्यादा अंदर तक ठेल जाते हैं और सीधे-सीधे दिल पर वार होता है। बखूबी तरीके से चुने गए वाद्यों की कारस्तानी इस दर्द को दूना कर देती है।

खोया क्या जो पाया हीं नहीं,
खाली हाथ की लकीरें हैं,
कल जो आयेगा, कल जो जा चुका..

बीता-बीता बीत चुका है,
फिर से पल-पल बीत रहा है..

तारे सारे रात-रात हैं,
दिन आए तो खाली अंबर,
आँख में सपना रह जाता है..


तीसरे गाने ("तेरी सीमाएँ") के साथ पधारती हैं श्रेया घोषाल। इनकी मीठी आवाज़ के बारे में जितना कहा जाए उतना कम होगा। ये जितने आराम से हँसी-खुशी वाले गीत गा लेती हैं, उतने हीं आराम से ग़म और दर्द के गीतों को निबाहती हैं। भले हीं संगीत कितना भी धीमा क्यों न हो, पता हीं नहीं चलता कि इन्हें किसी शब्द को खींचना पड़ रहा है। ऐसा हीं मज़ा लता दीदी के गीतों को सुनकर आया करता था (है)। अब जैसे इसी गीत को ले लीजिए - "मुक्ति को पाना है".. "मुक्ति" शब्द में अटकने की बड़ी संभावनाएँ थीं, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.. इसके लिए श्रेया घोषाल के साथ-साथ संगीतकारों की भी तारीफ़ करनी होगी। पहली मर्तबा मैंने जब इस गीत को सुना तो "मुक्ति" का इस्तेमाल मुझे कुछ अटपटा-सा लगा.. गुलज़ार साहब के नज़्मों में इस शब्द की कल्पना की जा सकती है, लेकिन गीत में? नहीं!! फिर मुझे ध्यान आया कि गुलज़ार साहब ने गुरूदेव के बांग्ला गीतों की तर्ज़ पर इस फिल्म के गीत लिखे हैं और बांग्ला गानों में ऐसे शब्द बहुतायत में नज़र आते हैं। यहाँ यह बात जाननी ज़रूरी है कि गुलज़ार साहब ने गीतों का अनुवाद नहीं किया, बल्कि वही माहौल बरकरार रखने की कोशिश की है।

तेरी सीमाएँ कोई नहीं हैं,
बहते जाना है, बहते जाना है..

तेरे होते दर्द नहीं था,
दिन का चेहरा ज़र्द नहीं था,
तुझसे रूठके मरते रहना है..

तुझको पाना, तुझको छूना,
मुक्ति का पाना है..


अब हम आ पहुँचे हैं चौथे गाने के पास, जो है "नाव मेरी"। एक बंगाली गायिका के बाद बारी है दूसरी बंगालन की यानि कि "मधुश्री" की। इनका साथ दिया है हरिहरण ने। इस गाने में गुलज़ार साहब अपनी दार्शनिक सोच के शीर्ष पर नज़र आते हैं। पहले तो वे कहते हैं कि सागरों में घाट नहीं होते, इसलिए तुम्हें बहते जाना है.. तुम्हारा ठहराव कहीं नहीं। और अंत होते-होते इस बात का खुलासा कर देते हैं कि तुम्हारे लिए किनारा किसी छोर पर नहीं, बल्कि तलछट में है.. तुम डूब जाओ तो शायद तुम्हें किनारा नसीब हो जाओ। इन पंक्तियों का बड़ा हीं गहरा अर्थ है। आप जब तक अपने आप को किसी रिश्ते की सतह पर रखते हैं और कोशिश करते हैं कि वह रिश्ता आपको अपना मान ले, तब तक आप भुलावे में जी रहे होते हैं। फिर या तो आपको एक रिश्ते से दूसरे रिश्ते की ओर बढना होता है या फिर ऐसे हीं किसी रिश्ते की सच्चाईयों में डूब जाना होता है। अगर आप डूब गए तो वह रिश्ता और आप एक हो चुके होते हैं, जिसे कोई जुदा नहीं कर सकता। इसलिए डूब जाने से हीं किनारा नसीब होगा ना कि किसी जगह सतह पर ठहरने से। संभव है कि गुलज़ार साहब ने कुछ और अर्थ सोचकर यह गाना लिखा हो (मैंने अभी तक फिल्म नहीं देखी, इसलिए यकीनन कह नहीं सकता), लेकिन मेरे हिसाब से यह अर्थ भी सटीक बैठता है।

नाव मेरी ठहरे जाने कहाँ!
घाट होते नहीं.. सागरों में कहीं..

दूर नहीं है कोई किनारा,
सागर जाती है हर धारा..

डूब के शायद इस नौका को,
मिल जाए किनारा..


इस फिल्म का अंतिम गाना है "आनंद-लोके मंगल-लोके", जिसे गाया है सुदेशना चटर्जी और साथियों ने। हिंदी रूपांतरण में बांग्ला गाने को यथारूप रखने से ज़ाहिर होता है कि निर्माता-निर्देशक ने गुरूदेव को श्रद्धांजलि अर्पित करने का प्रयास किया है। रवींद्र संगीत में आधुनिक वाद्य-यंत्रों का प्रयोग एक सफ़ल प्रयोग बन पड़ा है। भले हीं इसमें बांग्ला भाषा के शब्द हैं, लेकिन संगीत-संयोजन और गायिका की स्पष्ट आवाज़ के कारण गैर-बांग्लाभाषी भी इसे कम-से-कम एक बार सुन सकते हैं। मुझे जितनी बांग्ला आती है, उस हिसाब से यह कह सकता हूँ कि "सत्य-सुंदर" से गुहार लगाई जा रही है कि इस आनंद-लोक, इस मंगल-लोक में पधारें और स्नेह, प्रेम, दया और भक्ति का वरदान दें ताकि हम सबके प्राण कोमल हो सकें। आगे के बोल मुझे कुछ कठिन लगे, इसलिए न तो उन्हें यहाँ उपलब्ध करा पाया और ना हीं उनका अर्थ समझ/समझा पा रहा हूँ।

आनंद लोके मंगल लोके,
बिराजो सत्य-सुंदर..
स्नेह-प्रेम-दया-भक्ति,
कोमल करे प्राण..


तो ये थे "कशमकश" के पाँच गाने। आज के ढिंचाक जमाने में शांत और सरल गानों की कमी जिन किन्हीं को खल रही होगी, उनके लिए यह एलबम "टेलर-मेड" है। हिन्दी फिल्मों के ये दोनों संगीतकार नए हैं, लेकिन इनकी शुरूआत कमज़ोर नहीं कही जा सकती। इन दोनों के लिए तो यह सौभाग्य की बात है कि इन्हें रवींद्र संगीत पर काम करने का अवसर मिला और इनकी धुनों पर गुलज़ार साहब ने बोल लिखे। हाँ मुझे यहाँ गुलज़ार साहब से थोड़ी-सी शिकायत है। यूँ तो आप हर गाने में उपमाओं और "नई सोचों" की लड़ी लगा देते हैं और विरले हीं अपनी पंक्तियों को दुहराते हैं.. फिर ऐसा क्यों है कि "कशमकश" के गानों में "दुहराव-तिहराव" की भरमार है और हर गाने में एक या दो हीं नए ख़्याल हैं। यह मेरी नाराज़गी है अपने "आदर्श" से... आप लोग इस "बहकावे" में मत बहकिएगा। आप तो इन गानों का आनंद लें।

चलिए तो इस बातचीत को यहीं विराम देते हैं। आज की समीक्षा आपको कैसी लगी, ज़रूर बताईयेगा। अगले हफ़्ते फिर मुलाकात होगी। नमस्कार!

आवाज़ रेटिंग - 7.5/10

एक और बात: इस एलबम के सारे गाने आप यहाँ पर सुन सकते हैं।




अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Tuesday, May 24, 2011

लव यू मिस्टर कलाकार है सुरीले प्रेम गीतों से सजी अल्बम

Taaza Sur Taal (TST) - 14/2011 - Love U Mr Kalakaar

राजश्री प्रोडक्शन ने हमेशा ही साफ़ सुथरी संगीतमयी फिल्मों की परंपरा को निभाया है. पर मुझे लगता है कि वो अपनी फिल्मों के संगीत को सही रूप से प्रोमोट नहीं करते यही वजह है कि उनकी फिल्मों का संगीत अच्छा होने के बावजूद बहुत अधिक लोगों तक नहीं पहुँच पाता, हमेशा माउथ टू माउथ पब्लिसिटी काम नहीं करती है ये बात अब उन्हें समझनी चाहिए. तुषार कपूर और अमृता राव अभिनीत उनकी नयी फिल्म "लव यू मिस्टर कलाकार" एक और प्रेम कहानी है, जाहिर है संगीत में माधुर्य जरूरी है, संगीतकार के रूप में चुने गए हैं बेहद प्रतिभाशाली सन्देश शान्दलिया और गीत लिखे हैं नवोदित गीतकार मनोज मुन्तशिर ने. चलिए जरा सी चर्चा करें इस अल्बम में सजे गीतों की आज.

अंग्रेजी शब्दों क इस्तेमाल अब राजश्री वालों को भी रास आ रहा है. "सरफिरा सा है दिल" में श्रेया की अधुर आवाज़ है, खूबसूरत बोल हैं और मधुर धुन है सन्देश की, पर मैं समझ नहीं पाता हूँ, नीरज श्रीधर से ये गीत क्यों गवाया गया. आज जब इंडस्ट्री में इतने नए पुराने गायक मौजूद हैं संगीतकार नीरज से ऐसे गीत गवाते हैं जो उनका फोर्टे नहीं है ये अजीब लगता है. मुझे लगता है कि ये गीत और भी बढ़िया बन सकता था अगर सही गायक से इसे गवाया जाता.

विजय प्रकाश और गायत्री गांजावाला की आवाजों में अगला गीत "तेरा इंतज़ार", यहाँ भी एक बार फिर अंग्रेजी शब्दों से शुरुआत है. गाने का पेस बहुत बढ़िया है, विजय की आवाज़ में कशिश है, मनोज के शब्द परफेक्ट हैं. कुल मिलाकर एक खूबसूरत गीत है. गायत्री की आवाज़ दूसरे अंतरे से शुरू होती है जिसके बाद गीत और भी दिलचस्प हो जाता है. हमारी तरफ से पूरे अंक इस गीत को

"भूरे भूरे बादल, भीगा भीगा जंगल, नीला नीला पानी, शामें हैं सुहानी"....मुझे ये अगला गीत बेहद पसंद आया. श्रेया ने गायिकी में जो अदाएं उठायी है उसे मैच किया है बहुत अच्छे से कुणाल गांजावाला ने. बांसुरी की सुन्दर तानें पहाड़ों में वादियों में ले जाती है. एक बोन फायर में कैम्पिंग करते जोड़े की फीलिंग्स को बहुत अच्छे से मनोज ने अपने शब्दों से उभारा है और सन्देश ने जान फूंक दी है इस गीत में, अंत तक बांसुरी साथ चलती है और मन को मोहे रखती हैं.

शीर्षक गीत कुणाल और गायत्री की युगल आवाजों में है. कुणाल के स्वाभाविक अंदाज़ के अनुरूप है ये गीत. एक कलाकार जो अपने रंगों में दुनिया को रंगता है उसको समर्पित है ये गीत. अच्छा फिल्मांकन इस गीत को परदे पर बढ़िया बना देगा इसमें कोई शक नहीं. याद आया मुझे कि जीतेन्द्र ने एक मूर्तिकार की भूमिका की थी "गीत गया पत्थरों ने" में और अब एक तुषार पेंटर बने हैं इस सदी के. वेल वी टू लव ऑल अवर कलाकार.

अब बारी उस गायक की जिसकी आवाज़ का टिम्बर कहीं दूर ही उड़ा ले जाता है, जी हाँ मेरे पसंदीदा मोहित चौहान जिनके साथ है शिवांगी कश्यप (क्या शिवांगी, शिबानी कश्यप से सम्बंधित है, अगर आपको पता हो तो बताएं) जिनकी आवाज़ में ताजगी है. "वक्त ये रूठ के हाथ से छूट के जाने फिर आये न आये, कहीं से चली आ...", सबसे अच्छी बात है कि गीत सामान्य अंतरा मुखडा फोर्मेट में नहीं है. एक बहाव है जहाँ दोनों गायक आपको बहा ले जाते हैं. बहुत बढ़िया गीत है और हम दे रहे हैं एक और थम्प्स अप.

जेनिस सोबित और विन्नी हट्टन की आवाजों में एक अंग्रेजी गीत भी है "रीचिंग फॉर थे द रेनबो" और कुछ रीमिक्स भी हैं. कुल मिलाकर मुझे उम्मीद से अधिक मिला इस अल्बम से, संगीत के ऐसे दौर में जहाँ मेलोडी लगभग गायब सी हो चली है, फिल्म का संगीत एक ताज़ा झोंके जैसा है पर आपकी संगीत पिपासा को पूरी तरह से संतुष्ट कर पाता हो ऐसा भी नहीं है. इस दौर में लगता है कि एक झोंका नहीं आंधी चाहिए. बहरहाल सन्देश और मनोज मुन्तशिर की ये जोड़ी उम्मीद जगाती है. और आने वाले समय में हम इनसे और भी अच्छे संगीत प्रयासों की निश्चित ही उम्मीद रख सकते हैं.

श्रेष्ठ गीत – कहीं से चली आ, भूरे भूरे बादल, तेरा इन्तेज़ार
आवाज़ रेटिंग – ८/१०


और अब सुनिए इन गीतों को - सौजन्य रागा डॉट कॉम



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Friday, May 20, 2011

दबंग सलमान खान "रेड्डी" हैं प्रीतम के साथ एक और संगीत धमाके के लिए

Taaza Sur Taal (TST) - 13/2011 - REDDY

दोस्तों एक बार फिर से मैं हाज़िर हूँ एक और नयी फिल्म के संगीत पर अपनी राय लेकर. आज हम बात करेंगें "दबंग" सलमान खान की आने वाली फिल्म – रेड्डी की. टी सिर्रिस के भूषण कुमार ने इस फिल्म के लिए विश्वास जताया है अपने दोस्त प्रीतम पर. और जाहिर प्रीतम ने उन्हें निराश नहीं किया है एक बार फिर, बल्कि अपने पेट्ट गायकों को लेकर शायद इस साल की सबसे बड़ी हिट अल्बम देने में भी कामियाब हुए हैं. चलिए बात करते हैं इस अल्बम के गीतों की.

कैरक्टर ढीला अल्बम का पहला गीत है, नीरज श्रीधर और अमृता काक की आवाजों में. अभी हाल ही में अनु मालिक ने इस फूट टेप्पिंग गीत के अंतरे की धुन अपने एक पुराने गीत से मिलता जुलता बताया था. खैर वो ९० का दशक था अनु मालिक का और अब जब प्रीतम की तूती बोल रही हो तो अनु की आवाज़ कौन सुने. खैर गीत का फिल्माकन देख कर लगता है कि सलमान इस गीत के माध्यम से राज कपूर, दिलीप कुमार और धमेन्द्र को टारगेट कर रहे हैं. पर यही तीन कलाकार ही क्यों कोई समझे तो कृपया बताएं. अमिताभ भट्टाचार्य के शब्द कुछ बहत प्रभावी नहीं लगे मुझे पर संगीत बीट्स और संयोजन इतना जबरदस्त है कि आपके कदम खुद बा खुद थिरकने लगेंगें.

अगला गीत अल्बम का सबसे मधुर गीत है, के के और तुलसी कुमार की युगल आवाजों के इस गीत में गजब का सुकून है. एक ट्रेंड की तरह अंग्रेजी पंक्तियाँ का इस्तेमाल यहाँ भी है, जिसे शायद नीरज ने निभाया है. टिपिकल बोलीवुड रोमांटिक गीत है ये, जिसे मेलोडी के कद्रदान अवश्य पसंद करेंगें. अगला गीत "धिन का चिका" जबरदस्त है और जब से इसके प्रोमो छोटे परदे पर दिख रहे हैं इस गीत ने करेक्टर ढीला से भी अधिक लोकप्रियता हासिल कर ली है. और क्यों न हो, इतना जबरदस्त फिल्मांकन किसी भी गीत का बहुत दिनों बाद देखने को मिला है. पूरी तरह से भारतीय अंदाज़ के इस गीत में मिका ने जैसे जान डाल दी है. अमृता काक के लिए उनकी बराबरी करना मुश्किल तो था ही पर फिर भी उन्होंने अच्छा साथ दिया है. ९० के दशक की एक और फिल्म "ख़ामोशी द म्युसिकल" के एक गीत "बाजा" से प्रेरित है ये गीत पर इसमें इसकी अपनी ओरिजेनलिटी भी है और इसके मूल संगीतकार देवी श्री प्रसाद निश्चित ही इस गीत पर फक्र महसूस कर सकते हैं. वैसे मेरी बधाई गीत के कोरियोग्राफ़र को भी जिन्होंने इस गीत इतना शानदार फिल्मांकन दिया. यहाँ बोल लिखे हैं आशीष पंडित ने.

अल्बम का चौथा और अंतिम ओरिजिनल गीत एक पंजाबी शादी वाला है जिसमें राहत साहब की आवाज़ सुनियी देती है, साथ है तुलसी कुमार. गीत एक और टिपिकल बोलीवुड सरीखा पंजाबी गीत है जिसमें बेशक कुछ नयापन नहीं है पर एनर्जी खूब है. कुल मिलकर रेड्डी के संगीत में पकड़ है, मसाला है और एक हिट अल्बम होने के सभी गुण मौजूद हैं. ऊपर से सलमान का एक्स फेक्टर जो किसी भी फिल्म के लिए एक बूस्ट है, आपको याद होगा कि दबंग के गीत भी (मुन्नी के आलावा) फिल्म के प्रदर्शन के बाद अधिक लोकप्रिय हुए थे, और यहाँ भी अगर ऐसा हो तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

श्रेष्ठ गीत – "हमको प्यार हुआ", "धिनका चिका"
आवाज़ रेटिंग – ७.५/१०

फिल्म के गीत आप यहाँ सुन सकते हैं



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Monday, May 16, 2011

आ बदल डाले रस्में सभी इसी बात पे.....कुछ तो बात है अमित त्रिवेदी के "आई एम्" में

Taaza Sur Taal (TST) - 12/2011 - I AM

आज सोमवार की इस सुबह मुझे यानी सजीव सारथी को यहाँ देख कर हैरान न होईये, दरअसल कई कारणों से पिछले कुछ दिनों से हम ताज़ा सुर ताल नहीं पेश कर पाए और इस बीच बहुत सा संगीत ऐसा आ गया जिस पर चर्चा जरूरी थी, तो कुछ बैक लोग निकालने के इरादे से मैं आज यहाँ हूँ, आज हम बात करेंगें ओनिर की नयी फिल्म "आई ऍम" के संगीत की. दरअसल फिल्म संगीत में एक जबरदस्त बदलाव आया है. अब फिल्मों में अधिक वास्तविकता आ गयी है, तो संगीत का इस्तेमाल आम तौर पर पार्श्व संगीत के रूप में हो रहा है. यानी लिपसिंग अब लगभग खतम सी हो गयी है. और एक ट्रेंड चल पड़ा है रोक् शैली का. व्यक्तिगत तौर पर मुझे रोक् जेनर बेहद पसंद है पर अति सबकी बुरी है. खैर आई ऍम का संगीत भी यही उपरोक्त दोनों गुण मौजूद हैं.

पहला गाना "बांगुर", बेहद सुन्दर विचार, समाज के बदलते आयामों का चित्रण है, एक तुलनात्मक अध्ययन है बोलों में इस गीत के और इस कारुण अवस्था से बाहर आने की दुआ भी है. आवाजें है मामे खान और कविता सेठ की. अमित त्रिवेदी के चिर परिचित अंदाज़ का है गीत जिसे सुनते हुए भीड़ भाड भरे शहर उलझनों की जिन्दा तस्वीरें आँखों के आगे झूलने लगती हैं. मामे खान भी उभरते हुए गायक मोहन की तरह बेहद सशक्त है. इससे पहले आपने इन्हें "नो वन किल्ल्ड जसिका" के बेहद प्रभावशाली गीत "ऐतबार" में सुना था. पर यहाँ अंदाज़ अपेक्षाकृत बेहद माईल्ड है. कविता अपने फॉर्म में है, यक़ीनन गीत कई कई बार सुने जाने लायक है.

इसके बाद जो गीत है वो अल्बम का सबसे शानदार गीत है, पहले गीत की तमाम निराशाओं को दरकिनार कर एक नयी आशा का सन्देश है यहाँ. गीत के बोल उत्कृष्ट हैं, "बोझ बनके रहे सुबह क्यों किसी रात पे....", "जीत दम तोड़ दे न कभी किसी मात पे" जैसी पक्तियां स्वतः ही आपका ध्यान आकर्षित करेंगीं. आवाज़ है मेरे बेहद पसंदीदा गायक के के की. मैं अभी कुछ दिनों पहले ये फिल्म देखी थी, जिसके बाद ही मुझे इसके संगीत के चर्चा लायक होने का अहसास हुआ. एक और बार बार सुने जाने लायक गीत.

फिल्म में चार छोटी छोटी कहानियों को जोड़ा गया है. अगला गीत इसकी तीसरी कहानी पर है जहाँ नायक का बचपन में शारीरिक शोषण हुआ है और बड़े होने के बाद भी कैसे उन बुरे लम्हों को वो खुद से जुदा नहीं कर पा रहा है, इसी कशमकश का बयां है गीत "बोझिल से...". बेहद दर्द भरा गीत है, एक बार फिर शब्द शानदार हैं,..."बिना पूछे ढेर सारी यादें जब आती है.....ख़ाक सा धुवां सा रहता है इन आँखों में...." वाह. यहाँ संगीत है राजीव भल्ला का. आवाज़ निसंदेह के के की है, जिनकी आवाज में ऐसे गीत अक्सर एक मिसाल बन जाते हैं. यहाँ भी कोई अपवाद नहीं.

अगला गीत 'ऑंखें" शायद हिंदी फिल्म इतिहास का पहला गीत होगा जो एक प्रेम गीत है और जहाँ दोनों प्रेमी समलिंगी है. बस यही इस गीत की खूबी है पर इसके आलावा गीत में कोई नयापन नहीं है. विवेक फिलिप के संगीत में ये गीत अल्बम के बाकी गीतों से कुछ कमजोर ही है.

अमित त्रिवेदी वापस आते हैं एक और नए तजुर्बे के साथ. एक आज़ान से शुरू होता है ये गीत, क्योंकि फिल्म में इसका इस्तेमाल एक कश्मीरी पंडित परिवार के पलायन की दास्ताँ बयां करने के लिए होता है. "साये साये" जिस तरह से बोला गया है वही काफी है आपकी तव्वजो चुराने के लिए. देखिये ऊपर मैंने मोहन का नाम लिया और मोहन मौजूद है यहाँ, साथ में जबरदस्त फॉर्म में रेखा भारद्वाज. जन्नत से दूर होकर खोये हुए जन्नत का दर्द है बोलों में, कहीं कहीं अमित रहमान के "दिल से" वाले अंदाज़ को फोल्लो करते नज़र आते हैं जैसे जैसे गीत आगे बढ़ता है, मुझे यही बात खटकी इस गीत में वैसे गीत शानदार है पर जिन लोगों इस दर्द को जिया है केवल उन्हीं को ये लंबे समय तक याद रहेगा.

राजीव भल्ला का "येंदु वंडू मेरी समझ से बाहर, इसलिए इसका जिक्र छोड़ रहा हूँ, वैसे बांगुर, बोझिल और इसी बात पे जैसे गीत काफी हैं इस अल्बम के लिए आपके द्वारा चुकाई गयी कीमत की वसूली के लिए. वैसे कभी मौका लगे तो ये फिल्म भी देखिएगा, ओनिर एक बेहद सशक्त निर्देशक हैं और फिल्म में आज के दौर के परेल्लल सिनेमा के सभी कलाकार मौजूद हैं. मुझे लगता है जिस स्तर के संगीतकार हैं अमित त्रिवेदी उन्हें रोक् जेनर से कुछ अलग भी ट्राई करना चाहिए अपने संगीत में विवधता लाने के लिए.

श्रेष्ठ गीत – "इसी बात पे", "बांगुर", "साये साये", और "बोझिल"
आवाज़ रेटिंग – ७.५/१०

फिल्म के गीत आप यहाँ सुन सकते हैं



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Tuesday, February 8, 2011

पिया न रहे मन-बसिया..रंगरेज से दर्द-ए-दिल बयां कर रहे हैं "तनु वेड्स मनु" के संगीतकार कृष्णा ,गीतकार राजशेखर

Taaza Sur Taal (TST) - 05/2011 - TANU WEDS MANU

"तनु वेड्स मनु".. यह नाम सुनकर आपके मन में कोई भी उत्सुकता उतरती नहीं होगी, इसका मुझे पक्का यकीन है। मेरा भी यही हाल था। एक बेनाम-सी फिल्म, अजीबो-गरीब नाम और अजीबो-गरीब जोड़ी मुख्य-पात्रों की। "माधवन" और "कंगना".. मैं अपने सपने में भी इस जोड़ी की कल्पना नहीं कर सकता था..। लेकिन एक दिन अचानक इस फिल्म की कुछ झलकियाँ यू-ट्युब पर देखने को मिलीं. हल्की-सी उत्सुकता जागी और जैसे-जैसे दृश्य बढते गए, मैं इस "बेढब"-सी अजबनी दुनिया से जुड़ता चला गया। झलकियाँ का ओझल होना था और मैं यह जान चुका था कि यह फिल्म बिन देखे हीं नकार देने लायक नहीं है। कुछ तो अलग है इसमें और इन्हीं दृश्यों के बीच जब "कदी साडी गली पुल (भुल) के भी आया करो" के बीट्स ढोलक पर कूदने लगे तो जैसे मेरे कानों ने पायल बाँध लिये और ये दो नटखट उचकने लगे अपनी-अपनी जगहों पर। फिर तो मुझे समझ आ चुका था कि ऐंड़ी पर खड़े होकर मुझे इस फिल्म के गानों की बाट जोहनी होगी। फिर भी मन में एक संशय तो ज़रूर था कि "कदी साडी गली".. ये गाना तो पुराना है और जब एक पुराने गाने के सहारे फिल्म का प्रचार-प्रसार किया जा रहा है तो मुमकिन है कि "ओरिजनल गानों" में कोई दम न हो। लेकिन मैं दुआ कर रहा था कि मेरा शक़ गलत निकले और मेरी दुआ बहुत हद तक कामयाब हुई, इसकी मुझे बेहद खुशी है।

लेम्बर हुसैनपुरी के गाए "कदी साडी गली" में अजब का नशा है। ढोल के बजते हीं पाँव खुद-ब-खुद थिरकने लगते हैं। फिल्म में आने से पहले यह गाना जिस मुकाम पर था, आर०डी०बी० ने रीमिक्स करके उस मुकाम को कुछ और ऊपर कर दिया है। पंजाबी भांगड़ों की तो वैसे हीं धूम और धुन गजब की होती है, लेकिन कई मर्तबा एक तरह के हीं बीट्स इस्तेमाल होने के कारण मज़ा जाता रहता है। अच्छी बात यह है कि इस गाने में नयापन है। बस यही उम्मीद करता हूँ कि यह गाना फिल्म के कथानक को आगे बढाने में मदद करेगा और ठूंसा हुआ-सा नहीं दिखेगा।

फिल्म का पहला गाना हीं आर०डी०बी० का? लेकिन आर०डी०बी० तो बस एक हिप-हॉप या डांस-मस्ती गाने के लिए फिल्म में लाए जाते हैं यानि कि हर फिल्म में इनका बस एक हीं गाना होता है। "तब तो कोई न कोई दूसरा संगीतकार हीं इस फिल्म की नैया को अपने गानों के पतवार और चप्पु के सहारे पार लगाएगा और अगर गाने अच्छे करने हैं तो निर्देशक(आनंद एल राय) कोई जाने-माने संगीतकार को हीं यह बागडोर सौपेंगे ताकि बुरे गानों के कारण फिल्म की लुटिया न डूब जाए..." यही सोच रहे हैं ना आप? अमूमन हर किसी की यही सोच होती है। कोई भी नए संगीतकारों पर एकबारगी भरोसा नहीं कर पाता.. और अगर कोई फिल्म किसी निर्देशक की पहली फिल्म हो तब तो हर एक सुलझे इंसान की यही सलाह होती है कि भाई फिल्म में लगा पैसा निकालना हो तो रिस्क मत लो, सेफ़ खेलो और किसी नामी संगीतकार से गाने तैयार करवा लो ताकि फिल्म भले पिट जाए लेकिन गाने हिट हो जाएँ।

यहीं पर आपसे चूक हो गई। हाँ, लेकिन आनंद साहब ने कोई चूक नहीं की। इन्होंने न सिर्फ़ खुद कुछ नया करने का बीड़ा उठाया, बल्कि अपने साथ-साथ गीत और संगीत में भी नए मोहरे सजाकर पूरी की पूरी बाजी हीं रोमांचक कर दी। नया गीतकार, नया संगीतकार.. चलेंगे तो सब साथ, ढलेंगे तो सब साथ, लेकिन इस बात की तो खुशी होगी कि "फिल्म इंडस्ट्री" के दबाव के आगे झुकना नहीं पड़ा, जो दिल में आया वही किया। तो आईये हम सब स्वागत करते हैं संगीतकार "कृष्णा" (Krsna) एवं गीतकार "राजशेखर" का।

ये कृष्णा कौन हैं, ये राजशेखर पहले किधर थे, इन प्रश्नों का जवाब तो हम ढूँढ नहीं पाये, लेकिन इतना यकीन है कि इन दोनों की यह पहली हिन्दी-फिल्म है। और पहली हीं फिल्म में दोनों ने अपनी छाप छोड़ने की पूरी कोशिश की है।

चलिए तो इस जोड़ी के पहले गीत की बात करते हैं। "ओ रंगरेज मेरे"... इस गीत के बोल बड़े हीं खूबसूरत है। उर्दू और देसी शब्दों के इस्तेमाल से राजशेखर ने एक सूफ़ियाना माहौल तैयार किया है।

रंगरेज तूने अफ़ीम क्या है खा ली,
जो मुझसे तू है पूछे कि कौन-सा रंग?
रंगों का कारोबार है तेरा,
ये तू हीं तो जाने कि कौन-सा रंग?
मेरा बालम रंग, मेरा साजन रंग,
मेरा कातिक रंग, मेरा अगहन रंग,
मेरा फ़ागुन रंग, मेरा सावन रंग..

हद रंग दे, अनहद भी रंग दे,
मंदिर, मस्जिद, मयकद रंग..

आजा हर वसलत रंग दे,
जो आ न सके तो फ़ुरक़त रंग दे..

ऐ रंगरेज मेरे...
ये कौन-से पानी में तूने कौन-सा रंग घोला है?


"मेरे आठों पहर मनभावन रंग दे"- रंगरेज से ब़ड़ी हीं मीठी गुहार लगाई है हमारे आशिक़ ने। अब यहाँ पर रंगरेज खुदा है या फिर इश्क़ के पैरहन रंगने वाली प्रेमिका.. इसका खुलासा तो दिल की दराज़ें खोलकर हीं किया जा सकता है, लेकिन जो भी हो सबसे बड़ा रंगरेज तो खुदा हीं है और खुदा से इस तरह जुड़ने को हीं "निर्गुण" कहते हैं (हिन्दी फिल्मों में निर्गुण का सबसे बड़ा उदाहरण "लागा चुनरी में दाग" है)। जब आशिक़ यह कहता है कि "मेरा क़ातिल तू, मेरा मुंसिफ़ तू" तो चचा ग़ालिब का यह शेर याद आ जाता है:

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क, जीने और मरने का,
उसी को देखकर जीते हैं, जिस काफ़िर पर दम निकले!


इस रंगरेज के पास "कृष्णा" दो बार गए हैं एक बार अपनी हीं आवाज़ के साथ तो दूसरी बार "वडाली बंधुओं" की मंडली के साथ। यूँ तो वडाली बंधुओं (पुरनचंद वडाली एवं प्यारेलाल वडाली) पर खुदा की मेहर है (इसलिए इनकी आवाज़ों से सजी हुई हरेक नज़्म दिल को सुकून पहुँचाती है और यहाँ भी इन दोनों ने वही समां बाँधा है), लेकिन इस बार कृष्णा पर भी उस ऊपर वाले ने अपनी रहमत तारी कर दी है। दोनों हीं गाने अपनी जगह पर कमाल के बने हैं। धुन एक हीं है, इसलिए ज्यादा कुछ फ़र्क की उम्मीद भी नहीं थी। लेकिन जहाँ पर वडाली बंधु हों, वहाँ नयापन खुद-ब-खुद आ जाता है, इसलिए कृष्णा को यही कोशिश करनी थी कि वे पूरी तरह से कमजोर न पड़ जाएँ... ऐसा नहीं हुआ, यह सबके लिए अच्छी खबर है!

मोहित चौहान! यह नाम लिख देने/सुन लेने के बाद मन में किसी पहाड़ी वादी की परछाईयाँ उभर आती है और दिखने लगता है एक शख्स जो हाथ में गिटार और आँख में प्रेयसी के ख्वाब लिए पत्तों और गुंचों के बीच से चला जा जा रहा है। पहाड़ों का ठेठ अंदाज़ उसकी आवाज़ में खुलकर नज़र आता है और यही कारण है कि हर संगीतकार मोहित चौहान से "प्यार के दो मीठे बोल" गुनगुनाने की दरख्वास्त कर बैठता है। "कितने दफ़े दिल ने कहा, दिल की सुनी कितने दफ़े" (यूँ हीं).. बोल बड़े हीं सीधे और साधारण हैं, लेकिन मोहित की आवाज़ ने इस गाने में जान डाल दी है।

"पिया न रहे मन बसिया" - रूप कुमार राठौड़ साहब को मैने पहले हज़ारों बार सुना है, लेकिन आज तक इनकी आवाज़ इस तरह की पहले कभी नहीं लगी थी, जैसी कि इस गाने में है। इनकी आवाज़ यहाँ पहचान में हीं नहीं आती। मैंने तो कई जगहों पर "शफ़कत अमानत अली" का नाम लिखा पाया था (और मैं मान भी बैठा था) , लेकिन आठ-दस विश्वस्त सूत्रों और ब्लॉगों के चक्कर लगाने के बाद मुझे यकीन करना पड़ा कि ये अपने रूप साहब हीं हैं। अपनी नई आवाज़ में वही पुराना जादू बिखेरने में ये यहाँ भी कामयाब हुए हैं। ज़रा इस गाने के बोलो पर गौर करें:

पल न कटे अब सखी रे पिया बिन,
नीम-सा कड़वा लागे दिन,
हाय! नीम-सा कड़वा लागे अब दिन,
उस पे ये चंदा हाय.. चंदा भी बना सखी सौतन कि
चंदा भी बना हाय.. सखी सौतन कि
कीसो रात मोरी अमावसिया...
मन बसंत को पतझड़ कर वो
ले गयो, ले गयो, ले गयो... रंग-रसिया


पहले फिल्म के लिहाज से राजशेखर ने बेहतरीन पंक्तियाँ गढी हैं। जहाँ इस गाने में "मन-बसिया" और "रंग-रसिया" की बात हो रही है, वहीं अगले गाने "मन्नु भैया" में "करोलबाग की गलियों", "केसर", "यमुना" और "शर्मा जी" जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके इन्होंने गाने में चार-चाँद लगा दिए हैं। नाम से हीं ज़ाहिर है कि "मन्नु भैया" की टाँग खींची जा रही है और इस खेल में सबसे आगे हैं "सुनिधि चौहान" और उनका तबले और ढोलक (मज़ाक वाले) पर संगत दे रहे हैं नीलाद्री देबनाथ, उज्जैनी मुखर्जी, राखी चाँद और विवेक नायक

अंबिया, इलायची, दालचीनी और केसर,
सुखाएगी तन्नु करोलबाग की छत पर,
तब मन्नु भैया का करिहैं..

जब दिल्ली के मिक्सर में घुट जावे कानपुर की भंग,
जब दिल्ली के ऊपर चढ जावे कानपुर का रंग,
जब क़ुतुब से भी ऊपर जावे, कानपुर की पतंग,
तब मन्नु भैया का करिहैं..


मुझे तो यह गाना बेहद पसंद आया। इस गाने में जहाँ एक तरफ़ मस्ती है, मज़ाक है, वहीं दूसरी तरफ़ शब्दों और ध्वनियों की अच्छी धमाचौकड़ी भी है। ऐसे गाने अमूमन "पुरूष-स्वर" (मेल-व्याएस) में तैयार किए जाते है, लेकिन यहाँ कृष्णा की दाद देनी होगी जो इन्होंने सुनिधि को ये गाना सौंपा और वाह! सुनिधि ने दिल खुश कर दित्ता यार ;)

फिल्म का अंतिम गाना है मिका की आवाज़ में "जुगनी"। यह गाना दूसरे "जुगनी" गानों की तरह हीं है, इसलिए कुछ अलग-सा नहीं लगा मुझे। हाँ, मिका पा जी की मेहनत झलकती है और इसमें दो राय नहीं है कि इस गाने के लिए इनसे अच्छा कोई दूसरा गायक नहीं हो सकता था, लेकिन संगीत (संगीतकार) ने इनका साथ नहीं दिया। "बीट्स" प्रेडिक्टेबल हैं.. इसलिए मज़ा रह-रहकर किरकिरा हो जाता है। मुझे किसी भी दिन (any day) "ओए लकी लकी ओए" का "जुगनी" इस "जुगनी" से ज्यादा पसंद आएगा। क्या करें! स्वाद-स्वाद की बात है :)

तो इस तरह से "तनु वेड्स मनु" के संगीत ने गुमनाम से नामचीन का सफ़र आखिरकार तय कर हीं लिया (है)।

आज की समीक्षा आपको कैसी लगी, ज़रूर बताईयेगा। चलिए तो इस बातचीत को यहीं विराम देते हैं। अगले हफ़्ते फिर मुलाकात होगी। नमस्कार!

आवाज़ रेटिंग - 7/10

सुनने लायक गीत - रंगरेज, पिया न रहे, मन्नु भैया, साडी गली

एक और बात: इस फिल्म के सारे गाने(प्रिव्यु मात्र) आप कृष्णा के ओफ़िसियल वेबसाईट पर सुन सकते हैं यहाँ:
http://krsnamusic.com/news/tanu-weds-manu-piya-sung-by-roop-kumar-rathod-or-shafqat-amanat-ali/




अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Tuesday, January 18, 2011

"यमला पगला दीवाना" का रंग चढाने में कामयाब हुए "चढा दे रंग" वाले अली परवेज़ मेहदी.. साथ है "टिंकू जिया" भी

Taaza Sur Taal 02/2011 - Yamla Pagla Deewana

"अपने तो अपने होते हैं" शायद यही सोच लेकर अपना चिर-परिचित देवल परिवार "अपने" के बाद अपनी तिकड़ी लेकर हम सब के सामने फिर से हाजिर हुआ है और इस बार उनका नारा है "यमला पगला दीवाना"। फिल्म पिछले शुक्रवार को रीलिज हो चुकी है और जनता को खूब पसंद भी आ रही है। यह तो होना हीं था, जबकि तीनों देवल अपना-अपना जान-पहचाना अंदाज़ लेकर परदे पर नज़र आ रहे हों। "गरम-धरम" , "जट सन्नी" और "सोल्ज़र बॉबी"... दर्शकों को इतना कुछ एक हीं पैकेट में मिले तो और किस चीज़ की चाह बची रहेगी... हाँ एक चीज़ तो है और वो है संगीत.. अगर संगीत मन का नहीं हुआ तो मज़े में थोड़ी-सी खलल पड़ सकती है। चूँकि यह एक पंजाबी फिल्म है, इसलिए इससे पंजाबी फ़्लेवर की उम्मीद तो की हीं जा सकती है। अब यह देखना रह जाता है कि फ़िल्म इस "फ़्रंट" पर कितनी सफ़ल हुई है। तो चलिए आज की "संगीत-समीक्षा" की शुरूआत करते हैं।

"यमला पगला दीवाना" में गीतकारों-संगीतकारों और गायक-गायिकाओं की एक भीड़-सी जमा है। पहले संगीतकारों की बात करते हैं। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल (ओरिजनल "मैं जट यमला पगला दीवाना" .. फिल्म "प्रतिज्ञा" से), अनु मलिक, संदेश सांडिल्य, नौमान जावेद, आर०डी०बी० एवं राहुल बी० सेठ.. इन सारे संगीतकारों ने फिल्म के गानों की कमान संभाली है और इनके संगीत पर जिन्होंने बोल लिखे हैं वे हैं: आनंद बक्षी (ओरिजनल "मैं जट यमला पगला दीवाना"), धर्मेन्द्र (जी हाँ, अपने धरम पा जी भी अब गीतकार हो गए हैं, इन्होंने फिल्म में "कड्ड के बोतल" नाम का गाना लिखा है), इरशाद कामिल, नौमान जावेद, राहुल बी० सेठ एवं आर०डी०बी०।

इस बार से हमने निर्णय लिया है कि हम फिल्म के सारे गाने नहीं सुनवाएँगे, बस वही सुनवाएँगे एलबम का सर्वश्रेष्ठ गाना हो या कि जिसे जनता बहुत पसंद कर रही हो। इसी बात को ध्यान में रखते हुए, आईये हम और आप सुनते हैं "अली परवेज़ मेहदी" की आवाज़ों में "चढा दे रंग":

Chadha de rang



Chadha de rang (Sad version)



हमारा यह सौभाग्य है कि हमें "परवेज़ मेहदी" से कुछ सवाल-जवाब करने का मौका हासिल हुआ। हमारे अपने "सजीव जी" ने इनसे "ई-मेल" के द्वारा कुछ सवाल पूछे, जिनका बड़े हीं प्यार से परवेज़ भाई ने जवाब दिया। यह रही वो बातचीत:

आवाज़: परवेज़ भाई फिल्म "यमला पगला दीवाना" में हम आपका गाना सुनने जा रहे हैं, हमारे श्रोताओं को बताएँ कि कैसा रहा आपका अनुभव इस गीत का।

अली परवेज़: निर्माता-निर्देशक समीर कार्णिक और देवल परिवार के लिए काम करने में बड़ा मज़ा आया, बॉलीवुड के लिए यह मेरा पहला गाना है। मैंने इस गाने के लिए इतनी बड़ी सफ़लता की उम्मीद नहीं की थी, आम लोगों को गाना अच्छा लगा हीं है लेकिन गाने के समझदार लोगों से भी वाह-वाह मिली है..और वो मेरे लिए सबसे ज्यादा खुशी की बात है।

आवाज़: जी सही कहा आपने। अच्छा यह बताईये कि इस गीत को राहत साहब ने भी गाया है, लेकिन एलबम में आपकी आवाज़ को पहली तरजीह दी गई है, इससे बेहतर सम्मान की बात क्या हो सकती है.. आप इस बारे में क्या सोचते हैं।

अली परवेज़: राहत साहब के बारे में जो भी कहूँ वो कम होगा। उनको कौन नहीं जानता, उनको किसने नहीं सुना, ये तो मेरी खुश-नसीबी है कि मुझे भी वो हीं गाना गाने का मौका मिला जो उनसे गवाया गया था। अब मुझे क्यों पहली तरजीह दी गई है, इसे जनता से बेहतर भला कौन बता पाएगा?

आवाज़: अपने अब तक के संगीत-सफ़र के बारे में भी संक्षेप में कुछ कहें।

अली परवेज़: जनाब परवेज़ मेहदी साहब मेरे वालिद थे, और वो हीं मेरे सबसे बड़े गुरू थे और मेरे सबसे बड़े आलोचक भी.. वो हीं मेरे गुणों के पारखी थे। उनका अपना घराना था, अपनी गायकी थी... बस मैं उनकी बनाई हुई इस संगीत की राह पर कुछ सुरीला सफ़र तमाम करूँ, यही अल्लाह से दुआ करता हूँ।

आवाज़: यमला पगला दीवाना के गाने इन दिनों खूब लोकप्रिय हो रहे हैं। क्या आपको फिल्म के कलाकारों या क्रू से मिलने का मौका मिला है कभी?

अली परवेज़: नहीं, मुझे कास्ट से मिलने का मौका नहीं मिला, क्योंकि मैं यू०एस०ए० में सेटल्ड हूँ, और मैंने अपने स्टुडियो में गाना रिकार्ड किया था।

आवाज़: प्राईवेट एलबम्स के बारे में आपके क्या विचार हैं, क्या आप खुद किसी एलबम पर काम कर रहे हैं? आने वाले समय में किन फ़िल्मों में हम आपको सुन पाएँगे?

अली परवेज़: मेरे ख़्याल में हर फ़नकार को कम से कम एक मौका प्राईवेट एलबम बनाने का ज़रूर मिलना चाहिए, क्योंकि उसमें कलाकार को अपनी सोच (प्रतिभा) दिखाने का मौका मिलता है और उसकी गायकी के अलग-अलग रंग दिखते हैं। एलबम कोई फ़िल्म नहीं होता, इसमें कोई स्टोरी-लाईन नहीं होती, इसलिए फ़नकार अपने मन का करने के लिए आज़ाद होता है। इंशा-अल्लाह हम लोग कुछ प्रोजेट्स पर काम कर रहे हैं, जो आपके सामने बहुत हीं जल्द आएँगे।

आवाज़: परवेज़ भाई, आपने हमें समय दिया, इसके लिए आपका हम तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करते हैं।

अली परवेज़: आपका भी शुक्रिया!

फिल्म के सर्वश्रेष्ठ गानों के बाद आईये हम सुनते हैं "जनता की पसंद"। ललित पंडित द्वारा संगीतबद्ध और उन्हीं के लिखे हुए "मुन्नी बदनाम", इसी तरह "विशाल-शेखर" द्वारा संगीतबद्ध और विशाल की हीं लेखनी से उपजे "शीला की जवानी" के बाद शायद यह ट्रेंड निकल आया है कि एक ऐसा आईटम गाना तो ज़रूर हीं होना चाहिए जिसे संगीतकार हीं अपने शब्द दे। शायद इसी सोच ने इस फिल्म में "टिंकु जिया" को जन्म दिया है। इस गाने के कर्ता-धर्ता "अनु मलिक" हैं और "मुन्नी बदनाम" की सफ़लता को भुनाने के लिए इन्होंने "उसी" गायिका को माईक थमा दी है। जी हाँ, इस गाने में आवाज़ें हैं ममता शर्मा और जावेद अली की। यह गाना सुनने में उतना खास नहीं लगता, लेकिन परदे पर इसे देखकर सीटियाँ ज़रुर बज उठती हैं। अब चूँकि गाना मक़बूल हो चुका है, इसलिए हमने भी सोचा कि इसे आपके कानों तक पहुँचा दिया जाए।

Tinku Jiya



हमारी राय – फ़िल्म जनता को भले हीं बेहद पसंद आई हो, लेकिन संगीत के स्तर पर यह मात खा गई। दो-एक गानों को छोड़कर संगीत में खासा दम नहीं है। वैसे बॉलीवुड को "अली परवेज़ मेहदी" के रूप में एक बेहतरीन गायक हासिल हुआ है। उम्मीद और दुआ करते हैं कि ये हमें आगे भी सुनने को मिलेंगे। इन्हीं बातों के साथ आईये आज की समीक्षा पर विराम लगाते हैं। धन्यवाद!



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

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