Anita Kumar लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
Anita Kumar लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 25 मार्च 2009

आपको देख कर देखता रह गया...- जगजीत की गायिकी को शिशिर का सलाम


अभी कुछ दिनों पहले हमने आपको सुनवाया था शिशिर पारखी की रेशमी आवाज़ में जिगर मुरादाबादी का कलाम. जैसा कि हमने आपको बताया था कि शिशिर इन दिनों अपने अफ्रीका दौरे पर हैं जहाँ वो अपनी ग़ज़लों से श्रोताओं को मन्त्रमुग्ध कर रहे हैं. पर वहां भी वो प्रतिदिन आवाज़ को पढना नहीं भूलते. बीते सप्ताह नारोबी (दक्षिण अफ्रीका) में हुए एक कंसर्ट में उन्होंने जगजीत सिंह साहब की एक खूबसूरत ग़ज़ल को अपनी आवाज़ दी जिसकी रिकॉर्डिंग आज हम आपके लिए लेकर आये हैं. जगजीत की ये ग़ज़ल अपने समय में बेहद मशहूर हुई थी और आज भी इसे सुनकर मन मचल उठता है. कुछ शेर तो इस ग़ज़ल में वाकई जोरदार हैं. बानगी देखिये -

उसकी आँखों से कैसे छलकने लगा,
मेरे होंठों पे जो माज़रा रह गया....


और

ऐसे बिछडे सभी रात के मोड़ पर,
आखिरी हमसफ़र रास्ता रह गया...


गौरतलब है कि अभी पिछले सप्ताह ही आवाज़ पर अनीता कुमार ने जगजीत सिंह पर दो विशेष आलेख प्रस्तुत किये थे, आज सुनिए शिशिर पारखी की आवाज़ में मूल रूप से जगजीत की गाई ये ग़ज़ल -






बुधवार, 18 मार्च 2009

एक सम्मोहन का नाम है जगजीत सिंह


पुरुस्कार और म्युजिक थैरेपी

इसके अलावा भी उनकी और एलबम आयी जैसे कहकशां, चिराग जो बहुत लोकप्रिय हुईं। कुछ आलोचकों ने ( जी हां कुछ आलोचक अब भी बचे हुए थे) दबी जबान में कहना शुरु किया कि हांSSSSS , जगजीत सिंह सिर्फ़ सेमी क्लासिकल गजल ही गा सकते हैं उनके पास वेरायटी नहीं है। इस का जवाब दिया जगजीत जी ने पंजाबी गाने गा कर जो एकदम फ़ास्ट, जिंदा दिली से भरे हुए गाने थे जिन्हें सुनते ही आप के कदम अपने आप थिरकने लगें। साथ ही उन्हों ने गाये भजन जो मन को इतनी शांती देते हैं कि आप मेडिटेशन कर सकते हैं।

सबसे ऊंची प्रेम सगाई


और अब सुनिए एक पंजाबी गाना


और आज भी जगजीत जी गायकी के क्षेत्र में नये नये प्रयोग कर रहे हैं । लोग कहते हैं कि नब्बे के दशक से उनकी आवाज में, उनकी गायकी में और निखार आ गया है। मानव मन का ऐसा कोई एहसास नहीं जिसे जगजीत जी अपनी गजलों में न उतार सकते हों। इसी कारण अनेकों बार उन्हें अलग अलग सरकारों से सम्मान मिला है। उनके पिता जो साठ के दशक में उनके संगीत में अपना भविष्य बनाने के निश्चय से चिंतित थे आज गर्व से फ़ूले नहीं समाते। लेकिन सबसे बड़ा पुरुस्कार तो जगजीत जी की गायकी को तब मिला जब भोपाल के एक अस्तपताल ‘हमीदिया हॉस्पिटल’ में म्युजिक थैरेपी पर चल रहे प्रयोग के नतीजे सामने आये। इस प्रयोग में ये पाया गया कि जगजीत जी की गजलें जब ऑपरेशन थिएटर के अंदर बजायी गयीं तो मरीज को कम दर्द का एहसास हुआ, ये कहना था वहां के मुख्य ऐनेस्थिया देने वाले डाक्टर आर पी कौशल का। और इसी तरह जब अस्तपताल के दूसरे हिस्सों में जगजीत जी की गजलें बजायी गयी तो मरीजों का चित्त प्रसन्न रहता था और वो शीघ्र स्वास्थय लाभ ले कर घर को लौट जाते थे। ऐसा है जगजीत जी की गायकी का जादू।

सुनिए मेरी पसंद की दो और गज़लें-
जो भी भला बुरा है अल्लाह जानता है


आदमी आदमी को क्या देगा जो भी देगा खुदा देगा


कोई भी कलाकार अच्छा कलाकार तभी अच्छा कलाकार हो सकता है जब वो अच्छा इंसान हो। जगजीत जी भी इस नियम के अपवाद नहीं। जब वो साठ के दशक में बम्बई आये थे तो उन्हें अपनी जगह बनाने के लिए कई साल लगे थे और अथक परिश्रम करना पड़ा था, इस बात को वो आज तक नहीं भूले। नये कलाकारों को प्रोत्साहन देना मानों उन्होने अपना धर्म बना लिया हो। आज के कई नामी कलाकार उन्हीं की पारखी नजर और प्रोत्साहन का नतीजा हैं जैसे तलत अजीज, घनश्याम वासवानी, विनोद सहगल, सिजा रॉय, और अशोक खोसला को प्रोत्साहन देते हमने उन्हें खुद एक लाइव कॉन्सर्ट में देखा है। उन्हें कभी असुरक्षा की भावना ने त्रस्त नहीं किया कि ये लोग स्थापित हो गये तो मेरी मॉर्केट का क्या होगा। संगीत तो उनके लिए पूजा है।

सफ़लता का राज

एक बार किसी ने उनसे पूछा था कि आप इतने सालों से एक के बाद एक इतनी अच्छी गजलें कैसे दे पाते हैं, हर गजल अपने आप में एक नगीना होती हैं । उनका सीधा साधा उत्तर था कि मैं सबसे पहले ध्यान देता हूँ कवि पर, जिसकी नज्म या गजल मेरे दिल में उतर जाए उसी को मैं अपनी आवाज से सजाता हूँ, जो मेरे दिल में ही नहीं उतरे वो सुनने वाले के दिल में कैसे उतरेगी। उनकी चुनी हुई गजलों को देख कर ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि उन्हें कविता की कितनी समझ है। उन्हों ने चुन चुन कर मिर्जा गालिब, आमीर मिनाई, कफ़ील आजर, सुदर्शन फ़ाकिर, निदा फ़ाजिल की की रचनाओं में से गजलें चुनीं।

जितनी अच्छी उनकी गायकी है उतनी ही अच्छी उनकी विभिन्न भाषाओं पर पकड़ है। फ़िर भी वो इस बात का ध्यान रखते हैं कि वो जो भी गायें वो इतने सीधे सादे शब्दों में हो कि लोगों को आसानी से समझ में आ जाए। अगर आप अपना ज्ञान ब्खान कर रहे हैं लेकिन सुनने वाले को कुछ समझ ही नहीं आ रहा तो वो ऐसे ही है कि ‘भैंस के आगे बीन बजाए भैंस खड़ी पगुराए’, इस बात को जगजीत जी बखूबी समझते हैं और इसी लिए उनके नगमें हर दिल अजीज होते हैं।

तीसरी बात जो ध्यानाकर्षण करती है वो ये कि जगजीत जी मानते हैं कि आजकल के संगीत में शोर ज्यादा है और आत्मा कहीं खो गयी है। उसका कारण है आज की मौजूदा तकनीकी सुविधा। आज एक संगीतकार को कई प्रकार की मशीनें उपलब्ध हैं जैसे रिदम मशीन, सिन्थेसाइजर, सेम्पलरस्। ऐसे में संगीत तो मशीन देती है संगीतकार थोड़े ही देता है तो संगीत में आत्मा कहां से आयेगी, मेहनत के पसीने की सौंधी खुशबू कहां से आयेगी। जितने कम से कम वाद्ध्य का इस्तेमाल होगा संगीत उतना ही मधुर होगा। हमें ये बात एकदम सही लगती है, आप क्या कहते है?

बकौल जगजीत जी संगीत न सिर्फ़ हमारी आत्मा को तृप्त करता है बल्कि हमारे जीवन को भी संवारता है , आप पूछेगे कैसे? तो जगजीत जी बताते है कि जब एक गायक नियमित रियाज करता है तो उसके जीवन में अनुशासन आता है और ये अनुशासन सिर्फ़ संगीत के क्षेत्र में ही नहीं उसके जीवन के दूसरे अंग भी छूता है। अनुशासित व्यक्ति अपने आप सफ़ल हो जाता है ये तो जग जाहिर बात है।

अंत में हम तो यही कहेगें जगजीत सिंह वो कलाकार है जो समय के साथ साथ और कुंदन सा निखरता जाता है और जिसकी आवाज के जादू से उसके पीछे सम्मोहित से चलने वालों की भीड़ और बड़ती जाती है। ऐसे हैं हमारे जगजीत सिंह “The Pied Piper”.

यूं तो जगजीत जी के कई गाने हैं जो मुझे पसंद है और उनमें से कुछ गीत चुनना बहुत ही मुश्किल काम है फ़िर भी एक दो गीत और हो जाएं?

होठों से छू कर तुम मेरे गीत अमर कर दो


वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी...


चलते चलते देखें कैसे सम्मोहित करते हैं जगजीत सिंह अपनी गायकी से श्रोताओं को -


प्रस्तुति - अनीता कुमार


मंगलवार, 17 मार्च 2009

जगजीत सिंह ‘The Pied Piper’

रेडियो पर जगजीत सिंह की गजल बज रही है और मुझे याद आ रहा है, वो नब्बे का दशक जब हमारी उम्र रही होगी तीस के ऊपर(कितनी ऊपर हम नहीं बताने वाले…:)) पतिदेव काम के सिलसिले में अक्सर शहर से बाहर रहते थे। जब जब वो बाहर जाते दिन तो रोज की दिनचर्या में गुजर जाता लेकिन रातों को हमें अकेले डर के मारे नींद न आती। अब क्या करते? ऐसे में पूरी पूरी रात जगजीत सिंह की आवाज हमारा सहारा बनती।

मेरी पंसद के एक दो गीत हो जाएं,क्या कहते हैं आप ?

परेशां रात सारी हैं सितारों तुम तो सो जाओ...


मेरी तन्हाइयों तुम भी लगा लो मुझको सीने से कि मैं घबरा गया हूँ इस तरह रो रो के जीने से


आप कहेगें नब्बे का दशक? लेकिन जगजीत सिंह और चित्रा सिंह( उनकी धर्मपत्नी) की जोड़ी तो 1976 में ही अपनी पहली एलबम “The Unforgettables” से ही लोकप्रिय हो गये थे। जी हां जानते हैं, जानते हैं, हम भी उसी युवा वर्ग से थे जो उनकी पहली एल्बम से ही उनकी आवाज का दिवाना हो गया था, इसी लिए तो अपने संगीत के खजाने में से सिर्फ़ उनके ही कैसेट निकाल कर सुने जाते थे। भई तब सी डी का रिवाज नहीं था न्। अब जब कोई आप को इतना प्रभावित करे तो उसके बारे में सब कुछ जान लेने का मन करता ही है। हमने भी जितनी हो सकी उतनी जानकारी उनके बारे में हासिल करने की कौशिश की। मुझे मालूम है आप में से भी कई जगजीत जी के दिवाने होगें तो आइए बात करें कुछ उनकी कुछ अपनी।

तेरी महफ़िल में किस्मत आजमा कर हम भी देखेगें

आठ फ़रवरी 1941 में सरकारी मुलाजिम सरदार अमर सिंह धीमन और सरदारनी बच्चन कौर को चार लड़कियों और दो लड़कों के बाद, जब वाहे गुरु की नेमत के रूप में एक और पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई तो न जाने क्या सोच कर उन्हों ने उसका नाम रख दिया ‘जगजीत सिंह’,यानी की जग को जीतने वाला। इस नाम में ही शायद आने वाले भविष्य का आगाज छुपा था। हर माता पिता की तरह सरदार अमर सिंह जी ने भी सपने देखे थे कि उनका बेटा बड़ा हो कर आई ए एस की सीढ़ी पार करते हुए किसी ऊंचे सरकारी औहदे पर आसीन होगा। लेकिन खुदा को तो कुछ और ही मंजूर था। जगजीत सिंह जिन्हें उनके घर के लोग प्यार से ‘जीत’ बुलाते थे गंगानगर से दसवीं पास कर कॉलेज की पढ़ाई करने जलंधर आ गये। दसवीं तक तो साइंस लिया हुआ था लेकिन उनका मन सांइस में न लगता था, इस लिए बी ए इतिहास ले कर किया। साथ ही साथ् पंडित छगल लाल शर्मा और बाद में उस्ताद जमाल खां साहब से गायिकी की तालीम लेते रहे। ग्रेजुएशन होते होते जगजीत साहब ख्याल, ठुमरी और ध्रुपद जैसी विधाओं में परांगत हो गये। 1965 में उन्हों ने बम्बई आकर संगीत की दुनिया में अपनी किस्मत आजमाने का फ़ैसला कर लिया। उनके पिता जी स्वाभाविक है कि इस बात से खुश नहीं थे, उनके भविष्य की चिंता उन्हें खाये जा रही थी। पर जगजीत सिंह जी दृढ़ निश्चय कर चुके थे और वो बम्बई आ गये। अब जैसा कि हर नवोदित कलाकार के साथ होता है वो उनके साथ भी हुआ। बम्बई सपनों की नगरी मानी जाती है, जो भी यहां आखों में सपने ले कर आता है उसे अपने सपने पूरे करने का मौका जरूर देती है, लेकिन राह इतनी आसां भी नहीं होती। ये कड़ी मेहनत, कई निराशा भरे दिनों से गुजरने के बाद ही सफ़लता का सेहरा किसी के सर पर रखती है। जगजीत जी के साथ भी यही हुआ। शुरु शुरु में उन्हें शादियों में गाना पड़ा, कई इश्तहारों के जिंगल्स गाने पड़े। उसी जमाने में उनकी मुलाकात हुई चित्रा जी से। चित्रा जी खुद एक अच्छी गायिका थी और हैं। पहले पहल तो वो उनसे जरा भी प्रभावित न थीं, उन्हें लगता था कि जगजीत सिंह जी बहुत ही आलसीराम है जो न जगह देखते हैं न मौका, बस जरा मौहलत मिली नहीं कि लगे खर्राटे मारने। सोते ही रह्ते हैं, सोते ही रहते हैं। लेकिन धीरे धीरे जगजीत जी की गायकी का जादू उन पर भी चढ़ने लगा और वो उनकी ऐसी कायल हुई कि साठ का दशक ख्तम होते होते वो उनकी धर्मपत्नी बन गयीं। आज लगभग चालीस साल बाद भी वो जगजीत सिंह जी की गायकी के जादू से सम्मोहित हैं और मानती हैं कि जगजीत सिंह जी की आवाज कानों से सीधे दिल में उतर जाती है। ये बात वो तो क्या सारी दुनिया मानती है। हम भी पिछले चालिस सालों से जगजीत सिंह जी की आवाज के ऐसे दिवाने हैं कि सुनते ही खिचे चले जाते हैं जैसे पाइड पाइपर के पीछे बच्चे चल दिए थे।

1976 में भारत की संगीत की दुनिया में जगजीत सिंह और चित्रा सिंह पहले गजल गायक दंपत्ति के रूप में उतरे और ऐसे लोकप्रिय हुए कि दूसरे कई गायक दंपत्तियों के लिए मिसाल बन गये।

जगजीत जी की आवाज तो उन्हें ईश्वर से आशीष के रूप में मिली है पर उसे अपनी मेहनत और लगन से मांजा है जगजीत जी ने खुद्। वो न सिर्फ़ अच्छे गायक है उनकी दुरदर्शिता भी बेमिसाल है। सत्तर का दशक वो दशक था जब गजल की दुनिया में कई महारथी पहले से मौजूद थे जैसे मैंहदी हसन, पंकज मलिक,तलत महमूद, गुलाम अली, बेगम अख्तर, नूरजंहा आदि आदि। ऐसे में जगजीत जी के लिए अपनी जगह बना पाना काफ़ी टेढ़ी खीर थी। म्युजिक कंपनियां जो अपने नफ़े के प्रति बड़ी सतर्क रहती हैं आसानी से किसी नये गायक पर पैसा लगा कर खतरा नहीं उठाना चाह्तीं, अगर वो गायक न चला तो नुकसान तो होगा ही, प्रतिष्ठित गायकों की नाराजगी का भी खतरा रहता है।

दूरदर्शी जगजीत सिंह

जगजीत जी ने दूरदर्शिता दिखाते हुए अपने लिए मुकाम हासिल करने की सोची सेमी क्लासिकल में। जब उनकी पहली एलबम आयी तो समीक्षकों ने काफ़ी आलोचना की लेकिन जनता ने अपना फ़ैसला सुना दिया था। उनकी एलबम की बिक्री ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिये। उनका नाम संगीत की दुनिया के प्रतिष्ठित हस्तियों में शुमार हो गया। जगजीत सिंह दंपत्ति ने एक के बाद एक मधुर आत्मा में उतर जाने वाले एलबम देने शुरु कर दिए। जगजीत जी बड़ी आसानी से जनता की नब्ज पर हाथ धर लेते हैं। अगर आप ने ध्यान दिया हो तो उनकी ज्यादातर एलबम के नाम अंग्रेजी में हैं और गजलों का चुनाव उम्दा शायरी की मिसाल्।

जगजीत जी समाज के हर तबके तक पहुंचना चाह्ते थे। अंग्रेजी में नाम रखने से आज का युवा वर्ग (जो पॉप म्युजिक और हिप हॉप का दिवाना है) खुद को उनके संगीत से जुदा नहीं पाता और दिल में उतरती उम्दा शायरी प्रौढ़ वर्ग को दिवाना बना देती है। जैसे उनकी कुछ एलबमस के नाम हैं Ecstasies, A Sound Affair, Passions, Beyond Time, Mirage, Visions, Love is Blind, पर इसी के साथ देखे तो मिर्जा गालिब उनकी बेहतरीन एलबम में से एक हैं। हम तो यहां तक कह सकते हैं कि मिर्जा गालिब ने जहां दिल को छूने वाली गजले लिखीं उनमें आत्मा डाली जगजीत सिंह की आवाज और अंदाज ने।

जगजीत सिंह् जी न सिर्फ़ गैर फ़िल्मी बल्कि फ़िल्मी संगीत की दुनिया के भी नामी गिरामी सितारे बन गये, कई फ़िल्में उनके गाये गानों की वजह से आज तक जेहन से नहीं उतरती जैसे अर्थ, साथ साथ, प्रेमगीत, तुम बिन, सरफ़रोश, दुश्मन, तरकीब और भी न जाने कितनी। किस किस के नाम गिनाऊं?



मां का दर्द

जिन्दगी बहुत ही जालिम है, इसमें खुशी और गम दोनों से कोई अछूता नहीं रह पाया। सब अच्छा चल रहा था जब नब्बे के दशक में एक हादसे ने जगजीत सिंह दंपत्ति की दुनिया ही बदल कर रख दी। उनका 21 वर्षीय इकलौता बेटा विवेक एक सड़क दुर्घटना का शिकार हो गया। जिस दिन हमने अखबार में ये खबर पढ़ी थी दिल धक्क से रह गया था। जगजीत सिंह जी ने तो फ़िर भी इस झटके को अपनी छाती पर खाया और डटे रहे लेकिन चित्रा सिंह बिचारी क्या करतीं , वो मां इतना ढाढस कहां से लाती कि अपने जवान बेटे को जिसे घोड़ी चढ़ाने के सपने देख रही थी उसे अर्थी पर चढ़ा देखती। उन्हें ऐसा झटका लगा कि चौदह साल तक उनकी आवाज गमों के अंधेरों में कैद हो गयी और वो घर पर भी कभी भूले से कुछ गुनगुना भी न पायीं, बाहर गाना तो बहुत दूर की बात थी। बड़ी मुश्किल से जगजीत जी के बहुत समझाने पर उन्हों ने अपनी अंतिम एलबम पर काम किया जो उन दोनों ने अपने बेटे की याद को समर्पित की थी। उस एलबम का नाम था “Somewhere Some one” । जाहिर है कि इस एलबम में उन दोनों का पूरा दर्द उभर कर सामने आया और ऐसा आया कि हर सुनने वाले को आज भी रुलाता है।

चित्रा जी अपने गम में ऐसी डूबीं कि उन्होने खुद को अपने घर की चार दिवारी में कैद कर लिया और सिर्फ़ बेटे की यादों में लिपटी रहीं। जगजीत जी किसी तरह संभले और जिन्दगी को दोबारा पटरी पर लाने की कौशिश की। उन्होने पहली बार लता मंगेशकर जी के साथ एलबम बनायी ‘सजदा’ ये एलबम भी सुपर हिट रही, मेरी भी पंसदीदा एलबम में से ये एक हैं इसी का एक गाना जो मुझे बहुत पंसद है आप भी सुनिए………

हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी


इसकी दूसरी किश्त पढ़ें
प्रस्तुति - अनीता कुमार

सोमवार, 19 जनवरी 2009

दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे.... बेगम अख्तर

(पहले अंक से आगे..)

अख्तर बेगम जितनी अच्छी फ़नकार थीं उतनी ही खूबसूरत भी थीं। कई राजे महाराजे उनका साथ पाने के लिए उनके आगे पीछे घूमते थे लेकिन वो टस से मस न होतीं।

अकेलेपन के साथी थे- कोकीन,सिगरेट, शराब और गायकी। इन सब के बावजूद उनकी आवाज पर कभी कोई असर नहीं दीखा। अल्लाह की नेमत कौन छीन सकता था।

1945 में जब उनकी शौहरत अपनी चरम सीमा पर थी उन्हें शायद सच्चा प्यार मिला और उन्हों ने इश्तिआक अहमद अब्बासी, जो पेशे से वकील थे, से निकाह कर लिया और अख्तरी बाई फ़ैजाबादी से बेगम अख्तर बन गयीं। गायकी छोड़ दी और पर्दानशीं हो गयीं। बहुत से लोगों ने उनके गायकी छोड़ देने पर छींटाकशी की,"सौ चूहे खा के बिल्ली हज को चली" लेकिन उन्हों ने अपना घर ऐसे बसाया मानों यही उनकी इबादत हो। पांच साल तक उन्हों ने बाहर की दुनिया में झांक कर भी न देखा। लेकिन जो तकदीर वो लिखा कर लायी थीं उससे कैसे लड़ सकती थीं। वो बिमार रहने लगीं और डाक्टरों ने बताया कि उनकी बिमारी की एक ही वजह है कि वो अपने पहले प्यार, यानी की गायकी से दूर हैं।

मानो कहती हों -
इतना तो ज़िन्दगी में किसी के खलल पड़े...


उनके शौहर की शह पर 1949 में वो एक बार फ़िर अपने पहले प्यार की तरफ़ लौट पड़ीं और ऑल इंडिया रेडियो की लखनऊ शाखा से जुड़ गयीं और मरते दम तक जुड़ी रहीं। उन्हों ने न सिर्फ़ संगीत की दुनिया में वापस कदम रखा बल्कि हिन्दी फ़िल्मों में भी गायकी के साथ साथ अभिनय के क्षेत्र में भी अपना परचम फ़हराया। उनका हिन्दी फ़िल्मों का सफ़र 1933 में शुरु हुआ फ़िल्म 'एक दिन का बादशाह' और 'नल दमयंती' से। फ़िर तो सिलसिला चलता ही रहा, 1934 में मुमताज बेगम, अमीना 1935 में जवानी का नशा, नसीब का चक्कर, 1942 में रोटी। फ़िल्मों से कभी अदाकारा के रूप में तो कभी गायक के रूप में उनका रिश्ता बना ही रहा। सुनते हैं एक ठुमरी उनकी आवाज़ में - जब से श्याम सिधारे...


अब तक दिल में बसा हुआ है। अदाकारा के रूप में उनकी आखरी पेशकश थी सत्यजीत रे की बंगाली फ़िल्म 'जलसा घर' जिसमें उन्हों ने शास्त्रीय गायिका का किरदार निभाया था।

फ़िल्मों के अलावा वो ऑल इंडिया रेडियो पर,और मंच से गाती ही रहती थीं ।सब मिला के उनकी गायी करीब 400 गजलें, दादरा और ठुमरी मिलती हैं। संगीत पर उनकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि ज्यादातर वो शायरी को संगीत का जामा खुद पहनाती थी। ढेरों इनामों से नवाजे जाने के बावजूद लेशमात्र भी दंभ न था और ता उम्र वो मशहूर उस्तादों से सीखती रहीं । एक जज्बा था कि न सिर्फ़ अच्छा गाना है बल्कि वो बेहतर से बेहतर होना चाहिए- परफ़ेक्ट।

यही कारण था कि 1974 में जब अहमदाबाद में वो (अपनी खराब तबियत के बावजूद) मंच पर गा रही थीं वो खुद अपनी गायकी से संतुष्ट नहीं थी और उसे बेहतर बनाने के लिए उन्हों ने अपने ऊपर इतना जोर डाला कि उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा और वो चल पड़ी उस पड़ाव की ओर जहां से कोई लौट कर नहीं आता, जहां कोई साथ नहीं जाता, फ़िर भी अकेलेपन से निजाद मिल ही जाता है। वो गाती गयीं -

मेरे हमसफ़र मेरे हमनवाज मुझे दोस्त बन के दगा न दे...


खूने दिल का जो कुछ....


दीवाना बनाना है तो .....(उस्ताद बिस्मिल्लाह खान साहब की सबसे पसंदीदा ग़ज़ल)


खुशी ने मुझको ठुकराया....


हमार कहा मानो राजाजी (दादरा)


अब छलकते हुए...


खुश हूँ कि मेरा हुस्ने तलब काम तो आया...


और उनके चाहने वालों का दिल कह रहा है-
किस से पूछें हमने कहाँ वो चेहरा-ऐ-रोशन देखा है.....


कहने को बहुत कुछ है,आखिरकार पदमविभूषण से सम्मानित ऐसी नूरी शख्सियत को चंद शब्दों में कैसे बांधा जा सकता है, बस यही कहेगें -
डबडबा आई वो ऑंखें, जो मेरा नाम आया.
इश्क नाकाम सही, फ़िर भी बहुत काम आया.....


प्रस्तुति - अनीता कुमार




शुक्रवार, 16 जनवरी 2009

मल्लिका-ए-गजल - बेगम अख्तर


सुना है तानसेन जब दीपक राग गाते थे तो दीप जल उठते थे और जब मेघ मल्हार की तान छेड़ते थे तो मेघ अपनी गठरी खोलने को मजबूर हो जाते थे। पीछे मुड़ कर देखें तो न जाने कितने ही ऐसे फ़नकार वक्त की चादर में लिपटे मिल जाते हैं जो इतिहास का हिस्सा बन कर भी आज भी हमारे दिलो जान पर छाये हुए हैं, आज भी उनका संगीत आदमी तो आदमी, पशु पक्षियों, वृक्षों और सारी कायनात को अपने जादू से बांधे हुए है।

आइए ऐसी ही एक जादूगरनी से आप को मिलवाते हैं जो बेगम अख्तर के नाम से मशहूर हैं।


आज से लगभग एक सदी पहले जब रंगीन मिजाज, संगीत पुजारी अवधी नवाबों का जमाना था, लखनऊ से कोई 80 किलोमीटर दूर फ़ैजाबाद में एक प्रेम कहानी जन्मी। पेशे से वकील, युवा असगर हुसैन को मुश्तरी से इश्क हो गया। हुसैन साहब पहले से शादी शुदा थे पर इश्क का जादू ऐसा चढ़ा कि उन्हों ने मुश्तरी को अपनी दूसरी बेगम का दर्जा दे दिया। लेकिन हर प्रेम कहानी का अंत सुखद नहीं होता, दूसरे की आहों पर परवान चढ़े इश्क का अंत तो बुरा होना ही था। मुशतरी के दो बेटियों के मां बनते बनते हुसैन साहब के सर से इश्क का भूत उतर गया और उन्हों ने न सिर्फ़ मुश्तरी से सब रिश्ते तोड़ लिए बल्कि अपनी बेटियों (जोहरा और बिब्बी) के अस्तित्व को भी नकार दिया। दुखों की कड़ी अभी टूटी नहीं थी। चार साल की बिब्बी(अख्तर)और उसकी जुड़वां बहन जोहरा ने पता नहीं कैसे विषाक्त मिठाई खा ली और जब तक कुछ कारागर इलाज होता जोहरा इस दुनिया से कूच कर गयी। इतने बड़े जहान में एक दूसरे का सहारा बनने को रह गयीं मां बेटी अकेली।

इश्क में गैरते-जज़्बात ने रोने न दिया ...


ये वो जमाना था जब पेशेवर महिलाओं प्रोत्साहन देना तो दूर हिकारत की नजर से देखा जाता था, और अगर वो गायिका किसी गायिकी के घराने से हो तब तो उसे महज कोठे वाली ही समझ लिया जाता था। लेकिन अख्तरी बाई फ़ैजाबादी को भी आसान राहें गवारा कहाँ। सात साल की कच्ची उम्र में चंद्राबाई के स्वर कान में पड़ते ही उन्हों ने अपने जीवन का सबसे अहम फ़ैसला कर डाला कि उन्हें गायिका बनना है। बस उसी उम्र से संगीत की तालीम का एक लंबा सफ़र शुरु हो गया। पहले पटना के मशहूर सारंगी वादक उस्ताद इम्दाद खान, पटियाला के अता मौहम्मद खान, कलकत्ता के मौहम्मद खान, लाहौर के अब्दुल वाहिद खान से होता हुआ ये सफ़र आखिरकार उस्ताद झंडेखान पर जा कर खत्म हुआ।

ये सफ़र इतना आसां न था। मौसिकी का सफ़र वैसे तो सबके लिए ही तकलीफ़ों से गुले गुलजार होता है लेकिन औरतों के लिए ये सफ़र कई गुना ज्यादा तकलीफ़ें ले कर आता है। अख्तरी बाई भी उससे कैसे अछूती रह पातीं। सात साल की उम्र में ही पहले उस्ताद ने गायकी की बारीकियाँ सिखाने के बहाने उनकी पोशाक उठा अपना हाथ उनकी जांघ पर सरका दिया और तेरह साल की उम्र होते होते बिहार की किसी रियासत के राजा ने उनकी गायकी के कद्रदान बनते बनते उनकी अस्मत लूट ली। इस हादसे का जख्म सारी उम्र उनके लिए हरा रहा एक बेटी के रूप में जिसे दुनिया के डर से उन्हें अपनी छोटी बहन बताना पड़ता था। पन्द्रह साल की उम्र में पहली बार मंच पर उतरने के पहले हालातों ने वो नश्तर चुभो दिए कि उसके बाद इस सफ़र को जारी रखना एक जंग लड़ने के बराबर था, पर फ़िर भी उन्हों ने अपना संगीत का सफ़र जारी रखा।

'ऐ मौहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया, जाने क्युं आज मुझे तेरे नाम पे रोना आया'


कहते हैं न हिना रंग लाती है पिसने के बाद्। अख्तरी बाई ऐसी ही हिना थीं जितने नासूर जिन्दगी ने उन्हें अता किए उतने ही गहरे रंग उनकी गायकी में घुलते गये।आसपास इतने चाहने वाले होते हुए भी जिन्दगी में पसरे अकेलेपन का एहसास, 'अब आगे पता नहीं क्या हो? का डर, सच्चे प्यार की प्यास, दुख तो मानों उनके दिल में पक्का घर बना के बैठ गया था जो हजार कौशिश करने के बाद भी पल भर को भी हटने का नाम न लेता था। कोई आम महिला होती तो शायद टूट चुकी होती लेकिन अख्तरी बाई ने इन्हीं दुखों को अपनी ताकत बना लिया। जब वो गाती थीं तो उनकी आवाज में वो दर्द छलकता था जो सीधा सुनने वाले के दिल में उतर जाता था। आखों में आसूँ आये बिना न रहते थे।

गायकी और शायरी का तो जुड़वां बहनों जैसा रिश्ता है। अख्तरी बाई, जो शादी के बाद बेगम अख्तर कहलायी जाने लगीं, को भी अच्छी शायरी की खूब पहचान थी। फ़िर शायरी चाहे हिन्दूस्तानी में हो या पुरबिया, ब्रिज या उर्दू में उनकी शब्दों पर पकड़ भी उतनी ही लाजवाब थी जितनी गायकी पर । वो तभी कोई गजल गाती थीं जब उन्हें उसके शेर पसंद आ जाएं। चुनिन्दा शायरी जब उनकी शास्त्रीय संगीत में मंजी आवाज और रूह की गहराइयों से फ़ूटते दर्द में लिपट कर सामने आती थी तो सुनने वालों की आह निकले बिना न रहती। कितनी ही गजलें उनकी आवाज की नैमत पा कर अजर अमर हो गयीं। ये तो जैसे तयशुदा बात थी कि वो मिर्जा गालिब की गजलों की फ़ैन रहीं होगीं। मिर्जा गालिब की कई गजलों को उन्हों ने अपने खूबसूरत अंदाज में गा कर और खूबसूरत बना दिया। एक गजल जो मुझे भी बहुत पसंद है बेगम अख्तर की अदायगी में वो है -

जिक्र उस परीवश का और फ़िर बयां अपना...



(जारी..)

प्रस्तुति - अनीता कुमार


रविवार, 28 सितंबर 2008

चलो, एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों

मशहूर पार्श्व गायक महेन्द्र कपूर को अनिता कुमार की श्रद्धाँजलि

दोस्तो,

जन्म- ९ जनवरी १९३४
मूल- अमृतसर, पंजाब
मृत्यु- २७ सितम्बर, २००८
अभी-अभी खबर आयी कि शाम साढ़े सात बजे महेंद्र कपूर सदा के लिए रुखसत हो लिए। सुनते ही दिल धक्क से रह गया। अभी कल ही तो हेमंत दा की बरसी थी और वो बहुत याद आये, और आज महेंद्र कपूर चल दिये।

कानों में गूंजती उनकी आवाज के साथ साथ अपने बचपन की यादें भी लौट रही हैं। 1950 के दशक में जब महोम्मद रफ़ी, तलत महमूद, मन्ना डे, हेमंत दा, मुकेश और कालांतर में किशोर दा की तूती बोलती थी ऐसे में भी महेंद्र कपूर साहब ने अपना एक अलग मुकाम बना लिया था। एक ऐसी आवाज जो बरबस अपनी ओर खींच लेती थी। यूं तो उन्होंने उस जमाने के सभी सफ़ल नायकों को अपनी आवाज से नवाजा लेकिन मनोज कुमार भारत कुमार न होते अगर महेंद्र कपूर जी की आवाज ने उनका साथ न दिया होता। महेंद्र कपूर जी का नाम आते ही जहन में 'पूरब और पश्चिम' के गाने गूंजते लगते हैं

"है प्रीत की रीत जहां की रीत सदा, मैं गीत वहां के गाता हूँ, भारत का रहने वाला हूँ भारत की बात सुनाता हूँ"

आज भी इस गीत को सुनते-सुनते कौन भारतीय साथ में गुनगुनाने से खुद को रोक सकता है और किस भारतीय की छाती इस गाने के साथ चौड़ी नहीं होती। लाल बहादुर शास्त्री जी ने नारा दिया था "जय जवान, जय किसान", भारत के इस सपूत ने शास्त्री जी के इस नारे को अपने गीतों में न सिर्फ़ जिया बल्कि उस नारे को अमर भी कर दिया। जहां एक तरफ़ 'शहीद' फ़िल्म में उनकी आवाज गूंजी

"मेरा रंग दे बसंती चौला, माय , रंग दे बंसती चौला"

तो दूसरी तरफ़ 'उपकार' फ़िल्म के किसान की आवाज बन उन्हों ने गर्व से कहा

"मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती," ।

गीत सुनें

चलो इक बार फिर से


शेष गाने आप नीचे के प्लेयर से सुनें।
मोहम्मद रफ़ी को अपना गुरु मानने वाले, महेंद्र जी ने 1956 में ही फ़िल्मी गीतों के गायन की दुनिया में प्रवेश किया, लोगों ने शुरू-शुरू में कहा कि मोहम्मद रफ़ी को कॉपी करता है, लेकिन महज तीन साल बाद ही सन 1959 में उनका गाया 'नवरंग' फ़िल्म का गाना

-"आधा है चंद्रमा रात आधी, रह न जाये तेरी-मेरी बात आधी"

कालजयी गीत हमारे दिलों पर अपनी मोहर लगा गया। इसके पहले कि लोग कहते कि अरे ये तो तुक्का था जो लग गया, 1959 में ही एक और फ़िल्म 'धूल का फूल' का वो प्यारा सा गीत

"तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ, वफ़ा कर रहा हूँ वफ़ा चाहता हूँ"

ऐसा लोकप्रिय हुआ कि हर कोई उनसे वफ़ा करने को मजबूर हो गया।

फ़िर तो महेंद्र जी की शोहरत को मानो पंख लग गये, 1963 में आयी फ़िल्म 'गुमराह' का वो सदा बहार गीत

-" चलो इक बार फ़िर से अजनबी बन जाएं हम दोनों"

तान छेड़ते महेन्द्र
सुनिल दत्त और माला सिन्हा पर फ़िल्माया गया ये गीत हर टूटे दिल की आवाज बन गया और आज भी है। इस गाने पर महेंद्र जी को पहली बार फ़िल्म फ़ेअर अवार्ड भी मिला। इसी जैसा एक और गीत जो हमें याद आ रहा है वो है फ़िल्म 'वक़्त' का। हम लगभग दस साल के रहे होंगे जब फ़िल्म आयी "वक़्त", इस फ़िल्म के दो गाने बहुत लोकप्रिय हुए, एक तो मन्ना डे का गाया हुआ सदाबहार गीत जो आज भी हर किसी को गुदगुदाता है "ऐ मेरी जोहरा जबीं" और दूसरा गीत जो बहुत लोकप्रिय हुआ वो था महेंद्र जी का गाया
" दिन हैं बहार के ",

शशी कपूर और शर्मिला टैगोर पर फ़िल्माये इस गीत में महेंद्र जी ने जमाने भर की बेबसी भर शशी कपूर के किरदार को नयी ऊंचाई पर पहुंचा दिया था।

जहां ये गमगीन गाने हमारे गमों के साथी बने वहीं 'बहारें फ़िर भी आयेगीं' फ़िल्म का गीत
"बदल जाए अगर माली चमन होता नहीं खाली"

हर दिल की हौसलाअफ़्जाई करता मिल जाता है।
'किस्मत' फ़िल्म का वो गाना
"लाखों है यहां दिल वाले पर प्यार नहीं मिलता"
और
"तुम्हारा चाहने वाला खुदा की दुनिया में मेरे सिवा भी कोई और हो खुदा न करे"
कितने प्रेमियों को जबान दे गया

क्या क्या याद करें? अगर उन्होंने देश प्रेम, विरह, रोमान्स, आशावाद दिया तो भक्ति का रंग भी खूब जमाया। पूरब पश्चिम में उनकी गायी आरती
"ॐ जय जगदीश हरे "
तो आज मेरे ख्याल से हर घर में पूजा के अवसर पर बजती है। किसने सोचा था कि फ़िल्म का हिस्सा बन कर भी ये आरती फ़िल्मी रंग से अछूती रहेगी। बिना किसी लटके-झटके के सीधे सादे ट्रेडिशनल ढंग से गायी ये आरती आज भी मन को शांती देती है।
74 साल की उम्र में भी गुर्दे की बीमारी से जूझते हुए भी इस भारत के सपूत ने चैन से घर बैठना स्वीकार नहीं किया और देश-विदेश में घूम-घूम के भारतीय संगीत का जादू बिखेरता रहा, फ़िर वो जादू चाहे हिन्दी में हो या पंजाबी, गुजराती या मराठी में। मानो कहते हों

"तुम अगर साथ देने का वादा करो मैं यूं ही मस्त नगमें लुटाता रहूँ"

---अनिता कुमार

शुक्रवार, 26 सितंबर 2008

बेकरार कर के हमें यूँ न जाइए, आप को हमारी कसम लौट आइए

हेमंत कुमार की 19वीं बरसी पर अनिता कुमार की ख़ास पेशकश


आज 26 सितम्बर, हेमंत दा की 19वीं पुण्यतिथि। बचपन की यादों के झरोंखों से उनकी सुरीली मदमाती आवाज जहन में आ-आ कर दस्तक दे रही है। पचासवें दशक के किस बच्चे ने 'गंगा-जमुना' फ़िल्म का उनका गाया ये गीत कभी न कभी न गाया होगा!
"इंसाफ़ की डगर पे बच्चों दिखाओ चल के, ये देश है तुम्हारा"।

हेमंत कुमार
हेमंत कुमार मुखोपाध्य जिन्हें हम हेमंत दा के नाम से जानते हैं, 16 जून 1920 को वाराणसी के साधारण से परिवार में जन्में लेकिन बचपन में ही बंगाल में स्थानातरित हो लिए। उनके बड़े भाई कहानीकार थे, माता पिता ने सपना देखा कि कम से कम हेमंत इंजीनियर बनेगें। लेकिन नियति ने तो उनकी तकदीर में कुछ और ही लिखा था। औजारों की टंकार उनके कवि हृदय को कहां बाँध पाती, कॉलेज में आते न आते वो समझ गये थे कि संगीत ही उनकी नियति है और महज तेरह वर्ष की आयु में 1933 में ऑल इंडिया रेडियो के लिए अपना पहला गीत गा कर उन्होंने गीतों की दुनिया में अपना पहला कदम रखा और पहला फ़िल्मी गीत गाया एक बंगाली फ़िल्म 'निमयी संयास' के लिए।

1943 में आये बंग अकाल ने उस समय के हर भारतीय पर अपनी अमिट छाप छोड़ी थी। रबींद्र संगीत का ये महारथी उससे कैसे अछूता रहता। 1948 में उसी अकाल से प्रेरित होकर उन्होंने सलिल चौधरी का लिखा एक गैर फ़िल्मी गीत गाया "गणयेर बधु" । इस गाने से हेमंत दा और सलिल चौधरी जी को बंगाल में इतनी प्रसिद्धी मिली कि फिर कभी पीछे मुड़ कर न देखा, बंगाली फ़िल्मों में बतौर गायक उन्हें टक्कर देने वाला कोई न था।

1951 में उनके मित्र हेमेन गुप्ता बंगाल से बम्बई की ओर चल दिये हिन्दी फ़िल्मों में अपना हाथ आजमाने। हेमेन ने "आनंदमठ" बनाने का फ़ैसला किया और जब उसमें संगीत देने की बात आयी तो उन्होंने हेमंत दा को याद किया। उनके इसरार पर हेमंत दा कलकत्ता से बम्बई आ गये और पहली बार किसी फ़िल्म का संगीत दिया।

सुजलाम-सुफलाम सुनें
देश प्रेम पर आधारित ये फ़िल्म तो इतनी ज्यादा न चली लेकिन लता जी से गवाया हेमंत दा का गाना "सुजलाम सुफलाम…" कौन भूल सकता है। समय के साथ नयी पीढ़ी के संगीत की बदलती रुचि के चलते ये गाना अब रेडियो में भी इतना नहीं बजता। कुछ महीने पहले जब यूनूस जी ने अपने ब्लोग पर इस गाने का जिक्र किया और इसे अपने ब्लोग पर सुनवाया तो इस गाने को वहां से उठाये बिना रह न सके और आज भी अक्सर ये गीत हमारी शामों का साथी बनता है। जितने अच्छे बोल हैं उतना ही मधुर संगीत, और लता जी की आवाज गीत की आत्मा बन गयी।

गीत सुनें

छुपा लो यूँ दिल में


इंसाफ की डगर पे


बेक़रार करके हमें


ज़रा नज़रों से कह दो जी


तुम पुकार लो


ना तुम हमें जानो


जाने वो कैसे लोग थे


तेरी दुनिया में जीने से


या दिल की सुनो
वो कहते हैं न बम्बई है ही ऐसा मायाजाल, जो एक बार आया वो फ़िर जिन्दगी भर मुम्बई का ही हो कर रह जाता है। हेमंत दा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। आनंदमठ से बतौर संगीतकार शुरु हुआ सफ़र कब गायकी की तरफ़ मुड़ गया पता ही न चला। हेमंत दा उस समय के बहुचर्चित हीरो देवानंद की आवाज बन गये। सचिन देव बर्मन के संगीत में पगी उनकी आवाज हर रंग बिखरा सकती थी।
'बीस साल बाद' फ़िल्म के शोख गाने

"बेकरार कर के हमें यूं न जाइए, आप को हमारी कसम लौट आइए"और

" जरा नज़रों से कह दो जी"
आज भी दिल को गुदगुदा देते हैं तो दूसरी तरफ़ 'खामोशी' फ़िल्म में धर्मेंद्र की आवाज बन वहीदा से इसरार " तुम पुकार लो" ,

'ममता' फिल्म का लता मंगेशकर के साथ गाया मेलोडियस गीत 'छुपा लो यूँ दिल में प्यार मेरा' हर एक की जुबान पर है।

'बात रात की' फ़िल्म से "न तुम हमें जानो न हम तुम्हें जानें मगर लगता है कुछ ऐसा मेरा हमदम मिल गया"
इश्क और रोमांस की पराकाष्ठा है।
गुरुदत्त की प्यासा में "जाने वो कैसे लोग थे जिनको…"
या फ़िर हाऊस नं॰ 44 का गीत
"तेरी दुनिया में जीने से तो बेहतर है कि मर जाएं"
सुनते-सुनते किस के मुंह से आह न निकलेगी.

और 'अनुपमा' का 'या दिल की सुनो दुनिया वालों॰॰' धीर-गंभीर मगर मधुर गीत के जिक्र के बिना यह आलेख तो अधूरा ही रहेगा।

गीता दत्त के साथ
जहां बम्बई में आनंदमठ के बाद अनुपमा, जाग्रती, मां-बेटा, मंझली दीदी,साहब बीबी और गुलाम, नागिन जैसी फ़िल्मों में हिट संगीत दे कर हेमंत दा संगीतकार और देवानंद, धर्मेंद्र जैसे कई चोटी के नायकों की आवाज बन सफ़ल गीतकार बन गये थे वहीं उन्होनें बंगाली फ़िल्मों में भी अपनी जादुई आवाज से धूम मचा रखी थी। 1955 में जहां उन्हें हिन्दी फ़िल्मों में बतौर संगीतकार पहला फ़िल्म फ़ेअर अवार्ड मिला, वहीं उसी साल बंगाल के मशहूर नायक उत्तम कुमार के लिए पाशर्व गायक बन उन्होनें एक नयी साझेदारी की नींव रखी जो लंबे दशक तक चली। उनके गैर फ़िल्मी गीत भी उतने लोकप्रिय हुए जितने फ़िल्मी गीत। उनका परचम बंगाली और हिन्दी दोनों फ़िल्म जगत में समान रूप से लहराया। पर हेमंत दा को कहां चैन था। 1959 में उन्होंने अपनी पहली बंगाली फ़िल्म "नील अकशेर नीचे" फ़िल्म बना कर फ़िल्म प्रोडकशन में हाथ आजमाया। कहानी कलकत्ता में रह रहे चीनी फ़ेरीवालों की मुसीबतों पर आधारित थी। पहली ही पिक्चर राष्ट्रपति स्वर्ण पदक से सम्मानित हुई। फ़िर तो उन्होंने हिन्दी में भी कई यादगार फ़िल्में बनायी जैसे बीस साल बाद, कोहरा, बीबी और मकान, फ़रार, राहगीर, और खामोशी, बालिका-वधू। पर हर शह और हर शक्स जो आता है उसे जाना होता है, अस्सी के दशक में उन्हें पहला दिल का दौरा पड़ा। इस दिल के दौरे ने कइयों का दिल तोड़ दिया। हेमंत दा की आवाज पर इस दौरे का गहरा असर पड़ा। इसके बावजूद वो कई एलबम निकालते रहे, म्यूजिक कॉन्सर्टस में भाग लेते रहे लेकिन स्वास्थय उनका साथ नहीं दे रहा था और 26 सितम्बर 1989 को संगीत की दुनिया का ये चमकता हुआ सितारा सदा के लिए लुप्त हो गया और छोड़ गया पीछे यादें। उनके गये 19 साल हो गये लेकिन आज भी ग्रामोफ़ोन कंपनी उनके गाये गीतों की नयी एलबम हर साल निकालती है और हाथों हाथ लपकी जाती है।
हेमंत दा शारीरिक रूप से अब हमारे बीच नहीं है पर उनकी आवाज हमारे दिलों पर आज भी राज करती है। कितने ही गाने हैं जो यहां जोड़ नहीं पाये लेकिन वो मेरी यादों में हिलोरे ले रहे हैं। साहब बीबी गुलाम के गाने कोई भूल सकता है क्या?

----अनिता कुमार


हेमंत कुमार- संक्षिप्त परिचय


हेमंत दा
हिन्दी फ़िल्म जगत में बहु प्रतिभाशाली (multi talented) कलाकारों के नामों की सूचि में हेमंत कुमार या हेमंतदा का नाम सम्मान से लिया जाता है| बंगाली परिवार में जन्मे हेंमत कुमार का नाम हेमंत कुमार मुखोपाध्याय था| अभियात्रिकी (engineering) की पढ़ाई छोड़ संगीत की दुनिया को जानने निकले हेमंत पूरी तरह से संगीत के लिए ही बने रहे | १९३३ से आल इंडिया से शुरुवात करके हेमंत दा ने विदेशों तक सफर तय किया| शुरुवाती बरसों में केवल बंगाली भाषा कि फिल्मों के लिए ही काम करते रहे| गीत गाये, संगीत बनाया| गैर बंगाली फिल्मों में लोकप्रियता इतनी थी कि मशहूर संगीत कंपनी Grampphone Company Of India (GCI) प्रति वर्ष उनका एक गीतों का संग्रह प्रस्तुत करती रही| यह उनके ना रहने के कई सालों तक होता रहा |

बंगला का कोई गायक भला रविन्द्र संगीत से अनछुया कैसे रह सकता है? हेमंत दा ने भी इसके गीत गाये| बंगला फिल्मो में भी गाये| खासकर बंगला के गीत-संगीत के लिए वे मशहूर रहे| बतौर संगीतकार उन्होंने १९४७ में बंगला फ़िल्म 'अभियात्री' में काम किया| १०० से अधिक बंगला फिल्मों में उन्होंने गीत-संगीत के लिए काम किए| बंगाल के इस अनोखे रत्न ने हिन्दी फिल्मो में भी प्रयोग किए|

कुछ अमर कृतियाँ -
प्यासा का गीत - जाने वो कैसे लोग थे ..... या फ़िर ये गीत - ये नयन डरे डरे .... ये जाम भरे भरे ....खामोशी का गीत 'तुम पुकार लो॰॰तुम्हारा इंतज़ार है' । हिन्दी फ़िल्म नागीन (१९५१) में उन्हें संगीत के लिए फ़िल्म फेयर पुरस्कार मिला| उन्होंने सलील चौधरी , सचिन देव बर्मन, गुरुदत्त, देव आनद आदि प्रसिद्ध कलाकारों के साथ काम किया| बंगला गायिका बेला जी के साथ शादी की| उनकी दो संतानें भी संगीत से ही जुड़ी रहीं| अपने जीवन के अन्तिम कुछ बरसों में उन्होंने देश-विदेश में स्टेज शो किए, दूरदर्शन और रेडियो पर अपने कार्यक्रम प्रतुत किए| २६ सितम्बर १९८९ को इस सफल कलाकार ने हमसे विदाई ली |
आज के इस दिन पर हम उनको अपनी भाव पूर्ण श्रद्धाँजली देते हैं|

हिन्दी फिल्मों जिनमें संगीत कार के रूप में काम किए -
खामोशी, गर्ल फ्रेंड, हमारा वतन, नागिन, जागृति, बंदिश, साहिब बीबी और गुलाम , एक झलक , फरार, आनंद मठ, अनजान, अनुपमा, इंसपेक्टर, लगान, पायल, रहीर, सहारा, ताज, उस रात के बाद, यहूदी की लड़की, दो दिल, दो दुनी चार, एक ही रास्ता, फेर्री, इन्साफ कहाँ है, हिल स्टेशन, फैशन, चाँद, चम्पाकली, बंधन, बंदी, सम्राट , सन्नाटा आदि।

अवनीश एस॰ तिवारी की पेशकश

रविवार, 27 जुलाई 2008

पॉडकास्ट कवि सम्मेलन का आमंत्रण अंक

दोस्तो,

जैसाकि हमने वादा किया था कि महीने के अंतिम रविवार को पॉडकास्ट सम्मेलन का प्रसारण करेंगे। इंटरनेट की गति हर एक प्रयोक्ता के पास अलग-अलग है, इसलिए हम एक समान गुणवत्ता नहीं तो रख पाये हैं, मगर फिर भी एक सम्मिलित प्रयास किया है। आशा है आप सभी को पसंद आयेगा।

नीचे के प्लेयर से सुनें।



प्रतिभागी कवि
रंजना भाटिया, दिव्य प्रकाश दुबे, मनुज मेहता, नरेश राणा, शोभा महेन्द्रू, शिवानी सिंह, अनिता कुमार, अभिषेक पाटनी
संचालक- हरिहर झा
उप-संचालक- शैलेश भारतवासी

हमें हरिहर झा, ब्रह्मनाथ त्रिपाठी अंजान और पीयूष पण्डया की भी रिकॉर्डिंग प्राप्त हुई थी, लेकिन उन्हें आसानी से सुन पाना सम्भव नहीं था। इसलिए हम उनका इस्तेमाल नहीं कर सके।

यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें (ऑडियो फ़ाइल तीन अलग-अलग फ़ॉरमेट में है, अपनी सुविधानुसार कोई एक फ़ॉरमेट चुनें)




VBR MP364Kbps MP3Ogg Vorbis


हम सभी कवियों से यह गुज़ारिश करते हैं कि अपनी आवाज़ में अपनी कविता/कविताएँ रिकॉर्ड करके podcast.hindyugm@gmail.com पर भेजें। आपकी ऑनलाइन न रहने की स्थिति में भी हम आपकी आवाज़ का समुचित इस्तेमाल करने की कोशिश करेंगे।

# Podcast Kavi Sammelan. Part 1. Month: July 2008.

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ