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Sunday, August 2, 2009

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत (११)

नोट - आज से रविवार सुबह की कॉफी में आपकी होस्ट होंगी - दीपाली तिवारी "दिशा"

रविवार सुबह की कॉफी का एक और नया अंक लेकर आज हम उपस्तिथ हुए हैं. वैसे तो मन था कि आपकी पसंद के रक्षा बंधन गीत और उनसे जुडी आपकी यादों को ही आज के अंक में संगृहीत करें पर पिछले सप्ताह हुई एक दुखद घटना ने हमें मजबूर किया कि हम शुरुआत करें उस दिवंगत अभिनेत्री की कुछ बातें आपके साथ बांटकर.

फिल्म जगत में अपने अभिनय और सौन्दर्य का जादू बिखेर एक मुकाम बनाने वाली अभिनेत्री लीला नायडू को कौन नहीं जानता. उनका फिल्मी सफर बहुत लम्बा तो नहीं था लेकिन उनके अभिनय की धार को "गागर में सागर" की तरह सराहा गया. लीला नायडू ने सन १९५४ में फेमिना मिस इंडिया का खिताब जीता था और "वोग" मैग्जीन ने उन्हें विश्व की सर्वश्रेष्ठ दस सुन्दरियों में स्थान दिया था.

लीला नायडू ने अपना फिल्मी सफर मशहूर फिल्मकार ह्रशिकेश मुखर्जी की फिल्म "अनुराधा" से शुरु किया. इस फिल्म में उन्होंने अभिनेता बलराज साहनी की पत्नि की भूमिका निभायी थी. अनुराधा फिल्म के द्वारा लीला नायडू के अभिनय को सराहा गया और फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिये राष्ट्रीय पुरुस्कार भी मिला. अपने छोटे से फिल्मी सफर में लीला नायडू ने उम्मींद, ये रास्ते हैं प्यार के, द गुरु, बागी और त्रिकाल जैसी फिल्मों में अभिनय किया. सन १९६३ में प्रदर्शित फिल्म "ये रास्ते हैं प्यार के" ने लीला नायडू को एक अलग पहचान दी. इस फिल्म में अभिनय के बाद वो नारी स्वतंत्रता की प्रतीक बन गयीं. सन १९६३ में ही उन्होंने आइवरी प्रोडक्शन की फिल्म "हाउसहोल्डर" में भी काम किया.

उनके व्यक्तिगत जीवन पर नजर डालें तो कहा जाता है कि वह अपने निजी जीवन में भी उन्मुक्त विचारों की थी. उनके पिता रमैया नायडू आन्ध्रप्रदेश के थे और न्यूक्लियर विभाग में फिजिसिस्ट थे. उनकी माँ फ्रांसिसी मूल की थीं. अपने फिल्मी कैरियर के दौरान ही लीला नायडू ने ओबेरॉय होटल के मालिक मोहन सिंह के बेटे विक्की ओबेरॉय से विवाह कर लिया. उनसे उनकी दो बेटियाँ हैं. बाद में विक्की ओबेरॉय से तलाक हो जाने के बाद लीला नायडू ने अंग्रेजी कवि डॉम मॉरेस से विवाह किया और उनके साथ लगभग दस वर्ष फ्रांस में रहीं. जब कोर्ट ने उनकी दोनों बेटियों का जिम्मा उनसे लेकर विक्की ओबेरॉय को दे दिया तो वह भारत चलीं आयीं. यहाँ लीला नायडू की मुलाकात दार्शनिक जे.कृष्णमूर्ति से हुई. उसके बाद वह आजीवन उन्हीं के साथ रहीं.

लंबे समय तक फिल्मों से दूर रहने के बाद सन १९८५ में श्याम बेनेगल की फिल्म "त्रिकाल" से उनकी बॉलीवुड में वापिसी हुई थी. इसके बाद सन १९९२ में वह निर्देशक प्रदीप कृष्ण की फिल्म "इलैक्ट्रिक मून" में नजर आयीं थीं. यह उनकी आंखिरी फिल्म थी.

कवि बिहारीलाल का एक दोहा है कि "सतसैया कए दोहरे ज्यों नाविक के तीर, देखन में छोटे लगें घाव करं गंभीर" यह दोहा लीला नायडू के छोटे फिल्मी सफर पर भी लागू होता है.लीला नायडू ने छोटे फिल्मी सफर में अपने अभिनय की जो छाप छोडी़ है वो न तो बॉलीवुड भुला सकता है और न ही उनके चाहने वाले. आइये हम सभी सौन्दर्य और अभिनय की देवी को श्रद्धांजंली दें.

अब ऐसा कैसे हो सकता है कि हम आपको लीला जी पर फिमाये गए कुछ नायाब और कुछ दुर्लभ गीत ना सुनाएँ, फिल्म "अनुराधा" (इस फिल्म में बेमिसाल संगीत दिया था पंडित रवि शंकर ने ) और "ये राते हैं प्यार के", दो ऐसी फिल्में हैं जिसमें लीला जी पर फिल्माए गीतों को हम कभी नहीं भूल सकते. चलिए सुनते हैं इन्हीं दो फिल्मों से कुछ नायाब गीत -

जाने जाँ पास आओ न (सुनील दत्त, आशा भोंसले, ये रास्ते हैं प्यार के )


ये रास्ते हैं प्यार के (आशा भोंसले, शीर्षक)


आज ये मेरी जिन्दगी (आशा भोंसले, ये रास्ते हैं प्यार के)


ये खामोशियाँ (रफी- आशा, ये रास्ते हैं प्यार के, एक बेहद खूबसूरत प्रेम गीत)


सांवरे सांवरे (लता, अनुराधा)


कैसे दिन बीते (लता, अनुराधा)


और एक ये बेहद दुर्लभ सा गीत भी सुनिए -
गुनाहों का दिया हक (ये रास्ते हैं प्यार के)


रक्षा बंधन पर हमने चाहा था कि आप अपने कुछ संस्मरण बांटे पर अधिकतर श्रोता शायद इस परिस्तिथि के लिए तैयार नहीं लगे, स्वप्न जी ने कुछ लिखा तो नहीं पर अपने भाई जो अब इस दुनिया में नहीं हैं उन्हें याद करते हुए उनके सबसे पसंदीदा गीत को सुनवाने की फरमाईश की है. हमें यकीन है कि उनके आज जहाँ कहीं भी होंगे अपनी बहन की श्रद्धाजंली को ज़रूर स्वीकार करेंगें -

कोई होता जिसको अपना (किशोर कुमार, मेरे अपने)


हमलोग शुरु से ही संयुक्त परिवार में रहे. परिवार में सगे रिश्तों के अलावा ऐसे रिश्तों की भी भीड़ रही जिनसे हमारा सीधा-सीधा कोई नाता न था. यानी कि हमारा एक भरा-भरा परिवार था. हमारे यहाँ सभी तीज-त्यौहार बहुत ही विधि विधान से मनाये जाते थे. रक्षाबंधन भी इन्हीं में से एक है. मुझे आज भी याद है क मेरे ताऊजी, पापाजी तथा चाचाजी किस तरह सुबह से ही एक लम्बी पूजा में शामिल होते थे और उस दौरान नया जनेऊ पहनना आदि रस्में की जाती थीं. तरह-तरह के पकवान बनते थे. लेकिन हम बच्चे सिर्फ उनकी खुशबू से अपना काम चलाते थे क्योंकि माँ बार-बार यह कहकर टाल देती थी कि अभी पूजा खत्म नही हुई है. पूजा के बाद राखी बाँधकर खाना खाया जायेगा. उस समय तो अपने क्या दूर-दूर के रिश्तेदार भी राखी बँधवाने आते थे. आज बहुत कुछ बदल गया है. अब तो सगे भाई को भी राखी बाँधने का मौका नहीं मिलता है. खैर चलिए चलते चलते सुनते चलें रंजना भाटिया जी की पसंद का ये गीत जो इस रक्षा बंधन पर आप सब की नज़र है-

चंदा रे मेरे भैया से कहना (लता, चम्बल की कसम)


सभी भाई -बहनों के लिए ये रक्षा बंधन का पर्व मंगलमय हो इसी उम्मीद के साथ मैं दिशा आप सब से लेती हूँ इजाज़त.

प्रस्तुति - दीपाली तिवारी "दिशा"


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

Monday, July 27, 2009

रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ...सुनील दत्त का दर्द, रफी के स्वर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 153

'दस चेहरे एक आवाज़ - मोहम्मद रफ़ी' के तहत आज जिस चेहरे पर रफ़ी साहब की आवाज़ सजने वाली है, उस चेहरे का नाम है सुनिल दत्त। सुनिल दत्त उन अभिनेताओं में से हैं जिनका कई गायकों ने पार्श्व-गायन किया है जैसे कि तलत महमूद, मुकेश, किशोर कुमार, महेन्द्र कपूर, और रफ़ी साहब भी। रफ़ी साहब की आवाज़ और दत्त साहब के अभिनय से सजी एक बेहद मशहूर फ़िल्म रही है 'ग़ज़ल'. १९६४ में बनी यह फ़िल्म एक मुस्लिम सामाजिक फ़िल्म थी। ज़ाहिर है ऐसे फ़िल्मों में उर्दू शायरी का बड़ा हाथ हुआ करता है और यह फ़िल्म भी व्यतिक्रम नहीं है। साहिर लुधियानवी के अशआर, मदन मोहन का संगीत, सुनिल दत्त और मीना कुमारी के अभिनय, तथा रफ़ी साहब की आवाज़, कुल मिलाकर आज यह फ़िल्म यादगार फ़िल्मों में अपना जगह बना चुकी है, और यह जगह इसके गीत संगीत के वजह से ही और ज़्यादा पुख़्ता हुई है। साहिर, मदन मोहन, रफ़ी साहब, ये तीनों अपने अपने क्षेत्र में अग्रणी रहे हैं और आज का प्रस्तुत गीत इन तीनों के संगीत सफ़र का एक महत्वपूर्ण अध्याय रहा है, इसमें कोई शक़ नहीं है। "रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ, ये मुरादों की हसीं रात किसे पेश करूँ"। मदन मोहन के संगीत में और रफ़ी साहब की आवाज़ पर सुनिल दत्त साहब के दो और बेहद मशहूर गीत रहे हैं "तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है" (चिराग़) एवं "आप के पहलू में आ कर रो दिये" (मेरा साया), जिनमें से यह दूसरा गीत आप 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुन चुके हैं।

वेद मदन निर्मित एवं निर्देशित फ़िल्म 'ग़ज़ल' के इस ग़ज़ल का फ़िल्मांकन कुछ इस तरह हुआ है कि सुनिल दत्त और मीना कुमारी एक दूसरे से प्यार करते हैं, लेकिन मीना कुमारी की शादी कहीं और हो रही है। और उसी शादी की महफ़िल में सुनिल दत्त को गीत गाने का अनुरोध किया गया है। अपनी बरबाद मोहब्बत के मज़ार पर खड़े हो कर नाकाम आशिक़ अपने जज़्बात किस तरह से पेश कर सकता है, यह साहिर साहब से बेहतर भला कौन लिख सकता था भला! ऐसा लगता है जैसे साहिर साहब ने अपने ख़ुद के जज़्बात इस गाने में भर दिए हो! "कौन कहता है के चाहत पे सभी का हक़ है, तू जिसे चाहे तेरा प्यार उसी का हक़ है, मुझसे कहदे मैं तेरा हाथ किसे पेश करूँ, ये मुरादों की हसीं रात किसे पेश करूँ"। रफ़ी साहब की आवाज़ में इस ग़ज़ल को थोड़े अलग अंदाज़ में साहिर और मदन साहब ने पेश किया था लता जी की आवाज़ में भी जिसके बोल हैं "नग़मा-ओ-शेर की सौग़ात किसे पेश करूँ, ये छलकते हुए जज़्बात किसे पेश करूँ"। रफ़ी साहब और लता जी के गाये इस ग़ज़ल को सुनकर यह बताना मुश्किल है कि कौन किससे बेहतर है। लता जी की आवाज़ में इसे हम आप तक फिर कभी पहुँचाने की कोशिश करेंगे, लेकिन आज लता जी के उद्‍गार हम आप तक ज़रूर पहुँचा सकते हैं जो उन्होने रफ़ी साहब के बारे में कहा था अमीन सायानी साहब के एक इंटरव्यू में - "रफ़ी साहब बहुत सीधे आदमी थे, बहुत ही सीधे, और उनके मन में कोई छल कपट नहीं था। वो जब बात करते थे तो बहुत सीधे, और बात बहुत कम करते थे। जब कभी मिलते थे तो दो चार शब्द बोल कर चुप हो जाते थे। अच्छा, उनको कभी ग़ुस्सा भी आता था तो ग़ुस्सा भी पता चल जाता था कि इस वक़्त वो नाराज़ हैं। एक दिन मुझे मिले और 'रिकॉर्डिंग' मेरी हो रही थी। तो उस ज़माने में मैने मेहदी हसन साहब को सुना था और मुझे बहुत अच्छे लगते थे गानें उनके। तो मैं कभी 'रिकॉर्डिंग' में उनका कोई गाना गुनगुना रही थी ऐसे ही, तो उन्होने सुन लिया था। तो मेहदी साहब आये बम्बई, और पता चला उनको कि मेहदी हसन आये हैं, तो रफ़ी साहब आये तो उनको ग़ुस्सा आया हुआ था किसी बात पर, तो मुझे कहने लगे कि 'हाँ अभी सुनिए जाके उनको, वो आये हैं ना जिनका गाना आप को बहुत पसंद है'। मैने कहा कि 'रफ़ी साहब, आप को क्या तक़लीफ़ है, आप क्यों इस तरह जल के बात कर रहें हैं?' 'नहीं नहीं नहीं, आप सुनिये ना, आप को तो उनके गानें बहुत अच्छे लगते हैं'। मैने कहा 'अच्छे लगते हैं, आप के भी गानें अच्छे लगते हैं'. 'नहीं नहीं, हमारा क्या है, हम तो फ़िल्मों में गाते हैं'। पर ये था कि मन में कुछ नहीं था। वो दिल के बहुत साफ़ आदमी थे। और किसी बात का शौक नहीं, मैने आप को पहले भी एक मरतबा बताया था कि कोई पान, तम्बाकू, शराब, सिगरेट, कुछ नहीं। सिर्फ़ खाने का शौक था। यह भी मैने सुना था उनके घर में एक दिन कि कभी कभी रात को आते हैं तो फ़्रिज खोल कर जो भी मिलता है खा लेते हैं। पर जितने बीमार थे किसी को नहीं बताते थे। उनको बहुत प्रेशर की तक़लीफ़ थी, कभी कभी 'रिकॉर्डिंग' में पता चलता था, उनकी शक्ल बदल जाती थी, पर बताते नहीं थे, गाते रहते थे। और अमीन साहब, कभी कभी इतने अच्छे लोगों के साथ भी कुछ ऐसे लोग मिलते हैं, घरवाले, कि उनकी तरफ़ किसी का ध्यान नहीं था, उन्हे किसी ने सम्भाला नहीं, नहीं तो रफ़ी साहब और देर तक रहते!" रफ़ी साहब आज ज़रूर हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़ के विविध रंग और उनका नूर हमेशा हमेशा फ़िल्म संगीत के ख़ज़ाने को चमकाता रहेगा, रंगीन करता रहेगा, सुनिये "रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ"। हम भी पेश कर रहे हैं रफ़ी साहब की प्रतिभा को श्रद्धांजली।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा दूसरा (पहले गेस्ट होस्ट हमें मिल चुके हैं शरद तैलंग जी के रूप में)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. एक मासूम सा प्रेम गीत रफी साहब का गाया.
2. कलाकार हैं -"राजेंद्र कुमार".
3. मुखड़े में शब्द है - "नाराज़".

सुनिए/ सुनाईये अपनी पसंद दुनिया को आवाज़ के संग -
गीतों से हमारे रिश्ते गहरे हैं, गीत हमारे संग हंसते हैं, रोते हैं, सुख दुःख के सब मौसम इन्हीं गीतों में बसते हैं. क्या कभी आपके साथ ऐसा नहीं होता कि किसी गीत को सुन याद आ जाए कोई भूला साथी, कुछ बीती बातें, कुछ खट्टे मीठे किस्से, या कोई ख़ास पल फिर से जिन्दा हो जाए आपकी यादों में. बाँटिये हम सब के साथ उन सुरीले पलों की यादों को. आप टिपण्णी के माध्यम से अपनी पसंद के गीत और उससे जुडी अपनी किसी ख़ास याद का ब्यौरा (कम से कम ५० शब्दों में) हम सब के साथ बाँट सकते हैं वैसे बेहतर होगा यदि आप अपने आलेख और गीत की फरमाईश को hindyugm@gmail.com पर भेजें. चुने हुए आलेख और गीत आपके नाम से प्रसारित होंगें हर माह के पहले और तीसरे रविवार को "रविवार सुबह की कॉफी" शृंखला के तहत. आलेख हिंदी या फिर रोमन में टंकित होने चाहिए. हिंदी में लिखना बेहद सरल है मदद के लिए यहाँ जाएँ. अधिक जानकारी ये लिए ये आलेख पढें.


पिछली पहेली का परिणाम -
४४ अंकों के साथ स्वप्न जी मंजिल के और करीब आ चुकी है. दूर दूर तक आपका कोई प्रतिद्वंधी नहीं है. बहुत बधाई. मनु जी, पराग जी, शमिख जी और शरद जी आप सब से भी अनुरोध है कि रक्षा बंधन से जुडी अपनी यादें और पसंद के गीत हमें जल्द से जल्द लिख कर भेजें. शुरुआत आप सब खुद से कीजिये बाद में अपने साथियों को भी जोडीये, यकीन मानिये ये एक बहुत अच्छा आयोजन साबित होगा.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, June 11, 2009

नदी नारे न जाओ श्याम पैयां पडूँ...जयदेव ने दिया इस लोक गीत को नया जन्म

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 108

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के हीरक जयंती पर्व और फिर उसके बाद राज कपूर विशेषांकों के बाद आज हम वापस लौट आये हैं हमारे नियमित अंक पर। दोस्तों, अगर हम डाकुओं पर बनी फ़िल्मों की बात करें तो सबसे पहले जिस फ़िल्म का नाम हमारे ज़हन मे आता है वह है 'शोले'। इस फ़िल्म मे गब्बर सिंह के रूप में अमजद ख़ान ने वह इतिहास रचा है कि फिर उनके बाद किसी ने भी डाकू की ऐसी सशक्त भूमिका अदा नहीं की। 'शोले' ७० के दशक की फ़िल्म थी। लेकिन अगर हम एक दशक पीछे की ओर जायें, तो उस ज़माने मे डाकू के रूप मे सुनिल दत्त साहब का नाम बड़ा मशहूर था। उनकी ऐसी तमाम फ़िल्मों में जो फ़िल्म सब से ज़्यादा मशहूर हुई वह थी 'मुझे जीने दो'। १९६३ मे बनी इस फ़िल्म का निर्माण भी सुनिल दत्त और उनके भाई सोम दत्त ने मिलकर किया था। यह उनकी दूसरी फ़िल्म थी बतौर निर्माता, पहली फ़िल्म थी 'ये रास्तें हैं प्यार के' जो १९६३ मे ही बनी थी। 'मुझे जीने दो' की कहानी यह दर्शाती है कि किस तरह प्यार की कोमलता कट्टर से कट्टर डाकू को भी ज़िंदगी की सही राह पर वापस ले जा सकती है। यह कहानी है डाकू जरनैल सिंह (सुनिल दत्त) और चमेली (वहीदा रहमान) की। डाकुओं के लिए मशहूर मध्य प्रदेश के चंबल घाटी में ही इस फ़िल्म के कई दृश्य फ़िल्माये गये थे, जिससे इस फिल्म की जीवंतता और भी बढ़ गयी थी। मोनी भट्टाचार्य निर्देशित इस फ़िल्म के संगीतकार थे जयदेव और गीतकार थे साहिर लुधियानवी। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' मे सुनिए इसी फ़िल्म से आशा भोंसले का गाया एक गीत।

चमेली के रूप में वहीदा रहमान का अभिनय भी सराहनीय रहा इस फ़िल्म में। लेकिन सुनिल दत्त साहब ही मैदान मार गये और उन्हे इस फ़िल्म के लिए उस साल के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार मिला। इस फ़िल्म से जुड़ी पुरस्कारों की बात करें तो फ़िल्म के निर्देशक का नाम उस साल के 'कान्स फ़िल्म महोत्सव' के लिए मनोनीत किया गया था। और अब आते हैं आज के गीत पर। यूँ तो आशा भोंसले की आवाज़ हर तरह के गानों के लिए नम्बर वन है, लेकिन जब भी लोक शैली मे किसी गीत को गाने की बात आती है तो उनकी आवाज़ से वह खनक, वह लचीलापन, वह शरारत छलकने लगती है कि गीत को सुनते हुए हम वाक़ई भारत के किसी सुदूर गाँव में पहुँच जाते हैं। "नदी नारे न जायो श्याम पैंयाँ पड़ूँ" में भी कुछ इसी तरह का जादू बिखेरा है आशाजी ने। शास्त्रीय और लोक संगीत के रंगों से सराबोर इस गीत से जहाँ एक तरफ़ कृष्ण और गोपियों के दृश्य आँखों के सामने आ जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ़ इस गीत में मुजरे के रंग को भी महसूस किया जा सकता है। सुनिये...



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें २ अंक और २५ सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के ५ गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. इस गीत के संगीतकार हैं ब्रिज भूषण.
२. राम अवतार त्यागी के लिखे इस गीत को जिस कलाकार पर फिल्माया गया है उन पर बतौर बाल कलाकार फिल्माया एक गीत ओल्ड इस गोल्ड पर आ चुका है.
३. मुखड़े में शब्द है -"इरादा".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
मंजू जी इस बार आपका जवाब एकदम सही है, पर शरद जी एक बार फिर आपसे पहले आकर बाज़ी मार ही गए. ठीक ६.३० भारतीय समय अनुसार ओल्ड इस गोल्ड पोस्ट आती है, हमें लगता है की थोडी सी फुर्ती दिखा कर आप शरद जी को टक्कर दे पाएंगीं बहरहाल आज के लिए तो शरद जी को बधाई आपके अंक बढ़ कर हुए - १२. जानिए अपने होस्ट सुजॉय के बारे में कुछ दिलचस्प बातें इस साक्षात्कार में यहाँ
खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी

Listen Sadabahar Geetओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.



Thursday, May 14, 2009

जाओ रे जोगी तुम जाओ रे....आम्रपाली के स्वर में लता की सदा...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 80

ह कहानी है भारत के इतिहास के पन्नो से। इस कहानी की शुरुआत होती है वैशाली शहर में जहाँ एक रोज़ एक नारी का आविर्भाव होता है वहाँ के एक आम के बगीचे से। किसी को नहीं पता कि वह कौन है और कहाँ से आयी है। वह बहुत सुंदर थी और नृत्यकला में उसका कोई सानी नहीं था वहाँ पर। शहर में हर पुरुष उसका प्यार जीतना चाहता था। इसलिए उस लड़की ने यह ऐलान किया कि वह कभी किसी से शादी नहीं करेगी और वह पूरे शहर के लिए नृत्य करती रहेगी। दिन गुज़रने लगे, लोग उसे 'आम्रपाली' के नाम से पुकारने लगे क्योंकि वो आम के बगीचे से निकल कर पहली बार शहर में आयी थी। एक दिन अचानक मगध के राजा अजातशत्रु ने वैशाली पर आक्रमण कर दिया। शहर के सारे लोग, जो आम्रपाली के नृत्य में डूबे हुए थे, अब युद्ध के लिए तैयार हो रहे थे। यह देख आम्रपाली का हृदय दर्द से भर उठा। अजातशत्रु के सिपाही मगध की सेना से युद्ध में हारने लगते हैं, तो अजातशत्रु युद्धभूमी से भागकर मगध के सैनिक का भेस धारण कर वैशाली शहर में घुस जाते हैं और इत्तेफ़ाक से आ पहुँचते हैं नर्तकी आम्रपाली के घर। दोनो को एक दूसरे से प्यार हो जाता है, लेकिन अजातशत्रु फिर से वैशाली पर आक्रमण करने की साज़िश रचने लगता है। जब मगध के राजा को इस बात का पता चलता है कि उनकी राज नर्तकी आम्रपाली अजातशत्रु को अपने घर में पनाह दे रखी है तो आम्रपाली को क़ैद कर लिया जाता है और काल-कोठरी में डाल दिया जाता है ता-उम्र के लिए। इस बात पर अजातशत्रु भड़क उठता है और वैशाली पर बुरी तरह से फिर एक बार आक्रमण कर देता है। इस बार वैशाली हार जाता है और चारों तरफ़ मौत ही मौत नज़र आती है। अजातशत्रु आम्रपाली को मुक्त तो करवा देता है लेकिन आम्रपाली अब वो पहलीवाली आम्रपाली नहीं रही। वह संसार की मोह-माया को छोड़ कर भगवान बुद्ध के शरण में चली जाती है अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए। तो दोस्तों, यह थी आम्रपाली की कहानी। इस कहानी को आधार बना कर सन १९६६ में लेख टंडन ने एक फ़िल्म बनाई थी 'आम्रपाली' जिसमें आम्रपाली की भूमिका अदा की थी वैजयंतिमाला ने जो एक अच्छी नृत्यांगना भी थीं और इस चरित्र के लिए जिसकी बहुत ज़रूरत भी थी। और सुनिल दत्त नज़र आये अजातशत्रु के चरित्र में।

ऐतिहासिक और पौराणिक फ़िल्मों के लिए हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री ने जैसे कुछ संगीतकारों को अलग से नियुक्त कर रखा था। एक बार इधर किसी ने पौराणिक फ़िल्मों में संगीत दिया और उधर सामाजिक फ़िल्मों में उनके लिए दरवाज़ा लगभग हमेशा के लिए बंद सा हो गया। यही रीत चली आ रही थी दशकों से हमारे फ़िल्म जगत में। 'आम्रपाली' एक ऐतिहासिक फ़िल्म होते हुए भी इस फ़िल्म के संगीत के लिए किसी पौराणिक फ़िल्म के संगीतकार को नहीं बल्कि शंकर जयकिशन को ही लिया गया था। और इस बेजोड़ संगीतकार जोड़ी ने यह साबित भी किया कि ऐसे फ़िल्मों के लिए भी वो उतना ही असरदार संगीत तैयार कर सकते हैं जितना की किसी दूसरे सामान्य सामाजिक फ़िल्म के लिए। इस फ़िल्म में कुल ५ गीत थे, जिनमें ४ लताजी की एकल आवाज़ में थे और एक गीत समूह स्वरों में था। लताजी के गाए ये चारों गीत अपने आप में 'मास्टरपीसेस' हैं जिन्हे सुनकर दिल को एक अजीब सुकून और शांति मिलती है। इन्ही चार गीतों में से एक गीत आज आप को सुनवा रहे हैं - "जाओ रे जोगी तुम जाओ रे", जिसे लिखा है गीतकार शैलेन्द्र ने। इस गीत से मिलता-जुलता रोशन का स्वरबद्ध किया हुआ एक गीत है 'चित्रलेखा' फ़िल्म में "संसार से भागे फिरते हो भगवान को तुम क्या पायोगे", याद आया न? इस गीत को हम फिर कभी सुनेंगे, आज अब यहाँ पेश है आम्रपाली का गीत, सुनिए और याद कीजिए वैशाली के उस पुरातन युग को जहाँ राज दरबार में राज नर्तकी आम्रपाली नृत्य कर रही है इस गीत पर...



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. हेमंत दा का सदाबहार गीत.
२. इस सस्पेंस थ्रिलर फिल्म का नाम एक अंक से शुरू होता है.
३. पहला अंतरा इन शब्दों पर खत्म होता है -"खुद को बचाईये".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
ओल्ड इस गोल्ड की पहेलियों में पहली बार ऐसा हुआ कि दो गीत जिनके मुखड़ों में सूत्र का शब्द आता है और उनके रचनाकार भी एक ही निकले, कल की पहेली के जवाब में ये दोनों ही गीत हमें रचना जी ने सुझाए...उनमें से कौन सा जवाब सही था ये तो अब आप जान ही चुके हैं....पर रचना जी दाद देनी पड़ेगी आपकी....बहुत बहुत बधाई..नीलम जी कोशिश करते रहिये कभी तो तुक्का भी फिट होगा. हर्षद जी, पराग जी और मनु जी "रुक जा रात..." गीत भी किसी दिन जरूर सुनेंगे हम और आप इस महफिल में.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Tuesday, May 5, 2009

तुम्हीं मेरे मंदिर तुम्हीं मेरी पूजा...पति प्रेम की पवित्र भावनाओं को समर्पित एक गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 71

ज 'ओल्ड इज़ गोल्ड'के लिए हमने जिस गीत को चुना है उसमें एक पत्नी का अपने पति के लिए जो निष्पाप पवित्र प्रेम है उसका वर्णन हुआ है। इस गीत के बोल इतने सुंदर हैं कि जो पति-पत्नी के प्रेम को और भी कई गुना पावन कर देता है। लताजी की दिव्य आवाज़ और संगीतकार रवि का सुमधुर संगीत ने राजेन्द्र कृष्ण के बोलों को और भी ज़्यादा प्रभावशाली बना दिया है। लताजी की आवाज़ एक कर्तव्य-परायन भारतीय नारी के रूप को साकार करती है। और भारतीय नारी का यही रूप प्रस्तुत गीत में भी कूट कूट कर भरा हुआ है। फ़िल्म 'ख़ानदान' का यह गीत है "तुम ही मेरे मंदिर तुम ही मेरी पूजा तुम ही देवता हो"। यूँ तो १९६५ की इस फ़िल्म में मुमताज़, सूदेश कुमार, और प्राण भी थे, लेकिन वरिष्ठ जोड़ी के रूप में सुनिल दत्त और नूतन नज़र आये और यह गीत भी इन दोनो पर ही फ़िल्माया गया है। भारतीय संस्कृति मे पत्नी के लिए पति का रूप परमेश्वर का रूप होता है। आज के समाज में यह कितना सार्थक है इस बहस में हम पड़ना नहीं चाहते, लेकिन इस गीत का भाव कुछ इसी तरह का है। पत्नी की श्रद्धा और प्रेम की मिठास गीत के हर एक शब्द में झलक रहा है। इस गीत में नूतन को अपने बीमार अपाहिज पति (सुनिल दत्त) को बहलाते हुए दिखाया गया है। जैसे जैसे गीत आगे बढ़ता है, वह एक लोरी की शक्ल ले लेती है। "बहुत रात बीती चलो मैं सुला दूँ, पवन छेड़े सरगम मैं लोरी सुना दूँ" लाइन के ठीक बाद लताजी जिस नरमोनाज़ुक अंदाज़ में बिना बोलों के गुनगुनाती हैं, उसका असर बहुत से बोलों वाले लोरियों से भी कई गुना ज़्यादा है। इस गीत के लिए संगीतकार रवि को उस साल का सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का 'फ़िल्म-फ़ेयर' पुरस्कार मिला था। फ़िल्म 'ख़ानदान' की एक और ख़ास बात यह है कि इस फ़िल्म के एक नहीं बल्कि दो दो गीतों को अमीन सयानी के 'गीतमाला' के वार्षिक कार्यक्रम में स्थान मिला था। आशा भोंसले और मोहम्मद. रफ़ी का गाया "नील गगन पर उड़ते बादल आ" १४-वीं पायदान पर था और प्रस्तुत गीत "तुम्ही मेरे मंदिर" उस साल तीसरे पायदान पर था। दूसरे पायदान के लिए 'हिमालय की गोद में' फ़िल्म का "एक तू ना मिला" और पहले पायदान के लिए 'सहेली' फ़िल्म का "जिस दिल में बसा था प्यार तेरा" गीत चुने गये थे।

अब आपको आज के गीत के संगीतकार रवि और उनके साथ इस गीत के रिश्ते की बात बताते हैं। रवि के संघर्ष के दिनों में उनकी पत्नी ने बहुत दुख-दर्द झेलें हैं और अपने पति की ख़ातिर कई निस्वार्थ त्याग भी किये। इस बात का ज़िक्र रवि ने विविध भारती की एक मुलाक़ात में कई बार किया था। तो जब रविजी से यह पूछा गया कि उनके बनाए गीतों को सुनकर उनकी पत्नी का क्या विचार रहता था, उन्होने कहा था, "हलाँकि वो शब्दों में बयान नहीं करती थी, लेकिन मैं उसके चेहरे से जान जाता था कि वो ख़ुश है। और मुझे जब भी 'फ़िल्मफ़ेयर अवाराड्स‍' मिलते थे तब भी वो बहुत ख़ुश हो जाती थी। मैंने कभी उसके लिए कोई गीत नहीं बनाया, लेकिन उसे 'ख़ानदान' फ़िल्म का गीत "तुम ही मेरे मंदिर तुम ही मेरी पूजा" बहुत पसंद था। वो अकसर कहा करती थी कि इस तरह के गाने और बनने चाहिए।" रविजी की पत्नी कांता देवी का सन् १९८६ में स्वर्गवास हो गया। तो लीजिए रविजी की स्वर्गवासी पत्नी के त्याग और प्रेम को श्रद्धाजंली अर्पित करते हुए आज का यह गीत सुनते हैं।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. इस बेहद सफल संगीतकार जोड़ी में से एक संगीतकार ने अपने बंगले का नाम इसी फिल्म के नाम पर रखा.
२. लता और मुकेश की आवाजों में एक प्यारा सा गीत.
३. गीत शुरू होता है इस शब्द युगल से - "चोरी चोरी"

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
मनु जी एकदम सही जवाब....इस बार तो सभी ने बिलकुल सही जवाब दिया...दिलीप जी, नीलम जी, नीरज जी,संजीव जी सभी को बधाई, पराग जी, फिल्म का नाम बताना अनिवार्य नहीं है....आपने बस गीत का अंदाजा लगाना है. शन्नो जी सही कहा आपने ये गीत वाकई बहुत मजेदार है.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Monday, March 23, 2009

सुन मेरे बन्धू रे, सुन मेरे मितवा....

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 31

किसी सुदूर अनजाने गाँव की धरती से गुज़रती हुई नदी, उसकी कलकल करती धारा, दूर दिखाई देती है एक नाव, और कानो में गूंजने लगते हैं उस नाव पर बैठे किसी मांझी के सुर. अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए वो अपनी ही धुन में गाता चला जाता है. दोस्तों, शहरों में अपने 'कॉंक्रीट' के 'अपार्टमेंट' में रहकर शायद हम ऐसे दृश्य का नज़ारा ना कर सके, लेकिन एक गीत ऐसा है जिसे सुनकर आप उसी नज़ारे को ज़रूर महसूस कर पाएँगे, वही नदी, वही नाव और उसी मांझी की तस्वीर आपकी आँखों के सामने आ जाएँगे, यह हमारा विश्वास है. और वही गीत लेकर आज हम हाज़िर हुए हैं 'ओल्ड इस गोल्ड' की इस महफ़िल में.

भटियाली संगीत, यानी कि बंगाल के नाविकों का संगीत. नाव चलाते वक़्त वो जिस अंदाज़ में और सुर में गाते हैं उसी को भटियाली संगीत कहा जाता है. और बंगाल के लोक संगीत के इसी अंदाज़ में सचिन देव बर्मन ने इस क़दर महारत हासिल की है कि उनकी आवाज़ में इस तरह का गीत जैसे जीवंत कर देता है उसी मांझी को हमारी आँखों के सामने. 1959 में फिल्म "सुजाता" में बर्मन दादा ने ऐसा ही एक गीत गाया था. संख्या के हिसाब से अगर हम देखें तो भले ही दादा ने कम गीत गाए हैं, पर अदायगी और भाव सम्प्रेषणता की दृष्टि से देखें तो ऐसी गायिकी शायद ही किसी और गायक की आवाज़ में सुनने को मिले. और यही कारण है कि एस डी बर्मन के गाए गीत 'कवर वर्ज़न' के शिकार नहीं हुए. बर्मन दादा भले ही संगीतकार के रूप में विख्यात हुए हों लेकिन क्या आपको पता है कि उन्होने फिल्मजगत में अपनी शुरुआत बतौर गायक ही की थी. सन 1941 में संगीतकार मधुलल दामोदर मास्टर के लिए फिल्म "ताज महल" में पहली बार उन्होने गीत गाया था. तो लीजिए आज 'ओल्ड इस गोल्ड' में दादा बर्मन की गायिकी को सलाम करते हुए सुनते हैं उन्ही की आवाज़ में यह भटियाली सुर, फिल्म "सुजाता" से. फिल्म में यह एक पार्श्व-संगीत की तरह बजता है. सुनील दत्त और नूतन नदी के घाट पर खडे हैं और दूर किसी नाव में कोई मांझी यह गीत गा रहा है. तो सुन मेरे बंधु रे...



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. संजीव कुमार और सुलक्षणा पंडित अभिनीत इस फिल्म का ये शीर्षक गीत है.
२. एम् जी हशमत और कल्याण जी आनंद जी की टीम.
३. अंतरे में पंक्ति आती है "चैन मेरा क्यों लूटे..."

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
पारुल ने एक बार फिर रंग जमा दिया. मनु जी और नीरज जी भी बधाई स्वीकारें. ये शायद बहुत आसान था आप सब धुरंधरों के लिए :). नीरज जी तलत साहब पर हमारा आलेख और उनके कुछ ख़ास गीत आप यहाँ सुनें. धुरंधरों की सूची में ममता भी शामिल हो चुकी हैं।

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.




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