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शनिवार, 7 अगस्त 2010

ओल्ड इस गोल्ड - ई मेल के बहाने यादों के खजाने - ०२

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार! 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ानें' - 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के इस साप्ताहिक विशेषांक में आज दूसरी बार हमारी और आपकी मुलाक़ात हो रही है। आज की कड़ी के लिए हमने चुना है हमारी अतिपरिचित और प्यारी दोस्त इंदु पुरी गोस्वामी जी की फ़रमाइश का एक गीत। जी हाँ, वो ही इंदु जी जिनकी बातें हमारे होठों पर हमेशा मुस्कुराहट ले आती है। क्या ख़ूब तरीका है उनका 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के पहेलियों का पहेली के ही रूप में जवाब देने का! लेकिन आज वो ईमेल के बहाने जो गीत हमें सुनवा रही हैं और इस गीत से जुड़ी जो यादें हमारे साथ बांट रही हैं, वो थोड़ा सा संजीदा भी है और ग़मज़दा भी। दरअसल बात ऐसी थी कि बहुत दिनों से ही इंदु जी ने हमसे इस गीत को सुनवाने का अनुरोध एकाधिक बार किया था। लेकिन किसी ना किसी वजह से हम इसे सुनवा नहीं सके। कोई ऐसी शृंखला भी नहीं हुई जिसमें यह गीत फ़िट बैठता। और शायद इसलिए भी क्योंकि अब तक हमें यह नहीं मालूम था कि इंदु जी को यह गीत पसंद किसलिए है। अगर पता होता तो शायद अब तक हम इसे बजा चुके होते। ख़ैर, देर से ही सही, हम तो अब जान गए इस गीत को इतना ज़्यादा पसंद करने के पीछे क्या राज़ छुपा है, आप भी थोड़ी देर में जान जाएँगे। तो लीजिए, अब आगे की बातें पढ़िए इंदु जी के शब्दों में जो उन्होंने हमें लिख भेजा है हमारे ईमेल पते oig@hindyugm.com पर।

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प्रिय सुजोय जी,

नमस्ते!

कोई गाना हमे क्यों अच्छा लगने लगता है कई बार उसके पीछे कोई और कई कारण होते हैं, कई बार कोई भी कारण नही होता। बस अच्छे लगते हैं अपने खूबसूरत शब्दों के कारण, अपने मधुर संगीत के कारण। यह जो गाना है "युंही दिल ने चाहा था रोना रुलाना", इस गाने में ये दोनों चीजें तो है ही, दो कारण और भी हैं -

१. मेरा एक भतीजा था अविनाश- अविनाश पुरी गोस्वामी- २६ साल का। सुन्दर, स्मार्ट, कोंफ़िडेंट। प्यारा सा एक बच्चा भी है उसके, उस समय डेढ़-दो साल का ही था बच्चा। अविनाश को पुराने गानों में से ये गाना बहुत पसंद था। अविनाश अचानक चल बसा। इकलौता बेटा था...... जब भी ये गाना सुनती हूँ, जैसे वो पास आ बैठता है। लगता है यहीं कहीं है और मुझसे बोलेगा 'एक बार और लगाओ ना यही गाना बुआ!'

२. मैं समाजसेवी नही हूँ। किन्तु, कुछ करती रहती हूँ। ऐसा कुछ जो मुझे सुकून दे। अक्सर कहती भी रहती हूँ ना बहुत स्वार्थी औरत हूँ मैं। बस .....इसी कारण.....जिन बच्चों की किसी को जरूरत नही, जिन्हें मरने के लिए फेंक दिया जाता है, उन्हें लोगो को मोटिवेट कर के परिवार, माता-पिता मिल जाये ऐसा कुछ करती रहती हूँ। इन बच्चों को हॉस्पिटल से ही परिवार तक पहुँचाने में परिवार और प्रशासन के बीच जो भी रोल प्ले करना होता है करती हूँ। पिछले दिनों एक बच्चे को परिस्थितिवश घर लाना पड़ गया। 'वे' उसे मार देते या फेंक देते। चार महीने 'वो' नन्हा एंजिल मेरे पास रहा। मेरे पेट पर सोता, करवट लेने पर कमर पर लटका कर सुलाने की आदत डाल दी उसकी। इन सब की उससे ज्यादा मेरी आदत पड़ गई। पहचानने लगा था मुझे। हम सब उसे बहुत प्यार करने लगे थे। किन्तु..... उसके जवान होने और पैरों पर खड़े होने तक मुझे कम से कम जिन्दगी के बाईस पच्चीस साल चाहिए। परिवार की ख़ुशी के लिए भी कई बार...... और वो चला गया, एक बहुत अच्छे घर में जहाँ उसे सब पागलपन की हद तक कर प्यार करते हैं। किन्तु इसी जन्म में मुझे राधे, मीरा और यशोदा का जीवन दे गया। सुजॊय! ये सब तुम्हे मेरा पागलपन लगे किन्तु......हर बार कृष्ण ऩे मुझे और मेरी गोद को ही क्यों चुना या चुनते हैं और छोड़ कर चले जाते हैं कभी वापस ना लौटने के लिए? उसे याद करके रो भी नही सकती। मेरा ये सब काम करना बंद करवा देंगे सब मिल कर। इसलिए ये गाना एक बहाना बन जाता है मेरे लिए उसे याद करने का या फूट फूट कर रोने का। क्या कहूँ? नही मालूम ईश्वर क्या चाहता है मुझसे पर सोचती हूँ कैसे जी होगी यशोदा या राधा अपने कृष्ण के जाने के बाद? मैं तो जी रही हूँ....कि फिर ईश्वर किसी कृष्ण को मेरी गोद में भेजेगा और रोने के लिए यही गीत फिर एक बहाना बन जायेगा मेरे लिए कि "यूँही दिल ऩे चाहा था रोना रुलाना, तेरी याद तो बन गई एक बहाना"।

चाहो तो मेरी पसंद के ये कारण बता देना और चाहो तो एडिट कर कोई खूबसूरत बहाना बना देना, पर..........सच तो यही है.

प्यार,

तुम्हारी दोस्त,

इंदु



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इंदु जी, मेरे पास कोई शब्द नहीं है, मेरी उंगलियाँ की-बोर्ड पर नहीं चल पा रहे हैं। शायद ही कोई होगा जिसकी आँखें इस वक़्त आपकी इन बातों को पढ़कर नम नहीं हुई होंगी! हम आपके जिस इमेज से वाक़ीफ़ हैं, आपकी शख़्सीयत का यह दूसरा पहलू जानकर जितन आश्चर्य हुआ, उससे कई गुणा ज़्यादा हमारे दिल में आपकी इज़्ज़त और बढ़ गई। क्या कहूँ, यह गीत मुझे भी बेहद बेहद बेहद पसंद है (मैंने आपसे पहले भी ज़िक्र किया था इस बारे में), और हर बार इस गीत को सुनते हुए मेरी आँखें नम हो जाती रही हैं। लेकिन आज तो गीत सुने बग़ैर ही आँखें छलक रही हैं। अब तो इस गीत के साथ आपका नाम भी इस तरह से जुड़ गया है कि अब आगे से जब भी इस गीत को सुनूँगा, आपका ख़याल ज़रूर आएगा। आपके इन अनमोल बच्चों के लिए कुछ करने के प्रयास में अगर मैं आपकी कोई सहायता हर सकूँ तो मुझे अत्यन्त ख़ुशी होगी। लीजिए आप भी सुनिए और हमारे सभी श्रोताओं, आप सब भी सुनिए इंदु जी की पसंद पर फ़िल्म 'दिल ही तो है' से सुमन कल्याणपुर का गाया साहिर की रचना, संगीत रोशन का है। हम सभी की तरफ़ से अविनाश को स्मृति-सुमन और उस "नन्हे एंजिल" को एक उज्ज्वल भविष्य के लिए ढेरों शुभकामनाएँ। और हाँ इंदु जी, एक और बात, आप जैसे लोग ही इस दुनिया में रहने के क़ाबिल भी हैं और हक़दार भी, यकीन मानिए.....

गीत - युंही दिल ने चाहा था रोना रुलाना


तो ये था आज का 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने'। हमारे पास इंदु जी को शुक्रिया अदा करने के लिए शब्द नहीं है जिन्होंने अपने जीवन की ये महत्वपूर्ण अनुभव हम सभी के साथ बांटी।

दोस्तों, इंदु जी की तरह अगर आपके जीवन में भी इस तरह के ख़ास अनुभव है, जिन्हें अब तक आपने अपने दिल में ही छुपाए रखा, शायद अब वक़्त आ गया है कि आप पूरी दुनिया के साथ उन्हें बांटे और अपना जी हल्का करें। तो देर किस बात की, जल्द से जल्द हमें लिख भेजिए अपने जीवन के यादगार अनुभव, खट्टे-मीठे अनुभव, जो कभी आपको हँसाते भी हैं और कभी वो यादें आपको रुला भी जाती हैं। ज़िंदगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो मुक़ाम, वो फिर नहीं आते, लेकिन उनकी यादें तो हमेशा हमेशा के लिए हमारे साथ रह जाती हैं जिन्हे हम बार बार याद करके उन पलों को, उन लम्हों को, उन अनुभवों को जीते हैं। और इन्ही यादों के ख़ज़ाने को ईमेल के बहाने समृद्ध करने के लिए हमारा यह एक छोटा सा प्रयास है आपके मनपसंद स्तंभ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के टीम की तरफ़ से। हमें ईमेल कीजिए oig@hindyugm.com के पते पर। और याद रहे, हम आपके ईमेल का बेसबरी से इंतेज़ार कर रहे हैं। अब आज के लिए इजाज़त दीजिए, कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नियमीत अंक के साथ पुन: हाज़िर होंगे, नमस्कार!

प्रस्तुति: सुजॊय चटर्जी

शनिवार, 31 जुलाई 2010

'ओल्ड इज़ गोल्ड' - ई-मेल के बहाने यादों के ख़ज़ानें - ०१

नमस्कार दोस्तों! आज आप मुझे यहाँ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के स्तंभ में देख कर हैरान ज़रूर हो रहे होंगे कि भई शनिवार को तो 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल नहीं सजती है, तो फिर यह व्यतिक्रम कैसा! है न? दरअसल बात कुछ ऐसी है कि जब से हमने 'ओल इज़ गोल्ड' को दैनिक स्तंभ से बदल कर सप्ताह में पाँच दिन कर दिए हैं, हम से कई लोगों ने समय समय पर इसे फिर से दैनिक कर देने का अनुरोध किया है। हमारे लिए यह आसान तो नहीं था, क्योंकि अपनी रोज़-मर्रा की व्यस्त ज़िंदगी से समय निकाल कर ऐसा करना ज़रा मुश्किल सा हो रहा था, लेकिन आप सब के आग्रह और 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आपकी दिलचस्पी को हम नज़रंदाज़ भी तो नहीं कर सकते थे। इसलिए हमें एक नई बात सूझी। और वह यह कि कम से कम शनिवार को हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल सजाएँगे ज़रूर, लेकिन उस स्वरूप में नहीं जिस स्वरूप में रविवार से गुरुवार तक सजाते हैं। बल्कि क्यों ना कुछ अलग हट के किया जाए इसमें। नतीजा यह निकला कि आज से सम्भवत: हर शनिवार की शाम यह ख़ास महफ़िल सजेगी, जो कहलाएगी 'ओल्ड इज़ गोल्ड - ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ानें'।

'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' एक तरह से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का साप्ताहिक विशेषांक होगा जिसमें बातें होंगी आपकी, आपके मनपसंद गीतों की, उनसे जुड़ी हुई आपकी यादों की। इसके अलावा आप पुराने फ़िल्मों और फ़िल्मी गीतों के बारे में जो भी विचार रखना चाहें इस विशेषांक के लिए भेज सकते हैं। इस स्तंभ में आगे चलकर हम पुराने फ़िल्मी गीतों से जुड़े पहलुयों पर बहस भी करेंगे जैसे कि डिबेट में होता है, और भी कई नई चीज़ें शामिल होंगी इन विशेषांकों में। तो आपको बस इतना करना होगा कि अपने विचार, अपने पसंद के गानें और उनसे जुड़ी बातें और यादें, या फिर फ़िल्म-संगीत से जुड़ी आपका कोई भी अनुभव या संस्मरण या फ़ोटो हमारे ईमेल पते oig@hindyugm.com पर लिख भेजना होगा, और हम उन्हे पेश करेंगे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के इस ख़ास अलबेले, सजीले, सुरीले विशेषांक में जिसका नाम है 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ानें'।

यह तो थी इस विशेषांक के स्वरूप और नियमों की जानकारी। तो आइए अब शुरु किया जाए 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' की पहली कड़ी। आज का यह अंक रोशन है हमारे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के एक वरिष्ठ श्रोता व पाठिका की यादों के उजालों से। आप हैं हम सब की प्यारी गुड्डो दादी, जो रहती हैं अमरीका के शिकागो शहर में। गुड्डो दादी ने समय समय पर हमें टेलीफ़ोन कर और ईमेल के ज़रिए हमारा हौसला बढ़ाया है, हमारी तारीफ़ें की हैं, और अपनी स्नेहाशीष दी है। दादी से हमें पता चला कि गुज़रे ज़माने के कई फ़िल्मी कलाकारों से उनके परिवार का संबंध रहा है। उनके और उनके परिवार की कई तस्वीरें भी हैं जिनमें फ़िल्म जगत के नामचीन हस्तियों के चेहरे नज़र आ जाते हैं। ऐसी ही एक तस्वीर उन्होने हमें भेजी हैं जिसमें वो नज़र आ रही हैं गायिका सुरिंदर कौर के एक कार्यक्रम का आनंद उठाते हुए.


दरअसल हुआ युं था कि जब हमने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में 'दुर्लभ दस' के अंतर्गत सुरिंदर कौर का गाया फ़िल्म 'नदिया के पार' का गीत सुनवाया था "अखियाँ मिलाके अखियाँ", उसे सुन कर दादी की उस ज़माने की यादें ताज़ा हो गईं, और ईमेल के माध्यम से उन्होने अपने विचार कुछ इस तरह से व्यक्त किये - "आपके पास तो कुबेर का ख़ज़ाना है। सुरिंदर कौर जी का गीत सुनवाकर कहाँ पहुँचा दिया सितारों से आगे! सुरिंदर कौर जी का शो १९६७ में दिल्ली के रिज़र्व बैंक के आगे जिसका चित्र भी भेज रही हूँ। १९५२ से जानती हूँ सुरिंदर कौर जी को और उनकी बहन प्रकाश कौर जी को। इस चित्र में साथ में बेटी है और दूसरी ओर मुंह किये बेटा बैठा है।" दोस्तों, क्योंकि यह अंक यादों के ख़ज़ाने को और ज़्यादा समृद्ध करने का है, और गुड्डो दादी की यादें हम अनुभव कर रहे हैं जो रहती हैं अमरीका में, तो क्यों ना सुरिंदर कौर के गानें किस तरह से 'वॊयस ऒफ़ अमेरिका' पर बजाया गया था ३१ दिसंबर १९९२ को, उसका एक ज़िक्र यहाँ पेश किया जाए। यह जानकारी हमने प्राप्त की है 'लिस्नर्स बुलेटिन' के अंक-९१ से जो प्रकाशित हुआ था मार्च १९९३ में। रेडियो सीलोन पर १५-१६ वर्षों तक कार्य करने के बाद १९८४-८५ से Voice of America (VOA), वाशिंगटन में कार्यरत श्रीमती विजयलक्ष्मी डिसेरम एक अनोखी उद्‍घोषिका हैं। वे 'मनोरंजन' एवं 'संगीतकार' कार्यक्रमों में अक्सर हिंदी फ़िल्मों के गायकों, संगीतकारों, निर्माता-निर्देशकों, आदि पर प्रोग्राम पेश करती आईं हैं। ३१ दिसंबर १९९२ को इन्होंने गायिका सुरिंदर कौर के गाए हमेशा जवान गीतों को लेकर एक आकर्षक कार्यक्रम पेश किया था। गायिका के बारे में उन्होंने संगीतकार एस. मोहिंदर तथा 'हिंदी फ़िल्म गीत कोश' के संकलक हर मंदिर सिंह 'हमराज़' के विचार प्रस्तुत कर प्रोग्राम में चार चांद लगा दिए। गायिका सुरिंदर कौर के बारे में नई जानकारी देते हुए 'हमराज़' साहब ने बताया कि उनका गाया प्रथम गीत "इतने दूर है हुज़ूर, कैसे मुलाक़ात हो" (फ़िल्म- प्यार की जीत, '४९) था, न कि "बदनाम ना हो जाए मोहब्बत का फ़साना" (फ़िल्म- शहीद, '४९)। दरअसल 'प्यार की जीत' के लिए ही उन्होंने सब से पहले गीत गाए थे लेकिन उसी वर्ष निर्मित 'शहीद' (जिसमें उन्होंने बाद में गीत गाए) पहले रिलीज़ हो जाने के कारण यह भान्ति पैदा हो गई थी। तो दोस्तों, आइए आज के इस विशेषांक में सुना जाए सुरिंदर कौर की आवाज़ में फ़िल्म 'शहीद' के उसी हिट गीत को जिसके बोल हैं "बदनाम ना हो जाए मोहब्बत का फ़साना"।



तो ये था आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड - ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' जिसमें हमने गुड्डो दादी की यादों का सहारा लेकर गायिका सुरिंदर कौर को याद किया।

और अब एक सूचना: १४ अगस्त शनिवार को स्वतंत्रता दिवस की पूर्वसंध्या पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड - ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ानें' में हम चढ़ाएँगे देश भक्ति रंग। आपको इतना करना है कि इस ख़ास दिन से जुड़ी अपने बचपन की यादों को हमारे साथ बांटिए। कैसे मनाया करते थे इस पर्व को? बचपन में कौन कौन सी देश भक्ति और बच्चों की फ़िल्में देखी है आपने? कौन सा देश भक्ति गीत आपको सब से ज़्यादा पसंद है? देश भक्ति और देश भक्ति फ़िल्मों और गीतों से जुड़ी कोई भी याद, कोई भी संस्मरण आप हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिए अगले ७ दिनों के अंदर। आपकी यादों को हम पूरी दुनिया के साथ बांटेंगे १४ अगस्त की शाम।

अब आज के लिए इजाज़त दीजिए, कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नियमित अंक के साथ पुन: हाज़िर होंगे। मोहम्मद रफ़ी साहब को उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धा सुमन अर्पित हुए और यह भी बताते हुए कि कल के अंक में आप रफ़ी साहब की ही आवाज़ सुनेंगे, आपसे आज विदा ले रहे हैं, नमस्कार!



प्रस्तुति: सुजॊय चटर्जी

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