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Wednesday, December 22, 2010

दीवाना हुआ बादल, सावन की घटा छायी...जब स्वीट सिक्सटीस् में परवान चढा प्रेम

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 554/2010/254

जीव जगत की तमाम अनुभूतियों में सब से प्यारी, सब से सुंदर, सब से सुरीली, और सब से मीठी अनुभूति है प्रेम की अनुभूति, प्यार की अनुभूति। यह प्यार ही तो है जो इस संसार को अनंतकाल से चलाता आ रहा है। ज़रा सोचिए तो, अगर प्यार ना होता, अगर चाहत ना होती, तो क्या किसी अन्य चीज़ की कल्पना भी हम कर सकते थे! फिर चाहे यह प्यार किसी भी तरह का क्यों ना हो। मनुष्य का मनुष्य से, मनुष्य का जानवरों से, प्रकृति से, अपने देश से, अपने समाज से। दोस्तों, यह 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल है, जो बुना हुआ है फ़िल्म संगीत के तार से। और हमारी फ़िल्मों और फ़िल्मी गीतों का केन्द्रबिंदु भी देखिए प्रेम ही तो है। प्रेमिक-प्रेमिका के प्यार को ही केन्द्र में रखते हुए यहाँ फ़िल्में बनती हैं, और इसलिए ज़ाहिर है कि फ़िल्मों के ज़्यादातर गानें भी प्यार-मोहब्बत के रंगों में ही रंगे होते हैं। दशकों से प्यार भरे युगल गीतों की परम्परा चली आई है, और एक से एक सुरीले युगल गीत हमें कलाकारों ने दिए हैं। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर इन दिनों आप सुन रहे हैं फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर से चु्ने हुए कुछ सदाबहार युगल गीत 'एक मैं और एक तू' लघु शृंखला के अंतर्गत। यह तो सच है कि केवल दस गीतों में हम सुनहरे दौर के सदाबहार युगल गीतों की फ़ेहरिस्त को समेट नहीं सकते। यह बस एक छोटी सी कोशिश है इस विशाल समुंदर में से कुछ दस मोतियाँ चुन लाने की जो फ़िल्म संगीत के बदलते मिज़ाज को दर्शा सके, कि किस तरह से ३० के दशक से लेकर ८० के दशक तक फ़िल्मी युगल गीतों का मिज़ाज, उनका रूप रंग बदला। ३०, ४० और ५० के दशकों से एक एक गीत सुनने के बाद आज हम क़दम रख रहे हैं ६० के दशक में। ६० का दशक, जिसे हम 'स्वीट सिक्स्टीज़' भी कहते हैं, और इस दशक में ही सब से ज़्यादा लोकप्रिय गीत बनें हैं। इसलिए हम इस दशक से एक नहीं बल्कि तीन तीन युगल गीत आपको एक के बाद एक सुनवाएँगे। इन गीतों का आधार हमने लिया है उन तीन गायिकाओं का जो इस दशक में सब से ज़्यादा सक्रीय रहे। ये गायिकाएँ हैं लता मंगेशकर, आशा भोसले और सुमन कल्याणपुर।

आज के अंक में प्रस्तुत है आशा भोसले और मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ों में फ़िल्म 'कश्मीर की कली' का सदाबहार युगल गीत "दीवाना हुआ बादल, सावन की घटा छायी"। युं तो यह १९६४ की फ़िल्म है, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है जैसे इस फ़िल्म के गीतों पर वक़्त की ज़रा सी भी आंच नहीं लग पायी है। आज भी इस फ़िल्म के तमाम गानें उसी रूप में ब-दस्तूर बजते चले जा रहे हैं जैसे फ़िल्म के प्रदर्शन के दौर में बजे होंगे। ओ. पी. नय्यर के ६० के दशक की शायद यह सफलतम फ़िल्म रही होगी। शम्मी कपूर, शर्मीला टैगोर और नज़ीर हुसैन अभिनीत इस फ़िल्म के गीत लिखे थे एस.एच. बिहारी साहब ने। शक्ति दा, यानी शक्ति सामंत की यह फ़िल्म थी, और आप में से कुछ दोस्तों को याद होगा कि शक्ति दा के निधन के बाद जब हमने उन पर एक ख़ास शृंखला 'सफल हुई तेरी आराधना' प्रस्तुत की थी, उसमें हमने इस फ़िल्म की विस्तारीत चर्चा की थी। आज इस गीत के बारे में बस यही कहना चाहते हैं कि इसके मुखड़े का जो धुन है, वह दरअसल नय्यर साहब ने एक पीस के तौर पर "आँखों ही आँखों में इशारा हो गया" गीत के इंटरल्युड म्युज़िक में किया था। यह १९५६ की फ़िल्म 'सी.आइ.डी' का गीत है, और देखिये इसके ८ साल बाद इस धुन का इस्तमाल नय्यर साहब ने दोबारा किया और यह गीत एक माइलस्टोन बन गया ना केवल उनके करीयर का बल्कि फ़िल्म संगीत के धरोहर का भी। तो आइए अब इस गीत का आनंद उठाते हैं। रुत तो नहीं है सावन की, लेकिन ऐसे मधुर गीतों की बौछार का तो हमेशा ही स्वागत है, है न!



क्या आप जानते हैं...
कि 'कश्मीर की कली' फ़िल्म साइन करने के वक़्त शर्मीला टैगोर की उम्र केवल १४ वर्ष थी।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 5/शृंखला 06
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - किसी अन्य सूत्र की दरकार नहीं.

सवाल १ - लता जी के साथ किस गायक ने दिया है यहाँ - १ अंक
सवाल २ - गीतकार कौन हैं - २ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी बहुत बढ़िया चल रहे हैं इस बार, प्रतिभा जी और रोमेंद्र जी बहुत दिनों में दिखे

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Saturday, January 16, 2010

चैन से हमको कभी आपने जीने न दिया...यही शिकायत रही ओ पी को ताउम्र

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 316/2010/16

ज १६ जनवरी, संगीतकार ओ. पी. नय्यर साहब का जन्मदिवस है। जन्मदिन की मुबारक़बाद स्वीकार करने के लिए वो हमारे बीच आज मौजूद तो नहीं हैं, लेकिन हम उन्हे अपनी श्रद्धांजली ज़रूर अर्पित कर सकते हैं उन्ही के बनाए एक दिल को छू लेने वाले गीत के ज़रिए। नय्यर साहब के बहुत सारे गानें अब तक हमने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में सुनवाया है। आज हम जो गीत सुनेंगे वो उस दौर का है जब नय्यर साहब के गानों की लोकप्रियता कम होती जा रही थी। ७० के दशक के आते आते नए दौर के संगीतकारों, जैसे कि राहुल देव बर्मन, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल आदि, ने धूम मचा दी थी। ऐसे में पिछले पीढ़ी के संगीतकार थोड़े पीछे ही रह गए। उनमें नय्यर साहब भी शामिल थे। लेकिन १९७२ की फ़िल्म 'प्राण जाए पर वचन न जाए' में उन्होने कुछ ऐसा संगीत दिया कि इस फ़िल्म के गानें ना केवल सुपरहिट हुए, बल्कि जो लोग कहने लगे थे कि नय्यर साहब के संगीत में अब वो बात नहीं रही, उनके ज़ुबान पर ताला लगा दिया। आशा भोसले की आवाज़ में इस फ़िल्म का "चैन से हमको कभी आप ने जीने ना दिया, ज़हर जो चाहा अगर पीना तो पीने ना दिया" एक कालजयी रचना है जिसे लिखा था एस. एच. बिहारी साहब ने और धुन जैसा कि हमने बताया नय्यर साहब का। बड़ा ही नर्मोनाज़ुक संगीत है। नय्यर साहब का आम तौर पर जिस तरह का जोशीला और थिरकता हुआ संगीत रहता था, उसके बिल्कुल विपरीत अंदाज़ का यह गाना है। बहुत ही मीठा है और इसके बोल तो दिल को चीर कर रख देते हैं। आज सुनिए इसी कालजयी रचना को, इस बेमिसाल तिकड़ी, यानी कि एस. एच. बिहारी, ओ. पी. नय्यर, और आशा भोसले को सलाम करते हुए।

ओ. पी. नय्यर और आशा भोसले ने साथ साथ फ़िल्म संगीत में एक लम्बी पारी खेली है। करीब करीब १५ सालों तक एक के बाद एक सुपर डुपर हिट गानें ये दोनों देते चले आए हैं। कहा जाता है कि प्रोफ़ेशनल से कुछ हद तक उनका रिश्ता पर्सनल भी हो गया था। ७० के दशक के आते आते जब नय्यर साहब का स्थान शिखर से डगमगा रहा था, उन दिनों दोनों के बीच भी मतभेद होने शुरु हो गए थे। दोनों ही अपने अपने उसूलों के पक्के। फलस्वरूप, दोनों ने एक दूसरे से किनारा कर लिया सन् १९७२ में। इसके ठीक कुछ दिन पहले ही इस गीत की रिकार्डिंग् हुई थी। दोनों के बीच चाहे कुछ भी मतभेद चल रहा हो, दोनों ने ही प्रोफ़ेशनलिज़्म का उदाहरण प्रस्तुत किया और गीत में जान डाल दी। फ़िल्म के रिलीज़ होने के पहले ही इस फ़िल्म के गानें चारों तरफ़ छा गए। ख़ास कर यह गीत इतना ज़्यादा लोकप्रिय हो गया था कि फ़िल्मफ़ेयर पत्रिका ने आशा भोसले को उस साल के अवार्ड फ़ंकशन के लिए 'सिंगर ऒफ़ दि ईयर' चुन लिया। लेकिन दुखद बात यह हो गई कि आशा जी नय्यर साहब से कुछ इस क़दर ख़फ़ा हो गए कि वो ना केवल फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड लेने नहीं आईं, बल्कि इस फ़िल्म से यह गाना भी हटवा दिया जब कि गाना रेखा पर फ़िल्माया जा चुका था। फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड फ़ंकशन में नय्यर साहब ने आशा जी का पुरस्कार ग्रहण किया, और ऐसा कहा जाता है कि उस फ़ंकशन से लौटते वक़्त उस अवार्ड को गाड़ी से बाहर फेंक दिया और उसके टूटने की आवाज़ भी सुनी। कहने की आवश्यकता नहीं कि आशा और नय्यर के संगम का यह आख़िरी गाना था। समय का उपहास देखिए, इधर इतना सब कुछ हो गया, और उधर इस गीत में कैसे कैसे बोल थे, "आप ने जो है दिया वो तो किसी ने ना दिया", "काश ना आती अपनी जुदाई मौत ही आ जाती"। ऐसा लगा कि आशा जी नय्यर साहब के लिए ही ये बोल गा रही हैं। बहुत अफ़सोस होता है यह सोचकर कि इस ख़ूबसूरत संगीतमय जोड़ी का इस तरह से दुखद अंत हुआ। ख़ैर, सुनिए यह मास्टरपीस और सल्युट कीजिए ओ. पी. नय्यर की प्रतिभा को!



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

जिस राह हम बिछड़े थे,
उस मोड़ पे कभी मिलना,
ये धूप छाया बन जाएगी,
मत पूछना कहाँ,साथ चलना...

अतिरिक्त सूत्र - कल इस बहतरीन गीतकार का जन्मदिन भी है जिन्होंने इस गीत को लिखा है

पिछली पहेली का परिणाम-
इंदु जी आपने टक्कर दे रखी शरद जी को तगड़ी....२ अंकों के लिए बधाई...

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, December 22, 2009

यही वो जगह है, यही वो फिजायें....किसी की यादों में खोयी आशा की दर्द भरी सदा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 298

रद तैलंग जी के पसंद के ज़रिए आज बहुत दिनों के बाद हम लेकर आए हैं आशा भोसले और ओ. पी. नय्यर साहब की जोड़ी का एक और सदाबहार नग़मा। फ़िल्म 'ये रात फिर ना आएगी' का यह गीत "यही वो जगह है, ये ही वो फ़िज़ाएँ" इस जोड़ी का एक बहुत ही महत्वपूर्ण गीत है। बीती पुरानी यादों को उसी जगह पे जा कर फिर से एक बार जी लेने की बातें हैं इस गीत में। एस. एच. बिहारी साहब ने ऐसे जज़्बाती बोल लिखे हैं कि सुन कर दिल भर आता है। इस गीत के साथ हर कोई अपने आप को कनेक्ट कर सकता है। ख़ास कर वो लोग तो ज़रूर महसूस कर पाएँगे जो कभी अपने घर से दूर किसी जगह पर जा कर रहे होंगे और वहाँ पर कई रिश्ते भी बनाएँ होंगे, दोस्त बनाए होंगे, प्यार पाया होगा। और फिर जब उस जगह को छोड़ कर चले जाना पड़ा तो बस यादें ही साथ में वापस गईं। और फिर कई बरस बाद जब उसी जगह पर वापस लौटे तो सब कुछ बदला हुआ सा पाया। अगर कुछ वैसे का वैसा था तो बस दिल में उन बीते दिनों की यादें। "यही पर मेरा हाथ में हाथ लेकर कभी ना बिछड़ने का वादा किया था, सदा के लिए हो गए हम तुम्हारे गले से लगा कर हमें ये कहा था, कभी कम ना होंगी हमारी वफ़ाएँ, यही पर कभी आप हमसे मिले थे"। नय्यर साहब के अनुसार किसी गीत की कामयाबी में ५०% श्रेय गीतकार का होता है, २५% संगीतकार का, और बाकी के २५% में शामिल है गायक और साज़िंदे। इस गीत के बोलों को सुन हम अंदाज़ा लगा सकते हैं कि इस बात में कितनी सच्चाई है।

दोस्तों, इस गीत में सैक्सोफ़ोन मुख्य साज़ के तौर पर इस्तेमाल किया गया है, और आपको पता है इस साज़ को इस गीत में किन्होने बजाया था? वो हैं जानेमाने सैक्सोफ़ोन वादक मनोहारी सिंह। मनोहारी दा ने तमाम संगीतकारों के साथ काम किया है और बहुत सारे हिट गीतों में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। आज बात करते है मनोहारी दा और नय्यर साहब के साथ की। प्रस्तुत गीत के अलावा नय्यर साहब के जिस गीत में उन्होने इस साज़ को मुख्य रूप से बजाया था वह गीत है "है दुनिया उसी की ज़माना उसी का", फ़िल्म 'कश्मीर की कली' में। मनोहारी दा का कहना है कि नय्यर साहब का एक यूनिक स्टाइल है और उनका संगीत बड़ा ही जोशीला हुआ करता था। अगर उन्हे लगा कि टेक ओ.के. है तो किसी की क्या मजाल जो एक और टेक लेने की बात करे! फ़िल्म 'एक बार मुस्कुरा दो' में भी "कितने अटल थे तेरे इरादे" गीत में मनोहारी दा ने सैक्सोफ़ोन बजाया था। फ़िल्म 'ये रात फिर ना आएगी' का यह गीत सैक्सोफ़ोन पर मनोहारी दा ने सन्‍ १९६२ में दिल्ली के उस डिफ़ेन्स शो में बजाया था जिस शो में लता जी ने "ऐ मेरे वतन के लोगों" गाया था, और जिस शो में पंडित नेहरु शामिल थे। मनोहारी दा ने "ऐ मेरे वतन के लोगों" में मेटल फ़्ल्युट बजाया था। इस गीत के बाद वो पीछे बैठे हुए थे। उन्हे नहीं मालूम था कि इस शो में आशा जी 'यही वो जगह है" गाने वाली हैं। तो जब आशा जी इस गीत को गाना शुरु किया तो मनोहारी दा अपने आप को रोक नहीं सके और सैक्सोफ़ोन हाथ में लेकर स्टेज पर चले आए और सही वक्त पर बजाना शुरु किया जैसे कि गीत में बजता है। जनता ख़ुशी से पागल हो गई। वापस लौटने पर जब आशा जी ने यह क़िस्सा नय्यर साहब को बताया, तो नय्यर साहब ने एक १०० रुपय का नोट निकाल कर मनोहारी दा के हाथ में थमा दिया। दोस्तों, यह एक यादगार क़िस्सा था लेकिन मुझे इसमें कुछ संशय है। 'ये रात फिर न आएगी' रिलीज़ हुई थी १९६५ में और वह शो हुआ था १९६२ में। तो फिर यह गीत ३ साल पहले कैसे गाया गया होगा उस शो में? ख़ैर जो भी है, नय्यर साहब ने 'दास्तान-ए-नय्यर' शृंखला में इस गीत के बारे में कहा था यह धुन उन्होने मसूरी में बनाई थी। और आश्चर्य की बात देखिए, इस गीत से भी वही पहाड़ी रंग छलकता है। तो आइए, बीते दिनों की यादों में खो जाते हैं आशा भोसले के गाए हुए इस गीत के साथ।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. भारतीय शास्त्रीय संगीत के एक बड़े स्तंभ कहे जा सकते हैं ये महान संगीतकार जिन्होंने रचा इस गीत को.
२. शैलेन्द्र है गीतकार.
३. मुखड़े की पहली पंक्ति में शब्द है -"दिन".

पिछली पहेली का परिणाम -
जी बिलकुल आप सही कह रही हैं, शायद आशा जी को सम्मान इस गीत के लिए नहीं मिला था, पर जवाब आपका एकदम सही है, अब बस आप एक कदम दूर हैं मंजिल से, अवध जी ने सही कहा, हमें आपकी पसंद के गीतसुनना बहुत अच्छा लगेगा

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, November 12, 2009

हमने खायी है मोहब्बत में जवानी की क़सम....ज्ञान साहब का संगीतबद्ध एक दुर्लभ गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 260

फ़िल्म संगीत के इतिहास में अगर हम झाँकें तो ऐसे कई कई नाम ज़हन में आते हैं, जिन नामों पर जैसे वक़्त की धूल सी चढ़ गई है, और रोज़ मर्रा की ज़िंदगी में जिन्हे हम आज बड़ी मुश्किल से याद करते हैं। लेकिन एक वक़्त ऐसा था जब ये फ़नकार, कम ही सही, लेकिन अपनी प्रतिभा के जौहर से फ़िल्म संगीत के विशाल ख़ज़ाने को अपने अपने अनूठे ढंग से समृद्ध किया था। इनमें शामिल हैं फ़िल्म संगीत के पहली पीढ़ी के कई बड़े बड़े संगीतकार भी, जिन्हे आज की पीढ़ी लगभग भुला ही चुकी है। लेकिन संगीत के सच्चे रसिक आज भी उन्हे याद करते हैं, सम्मान करते हैं। और 'ओल्ड इज़ गोल्ड' एक ऐसा मंच है जो फ़िल्म संगीत के सुनहरे दशकों के हर दौर के कलाकारों को समर्पित है। आज एक ऐसे ही गुणी संगीतकार का ज़िक्र कर रहे हैं, आप हैं फ़िल्म संगीत के पहली पीढ़ी के संगीतकार ज्ञान दत्त। ज्ञान दत्त जी का नाम याद आते ही याद आते हैं सहगल साहब के गाए फ़िल्म 'भक्त सूरदास' के तमाम भजन। 'भक्त सूरदास' और ज्ञान दत्त जैसे एक दूसरे के पर्याय बन गए थे। यह ४० का दौर था। फिर धीरे धीरे बदलते दौर के साथ साथ ज्ञान दत्त भी पीछे पड़ते गए और सन् १९५० में उनकी अंतिम "चर्चित" फ़िल्म आई 'दिलरुबा'। हालाँकि इसके बाद भी उन्होने कुछ फ़िल्मों में संगीत दिए लेकिन वो नहीं चले। आज हम सुनवा रहे हैं फ़िल्म 'दिलरुबा' का एक युगल गीत जिसे गाया है गीता रॉय और जी. एम. दुर्रानी ने। इस फ़िल्म में ज्ञान दत्त के स्वरबद्ध गीतों को लिखे डी. एन. मधोक, बूटाराम शर्मा, नीलकंठ तिवारी, एस. एच, बिहारी और राजेन्द्र कृष्ण जैसे गीतकारों ने। इस फ़िल्म के ज़्यादातर गानें गीता रॉय की आवाज़ में थे, लेकिन दो दुर्लभ युगलगानें भी शामिल है। दुर्लभ इसलिए कि इन गीतों में बहुत ही रेयर आवाज़ें मौजूद हैं। गीता जी ने ये दोनों गानें प्रमोदिनी देसाई और जी. एम. दुर्रनी के साथ गाया है। दुर्रनी साहब वाला गीत आज आपकी नज़र कर रहे हैं जिसके बोल हैं "हमने खाई है मोहब्बत में जवानी की क़सम, न कभी होंगे जुदा हम"।

'दिलरुबा' द्वारका खोसला की फ़िल्म थी जिसमें मुख्य कलाकार थे देव आनंद और रेहाना। आज के प्रस्तुत गीत को लिखा था एस. एच. बिहारी ने। बिहारी साहब का पदार्पण फ़िल्म जगत में १९४९ में हुई थी जब अनिल बिस्वास ने उनसे लिखवाया था फ़िल्म 'लाडली' का एक गीत "मैं एक छोटी सी चिंगारी"। मीना कपूर की आवाज़ में इस गीत को फ़िल्म के खलनायिका पर फ़िल्माया गया था। उसके बाद सन् '५० में ज्ञान दत्त ने उनसे 'दिलरुबा' में यह गीत लिखवाया था। बिहारी साहब ने इसी फ़िल्म में एक और गीत भी लिखा था जिसे शमशाद बेग़म, प्रमोदिनी, गी. एम. दुर्रनी और साथियों ने गाया था और इस गाने की अवधि थी कुल ७ मिनट और ४० सेकन्ड्स। ख़ैर, बात करते हैं आज के प्रस्तुत गीत की। पाश्चात्य संगीत संयोजन से समृद्ध इस हल्के फुल्के युगल गीत में उस ज़माने की पीढ़ी का रोमांस दर्शाया गया है। इस भाव पर असंख्य गानें समय समय पर बने हैं। कुछ बातें हमारे समाज की कभी नहीं बदलती है चाहे उसका अंदाज़ बदल जाए। प्यार में क़समें खाने की परंपरा सदियों पहले भी थी, इस फ़िल्म के समय भी थी, और आज भी है। लेकिन अंदाज़ ज़रूर बदल गया है। कहाँ है वह मासूमियत जो प्यार में हुआ करती थी उस ज़माने में! आज सब कुछ इतना खुला खुला सा हो गया है कि वह शोख़ी, वह नाज़ुकी, वह मासूमियत कहीं ग़ायब हो गई है। लेकिन हम उसी मासूमियत भरे अंदाज़ का मज़ा आज लेंगे इस गीत को सुनते हुए।

इस गीत को सुनने के बाद आपको एक काम यह करना है कि ५० और ६० के दशकों से कम से कम १० गीत ऐसे चुनने हैं जिसमें प्यार में क़सम खाने की बात कही गई है। हो सकता है कि सब से पहले जवाब देने वाले को हम कोई इनाम भी दे दें, तो ज़रूर कोशिश कीजिएगा, और फिलहाल मुझे आज्ञा दीजिए, नमस्कार!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी, स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. कल से शुरू होगी नन्हे मुन्ने बच्चों को समर्पित श्रृंखला -"बचपन के दिन भुला न देना".
२. शैलेन्द्र ने लिखा था इस गीत को.
३. एक अंतरे की पहली पंक्ति में शब्द है -"रेल".

पिछली पहेली का परिणाम -

शरद जी लगता है बाकी सब पीछे हट गए हैं, क्योंकि शेर तो एक ही सकता है जंगल में....बधाई आप ४४ अंकों पर आ चुके हैं...अरे भाई कोई तो इन्हें टक्कर दो....

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Friday, September 4, 2009

चल बादलों के आगे ....कहा हेमंत दा ने आशा के सुर से सुर मिलाकर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 192

'१० गायक और एक आपकी आशा' की पहली कड़ी में कल आप ने आशा भोसले और तलत महमूद का गाया फ़िल्म 'इंसाफ़' का युगल गीत सुना था। आज भी कल जैसा ही एक नर्म-ओ-नाज़ुक रोमांटिक युगल गीत लेकर हम हाज़िर हुए हैं। आज के गायक हैं हेमंत कुमार। इससे पहले की हम आज के गीत की चर्चा करें, क्योंकि यह शृंखला केन्द्रित है आशा जी पर, तो आशा जी के बारे में पहले कुछ बातें हो जाए! आशा जी ने फ़िल्म जगत में अपना सफ़र शुरु किया था बतौर बाल कलाकार। 'बड़ी माँ' और 'आई बहार' जैसी फ़िल्मों में उन्होने अभिनय किया था। बतौर पार्श्वगायिका उन्हे पहला मौका दिया था संगीतकार हंसराज बहल ने, फ़िल्म थी 'चुनरिया' और साल था १९४८। लेकिन यह फ़िल्म नहीं चली और उनका गाना भी नज़रंदाज़ हो गया। शोहरत की ऊँचाइयों को छूने के लिए उन्हे करीब करीब १० साल संघर्ष करना पड़ा. १९५७ के कुछ फ़िल्मों से वो हिट हो गयीं और १९५८ में बनी 'हावड़ा ब्रिज' के "आइए मेहरबान" गीत से तो वो लोगों के दिलों पर राज करने लगीं। १९४८ की 'चुनरिया' से लेकर १९५८ की 'हावड़ा ब्रिज' तक जिन जिन प्रमुख फ़िल्मों में आशा जी ने गीत गाए, उन पर एक नज़र डालते चलें।

१९४९ - लेख, रुमाल
१९५० - मुक़द्दर, बावरे नन
१९५१ - सब्ज़ बाग़, लचक, जोहरी, मुखड़ा
१९५२ - जलपरी, संगदिल, अलादिन और जादुई चिराग़
१९५३ - परिनीता, एक दो तीन, छम छमा छम, रंगीला, चाचा चौधरी, हुस्न का चोर, गौहर, आग का दरिया, नौलखा हार, शमशीर, पापी
१९५४ - इल्ज़ाम, अलिबाबा और ४० चोर, बूट पालिश, अधिकार, चक्रधारी, धूप छाँव, दुर्गा पूजा, तुल्सीदास, मस्ताना
१९५५ - मधुर मिलन, श्री नकद नारायण, लुटेरा, मुसाफ़िरखाना, इंसानीयत, जशन, नवरात्री, मस्तानी, शिव भक्त, राजकन्या, रेल्वे प्लेट्फ़ार्म, तातर का चोर, हल्लागुल्ला, जल्वा, प्यारा दुश्मन
१९५६ - छू मंतर, कर भला, पैसा ही पैसा, इंद्रसभा, राम नवमी, सबसे बड़ा रुपया, हम सब चोर हैं, क़िस्मत, समुंदरी डाकू, इंसाफ़, गुरु घंटाल, फ़ंटुश, भागमभाग, जल्लाद
१९५७ - नौ दो ग्यारह, तुम सा नहीं देखा, संत रघु दुश्मन, जौनी वाकर, क़ैदी, अभिमान, पेयिंग्‍ गेस्ट, कितना बदल गया इंसान, बड़े सरकार, बंदी, बड़ा भाई, उस्ताद, मिस्टर एक्स, देख कबीरा रोया, एक झलक।

हेमंत कुमार के साथ आशा जी के गाये तमाम गीतों में से आज सुनिए १९५७ की फ़िल्म 'एक झलक' का एक बड़ा ही मधुर गीत "चल बादलों से आगे कुछ और ही समां है, हर चीज़ है निराली हर ज़िंदगी जवाँ है"। उन दिनों हेमंत कुमार अभिनेता प्रदीप कुमार के स्क्रीन वायस हुआ करते थे। दोनों ने अपने अपने बंबई के करीयर की शुरुआत १९५२ की फ़िल्म 'आनंदमठ' से की थी। उसके बाद 'अनारकली' और 'नागिन' जैसी ब्लौक्बस्टर फ़िल्में आईं। १९५७ में भी इस जोड़ी का सिलसिला जारी रहा। दीप खोंसला के साथ मिल कर प्रदीप कुमार ने 'दीप ऐंड प्रदीप प्रोडक्शन्स' की स्थापना की और इस बैनर के तले पहली फ़िल्म का निर्माण किया 'एक झलक'। ज़ाहिर सी बात है कि हेमंत कुमार से वो अपना पार्श्वगायन करवाते। लेकिन संगीत निर्देशन का भी दायित्व हेमंतदा को ही सौंपा गया। प्रदीप कुमार, वैजयंतीमाला और राजेन्द्र कुमार अभिनीत इस फ़िल्म में हेमंत दा ने नायिका के लिए आशा जी की आवाज़ चुनी और गीतों को लिखा एस. एच. बिहारी ने। गीता दत्त के साथ गाए युगल गीत "आजा ज़रा मेरे दिल के सहारे" के अलावा, हेमंत दा ने आशा जी के साथ कम से कम दो ऐसे युगल गीत गाए जो बेहद बेहद पसंद किए गए। उनमें से एक तो आज का प्रस्तुत गीत है, और दूसरा गीत था "ये हँसता हुआ कारवाँ ज़िंदगी का न पूछो चला है किधर"। इन दोनों गीतों में पाश्चत्य संगीत का असर है, लेकिन मेलडी को बरक़रार रखते हुए। यही तो बात थी उस ज़माने की। पाश्चात्य संगीत को अपनाना कोई बुरी बात नहीं है, जब तक वो गीत की मधुरता, शब्दों की गहराई और हमारी शोभनीय संस्कृति के साथ द्वंद न करने लग जाए। हेमंत दा ने जब कभी भी पाश्चात्य संगीत का इस्तेमाल अपने गीतों में किया है, हर बार इन चीज़ों को ध्यान में रखा है। तो चलिए सुनते हैं आज का यह गीत। कल जो बोनस १० अंकों वाला सवाल हमने पूछा था, उसका सही जवाब हम ऐसे नहीं बताएँगे, बल्कि हर रोज़ धीरे धीरे राज़ पर से परदा उठता जाएगा, जैसे जैसे गीत पेश होते जाएँगे।



गील के बोल:
हेमंत: (चल बादलों से आगे
कुछ और ही समा है
हर चीज़ है निराली
हर ज़िंदगी जवाँ है ) \- 2

आशा: (जिसे देखने को मेरी
आँखें तरस रही हैं ) \- 2
वो जगह जहाँ से हरदम
उजला बरस रही है
मेरी ख़्वाब की वो दुनिया
बतलाओ तो कहाँ है
हर चीज़ है निराली
हर ज़िंदगी जवाँ है

हेमंत: चल बादलों से आगे ...


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. कल के गीत आशा के साथ होंगें "मन्ना डे".
२. इस मशहूर फिल्म के नाम में एक रंग का नाम शामिल है.
३. शास्त्रीय संगीत पर आधारित इस गीत को लिखा है नीरज ने.

पिछली पहेली का परिणाम -
हर बार की तरह पराग जी फिर आगे निकल आये हैं २२ अंकों के साथ. बधाई....१० बोनुस अंकों के लिए आप सब ने अच्छी कोशिश की, पर सही जवाब किसी के पास नहीं मिला....खैर ऐसे मौके हम आपको आगे भी देते रहेंगें.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Saturday, August 1, 2009

रहा गर्दिशों में हरदम मेरा इश्क का सितारा...मनोज कुमार की पीडा और रफी साहब की आवाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 158

"याद न जाये बीते दिनों की, जाके न आए जो दिन, दिल क्यों बुलाए उन्हे दिल क्यों बुलाए"। दोस्तों, फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर की यादें इतनी पुरअसर हैं, इतने सुरीले हैं, कि उन्हे भुला पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। भले ही वो दिन फिर वापस नहीं आ सकते, लेकिन ग्रामोफ़ोन रिकार्ड्स, कैसेट्स और सीडीज़ के माध्यम से उन सुरीले दिनों की यादों को क़ैद कर लिया गया है जो सदियों तक उन सुरीले ज़माने की और उस दौर से गुज़रे कलाकारों की सुर साधना से दुनिया की फिजाओं को महकाती रहेंगी। इन सुर साधकों में से एक नाम मोहम्मद रफ़ी साहब का है, जिनकी कल पुण्य तिथि थी। आज ही के दिन सन् १९८० में वो हम से बिछड़ गये थे। जब भी रफ़ी साहब के गाये गीतों की महफ़िल सजती है तो यह दिल ग़मगीन हो जाता है यह सोचकर कि उपरवाले ने इतनी जल्दी क्यों उन्हे हम से अलग कर दिया! अभी तो मानो बस महफ़िल शुरु ही हुई थी, ३० साल पूरे होने जा रहे हैं उनके गये हुए, पर दिल तो आज भी बस यही कहता है उन्ही के गाये 'साज़ और आवाज़' फ़िल्म के उस गीत के बोलों में ढलकर कि "दिल की महफ़िल सजी है चले आइए, आप की बस कमी है चले आइए"। रफ़ी साहब की कमी न आज तक पूरी हो सकी है और लगता नहीं कि आगे भी हो पायेगी। ख़ैर, इन दिनों आप सुन रहे हैं लघु शृंखला 'दस चेहरे एक आवाज़ - मोहम्मद रफ़ी' के अंतर्गत रफ़ी साहब के गाये गानें अलग अलग अभिनेताओं पर फ़िल्माये हुए। आज बारी है अभिनेता मनोज कुमार की। मनोज कुमार के लिए मुकेश और महेन्द्र कपूर ने काफ़ी प्लेबैक किया है, लेकिन रफ़ी साहब के भी कई शानदार गानें हैं जिन पर मनोज साहब ने अभिनय किया है। ऐसी ही एक फ़िल्म है 'दो बदन' जिसके गानें सदाबहार नग़मों में स्थान पाते है। इसी फ़िल्म से आज सुनिये "रहा गर्दिशों में हर दम मेरे इश्क़ का सितारा, कभी डगमागायी कश्ती कभी खो गया किनारा"। रफ़ी साहब ने दो और मशहूर गीत इस फ़िल्म में गाये थे "भरी दुनिया में आख़िर दिल को समझाने कहाँ जायें" और "नसीब में जिसके जो लिखा था", जिन्हे हम फिर कभी आप को सुनवाने की कोशिश करेंगे।

फ़िल्म 'दो बदन' आयी थी सन् १९६६ में जिसका निर्माण किया था शमसुल हुदा बिहारी ने। जी हाँ, ये वही गीतकार एस. एच. बिहारी साहब ही हैं। बिहारी साहब ने बतौर फ़िल्म निर्देशक भी अपना हाथ आज़माया था, फ़िल्म थी 'जोगी'। राज खोसला के निर्देशन में मनोज कुमार के साथ आशा पारेख 'दो बदन' में नायिका के रूप में और सिमि गरेवाल सह-नायिका के रूप में नज़र आयीं थीं। सिमि गरेवाल को इस फ़िल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री का फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार भी मिला था। इस फ़िल्म के गीत संगीत के लिए संगीतकार रवि, गीतकार शक़ील बदायूनी ("नसीब में जिसके जो लिखा था") और गायिका लता मंगेशकर ("लो आ गयी उनके याद") भी फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार के लिए मनोनीत हुए थे। दोस्तों, आज का यह गीत सुनने से पहले जान लेते हैं संगीतकार रवि साहब की बातें रफ़ी साहब के बारे में, जो उन्होने कहे थे विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' शृंखला में - "यह १९४७ की बात है। मैं दिल्ली में था, जश्न-ए-जमुरीयत के मौक़े पर दो कलाकारों को बुलाया गया था - मोहम्मद रफ़ी और मुकेश। मैने पता किया कि वो कहाँ पर ठहरे हुए हैं। पता चला कि फ़तेहपुरी में 'कोरोनेशन होटल' में ठहरे हैं। मैं उनसे मिलने जा रहा था कि किसी ने कहा कि जब वे सुनेंगे कि मैं भी गायक बनने के ख़्वाब से उनसे मिलने गया हूँ तो कहेंगे कि 'हमारे ही पेट पर लात मारने आये हो?' मैने कहा कि 'मैं कहूँगा उनसे कि मैं 'म्युज़िक डिरेक्टर' बनना चाहता हूँ'। तो उसने कहा कि वो पूछेंगे कि ''नोटेशन' आता है क्या?', 'पहले सहायक बनना पड़ेगा', वगेरह वगेरह। ख़ैर, मेरी पहली ही फ़िल्म 'वचन' में उन्होने गाना गाया था "एक पैसा दे दो बाबू"। मैने सोचा कि उनको बता दूँ कि एक बार मैं उनसे दिल्ली में मिलने गया था, लेकिन फिर नहीं बताया। बहुत अच्छे आदमी थी। उस ज़माने में लता का 'रेट' था ५००० रूपए प्रति गीत। एक बार मैं उनके पास गया गाना लेकर और कहा कि 'रफ़ी साहब, गाना अच्छा है पर पैसे नहीं हैं'। उन्होने ज़हीर को बुलाया और कहा कि 'ये जो भी देंगे ले लेना'। एक बार अमरिका से वापस आकर कहने लगे कि 'अमरिका में मैने तुम्हारा फ़लाना गाना गाया, बहुत पसंद किया लोगों ने, मुझे भी अच्छा लगा'।" तो लीजिए दोस्तों, रफ़ी और रवि के संगम से उत्पन्न फ़िल्म 'दो बदन' का नग़मा सुनिये जो फ़िल्माया गया था मनोज कुमार पर। कल रफी साहब की पुण्यतिथि पर रफी साहब के लिए कुछ कहना चाहता था कह न पाया, आज कहता हूँ नौशाद साहब के शब्द उधार लेकर -

"दुखी थे लाख पर तेरी सूरत से हर मुसीबत टल जाता था,
तेरी आवाज़ के शबनम से ग़म का हर धूल धुल जाता था,
तू ही था प्यार का एक साज़ इस नफ़रत की दुनिया में,
गनीमत थी कि एक प्यार का साज़ तो था इस नफ़रत की दुनिया में!"




और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. एक मस्ती भरा गीत रफी साहब का गाया.
2. कलाकार हैं -सदाबहार "देवानंद".
3. मुखडा ख़तम होता है इस शब्द से -"दीवाना".

कौन सा है आपकी पसदं का गीत -
अगले रविवार सुबह की कॉफी के लिए लिख भेजिए (कम से कम ५० शब्दों में ) अपनी पसंद को कोई देशभक्ति गीत और उस ख़ास गीत से जुडी अपनी कोई याद का ब्यौरा. हम आपकी पसंद के गीत आपके संस्मरण के साथ प्रस्तुत करने की कोशिश करेंगें.


पिछली पहेली का परिणाम -
आज फिर बिगुल बजाने का दिन है. ढोल नगाडे बज रहे हैं हमें मिल गयी है हमारी दूसरी विजेता स्वप्न मंजूषा जी के रूप में. बहुत बहुत बधाई आपको. वैसे ये तो लगभग तय ही था. मज़ा तो अब आएगा, ये देखना दिलचस्प होगा कि हमारे तीसरे विजेता पराग जी होंगे या फिर दिशा जी, मनु जी भी हो सकते हैं, एरोशिक (?) भी या फिर डार्क होर्स सुमित भी....स्वप्न जी आप अपनी पसंद के ५ गीत सोचिये और दूर से मज़ा लीजिये इस नए संग्राम का.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, June 22, 2009

बहुत शुक्रिया बड़ी मेहरबानी...ओल्ड इस गोल्ड के सभी श्रोताओं को समर्पित ये गीत.

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 119

हाल ही में हमने आपको एस. एच. बिहारी के बारे में विस्तार से बताया था कि किस तरह से उन्हे एस. मुखर्जी ने १९५४ की फ़िल्म 'शर्त' में पहला बड़ा ब्रेक दिया था। आगे चलकर उनकी कई और फ़िल्मों में बिहारी साहब ने गीत लिखे, और सिर्फ़ लिखे ही नहीं, उन्हे कामयाबी की बुलंदी तक भी पहुँचाया। ऐसी ही एक फ़िल्म थी 'एक मुसाफ़िर एक हसीना'. जॉय मुखर्जी और साधना अभिनीत इस फ़िल्म में ओ. पी. नय्यर का संगीत था। आशा भोंसले और रफ़ी साहब के गाये इस फ़िल्म के तमाम युगल गीतों में तीन गीत जो सबसे ज़्यादा लोकप्रिय हुए, वो थे "मैं प्यार का राही हूँ", "आप युँही अगर हम से मिलती रहीं, देखिये एक दिन प्यार हो जायेगा", और तीसरा गीत था "बहुत शुक्रिया बड़ी मेहरबानी, मेरी ज़िंदगी में हुज़ूर आप आये". यूँ तो एस. एच. बिहारी ने ही इस फ़िल्म के अधिकतर गानें लिखे, लेकिन "आप युँही अगर" वाला गीत राजा मेहंदी अली ख़ान ने लिखा था। आज इस महफ़िल में सुनिये तीसरा युगल गीत। फ़िल्म की कहानी कुछ इस तरह थी कि शादी की रात साधना के घर आतंकवादियों का हमला होता है, जिससे दुल्हन बनी साधना को शादी से पहले ही अपनी रक्षा के लिए घर से भाग जाना पड़ता है। भटकते हुए उसे मिल जाता है एक नौजवान लड़का (जॉय मुखर्जी) जो पीड़ित है ऐम्नेसिया, यानी कि याद्दाश्त जाने की बीमारी से। साधना उसे कई विपत्तियों से बचाती है जिससे कि वो उस पर पूरी तरह से निर्भर हो जाता है, और तभी फ़िल्म में यह गीत आता है कि "बहुत शुक्रिया बड़ी मेहरबानी, मेरी ज़िंदगी में हुज़ूर आप आये"। दोनों में प्यार होता है और इस तरह से फ़िल्म की कहानी आगे बढ़ती है। लेकिन क्या होता है जब नायक की याद्दाश्त वापस आ जाती है तो? यह तो आप ख़ुद ही देख लीजिएगा इस फ़िल्म में।

प्रस्तुत गीत का जो भाव है इस भाव पर समय समय पर कई गीत हमारे गीतकारों ने लिखे हैं। फ़िल्म 'हमसाया' में ही नय्यर साहब ने ऐसा ही एक गीत काम्पोज़ किया था शेवन रिज़्वी का लिखा हुआ और आशा-रफ़ी का ही गाया हुआ, "तेरा शुक्रिया के तूने गले फिर लगा लिया है, मैने दिल के टुकड़े चुन कर नया दिल बना लिया है"। इसके बाद भी कई फ़िल्मों में शुक्रिया और मेहरबानी पर गानें शामिल हुए हैं, लेकिन इनमें से जो सबसे ज़्यादा 'हिट' हुआ था, वह था शाहरूख़ ख़ान की फ़िल्म 'डुप्लीकेट' का गीत "मेरे महबूब मेरे सनम, शुक्रिया मेहरबानी करम"। दोस्तों, हम भी आज के इस प्रस्तुत गीत के बहाने आपका तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करते हैं कि आप इतने दिनों से इस शृंखला को पसंद कर रहे हैं, इसमें सक्रीय रूप से भाग ले रहे हैं, और दिन-ब-दिन इसे आगे बढ़ाते जा रहे हैं। अगर इस शृंखला को और भी ज़्यादा बेहतर और लोकप्रिय बनाने के लिए आपके दिल में कोई विचार या सुझाव हो तो बेझिझक हमसे कहिएगा। फिलहाल सुनिये आज का यह 'गोल्डन' गीत।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें २ अंक और २५ सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के ५ गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. एक बहतरीन दर्दीला नगमा.
२. इसी फिल्म के एक अन्य गीत में "बरेली" का जिक्र हुआ है.
३. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से -"शाम".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी ने १८ अंक प्राप्त कर बढ़त बरकरार रखी है, बधाई हो जनाब, पर स्वप्न जी आप भी बिलकुल पीछे नहीं है. जम कर मुकाबला कीजिये. दिशा जी आप शायद पहली बार आई हैं, जवाब तो सही है पर ज़रा इन धुरंधरों से अधिक फुर्ती दिखाईये तो बात बने. राज जी और निर्मला जी आपके लिए बस यही कहेंगें -"रहना तू है जैसा तू...". शरद जी आपने सही कहा, इन गीतों का नशा ही ऐसा है, हम तो यही चाहेंगें कि ये खुमार कभी न उतरे.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, May 27, 2009

न ये चाँद होगा न तारे रहेंगें...एस एच बिहारी का लिखा ये अनमोल नग्मा गीता दत्त की आवाज़ में.

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 93

ज के 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में प्यार के इज़हार का एक बड़ा ही ख़ूबसूरत अंदाज़ पेश-ए-ख़िदमत है गीता दत्त की आवाज़ में। दोस्तों, आपने ऐसा कई कई गीतों में सुना होगा कि प्रेमी अपनी प्रेमिका से कहता है कि जब तक यह दुनिया रहेगी, तब तक मेरा प्यार रहेगा; और जब तक चाँद सितारे चमकते रहेंगे, तब तक हमारे प्यार के दीये जलते रहेंगे, वगैरह वगैरह । लेकिन आज का जो यह गीत है वह एक क़दम आगे निकल जाता है और कहता है कि भले ही चाँद तारे चमकना छोड़ दें, लेकिन उनका प्यार हमेशा एक दूसरे के साथ बना रहेगा। आप समझ गये होंगे कि हमारा इशारा किस गीत की तरफ़ है। जी हाँ, फ़िल्म 'शर्त' का सदाबहार गीत "न ये चाँद होगा न तारे रहेंगे, मगर हम हमेशा तुम्हारे रहेंगे"। इस गीत को हेमंत कुमार ने भी गाया था लेकिन आज हम गीताजी का गाया गीत आपको सुनवा रहे हैं। गीत का एक एक शब्द दिल को छू लेनेवाला है, जिनसे सच्चे प्यार की कोमलता झलकती है। 'चाँद' से याद आया कि इसी फ़िल्म में 'चाँद' से जुड़े कुछ और गानें भी थे, जैसे कि लता और हेमन्तदा का गाया "देखो वो चाँद छुपके करता है क्या इशारे" और गीताजी का ही गाया एक और गाना "चाँद घटने लगा रात ढलने लगी, तार मेरे दिल के मचलने लगे"। इन गीतों को हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आगे कभी शामिल करने की ज़रूर कोशिश करेंगे।

फ़िल्म 'शर्त' के गीतकार थे शमसुल हुदा बिहारी, यानि कि एस.एच. बिहारी। उन्होने १९५० में फ़िल्म 'दिलरुबा' से अपनी पारी शुरु करने के बाद १९५१ में 'निर्दोश' और 'बेदर्दी', १९५२ में 'ख़ूबसूरत' और 'निशान डंका', तथा १९५३ में 'रंगीला' जैसी फ़िल्मों में गाने लिखे, लेकिन इनमें से कोई भी गीत बहुत ज़्यादा लोकप्रिय नहीं हुआ। उन्हे अपनी पहली महत्वपूर्ण सफलता मिली १९५४ में जब फ़िल्मिस्तान के शशधर मुखर्जी ने उन्हे मौका दिया फ़िल्म 'शर्त' में गाने लिखने का। मुखर्जी साहब ने पहले भी कई कलाकारों को उनका पहला महत्वपूर्ण ब्रेक दे चुके हैं, जिनमें शामिल हैं एस.डी. बर्मन, हेमन्त कुमार, निर्देशक हेमेन गुप्ता और सत्येन बोस। १९५४ में इस लिस्ट में दो और नाम जुड़ गये, एक तो थे गीतकार एस. एच. बिहारी का और दूसरे निर्देशक बिभुती मित्र का। श्यामा और दीपक अभिनीत फ़िल्म 'शर्त' आधारित था अल्फ़्रेड हिचकाक की मशहूर उपन्यास 'स्ट्रेन्जर्स औन दि ट्रेन' पर। जहाँ एक ओर एस.एच. बिहारी साहब को अपनी पहली बड़ी कामयाबी हासिल हुई, वहीं दूसरी ओर संगीतकार हेमन्त कुमार के सुरीले गीतों के ख़ज़ाने में कुछ अनमोल मोती और शामिल हो गये। इससे पहले कि आप यह गीत सुने, ज़रा पहले जान लीजिए कि बिहारी साहब ने १९७० में प्रसारित विविध भारती के 'जयमाला' कार्यक्रम में इस फ़िल्म के बारे में क्या कहा था - "जिस तरह आपकी ज़िंदगी में हर क़दम पर मुश्किलात हैं, हमारी इस फ़िल्मी दुनिया में भी हमें कठिन रास्तों से होकर गुज़रना पड़ता है। मैने असरार-उल-हक़ जैसे शायर को यहाँ से नाकाम लौटते हुए देखा है, उसके बाद उन्ही की शायरी का फ़िल्मी गीतों में नाजायज़ इस्तेमाल होते हुए भी देखा है, और जिन्हे कामयाबी भी हासिल हुई। यह शायरी की कंगाली है जिसे माफ़ नहीं किया जा सकता। मेरी ज़िंदगी में भी धूप छाँव आते रहे हैं। एक बार राजा मेहंदी अली ख़ान साहब मुझे परेशान देखकर कहा कि क्या परेशानी है, मैने अपनी परेशानी बतायी तो वो मुझे एक बाबा के पास ले गये। वहाँ जाकर देखा कि बाबा के दर्शन के लिए मोटरों की क़तारें लगी हुईं हैं। अब देखिए एक ग़रीब रोटी के लिए बाबा के पास गया है तो एक मोटरवाला भी उनके पास गया है। हर किसी को कुछ ना कुछ परेशानी है। ख़ैर, मैं बाबा से मिला, उन्होने मुझे एक चाँदी का रुपया दिया और मेरे बाज़ू पर बाँधने के लिए कहा। मैं उसे बाँधकर मुखर्जी साहब के घर जा पहुँचा। दिन भर इंतज़ार करता रहा पर वो घर पर नहीं थे। भूख से मेरा बुरा हाल था। मैने वह सिक्का अपनी बाज़ू से निकाला और सामने की दुकान में जाकर भजिया खा लिया। फिर मैं मुखर्जी साहब के गेट वापस जा पहुँचा। मुखर्जी साहब गेट पर ही खड़े थे। मैने उन्हे सलाम किया जिसका उन्होने जवाब नहीं दिया, शायद कुछ लोगों की यही अदा होती है! उन्होने मुझसे पूछा कि क्या बेचते हो? मैनें कहा कि मैं दिल के टुकडे बेचता हूँ पर वो नहीं जो फ़िल्मी गीतों में लिखा होता है कि एक दिल के सौ टुकडे हो गये, वगैरह वगैरह। मेरी बातों से वो प्रभावित हो गये। चाँदी का सिक्का तो कमाल नहीं दिखाया पर मेरी ज़ुबान कमाल कर गयी। और आज से १७ साल पहले इस गाने का जनम हुआ, न ये चाँद होगा न तारे रहेंगे, मगर हम हमेशा तुम्हारे रहेंगे।"



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. दिलीप कुमार ने इस फिल्म में उस किरदार को निभाया है जिसे सहगल और शाहरुख़ खान ने भी परदे पर अवतरित किया है.
२. लता की आवाज़ का जादू.
३. मुखड़े में शब्द है -"अदा".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी ने एक बार फिर बाज़ी मार ली, मनु जी, नीलम जी और दिलीप जी, धन्येवाद आप सब श्रोताओं का है जिन्होंने इस आयोजन को इतना सफल बनाया है. दिलीप जी थोडी बहुत प्यास अधूरी रह जाये तो ही मज़ा है वरना मयखानों पे ताले न लग जायेंगें :)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Monday, March 9, 2009

मेरी जान तुम पे सदके...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 18

'ओल्ड इस गोल्ड' की एक और शाम लेकर हम हाज़िर हैं. आज की यह शाम थोडी शायराना है, जिसमें थोड़ी सी रूमानियत है, थोड़ी बेचैनी है, थोड़ी सी प्यास भी है, और थोड़ी सी चाहत भी. 60 के दशक के आखिर में संगीतकार ओ पी नय्यर के स्वरबद्ध गीत कम होने लगे थे. लेकिन जब भी किसी फिल्म को उन्होने अपना पारस हाथ लगाया तो वो जैसे सोना बन गया. 1966 में बनी फिल्म "सावन की घटा" आज अगर याद की जाती है तो सिर्फ़ उसके महकते हुए गीत संगीत के लिए. ओ पी नय्यर और एस एच बिहारी इस फिल्म के संगीतकार और गीतकार थे. इस फिल्म के लगभग सभी गीत 'हिट' हुए थे. आशा भोंसले और मोहम्मद रफ़ी ने ज़्यादातर गीत भी गाए इस फिल्म में. लेकिन एक गीत ऐसा था जिसे नय्यर साहब ने महेंद्र कपूर से गवाया. इसी गीत का एक दूसरा 'वर्जन' भी था जिसे आशाजी ने गाया था. "मेरी जान तुमपे सदके अहसान इतना कर दो, मेरी ज़िंदगी में अपनी चाहत का रंग भर दो". इसमें कोई शक़ नहीं की महेंद्र कपूर ने इस गीत में अपनी गायकी का वो रंग भरा है जो आज तक उतरने का नाम नहीं लेती.

हालाँकि ओ पी नय्यर के चहेते गायक रहे हैं मोहम्मद रफ़ी, लेकिन महेंद्र कपूर को भी उन्होने कई बार गवाया है. महेंद्र और नय्यर साहब के सुरीले संगम से निकले कुछ गीतों के नाम गिनाएँ आपको? "लाखों है यहाँ दिलवाले और प्यार नहीं मिलता", "आँखों में क़यामत के काजल, होंठों पे ग़ज़ब की लाली है", यह दोनो फिल्म किस्मत के गाने हैं, फिर "यह रात फिर ना आएगी" का वो गाना "मेरा प्यार वो है कि मरकर भी तुमको जुदा अपनी बाहों से होने ना देगा", बहारें फिर भी आएँगी फिल्म में "बदल जाए अगर माली चमन होता नहीं खाली", और फिर "दिल और मोहब्बत" फिल्म में "कहाँ से लाई ओ जानेमन" और आशा भोंसले के साथ "हाथ आया है जब से तेरा हाथ में", इन गीतों को हम 'ओल्ड इस गोल्ड' में आनेवाले समय में शामिल करने की कोशिश करेंगे. लेकिन आज सुनिए फिल्म "सावन की घटा" से यह गाना.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. आवाज़ पर नौशाद की तीन बहतरीन फिल्मों के जिक्र में इस फिल्म का भी नाम शामिल था.
२. बोल है शकील बदायुनीं के और आवाज़ है लता की.
३. मुखड़े से पहले एक शेर में जिसमें शब्द आता है - "ढिंढोरा"

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
उज्जवल कुमार जी बधाई....आपने एकदम सही जवाब दिया

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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