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Sunday, August 18, 2019

राग मीरा मल्हार : SWARGOSHTHI – 431 : RAG MIRA MALHAR






स्वरगोष्ठी – 431 में आज

वर्षा ऋतु के राग – 5 : मीरा मल्हार अथवा मीराबाई की मल्हार

पण्डित अजय चक्रवर्ती से इस राग में बन्दिश और वाणी जयराम से फिल्मी गीत सुनिए




पण्डित  रविशंकर
पण्डित  अजय चक्रवर्ती
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ “स्वरगोष्ठी” के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “वर्षा ऋतु के राग” की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आपको स्वरों के माध्यम से बादलों की उमड़-घुमड़, बिजली की कड़क और रिमझिम फुहारों में भींगने के लिए आमंत्रित करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि केवल मल्हार नाम से कोई राग नहीं है। दरअसल मल्हार एक अंग का नाम है। जब कोई राग इस अंग से संचालित होता है तब इसे मल्हार अंग का राग कहलाता है। राग मेघ मल्हार, मियाँ मल्हार, गौड़ मल्हार सूर मल्हार, रामदासी मल्हार आदि मल्हार अंग के प्रचलित राग हैं। इस श्रृंखला की पाँचवीं कड़ी में हम मल्हार अंग के राग मीरा मल्हार अथवा मीराबाई की मल्हार पर चर्चा करेंगे। श्रृंखला की इस कड़ी में आज आपके लिए हम 1979 में प्रदर्शित गुलज़ार की फिल्म ‘मीरा’ का एक गीत, जिसे संगीतकार पण्डित रविशंकर ने राग मीराबाई की मल्हार में निबद्ध किया था, गायिका वाणी जयराम की आवाज़ में सुनवा रहे हैं। दूसरे चरण में सुविख्यात गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वर में हम राग मीराबाई की मल्हार की एक आकर्षक रचना प्रस्तुत करेंगे, जिसके बोल हैं – “जगज्जननी माता चण्डी...”।



आज की कड़ी में हम मल्हार अंग के राग मीरा मल्हार अथवा मीराबाई की मल्हार के स्वरों से निबद्ध कुछ संगीत-रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। । राग के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि इनका नामकरण भक्ति संगीत के विदुषी मीराबाई के नाम पर हुआ है। राग मीराबाई की मल्हार मल्हार अंग का राग है। यह माना जाता है कि इस राग की रचना सुप्रसिद्ध भक्त कवयित्री मीराबाई ने की थी। आमतौर पर राग मीरा मल्हार के गायन-वादन का समय मध्यरात्रि माना जाता है, किन्तु वर्षा ऋतु में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। राग के स्वरूप का अनुभव करने के लिए अब हम आपको 1979 में प्रदर्शित गुलज़ार की फिल्म ‘मीरा’ से एक गीत सुनवा रहे हैं। यह गीत ही नहीं, बल्कि इस राग की संरचना भी स्वयं भक्त कवयित्री मीराबाई की है। फिल्म ‘मीरा’ के संगीत पर मैं अपने प्रिय मित्र और फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार सुजॉय चटर्जी के आलेख का एक अंश उद्धृत कर रहा हूँ।

"जाने-माने गीतकार गुलज़ार को मीरा के जीवन पर एक फिल्म बनाने का प्रस्ताव मिला। मीराबाई की मुख्य भूमिका में अभिनेत्री हेमामालिनी का और संगीत निर्देशन के लिए लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल का चुनाव पहले ही हो चुका था। फ़िल्म की स्क्रिप्ट तैयार हो जाने के बाद गुलज़ार ने सिटिंग रखी फ़िल्म के संगीतकार लक्ष्मी-प्यारे के साथ। मीराबाई द्वारा लिखी बेशुमार भजनों की चर्चा करते हुए अन्त में कुल 12 भजन छाँट लिए गये जो फ़िल्म में रखे जाने थे। फ़िल्म के निर्माता ने व्यावसायिक पत्रिकाओं में विज्ञापन प्रकाशित कर दिया - 'आज की मीरा' (लता मंगेशकर) 'मीरा' की मुहूर्त शॉट में क्लैप करेंगी। गुलज़ार ने पहला भजन "मेरे तो गिरिधर गोपाल..." को सबसे पहले फ़िल्माने की तैयारी भी कर ली। लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने भजन कम्पोज़ किया और लता जी से सम्पर्क किया रेकॉर्डिंग के लिए। लक्ष्मी-प्यारे जानते थे कि लता जी ना नहीं करेंगी। पर उनके सर पे बिजली आ गिरी जब लता जी ने इसे गाने से इन्कार कर दिया। लता जी के अनुसार अभी हाल ही में उन्होंने अपने भाई हृदयनाथ मंगेशकर के लिए मीरा भजनों का एक ग़ैर फ़िल्मी ऐल्बम रेकॉर्ड किया है, इसलिए दोबारा किसी कमर्शियल फ़िल्म के लिए वही भजन नहीं गा सकती। लता जी किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहती थीं। मसला इतना नाज़ुक था कि ना तो गुलज़ार लता जी से इस पर बहस कर सकते थे और एल.पी. का तो सवाल ही नहीं था। हुआ यूँ कि लता जी के ना कहने पर एल. पी ने भी फ़िल्म में संगीत देने से मना कर दिया। उन्हे लगा कि कहीं लता जी उनसे नाराज़ हो गईं और भविष्य में उनके गीत गाने से मना कर देंगी तो वो बरबाद हो जायेंगे। ख़ैर, लता जी के पीछे हट जाने के बाद गुलज़ार ने आशा भोसले से अनुरोध किया। पर आशा जी ने भी यह कहते हुए मना कर दिया कि जहाँ देवता ने पाँव रखे हों, वहाँ फिर मनुष्य पाँव नहीं रखते। अब 'मीरा' की टीम डर गई। न लता है, न आशा, न एल.पी.। गुलज़ार अगर चाहते तो पंचम को संगीतकार बनने के लिए अनुरोध कर सकते थे, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। लता और आशा के गुलज़ार को मना करने पर पंचम वैसे ही शर्मिन्दा थे, गुलज़ार उन्हें और ज़्यादा शर्मिन्दा नहीं करना चाहते थे। और इस तरह से लता, आशा, एल.पी, पंचम - ये दिग्गज इस फ़िल्म से बहुत दूर हो गये।

गुलज़ार ने हार नहीं मानी और सोचने लगे कि ऐसा कौन संगीतकार है जो अपने संगीत के दम पर लता और आशा के बिना भी फ़िल्म के गीतों को सही न्याय और स्तर दिला सकता है! और तभी उन्हें पण्डित रविशंकर का नाम याद आया। पण्डित जी उस समय न्यूयॉर्क में थे; उनसे फोन पर सम्पर्क करने पर उन्होंने बताया कि वो सितम्बर-अक्तूबर में भारत आएँगे और आने के बाद स्क्रिप्ट पढ़ कर अपना फ़ैसला सुनायेंगे। वह जून का महीना था और गुलज़ार इतने दिनों तक इन्तज़ार नहीं कर सकते थे। इसलिए उन्होंने अमरीका का टिकट कटवाया और पहुँच गये पण्डित जी के पास। यह गुलज़ार साहब की पहली अमरीका यात्रा थी। पण्डित जी को स्क्रिप्ट पसन्द आई, पर उस पर काम वो सितम्बर से ही शुरू कर पायेंगे, ऐसा उन्होंने कहा। लेकिन गुलज़ार साहब के फिर से अनुरोध करने पर वो अमरीका में रहते हुए ही धुनों पर काम करने को तैयार हो गये। अभी भी पण्डित जी को थोड़ी सी हिचकिचाहट थी क्योंकि उन्होंने भी लता मंगेशकर वाले विवाद की चर्चा सुनी थी। संयोग से जब गुलज़ार पण्डित जी से मिलने अमरीका गये, उन दिनों लता जी भी वहीं थीं। गुलज़ार साहब और पण्डित जी ने लता जी को फ़ोन किया और उन्हें सब कुछ बताया तो लता जी ने उनसे कहा कि उन्हें फ़िल्म 'मीरा' के बनने से कोई परेशानी नहीं है, बस वो ख़ुद इसमें शामिल नहीं होना चाहती। अब इसके बाद पण्डित जी के सामने अगला सवाल था कि कौन सी गायिका इन भजनों को गाने वाली हैं? गुलज़ार के मन में वाणी जयराम का नाम था, पर वो पण्डित जी से यह कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे, यह सोच कर कि वो कैसे रिऐक्ट करेंगे वाणी जयराम का नाम सुन कर। इसलिए गुलज़ार साहब ने ही पण्डित जी से गायिका चुनने को कहा। और पण्डित जी का जवाब था, "वाणी जयराम कैसी रहेगी?"

पण्डित रविशंकर ने "बाला मैं बैरागन हो‍ऊँगी..." को सबसे पहले कम्पोज़ किया। गुलज़ार साहब के अनुसार यह इस फिल्म का सबसे बेहतरीन भजन है। कहते हैं कि "एरी मैं तो प्रेम दीवानी..." कम्पोज़ करते समय पण्डित जी ने कहा था - "जो ट्यून रोशन साहब ने बनायी है 'नौबहार' में, वह दिमाग़ से नहीं जाती। लेकिन मैं अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश करूँगा कि कुछ अलग हट कर बनाऊँ"। पर जिस भजन के लिए वाणी जयराम को पुरस्कार मिला, वह था "मेरे तो गिरिधर गोपाल..."। सितम्बर में भारत वापस आने के बाद 'मीरा' के सभी 12 भजन एक के बाद एक 9 दिनों के अन्दर रेकॉर्ड किये गये वाणी जयराम की आवाज़ में। पण्डित जी ने सुबह 9 से रात 9 बजे तक काम करते हुए पूरे अनुशासन के साथ कार्य को समय पर सम्पन्न किया। एक दिन ऐसा हुआ कि पण्डित जी बहुत ही थके हुए से दिख रहे थे। गुलज़ार साहब के पूछने पर उन्होंने बताया कि अगले दिन वो दोपहर 2 बजे से काम शुरू करेंगे। यह कह कर वो निकल गये। अगले दिन पण्डित जी 2 बजे आये, बिल्कुल तरो-ताज़ा दिख रहे थे। जब गुलज़ार साहब ने उनसे इसका ज़िक्र किया तो उन्होंने कहा कि अब वो बहुत ज़्यादा बेहतर महसूस कर रहे हैं क्योंकि उन्होंने लगातार 8 घंटे अपना सितार बजाया है सुबह 4 बजे से बैठ कर; वो इसलिए थके हुए से लग रहे थे क्योंकि कई दिनों से उन्हे अपने सितार को छूने का मौका नहीं मिल पाया था। इस तरह से 'मीरा' के गानें बने।" आइए, अब हम आपको इसी फिल्म का एक गीत (मीराबाई का पद) सुनवाते हैं, राग मीरा मल्हार के स्वरों में पिरोया हुआ। ग्रन्थकार के.एल. पाण्डेय ने अपनी पुस्तक "हिन्दी सिने राग इन्साइक्लोपीडिया" में इस गीत में राग मियाँ की मल्हार का स्पर्श बताया है। अन्य गीतों की तरह इसे वाणी जयराम ने स्वर दिया है और संगीत पण्डित रविशंकर का है।

राग मीरा मल्हार : ‘बादल देख डरी...’ : वाणी जयराम : संगीत – पं. रविशंकर : फिल्म – मीरा


आज की कड़ी में हम मल्हार अंग के राग मीराबाई की मल्हार के स्वरों से अनुगूँजित कुछ संगीत-रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। । राग के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि इनका नामकरण भक्ति संगीत के विदुषी मीराबाई के नाम पर हुआ है। राग मीराबाई की मल्हार मल्हार अंग का राग है। यह माना जाता है कि इस राग की रचना सुप्रसिद्ध भक्त कवयित्री मीराबाई ने की थी। यह काफी थाट का सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इस राग के आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। राग मीरा मल्हार में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर के दोनों रूप (शुद्ध और कोमल) प्रयोग किये जाते हैं। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग मीरा मल्हार और रामदासी मल्हार में थाट, जाति, वादी और संवादी स्वर समान होते हैं। आरोह और अवरोह के स्वर भी लगभग समान होते हैं। केवल कोमल धैवत स्वर का अन्तर होता है। राग रामदासी मल्हार में केवल शुद्ध धैवत का प्रयोग होता है, जबकि राग मीरा मल्हार में दोनों धैवत का प्रयोग किया जाता है। आमतौर पर राग मीरा मल्हार के गायन-वादन का समय मध्यरात्रि माना जाता है, किन्तु वर्षा ऋतु में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। राग के शास्त्रीय स्वरूप का अनुभव करने के लिए अब हम आपको सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वर में राग मीराबाई की मल्हार में निबद्ध तीनताल की एक रचना सुनवा रहे हैं।आप यह बन्दिश सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग मीराबाई की मल्हार : “जगज्जननी माता चण्डी...” : पण्डित अजय चक्रवर्ती




संगीत पहेली

“स्वरगोष्ठी” के 431वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1976 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 440वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।






1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इस अंश में किस राग की झलक है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका की आवाज़ हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 24 अगस्त, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 433 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 429वें अंक की पहेली में हमने आपसे वर्ष 1967 में प्रदर्शित फिल्म “रामराज्य” के एक गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – सूर मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “वर्षा ऋतु के राग” की पाँचवीं कड़ी में आज आपने मल्हार अंग के राग “मीरा मल्हार” का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वरों में प्रस्तुत एक खयाल रचना का रसास्वादन किया। इससे पहले इसी राग पर आधारित फिल्म “मीरा” से एक गीत पार्श्वगायिका वाणी जयराम के स्वरों में सुनवाया गया। वीआरएसएच 1979 में प्रदर्शित इस फिल्म के संगीतकार पण्डित रविशंकर ने इस गीत को राग मीरा मल्हार अथवा मीराबाई की मल्हार के स्वरों में संगीतबद्ध किया है। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  
डियो प्लेबैक इण्डिया  
राग मीरा मल्हार : SWARGOSHTHI – 431 : RAG MIRA MALHAR : 18 अगस्त, 2019

Sunday, August 13, 2017

राग मीरा और रामदासी मल्हार : SWARGOSHTHI – 330 : RAG MIRA & RAMDASI MALHAR




स्वरगोष्ठी – 330 में आज

पावस ऋतु के राग – 5 : राग मीरा और रामदासी मल्हार

उस्ताद अमीर खाँ से रामदासी और वाणी जयराम से मीरा मल्हार की रचनाएँ सुनिए




उस्ताद अमीर  खाँ
वाणी जयराम
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पावस ऋतु के राग” की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी सहयोगी संज्ञा टण्डन के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। गीतों का परिचयात्मक आलेख हम अपने सम्पादक-मण्डल की सदस्य संज्ञा टण्डन की रिकार्ड किये आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा, अवश्य सूचित कीजिएगा। आपको स्वरों के माध्यम से बादलों की उमड़-घुमड़, बिजली की कड़क और रिमझिम फुहारों में भींगने के लिए आमंत्रित करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की पाँचवीं कड़ी में हम मल्हार अंग के दो रागों मीरा मल्हार अथवा मीराबाई की मल्हार और रामदासी मल्हार पर चर्चा करेंगे। कुछ राग अपने युग के महान संगीतज्ञों, कवियों के नाम पर प्रचलित है। ऐसे ही दो उल्लेखनीय राग है- भक्त कवयित्री मीराबाई द्वारा रचित राग मीरा मल्हार और संगीत-नायक रामदास द्वारा रचित राग रामदासी मल्हार। इन ऋतु प्रधान रागों में निबद्ध रचनाओं में पावस ऋतु के सजीव चित्रण का गुण तो होता ही है, श्रृंगार, विरह और भक्तिरस के भावों को सम्प्रेषित करने की क्षमता भी होती है। आज हम आपको सबसे पहले राग मीरा मल्हार के स्वरों में निबद्ध 1979 में प्रदर्शित फिल्म “मीरा” से गायिका वाणी जयराम की आवाज़ में कवयित्री मीराबाई का ही एक पद प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके साथ ही राग रामदासी मल्हार का शास्त्रीय स्वरूप उपस्थित करने के लिए सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में एक खयाल रचना प्रस्तुत कर रहे हैं।



राग मीरा मल्हार : ‘बादल देख डरी...’ : वाणी जयराम : संगीत – पं. रविशंकर : फिल्म – मीरा
राग रामदासी मल्हार : ‘छाए बदरा कारे कारे...’ : उस्ताद अमीर खाँ 



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 330वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1976 में प्रदर्शित एक हिन्दी फिल्म से लिये गए एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह मल्हार अंग का कौन सा राग है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 19 अगस्त, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 332वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 328वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1967 में प्रदर्शित फिल्म ‘रामराज्य’ से राग आधारित गीत का एक अंश प्रस्तुत कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – सूर मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – लता मंगेशकर

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में तीन में से दो प्रश्नों का सही उत्तर देकर लखनऊ की विनुषी कारीढाल ने पूरे दो अंक अर्जित किये हैं। पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे अन्य नियमित प्रतिभागी हैं - चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला “पावस ऋतु के राग” जारी है। इस श्रृंखला ऋतु प्रधान गीतो को प्रस्तुत किया जा रहा है। आज की इस कड़ी में हमने आपके लिए राग मीरा मल्हार और रामदासी मल्हार पर चर्चा की। आगामी अंक में हम मल्हार अंग के किसी और राग पर चर्चा करेंगे और इस राग में निबद्ध कुछ रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। हमारी जारी श्रृंखला और आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन   
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 


Thursday, June 1, 2017

"सातों बार बोले बंसी" जैसे नगीनों से सजी है आज की "गुलज़ार-आशा-पंचम"-मयी महफ़िल

महफ़िल ए कहकशाँ 23





पंचम, आशा ताई और गुलज़ार 

दोस्तों सुजोय और विश्व दीपक द्वारा संचालित "कहकशां" और "महफिले ग़ज़ल" का ऑडियो स्वरुप लेकर हम हाज़िर हैं, "महफिल ए कहकशां" के रूप में पूजा अनिल और रीतेश खरे  के साथ।  अदब और शायरी की इस महफ़िल में आज पेश है गुलज़ार, राहुल देव बर्मन और आशा भोसले की तिकड़ी के सुरीले संगम से निकला एक नगमा 'दिल पडोसी है' एल्बम से| 










मुख्य स्वर - पूजा अनिल, रीतेश खरे एवं सजीव सारथी 

स्क्रिप्ट - विश्व दीपक एवं सुजॉय चटर्जी


Saturday, February 4, 2017

चित्रकथा - 5: गुलज़ार के गीतों में विरोधाभास


अंक - 5

गुलज़ार के गीतों में विरोधाभास

“एक पल रात भर नहीं गुज़रा...”



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं है। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। हमारी दिलचस्पी का आलम ऐसा है कि हम केवल फ़िल्में देख कर या गाने सुनने तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखते, बल्कि फ़िल्म संबंधित हर तरह की जानकारियाँ बटोरने का प्रयत्न करते रहते हैं। इसी दिशा में आपके हमसफ़र बन कर हम आ रहे हैं हर शनिवार ’चित्रकथा’ लेकर। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ के पहले अंक में आपका हार्दिक स्वागत है। 

गुलज़ार एक ऐसे गीतकार हैं जिन्होंने अपने गीतों में हिन्दी व्याकरण के अलंकारों का बहुतायात में प्रयोग किया है। रूपक और उपमा के के प्रयोगों से उन्होंने हमेशा अपने श्रोताओं को चमत्कृत तो किया ही है, कई बार उन्होंने ’विरोधाभास’ का भी प्रयोग अपने गीतों में किया है। आइए आज ’चित्रशाला’ में गुलज़ार के लिखे उन गीतों की चर्चा करें जिनमें विरोधाभास की झलक मिलती है।




 जिस तरह से अलंकार नारी की शोभा और गरिमा को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, उसी
तरह से हिन्दी काव्य और साहित्य में भी कुछ अलंकार चिन्हित हैं जिनसे भाषा और अभिव्यक्ति की शोभा बढ़ती है। अनुप्रास, उपमा, रूपक, यमक, श्लेष, उत्प्रेक्षा, अन्योक्ति, अतिशयोक्ति, संदेह, उभय और दृष्टान्त हिन्दी व्याकरण के प्रमुख अलंकार हैं। एक और अलंकार है जिसे कई बार अलंकारों की श्रेणी में शामिल किया जाता है और वह है विरोधाभास अलंकार, यानी कि विरोध का आभास कराने वाला। विरोधाभास जिसे अंग्रेज़ी में contradiction या contradictory कह सकते हैं। तो इस विरोधाभास से भी भाषा को अलंकृत किया जा सकता है। जब किसी काव्य या गद्य में कही गई दो बातें आपस में प्रतिवाद करे या एक दूसरे का विरोध करे, एक दूसरे को contradict करे, उसे विरोधाभास अलंकार कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, साहित्य में एक विरोधमूलक अर्थालंकार जिसमें वस्तुतः विरोध का वर्णन न होने पर भी विरोध का आभास होता है, उसे विरोधाभास कहते हैं। उदाहरण के रूप में, "या अनुरागी चित्त की गति समझें नहीं कोइ, ज्यों-ज्यों बूडै स्याम रंग त्यों-त्यों उज्ज्वल होइ।", यहाँ स्याम रंग (काले रंग) में डूबने पर भी उज्ज्वल (सफ़ेद) होने की बात कही गई है, इसलिए इसमें विरोधाभास है।

गीतकार गुलज़ार के अनेक गीतों में विरोधाभास के उदाहरण सुने जा सकते हैं। कुछ विरोधाभास तो ऐसे हैं जिनका उन्होंने एकाधिक बार प्रयोग किया है। इनमें से एक है "ख़ामोशियों की गूंज"। ख़ामोशी यानी चुप्पी, यानी जिसकी कोई आवाज़ नहीं, भला ख़ामोशी कैसे पुकार सकती है, ख़ामोशी कैसे गूंज सकती है, ख़ामोशी कैसे गुनगुना सकती है? इस विरोधाभास का प्रयोग गुलज़ार साहब ने पहली बार सम्भवत: 1969 की फ़िल्म ’ख़ामोशी’ के ही गीत में किया था। "हमने देखी है उन आँखों की महकती ख़ुशबू" गीत के अन्तरे में वो लिखते हैं "प्यार कोई बोल नहीं, प्यार आवाज़ नहीं, एक ख़ामोशी है सुनती है कहा करती है"। ख़ामोशी कह रही है, इसमें विरोधाभास है। इसके बाद 1975 की फ़िल्म ’मौसम’ के गीत "दिल ढूंढ़ता है" के अन्तरे में उन्होंने कहा "वादी में गूंजती हुई ख़ामोशियाँ सुने"। यहाँ गूंजती हुई ख़ामोशियाँ में विरोधाभास है। 1978 की फ़िल्म ’घर’ के गीत "आपकी आँखों में कुछ" में एक जगह वो कहते हैं "आपकी ख़ामोशियाँ भी आपकी आवाज़ है"। ख़ामोशियों की आवाज़ में विरोधाभास है। गुलज़ार के इस विरोधाभास का प्रयोग गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ने कई साल बाद 2001 में आई फ़िल्म 'वन टू का फ़ोर’ के गीत "ख़ामोशियाँ गुनगुनाने लगी, तन्हाइयाँ मुसुकुराने लगी" के शुरु में किया था। इसमें तो दो दो विरोधाभास हैं - ख़ामोशियाँ के गुनगुनाने में और तन्हाइयों के मुस्कुराने में। तन्हाई दर्द का प्रतीक है, ये मुस्कुरा कैसे सकती है भला!! तन्हाई से संबंधित एक और विरोधाभास गुलज़ार ने दिया 1980 की फ़िल्म ’सितारा’ के गीत "ये साये हैं ये दुनिया है" में जब वो कहते हैं कि "भरी भीड़ में ख़ाली तन्हाइयों की" और फिर "बड़ी नीची राहें हैं ऊँचाइयों की"। 

गुलज़ार के गीतों में विरोधाभास का बहुत ही सुन्दर प्रयोग देखने/सुनने को मिलता है। एक और विरोधाभास जिसका उन्होंने एकाधिक बार प्रयोग किया है, वह है पल, समय, वक़्त को लेकर। "जाने क्या सोच कर नहीं गुज़रा, एक पल रात भर नहीं गुज़रा" (’किनारा’, 1977- इसमें विरोधाभास को किस ख़ूबसूरती से दर्शाया गया है ज़रा महसूस कीजिए। एक पल जो एक ही पल में गुज़र जाना चाहिए, उसे गुलज़ार साहब रात भर रोके रखते हैं। 1996 की फ़िल्म ’माचिस’ के मशहूर गीत "छोड़ आए हम वो गलियाँ" में गुलज़ार लिखते हैं "इक छोटा सा लम्हा है जो ख़त्म नहीं होता"। ’किनारा’ और ’माचिस’ के इन दो उदाहरणों में समानता स्पष्ट है। ये तो रही पल या लम्हे के ना गुज़रने का विरोधाभास। इसी संदर्भ में रात के ना गुज़रने को भी कई बार दर्शाया है उन्होंने। "दो नैनों में आँसू भरे हैं, निन्दिया कैसे समाये" गीत में एक पंक्ति है "ज़िन्दगी तो काटी ये रात कट जाए"। फ़िल्म ’आंधी’ के मशहूर गीत "तुम आ गए हो नूर आ गया है" में पंक्ति है "दिन डूबा नहीं रात डूबी नहीं जाने कैसा है सफ़र"; इसी फ़िल्म के अन्य गीत "तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई" में पंक्ति है "तुम जो कहदो तो आज की रात चाँद डूबेगा नहीं, चाँद को रोक लो"। इन सभी उदाहरणों में विरोधाभास का एक वलय इन्हें घेर रखा है। फ़िल्मा ’लिबास’ के "सिलि हवा छू गई" में "जितने भी तय करते गए, बढ़ते गए ये फ़ासले" में भी कुछ कुछ इसी तरह का विरोध है; तय करने पर फ़ासला कम होना चाहिए, ना कि बढ़ना चाहिए!

गुलज़ार के गीतों में विरोधाभास की फ़ेहरिस्त इतनी लम्बी है कि सबका ज़िक्र करने लगे तो पूरी की पूरी किताब बन जाएगी। फ़िल्म ’गृहप्रवेश’ के गीत "पहचान तो थी पहचाना नहीं" में तीन विरोधाभास के उदाहरण मिलते हैं। मुखड़ा ही विरोधाभास से भरा हुआ है -"पहचान तो थी पहचाना नहीं, मैं अपने आप को जाना नहीं"। पहचान होते हुए भी ना पहचानना और अपने आप को ही नहीं जानना विरोध का आभास कराता है। पहले अन्तरे की पहली पंक्ति है "जब धूप बरसती है सर पे"। बरसने का अर्थ आम तौर पर बारिश होता है। धूप जो बारिश के बिलकुल विपरीत है, वह भला कैसे बरस सकती है? बारिश से याद आया फ़िल्म ’उसकी कहानी’ के गीत "मेरी जाँ मुझे जाँ ना कहो मेरी जाँ" में एक पंक्ति है "सूखे सावन बरस गए, इतनी बार आँखों से"। यहाँ एक ही उदाहरण में दो दो विरोधाभास है। पहला यह कि सावन सूखा कैसे हो सकता है? और दूसरा यह कि अगर सावन सूखा है तो बरस कैसे सकता है? वापस आते हैं ’गृह प्रवेश’ के गीत पर। इसके दूसरे अन्तरे में कहा गया - "मैं जागी रही कुछ सपनों में, और जागी हुई भी सोई रही"। विरोधाभास से कैसा सुन्दर बन पड़ा है यह अभिव्यक्ति!

1959 की फ़िल्म ’कागज़ के फूल’ में कैफ़ी आज़मी ने लिखा था "वक़्त ने किया क्या हसीं सितम"। "हसीं सितम" के इस विरोधाभास का गुलज़ार ने भी प्रयोग किया था फ़िल्म ’किनारा’ के ही एक अन्य गीत में। "नाम गुम जाएगा, चेहरा यह बदल जाएगा" में वो कहते हैं कि "वक़्त के सितम कम हसीं नहीं"। सितम के बाद आते हैं बेवफ़ाई पर। 1980 में जब इसमाइल श्रॉफ़ की फ़िल्म ’थोड़ी सी बेवफ़ाई’ में गीत लिखने का मौक़ा गुलज़ार को मिला, तो उन्होंने इस फ़िल्म के शीर्षक गीत के रूप में एक ऐसे गीत की रचना कर डाली जो फ़िल्म की पूरी कहानी का निचोड़ बन कर रह गया। और बोल भी ऐसे चुने कि सुनने वाला वाह किए बिना न रह सके! "हज़ार राहें मुड़ के देखीं कहीं से कोई सदा न आई, बड़ी वफ़ा से निभाई तुमने हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई"। बरसों पहले राजेन्द्र कृष्ण ने लिखा था "हमसे आया ना गया, तुमसे बुलाया ना गया, फ़ासला प्यार में दोनों से मिटाया ना गया"। कुछ कुछ इसी तरह का भाव था ’थोड़ी से बेवफ़ाई’ के गीत में भी, पर बोल और भी ज़्यादा असरदार। "वफ़ा" और "बेवफ़ा" एक दूसरे के विपरीत शब्द हैं। तो फिर बड़ी वफ़ा से बेवफ़ाई को निभाना आख़िर विरोधाभास नहीं तो और क्या है!

गुलज़ार के गीतों में पैरों के नीचे कभी ज़मीन बहने लगती है तो कभी सर से आसमान उड़ जाता है। चाहे कितना भी विरोधाभास क्यों न हो, कितनी ही असंगति क्यों न हो, हर बार गुलज़ार अपने श्रोताओं को चमत्कृत कर देते हैं ऐसे ऐसे विरोधाभास देकर कि जिसकी कल्पना इससे पहले किसी ने नहीं की होगी। ’नमकीन’ फ़िल्म के गीत "राह पे रहते हैं, यादों पे बसर करते हैं" में वो लिखते हैं "उड़ते पैरों के तले जब बहती है ज़मीं"। इससे उनका इशारा है कि एक ट्रक ड्राइवर जो अपनी ट्रक दौड़ाए जा रहा है, पाँव उसका ज़मीन पर नहीं है (ट्रक पर है), मतलब वो ज़मीन से उपर है या उड़ रहा है, और चलते हुए ट्रक से नीचे देखा जाए तो प्रतीत होता है कि ज़मीं पीछे सरक रही है। भावार्थ में चाहे विरोधाभास ना हो पर शाब्दिक अर्थ को देखा जाए तो इस पंक्ति में विरोध का आभास ज़रूर है। ’बण्टी और बबली’ का गीत "चुप चुपे के" तो विरोधाभास और रूपक से भरा हुआ है। "देखना मेरे सर से आसमाँ उड़ गया है", "देखना आसमाँ के सिरे खुल गए हैं ज़मीं से", "देखना क्या हुआ है, ये ज़मीं बह रही है", "पाँव रुकने लगे, राह चलने लगी", "देखना आसमाँ ही बरसने लगे ना ज़मीं पे" - इन सभी में कहीं न कहीं विरोधाभास है।

गुलज़ार के विरोधाभास से सजे कुछ और गीत गिनवाए जाएँ। "तुम पुकार लो, तुम्हारा इन्तज़ार है" में पंक्ति है "रात ये क़रार की बेक़रार है"; ’माचिस’ के गीत "भेजे कहार" में "ठंडी नमी जलती रही"; "दो दीवाने शहर में" के गीत में "जब तारे ज़मीं पर चलते हैं, आकाश ज़मीं हो जाता है"; ’रुदाली’ के गीत "समय ओ धीरे चलो" में साँस जो जीवन का आधार है उसे ही ज़हर करार देते हुए गुलज़ार लिखते हैं "ज़हर ये साँस का पीया ना पीया"। इसी तरह से "यारा सीली सीली" में पंक्ति है "पैरों में ना साया कोई सर पे ना साईं रे, मेरे साथ जाए ना मेरी परछाईं रे"। परछाई का साथ में न जाना एक विरोधाभास है। इस तरह से ध्यानपूर्वक गुलज़ार के गीतों को सुनने पर और भी बहुत से विरोधाभास के उदाहरण मिल जाएँगे इसमें कोई संदेह नहीं है। जिस ख़ूबसूरती से गुलज़ार ने विरोधाभास से अपने गीतों को सजाया है, शायद ही किसी अन्य गीतकार ने ऐसा किया हो। और यही वजह है कि गुलज़ार के गीतों से सिर्फ़ मनोरंजन ही नहीं होता, भाषा और साहित्य का अध्ययन भी होता है।

आपकी बात

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शोध, आलेख, प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, January 14, 2017

चित्रकथा - 2: बिमल रॉय की मृत्यु की अजीबोग़रीब दास्तान


अंक - 2

बिमल रॉय की मृत्यु की अजीबोग़रीब दास्तान

“अमृत कुंभ की खोज में...”



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं है। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। हमारी दिलचस्पी का आलम ऐसा है कि हम केवल फ़िल्में देख कर या गाने सुनने तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखते, बल्कि फ़िल्म संबंधित हर तरह की जानकारियाँ बटोरने का प्रयत्न करते रहते हैं। इसी दिशा में आपके हमसफ़र बन कर हम आते हैं हर शनिवार ’चित्रकथा’ लेकर। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ के दूसरे अंक में आपका हार्दिक स्वागत है।  

फ़िल्मकार बिमल रॉय एक कहानी पर फ़िल्म बना रहे थे। फ़िल्म तो नहीं बनी पर उस कहानी की एक घटना बिमल रॉय के साथ यूं के यूं घट गई। यह उनके जीवन की आख़िरी घटना थी। यह उनकी मृत्यु की घटना थी। आइए आज ’चित्रकथा’ में इसी अजीबोग़रीब घटना के बारे में जाने जिसका उल्लेख गुलज़ार साहब ने उनकी लघुकथाओं की पुस्तक ’रावी पार’ में ’बिमल दा’ नामक लेख में किया है।




कुछ कलाकार ऐसे होते हैं जो एक बहुत ही कम कार्यकाल में या छोटी सी आयु में अपनी कला, लगन और परिश्रम से ऐसा कुछ कर जाते हैं कि फिर वो अमर हो जाते हैं। बिमल रॉय एक ऐसे ही फ़िल्मकार थे जिन्होंने केवल एक दशक में इतने सारे हिट और उच्चस्तरीय फ़िल्में भारतीय सिनेमा को दी है कि उन्हें अगर भारतीय सिनेमा के स्तंभ फ़िल्मकारों में से एक कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। बिमॉल रॉय एक ऐसी संस्था का नाम है जो आज तक प्रेरणास्रोत बनी हुई है। लेकिन आज हम बिमल रॉय की फ़िल्मों की समीक्षा नहीं कर रहे हैं, बल्कि एक ऐसी आश्चर्यजनक घटना से आपका परिचय करवाने जा रहे हैं कि जिसे पढ़ कर आप भी दंग रह जायेंगे। अगर फ़िल्म की कहानी के नायक से साथ घटने वाली घटना ख़ुद फ़िल्मकार के साथ घट जाए, और वह भी उसी दिन जिस दिन कहानी में वह घटना घटने वाली हो, तो फिर इसे आप क्या कहेंगे? सिर्फ़ संजोग या कुछ और?

यह किस्सा है एक अजीब संजोग का। यह संजोग जुड़ा है बिमल रॉय और उनकी फ़िल्म के एक चरित्र
से। बात 1955 की रही होगी जब बिमल रॉय ’देवदास’ बना रहे थे। शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय की इस उपन्यास पर फ़िल्म बनाने के बाद उन्होंने एक और बांगला उपन्यासकार समरेश बसु की एक उपन्यास पढ़ना शुरु किया। उपन्यास पूरी पढ़ डाली। उपन्यास का नाम था "अमृतो कुंभेर संधाने" (अमृत कुंभ की खोज में)। वो इस पर एक बांगला-हिन्दी द्विभाषी फ़िल्म बनाना चाहते थे। हिन्दी संस्करण वाले फ़िल्म का नाम रखा गया ’अमृत कुंभ की खोज में’। समरेश बसु की उपन्यास की कहानी महाकुंभ मेले में होने वाले प्रचलित स्नान पर आधारित थी। ऐसी मान्यता है कि मेले के नौवे दिन, यानी कि जोग-स्नान के दिन प्रयाग के संगम में स्नान करने से व्यक्ति को लम्बी आयु और स्वस्थ जीवन मिलता है। समरेश बसु की उपन्यास के हिसाब से कहानी का मुख्य पात्र बलराम को टी.बी (काली खाँसी) हो जाती है, और वो दिन-ब-दिन कमज़ोर होता जाता है। इस वजह से वो अपनी लम्बी उम्र के लिए इलाहाबाद महाकुंभ के नौवे दिन, यानी कि जोग-स्नान वाले दिन स्नान करने आता है, पर दुर्भाग्य से बलराम पहले ही दिन भगदड़ में मारा जाता है। समरेश बसु की इस कहानी में जिस भगदड़ का पार्श्व रखा गया है, वह हक़ीक़त में 1954 के कुंभ मेले में हुई थी। 3 फ़रवरी के दिन हुई इस भगदड़ में 800 से अधिक लोग मारे गए थे और 2000 बुरी तरह से घायल हुए थे। यह मौनी अमावस्या का स्नान था। इसी भगदड़ का उल्लेख हमें विक्रम सेठ की 1993 की उपन्यास ’A Suitable Boy' में भी मिलता है।

ख़ैर, बिमल रॉय को यह कहानी बहुत पसन्द आई, और उन्हें लगा कि इस कहानी के माध्यम से समाज को एक सशक्त संदेश दिया जा सकता है और साथ ही नाटकीय क्लाइमैक्स की वजह से फ़िल्म आम जनता को भी पसन्द आएगी। मगर कहानी की एक बात उन्हें बहुत खटक रही थी और वह यह कि बलराम का पहले ही दिन मर जाना उन्हें कुछ ठीक नहीं लगा। आख़िर वो एक फ़िल्मकार थे और फ़िल्म बनाना चाह रहे थे। मुख्य नायक के पहले ही दिन मर जाने से वो सहमत नहीं थे। फ़िल्म के फ़्लॉप होने का खतरा उन्हें नज़र आ रहा था। फिर भी उन्होंने इस कहानी पर स्क्रिप्ट लिखने का काम गुलज़ार को दे दिया। यह बात होगी सन् 1959 की। गुलज़ार साहब ने अगले तीन साल तक स्क्रिप्ट पर काम करना जारी रखा। जब जब समय मिलता वो बिमल रॉय से नोट्स लेते और लिखने बैठ जाते। काम अपनी गति से चलने लगा। 

’अमृत कुंभ की खोज में’ के नायक की भूमिका के लिए पहले-पहले दिलीप कुमार का नाम तय हुआ था,
1960  में इलाहाबाद के अर्धकुंभ में फ़िल्माए गए स्टॉक शॉट्स में से एक
पर बाद में सम्भवत: धर्मेन्द्र का नाम फ़ाइनल हुआ था। बिमल रॉय ने योजना बनाई थी 1960 की सर्दियों में जो इलाहाबाद में वार्षिक कुंभ होगा, वो उसमें स्टॉक शॉट्स को शूट करेंगे और उसके दो साल बाद दिसंबर 1964 के महाकुंभ में फ़िल्म की बाकी शूटिंग् करेंगे। लेकिन जब 1960 के वार्षिक कुंभ को शूट करने का समय आया तो दादा बिमल रॉय की तबीयत ख़राब हो गई। वो शूटिंग् पे नहीं जा सके। उन्होंने अपनी जगह गुलज़ार को भेज दिया। काम तो शुरु हो गया पर बिमल दा की तबीयत दिन-ब-दिन बद से बदतर होती चली गई। 
और थोड़े ही दिनों बाद पता चला कि बिमल दा को कैन्सर (कर्कट रोग) है। बीमारी की वजह से धीरे धीरे बिमल रॉय का घर से निकलना बन्द हो गया; उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया। फिर भी वो गुलज़ार को घर बुला कर पूछते रहते थे कि तुम अमृत कुंभ पर काम कर रहे हो ना? उन्होंने गुलज़ार को यह भी अनुदेश दिए कि कहानी का मुख्य नायक बलराम पहले दिन मरना नहीं चाहिए। उसे या तो महाकुंभ के तीसरे दिन या पाँचवे दिन मरना चाहिए। बहुत दिनों के विचार-विमर्श के बाद आख़िरकार यह तय हुआ कि बलराम महाकुंभ के नौवे दिन मरेगा यानी कि ठीक जोग स्नान के दिन। जैसे जैसे शूटिंग् का दिन, यानी 1964 का महाकुंभ नज़दीक आ रहा था, वैसे वैसे बिमल दा की हालत और भी ख़राब होती जा रही थी। लगने लगा था कि वो इस फ़िल्म को शूट नहीं कर पाएँगे। लेकिन फिर भी वो बार-बार गुलज़ार को यह हिदायत दे रहे थे कि हमें यह फ़िल्म महाकुंभ के मेले में ही शूट करनी है। बिमल रॉय की क़िस्मत में यह फ़िल्म शूट करना नहीं लिखा था। उनकी बीमारी की वजह से फ़िल्म की शूटिंग् कैन्सल कर दी गई। बिमल दा का अन्त अब दरवाज़े पर आ गया था। 



1964 का महाकुंभ 31 दिसंबर को शुरु होना था। महाकुंभ शुरु हुआ। और इस हिसाब से जोग स्नान, नौवे दिन, यानी कि 8 जनवरी 1965 को पड़ता। फ़िल्म तो बन्द हो गई पर बिमल रॉय का इस फ़िल्म की कहानी से नाता नहीं टूटा। बिमल रॉय ने जिस दिन अपनी कहानी के नायक बलराम का मरना तय किया था, ठीक उसी दिन, जोग-स्नान के दिन, 8 जनवरी 1965 को, मात्र 56 वर्ष की आयु में बिमल रॉय इस फ़ानी दुनिया को छोड़ कर हमेशा के लिए चले गए। इससे बड़ा संजोग और क्या हो सकता है! यह घटना जैसे एक सिहरन सी पैदा करती है हमारे मन-मस्तिष्क में। कुछ बातें, कुछ घटनाएँ ऐसी घट जाती हैं जिन्हें विज्ञान से समझाया नहीं जा सकता, जिनकी व्याख्या विज्ञान द्वारा संभव नहीं। बिमल दा की मृत्यु की यह घटना भी ऐसी ही एक घटना थी।


1943 में ’Bengal Famine' नामक फ़िल्म से अपना करीयर शुरु करने के बाद पचास के दशक में बिमल रॉय भारतीय सिनेमा के एक स्तंभ फ़िल्मकार बन चुके थे। 1953 में ’परिणीता’, ’दो बिघा ज़मीन’, 1954 में ’बिराज बहू’, ’बाप बेटी’, 1955 में ’देवदास’, 1958 में ’यहूदी’ और ’मधुमती’, 1959 में ’सुजाता’ और 1960 में ’परख’ जैसी फ़िल्में देकर बिमल दा शोहरत की बुलन्दी पर जा पहुँचे थे। पर काल के आगे किसी का बस नहीं चलता। उनके इस सफलता को कोई बुरी नज़र लग गई। इस एक दशक के अन्दर उन्हें 11 फ़िल्मफ़ेअर और 6 राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। उनकी एक और कालजयी फ़िल्म ’बन्दिनी’ उनकी मृत्यु के बाद प्रदर्शित हुई।

’अमृत कुंभ की खोज में’ तो फिर नहीं बन सकी, पर 1960 के इलाहाबाद के अर्धकुंभ में जो शॉट्स लिए गए थे, उन फ़ूटेज को 11 मिनट की एक लघु वृत्तचित्र के रूप में जारी किया गया। दरसल बिमल दा की मृत्यु के बाद यह फ़ूटेज भी खो गई थी, या यूं कहिए कि इस पर किसी का ध्यान नहीं गया। पर तीन दशक बाद, मार्च 1999 में बिमल दा के पुत्र जॉय रॉय को अकस्मात यह फ़ूटेज मिल गई और वह भी उत्तम अवस्था में। उन्हें जैसे कोई अमूल्य ख़ज़ाना मिल गया हो! तब जॉय ने इन फ़ूटेजों को जोड़ कर 11 मिनट का एक लघु वृत्तचित्र तैयार किया ’Images of Kumbh Mela' शीर्षक से। इस दुर्लभ वृत्तचित्र को नीचे दिए गए यू-ट्युब लिंक पर देखा जा सकता है।




आपकी बात

’चित्रकथा’ की पहली कड़ी को आप सभी ने सराहा, जिसके लिए हम आपके आभारी हैं। इस कड़ी की रेडरशिप 13 जनवरी तक 154 आयी है। हमारे एक पाठक श्री सुरजीत सिंह ने यह सुझाव दिया है कि क्यों ना इसे हिन्दी और अंग्रेज़ी, दोनों भाषाओं में प्रकाशित की जाए! सुरजीत जी, आपका सुझाव बहुत ही अच्छा है, लेकिन फ़िलहाल समयाभाव के कारण हम ऐसा कर पाने में असमर्थ हैं। भविष्य में अवकाश मिलने पर हम इस बारे में विचार कर सकते हैं, पर इस वक़्त ऐसा संभव नहीं, इसके लिए हमें खेद है।

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!


शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Thursday, November 24, 2016

"सातों बार बोले बंसी" और "जाने दो मुझे जाने दो" जैसे नगीनों से सजी है आज की "गुलज़ार-आशा-पंचम"-मयी महफ़िल



कहकशाँ - 24
गुलज़ार, पंचम और आशा ’दिल पड़ोसी है’ में  
"दिल पड़ोसी है, मगर मेरा तरफ़दार नहीं..."



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है गुलज़ार, राहुल देव बर्मन और आशा भोसले की तिकड़ी के सुरीले संगम से निकले दो नगमें 'दिल पड़ोसी है’ ऐल्बम से।



बाद मुद्दत के फिर मिली हो तुम,
ये जो थोड़ी-सी भर गई हो तुम,
ये वज़न तुम पर अच्छा लगता है..

अभी कुछ दिनों पहले ही भरी-पूरी फिल्मफेयर की ट्रॉफ़ी स्वीकार करते समय गुलज़ार साहब ने जब ये पंक्तियाँ कहीं तो उनकी आँखों में गज़ब का एक आत्म-विश्वास था, लहजे में पिछले ४८ सालों की मेहनत की मणियाँ पिरोई हुई-सी मालूम होती थीं और बालपन वैसा ही जैसे किसी पाँचवे दर्जे के बच्चे को सबसे सुंदर लिखने या सबसे सुंदर कहने के लिए "इन्स्ट्रुमेंट बॉक्स" से नवाज़ा गया हो। उजले कपड़ों में देवदूत-से सजते और जँचते गुलज़ार साहब ने अपनी उम्र का तकाज़ा देते हुए नए-नवेलों को खुद पर गुमान करने का मौका यह कह कर दे दिया कि "अच्छा लगता है, आपके साथ-साथ यहाँ तक चला आया हूँ।" अब उम्र बढ़ गई है तो नज़्म भी पुरानी होंगी साथ-साथ, लेकिन "दिल तो बच्चा है जी", इसलिए हर दौर में वही "छुटभैया" दिल हर बार कुछ नया लेकर हाज़िर हो जाता है। यूँ तो यह दिल गुलज़ार साहब का है, लेकिन इसकी कारगुजारियों का दोष अपने मत्थे नहीं लेते हुए, गुलज़ार साहब "विशाल" पर सारा दोष मथ देते हैं और कहते हैं कि "इस नवजवान के कारण ही मैं अपनी नज़्मों को जवान रख पाता हूँ।" अब इसे गुलज़ार साहब का बड़प्पन कहें या छुटपन, लेकिन जो भी हो, इतना तो मानना पड़ेगा कि लगभग पचास सालों से चल रही इनकी लेखनी अब भी दवात से लबालब है। अब भी दिल पर वही सुंदर-से "हस्ताक्षर" रचती रहती है, वही गोल-गोल अक्षर, गोल-गोल अंडा, मास्टर-जी का डंडा, बकड़ी की पूँछ, मास्टर-जी की मूँछ, और लो बन गया "क"। ऐसे ही प्यारे-प्यारे तरीकों से और कल्पना की उड़ानों के सहारे गुलज़ार साहब हमारे बीच की ही कोई चीज हमें सौंप जाते हैं, जिसका तब तक हमें पता हीं नहीं होता। ८ सितम्बर १९८७ को भी यही बात हुई थी। उस दिन जब गुलज़ार साहब ने हमें "दिल" का अड्डा बताया, तभी हमें मालूम हुआ कि यह नामुराद कोई और नहीं "हमारा पड़ोसी है", यह ऐसा पड़ोसी है जो "हमारे ग़म उठा लेता है, लेकिन हमारे ग़मों को दूर नहीं करता" तभी तो गुलज़ार साहब कहते हैं:

हाँ मेरे ग़म तो उठा लेता है, ग़मख्वार नहीं,
दिल पड़ोसी है, मगर मेरा तरफ़दार नहीं..

("ये जो थोड़ी-सी भर गई हो तुम..." यह सुनकर आपको नहीं लगता कि शायर ने किसी ख़ास के लिए ये अल्फ़ाज़ कहे हैं। अलग बात है कि फिल्मफेयर की ब्लैक-लेडी पर भी ये पंक्तियाँ सटीक बैठती हैं, लेकिन पवन झा जी की मानें तो गुलज़ार साहब ने कुछ सालों पहले "एक ख़ास" के लिए यह नज़्म लिखी थी.. वह ख़ास कौन है? यह पूछने की ज़रूरत भी है क्या? :) )

हाँ तो हम गुलज़ार साहब और "दिल पड़ोसी है" की बातें कर रहे थे। इस एलबम के एक-एक गीत को गुलज़ार साहब ने इतनी शिद्दत से लिखा है (वैसे ये हर गीत को उतनी ही मेहनत, शिद्दत और हसरत से रचते हैं) कि मुझसे अपनी पसंद के एक या दो गाने चुनते नहीं बन रहे। "कोयले से हीरे को ढूँढ निकाला जा सकता है, लेकिन जहाँ हीरे ही हीरे हो वहाँ पारखी का सर घूम न जाए तो कहना।" वैसे मैं अपने आप को पारखी नहीं मानता लेकिन हीरों के बीच बैठा तो ज़रूर हूँ। शायद एक-एक हीरा परखता चलूँ तो कुछ काम बने। अब ज़रा इसे देखिए:

चाँद पेड़ों पे था,
और मैं गिरजे में थी,
तूने लब छू लिए,
जब मैं सजदे में थी,
कैसे भूलूँगी मैं, वो घड़ी गश की थी,
ना तेरे बस की थी, ना मेरे बस की थी.. (रात क्रिसमस की थी)

या फिर इसे:

माँझी रे माँझी, रमैया माँझी,
मोइनी नदी के उस पार जाना है,
उस पार आया है जोगी,
जोगी सुना है बड़ा सयाना है..

शाम ढले तो पानी पे चलके पार जाता है,
रात की ओट में छुपके रसिया मोहे बुलाता है,
सोना सोना, जोगी ने मेरा
जाने कहाँ से नाम जाना है.. (माँझी रे माँझी) 

यहाँ पर माँझी और मोइनी नदी के बहाने "माया-मोह" की दुनिया के उस पार बसे "अलौकिक" संसार की बात बड़े ही खूबसूरत और सूफ़ियाना तरीके से गुलज़ार साहब ने कह दी है। ऐसी ही और भी कई सारी नज़्में हैं इस एलबम में जिसमें गुलज़ार, पंचम और आशा की तिकड़ी की तूती गूँज-गूँज कर बोलती है। जिस तरह हमने पिछली कड़ी में खुद इन दिग्गजों से ही इनकी पसंद-नापसंद और गानों के बनने की कहानी सुनी थी, उसी तरह आज भी क्यों न वह बागडोर इन्हीं को सौंप दी जाए।

आशा: "सातों बार बोले बंसी"

पंचम: इसके बारे में गुलज़ार, तुम बताओ।

गुलज़ार: "सातों बार बोले बंसी, एक हीं बार बोले ना.. तन की लागी सारी बोले, मन की लागी खोले ना".. ये गाने में खास बात ये है कि बांसुरी को "पर्सोनिफ़ाई" करके देखिए आप।

पंचम: कैसे?

गुलज़ार: जितनी फूंक तन पे लगती है, उतनी हीं बार बोलती है लेकिन अंदर की बात नहीं बताती। उसके सुर सात हैं, सातों बोलते हैं, जो चुप रहती है जिस बात पे, वो नहीं बोलती।

आशा: वाह!

गुलज़ार: उसमें खूबसूरत बात ये है कि उसको "पर्सोनिफ़ाई" करके देखिए। किस तरह से वो उठके कृष्णा के मुँह लगती है, मुँह लगी हुई है, मुँह चढी हुई है, और वो सारी बातें कहती है, एक जो उसका अपनापन है, वो चुप है, वो नहीं बोलती, उन सात सुरों के अलावा। उसके सारी "इलस्ट्रेशन" जितनी है, वो बाँसुरी के साथ "पर्सोनिफ़ाई" करके देखिए आप।

पंचम: ये गाने में थोड़ा लयकारी भी किया था, सरगम भी किए थे, बड़ा अच्छा था।

आशा: और उसमें बाँसुरी साथ में बोल रही है, और आवाज़ भी आ रही है, तो समझ में नहीं आ रहा कि बाँसुरी बोल रही है कि राधा बोल रही है।

गुलज़ार: हाँ, वही, उसमें "परसोनिफ़िकेशन" है सारी की सारी। फूंक पे बोलती है और वो फूंक पे हीं बोलती है बाँसुरी।

अब चूँकि गुलज़ार साहब ने इस गाने को बड़ी ही बारीकी से समझा दिया है, इसलिए मुझे नहीं लगता है मुझे कुछ और कहने की ज़रुरत पड़ेगी। तो चलिए पढते और सुनते हैं यह गाना:

सातों बार बोले बंसी,
एक ही बार बोले ना,
तन की लागी सारी बोले,
मन की लागी खोले ना..

चुपके सुर में भेद छुपाये,
फूँक-फूँक बतलाये,
तन की सीधी मन की घुन्नी,
पच्चीस पेंचे खाए,
हो.. हाँ बोले ना बोले ना,
हाँ बोले ना बोले ना..

प्रीत की पीड़ा जाने मुई,
छाती छेद पड़े, 
उठ-उठ के फिर मुँह लगती है,
कान्हा संग लड़े,
हो.. हाँ बोले ना बोले ना,
हाँ बोले ना बोले ना..




नियम से तो हमें बस एक ही गाने तक अपनी महफ़िल को सीमित रखना चाहिए था, लेकिन बात जब इस "स्वर्णिम" तिकड़ी की हो रही हो तो एक से किसका मन भरता है! यूँ भी हम जितना इनके गाने सुनेंगे, उतना ही हमें संगीत की बारीकियाँ जानने को मिलेंगी। पंचम दा की यही तो ख़ासियत रही थी कि वे संगीत को बस "ट्रेडिशनल" एवं "कन्वेशनल" वाद्य-यंत्रों तक घेरकर नहीं रखते थे, बल्कि "बोल" के हिसाब से उसमे "रेलगाड़ी की सीटी", "मुर्गे की बाँग", "जहाज का हॉर्न" तक डाल देते थे। तभी तो सुनने वाला इनके संगीत की ओर खुद-ब-खुद खींचा चला आता था। जहाँ तक आशा ताई की बात है, तो इनके जैसा "रेंज" शायद ही किसी गायिका के पास होगा। ये जितने आराम से "दिल चीज़ क्या है" गाती हैं, उतनी ही सहूलियत से "दम मारो दम" को भी निभा जाती हैं। अब जहाँ ये तीनों अलग-अलग इतने करामाती हैं तो फिर साथ आ जाने पर "क़यामत" तो आनी ही है। आशा जी "दिल पड़ोसी है" को अपना सर्वश्रेष्ठ एलबम मानती है, तभी तो गुलज़ार साहब को उनके जन्मदिवस पर बधाई-संदेश भी इसी के रंग में रंगकर भेज डालती हैं: "भाई जन्म-दिन मुबारक। पंचम, आप और मैं खंडाला में, दिल पड़ोसी है के दिन, मैं जिंदगी में कभी नहीं भूलूंगी।" हम भी इस तिकड़ी को कभी नहीं भूलेंगे। इसी वादे और दावे के साथ चलिए अगली बातचीत और अगले गाने का लुत्फ़ उठाते हैं:

आशा(गाती हैं): "जेते दाओ आमाए डेको ना... "

गुलज़ार: वाह!

पंचम: ये तो आप बंगाली में गा रही हैं.. "प्रोग्राम" का हिन्दी गानों का है।

आशा: हिन्दी हो, पंजाबी हो, चाहे टिम्बकटु की ज़बान हो, गाना सुर जहाँ अच्छे, मतलब जहाँ अच्छा, वो गाना अच्छा होता है।

गुलज़ार: सच में आशा जी, मैंने इसके कई बंगाली गाने चुराए हैं।

आशा: अच्छा?

गुलज़ार: हाँ, बहुत बार। ये पूजा के लिए जो गाने करते हैं, तो मैं पास बैठे हुए, कई बार धुन बहुत अच्छी लगी, जैसे एक, उसके पूरे बंगाली के बोल मुझे याद नहीं, और गौरी दा "फ़ेमस पोयट फ़्रॉम बंगाल"

आशा: गौरी शंकर मजुमदार

गुलज़ार: जी हाँ, और इनके बोल चल रहे थे पूजा के गाने के "आस्थे आमार देरी होबे"

पंचम: आ हा हा

गुलज़ार: उसपे वो गाना लिखा था उस ट्युन पर.. "तेरे बिना ज़िंदगी से कोई शिकवा तो नहीं"

पंचम: ये उसी का गाना?

गुलज़ार: हाँ, आँधी में। और ये भी उसी तरह का गाना इनका, जिसपे आप अभी गा रहीं थीं, "जेते दाव आमाय"

आशा: "दिल पड़ोसी है" में.. (गाती हैं) "जाने दो मुझे जाने दो"।

और ये रहे उस गाने के बोल:

जाने दो मुझे जाने दो
रंजिशें या गिले, वफ़ा के सिले
जो गये जाने दो
जाने दो मुझे जाने दो

थोड़ी ख़लिश होगी, थोड़ा सा ग़म होगा,
तन्हाई तो होगी, अहसास कम होगा
गहरी ख़राशों की गहरी निशानियाँ हैं
चेहरे के नीचे कितनी सारी कहानियाँ हैं
माज़ी के सिलसिले, जा चुके जाने दो 
ना आ आ..

उम्मीद-ओ-शौक़ सारे लौटा रही हूँ मैं,
रुसवाई थोड़ी-सी ले जा रही हूँ मैं
बासी दिलासों की शब तो गुज़ार आये
आँखों से गर्द सारी रोके उतार आये
आँखों के बुलबुले बह गये, जाने दो 
ना आ आ..




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खोज और आलेख : विश्वदीपक ’तन्हा’
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

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