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Wednesday, November 18, 2009

हाय हम क्या से क्या हो गए....लज्जत-ए-इश्क़ महसूस करें जावेद अख़्तर और अल्का याज्ञनिक के साथ

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #६०

ज की महफ़िल में हम हाज़िर हैं शरद जी की पसंद की तीसरी और अंतिम नज़्म लेकर। गायकी के दो पुराने उस्तादों(मन्ना डे और मुकेश) को सुनने-सुनाने के बाद आज हमने रूख किया है १९९० और २००० के दशक की ओर और इस सफ़र में हमारा साथ वह दे रही हैं जो आज भी उसी शिद्दत से सुनी जाती हैं जिस शिद्दत से ३० साल पहले सुनी जाती थीं। नए दौर में कई सारी नई गायिकाएँ आईं, लेकिन इनके जादू को दुहरा न सकीं। इन्होंने अपना पहला गाना १९७९ की फिल्म "पायल की झनकार" में गाया था, वह गाना ज्यादा मशहूर तो नहीं हुआ, लेकिन हाँ उस गाने ने यह घोषणा तो कर दी कि एक लम्बे दौर का घोड़ा मैदान में उतर चुका है। फिर १९८१ में आई "लावारिस" जिसमें अमिताभ बच्चन का गाया "मेरे अंगने में" बच्चे-बच्चे की जुबान पर चढ गया। लेकिन हाँ अमित जी के गाए इस गाने का एक रूप और था, जिसे परदे पर "राखी" गाती हैं और परदे के पीछे हमारी आज की फ़नकारा। यह गाना भी खूब चला, लेकिन अगर कोई यह पूछे कि इन्हें सही मायने में सफ़लता कब मिली, तो निर्विरोध एक हीं जवाब होगा और वह जवाब है १९८८ में रीलिज हुई फिल्म "तेजाब" का बहुचर्चित गाना "एक दो तीन"...है कोई जिसे वह गाना याद नहीं या फिर जिसे वह गाना पसंद नहीं? इन्हें इस गाने के लिए "फिल्मफ़ेयर फीमेल बेस्ट सिंगर" के अवार्ड से नवाज़ा गया। फिर उसी साल आए "क़यामत से क़यामत" तक के गानों ने तो इन्हें घर-घर की पहचान दे दी। उदित नारायण के साथ इनकी जुगलबंदी इतनी मशहूर हुई कि इस जोड़ी को न जाने कितनी हीं फिल्मों में दुहराया गया और हर बार नतीजा जबरदस्त हीं आया। १९९४ में "हम है राही प्यार के" के गाने "घूंघट की आड़ से दिलवर का" और १९९९ में "कुछ कुछ होता है" के टाईटल ट्रैक के लिए इन्हें "रजत कमल पुरस्कार" से सुशोभित किया गया। अगर फिल्मफ़ेयर पुरस्कारों की बात करें तो आशा ताई के साथ ये सबसे ज्यादा बार यह पुरस्कार (७ बार) पाने का रिकार्ड रखती हैं। हमने इनके बारे में इतनी जानकारी दी तो आप अब तक समझ हीं गए होंगे कि ये और कोई नहीं "अल्का याज्ञनिक" जी हैं। ये तो थी अलका जी, अब हम बात करने जा रहे हैं उस फ़नकार, उस लेखक, उस कवि, उस शायर की, जिनके बारे में खुद से कुछ कहना हमारे लिए संभव नहीं है। इसलिए आगे आप जो भी पढेंगे वे उनके हीं शब्द होंगे। हाँ, आगे बढने से पहले हम आपसे उनका परिचय तो करा हीं सकते हैं। तो आज की नज़्म की रचना की है उस शख्स ने, जिनका नाम उनके अब्बाजान "जांनिसार अख़्तर" ने "जादू" रखा था(यह नाम उन्होंने अपने हीं एक शेर के मिसरे "लंबा-लंबा किसी जादू का फसाना होगा" से लिया था) और आगे चलकर जो "जावेद अख़्तर" कहलाए...इन साहब का नाम आते हीं "आफ़रीन आफ़रीन" की आवाज़ कानों में घुलने लगती है। क्या कहते हैं आप?

अपनी पुस्तक "तरकश" में अपना परिचय वे कुछ इस तरह देते हैं: लोग जब अपने बारे में लिखते हैं तो सबसे पहले यह बताते हैं कि वो किस शहर के रहने वाले हैं–मैं किस शहर को अपना शहर कहूँ ?... पैदा होने का जुर्म ग्वालियर में किया लेकिन होश सँभाला लखनऊ में, पहली बार होश खोया अलीगढ़ में, फिर भोपाल में रहकर कुछ होशियार हुआ लेकिन बम्बई आकर काफ़ी दिनों तक होश ठिकाने रहे। जावेद साहब अपनी कहानी लखनऊ से शुरू करते हैं और कहते हैं: शहर लखनऊ... किरदार मेरे नाना-नानी, दूसरे घरवाले और मैं... मेरी उम्र आठ बरस है। बाप बम्बई में है, मां कब्र में। इस पंक्ति में अपने पिता के प्रति जावेद साहब की नाराज़गी बखूबी नज़र आ रही है। इसी क्रम में वो १८ जून १९५३ के उस दिन को याद करने लगते हैं, जिस दिन उनकी माँ की मौत हुई थी। जगह, लखनऊ, मेरे नाना का घर रोती हुई मेरी खाला, मेरे छोटे भाई सलमान को, जिसकी उम्र साढ़े छह बरस है और मुझे हाथ पकड़ के घर के उस बड़े कमरे में ले जाती हैं जहां फर्श पर बहुत-सी औरतें बैठी हैं। तख्त पर सफेद कफन में लेटी मेरी मां का चेहरा खुला है। सिरहाने बैठी मेरी बूढी नानी थकी-थकी सी हौले-हौले रो रही हैं। दो औरतें उन्हें संभाल रही हैं। मेरी खाला हम दोनों बच्चों को उस तख्त के पास ले जाती हैं और कहती है, अपनी माँ को आखिरी बार देख लो। मैं कल ही आठ बरस का हुआ था। समझदार हूं। जानता हूं मौत क्या होती है। मैं अपनी मां के चेहरे को बहुत गौर से देखता हूं कि अच्छी तरह याद हो जाए। मेरी खाला कह रही हैं इनसे वादा करो कि तुम जिंदगी में कुछ बनोगे, इनसे वादा करो कि तुम जिंदगी में कुछ करोगे। मैं कुछ कह नहीं पाता, बस देखता रहता हूं और फिर कोई औरत मेरी मां के चेहरे पर कफन ओढ़ा देती है। ऐसा तो नहीं है कि मैंने जिंदगी में कुछ किया ही नहीं है लेकिन फिर ये ख्याल आता है कि मैं जितना कर सकता हूं, उसका तो एक चौथाई भी अब तक नहीं किया और इस ख्याल को दी हुई बेचैनी जाती नहीं। अपने पिता के प्रति नाराज़गी का अफ़सोस उन्हें तब होता है, जब उनके पिता अपनी ज़िंदगी की अंतिम घड़ियाँ गिन रहे होते हैं। १८ अगस्त १९७६ को मेरे बाप की मृत्यु होती है (मरने से नौ दिन पहले उन्होंने मुझे अपनी आखिरी किताब ऑटोग्राफ करके दी थी। उस पर लिखा था 'जब हम न रहेंगे तो बहुत याद करोगे’। (उन्होंने ठीक लिखा था)। अब मेरा दिल उन बातों में ज्यादा लगता है जिनसे दुनिया की जबान में कहा जाए तो, कोई फायदा नहीं। शायरी से मेरा रिश्ता पैदाइशी और दिलचस्पी हमेशा से है। लड़कपन से जानता हूं कि चाहूँ तो शायरी कर सकता हूं मगर आज तक की नहीं है। ये मेरी नाराजगी और बगावत का एक प्रतीक है(क्योंकि मेरे पिताजी एक मक़बूल शायर थे)। १९७९ में पहली बार शेर कहता हूं और ये शेर लिखकर मैंने अपनी विरासत और अपने बाप से सुलह कर ली है।

मुंबई (तब की बंबई) में आने के बाद उनके साथ क्या-क्या हुआ, इसे याद करते हुए वे कहते हैं: ४ अक्टूबर १९६४, मैं बंबई सेंट्रल स्टेशन पर उतरा हूं। अब इस अदालत में मेरी जिंदगी का फैसला होना है। बंबई आने के छह दिन बाद बाप का घर छोड़ना पड़ता है। जेब में सत्ताईस नए पैसे हैं। मैं खुश हूं कि जिंदगी में कभी अट्ठाईस नए पैसे भी जेब में आ गए तो मैं फ़ायदे में रंगा और दुनिया घाटे में। बंबई में दो बरस होने को आए, न रहने का ठिकाना है न खाने का। यूं तो एक छोटी सी फिल्म में सौ रुपए महीने पर डायलॉग लिख चुका हूं। कभी कहीं असिस्टेंट हो जाता हूं, कभी एक आध छोटा मोटा काम मिल जाता है, अकसर वो भी नहीं मिलता। दादर एक प्रोडयूसर के ऑफिस अपने पैसे मांगने आया हूं, जिसने मुझसे अपनी पिक्चर के कॉमेडी सीन लिखवाए थे। ये सीन उस मशहूर राइटर के नाम से ही फिल्म में आएंगे जो ये फिल्म लिख रहा है। ऑफिस बंद है। एक फिल्म में डायलॉग लिखने का काम मिला है। कुछ सीन लिखकर डायरेक्टर के घर जाता हूं। वो बैठा नाश्ते में अनानास खा रहा है, सीन लेकर पढ़ता है और सारे कागज मेरे मुंह पर फेंक देता है और फिल्म से निकालते हुए मुझे बताता है कि मैं जिंदगी में कभी राइटर नहीं बन सकता। वापस बांदरा जाना है जो काफी दूर है। पैसे बस इतने हैं कि या तो बस का टिकट ले लूं या कुछ खा लूं, मगर फिर पैदल वापस जाना पड़ेगा। चने खरीदकर जेब में भरता हूं और पैदल सफर शुरू करता हूं। कोहेनूर मिल्स के गेट के सामने से गुजरते हुए सोचता हूं कि शायद सब बदल जाए लेकिन ये गेट तो रहेगा। एक दिन इसी के सामने से अपनी कार से गुजरूंगा। तपती धूप में एक सड़क पर चलते हुए मैं अपनी आंख के कोने में आया एक आंसू पोंछता हूं और सोचता हूं कि मैं एक दिन इस डायरेक्टर को दिखाऊँगा कि मैं... फिर जाने क्यों ख्याल आता है कि क्या ये डायरेक्टर नाश्ते में रोज अनानास खाता होगा? बड़ी हीं आसानी से जावेद साहब ने ग़म में भी खुशी और मस्ती का पुट डाल दिया है। यही है उनकी खासियत। चलते-चलते शबाना आज़मी और हनी इरानी से इनके रिश्ते पर भी एक नज़र डाल लेते हैं। मेरी मुलाकात शबाना से होती है। कैफी आजमी की बेटी शबाना भी शायद अपनी जड़ों की तरफ लौट रही है। उसे भी ऐसे हज़ारों सवाल सताने लगे हैं जिनके बारे में उसने पहले कभी नहीं सोचा था। कोई हैरत नहीं कि हम करीब आने लगते हैं। धीरे-धीरे मेरे अंदर बहुत कुछ बदल रहा है। १९८३ में मैं और हनी अलग हो जाते हैं। हनी से मेरी शादी जरूर टूट गई मगर तलाक भी हमारी दोस्ती का कुछ नहीं बिगाड़ सका। और अगर मां-बाप के अलग होने से रिश्तों में कोई ऐसी कड़वाहट नहीं आई तो इसमें मेरा कमाल बहुत कम और हनी की तारीफ बहुत ज्यादा है। हनी आज एक बहुत कामयाब फिल्म राइटर है और मेरी बहुत अच्छी दोस्त। मैं दुनिया में कम लोगों को इतनी इज्जत करता हूं जितनी इज्जत मेरे दिल में हनी के लिए है। जावेद साहब के बारे में हमने उन्हीं के शब्दों में बहुत कुछ जाना। इनके बारे में कहने को अभी और भी बहुत कुछ है, लेकिन वो सब फिर कभी बाद में। अभी तो उनके इस शेर का आनंद लेना ज्यादा मुनासिब लगता है:

कह गए हम किससे दिल की बात
शहर में एक सनसनी सी है...


इस शेर के बाद चलिए हम अब १९९७ में रीलिज हुए एलबम "तुम याद आए" से इस नज़्म को सुनते हैं, जिसमें जावेद साहब का वही चिरपरिचित अंदाज़ है तो अलका जी की वही मखमली आवाज़:

मोहब्बत पलकों पे कितने हसीन ख्वाब सजाती है..
फूलों-से महकते ख्वाब..
सितारों-से जगमगाते ख्वाब..
शबनम-से बरसते ख्वाब..
फिर कभी यूँ भी होता है कि
पलकों की डालियों से ख्वाबों
के सारे परिंदे उड़ जाते
हैं..और आँखें हैरान-सी रह जाती हैं

सारे सपने कहीं खो गए..
हाय हम क्या से क्या हो गए..
दिल से तन्हाई का दर्द जीता
क्या कहें हम पे क्या क्या न बीता..
तुम न आए मगर, जो गए..
हाय हम क्या से क्या हो गए॥

सारे सपने कहीं खो गए..
हाय हम क्या से क्या हो गए..

तुमने हमसे कहीं थी जो बातें..
उनको दोहराती हैं गम की रातें..
तुमसे मिलने के दिन तो गए..
हाय हम क्या से क्या हो गए..

सारे सपने कहीं खो गए..
हाय हम क्या से क्या हो गए..

कोई शिकवा न कोई गिला है..
तुमसे कब हमको ये गम मिला है...
हाँ _____ अपने ही सो गए..
हाय हम क्या से क्या हो गए..

सारे सपने कहीं खो गए..
हाय हम क्या से क्या हो गए..




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "तराने" और शेर कुछ यूं था -

लबों पे तराने अब आ ना सकेंगे,
कि अब ज़िन्दगी में मोहब्बत नहीं है

इस शब्द की सबसे पहले शिनाख्त की "शामिख" साहब ने। आपने इस शब्द पर कुछ शेर भी कहे:

मेरे सरकश तराने सुन के दुनिया ये समझती है
कि शायद मेरे दिल को इश्क़ के नग़्मों से नफ़रत है (साहिर लुधियानवी)

एक मैं क्या अभी आयेंगे दीवाने कितने
अभी गूंजेगे मुहब्बत के तराने कितने
ज़िन्दगी तुमको सुनायेगी फ़साने कितने
क्यूं समझती हो मुझे भूल नही पाओगी (जावेद अख्तर)

गूँजे तराने सुबह के इक शोर हो गया
आलम तमाम रस में सराबोर हो गया (कैफ़ी आज़मी)

पिछली बार तो शरद जी का कोई अता-पता नहीं था, लेकिन चलिए इस बार उन्होंने निराश नहीं किया। आप अपने हीं एक स्वरचित शेर के साथ महफ़िल में तशरीफ़ लाए:

तराने हों खुशी के या हों ग़म के इतना तो तय है
उन्हें जब भी मैं सुनता हूँ सुकूं तब दिल को मिलता है।

इनके बाद महफ़िल में हाज़िरी लगी सीमा जी की। यह रही आपकी पेशकश:

अब तुमसे रुख़सत होता हूँ आओ सँभालो साजे़-गजल,
नये तराने छेडो़,मेरे नग्‍़मों को नींद आती है। (फ़िराक़ गोरखपुरी)

शुद्ध हिन्दी के शब्दों के साथ उर्दू के "तराने" का अच्छा मिश्रण किया मंजु जी ने। ये रहीं आपकी स्वरचित पंक्तियाँ:

सूर्योदय की अरुणिम बेला में ,
स्वागत में खगकुल झूम -झूम तराने गाए .

सुमित जी, शामिख साहब की बातों से मैं भी इत्तेफ़ाक़ रखता हूँ। आखिर कौन है यहाँ जिसे सारे शेर याद हैं। आपको अंतर्जाल का सहारा तो लेना हीं होगा और अगर ऐसा नहीं करना चाहते तो अपना हीं लिखा कुछ सुना दिया करें। बिना शेर की महफ़िल अधूरी-सी लगती है। आगे से ध्यान रखिएगा।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, June 9, 2009

आप आएँगे करार आ जाएगा.. .. महफ़िल-ए-चैन और "हुसैन"

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #१९

से कितने सारे गज़ल गायक होंगे जो यह दावा कर सकते हों कि उन्होंने भारत के राष्ट्रपति के सामने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है। अगर इतना भी हो तो बहुत है, लेकिन अगर मैं यह पूछूँ कि किनका यह सौभाग्य रहा है कि उनके संगीत एलबम का विमोचन खुद भारत के प्रधानमंत्री ने किया हो , तो मुझे नहीं लगता कि आज के फ़नकार को छोड़कर और कोई होगा। यह समय और किस्मत का एक खेल हीं कहिए को जिनको खुदा ने धन नहीं दिया, उन्हें ऐसा बाकपन परोसा है कि सारी दुनिया बस इसी एक "तमगे" के लिए उनसे रश्क करती है, आखिर करे भी क्यों न, इस तमगे, इस सम्मान के सामने बाकियों की क्या बिसात! यह सन् ७६ की बात है, जब हमारे इन फ़नकार ने तत्कालीन राष्ट्रपति "श्री फखरूद्दीन अली अहमद" के सामने अपनी गज़ल की तान छेड़ी थी। इस मुबारक घटना के छह साल बाद यानी कि १९८२ में इनके "रिकार्ड" को श्रीमती इंदिरा गाँधी ने अपने कर-कमलों से विमोचित किया था। सरकारी महकमों तक में अपनी छाप छोड़ने वाले इन फ़नकारों( दर-असल आज हम जिनकी बात कर रहे हैं, वे महज एक फ़नकार नही, बल्कि दो हैं, जी हाँ हम गायक-बंधुओं की बात कर रहे हैं) ने ना सिर्फ़ गज़ल-गायकी का नाम रोशन किया है, बल्कि गज़ल के साथ "शास्त्रीय संगीत" का मिश्रण कर भारतीय संस्कृति के अमूल्य धरोहरों की भी निगेहबानी की है। यह खुदा की दुआ है कि १९५८ से संगीत का सफर शुरू करने वाले इन फ़नकारों की साधना अब तक जारी है। वैसे इतनी सारी जानकारी उन फ़नकारों की पहचाने के लिए काफ़ी होगी । लेकिन अगर फिर भी न पहचाना हो तो इतना बता दूँ कि कुछ सालों पहले "यश चोपड़ा" की एक महत्वाकांक्षी फिल्म, जो कि भारत-पाकिस्तान में बसे लोगों के रिश्तों को मद्देनज़र रखकर बनाई गई थी, में एक बेहद हीं खूबसूरत क़व्वाली को गाकर इन दोनों ने फ़िल्मी दुनिया में अपना कदम रखा था।

"ग्वालियर घराने" से ताल्लुक रखने वाले "उस्ताद अहमद हुसैन" और "उस्ताद मोहम्मद हुसैन", जिन्हें दुनिया एक साथ "हुसैन बंधु" या फिर "हुसैन ब्रदर्स" के नाम से जानती है के पिता जी "उस्ताद अफ़ज़ल हुसैन जयपुरी" भी एक जमाने में गज़ल और ठुमरी-गायन में अपना मुकाम रखते थे। यही कारण है कि इन दोनों की शास्त्रीय संगीत में बचपन से हीं रूचि रही। यह बात वाकई काबिल-ए-गौर है कि संगीत के क्षेत्र में भाईयों की ऐसी कोई दूसरी जोड़ी नहीं है ,जिन्होंने एक साथ महफ़िलों से लेकर एलबमों तक गज़ल और भजन को बराबर का सम्मान दिया हो और जिसे प्रशंसकों से भी भरपूर प्यार मिला हो। "हुसैन बंधु" की सबसे बड़ी खासियत यह कि इन्होंने कभी भी पैसों के लिए नहीं गाया, बल्कि जरूरत आने पर मुफ़्त में भी अपने कार्यक्रम किए। इनकी नेकदिली और दरियादिली के कई सारे किस्से प्रसिद्द हैं। इन्होंने अपने गायन में छुपी "आध्यात्मिक शक्ति" का प्रयोग कैंसर से पीड़ित इंसानों के उपचार के लिए भी किया है। अब जब कोई शख्स दूसरों के लिए इतना करे तो फिर उसके लिए खुदा कुछ न करे, ऐसा हो हीं नहीं सकता। "हुसैन बंधुओं" के बारे में कहने को बहुत कुछ है, लेकिन मुझे लगता है कि इसके लिए एक अलग अंक की जरूरत होगी, इसलिए अब सीधे गज़ल की ओर रूख करता हूँ।

आज हो जो गज़ल आपके सामने पेश कर रहे हैं, उसे हमने "गोल्डन मोमेंट्स- प्यार का जज़्बा" एलबम से लिया है। इस गज़ल के बोल जनाब दिनेश ठाकुर ने लिखे हैं। यूँ तो हसरत जयपुरी साहब "हुसैन बंधुओं" की पसंद रहे हैं,लेकिन ऐसा नहीं है कि इन दोनों ने दूसरे शायरों से परहेज किया हो। अन्य शायरों के साथ भी इन दोनों भाईयों ने कई सारी नामचीन गज़लें दी हैं। वैसे आपको यह बता दूँ कि "जयपुर" का होने के कारण और "हसरत जयपुरी" से इतना बढिया रिश्ता होने के कारण कई लोग यह भी मानते हैं कि "हसरत जयपुरी" हीं इनके पिता हैं। शुक्र है कि मुझे उनके पिता का नाम मिल गया, नहीं तो मुमकिन था कि मैं भी यही मान बैठता । चलिए अब कुछ लीक से हटकर बात करता हूँ। आप लोगों ने यह महसूस किया होगा कि आज का अंक बाकी के अंकों से काफ़ी छोटा है, इसका कारण यह है कि मुझे यह पूरा का पूरा आलेख बेमन से लिखना पड़ा। दर-असल मैं जब यह लिखने बैठा तभी मुझे "हिन्दी साहित्य के तीन बड़े कवियों की दुर्घटना में मृत्यु" की जानकारी मिली। पूरा ब्योरा जानने के लिए यहाँ जाएँ। इसके बाद मै लाख कोशिशों के बावजूद अपने मन को संयत न कर सका। भले हीं मेरे पास "हुसैन बंधुओं" के बारे में अच्छी-खासी जानकारी थी, लेकिन जब दिल और दिमाग हीं काम न करे तो उन जानकारियों का क्या फ़ायदा। वैसे मैं आपको यह विश्वास दिलाता हूँ कि आने वाले कुछ दिनों में मैं इन दोनों बंधुओं पर एक आलेख लेकर हाजिर होऊँगा, लेकिन आज मुझे मुआफ़ कीजिए। ग़म की इस घड़ी में "हसरत जयपुरी" का लिखा एक शेर मुझे याद आ रहा है, जिसे संयोगवश "हुसैन बंधुओं" ने हीं अपनी आवाज़ से सजाया था। ध्यान देंगे:

आपके दम से हीं कायम है निज़ाम-ए-ज़िंदगी,
एक पल के वास्ते भी छोड़ न जाना हमें।


इस बात का ग़म है कि हमें वे लोग छोड़ गएं,लेकिन उनके शब्द हमारे बीच हमेशा जिंदा रहेंगे, क्योंकि हम सबने उनकी कला से इश्क किया था और इश्क के दरिया में उतरने वाले डूब कर भी उभर जाते हैं। :

इश्क के दरिया में जब आ जाएगा,
दिल ग़मों से खुद उभरता जाएगा।

तोड़ देगा ये हदों को एक दिन,
बहते पानी को जो रोका जाएगा।

हम हुए बर्बाद भी तो देखना,
कुछ सबब तुमसे भी पूछा जाएगा।

मुंतज़िर है हम इसी उम्मीद पर,
आप आएँगे करार आ जाएगा।

हश्र के दिन को भी हमारी रूह को,
आप के कूचे में ढूँढा जाएगा।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

कहीं आँसूओं की है दास्ताँ, कहीं मुस्कुराहटों का बयां,
कहीं बरकतों की है ___, कहीं तिशनगी बेहिसाब है...

आपके विकल्प हैं -
a) बारिशें, b) रहमतें, c) बरसातें, d) तोहमतें

इरशाद ....

पिछली महफ़िल के साथी-

पिछली महफिल का सही शब्द था -"अँधेरा". पर कोई भी श्रोता सही जवाब नहीं दे पाया. सब ने "घर जला" कर उजाला होने की बात सोच ली, पर मैकदे में जहाँ घर जलाकर शराब पी जाए वहां उजाला कैसे हो सकता है. शायर ने बहुत समझदारी से यहाँ विरोधाभासी शब्दों का तालमेल बिठाया है. सही शेर कुछ यूँ था -

इसीलिए तो अँधेरा है मैकदे में बहुत,
यहाँ घरों को जलाकर शराब पीते हैं ...

मंजू जी और जाकिर जी आपका महफ़िल में स्वागत है. रचना जी, सुमित जी, फ़राज़ जी, आशीष जी, मनु जी, कुलदीप अंजुम जी, आप सब ने कोशिश की...आज आप सब सही जवाब देंगें हमें यकीन है. बहरहाल कुछ शेर जो आप सब ने याद दिलाये उनमें से कुछ में "अँधेरा" शब्द भी आया है. कुछ चुनिन्दा शेर गौर फरमाएं-

चिरागो ने जब अंधेरो से दोस्ती की है,
जला के अपना घर हमने रोशनी की है। (सुमित)

इस अँधेरे में तो ठोकर ही उजाला देगी
रात जंगल में कोई शम्मा जलाने से रही (आशीष)

उजालो में अब हमे दिखाई नहीं देता
अँधेरे में कोई बाहर जाने नहीं देता (कुलदीप अंजुम)

चलिए महफिले शाद रहे आबाद रहे हम तो बस यही दुआ करेंगे...

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर सोमवार और गुरूवार दो अनमोल रचनाओं के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Friday, June 5, 2009

तेरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे..... पेश है ऐसी हीं एक महफ़िल

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #१८

मुमकिन है कि मेरी इस बात पर कईयों की भौंहें तन जाएँ, कई सारे लोग मुझे देशभक्ति का सबक सिखाने को आतुर हो जाएँ तो कई सारे लोग इस पंक्ति से आगे हीं न पढें, लेकिन आज मैं जो कुछ कहने जा रहा हूँ, वह कई दिनों से मेरे सीने में दबा था और मुझे लगा कि आज का दिन हीं सबसे सटीक दिन है जिस दिन इस बात की चर्चा की जा सकती है। चूँकि हम सब संगीत के पुजारी हैं, संगीत के भक्त हैं और संगीत के देवी-देवताओं की खोज में रहा करते हैं,इसलिए जिस ओर भी हमें सुर और ताल की भनक लगती है, उसी ओर रूख कर लेते हैं। इसी संगीत की आराधना के लिए हमने महफ़िल-ए-गज़ल के इस अंक को भी सजाया है। अब इसे संयोग कहिए या फिर ऊपर वाले की कोई जानी-पहचानी साजिश कि आज की गज़ल से जो दो फ़नकार जुड़े हुए हैं,उनका हमारे मुल्क और हमारे पड़ोसी मुल्क से बड़ा हीं गहरा नाता है। और यही कारण है कि मैं कुछ लीक से हटकर कहने पर आमादा हुआ जा रहा हूँ। जब भी मैं गुलाम अली, मेहदी हसन जैसे फ़नकारों को सुनता हूँ या फिर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़,अहमद फ़राज़ जैसे शायरों को पढता हूँ तो मेरे दिल से यह आह उठती है कि काश हिन्दुस्तान का बँटवारा न हुआ होता, काश दोनों मुल्क एक होते तो फिर हम बड़े हीं फ़ख्र से कहते हैं कि नु्सरत फ़तेह अली खान साहब हिन्दुस्तान की शान हैं। बँटवारे का दर्द तब और भी गहरा हो जाता है जब हमें यह मालूम हो कि अमूक शख्स को बँटवारे के दौरान या फिर उसी इर्द-गिर्द अपना सब कुछ छोड़कर पाकिस्तान की ओर रूख करना पड़ा था। उस ओर से हिन्दुस्तान आने वालों पर भी यही बात लागू होती है। आज हम जिन दो फ़नकारों की बात करने जा रहे हैं, उन दोनों में एक बात खास है और वह यह कि दोनों ने हीं बँटवारे के दर्द को महसूस किया है। पहली शख्सियत एक फ़नकारा हैं जिनका जन्म पंजाब के रोहतक में हुआ था तो दूसरे शख्स एक फ़नकार, एक शायर हैं जिनका जन्म पंजाब के हीं होशियारपुर में हुआ था और दोनों ने हीं पाकिस्तान में अपनी अंतिम साँसें लीं। चलिए उनके बारे में विस्तार से जानकारी लेते हैं।

आज से महज़ ४४ दिन पहले यानी कि २१ अप्रैल को हीं वह बदकिस्मत घड़ी आई थी, जब हमें उस फ़नकारा को अंतिम विदाई देनी पड़ी। हम जिन फ़नकारा की बात कर रहे हैं,उन्हें कुछ लोग पाकिस्तान की "बेग़म अख्तर" भी कहा करते हैं। तो कुछ लोगों का यह भी कहना है कि "अगर नूरजहाँ ने ’मुझसे पहली-सी मोहब्बत’, मेहदी हसन ने ’गुलों में रंग भरे’ और इन फ़नकारा ने ’लाज़िम है कि हम भी देखेंगे’ न गाया होता " तो ’फ़ैज़’ को उतना फ़ैज़ नसीब न होता"। इन फ़नकारा ने "फ़ैज़ अहमद फ़ैज़" को जितना गाया है, उतना शायद हीं किसी और ने गाया होगा। "फ़ैज़" साहब के अलावा "अहमद फ़राज़" की गज़लों को मक़बूल करने में भी इनका बड़ा हाथ था। न जाने ऐसी कितनी हीं गज़लें हैं जो प्रसिद्धि की मुकाम पर तब हीं पहुँचीं जब उन्हें इनकी आवाज़ का सहारा मिला। ये जब तक ज़िंदा रहीं, तब तक इनका इक़बाल बुलंद रहा और हो भी क्यों न हो जब इनका नाम हीं "इक़बाल" था। जी हाँ , हम गज़ल-गायकी की अज़ीम-उस-शान शख्सियत "इक़बाल बानो" की बात कर रहे हैं और यह भी बता दें कि इनका इक़बाल हमेशा हीं बुलंद रहने वाला है। "इक़बाल" साहिबा,जिन्होंने संगीत की तालीम दिल्ली घराने के उस्ताद चाँद खान से ली थी, को अपने फ़न का प्रदर्शन करने का पहला मौका "आल इंडिया रेडियो" के दिल्ली स्टेशन में मिला था। यह सन् ५० के भी पहले की बात है। तब तक वह एक स्टार हो चुकी थीं। कुछ हीं महीनों में उन्हें पाकिस्तान की ओर पलायन करना पड़ा, जहाँ महज सतरह साल की उम्र में उनकी शादी एक जमींदार से कर दी गई। इसे उन्हें चाहने वालों की दुआ कहिये या फिर खुशकिस्मती कि शादी के बाद भी उनका अंदाज कमतर न हुआ और उन्होंने गाना जारी रखा। ५४ से ५९ के बीच उन्होंने लगभग छह उर्दू फिल्मों में गाने गाए, जिनमें "गुमनाम", "क़ातिल", "सरफ़रोश" प्रमुख हैं। पाकिस्तानी संगीत में बेशकिमती योगदान देने के कारण १९७४ में पाकिस्तान सरकार ने उन्हें तमगा-ए-इम्तियाज़ से नवाजा। "इक़बाल" साहिबा के लिए नवाजिश और अवाम में अवाम का ओहदा ज्यादा बड़ा था और इसीलिए १९८० में जब पाकिस्तान की गद्दी पर फ़ौज़ काबिज थी और जनरल ज़िया उल हक़ का उत्पात चरम पर था, तब उन्होंने लोगों को जगाने के लिए "फ़ैज़" के क्रांतिकारी कलाम गाने शुरू कर दिए। सरकार की कठोर नीतियों और उनके गाने पर लगी पाबंदी का भी उन पर कोई असर न हुआ। ऐसी जिगर वाली थीं हमारी आज की फ़नकारा। उस पुर-असर आवाज़ की मल्लिका ने अपने पति की मौत के बाद लाहौर को अपनी कर्मभूमि की तौर पर चुना और अपनी अंतिम साँस भी वहीं ली। यह तो हुई पहली फ़नकारा की बात, अब हम आज के दूसरे फ़नकार की और रूख करते हैं।

१९१२ में "पंजाब" के होशियारपुर में जन्मे "अब्दुल हाफ़िज़ सलीम" के बारे में अंतर्जाल पर बमुश्किल हीं कोई जानकारी मौजूद है। जिससे भी पूछो, वह आपको उनकी गज़लों की फ़ेहरिश्त थमाकर खुश हो जाता है और आपको भी उतने से हीं संतुष्ट होना होता है। मेरी खुशकिस्मती है कि मैं उनके बारे में इससे ज्यादा कुछ पता कर पाया हूँ। एक तो यह कि "इक़बाल" साहिबा की तरह उन्हें भी बँटवारे में पाकिस्तान जाना पड़ा था। इसके अलावा यह कि सिंध प्रांत के हैदराबाद शहर को उन्होंने अपनी कर्मभूमि की तौर पर स्वीकार किया था। वहाँ पर "रेडियो पाकिस्तान" में वे "पत्रकार" और "उद्धोषक" का फ़र्ज़ अदा करते रहे और जब "रिटायर" होने का निश्चय किया तब वे "डिप्टी डायरेक्टर जनरल" के पद को सुशोभित कर रहे थे। शायरी के शौक ने उन्हें एक तखल्लुस भी दिया था। और मेरी मानें तो शायद हीं कोई होगा, जो उन्हें उनके मूल नाम से जानता होगा। जी हाँ, शायर और शायरी के प्रशंसक उन्हें "हाफ़िज़ होशियारपुरी" के नाम से जानते हैं। अपनी जन्मस्थली से इस तरह प्यार करने के उदाहरण आज कल कम हीं मिलते हैं। "हाफ़िज़" साहब का तखल्लुस जानने के बाद शायद अब आपने भी उन्हें पहचान लिया होगा। बरसों तक "हैदराबाद" में रहने वाले "हाफ़िज़" साहब ने ६१ साल की उम्र में अपनी अंतिम साँस "कराची" में ली। उनकी गज़लें जो बेहद मक़बूल हुईं, उनमें से कुछ हैं: १)तेरी तलाश में हम जब कभी निकलते हैं, २)कुछ इस तरह से नज़र से गुजर गया कोई , ३)कहीं देखी है शायद तेरी सूरत इससे पहले भी , ४)आज उन्हें कुछ इस तरह जी खोलकर देखा किए , ५)दीपक राग है चाहत अपनी काहे सुनाए तुम्हें। सारी गज़लें एक से बढकर एक हैं और उन गज़लों की तरह हीं एक और गज़ल है, जो हम आपको आज सुनाने जा रहे हैं। लेकिन उस गज़ल को सुनाने से पहले हम "हाफ़िज़" साहब का हीं एक शेर आपके सामने अर्ज करना चाहते हैं। मुलाहजा फ़रामाईयेगा:

मेरी किस्मत कि मैं इस दौर में बदनाम हुआ वरना,
वफ़ादारी थी शर्त्त-ए-आदमियत इससे पहले भी।


मुआफ़ कीजिएगा, आज कुछ ज्यादा हीं इंतज़ार करा दिया आपको। क्या करें, फ़नकार हीं कुछ ऐसे थे। वैसे आज की गज़ल के बारे में तो कुछ भी नहीं कहा। कहूँ क्या? छोड़िये, ज्यादा कहूँगा तो मज़ा चला जाएगा, इसलिए आप खुद हीं इसका लुत्फ़ उठाईये:

मोहब्बत करने वाले कम न होंगे,
तेरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे।

ज़माने भर के ग़म या इक तेरा ग़म,
ये ग़म होगा तो कितने ग़म न होंगे।

दिलों की उलझने बढती रहेंगी,
अगर कुछ मशवरे बा-हम न होंगे।

अगर तू इत्तेफ़ाक़न मिल भी जाए,
तेरी फ़ुर्कत के सदमें कम न होंगे।

"हाफ़िज़" उनसे मैं जितना बदगुमां हूँ,
वो मुझसे इस क़दर बरहम न होंगे।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

इसीलिए तो ___ है मैकदे में बहुत,
यहाँ घरों को जला कर शराब पीते हैं...


आपके विकल्प हैं -
a) बसेरा, b) अँधेरा, c) सवेरा, d) उजाला

इरशाद ....

पिछली महफ़िल के साथी-

पिछली महफ़िल का शब्द था -"तबस्सुम" और शेर कुछ यूं था -

मुझे गुस्सा दिखाया जा रहा है,
तबस्सुम को चबाया जा रहा है..

सही जवाब देकर मैदान जीता स्वप्न मंजूषा शैल जी ने, और देखिये क्या खूब शेर भी अर्ज किया उन्होंने -

वो तबस्सुम से अपना ग़म दबाये जाए है
ये कैसी ख़लिश कि सुकूँ मुझे आये जाए है...

सुमित जी और मनु जी भी आये सही जवाब के साथ और दोनों को ही याद हो आये कुछ यादगार फ़िल्मी गीत. मनु जी ने एक शेर भी फरमाया पर जहाँ बात होनी थी तबस्सुम की वहां दर्द का जिक्र क्यों मनु जी :) कुलदीप अंजुम साहब भी आये कुछ यूं फरमाते हुए -

चुरायेंगे किसी का दिल, हम शेर को चुराएं क्या
चुरायेंगे एक खुशी मुफलिसी के दरमियाँ |
मुस्कुरा रहे हैं सब, हम अभी से मुस्कुराएं क्या
मुस्कुरायेंगे कभी खुदखुशी के दरमियाँ ||

वाह वाह.....वैसे आप अपनी सामग्री हमें hindyugm@gmail.com पर भेज सकते हैं. शमिक फ़राज़ जी आपका भी जवाब जाहिर है सही है पर यहाँ की परंपरा है आप अपना या किसी अन्य शायर का कोई शेर भी याद दिलायें जिसमें वो ख़ास शब्द आता हो. अब आप सब आज की महफ़िल का आनंद लें.

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर सोमवार और गुरूवार दो अनमोल रचनाओं के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Monday, April 6, 2009

आबिदा और नुसरत एक साथ...महफिल-ए-ग़ज़ल में

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #०२

नकी नज़र का दोष ना मेरे हुनर का दोष,
पाने को मुझको हो चला है इश्क सरफ़रोश।


इश्क वो बला है जो कब किस दिशा से आए, किसी को पता नहीं होता। इश्क पर न जाने कितनी हीं तहरीरें लिखी जा चुकी हैं, लेकिन इश्क को क्या कोई भी अब तक जान पाया है। पहली नज़र में हीं कोई किसी को कैसे भा जाता है, कोई किसी के लिए जान तक की बाजी क्यों लगा देता है और तो और इश्क के लिए कोई खुद की हस्ती तक को दाँव पर लगा देता है। आखिर ऎसा क्यों है? अगर इश्क के असर पर गौर किया जाए तो यह बात सभी मानेंगे कि इश्क इंसान में बदलाव ला देता है। इंसान खुद के बनाए रस्तों पर चलने लगता है और खुद के बनाए इन्हीं रस्तों पर खुदा मिलते हैं। कहते भी हैं कि "जो इश्क की मर्जी वही रब की मर्जी " । तो फिर ऎसा क्यों है कि इन खुदा के बंदों से कायनात की दुश्मनी ठन जाती है। तवारीख़ गवाह है कि जिसने भी इश्क की निगेहबानी की है, उसके हिस्से में संग(पत्थर) हीं आए हैं। सरफ़रोश इश्क इंसान को सरफ़रोश बना कर हीं छोड़ता है,वहीं दूसरी ओर खुदा के रसूल हीं खुदा के शाहकार को पाप का नाम देने लगते हैं:

संग-दिल जहां मुझसे भले हीं अलहदा रहे,
काफ़ी है कि मेरी तरफ बस वो खु़दा रहे।


बेग़म आबीदा परवीन,जिनके लिए सितारा-ए-इम्तियाज़ की उपाधि भी छोटी है,की आवाज़ में खुदावंद ने एक अलग हीं कशिश डाली है। आईये अब हम इन्हीं की पुरकशिश आवाज़ में कराँची के हकीम नसीर की लिखी गज़ल सुनते हैं।



गुजरे पहर में रात ने जो ख़्वाब कत्ल किये,
अच्छा है उनको भूलना,शब भर न वे जिये।


इंसान ईश्वर का सबसे पेचीदा आविष्कार है। वह वर्तमान में जीता है, भविष्य के पीछे भागता है और भूत की होनी-अनहोनी पर सर खपाता रहता है। ना हीं वह माज़ी का दामन छोड़ता है और ना हीं मुस्तकबिल से नज़रें हटाता है। इसी माज़ी-मुस्तकबिल के पेंच में उलझा वह मौजूद की बलि देता रहता है। वह जब किसी की चाह पाल लेता है तो या तो उसे पाकर हीं दम लेता है या फिर हरदम उसी की राह जोहता रहता है। और वही इंसान अगर इश्क के रास्ते पर हो तो उसे एक हीं मंज़िल दीखती है,फिर चाहे वह मंजिल कितनी भी दूर क्यों न हो या फिर उस रास्ते की कोई मंजिल हीं न हो। वह उसी रास्ते पर मुसलसल चलता रहता है, ना हीं वह मंजिल को भूलता है और ना हीं रास्ता बदलता है। उस नासमझ को इस बात का इल्म नहीं होता कि "जिस तरह दुनिया बेहतरी के लिए बदलती रही है, उसी तरह इंसान से भी फ़िज़ा यही उम्मीद करती है कि वह बेहतरी के लिए बदलता रहे।" कहा भी गया है कि "छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए, यह मुनासिब नहीं आदमी के लिए" । काश यह बात हर इंसान की समझ में आ जाए:

शिकवा क्यों अपने-आप से, ग़र पास सब न हो,
किस्मत में मोहतरम के भी मुमकिन है रब न हो।


मौजूदा गज़ल में अमज़द इस्लाम अमज़द कहते हैं -
"कहाँ आके रूकने थे रास्ते, कहाँ मोड़ था उसे भूल जा,
वो जो मिल गया उसे याद रख, जो नहीं मिला उसे भूल जा।"

उस्ताद नुसरत फतेह अली खान की आवाज़ ने इस गज़ल को दर्द से सराबोर कर दिया है। आईये हम और आप मिलकर इस दर्द-ए-सुखन का लुत्फ उठाते हैं।



चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक ख़ास शब्द होगा जो मोटे अक्षर में छपा होगा. वही शब्द आपका सूत्र है. आपने याद करके बताना है हमें वो सभी शेर जो आपको याद आते हैं जिसके दो मिसरों में कहीं न कहीं वही शब्द आता हो. आप अपना खुद का लिखा हुआ कोई शेर भी पेश कर सकते हैं जिसमें आपने उस ख़ास शब्द का प्रयोग किया हो. तो खंगालिए अपने जेहन को और अपने संग्रह में रखी शायरी की किताबों को. आज के लिए आपका शेर है - गौर से पढिये -

जिंदगी तुझसे हर एक बात पे समझौता करूँ,
शौक जीने का है मुझको मगर इतना भी नहीं...

इरशाद ....


प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर सोमवार और गुरूवार दो अनमोल रचनाओं के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.


Friday, October 17, 2008

सुनिए करवाचौथ पर कविता तथा संगीतबद्ध गीत

करवाचौथ पर हिन्द-युग्म की खास पेशकश


आज यानी की कार्तिक कृण्ण पक्ष की चतुर्थी को पूरे भारतवर्ष में सुहागिन स्त्रियाँ अपने पतियों की लम्बी उम्र के लिए करवाचौथ का व्रत रखती हैं। अभी पिछले सप्ताह हमने इसी त्यौहार को समर्पित शिवानी सिंह का गीत 'ऐसा नहीं कि आज मुझे चाँद चाहिए, मुझको तुम्हारे प्यार में विश्वास चाहिए' ज़ारी किया था।

हिन्द-युग्म आज इन्हीं सुहागनों को अपने ख़जाने से एक कविता समर्पित कर रहा है। हमने इस वर्ष के विश्व पुस्तक मेला में अपना पहला संगीतबद्ध एल्बम ज़ारी किया था, जिसमें १० कविताओं और १० गीतों का समावेश था। इसी एल्बम की एक कविता है 'करवाचौथ' जिसे विश्व दीपक 'तन्हा' ने लिखा है। इस कविता को आवाज़ दी है रूपेश ऋषि ने। इस कविता के तुरंत बाद हमने इसी एल्बम में सुनीता यादव द्वारा स्वरबद्ध किया तथा गाया हुआ गीत 'तू है दिल के पास'। हम समझते हैं कि अपने पतियों की लम्बी उम्र की आकांक्षी महिलाओं को हमारा यह उपहार ज़रूर पसंद आयेगा।



विश्वास का त्योहार

ओ चाँद तुझे पता है क्या?
तू कितना अनमोल है
देखने को धरती की सारी पत्नियाँ
बेसब्र फलक को ताकेंगी
कब आयेगा, तू कब छायेगा?
देगा उनको आशीर्वचन
होगा उनका प्रेम अमर

जी हाँ, करवाचौथ इसी उद्देश्य से मनाया जाता है। यह व्रत पंजाब, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में अत्यंत धूम-धाम से मनाया जाता है। भारतीय पांचांग जो कि खुद चन्द्रमा की चाल पर आधारित है के अनुसार प्रत्येक साल के कार्तिक महीने में चतुर्थी को सुहागिनों के लिये वरदान स्वरूप बनकर आता है। उनकी आस्था, परंपरा, धार्मिकता, अपने पति के लिये प्यार, सम्मान, समर्पण, इस एक व्रत में सबकुछ निहीत है। जैसाकि हम सब जानते हैं कि भारतीय पत्नी की सारी दुनिया, उसके पति से शुरू होती है उन्हीं पर समाप्त होती है। शायद चाँद को इसीलिये इसका प्रतीक माना गया होगा क्योंकि चाँद भी धरती के कक्षा में जिस तन्मयता, प्यार समर्पण से वो धरती के इर्द गिर्द रहता है, हमारी भारतीय औरते उसी प्रतीक को अपना लेती हैं। वैसे भी हमारा भारत, अपने परंपराओं, प्रकृति प्रेम, अध्यात्मिकता, वृहद संस्कृति, उच्च विचार और धार्मिक पुरजोरता के आधार पर विश्व में अपने अलग पहचान बनाने में सक्षम है। इसके उदाहरण स्वरूप करवा चौथ से अच्छा कौन सा व्रत हो सकता है जो कि परंपरा, अध्यात्म, प्यार, समर्पण, प्रकृति प्रेम, और जीवन सबको एक साथ, एक सूत्र में पिरोकर, सदियों से चलता आ रहा है। मैं सोच रही हूँ कि इस व्रत के बारे में मैं क्या बताऊँ? मुझसे बेहतर सब जानते हैं? व्रत की पूजा, विधी, दंत कथाएँ, कथाएँ, इत्यादि के बारे में सभी लोगों को पता है। अन्तरजाल पर तो वृहद स्तर पर सारी सामग्री भी उपलब्ध है। तो उसी रटी-रटायी बात को दुबारा से रटने का मन नहीं बन रहा है। वैसे करवा चौथ पर मेरा निजी दृष्टिकोण कुछ नहीं है, कोई पूर्वाग्रह भी नहीं है। पूर्वी प्रदेश के इलाकों में इस व्रत की पहुँच नहीं है, तो मैंने कभी अपने घर में करवाचौथ का व्रत होने नहीं देखा। मेरा अपना मानना है कि यह पावन व्रत किसी परंपरा के आधार पर न होकर, युगल के अपने ताल-मेल पर हो तो बेहतर है। जहाँ पत्नी इस कामना के साथ दिन भर निर्जला रहकर रात को चाँद देखकर अपने चाँद के शाश्वत जीवन की कामना करती है, वह कामना सच्चे दिल से शाश्वत प्रेम से परिपूर्ण हो, न कि सिर्फ इसलिये हो को ऐसी परंपरा है। यह तभी संभव होगा जब युगल का व्यक्तिगत जीवन परंपरा के आधार पर न जाकर, प्रेम के आधार पर हो, शादी सिर्फ एक बंधन न हो, बल्कि शादी नवजीवन का खुला आकाश हो, जिसमें प्यार का ऐसा वृक्ष लहरायें जिसकी जड़ों में परंपरा का दीमक नहीं प्यार का अमृत बरसता हो, जिसकी तनाओं में, बंधन का नहीं प्रेम का आधार हो। जब ऐसा युगल एक दूसरे के लिये, करवा चौथ का व्रत करके चाँद से अपने प्यार के शाश्वत होने का आशीर्वचन माँगेगा तो चाँद ही क्या, पूरी कायनात से उनको वो आशीर्वचन मिलेगा।

करवाचौथ महज एक व्रत नहीं है, बल्कि सूत्र है, विश्चास का कि हम साथ साथ रहेंगे, आधार है जीने का कि हमारा साथ ना छूटे। आज हम कितना भी आधुनिक हो जायें, पर क्या ये आधुनिकता हमारे बीच के प्यार को मिटाने के लिये होनी चाहिये?

आधुनिक होने का मतलब क्या होता है, मुझे समझ में नहीं आया.. शायद आम भाषा में आधुनिक होने का मतलब होता होगा, अपनी जड़ों से खोखला होना। रिश्तों में अपनत्व का मिट जाना, फालतू का अपने संस्कृति पर अंगूली उठाते रहना। हम यह भूल जाते है कि परंपरा वक्त की मांग के अनुसार बनी होती है, वक़्त के साथ परंपरा में संशोधन किया जाना चाहिये पर उसको तिरस्कृत नहीं करना चाहिये, आखिर यही परम्परा हमारे पूर्वजों की धरोहर है।
मेरे विदेशी क्लाईंट्स से कभी-कभार इस पर अच्छा विचार विमर्श हो जाता है। आज ही की बात है, ऑनलाईन मेडिटेशन क्लास के बाद एक क्लाईंट को करवा चौथ के बारे में जानने कि इच्छा हूई। पूरी बात समझने के बाद आप जानते हैं उन्होंने क्या कहा? अगले साल से वो भी करवा चौथ का व्रत रखेगी। चौकिये मत, मुझे नहीं पता कि वो अगले साल तक इस बात को याद रख पायेंगी या नहीं, पर हाँ अपने रिश्ते को मजबूत बनाने के लिये उनकी यह सोच ही काफी नहीं लगती? आखिर हम आधुनिकता का लबादा ओढ़ कर कब तक अपने धरोहर को, अपने ही प्यार के वुक्ष को काटते रहने पर तुले रहेंगे।
परंपरा, जो विश्चास की नींव पर, सच्चाई के ईंट से, प्यार रूपी हिम्मत से सदियो से चली आ रही है, उसको खोखला बताना गलत नहीं है तो क्या है?
करवा चौथ जबरन नहीं, प्यार से, विश्वास से मनाईये, इस यकिन से मनाइये कि आपका प्यार अमिट और शास्वत रहे।

-डॉ॰ गरिमा तिवारी
(तत्वज्ञ)

पूजन-विधि तथा पौराणिक मान्यताएँ






चित्र वाली जानकारी का स्रोत- http://www.indif.com

Thursday, October 16, 2008

कोशिश जब तेरी हद से गुज़र जायेगी...मंजिल ख़ुद ब ख़ुद तेरे पास चली आएगी

पिछले लगभग एक हफ्ते से हम आपको सुनवा रहे हैं एक ऐसे गायक को जिसने अपनी खनकती आवाज़ में संगीतमय श्रद्धाजंली प्रस्तुत की अजीम ओ उस्ताद शायरों को,जिसे आप सब ने सुना और बेहद सराहा भी. ,

लीजिये आज हम आपके रूबरू लेकर आये हैं उसी जबरदस्त फनकार को जिसकी आवाज़ में सोज़ भी है और साज़ भी और जिसका है सबसे मुक्तलिफ़ अंदाज़ भी. आवाज़ की खोजी टीम निरंतर नई और पुरकशिश आवाजों की तलाश में जुटी है, और हमें बेहद खुशी और फक्र है की हम कुछ नायाब आवाजों को आपके समक्ष लाने में सफल रहे हैं. आवाज़ की टीम आज गर्व के साथ पेश कर रही है गायन और संगीत की दुनिया का एक बेहद चमकता सितारा - शिशिर पारखी. इससे पहले कि हम शिशिर जी से मुखातिब हों आईये जान लें उनका एक संक्षिप्त परिचय.

एक संगीतमय परिवार में जन्में शिशिर को संगीत जैसे विरासत में मिला था. उनकी माँ श्रीमती प्रतिमा पारखी संगीत विशारद और बेहद मशहूर संगीत अध्यापिका होने के साथ साथ पिछले ३५ वर्षों से आल इंडिया रेडियो की ग्रेडड आर्टिस्ट भी हैं. स्वर्गीय पिता श्री शरद पारखी बोकारों के SAIL प्लांट में चीफ आर्किटेक्ट होने के साथ साथ एक बेहतरीन संगीतकार और संगीत प्रेमी थे, दोनों ने ही बचपन से शिशिर को संगीत सीखने के लिए प्रेरित किया जिसका परिणाम ये हुआ कि मात्र ६ साल की उम्र में उन्होंने गायन और तबला सीखना शुरू किया, स्कूल प्रतियोगिताओं में रंग ज़माने के बाद उन्हें अंतर्राष्ट्रीय बाल वर्ष के दौरान आल इंडिया रेडियो पर गाने के लिए आमंत्रित किया गया, १५ वर्ष की आयु में उन्होंने अपना पहला स्टेज परफॉर्मेंस (solo ghazal concert) पेश किया. आज वो ख़ुद भी दूरदर्शन और AIR के ग्रेडड आर्टिस्ट हैं और बहुत बार आपने इन्हे दूरदर्शन पर अपनी आवाज़ का जादू बिखेरते हुए देखा भी होगा, अगर नही तो कुछ क्लिपिंग यहाँ से आप देख सकते हैं -

http://in.youtube.com/user/ghazalsingershishir



चाहे वो ग़ज़ल हो, या फ़िर भजन, सुगम संगीत हो या फ़िर हिन्दी फिल्मी गीत, शास्त्रीय गायन हो या फ़िर क्षेत्रीय लोक गीत, शिशिर की महारत गायन की हर विधा में आपको मिलेगी. आज उनके खाते में २००० से भी अधिक लाइव शो दर्ज हैं, विभिन्न विधाओं में उनकी लगभग १०० के आस पास कासेस्ट्स, ऑडियो CDS और VCDs टी सीरीज़ और वीनस बाज़ार में ला चुकी है. "एहतराम" उनकी सबसे ताज़ी और अब तक कि सबसे दमदार प्रस्तुति है जिसकी पीछे बहुत उनकी पूरी टीम ने बहुत मेहनत से काम किया है, यह एक कोशिश है उर्दू अदब के अजीम शायरों को एक tribute देने की, इन ग़ज़लों को आप आवाज़ पर सुन ही चुके हैं. इस खूबसूरत से संकलन से यदि आप अपने सगीत संग्रहालय को और समृद्ध बनाना चाहते हैं तो इस लिंक पर जाकर इस ACD को हमेशा के लिए अपना बना सकते हैं -

http://webstore.tseries.com/product_details.php?type=acd&pid=1985

आवाज़ के लिए विश्व दीपक "तन्हा" ने की शिशिर जी से एक खास मुलाकात, पेश है उसी बातचीत के अंश -

शिशिर जी आपके लगभग १०० से ज्यादा कैसेट्स रीलिज हो चुके हैं। संगीत की दुनिया में आप अपने आप को कहाँ पाते हैं?

संगीत एक महासागर है.इसकी गहराई और विशालता में कौन कहाँ है ये समझ पाना नामुमकिन है.
बस यही कह सकता हूँ .....

अपनी ऊँचाइओं का ज़िक्र मैं क्या करूँ
सामने हूँ मैं, और ऊपर आस्मां है

हालाँकि संगीत के भरोसे अपनी उपजीविका अर्जन करना साधना है, उपासना है, तपस्या है .... मेरी हर एक कैसेट या सीडी मेरेलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इस क्षेत्र में जो स्थिरता मुझे मिली है वह मैं नाज़रंदाज़ नहीं कर सकता. प्रत्येक एल्बम में मेरा समर्पण और मुझे सुनने वालों की बढ़ती चाहत, यही मेरी संपत्ति है.

गज़ल, भजन, सुगम संगीत , हिंदी फिल्मी संगीत और क्षेत्रीय (रीजनल) संगीत में आप किसे ज्यादा तवज्जो देते हैं और क्यों?

जैसा कि मैंने कहा संगीत तो महासागर है. चाहे भजन हो, गीत हो, ग़ज़ल हो या फिर लोक संगीत, हर एक का अपना ख़ास अंदाज़ व महत्व है यह सारे अंदाज़ अत्मसाद करके सही तरीके से प्रस्तुत करना यही एक कलाकार की असल कला का मापदंड होता है. इसलिए किसी एक गायन पद्धति या शैली को तवज्जो देना मेरी नज़र में ज्यादती होगी. इनके अलावा भी संगीत के जो प्रकार हैं, उनकी नवीनता स्वीकार करने के लिए सदैव मैं तत्पर रहूँगा. हाँ लेकिन यह कह सकता हूँ कि मैं गा रहा हूँ और सामने श्रोता बैठे हों यानी जब मैं लाइव कंसर्ट करता हूँ तो उसका आनंद और अंदाज़ ही कुछ निराला होता है. मैं ग़ज़ल, भजन व हिन्दी फिल्मी गीतों के लाइव प्रोग्राम्स अक़्सर करता रहता हूँ.

"एहतराम" आपकी जानीमानी गज़लों की एलबम है। इस एलबम के बारे में अपने कुछ अनुभव बताएँ।

एहतराम मेरा ' ड्रीम प्रोजेक्ट ' है. जिन महान शायरों के दम पर उर्दू शायरी का आधार टिका है, उनका एहतराम लाज़मी ही है. मैं पिछले २० वर्षों से लाइव ग़ज़ल कंसर्ट्स करता आ रहा हूँ. मैं चाहता था की मेरे ग़ज़ल अल्बम्स का आगाज़ इन महान शायरों के एहतराम से ही हो. इसके निर्माण की कल्पना के साथ ही मुझे हर जगह से काफी प्रोत्साहन मिला.टी-सीरीज़ के लिए मैंने पिछले कुछ वर्षों में करीब बीस devotional अल्बम्स किए हैं. इस पहले ग़ज़ल अल्बम के लिए भी टी-सीरीज़ के श्री अजीत कोहली जी ने काफी सहयोग दिया व प्रोत्साहित किया और इस ग़ज़ल सीडी को worldwide रिलीज़ किया गया. यह टी-सीरीज़ के webstores पर भी उपलब्ध है.

लोगों की फरमाइश पर एहतिराम की सभी ग़ज़लों को Nairobi, Kenya के १०६.३ ईस्ट फम पर कई बार बजाया गया व विदेशों में भी इसे worldspace Radio पर सुना गया.इसके अलावा दुनियाँ भर की कई जगहों से लगातार e- mails आते रहते हैं.विदेशों में लाइव ग़ज़ल कंसर्ट्स के लिए भी काफी लोग पूछ रहे हैं. इन प्रतिक्रियाओं से यह लगता है की लोगों को ये ग़ज़लें काफी पसंद आ रही है. इन शुरवाती अनुभवों के बाद देखते हैं आगे आगे और क्या क्या अनुभव आते हैं. 'एहतराम' सही मायने में एहतराम के काबिल महसूस हो रहा है ये निश्चित है.

जी सही कहा आपने इन्हे आवाज़ पर भी काफी पसंद किया गया है. "अहतराम" में संजोई गई सारी गज़लें सुप्रसिद्ध शाइरों की है। गज़लों को देखकर महसूस होता है कि गज़लों को चुनने में अच्छी खासी स्टडी की गई है। गज़लों का चुनाव आपने किया है या फिर किसी और की सहायता ली है?

जब तक गानेवाला किसी भी ग़ज़ल के लफ्जों से अच्छी तरह वाकिफ़ न हो वह सही भाव प्रस्तुत नही कर सकता और इसलिए यह सारी मशक्कत मैने ही की है और तहे दिल से की है. अगर आप उर्दू शायरी का इतिहास देखें तो मीर से लेकर दाग़ तक का काल उर्दू शायरी का स्वर्णकाल कहलाता है. उस समय के हर नामचीन शायरों की रचनाओं को पढ़ना, समझना और ख़ास अदा से प्रस्तुत करना यह एक लंबा दौर मैंने गुज़ारा है.काफी सालों से अध्ययन करते करते मेरे पास ग़ज़ल और शायरी से सम्बंधित कई किताबों का अच्छा खासा संग्रह तैयार हो गया है.कुल मिलकर एहतिराम मेरा एक सफल प्रयत्न है यह चाहनेवालों के प्रतिसाद से साबित हो रहा है.

यकीनन शिशिर जी, गज़लों को संगीत से सजाना आप कितना कठिन मानते हैं? चूँकि गज़लें खालिस उर्दू की हैं, तो क्या गज़लों में भाव जगाने के लिए आपके लिहाज से उर्दू की जानकारी नितांत जरूरी है।

निश्चित ही ग़ज़ल की खासिअत यही है की उसके नियमो के आधार पर ही वह खरी उतरती है.किसी शायर ने कहा है-

खामोशी से हज़ार ग़म सहना
कितना दुश्वार है ग़ज़ल कहना

दूसरे शायर कहते हैं -

शायरी क्या है, दिली जज़्बात का इज़हार है
दिल अगर बेकार है तो शायरी बेकार है

ग़ज़ल की बहर के आधार पर और ख़ास लफ्जों के आधार पर तर्ज़ का होना ज़रूरी है. यह निश्चित रूप से थोड़ा कठिन है. अब जिन्हें उर्दू भाषा की जानकारी न हो वह ग़ज़ल के साथ न्याय कैसे कर सकता है? उर्दू भाषा का उच्चारण भी सही होना अनिवार्य है और साथ ही उसके अर्थ को समझना भी. हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में भी ख़ास भाव प्रस्तुत करने के लिए ख़ास रागों का व सुरों का प्रावधान है. उन्ही सुरों में वह प्रभावी भी होता है. इसलिए ग़ज़ल गाने के लिए पुरी तरह उस ग़ज़ल का हो जाना ज़रूरी है ऐसा मैं मानता हूँ. इस सब के बावजूद किसी शायर ने सच कहा है-

ग़ज़ल में बंदिशे-अल्फाज़ ही नहीं सब कुछ
जिगर का खून भी कुछ चाहिए असर के लिए

मराठी पृष्ठभूमि (background) के होने के कारण आपको हिंदी और उर्दू की रचनाओं में संगीत देने और गाने में कोई दिक्कत महसूस होती है?

जैसा कि मैने कहा की ग़ज़ल गाने के लिए उसके प्रति पुरी तरह समर्पित होना ज़रूरी है दरअसल शुरू से हिन्दी व उर्दू मेरी पसंद रही है और मेरा कार्यक्षेत्र रहा है.आज भी हमारे देश में ऐसे कई सफल ग़ज़ल गायक है जिनकी मातृभाषा हिन्दी या उर्दू नहीं है.भाषा किसी की बपौती नहीं है बशर्ते आप उसके प्रति पुरी तरह समर्पित हों. मेरी ग़ज़लों को सुनने वाले कुछ जानकार लोग ही यह तय करें की मै उन ग़ज़लों के साथ न्याय कर पाया हूँ या नहीं.

आपको एक और उदाहरण देना चाहूँगा की कुछ वर्ष पहले मैं गल्फ टूर पर गया था. टीम में अकेला गायक था और वहां तो सभी भाषाओँ के गीत गाने पड़ते थे. मराठी ही क्या, मलयाली, तमिल, तेलगु व पंजाबी सभी श्रोताओं को मैने संतुस्ट किया.

बिल्कुल सही कहा आपने शिशिर जी, भाषा किसी कि बपौती बिल्कुल नही है, ये बतायें आपने सुरेश वाडेकर, अनुराधा पौंडवाल और साधना सरगम जैसे नामी फ़नकारों के साथ भी काम किया है। उनके साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?

अनुभव अच्छा ही रहा. वे सभी बहुत अच्छे कलाकार हैं उनसे प्रोत्साहन भी मिला. आगे भी मेरे स्वरबद्ध किए हुआ गाने वो ज़रूर गायेंगे ऐसी उम्मीद है.

बतौर संगीतकार हिंदी फिल्मों में संगीत देने के बारे में आप क्या सोचते हैं?

दरअसल इस क्षेत्र में अपनी सोच ही काफी नहीं होती पर फ़िल्म में संगीत देना कौन नहीं चाहेगा? मुझे अलग अलग प्रकार के गीत, भजन, ग़ज़ल, क्षेत्रीय संगीत को स्वरबद्ध करने का या संगीत देने का अनुभव रहा है. ग़ज़ल, भजन के अलावा फिल्मी गीतों पर आधारित नए पुराने गानों के लाइव प्रोग्राम्स भी कई सालों से करता आ रहा हूँ. लोगों की पसंद मैं काफी हद तक समझता हूँ. इसके अलावा कई टेलिविज़न सेरिअल्स में भी संगीत दिया व प्लेबैक किया है. इसलिए मौका मिला तो फ़िल्म संगीत में भी पुरा न्याय करूँगा ये मेरा विश्वास है.


संगीत की दुनिया में संघर्ष का क्या स्थान है? चूँकि आप एक मुकाम हासिल कर चुके हैं, इस क्षेत्र में नए लोगों को आप क्या सलाह देना चाहेंगे?

संघर्ष जीवन का अविभाज्य अंग है. जीवन के हर क्षेत्र में संघर्ष ज़रूरी है जितने भी बड़े कलाकार है वो संघर्ष के बिना ऊपर नहीं आए हैं.पर हाँ किस्मत भी अपनी जगह महत्व रखती है पर सबसे ज़रूरी है लगन और लक्ष्य प्राप्ति के लिए संघर्ष की तैयारी. प्रातियोगिता आज सर चढ़ कर बोल रही है. हर नए कलाकार को इस प्रवाह में ख़ुद को प्रवाहित करना ज़रूरी है और जब प्रवाहित होना ही है तो तैरना सीख लेना फायदेमंद होगा . मतलब यह कि पहले संपूर्ण संगीत का ज्ञान और बाद में बदलते समय के साथ संगीत के प्रति समर्पण और न्याय. अर्जुन की तरह बस आँख देखते रहे और निशाना लगते रहे क्योंकि-

कोशिश जब तेरी हद से गुज़र जायेगी
मंजिल ख़ुद ब ख़ुद तेरे पास चली आएगी

भविष्य के लिए आपकी क्या योजनाएँ हैं?

फिलहाल तो लाइव प्रोग्राम्स ख़ास कर ग़ज़लों की महफिलों में व्यस्त हूँ. अगले ग़ज़ल एल्बम की तैयारी चल रही है एक बिल्कुल नए शायर के साथ. और बहुत से प्लान्स हैं आगे आपको बताते रहूँगा. हिंद युग्म के साथ एक लम्बी पारी की उम्मीद कर रहा हूँ, कुछ योजनाओं पर बात चल रही है देखते हैं कहाँ तक बात पहुँचती है.

बहुत से नए कलाकारों को आवाज़ एक मंच दे चुका है. ये सब अभी अपने शुरुवाती दौर में हैं. और आप बेहद अनुभवी. इन नए कलाकारों के लिए आप क्या सदेश देना चाहेंगे ?

चाहे शायर हो,गायक या संगीतकार उनके अवश्यकता के अनुसार उचित मार्गदर्शन व सहयोग देने के लिए मै सदा तैयार हूँ. किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए आप हिंद युग्म या मुझे shishir.parkhie@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

आप संगीत के क्षेत्र में यूँ हीं दिन दुनी रात चौगुनी तरक्की करते रहें हिंद युग्म परिवार यही दुआ करता हैं.

शिशिर पारखी जी का संपर्क सूत्र -

Shishir parkhie
Singer & Music Composer
13, Kasturba Layout, Ambazari, Nagpur
Mahashtra, India. Zip- 440033
Cell:00919823113823
Land: 91-712-2241663

Thursday, July 31, 2008

जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे...

आवाज़ पर आज का दिन समर्पित रहा, अजीम फनकार मोहमद रफी साहब के नाम, संजय भाई ने सुबह वसंत देसाई की बात याद दिलाई थी, वे कहते थे " रफ़ी साहब कोई सामान्य इंसान नही थे...वह तो एक शापित गंधर्व था जो किसी मामूली सी ग़लती का पश्चाताप करने इस मृत्युलोक में आ गया." बात रूपक में कही गई है लेकिन रफ़ी साहब की शख़्सियत पर एकदम फ़बती है.( पूरा पढ़ें ...)

मोहम्मद रफी, ऐतिहासिक हिन्दी सिनेमा जगत का एक ऐसा स्तम्भ जो आज भी संगीत प्रेमियों के दिल पर अमिट छाप बनाये है, जिनकी सुरीली अद्वितीय आवाज हर रोज हमें दीवाना करती है और जिन्होंने करीब पैंतीस सालों में अपनी अतुलनीय आवाज में मधुर गीतों का एक बड़ा अम्बार हमारे लिये छोड़ा । रफी जी की आवाज एक ऐसी आवाज, जिसने दुःख भरे नगमों से लेकर धूम-धड़ाके वाले मस्ती भरे गीतों सभी को एक बहतरीन गायकी के साथ निभाया, यूँ तो बहुत से नये गायक कलाकारों द्वारा रफी जी की आवाज को नकल करने की कोशिश की गयी और उनको सराहा भी गया परंतु कोई भी मोहम्मद रफी के उस जादू को नही ला सका; शायद कोई कर भी न सके । पुरजोर कोशिशों के बावजूद कोई भी ऐसा गायक रफी साहब की केवल एक-आध आवाज को नकल करने में सफल हो सकता है परंतु कोई भी रफी साहब की उस आवाज की विविधता को नही ला सकता जैसा वे करते थे.

रफी साहब, गीत-संगीत के आकाश में इस सितारे का उदय अमृतसर के निकट एक गांव कोटला सुल्तान सिंह में 24 दिसम्बर 1924 को हुआ । जब रफी जी अपने बचपन की सीढियां चढ रहे थे तब इनका परिवार लाहौर चला गया । रफी जी का गीत-संगीत के प्रति इतना लगाव था कि ये बचपन के दिनों में उस फकीर का पीछा करते थे जो प्रतिदिन उस जगह आता था और गीत गाता था जहाँ ये रहते थे । इनके बड़े भाई हामिद इनके संगीत के प्रति अटूट लगाव से परिचित थे और हमेशा प्रोत्साहित किया करते थे । लाहौर में ही उस्ताद वाहिद खान जी से रफी जी ने सगीत की शिक्षा प्राप्त करनी शुरू कर दी । रफी साहेब के शुरुवाती दिनों की कहानी आप को युनुस भाई बता ही चुके हैं ( यहाँ पढ़ें...)


रफ़ी साहब के संगीत सफर की बड़ी शुरूआत फिल्म "दुलारी(१९४९)" के सदाबहार गीत "सुहानी रात ढल चुकी" से हुई थी। इस गाने के बाद रफ़ी साहब ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और सत्तर के दशक तक वे पार्श्व-गायन के बेताज बादशाह रहे। इस सफलता के बावजूद, रफी साहब में किसी तरह का गुरूर न था और वे हमेशा हीं एक शांत और सुलझे हुए व्यक्तित्व के रूप में जाने गए। उनके कई सारे प्रशंसक तो आज तक यह समझ नहीं पाए कि इतना शांत और अंतर्मुखी व्यक्ति अपने गानों में निरा जोशीला कैसे नज़र आता है।

उनके पुत्र शाहिद के शब्दों में -

"जब एक बार हमने उनसे पूछा कि क्या वास्तव में आपने हीं 'याहू' गाया है, तो अब्बाजान ने मुस्कुराकर हामीं भर दी। हम उनसे पूछते रहे कि 'आपने यह गाना गाया कैसे?', पर उन्होंने इस बारे में कुछ न कहा। हमारे लिए यह सोचना भी नामुमकिन था कि उनके जैसा सरल इंसान "याहू" जैसी हुड़दंग को अपनी आवाज दे सकता है।"

शायद यह रफ़ी साहब की नेकदिली और संगीत जानने व सीखने की चाहत हीं थी, जिसने उन्हें इतना महान पार्श्व-गायक बनाया था। उन्होंने किसी भी फनकार की अनदेखी नहीं की। उनकी नज़रों में हर संगीतकार चाहे वह अनुभवी हो या फिर कोई नया, एक समान था। रफ़ी साहब का मानना था कि जो उन्हे नया गीत गाने को दे रहा है, वह उन्हें कुछ नया सीखा रहा है, इसलिए वह उनका "उस्ताद" है। अगर गीत और संगीत बढिया हो तो वे मेहनताने की परवाह भी नहीं करते थे। अगर किसी के पास पैसा न हो, तब भी वे समान भाव से हीं उसके लिए गाते थे।

गौरतलब है कि रफ़ी साहब ने अपने समय के लगभग सभी संगीतकारों के साथ काम किया था, परंतु जिन संगीतकारों ने उनकी प्रतिभा को बखूबी पहचाना और उनकी कला का भरपूर उपयोग किया , उनमें नौशाद साहब का नाम सबसे ऊपर आता है। नौशाद साहब के लिए उन्होंने सबसे पहला गाना फिल्म "पहले आप" के लिए "हिन्दुस्तान के हम हैं , है हिन्दुस्तान हमारा" गाया था। दोनों ने एक साथ बहुत सारे हिट गाने दिए जिन में से "बैजू बावरा" , "मेरे महबूब" प्रमुख हैं। एस०डी० बर्मन साहब के साथ भी रफ़ी साहब की जोड़ी बेहद हिट हुई थी। "कागज़ के फूल", "गाईड", "तेरे घर के सामने", "प्यासा" जैसी फिल्में इस कामयाब जोड़ी के कुछ उदाहरण हैं।

सत्तर के दशक के प्रारंभ में रफ़ी साहब की गायकी कुछ कम हो गई और संगीत के फ़लक पर किशोर दा नाम का एक नया सितारा उभरने लगा। परंतु रफ़ी साहन ने नासिर हुसैन की संगीतमय फिल्म "हम किसी से कम नहीं(१९७७)" से जबर्दस्त वापसी की। उसी साल उन्हें "क्या हुआ तेरा वादा" के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से भी नवाजा गया।

रफ़ी साहब के संगीत सफर का अंत "आस-पास" फिल्म के "तू कहीं आस-पास" गाने से हुआ। ३१ जुलाई, १९८० को उनका देहावसान हो गया। उनके शरीर की मृत्यु हो गई, परंतु उनकी आवाज आज हीं सारी फ़िज़ा में गूँजी हुई है। उनकी अमरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि , उनकी मृत्यु के लगभग तीन दशक बाद भी , उनकी लोकप्रियता आज भी चरम पर है। कितना सच कहा है रफी साहब ने अपने इस गीत में...."तुम मुझे यूँ भुला न पाओगे, जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे, संग संग तुम भी गुनगुनाओगे...."

जानकारी सोत्र - इन्टरनेट , आवाज़ के लिए संकलन किया - विश्व दीपक 'तनहा' और भूपेंद्र राघव.

( ऊपर चित्र में रफी साहब, साथी लता और मुकेश के साथ )

हमें यकीं है कि आज पूरे दिन आपने रफी साहब के अमर गीतों को सुनकर उन्हें याद किया होगा, हम छोड़ जाते हैं आपको एक अनोखे गीत के साथ, जहाँ रफी साहब ने आवाज़ दी, किशोर कुमार की अदाकारी को, ये है दो महान कलाकारों के हुनर का संगम...देखिये और आनंद लीजिये.



रफी साहब के केवल दो ही साक्षात्कार उपलब्ध हैं, जिनमे से एक आप देख सकते हैं यहाँ.

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