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Wednesday, December 31, 2008

वार्षिक गीतमाला (पायदान ३० से २१ तक)

वर्ष २००८ के श्रेष्ट ५० फिल्मी गीत (हिंद युग्म के संगीत प्रेमियों द्वारा चुने हुए),पायदान संख्या ३० से २१ तक

पिछले अंक में हम आपको ४०वीं पायदान से ३१वीं पायदान तक के गीतों से रूबरू करा चुके हैं। उन गीतों का दुबारा आनंद लेने के लिए यहाँ जाएँ।

३० वीं पायदान - मेरी माटी (रामचंद पाकिस्तानी)

पाकिस्तान के जानेमाने निर्देशक महरीन जब्बार ,जिन्होंने पहचान, कहानियाँ, पुतली घर जैसे नामचीन टीवी धारावाहिकों एवं नाटकों का निर्देशन किया है, "रामचंद पाकिस्तानी" लेकर फिल्म-इंडस्ट्री में उपस्थित हुए हैं। यह फिल्म अपने अनोखे नाम के कारण दर्शकों को आकर्षित करती है। नगरपरकर गाँव में रहने वाली "चंपा"(नंदिता दास द्वारा अभिनीत) की जिंदगी में तब उथलपुथल मच जाता है,जब उसका पति एवं उसका लड़का "रामचंद" अनजाने हीं सरहद पारकर भारत आ जाता है और भारतीय फौज उन्हें घुसपैठिया मान लेती है। यह फिल्म उसी चंपा की दास्तान है। देबज्योति मिश्रा द्वारा संगीतबद्ध एवं अनवर मक़सूद द्वारा लिखित "मेरी माटी" गायकों (शुभा मुद्गल एवं शफ़क़त अमानत अली) की अनोखी जुगलबंदी के कारण श्रोताओं पर असर करने में कामयाब साबित होती है।



२९ वीं पायदान - बंदया(खुदा के लिए)

यूँ तो बुल्ले शाह की नज़्में साढे तीन सदियाँ पुरानी हैं,लेकिन उनकी नज़्मों का नूर अब भी ताज़ातरीन है। नब्बे की दशक में पाकिस्तानी रौक बैंड "जुनून" ने पहली मर्तबा बुल्ले शाह की नज़्मों को युवाओं के दरम्यान मौजूद कराया था,उसके बाद उनके कलामों पर सबसे ज्यादा काम "रब्बी शेरगिल" ने किया है। "बुल्ला की जाना" इसका जबर्दस्त उदाहरण है। "खुदा के लिए" का "बंदया" भी इसी कड़ी का एक अनमोल मोती है। इस गाने को अपने संगीत से संवारा है खवर जावेद ने तो अपनी गलाकारी से सजाया है खवर जावेद एवं फराह ज़ाला ने।


२८ वीं पायदान - जी करदा(सिंह इज किंग)

आलोचकों की मानें तो प्रीतम ने धुन की चोरी में अन्नु मल्लिक एवं बप्पी लहरी को अगर पीछे नहीं छोड़ा है तो बराबरी तो कर हीं ली है और अगर जनता की माने तो प्रीतम की धुन सबके दिलॊ को अपनी-सी लगती है। इसी उहाफोह के बीच का गीत है "जी करदा"। धुन कितनी मौलिक है,यह तो पता नहीं,लेकिन इसके सूत्रों का अब तक पता नहीं चला है और इसी कारण यह गीत हमारे गीतमाला में शामिल है। "सिंह इज किंग" यूँ तो हाँगकाँग की एक फिल्म "जी जी" की सर से पाँव तक नकल है ,लेकिन अक्षय कुमार की बिंदास अदायगी ने इसे इस साल की दूसरी सबसे बड़ी व्यावसायिक फिल्म बना दिया है। रही बात गाने की तो इस गाने के बोल लिखे हैं मयूर पुरी ने और इसे अपनी आवाज़ दी है लभ जंजुआ (सोणी दे नखरे, प्यार करके पछताया फेम) एवं सुज़ी ने।


२७ वीं पायदान -सीता राम सीता राम(वेलकम टू सज्जनपुर)

समानांतर-सिनेमा के बेताज बादशाह श्याम बेनेगल की पहली हल्की-फुल्की एवं पूर्णतया व्यावसायिक फिल्म "वेलकम टू सज्जनपुर" आशा के अनुरूप दर्शकों को गुदगुदाने में सफल साबित होती है। इस फिल्म के मुख्य कलाकार थे - श्रेयस तालपडे एवं अमृता राव, लेकिन अपनी अदायगी से सबसे ज्यादा प्रभावित किया रवि झंकल ने। इस फिल्म में सामाजिक असामानता एवं राजनीतिक तनावों को हास्य का पुट देकर प्रस्तुत किया गया है एवं हँसाकर हीं सही फिल्म असर तो कर हीं जाती हई। "लगे रहो मुन्नाभाई","खोया खोया चाँद" एवं "लागा चुनरी में दाग" के बाद संगीतकार शांतनु मोइत्रा एवं गीतकार स्वानंद किरकिरे की जोड़ी एक बार फिर अपना कमाल दिखाती है। कृष्ण कुमार की आवाज झूमने पर मजबूर करती है।


२६ वीं पायदान -मम्मा(दसविदानिया)

दिल को छूता कैलाश, नरेश और परेश का संगीत एवं कैलाश के बोल किसी भी संवेदनशील इंसान को रूलाने के लिए काफी है। कैलाश की आवाज एक झटके में असर करती है। इस गाने का फिल्मांकन विनय पाठक, गौरव गेरा एवं सरिता जोशी पर किया गया है और जिस तरह से इन कलाकारों ने अपने इमोशन एक्सप्रेस किए हैं, देखकर हृदय रोमांचित हो जाता है। हैट्स आफ टू कैलाश एंड विनय पाठक..........


२५ वीं पायदान -दिल हारा(टशन)

यूँ तो टशन इस साल की सबसे बड़ी फ्लाप फिल्मों से एक है और आलोचकॊं की मानें तो यश राज फिल्म्स के लिए एक धब्बा है,लेकिन विशाल-शेखर का संगीत डूबते के लिए तिनका साबित होता है। यह साल विशाल-शेखर के लिए बहुत हीं सफल रहा है। "दिल से" एवं "मक़बूल" जैसे फिल्मॊं में अदायगी कर चुके एवं "लीजेंड और भगत सिंह" के पटकथा-लेखक "पियुष मिश्रा" ने इस फिल्म के गीत लिखे हैं। रही बात इस गाने की तो "छप्पन तारे तोर नाच लूँ" की स्वरलहरियाँ जैसे हीं हवाओं में उतरती है, "सुखविंदर" के अज़ीम-ओ-शान आगमन का अंदाजा हो जाता है।


२४ वीं पायदान -मन मोहना(जोधा अकबर)

कुछ सालों पहले जी०टी०वी० के "सा रे गा मा" में (जब सोनु निगम उद्घोषक हुआ करते थे) बेला शिंदे ने अपनी गायिकी से सबको मोहित किया था और विजेता भी हुई थी। लेकिन उसके बाद बेला शिंदे कुछ खास नहीं कर पाई। इस साल आई
"जोधा अकबर" से इस गायिका ने अपनी वापसी की है। "मन मोहना" यूँ तो एक भजन है,लेकिन जिस खूबी से जावेद अख्तर ने इसे लिखा है, निस्संदेह हीं नास्तिकों पर भी असर करने में यह समर्थ है। इस गाने से ए०आर०रहमान अपने रेंज का अनूठापन दर्शाते हैं।


२३ वीं पायदान -कभी कभी अदिति(जाने तू या जाने ना)

मीठी-सी पतली आवाज़ सुनकर कोई भी यह अंदाजा नहीं लगा सकता कि इस गाने को किसी २०-२२ साल के युवा ने आवाज़ नहीं दी,बल्कि ४२ साल के युवा(?) की मैच्युर आवाज़ है। जी हाँ, मैं रहमान की नई खोज राशिद अली की बात कर रहा हूँ। रहमान से राशिद अली की मुलाकात लगभग छह साल पहले हुई थी, बड़ी ही कैजुअल मुलाकात थी वह। इसके बाद रहमान के ट्रुप में राशिद गिटारिस्ट के तौर पर शामिल हो गए और "बाम्बे ड्रीम्स" की सफलता के भागीदार बने। यहाँ तक कि "कभी कभी अदिति" का गिटार पीस भी राशिद के म्युजिकल आईडियाज से प्रेरित है। इस गीत के बोल लिखे हैं "आती क्या खंडाला" फेम अब्बास टायरवाला ने।


२२ वीं पायदान -बाखुदा(किस्मत कनेक्शन)

आतिफ असलम(पहली नज़र फेम) की आवाज़ का जादू खुद हीं सर चढकर बोलता है,उस पर अल्का याग्निक की मीठी आवाज का तरका.... माशा-अल्लाह! इस गाने में प्रीतम अपने रंग में नज़र आते हैं। खुदा की गवाही देकर प्यार का इकरार करने की अदा काबिल-ए-तारीफ है, वैसे तो यह काम सुपरस्टार अमिताभ बच्चन पहले हीं कर चुके हैं "खुदा गवाह" में। इस गीत के बोल लिखे हैं सब्बीर अहमद ने। वैसे तो यह फिल्म बाकस-आफिस पर कुछ खास नहीं कर सकी,लेकिन शाहरूख के बिना पहली मर्तबा अजीज मिर्जा को देखना अलग अनुभव दे गया। शाहिद और विद्या की जोड़ी भी लीक से हटकर लगी।


२१ वीं पायदान -जलवा(फैशन)

सलीम-सुलेमान जब "फैशन" के लिए टाईटल ट्रैक बना रहे थे, तब उन्हें महसूस हुआ कि "फैशन" से राईम करता हुआ (फैशन की तुक में) शब्द खोजना मुश्किल हीं नहीं नामुमकिन है, तभी सलीम ने "जलवा" शब्द सुझाया। वही से आगे बढते हुआ बना "फैशन का है यह जलवा" और यह पंक्ति कमाल कर गई। मज़े की बात यह है कि "फैशन" फिल्म की पूरी कहानी इसी पंक्ति के इर्द-गिर्द घुमती है। इस गाने के बोल लिखे हैं अतिथि गीतकार "संदीप नाथ" ने और अपनी आवाज़ से सुसज्जित किया है सुखविंदर सिंह, सत्या हिंदुजा और रोबर्ट बौब ओमुलो ने। रैंप पर चलती प्रियंका,कंगना,मुग्धा और पृष्ठभूमि में बजता यह गीत रोमांचित कर देता है।



बाकी के गीत लेकर हम जल्द हीं हाज़िर होंगे।

सभी गानों को यहाँ सुनें:


चुनिए वर्ष के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार, आवाज़ की टीम द्वारा चुने गए इन ४ नामों में से -

ऐ आर रहमान फ़िल्म जोधा अकबर के लिए

ऐ आर रहमान फ़िल्म जाने तू या जाने न के लिए

शंकर एहसान लॉय फ़िल्म रॉक ऑन के लिए और

सलीम सुलेमान फ़िल्म रब ने बना दी जोड़ी के लिए

या कोई अन्य

आप अपनी पसंद यहाँ टिपण्णी कर दे सकते हैं या फ़िर मेल करें podcast.hindyugm@gmail.com पर

Tuesday, December 30, 2008

वार्षिक गीतमाला (पायदान ४० से ३१ तक)

वर्ष २००८ के श्रेष्ट ५० फिल्मी गीत (हिंद युग्म के संगीत प्रेमियों द्वारा चुने हुए),पायदान संख्या ४० से ३१ तक

पिछले अंक में हम आपको ५०वीं पायदान से ४१वीं पायदान तक के गीतों से रूबरू करा चुके हैं। उन गीतों का दुबारा आनंद लेने के लिए यहाँ जाएँ।

४० वीं पायदान - आशियाना(फैशन)

४०वें पायदान पर फिल्म "फैशन" का गीत "आशियाना" काबिज़ है। इस गीत के बोल लिखे हैं इरफ़ान सिद्दकी ने और सुरबद्ध किया है सलीम-सुलेमान की जोड़ी ने। इस गीत को सलीम मर्चैंट(सलीम-सुलेमान की जोड़ी से एक) ने अपनी आवाज़ से जीवंत किया है। मधुर भंडारकर की यह फिल्म "फैशन" अपने विषय के साथ-साथ अपने गीतों के कारण भी चर्चा में रही है।



३९ वीं पायदान - अलविदा(दसविदानिया)

कैलाश खेर यूँ तो अपनी आवाज़ और संगीत के कारण संगीत-जगत में मकबूल हैं। लेकिन जो बात बहुत कम लोग जानते हैं, वह यह है कि अमूमन अपने सभी गानों के बोल कैलाश हीं लिखते हैं।अलविदा भी उनकी त्रिमुखी प्रतिभा का साक्षात उदाहरण है। "दसविदानिया" अपनी सीधी-सपाट कहानी, हद में किए गए अभिनय और "कौमन मैन" की छवि वाले नायक के कारण फिल्मी जगत के लिए मील का पत्थर साबित हुई है। जिन्हें "दसविदानिया" का अर्थ न मालूम हो या जिन्होंने जानने की कभी कोशिश न की हो, उन्हें बता दूँ कि "दसविदानिया" एक रसियन वर्ड है,जिसका अर्थ होता है "गुड बाय/अलविदा" ।


३८ वीं पायदान - ओए लकी लकी ओए(ओए लकी लकी ओए)

आजकल हिन्दी फिल्म-उद्योग में पंजाबी गानों की धूम मची हुई है।इसी का असर है कि पिछले साल आई "मौजा हीं मौजा" या फिर इस साल आए "सिंह इज किंग" में अपनी आवाज का लोहा मनवाए हुए मिका सिंह इस गाने में भी अपनी मौजूदगी का अहसास दिला जाते हैं। इस गीत को अपनी धूनों से सजाया है "स्नेहा खनवल्कर" ने, जिन्होंने अपने कैरियर की शुरूआत राम गोपाल वर्मा के "गो" से की थी। निस्संदेह "गो" का किसी को पता नहीं,लेकिन "ओए लकी लकी ओए" से बालीवुड में स्नेहा की री-इंट्री कई उम्मीदें जगाती है। इस गीत के बोल लिखे हैं निर्देशक दिवाकर बनर्जी( खोसला का घोसला फेम), उर्मी जुवेकर एवं मनु ऋषि ने। तेज धुन की यह गीत झूमने पर मजबूर करती है।


३७ वीं पायदान - मन्नताँ(हीरोज)

यूँ तो "हीरोज" बाक्स-आफिस पर पीट गई,लेकिन फिल्म का यह गीत दर्शकों और श्रोताओं पर असर करने में कामयाब साबित हुआ। इसे सोनू निगम और कविता कृष्णमूर्ति की आवाज़ का जादू कहें , साजिद-वाजिद की स्वर-लहरियों का नशा या फिर जलीस शेरवानी-राहुल सेठ की कलम का हुनर,यह गीत कहीं से भी निराश नहीं करता। इस गाने की सबसे बड़ी खासियत है फिल्म इंडस्ट्री में कविता कृष्णमूर्ति की वापसी।


३६ वीं पायदान - सहेली जैसा सैंया(यू,मी और हम)

बाक्स आफिस के अब तक के रिकार्ड यही बताते हैं कि अजय देवगन ने अभिनय के अलावा जिस भी क्षेत्र में अपने कदम बढायें है, सौदा नुकसानदायक हीं साबित हुआ है, फिर चाहे वो फिल्म-निर्माण हो(राजू चाचा,यू मी और हम) या फिर निर्देशन(यू,मी और हम)। इस फिल्म में अजय देवगन सातवीं बार अपनी पत्नी काजोल के साथ अभिनय करते नज़र आए हैं,लेकिन इस बार "लेडी लक" भी अजय देवगन की नौका पार नहीं करा पाया। रही बात गाने की तो, इस गाने का मूल आकर्षण है "सुनिधि चौहान" की आवाज़। वैसे तो "मुन्ना धीमन" के अनकन्वेंशनल बोल एवं विशाल भारद्वाज का रूमानी संगीत भी बेहतरीन है,लेकिन "सुनिधि" का जादू हीं इस गाने की जान है।


३५ वीं पायदान - नज़रें मिलाना(जाने तू या जाने ना)

ए०आर० रहमान-- नाम हीं काफी है, किसी ने सच हीं कहा है। इस गाने की यू०एस०पी० का पूरा श्रेय ए०आर० रहमान को जाता है। फिल्म-इंडस्ट्री में यह विख्यात है कि जिस खूबी से रहमान गायकों का प्रयोग करते हैं,वैसा कोई भी संगीतकार नहीं कर पाता। इस गाने को सात गायकों ने अपनी आवाज़ दी है- अनुपमा देशपांडे, बेनी दयाल(आवाज़ हूँ मैं(युवराज),कैसे मुझे तू मिल गई(गज़नी) फेम),दर्शना, नरेश अय्यर(पाठशाला,रूबरू फेम), सतीश चक्रवर्ती, श्वेता भार्गवे एवं तन्वी। इस गाने के बोल लिखे हैं, इस फिल्म के लेखक एवं निर्देशक अब्बास टायरवाला ने। यह फिल्म अपनी अप्रत्याशित सफलता के कारण अब्बास टायरवाला के लिए निर्देशक के रूप में ड्रीम डेब्यु साबित हुई है।


३४ वीं पायदान - हा रहम(महफ़ूज़)(आमिर)

साधारण स्टार-कास्ट लेकिन असाधारण कहानी के साथ आई यह फिल्म सबों के दिल को छू गई। ऎसा लगा मानो अपनी हीं कहानी है। टीवी जगत से आए "राजीव खंडेलवाल" ने लाचार लेकिन आत्मविश्वासी "आमिर" के रूप में अपनी अदायगी से अपनी क्षमता का लोहा मनवा दिया। निर्देशन के क्षेत्र में पहली बार उतरे "राज कुमार गुप्ता" ने अपनी हीं कहानी "आमिर" को बड़े पर्दे पर बखूबी उतारा है। अमिताभ वर्मा के बोल और अमित त्रिवेदी के संगीत से सजे "महफ़ूज" में वह सारी बात है जो दिल को छूने के लिए काफ़ी होती है। गायकी में अमित और अमिताभ का साथ दिया है ए०आर०रहमान की खोज मुर्तजा कादिर( चुपके से(साथिया) फेम) ने।


३३ वीं पायदान - अल्लाह अल्लाह(खुदा के लिए)

"खुदा के लिए" एक पाकिस्तानी उर्दू फिल्म है,जिसे अपने लेखन एवं निर्देशन से संवारा है शोएब मंसूर ने।प्रमुख सितारे हैं- पाकिस्तान के सुपर स्टार शान, ईमान अली एवं फवाद खान। यह फिल्म पाकिस्तान की सबसे बड़ी व्यावसायिक फिल्म साबित हुई है।यह फिल्म अपने कंटेंट के कारण विवादों में रही और इस कारण इसके कई दृश्यों पर कैंची चली। इस बदकिस्मती की मार इस फिल्म के सबसे बेहतरीन सीन पर भी पड़ी,जिस कारण दर्शक नसीरूद्दीन शाह की लाजवाब अदायगी का जलवा देखने से वंचित रह गए। "अल्लाह-अल्लाह" गाने की बात करें , तो इसे संगीत से सजाया है खवर जवाद ने और आवाजें दी हैं सईन ज़हूर एवं ज़रा मदानी ने। इस गाने में "अल्लाह-अल्लाह" कहने का तरीका श्रोता को अंदर तक रोमांचित कर देता है।


३२ वीं पायदान - जाने तू मेरा क्या है(जाने तू या जाने ना)

फिर से ए०आर०रहमान एवं अब्बास टायरवाला का जादू। इस साल ए०आर०रहमान ने पाँच फिल्मों का संगीत-निर्माण किया और हर फिल्म के हर गीत का मूड दूजे से जुदा। इस गाने को अपनी आवाज़ से मुकम्मल किया है रूना रिज़वी ने। इस गाने के साथ एक दिलचस्प कहानी जुड़ी है। इस फिल्म के निर्माता आमिर खान, निर्देशक अब्बास टायरवाला एवं आमिर खान के भाई एवं इस फिल्म के निर्देशन-सहयोगी मंसूर खान इस गाने का वीडियो फिल्म में नहीं रखना चाहते थे,इसलिए फिल्म इस गाने के बिना हीं रीलिज की गई। इस बात का जिक्र आमिर ने खुद अपने ब्लाग पर किया है।एक सप्ताह बाद दर्शकों की माँग पर इस गाने को फिल्म में डाला गया। और लोगों की मानें तो इस गाने का पिक्चराईजेशन कमाल का है, काले लिबास में जेनेलिया को देखकर युवाओं की साँसें रूकी की रूकी रह जाती है।


३१ वीं पायदान - बहका(गज़नी)

इस गाने के साथ ए०आर०रहमान ने अलग हीं तरह का प्रयोग किया है,विशेषकर "धक-धक धड़कन" वाली पंक्ति में। चूँकि यह गाना नया है और कहा जाता है कि रहमान का संगीत शराब की तरह धीरे-धीरे चढता है,इसलिए उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले दिनों में यह गीत लोगों के सर चढ कर बोलेगा। प्रसून जोशी ने बेहतरीन बोल लिखे हैं। रंग दे बसंती के बाद प्रसून जोशी एवं रहमान की एक साथ यह दूसरी फिल्म है। गुलज़ार, जावेद अख्तर, महबूब जैसे दिग्गजों के साथ काम कर चुके स्वयं रहमान ने इस गाने में प्रसून की पंक्तियों एवं लेखन-कला की बड़ाई की है। इस गाने को अपनी आवाज़ से सजाया है साऊथ के सेनसेशन एवं रहमान के फेवरिट कार्तिक ने।


सभी गानों को यहाँ सुनें:


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ऐ आर रहमान फ़िल्म जोधा अकबर के लिए

ऐ आर रहमान फ़िल्म जाने तू या जाने न के लिए

शंकर एहसान लॉय फ़िल्म रॉक ऑन के लिए और

सलीम सुलेमान फ़िल्म रब ने बना दी जोड़ी के लिए

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