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Monday, November 1, 2010

मैं जब भी अकेली होती हूँ...जब नुक्ते में नुक्स कर बैठी महान आशा जी भी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 517/2010/217

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार! एक दोहे मे कहा गया है कि "दोस (दोष) पराये देख के चला हसन्त हसन्त, अपनी याद ना आवे जिनका आदि ना अंत"। यानी कि हम दूसरों की ग़लतियों को देख कर उनका मज़ाक उड़ाते हैं, लेकिन अपनी ग़लतियों का कोई अहसास नहीं होता। अब आप अगर यह सोच रहे होंगे कि हमें दूसरों की ग़लतियाँ नहीं निकालनी चाहिए, तो ज़रा ठहरिए, क्योंकि कबीरदास के एक अन्य दोहे में यह भी कहा गया है कि "निन्दक नियरे राखिये आँगन कुटि चवाय, बिना पानी साबुन बिना निर्मल करे सुभाय"। यानि कि हमें उन लोगों को अपने आस पास ही रखने चाहिए जो हमारी निंदा करते हैं, ताकि इसी बहाने हमें अपनी ख़ामियों और ग़लतियों के बारे में पता चलता रहेगा, जिससे कि हम अपने आप को सुधार सकते हैं। आप समझ रहे होंगे कि हम ये सब बातें किस संदर्भ में कर रहे हैं। जी हाँ, 'गीत गड़बड़ी वले' शृंखला के संदर्भ में। क्या है कि हमें भी अच्छा तो नहीं लग रहा है कि इन महान कलाकारों की ग़लतियों को बार बार उजागर करें, लेकिन अब जब शृंखला शुरु हो ही चुकी है, तो इसे अंजाम भी तो देना पड़ेगा। तो चलिए सिलसिले को आगे बढ़ाते हैं। आज और कल के लिए हमने दो ऐसे गीत चुने हैं जिनमें किसी शब्द में नुक्ता लगा देने की वजह से ग़लत उच्चारण हो गया है। इस तरह की ग़लतियाँ उस समय होती है जब गीतकार रिहर्सल या रेकॊर्डिंग् पर मौजूद ना हों। आज का गीत है फ़िल्म 'धर्मपुत्र' का, जिसे आशा भोसले ने गाया है। गीत के बोल हैं "मैं जब भी अकेली होती हूँ, तुम चुपके से आ जाते हो, और झाँक के मेरी आँखों में, बीते दिन याद दिलाते हो"। इस गीत के अंतिम अंतरे के बोल हैं - "रो रो के तुम्हे ख़त लिखती हूँ, और ख़ुद पढ़ कर रो लेती हूँ, हालात के तपते तूफान में जज़्बात की कश्ती खेती हूँ"। आशा जी ने "ख़त" और "ख़ुद" शब्दों को तो नुक्ता के साथ सही सही गाया, लेकिन उन्होंने ग़लती से "खेती" शब्द में भी नुक्ता लगा कर उसे "ख़ेती" कर दिया। यह ग़लती ज़रूर "ख़त" और "ख़ुद" शब्दों की वजह से ही हुई होगी, जिनकी वजह से यकायक उनके मुख से "खेती" के बजाय "ख़ेती" निकल गया होगा। ख़ैर, कोई बात नहीं, इतने सुंदर गीत के लिए ऐसी छोटी सी ग़लती तो माफ़ की ही जा सकती है, है न?

'धर्मपुत्र' साल १९६१ की फ़िल्म थी जिसका निर्माण किया था बी. आर. चोपड़ा ने और उनके छोटे भाई यश चोपड़ा इस फ़िल्म के निर्देशक थे। फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे शशि कपूर, माला सिंहा, रहमान, । आचार्य चतुरसेन शास्त्री की उपन्यास पर बनी इस फ़िल्म को लिखा था अख़्तर-उल-रहमान ने। फ़िल्म के गानें लिखे साहिर लुधियानवी ने और संगीत था एन. दत्ता का। साहिर और एन. दत्ता की जोड़ी इससे पहले बी. आर. फ़िल्म्स की ही 'धूल का फूल' में काम कर चुकी थी। आपको यह भी बता दें कि यश चोपड़ा ने 'धूल का फूल' निर्देशित कर अपने आप को बतौर निर्देशक स्थापित किया था, और 'धर्मपुत्र' उनकी निर्देशित दूसरी फ़िल्म थी। इन दोनों फ़िल्मों को देख कर लोगों को पता चल चुका था कि यश चोपड़ा फ़िल्मी दुनिया में लम्बी पारी खेलने के लिए ही उतरे हैं। 'धर्मपुत्र' के सिनेमाटोग्राफ़र थे धरम चोपड़ा और सहायक संगीत निर्देशक के रूप में फ़िल्म के संगीत सृजन में महत्वपूर्ण योगदान दिया यूसुफ़ आज़ाद ने। 'धुनों की यात्रा' किताब के लेखक पंकज राग के शब्दों में, "विभाजन की ख़ूनी पृष्ठभूमि में पनपते प्यार के क्षणों को पूरी फ़िल्म में संजोकर रखने में साहिर के गीतों और एन. दत्ता की धुनों ने बड़ा योअगदान दिया। बागेश्वरी का पुट देकर काफ़ी हाट में "मैं जब भी अकेली होती हूँ" में आशा की गायकी के द्वारा किस ख़ूबी से प्यार के लम्हों को जीवन्त करने में एन. दत्ता सफल रहे थे, यह इस गीत को सुन कर ही पता चलता है।" तो लीजिए दोस्तों, हम सब मिलकर सुनें फ़िल्म 'धर्मपुत्र' का यह ख़ूबसूरत गीत।



क्या आप जानते हैं...
कि एन. दत्ता का पूरा नाम है दत्ता नाइक, और उनकी पहली दो फ़िल्में थीं 'मिलाप' और 'मैरीन ड्राइव', ये दोनों ही फ़िल्में १९५५ में प्रदर्शित हुई थीं।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०८ /शृंखला ०२
लीजिए गीत का प्रिल्यूड और शुरूआती शेर भी सुन लीजिए-


अतिरिक्त सूत्र - ये आवाज़ थी लता मंगेशकर की.

सवाल १ - फिल्म का नाम और निर्देशक बताएं - २ अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - संगीतकार बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
इस दूसरी शृंखला में श्याम कान्त जी और अमित जी अब ७-७ अंकों पर साथ साथ हैं, शरद जी ५ और बिट्टू जी ४ अंकों पर हैं, मुकाबल दिलचस्प है....आज के जवाब पर बहुत निर्भर करेगा

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, September 13, 2010

नन्ही नन्ही बुंदिया जिया लहराए बादल घिर आए...बरसात के मौसम में आनंद लीजिए लता के इस बेहद दुर्लभ गीत का भी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 482/2010/182

'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कल से हमने शुरु की है इस सदी की आवाज़ लता मंगेशकर के गाए कुछ बेहद दुर्लभ और भूले बिसरे गीतों से सजी लघु शृंखला 'लता के दुर्लभ दस'। कल की कड़ी में आपने १९४८ की फ़िल्म 'हीर रांझा' का एक पारम्परिक विदाई गीत सुना था, आइए आज १९४८ की ही एक और फ़िल्म का गीत सुना जाए। यह फ़िल्म है 'मेरी कहानी'। इस फ़िल्म का निर्माण किया था एस. टी. पी प्रोडक्शन्स के बैनर ने, फ़िल्म के निर्देशक थे केकी मिस्त्री। सुरेन्द्र, मुनव्वर सुल्ताना, प्रतिमा देवी, मुराद और लीला कुमारी अभिनीत इस फ़िल्म के संगीतकार थे दत्ता कोरेगाँवकर, जिन्हें हम के. दत्ता के नाम से भी जानते हैं। फ़िल्म में दो गीतकारों ने गीत लिखे - नक्शब जराचवी, यानी कि जे. नक्शब, और अंजुम पीलीभीती। इस फ़िल्म के मुख्य गायक गायिका के रूप में सुरेन्द्र और गीता रॊय को ही लिया गया था। लेकिन उपलब्ध जानकारी के अनुसार लता मंगेशकर से इस फ़िल्म में दो गीत गवाए गए थे, जिनमें से एक तो आज का प्रस्तुत गीत है "नन्ही नन्ही बुंदिया जिया लहराए बादल घिर आए", और दूसरे गीत के बोल थे "दिलवाले दिल का मेल"। उल्लेखनीय बात यह है कि यह जो "दिलवाले दिल का मेल" गीत है, इसकी धुन १९४४ की ब्लॊकबस्टर फ़िल्म 'रतन' के मशहूर गीत "जब तुम ही चले परदेस" से प्रेरित था। गीता-सुरेन्द्र के गाए "दिल की दुनिया में हाँ" और "बुलबुल को मिला" और सुरेन्द्र के गाए "दिल को तुम्हारी याद ने आकर हिला दिया" जैसे सुरीली गीतों के बावजूद के. दत्ता धीरे धीरे पीछे होते चले गए, और फ़िल्म संगीत के बदलते माहौल को अपना ना सके। दोस्तों, के. दत्ता ही वो संगीतकार थे जिन्होंने लता को उनका पहला एकल प्लेबैक्ड गीत "पा लागूँ कर जोरी रे, श्याम मोसे ना खेलो होरी" दिया था १९४७ की फ़िल्म 'आपकी सेवा में' में। और आज के प्रस्तुत गीत के गीतकार जे. नक्शब ने लता को दिया था उनका पहला सुपर डुपर हिट गीत "आएगा आनेवाला" १९४९ की फ़िल्म 'महल' में। तो इस तरह से आज का 'मेरी कहानी' फ़िल्म का यह गीत बेहद ख़ास है क्योंकि इस गीत के गीतकार और संगीतकार का लता के शुरुआती करीयर में बेहद महत्वपूर्ण स्थान रहा है। आज के प्रस्तुत गीत की अगर बात करें तो यह बारिश का गीत है और बड़ी ही चंचल और चुलबुली अंदाज़ में लता जी की कमसिन आवाज़ में इसे गाया गया है। गीत का रीदम सुन कर नूरजहाँ के गाए "जवाँ है मोहब्बत हसी है ज़माना" गीत की भी याद आ जाती है।

दोस्तों, जैसा कि हमने कल कहा था कि इस शृंखला में सुनेंगे तो लता जी के ही गीत, लेकिन चर्चा ज़्यादा करेंगे इन दुर्लभ गीतों से जुड़े कुछ भूले बिसरे फ़नकारों की। ये वो फ़नकार हैं जिनकी यादें भी आज धुंदली होती जा रही हैं। रोज़ मर्रा की ज़िंदगी में हम इन्हें भले याद ना करें, लेकिन इस बात को झुटला भी नहीं सकते कि फ़िल्म संगीत के उस दौर में इन फ़नकारों ने फ़िल्म संगीत के ख़ज़ाने को समृद्ध करने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। आइए आज बात करते हैं के. दत्ता साहब की। दत्ता कोरेगाँवकर ४० और ५० के दशक के एक कमचर्चित संगीतकार थे, जिन्होंने अपने पूरे करीयर में केवल १७ फ़िल्मों में ही संगीत दिया। उनका सफ़र शुरु हुआ था १९३९ की फ़िल्म 'मेरा हक़' से, उसके बाद १९४० में 'अलख निरंजन' और 'गीता' जैसी फ़िल्मों में संगीत दिया लेकिन ये फ़िल्में नहीं चलीं। के. दत्ता ने १९४२ में मज़हर ख़ान निर्देशित फ़िल्म 'याद' में संगीत दिया जिसके गानें मशहूर हुए थे। जी. एम. दुर्रानी और राजकुमारी की आवाज़ों में इस फ़िल्म का एक रोमांटिक डुएट "याद जब बेचैन करती है" ख़ासा लोकप्रिय हुआ था उस ज़माने में। फिर उसके बाद दत्ता साहब का साथ हुआ मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ से। १९४५ में फ़िल्म 'बड़ी माँ' में नूरजहाँ के गाए गीतों ने तहलका मचा दिया था। आज जब लता जी पर केन्द्रित है यह शृंखला, तो यहाँ पर यह बताना ज़रूरी है कि 'बड़ी माँ' में अपने पिता की मृत्यु के बाद घर की आजीविका चलाने को संघर्षरत लता जी को मास्टर विनायक ने एक छोटी सी भूमिका दी थी और अपने उपर फ़िल्माए दो गीतों को भी उन्होंने गाया था। कीर्तन शैली का "माता तेरे चरणों में" और "जननी जन्मभूमि.... तुम माँ हो बड़ी माँ" लता के आरम्भिक गीतों के तौर पर ऐतिहासिक महत्व रखता है। के. दत्ता और लता से संबंधित एक और रोचक जानकारी हम यहाँ आपको देना चाहेंगे जो हमें प्राप्त हुई पंकज राग लिखित 'धुनों की यात्रा' किताब में। 'बड़ी माँ' के समय ही के. दत्ता और फ़िल्म के अन्य सदस्यों के साथ गेटवे ऒफ़ इण्डिया के पास एक दिन शाम को टहलते हुए लता ने "पैग़ाम" शब्द का उच्चारण ग़लत तरीके से बग़ैर नुक्ते के किया। के. दत्ता ने वहीं लता को रोका और स्पष्ट तौर पर समझाया कि यदि लता फ़िल्मों में अपना करीयर बनाना चाहती हैं तो उन्हें उर्दू शब्दों का स्पष्ट उच्चारण सीखना होगा। लता इस सीख को कभी नहीं भूलीं, और उनकी शुद्ध अदायगी में के. दत्ता की इस सीख का कहीं न कहीं हाथ अवश्य रहा है। तो आइए, सुनते हैं फ़िल्म 'मेरी कहानी' का यह गीत जिसके लिए आभार अजय देशपाण्डेय जी का जिन्होंने इस दुर्लभ गीत को हमारे लिए उपलब्ध करवाया.



क्या आप जानते हैं...
कि के. दत्ता स्वरब्द्ध 'बड़ी माँ' का मशहूर गीत "दिया जलाकर आप बुझाया" ओ. पी. नय्यर को इतना पसंद था कि संगीतकार बन कर शोहरत हासिल करने के बाद नय्यर साहब ने दता साहब को ख़ास इस गीत के लिए एक पियानो भेंट किया था।

विशेष सूचना:

लता जी के जनमदिन के उपलक्ष्य पर इस शृंखला के अलावा २५ सितंबर शनिवार को 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ानें' में होगा लता मंगेशकर विशेष। इस लता विशेषांक में आप लता जी को दे सकते हैं जनमदिन की शुभकामनाएँ बस एक ईमेल के बहाने। लता जी के प्रति अपने उदगार, या उनके गाए आपके पसंदीदा १० गीत, या फिर उनके गाए किसी गीत से जुड़ी आपकी कोई ख़ास याद, या उनके लिए आपकी शुभकामनाएँ, इनमें से जो भी आप चाहें एक ईमेल में लिख कर हमें २० सितंबर से पहले oig@hindyugm.com के पते पर भेज दें। हमें आपके ईमेल का इंतज़ार रहेगा।


अजय देशपांडे जी ने लता जी के दुर्लभ गीतों को संगृहीत करने के उद्देश्य से एक वेब साईट का निर्माण किया है, जरूर देखिये यहाँ.

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. यह १९४९ की एक फ़िल्म का गीत है, फ़िल्म के शीर्षक में दो शब्द हैं और दोनों ही अंग्रेज़ी के। फ़िल्म का नाम बताएँ। ३ अंक।
२. युं तो यह लता का गाया एकल गीत है, लेकिन इस फ़िल्म में लता ने शंकर दासगुप्ता के साथ एक युगल गीत भी गाया था। कल बजने वाले गीत का भाव बिलकुल वही है जो भाव लता और मुकेश के गाए उस सदाबहार युगल गीत का भी है जिसे रोशन ने स्वरबद्ध किया था। चलिए कई क्लूज़ दे दिए, अब आप बताइए कल बजने वाले गीत के बोल। ३ अंक।
३. इस फ़िल्म में दो संगीतकार हैं। इनमें से एक वो हैं जिन्होंने लता को यह सिखाया था कि गीत गाते वक़्त सांसों को कैसे नियंत्रित किया जाता है ताकि सांसें सुनाई ना दे। कौन हैं ये महान संगीतकार? २ अंक।
४. गीतकार वो हैं जिनका लिखा एक ग़ैर फ़िल्मी देशभक्ति गीत लता का गाया सब से मशहूर देशभक्ति गीत बन गया है। गीतकार बताएँ। १ अंक।

पिछली पहेली का परिणाम -
केवल अवध जी सही जवाब दे पाए. वैसे हम ये समझ सकते हैं कि ये शृंखला जरा मुश्किल होगी हमारे श्रोताओं के लिए, पर चुनौतियों में ही मज़ा है, है न....स्कोर अब तक - अवध जी है ८१ पर, इंदु जी हैं ५० पर, पवन जी ३५ और प्रतिभा जी ३४ पर हैं. बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Friday, May 28, 2010

ये वो दौर था जब फ़िल्में एक खास उद्देश्य से बनती थी, जाहिर है संगीत पर भी खूब मेहनत होती थी

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # ३८

बी. आर चोपड़ा हिंदी सिनेमा के एक महत्वपूर्ण स्तंभ रहे हैं। उनकी हर फ़िल्म हमें कुछ ना कुछ ज़रूर संदेश देती है। आज उन्ही की फ़िल्म 'धूल का फूल' से एक युगल गीत, जिसे फ़िल्म के लिए लता मंगेशकर और महेन्द्र कपूर ने गाया था। साहिर लुधियानवी के बोल और एन. दत्ता का संगीत। जब बी. आर. चोपड़ा साहब का नाम आ ही गया है तो क्यों ना उन्ही के द्वारा प्रस्तुत विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम से एक अंश यहाँ पर पेश कर दिया जाए। "मेरा नाम बी. आर. चोपड़ा, पूरा नाम बलदेव राज चोपड़ा, पूरी फ़िल्म लाइन में एक ही शख़्स है जो मुझे बलदेव के नाम से पुअकारता है, और वो हैं दादामुनि अशोक कुमार। एक दिन बलदेव ने एक बदमाशी की, और एक अंग्रेज़ी फ़िल्म देखी। आर्य समाज के जलसे में जाने का बहाना कर के गया था। वापस लौटे तो देर हो चुकी थी। पिताजी ने पूछा कि कहाँ से आ रहे हो भाई? आर्य समाज के उसूलों पर चलनेवाले बलदेव से झूठ ना बोला गया। पिताजी सच से ख़ुश हो गए, मगर आइंदा फ़िल्में देखने पर पाबंदी लगा दी। कॊलेज में लिखने का शौक पैदा हो गया। पढ़ाई के साथ साथ मैगज़िन्स में ख़ूब लिखे। कभी कहानी, कभी अफ़साना, कभी फ़िल्म रिव्यू, कभी आर्टिकल। अर बाद में ख़्वाबों को पूरा करने के लिए आइ.सी.एस के इम्तिहान में बैठा। बदक़िस्मती से कामयाब ना हो सका। बहुत दुख हुआ। दुनिया से किनाराकशी कर ली, और ज़िंदगी को ख़त्म करने का इरादा कर लिया। उस वक़्त पिताजी ने कहा कि बलदेव, यह सरासर बुज़दिली है, ज़िंदगी का मुक़ाबला ना मुंह छुपाकर होता है और ना सर झुकाकर।" और दोस्तों, शायद यही शब्द चोपड़ा साहब की फ़िल्म 'हमराज़' के एक गीत का मुखड़ा बन गया आगे चलकर। लेकिन फ़िल्हाल हम सुनने जा रहे हैं ;धूल का फूल' का गीत।

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत -तेरे प्यार का...
कवर गायन -पारसमणी आचार्य और प्रदीप सोम सुन्दरन




ये कवर संस्करण आपको कैसा लगा ? अपनी राय टिप्पणियों के माध्यम से हम तक और इस युवा कलाकार तक अवश्य पहुंचाएं


डाक्टर पारसमणी आचार्य
मैं पारसमणी राजकोट गुजरात से हूँ, पापा पुलिस में थे और बहुत से वाध्य बजा लेते थे, उनमें से सितार मेरा पसंदीदा था. माँ भी HMV और AIR के लिए क्षेत्रीय भाषा में पार्श्वगायन करती थी, रेडियो पर मेरा गायन काफी छोटी उम्र से शुरू हो गया था. मैं खुशकिस्मत हूँ कि उस्ताद सुलतान खान साहब, बेगम अख्तर, रफ़ी साहब और पंडित रवि शंकर जी जैसे दिग्गजों को मैंने करीब से देखा और उनका आशीर्वाद पाया. गायन मेरा शौक तब भी था और अब भी है, रफ़ी साहब, लता मंगेशकर, सहगल साहब, बड़े गुलाम अली खान साहब और आशा भोसले मेरी सबसे पसंदीदा हैं

प्रदीप सोमसुन्दरन
जो लोग टीवी पर म्यूजिकल शो देखने के शौक़ीन हैं, उन्होंने भारतीय टेलीविजन पर पहले सांगैतिक आयोजन 'मेरी आवाज़ सुनो' को ज़रूर देखा होगा। प्रदीप सोमसुंदरन को इसी कार्यक्रम में सन 1996 में सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक चुना गया था और लता मंगेशकर सम्मान से सम्मानित किया गया था। 26 जनवरी 1967 को नेल्लूवया, नेल्लूर, केरल में जन्मे प्रदीप पेशे से इलेक्ट्रानिक के प्राध्यापक हैं। त्रिचुर की श्रीमती गीता रानी से 12 वर्ष की अवस्था में ही प्रदीप ने कर्नाटक-संगीत की शिक्षा लेना शुरू कर दी थी और 16 वर्ष की अवस्था में स्टेज-परफॉर्मेन्स देने लेगे थे। प्रदीप कनार्टक शास्त्रीय गायन के अतिरिक्त हिन्दी, मलयालम, तमिल, तेलगू, अंग्रेज़ी और जापानी आदि भाषाओं में ग़ज़लें और भजन गाते हैं। इन्होंने कई मलयालम फिल्मी गीतों में अपनी आवाज़ दी है। और गैर मलयालम फिल्मी तथा गैर हिन्दी फिल्मी गीतों में ये काफी चर्चित रहे हैं।


विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड के ४०० शानदार एपिसोड आप सब के सहयोग और निरंतर मिलती प्रेरणा से संभव हुए. इस लंबे सफर में कुछ साथी व्यस्तता के चलते कभी साथ नहीं चल पाए तो कुछ हमसे जुड़े बहुत आगे चलकर. इन दिनों हम इन्हीं बीते ४०० एपिसोडों के कुछ चर्चित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस रीवायिवल सीरीस में, ताकि आप सब जो किन्हीं कारणों वश इस आयोजन के कुछ अंश मिस कर गए वो इस मिनी केप्सूल में उनका आनंद उठा सकें. नयी कड़ियों के साथ हम जल्द ही वापस लौटेंगें

Sunday, April 11, 2010

मैंने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी....गुड्डो दादी की पसंद आज ओल्ड इस गोल्ड पर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 401/2010/101

'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में सभी श्रोताओं व पाठकों का फिर एक बार स्वागत है। पिछले दिनों हमने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के लिए एक नए ई-मेल पते की शुरुआत की थी जिस पर हम आप से आपकी पसंद और सुझावों का स्वागत किया करते हैं। हमें बेहद ख़ुशी है कि आप में से कई 'आवाज़' के चाहनेवाले इस पते पर ना केवल अपनी पसंद लिख कर भेज रहे हैं, बल्कि साथ ही साथ सुझाव भी भेज रहे हैं और हमारी ग़लतियों को भी सुधार रहे हैं। हम पूरी कोशिश करते हैं कि आलेखों में लिखे जाने वाले तथ्य १००% सही हो, लेकिन कभी कभी ग़लतियाँ हो ही जाती हैं। इसलिए हम आप से फिर एक बार निवेदन करते हैं कि जब भी कभी आपको लगे कि दी जाने वाली जानकारी ग़लत है, तो हमें ज़रूर सूचित करें। और अब हम आते हैं आपकी पसंद पर। हमारा मतलब है, उन फ़रमाइशों पर जिन्हे आप ने की है हम से। जी हाँ, पिछले दिनों हमें आप की तरफ़ से जिन जिन गीतों को सुनवाने की फ़रमाइशें प्राप्त हुई हैं, उन्ही गीतों को लेकर हम आज से शुरु कर रहे हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई लघु शृंखला 'पसंद अपनी अपनी'। हमारे ई-मेल पते पर सब से पहली पसंद जो हमें प्राप्त हुई है, वह है गुड्डो दादी का। दादी का आशीर्वाद हमारे साथ हमेशा रहा है और कई बार उन्होने हमारे इस प्रयास की सराहना भी की हैं। यहाँ तक कि सजीव जी के जन्मदिन पर अमेरीका से टेलीफ़ोन कर उन्होने शुभकामनाएँ दी थी। 'आवाज़' के इस माध्यम से जिस तरह का प्यार हम सब को मिला है और मिल रहा है, उसका मूल्यांकन कर पाना संभव नहीं। तो गुड्डो दादी की पसंद का गीत है फ़िल्म 'चन्द्रकान्ता' का "मैंने चांद और सितारों की तमन्ना की थी, मुझको रातों की स्याही के सिवा कुछ ना मिला"। मोहम्मद रफ़ी की आवाज़, एन. दत्ता का संगीत और गीतकार हैं साहिर लुधियानवी।

'चन्द्रकान्ता' १९५६ की फ़िल्म थी। सचिन देव बर्मन के सहायक के रूप में काम कर रहे एन. दत्ता को बतौर स्वतन्त्र संगीतकार पहला मौका दिया था जी. पी. सिप्पी ने १९५५ में फ़िल्म 'मरीन ड्राइव' में। इसके अगले ही साल, १९५६ में एन. दत्ता के संगीत से सजी दो फ़िल्में प्रदर्शित हुईं - 'दशहरा' और 'चन्द्रकान्ता'। रफ़ी साहब के गाए 'चंद्रकान्ता' के इस गीत ने एन. दत्ता को आपार ख्याति दिलाई। 'चन्द्रकान्ता' भी जी. पी. सिप्पी की ही फ़िल्म थी। दरअसल इस साल सिप्पी साहब ने दो फ़िल्में बनाई; एक तो थी 'चन्द्रकान्ता', और दूसरी फ़िल्म थी 'श्रीमति ४२०' जिसके लिए उन्होने ओ. पी. नय्यर को संगीतकार चुना था। भारत भूषण और बीना राय अभिनीत 'चन्द्रकान्ता' अगर आज लोगों की यादों में ताज़ा है तो सिर्फ़ इस गीत की वजह से। किस ख़ूबसूरती के साथ साहिर साहब ने जीवन के सपनों को चमकते चांद और सितारों के साथ तुलना की है, और दूसरी तरफ़ दुखों की तुलना रात के अंधकार से और अंधकार की तुलना काली स्याही से की है। अपनी व्यक्तिगत अनुभवों की वजह से साहिर साहब जब भी कभी इस तरह का ग़मज़दा नग़मा लिखते थे तो उसमें जैसे कलेजा चीर कर रख देते थे। दत्ता साहब की मेलडी में ढल कर किस तरह का पैथोस उभर कर आया है इस अंतरे में जब शायर लिखते हैं कि "प्यार मांगा तो सिसकते हुए अरमान मिले, चैन चाहा तो उमड़ते हुए तूफ़ान मिले, डूबते दिल ने किनारे की तमन्ना की थी, मैंने चांद और सितारों की तमन्ना की थी"। तो गुड्डो दादी, आपकी फरमाईश के इस गीत को सुनने और हम सब को सुनवाने की जो तमन्ना थी, वो तो हो रही है पूरी। आपका बहुत बहुत शुक्रिया और आगे भी इसी तरह से हमसे जुड़े रहिएगा। धन्यवाद!



क्या आप जानते हैं...
कि एन. दत्ता ने १९५६ में जिस 'दशहरा' नामक फ़िल्म में संगीत दिया था, उसी फ़िल्म में संगीतकार एस. एन. त्रिपाठी ने पर्दे पर एक भूमिका अदा की थी।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मुखड़े की पहली पंक्ति में शब्द है -"खामोश" फिल्म बताएं-३ अंक.
2. इस युगल गीत में एक आवाज़ सुधा मल्होत्रा की भी है, गायक बताएं- २ अंक.
3. सुधा जी को जिस शायर के साथ जोड़ कर देखा जाता है उन्हीं का लिखा है ये गीत,नाम बताएं-२ अंक.
4. संगीतकार कौन हैं इस खूबसूरत गीत के-२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
इंदु जी आपका कार्यक्रम बढ़िया हो ये तो हम चाहेंगे, पर ओल्ड इस गोल्ड में हजारी भी जरूरी है याद रखिये, शरद जी शुक्रिया....आपके क्या कहने...अर्चना और अवध जी शुक्रिया

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, February 28, 2010

यादों का सहारा न होता हम छोड के दुनिया चल देते....और चले ही तो गए तलत साहब

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 359/2010/59

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोताओं व पाठकों को हमारी तरफ़ से होली की हार्दिक शुभकामनाएँ। इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर जारी है तलत महमूद पर केन्द्रित शृंखला 'दस महकती ग़ज़लें और एक मख़मली आवाज़'। जैसा कि हमने आप से पहली ही कहा था कि तलत महमूद की गाई ग़ज़लों की इस ख़ास शृंखला के दस में से नौ ग़ज़लें फ़िल्मों से चुनी हुई होगी और आख़िरी ग़ज़ल हम आपको ग़ैर फ़िल्मी सुनवाएँगे। तो आज बारी है आख़िरी फ़िल्मी ग़ज़ल की। ६० के दशक के आख़िर के सालों में फ़िल्म संगीत पर पाश्चात्य संगीत इस क़दर हावी हो गया कि गीतों से नाज़ुकी और मासूमियत कम होने लगी। ऐसे में वो कलाकार जो इस बदलाव के साथ अपने आप को बदल नहीं सके, वो धीरे धीरे फ़िल्मों से दूर होते चले गए। इनमें कई कलाकार अपनी स्वेच्छा से पीछे हो लिए तो बहुत सारे अपने आप को इस परिवर्तन में ढाल नहीं सके। तलत महमूद उन कलाकारों में से थे जो स्वेच्छा से ही इस जगत को त्याग दिया और ग़ैर फ़िल्म संगीत जगत में अपने आप को व्यस्त कर लिया। आज हमने एक ऐसी ग़ज़ल चुनी है जो बनी थी सन‍ १९६९ में। फ़िल्म 'पत्थर के ख़्वाब' फ़िल्मी की यह ग़ज़ल पाल प्रेमी साहब का लिखा हुआ है और संगीत है एन. दत्ता का। है बड़ा ही सीधा सादा, लेकिन इस ग़ज़ल को सुनते हुए इसकी धुन कुछ इस तरह से ज़हन में रच बस जाती है कि केवल एक बार सुन कर जी नहीं भरता। झूठ नहीं बोलूँगा, मैंने यह ग़ज़ल पहले कभी नहीं सुनी थी। इस शृंखला के लिए यह ग़ज़ल मैंने पहली बार सुनी और पहली ही बार में यह मुझे इतना अच्छा लगा कि अब तक ५ मर्तबा सुन चुका हूँ। "यादों का सहारा ना होता हम छोड़ के दुनिया चल देते, ये दर्द जो प्यारा ना होता हम छोड़ के दुनिया चल देते"। जाने क्या बात है इस ग़ज़ल में कि यह सुनने वाले को अपनी ओर आकर्षित करती है। ऒर्केस्ट्रेशन भी सरल है। तबले का अच्छा प्रयोग है, इंटरल्युड में स्ट्रिंग्स सुनने को मिलते हैं।

दोस्तों, 'पत्थर के ख़्वाब' फ़िल्म आई थी १९६९ में जिसका निर्माण हुआ था नागिन प्रोडक्शन्स के बैनर तले। महीपाल, परवीन चौधरी, डी. के. सप्रू, मोहन चोटी प्रमुख अभिनीत इस फ़िल्म को निर्देशित किया था पाल प्रेमी ने। जी हाँ, वही पाल प्रेमी जिन्होने इस ग़ज़ल को भी लिखा। पाल प्रेमी साहब ना केवल निर्देशक और गीतकार थे, बल्कि उन्होने अभिनय के क्षेत्र में भी अपना हाथ आज़माया था। १९६५ की फ़िल्म 'श्रीमान फ़ंटूश' में उन्होने अभिनय किया। बतौर निर्देशक 'पत्थर के ख़्वाब' के अलावा १९६७ की फ़िल्म 'हमारे ग़म से मत खेलो' का भी निर्देशन किया। १९५५ की फ़िल्म 'हातिमताई की बेटी' में उन्होने सह निर्देशक के रूप में काम किया था। दोस्तों, पाल प्रेमी साहब के बारे में हम केवल इतनी ही जानकारी बटोर सके। अगर आप उनके फ़िल्मी करीयर या जीवन से संबंधित किसी बात की जानकारी रखते हों तो हमारे साथ ज़रूर बाँटिएगा। इस फ़िल्म के संगीतकार एन. दत्ता ने चोपड़ा कैम्प की कई बड़ी फ़िल्मों में संगीत दिया है। लेकिन वक़्त बहुत ज़ालिम होता है। जब इंसान का वक़्त अच्छा होता है तो हर कोई साथ देता है और वक़्त बुरा हो तो हर चीज़ मुंह मोड़ लेती है। दत्त साहब के साथ भी यही हुआ। जब तक स्वास्थ्य ने साथ दिया, उन्हे बड़ी फ़िल्में मिलती रहीं, लेकिन जब स्वास्थ्य बिगड़ने लगा तो चोपड़ा कैम्प भी संगीतकार रवि की ओर मुड गया। एन. दत्ता कमचर्चित फ़िल्मों में संगीत देने लगे और गुमनामी की तरफ़ निकल पड़े। आज की यह फ़िल्म भी एक ऐसी ही फ़िल्म है, जिसने सफलता की किरण तो नहीं देखी, लेकिन ख़ास कर तलत साहब की गाई इस ग़ज़ल ने आज तक इस फ़िल्म के नाम को ज़िंदा कर रखा है। यक़ीन मानिए या आप ख़ुद आजमा लीजिए कि गूगल पर अगर आप 'पत्थर के ख़्वाब' ढ़ूंढते हैं तो ज़्यादातर इस ग़ज़ल के ही रेज़ल्ट्स आते हैं, ना कि इस फ़िल्म के। आइए अब इस ग़ज़ल का लुत्फ़ उठाया जाए। हम तो भई यही कहेंगे कि अगर तलत साहब के गाए गीतों और ग़ज़लों का सहारा फ़िल्म संगीत को नहीं मिलता तो इस धरोहर की क़ीमत बहुत कम होती। पेश-ए-ख़िदमत है यह ग़ज़ल और इसके तमाम शेर इस प्रकार हैं:

यादों का सहारा ना होता हम छोड़ के दुनिया चल देते,
ये दर्द जो प्यारा ना होता हम छोड़ के दुनिया चल देते।

टूटा हुआ दिल टूटे अरमान तेरी हैं अमानत पास मेरे,
ये दिल जो तुम्हारा ना होता हम छोड़ के दुनिया चल देते।

शायद के तेरे काम आ जाए ये जान मेरी ओ जान-ए-जिगर,
क़िस्मत का इशारा ना होता हम छोड़ के दुनिया चल देते।

रुक जाए कहाँ है किसको ख़बर दौरान-ए-सफ़र या मंज़िल पर,
गरदिश में सितारा ना होता हम छोड़ के दुनिया चल देते।



क्या आप जानते हैं...
कि तलत महमूद ने १२ भारतीय भाषाओं में कुल ७४७ गीत गाए हैं, और ये भाषाएँ हैं - उर्दू/ हिंदी, बंगला, भोजपुरी, तेलुगू, गुजराती, मराठी, मलयालम, पंजाबी, सिंधी, अवधी, मारवारी और असमीया।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मतले में ये दो शब्द है - "आंसुओं" और "सूरतों", बताईये ग़ज़ल के बोल.-३ अंक.
2. इस गज़ल को किसने लिखा है बताएं - ३ अंक.
3. गज़ल के संगीतकार का नाम बताएं- २ अंक.
4. तलत साहब एक अमेरिकी सिगरेट कम्पनी के विज्ञापन में भी नज़र आये थे, कौन सी थी वो कंपनी-सही जवाब के मिलेंगें ३ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
एक बार फिर शरद जी न सिर्फ सही जवाब देकर ३ अंक कमाए, बल्कि हमारी गलती को दुरुस्त भी किया, जाहिर है शरद जी बेहद ध्यान से हमारी हर पोस्ट पढते हैं, उनके जैसा श्रोता हमें कोई शायाद ही मिल पाए, इंदु जी, बधाई आपने भी ३ अंक जोड़े अपने खाते में, अब आपके क्या कहने, अवध जी भी २ अंकों के हकदार बनें, पाबला जी फिर गायब हो गए :), चलिए आप सभी को होली की ढेरों ढेरों शुभकामनाएं. ईश्वर आप सब के जीवन में भी प्रेम के रंगों की ऐसी बौछार करें कि आने वाला हर दिन आप के जीवन में खुशियों से लदा लदा आये....
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Saturday, June 20, 2009

बचना ज़रा ज़माना है बुरा...रफी और गीता दत्त में खट्टी मीठी नोंक झोंक

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 117

हाँ तक मोहम्मद रफ़ी और गीता दत्त के गाये युगल गीतों की बात है, हमने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में कई बार ऐसे गीत बजाये हैं। और वो सभी के सभी नय्यर साहब के संगीत निर्देशन में थे। आज भी एक रफ़ी-गीता डुएट लेकर हम ज़रूर आये हैं लेकिन ओ. पी. नय्यर के संगीत में नहीं, बल्कि एन. दत्ता के संगीत निर्देशन में। जी हाँ, यह गीत है फ़िल्म 'मिलाप' का। वही देव आनंद - गीता बाली वाली 'मिलाप' जो बनी थी सन् १९५५ में और जिसमें एन. दत्ता ने पहली बार बतौर स्वतंत्र संगीतकार संगीत दिया था। केवल एन. दत्ता का ही नहीं, बल्कि फ़िल्म के निर्देशक राज खोंसला का भी यह पहला निर्देशन था। इससे पहले उन्होने गुरु दत्त के सहायक निर्देशक के रूप में फ़िल्म 'बाज़ी' ('५१), 'जाल' ('५२), 'बाज़' ('५३) और 'आर पार' (१९५४) काम कर चुके थे। इसलिए एक अच्छे फ़िल्म निर्देशक बनने के सारे गुण उनमे समा चुके थे। जिस तरह से इस फ़िल्म में उन्होने नायिका गीता बाली की 'एन्ट्री' करवाई है "हमसे भी कर लो कभी कभी तो" गीत में, यह हमें याद दिलाती है गुरु दत्त साहब की जिन्होने कुछ इसी अंदाज़ में शक़ीला का 'एन्ट्री' करवाया था "बाबुजी धीरे चलना" गीत में, फ़िल्म 'आर पार' में। फ़िल्म 'मिलाप' फ़्रैंक काप्रा के मशहूर कृति 'मिस्टर डीड्स गोज़ टु टाउन' (१९३६) से प्रेरीत था। इस फ़िल्म के पहले दिन की शूटिंग से संबंधित एक हास्यास्पद घटना आपको बताते हैं। हुआ यूँ कि राज खोंसला साहब, जो अब तक गुरु दत्त के सहायक हुआ करते थे, उन्हे अब 'मिलाप' में निर्देशक बना दिया गया था। तो पहले दिन की शूटिंग के वक़्त जब उन्हे यह बताया गया कि शॉट रेडी है, तो वो अपनी पुरानी आदत के मुताबिक बोल उठे, "गुरु दत्त को बुलाओ"। यह सुनकर के. एन. सिंह, जो पास ही बैठे हुए थे, ज़ोर से हँस पड़े।

'मिलाप' के संगीतकार दत्ता नाइक, जिन्हे हम और आप एन. दत्ता के नाम से जानते हैं, की यह पहली फ़िल्म थी बतौर स्वतंत्र संगीतकार। इससे पहले वो सचिन दा के सहायक हुआ करते थे। उनकी प्रतिभा नज़रंदाज़ नहीं हुई और उन्हे इस फ़िल्म में पहला ब्रेक मिल गया। बर्मन दादा के साथ काम करते वक़्त एन. दत्ता साहिर लुधियानवी के संस्पर्श में भी आये जिनके क्रांतिकारी ख्यालातों से वो काफ़ी मुतासिर भी थे। एन. दत्ता और साहिर की जोड़ी बनी और दोनो ने साथ साथ कई फ़िल्मों का गीत संगीत तैयार किया। 'मिलाप' पहली फ़िल्म थी। आज फ़िल्म 'मिलाप' को याद किया जाता है तो गीता दत्त के गाये "जाते हो तो जाओ तुम जाओगे कहाँ, मेरे जैसा दिल तुम पायोगे कहाँ" गीत की वजह से। हालाँकि इस फ़िल्म के और भी कई गीत उस समय काफ़ी लोकप्रिय हुए थे, लेकिन यह गीत सबसे ज़्यादा चला था। गीता दत्त और रफ़ी साहब की आवाज़ों में जिस गीत का ज़िक्र हमने उपर किया और जिस गीत को आज हम सुनवा रहे हैं वह गीत है "बचना ज़रा ये ज़माना है बुरा, कभी मेरी गली में ना आना". जॉनी वाकर और गीता बाली पर फ़िल्माये गये इस गीत में राज खोंसला और एन. दत्ता ने वही बात पैदा करने की कोशिश की है जो गुरु दत्त और ओ. पी. नय्यर या बर्मन दादा किया करते थे। फ़िल्म 'मिलाप' के संगीत ने एन. दत्ता को फ़िल्म जगत में काफ़ी हद तक स्थापित कर दिया। तो लीजिये आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में संगीतकार एन. दत्ता को याद करते हुए सुनिये यह गीत।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें २ अंक और २५ सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के ५ गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. नायिका की सुन्दरता का बयां है ये गीत.
२. रचा है आनंद बख्शी ने.
३. मुखड़े में शब्द है -"हुस्न".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
स्वप्न मंजूषा जी १० अंकों के लिए बधाई. शरद जी, रचना जी आप सब को भी सही गीत पहचानने के लिए बधाई. पराग जी बहुत अच्छी जानकारी दी आपने, वाकई इस तीनों गायिकाओं का एक फिल्म में गीत होना दुर्लभ ही है.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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