Showing posts with label rag charukeshi. Show all posts
Showing posts with label rag charukeshi. Show all posts

Sunday, June 26, 2016

राग चारुकेशी : SWARGOSHTHI – 276 : RAG CHARUKESHI


स्वरगोष्ठी – 276 में आज


मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन – 9 : राष्ट्रीय पुरस्कार से अलंकृत संगीत


‘बइयाँ ना धरो ओ बलमा...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी श्रृंखला – ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ जारी है। श्रृंखला की नौवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का एक बार फिर हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला आप तक पहुँचाने के लिए हमने फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी का सहयोग लिया है। हमारी यह श्रृंखला फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर केन्द्रित है। श्रृंखला के प्रत्येक अंक में हम मदन मोहन के स्वरबद्ध किसी राग आधारित गीत की चर्चा और फिर उस राग की उदाहरण सहित जानकारी दे रहे हैं। गत 25 जून को हमने मदन मोहन का 93वाँ जन्मदिन मनाया। श्रृंखला की नौवीं कड़ी में आज हम आपको राग चारुकेशी के स्वरों में पिरोये गए 1970 में प्रदर्शित फिल्म ‘दस्तक’ से एक सुमधुर गीत का रसास्वादन कराएँगे। इस राग आधारित गीत को स्वर दिया है, लता मंगेशकर ने। संगीतकार मदन मोहन द्वारा राग चारुकेशी के स्वर में निबद्ध फिल्म ‘दस्तक’ के इस गीत के साथ ही राग का यथार्थ स्वरूप उपस्थित करने के लिए हम सुप्रसिद्ध सारंगी वादक उस्ताद सुल्तान खाँ की सारंगी पर राग चारुकेशी का आलाप और एक विलम्बित रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं।


संगीतकार मदन मोहन के गीतों की बात चल रही हो और 1970 की फ़िल्म ’दस्तक’ के गीत-संगीत की चर्चा ना हो, तो शायद चर्चा अधूरी रह जाए। 70 का दशक मदन मोहन के संगीत सफ़र का अन्तिम अध्याय था। पिछले दो दशकों से उत्कृष्ट संगीत देने के बावजूद जब उन्हें कोई भी विशिष्ट पुरस्कार कहीं से नहीं मिला तो इस बात का अफ़सोस उन्हें ज़रूर था, ऐसा उनके परिवार वालों ने उनके वेबसाइट पर लिखा है। मदन जी को पुरस्कारों पर से ना केवल भरोसा उठ गया था बल्कि उनमें पुरस्कार प्राप्त करने में कोई इच्छा ही नहीं बची थी। इसलिए जब ’दस्तक’ के लिए उनका नाम राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए चुना गया तो उन्होंने दिल्ली जाकर उसे ग्रहण करने से साफ़ इनकार कर दिया। उनकी यह नाराज़गी जायज़ थी, पर राष्ट्रपति द्वारा दिए जाने वाले पुरस्कार को ग्रहण करने से इनकार की बात सुन कर उनके परिवार वाले और फ़िल्म-जगत के उनके मित्र विक्षुब्ध हो उठे। बहुत लोगों ने उन्हें समझाया पर वो मानने के लिए तैयार नहीं। अन्त में अभिनेता संजीव कुमार, जिन्हें ’दस्तक’ फ़िल्म के लिए ही सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिल रहा था, ने उनसे कहा कि मैं भी दिल्ली जा रहा हूँ इसी फ़िल्म के लिए पुरस्कार ग्रहण करने, तब जाकर मदन जी राज़ी हुए साथ चलने को।

फ़िल्म ’दस्तक’ में कुल चार ही गीत थे - तीन लता की आवाज़ में और एक रफ़ी का गाया हुआ। "माई री मैं कासे कहूँ पीर अपने जिया की..." गीत फ़िल्म में लता जी की आवाज़ में है, पर मदन मोहन की आवाज़ में इसका एक संस्करण रेकॉर्ड पर उपलब्ध है। "हम हैं मताय-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह..." गीत के बारे में डॉ. अलका देव मारुलकर कहती हैं, "अभिजात संगीत, परिष्कृत संगीत, अमर्त्य संगीत की परिभाषा क्या है, यह हम नहीं जानते, लेकिन वैसा ही होगा जैसा मदन मोहन के गीत हैं, जिसे हम कहते हैं अभिरुचि सम्पन्न। ऐसा ही एक गीत है फ़िल्म ’दस्तक’ में। इस गीत में करूण विलाप है, बाज़ार में बिकनेवाली कला का करूण विलाप!"।  फ़िल्म ’दस्तक’ का तीसरा लता जी का गाया गीत है "ब‍इयाँ ना धरो ओ बलमा..." जिसे हमने आज के इस अंक के लिए चुना है। यह गीत राग चारुकेशी पर आधारित है। इस गीत की गायकी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि लता जी ने इसे अपने सबसे कम स्वरमान (lowest pitch) पर गाया है। लता जी के अधिकतर गीत ऊँची पट्टी पर गाये गए हैं, पर यह गीत बिल्कुल विपरीत है। इस गीत के साथ एक दिलचस्प घटना भी जुड़ी हुई है। इसे लता जी के अपने शब्दों में ही पढ़िए - "शायरी पर वो बहुत ज़ोर देते थे। जब तक शब्दों में गहराई न हो, गीतकार को गीत का आलेख वापस लौटा देते थे। फिर कोशिश कीजिए, जब दिल से बात निकलेगी तब असर करेगी। एक दिन मजरूह साहब का गीत रेकॉर्ड हुआ। बहुत अच्छा रेकॉर्ड हुआ। तर्ज़ तो थी ही अच्छी, कविता बहुत ही सुन्दर थी। रेकॉर्डिंग के बाद मदन भ‍इया इतने ज़्यादा ख़ुश थे कि फ़ौरन पहुँचे स्टुडियो में शाबाशी देने शायर को। आप जानते हैं किस तरह शाबाशी दी? बेचारे मजरूह साहब के पेट पर हल्के हल्के दर्जनों मुक्के बरसा दिए। मजरूह साहब ठहरे शायर, और वो भी सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश के, मरहबा का यह तरीक़ा उनके लिए यक़ीनन एक नया तजुर्बा था। पता नहीं पुरदर्द था या पुरकैफ़। मदन भ‍इया बोले घर चलिए मैं आपको अपने हाथ से पका कर खाना खिलाऊँगा। रस चाहे स्वर का हो या रसोई का, वो दोनों में माहिर थे।" आइए, राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म ‘दस्तक’ का यही गीत सुनते हैं।


राग चारुकेशी : “बइयाँ ना धरो ओ बलमा...” : लता मंगेशकर : फिल्म – दस्तक



राग चारुकेशी मूलतः दक्षिण भारतीय संगीत पद्यति का राग है। उत्तर भारतीय संगीत में इस राग का प्रचलन कर्नाटक संगीत से ही हुआ है। यह सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात आरोह और अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। राग चारुकेशी में धैवत और निषाद स्वर कोमल तथा शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। आरोह में – सा, रे, ग, म, प, ध(कोमल), नि(कोमल), सां तथा अवरोह में सां, नि(कोमल), ध(कोमल), प, म, ग, रे, सा स्वर होते हैं। राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। राग चारुकेशी को दिन के दूसरे प्रहर में गाने-बजाने की परम्परा है। इस राग में यदि शुद्ध ऋषभ स्वर को कोमल ऋषभ स्वर में परिवर्तित कर दिया जाए तो यह राग बसन्त मुखारी की अनुभूति कराता है। इसी प्रकार यदि कोमल निषाद स्वर को शुद्ध निषाद स्वर में परिवर्तित कर दिया जाए तो राग नटभैरव का अनुभव होने लगता है। फिल्मों में राग चारुकेशी का सर्वाधिक प्रयोग संगीतकार कल्याणजी आनन्दजी ने किया है। राग चारुकेशी के यथार्थ स्वरूप को समझने के लिए अब हम इस राग में वाद्य-संगीत की एक रचना प्रस्तुत कर रहे हैं। देश के सुविख्यात सारंगी वादक उस्ताद सुल्तान खाँ की सारंगी पर राग चारुकेशी का आलाप और एक विलम्बित रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं। आप वाद्य संगीत की इस रचना में फिल्म ‘दस्तक’ के गीत के स्वर तलाश करने का प्रयास कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति प्रदान कीजिए।


राग चारुकेशी : सारंगी पर आलाप और विलम्बित लय की एक रचना : उस्ताद सुल्तान खाँ





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 276वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक बार पुनः संगीतकार मदन मोहन के संगीत से सजे एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 280वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन का आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत के गायक को पहचान सकते हैं? हमे गायक का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 2 जुलाई, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 278वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 274 की संगीत पहेली में हमने आपको मदन मोहन के संगीत निर्देशन में बनी और 1964 में प्रदर्शित फिल्म ‘जहाँआरा’ से एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – छायानट, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है – ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायक और गायिका – मोहम्मद रफी और सुमन कल्याणपुर

इस बार की पहेली में चार प्रतिभागियों ने सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं - वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। इन सभी विजेताओं ने दो-दो अंक अर्जित किये है। सभी विजेता प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में जारी हमारी श्रृंखला ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ की आज की कड़ी में आपने राग चारुकेशी का परिचय प्राप्त किया। इस श्रृंखला में हम फिल्म संगीतकार मदन मोहन के कुछ राग आधारित गीतों को चुन कर आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। हमारी अगली श्रृंखला “वर्षा ऋतु के राग” विषय पर आधारित होगी। इस श्रृंखला के लिए आप अपने सुझाव या फरमाइश ऊपर दिये गए ई-मेल पते पर शीघ्र भेजिए। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, December 29, 2013

कुछ दिग्गज स्वर-शिल्पी, जिन्होने कबीर को गाया

  
स्वरगोष्ठी – 148 में आज

रागों में भक्तिरस – 16

‘चदरिया झीनी रे बीनी...’


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की सोलहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-रसिकों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और कुछ प्रमुख भक्तिरस कवियों की रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस भक्ति रचना के फिल्म में किये गए प्रयोग भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की पिछली दो कड़ियों में हमने सोलहवीं शताब्दी की भक्त कवयित्री मीरा के दो पदों पर आपके साथ चर्चा की थी। आज की कड़ी में हम पन्द्रहवीं शताब्दी के सन्त कवि कबीर के व्यक्तित्व और उनके एक पद- ‘चदरिया झीनी रे बीनी...’ पर चर्चा करेंगे। कबीर के इस पद को भारतीय संगीत की हर शैली में गाया गया है। आज के अंक में पहले हम आपको यह पद राग चारुकेशी में निबद्ध, ध्रुवपद गायक गुण्डेचा बन्धुओं के स्वरों में सुनवाएँगे। इसके बाद यही पद सुविख्यात भजन गायक अनूप जलोटा राग देश में और अन्त में लोक संगीत के जाने-माने गायक प्रह्लाद सिंह टिपणिया प्रस्तुत करेंगे। आप भी नादब्रह्म के माध्यम से निर्गुणब्रह्म की उपासना के साक्षी बनें। 


न्द्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी के जिन भक्त कवियों ने भारतीय जनमानस को सर्वाधिक प्रभावित किया उनमें कबीर अग्रगण्य हैं। उनके जन्म और जन्मतिथि के विषय में विद्वानों के कई मत हैं। एक मान्यता के अनुसार कबीर का जन्म 1398 ई. की ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को काशी (अब वाराणसी) के लहरतारा नामक स्थान पर हुआ था। जुलाहा परिवार में उनका पालन-पोषण हुआ। आगे चलकर वे सन्त रामानन्द के शिष्य बने और अलख जगाने लगे। कबीर विविध क्षेत्रों की मिली-जुली सधुक्कड़ी भाषा में किसी भी सम्प्रदाय और रूढ़ियों की परवाह किये बिना खरी बात कहते थे। कबीर ने हिन्दू और मुस्लिम, दोनों धर्मावलम्बियों के समाज में व्याप्त रूढ़िवाद तथा कट्टरवाद का मुखर विरोध किया। कबीर की वाणी, उनके मुखर उपदेश, उनकी साखी, रमैनी, बीजक, बावन-अक्षरी, उलटबासी आदि रूप में उपलब्ध हैं। गुरुग्रन्थ साहब में उनके 200 पद और 250 साखियाँ संकलित हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में चर्चा के लिए हमने कबीर का ही एक पद चुना है। यह कबीर के अत्यन्त लोकप्रिय पदों में से एक है। पहले आप इस पद की पंक्तियों पर दृष्टिपात कीजिए।

झीनी झीनी बीनी चदरिया।

काहे कै ताना काहे कै भरनी,

कौन तार से बीनी चदरिया।

ईडा पिङ्गला ताना भरनी,

सुखमन तार से बीनी चदरिया।

आठ कँवल दल चरखा डोलै,

पाँच तत्त्व गुन तीनी चदरिया।

वाको सियत मास दस लागे,

ठोंक ठोंक कै बीनी चदरिया।

सो चादर सुर नर मुनि ओढी,

ओढि कै मैली कीनी चदरिया।

दास कबीर जतन से ओढी,

ज्यों कीं त्यों धर दीनी चदरिया॥

इस पद में कबीर ने मानव के शरीर धारण करने, जीवन को संस्कारित करने और शरीर की सार्थकता से सम्बन्धित गूढ तत्त्वों को एक चादर के प्रतीक रूप में समझाने का प्रयास किया है। कबीर के शब्दों को भारतीय संगीत की प्रायः सभी शैलियों में स्वर मिला है। शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम, लोक और फिल्म संगीत के साथ-साथ सूफी संगीत और कव्वाली में भी कबीर गाये जाते है। आज के अंक में इस पद के गायन के तीन उदाहरण हम प्रस्तुत करेंगे। सबसे पहले यह पद ध्रुवपद अंग में सुनिए, जिसे सुप्रसिद्ध ध्रुवपद गायक गुण्डेचा बन्धुओं ने प्रस्तुत किया है। भारतीय संगीत की प्राचीन और शास्त्र-सम्मत शैली है- ध्रुवपद। इस शैली की गायकी में एक युगल गायक हैं- गुण्डेचा बन्धु (रमाकान्त और उमाकान्त गुण्डेचा), जिन्हें देश-विदेश में ध्रुवपद गायकी में भरपूर यश प्राप्त हुआ है। इनकी संगीत-शिक्षा उस्ताद जिया फरीदउद्दीन डागर और विख्यात रुद्रवीणा वादक उस्ताद जिया मोहिउद्दीन डागर द्वारा हुई है। ध्रुवपद के ‘डागुरवाणी’ गायन में दीक्षित इन कलासाधकों ने कबीर का यह पद राग चारुकेशी के स्वरों में प्रस्तुत किया है। राग चारुकेशी के परिचय से पहले गुण्डेचा बन्धुओं से सुनिए कबीर का पद- ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया...’। मोहक पखावज वादन अखिलेश गुण्डेचा ने की है।


कबीर पद : ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया...’ : राग चारुकेशी : पं. रमाकान्त और उमाकान्त गुण्डेचा



कबीर का यह पद आप राग चारुकेशी के स्वरों में सुन रहे थे। यह राग मूलतः कर्नाटक संगीत पद्यति का है, जिसे उत्तर भारतीय संगीत पद्यति में भी मान्यता प्राप्त है। सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह-अवरोह में धैवत और निषाद स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते है। राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। यह राग पूर्वांग में बिलावल और उत्तरांग में भैरवी का आभास कराता है। चारुकेशी के शुद्ध ऋषभ के स्थान पर यदि कोमल ऋषभ का प्रयोग किया जाए तो राग बसन्त मुखारी का और यदि कोमल निषाद के स्थान पर शुद्ध निषाद का प्रयोग किया जाए तो यह राग नट भैरव की अनुभूति कराता है। इस राग का गायन-वादन दिन के दूसरे प्रहर में अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है।

कबीर का यही पद अब हम चर्चित भजन गायक अनूप जलोटा के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं। अनूप जलोटा के पिता पुरुषोत्तमदास जलोटा स्वयं एक लोकप्रिय भजन गायक हैं। इनका परिवार पंजाब से लखनऊ आया था। परन्तु अनूप जलोटा का जन्म 29 जुलाई 1953 को नैनीताल में हुआ था। भजन गायन उन्हें अपने माता-पिता से विरासत में मिला, जिसे उन्होने लखनऊ के भातखण्डे संगीत महाविद्यालय (अब विश्वविद्यालय) में सँवारा। बचपन से ही क्रिकेट और टेबिल टेनिस खेल के शौकीन अनूप जलोटा सूर, कबीर, तुलसी, मीरा आदि भक्त कवियों-कवयित्रियों के पदों को रागों का स्पर्श देकर देश-विदेश के श्रोताओं के बीच लोकप्रिय हुए। आज हमारी चर्चा में कबीर का जो पद है, उसे अनूप जलोटा ने राग देश का स्पर्श दिया है। राग देश की रचना खमाज थाट के अन्तर्गत मानी गई है। इसमे कोमल और शुद्ध दोनों निषाद का प्रयोग होता है। आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। आरोह में गान्धार स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग होते हैं। इस प्रकार यह औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। इस राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। इसके गायन-वादन का उपयुक्त समय रात्रि का दूसरा प्रहर है। अब सुनिए, राग देश के स्वरों का सहारा लेकर, अनूप जलोटा की आवाज़ में कबीर का यही पद।


कबीर पद : ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया...’ : राग देश : भजन गायक अनूप जलोटा



कबीर का यह पद संगीत की विविध शैलियों में अनेक शीर्षस्थ कलासाधकों ने गाया है। ध्रुवपद और भजन गायकी में यह पद सुनवाने का बाद अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, यही पद मालवा की लोक संगीत शैली में। इसे मालवा अंचल की लोक संगीत शैली में प्रस्तुत कर रहे है, पद्मश्री सम्मान से विभूषित प्रह्लाद सिंह टिपणिया 7 सितम्बर, 1954 को उज्जैन (मध्यप्रदेश) के तरना कस्बे में जन्में श्री टिपणिया पेशे से शिक्षक हैं और मालवा के लोक संगीत में उनकी गहरी अभिरुचि थी। पारम्परिक लोक कलाकारों के बीच रह कर उन्होने इस अनूठी शैली का गहन अध्ययन किया और कबीर को ही गाने लगे। इस प्रकार की गायकी में स्वर और लय को साधने का प्रमुख वाद्य तम्बूरा होता है, जिसमें पाँच तार होते हैं। इसके अलावा करताल, ढोलक और मँजीरा भी सहायक वाद्य होते हैं। देश में आयोजित होने वाले प्रमुख संगीत समारोहों के सहभागी श्री टिपणिया अमेरिका और ब्रिटेन में भी कबीर को प्रस्तुत कर चुके हैं। कबीर के पद ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया...’ का मालवा की लोक संगीत शैली में गायन प्रस्तुत कर रहे हैं, प्रह्लाद सिंह टिपणिया और उनके साथी। आप कबीर के इस पद की रसानुभूति कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


कबीर पद : ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया...’ : लोक संगीत : प्रह्लाद सिंह टिपणिया और साथी




आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 148वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक विख्यात गायक की आवाज़ में कबीर की भक्ति रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यह पाँचवाँ और इस वर्ष का अन्तिम सेगमेंट है। 150वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – इस भक्ति रचना के अंश को सुन कर गायक को पहचानिए और हमे उनका नाम लिख भेजिए।

2 – इस रचना की प्रस्तुति में जिस ताल का प्रयोग हुआ है उसके मात्राओं की संख्या बताइए।

आप अपने उत्तर केवल radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 150वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 146वीं कड़ी में हमने आपको भक्त कवयित्री मीरा के एक पद का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका वाणी जयराम। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी और चंडीगढ़ से हरकीरत सिंह ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का


   
मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ के अन्तर्गत आज के अंक में हमने आपको सन्त कबीर के एक पद का गायन ध्रुवपद शैली, भजन शैली और लोक संगीत शैली में प्रस्तुत किया। अगले अंक में इसी पद का गायन कुछ और शैलियों और कलासाधकों के स्वरों में हम प्रस्तुत करेंगे। अगले अंक में इस लघु श्रृंखला की सत्रहवीं कड़ी के साथ रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों की प्रतीक्षा करेंगे।



प्रस्तुति :कृष्णमोहन मिश्र 

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ