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Wednesday, August 26, 2009

मुझको इस रात की तन्हाई में आवाज़ न दो....दर्द और मुकेश की आवाज़ का था एक गहरा नाता

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 183

'१० गीत जो थे मुकेश को प्रिय' लघु शृंखला के अंतर्गत आप सुन रहे हैं मुकेश की गाए हुए उन गीतों को जो उनके दिल के बहुत करीब थे। इसमे कोई दोराय नहीं कि ये गानें सिर्फ़ उन्ही को नहीं, हम सभी को अत्यंत प्रिय हैं, और तभी तो इतने दशकों बाद भी लोगों की ज़ुबाँ पर अक्सर चढ़े हुए मिलते हैं। विविध भारती के वरिष्ठ उद्‍घोषक कमल शर्मा के शब्दों में, "मुकेश के स्वर में नैस्वर्गिक मिठास थी, सोज़ और मधुरता तो थी ही, साधना और लगन से उन्होने उसमें और निखार ले आए थे। चाहे शृंगार रस हो या मस्ती भरा कोई गीत, या फिर टूटे हुए दिल की सिसकियाँ, हर मूड को बख़ूबी पेश करने की क्षमता रखते थे मुकेश। लेकिन सच तो यही है कि मुकेश ने प्रेम से ज़्यादा विरह और वेदना के गीत गाए हैं। एक ज़माना था जब प्रेम निवेदन मे एक शालीनता हुआ करती थी। और प्यार में नाकामी में भी कुछ ऐसी ही बात थी। ऐसे ही टूटे हुए किसी दिल की दुनिया में ले जाते हैं मुकेश की आवाज़। रात के गभीर सन्नाटे मे जब ये आवाज़ हौले हौले गूँजती है तो बेचैन कर देती है मन को।" एक ऐसा ही बेचैन कर देने वाला गीत अज पेश-ए-ख़िदमत है फ़िल्म 'दिल भी तेरा हम भी तेरे' से। "मुझको इस रात की तन्हाई में आवाज़ न दो, जिसकी आवाज़ रुलाए मुझे वो साज़ न दो"।

'दिल भी तेरा हम भी तेरे' सन् १९६० की फ़िल्म थी। कन्वर कला मंदिर के बैनर तले बनी इस फ़िल्म के निर्देशक थे अर्जुन हिंगोरानी और मुख्य चरित्रों में थे धर्मेन्द्र, उषा किरण, बलराज साहनी और कुमकुम। धर्मेन्द्र भी नए थे, फ़िल्म कम बजट की थी, और बतौर संगीतकार भी नए नए फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखने वाले कल्याणजी-आनंदजी को लिया गया था। इस गीत को लिखा था शायर शमिम जयपुरी साहब ने। फ़िल्म भले ही ज़्यादा न चली हो, लेकिन फ़िल्म के प्रस्तुत गीत ने वह कमाल दिखाया जो फ़िल्म के किसी दूसरे क्षेत्र ने नहीं दिखा पाया। इस गीत को याद करते हुए आनंदजी 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में कहते हैं, "इससे पहले, कमलजी, दो चार बहुत अच्छे गानें हैं जो सुनाने हैं लोगों को, ये शुरु की पिक्चरें चली नहीं, हमारी पिक्चर चली २५-वे पिक्चर से, 'जब जब फूल खिले', जब कलर का एरा आया। लेकिन हर पिक्चर के गानें चल गए थे। 'सम्राट चंद्रगुप्त' में "चाहे पास हो चाहे दूर हो", "भर भर आए अखियाँ", "नैना हैं जादू भरे", "क़ैद में है बुलबुल सैयाद मुस्कुराये"। उसके बाद एक नया ट्रेंड भाईसाहब (कल्यानजी) ने बहुत अच्छा काम्पोज़ किया था, "मुझको इस रात की तन्हाई में आवाज़ न दो", म्युज़िक का एक नया दौर, एक नई स्टाइल में उन्होने बनाया था। मैने उनसे कहा कि 'बहुत अच्छा काम्पोज़ किया'। बोले 'क्या किया? हो गया'। ग़ज़ल को एक नए अंदाज़ में पेश किया गया है, तो वह गाना चल गया। उसके बाद "नींद न मुझको आए", 'सट्टा बाज़ार' के गानें चले, "तुम्हे याद होगा कभी हम मिले थे", उपरवाला इतना मेहरबान था हम पे कि हर पिक्चर के दो तीन गानें चल जाते थे।" तो दोस्तों, आइए, शमिम जयपुरी के असरदार बोलों, कल्याणजी-आनंदजी के दिल छू लेनेवाले संगीत और मुकेश की सोज़ भरी आवाज़ में सुनते हैं आज का सुनहरा नग़मा।



गीत के बोल (सौजन्य बी एस पाबला)

मुझ को इस रात की तनहाई में आवाज़ न दो
जिसकी आवाज़ रुला दे मुझे वो साज़ न दो
आवाज़ न दो...

मैंने अब तुम से न मिलने की कसम खाई है
क्या खबर तुमको मेरी जान पे बन आई है
मैं बहक जाऊँ कसम खाके तुम ऐसा न करो
आवाज़ न दो...

दिल मेरा डूब गया आस मेरी टूट गई
मेरे हाथों ही से पतवार मेरी छूट गई
अब मैं तूफ़ान में हूँ साहिल से इशारा न करो
आवाज़ न दो...

रौशनी हो न सकी लाख जलाया हमने
तुझको भूला ही नहीं लाख भुलाया हमने
मैं परेशां हूँ मुझे और परेशां न करो
आवाज़ न दो...

किस कदर रोज़ किया मुझसे किनारा तुमने
कोई भटकेगा अकेला ये न सोचा तुमने
छुप गए हो तो कभी याद ही आया न करो
आवाज़ न दो...


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. राज कपूर की आवाज़ ही नहीं उनकी आत्मा थे मुकेश.
२. मुखड़े में शब्द है -"अपने".
३. इस फिल्म का एक अन्य हिट गीत पहले ही इस शृंखला का हिस्सा बन चुका है.

पिछली पहेली का परिणाम -
पूर्वी जी बधाई, १४ अंकों के साथ आप रोहित जी और दिशा जी के बराबर आ चुकी हैं. अब बस आपसे २ अंक आगे पराग जी हैं. दिलीप जी, शमिख जी, मनु जी, वाणी जी, अदा जी, विनोद जी और पाबला जी का विशेष आभार.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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