शनिवार, 31 जनवरी 2009

सुनो कहानी: प्रेमचंद की 'माँ'

उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी 'माँ'

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने शन्नो अग्रवाल की आवाज़ में प्रेमचंद की रचना ''गुल्ली डंडा'' का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं प्रेमचंद की अमर कहानी "माँ", जिसको स्वर दिया है लन्दन निवासी कवयित्री शन्नो अग्रवाल ने। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। कहानी का कुल प्रसारण समय है: 39 मिनट।


यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ...मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूं
~ मुंशी प्रेमचंद (१८३१-१९३६)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनिए प्रेमचंद की एक नयी कहानी

वह उसका प्यारा पति ही था, किन्तु शोक! उसकी सूरत कितनी बदल गई थी। वह जवानी, वह तेज, वह चपलता, वह सुगठन, सब प्रस्थान कर चुका था। केवल हड्डियों का एक ढॉँचा रह गया था। न कोई संगी, न साथी, न यार, न दोस्त।
(प्रेमचंद की "माँ" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.
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यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें (ऑडियो फ़ाइल तीन अलग-अलग फ़ॉरमेट में है, अपनी सुविधानुसार कोई एक फ़ॉरमेट चुनें)
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#Twenty Fourth Story, Maa: Munsi Premchand/Hindi Audio Book/2009/04. Voice: Shanno Aggarwal

शुक्रवार, 30 जनवरी 2009

"केसरिया बालमा..", मांड एक - फनकार अनेक


राजस्थान के राजाओं की रूमानी कहानियों पर आधारित लोक गीत हैं जिन्हें मांड कहा जाता है. रेगिस्तान की मिटटी में रचे बसे इस राग पर जाने कितनी रचनाएँ बनी, जब भी किसी गायक/गायिका ने मांड को स्वर दिया सुनने वालों के जेहन में ऊंठों के गुजरते काफिलों पर गाते बंजारों की यायावरी जीवंत हो गई.

मांड ने हमेशा से संगीत प्रेमियों के के दिलों पर राज किया है. देशी- विदेशी सब पर इसने अपना जादू चलाया है. सही मायनों में मांड राजस्थानी लोक संस्कृति की सच्ची पहचान है. मांड के बारे में में संजय पटेल भाई ने हमें जानकारी दी कि पंडित अजय चक्रवर्ती के शोधों के अनुसार मांड के कई रंग होते है,और तक़रीबन सौ तरह की माँडें गाई बजाई जातीं रहीं हैं.

"केसरिया बालमा..." की धुन से हर संगीत प्रेमी परिचित है. ये लोक गीत मांड का एक शुद्धतम रूप है. बरसों बरस जाने कितने फनकारों ने इसे अपनी आवाज़ में तराशा. इसे गाने बजाने के मोह से शायद ही कोई बच पाया हो. यहाँ तक कि आज के पॉप गायक/ गायिकाएं भी इसके सम्मोहन में डूबे नज़र आए हैं. चलिए अब बातों को विराम देते हैं और आपको सुनवाते हैं मुक्तलिफ़ गायक /गायिकाओं की आवाज़ में "केसरिया" रंग रंगा राग मांड.

सबसे पहले सुनिए अल्लाह जिला बाई के कंठ स्वरों का नाद -


शुभा मुदगल के अंदाज़ का आनंद लें -


अकबर अली का निराला अंदाज़ -


ज़रीना बेगम -


लता मंगेशकर ने भी इसे गाया फ़िल्म "लेकिन" में -


पॉप/रॉक संगीत के अगुवा पलाश सेन भी पीछे नही रहे -


उम्मीद है कि "मिटटी के गीत" शृंखला की ये प्रस्तुति आपको पसंद आई होगी...जल्द ही मिलेंगें किसी अन्य प्रदेश के लोक संगीत का जायका लेकर.



गुरुवार, 29 जनवरी 2009

संगीतकार हमेशा गायक से ऊँचा दर्जा रखता है, मानना था ओ पी नैयर का

(पहले अंक से आगे ...)

"किस्मत ने हमें मिलाया और किस्मत ने ही हमें जुदा कर दिया....", अक्सर उनके मुँह से ये वाक्य निकलता था. आशा के साथ सम्बन्ध विच्छेद होने के बाद ओ पी का जीवन फ़िर कभी पहले जैसा नही रहा. इस पूरी घटना ने उनके पारिवारिक रिश्तों में भी दरारें पैदा कर दी थी. ये सब उनकी पत्नी, तीन बेटियों और एक बेटे के लिए लगभग असहनीय हो चला था. कुंठा से भरे ओ पी ने किसी साधू की सलाह पर सारी धन संपत्ति, घर (जो लगभग ६ करोड़ का था उन दिनों), गाड़ी, बैंक बैलेंस आदि का त्याग कर सब से अपना नाता तोड़ लिया. पर उनके परिवार ने कभी भी उन्हें माफ़ नही किया....कुछ ज़ख्म कभी नही भरते शायद. 1989 में घर छोड़ने के बाद उन्होंने एक मध्यमवर्गीय महाराष्ट्रीय परिवार के साथ पेइंग गेस्ट बन कर रहने लगे, और मरते दम तक यही उनका परिवार रहा. यहाँ उन्हें वो प्यार और वो सम्मान मिला जिसे शायद उम्र भर तलाशते रहे ओ पी. उस परिवार के एक सदस्या के अनुसार उन्हें अपने परिवार और फ़िल्म इंडस्ट्री के बारे में बात करना बिल्कुल नही अच्छा लगता था. सुरैया, शमशाद बेगम और कभी कभी गजेन्द्र सिंह (स रे गा माँ पा फेम) ही थी जिनसे वो बात कर लिया करते थे. उन्हें होमीयो पेथी का अच्छा ज्ञान था और इसी ज्ञान को बाँट कर वो लोगों की सेवा करने लगे. उनके कुछ जो साक्षात्कार उपलब्ध हैं उनके कुछ अंशों के माध्यम से कोशिश करते हैं और करीब से समझने की हम सब के प्रिय संगीतकार ओ पी को.

पर पहले सुनिए वो गीत जो मुझे व्यक्तिगत तौर पर बहुत पसंद है -


"मुझे दिखावे और झूठ से नफ़रत है. मैं लता की आवाज़ का इस्तेमाल किए बिना भी कामियाब रहा. इस बात में कोई शक नही कि लता की आवाज़ में दिव्य तत्व हैं, वो एक महान गायिका हैं, पर उनकी आवाज़ पतली है, मेरे गीतों को जिस तरह की आवाजों की दरकार थी वो शमशाद, गीता और आशा में मुझे मिल गया था." तमाम मतभेदों के बावजूद ओ पी लता को ही सर्वश्रेष्ठ मानते थे. आशा के साथ उन्होंने कमियाबी की बुलंदियों को छुआ, लगभग 70 फिल्मों का रहा ये साथ. बाद में आशा ने आर डी बर्मन से विवाह कर लिया. पर ओ पी ने हमेशा ये कहा कि आर डी ने अपने बेहतर गाने लता से गवाए और आशा को हमेशा दूसरा ही स्थान दिया. रफी को सर्वश्रेष्ठ गायक मानते थे. पर मुकेश और महेंद्र कपूर के साथ भी उनके बेहद कामियाब गीत सुने जा सकते हैं.

उदहारण के लिए "संबंध" का ये गीत ही लीजिये -


ओ पी ने लता मंगेशकर सम्मान को लेने से इनकार कर दिया. उनका तर्क था -"एक संगीतकार कैसे वो सम्मान ले सकता है जो एक गायक या गायिका के नाम पर हों. संगीतकार गायक से उपर होता है. दूसरी बात लता अभी जीवित हैं उनके नाम पर सम्मान देना ग़लत है और तीसरा कारण ये कि मैंने कभी लता के साथ काम नही किया, इसलिए मैं इस पुरस्कार के स्वीकार करने में असमर्थ हूँ...मेरा सबसे बड़ा सम्मान तो मेरे श्रोताओं के प्यार के रूप में मुझे मिल ही चुका है..." सच ही तो है आज भी उनके गीत हम सब की जुबां पर बरबस आ जाते हैं, कौन सा ऐसा राष्ट्रीय त्यौहार है जब ये गीत स्कूलों में नही बजता...



गुरुदत्त को याद कर ओ पी बहुत भावुक हो जाते थे, उस रात को याद कर वो बताते हैं -"उस दिन जब मैं घर आया तो मुझे मेरी पत्नी ने बताया कि राज कपूर का फ़ोन आया था और बता रहे थे कि गुरुदत्त बेतहाशा रोये जा रहे हैं और मुझसे (ओ पी से)मिलना चाह रहे हैं. मैं उस दिन बहुत थका हुआ थे और नींद की ज़रूरत महसूस कर रहा था यूँ भी मुझे अगली सुबह उनसे मिलना ही था तो मैं नही गया...अगली सुबह जब उनके घर पहुँचा तब तक सब खत्म हो चुका था मैंने अपनी आदत स्वरुप खुले आम गीता और वहीदा को उनकी मौत का जिम्मेदार ठहराया. वहीदा शायद मुझसे नफरत करती थी...". संगीत के बदलते रूप से वो दुखी नही थे -"सब कुछ बदलता है समय के साथ लाजमी है संगीत भी बदलेगा. पर सात सुरों की शुद्धता कभी कम नही हो सकती, गीत भद्दे लिखे जा सकते हैं, नृत्य भद्दे हो सकते हैं पर संगीत कभी भद्दा नही हो सकता."



अपनी कुछ बाजीगारियों का ज़िक्र भी उन्होंने किया है कुछ जगहों पर मसलन - "मैं कभी भी १५ मिनट से अधिक नही लेता था कोई धुन बनने में, पर निर्माताओं को हमेशा १०-१५ दिन आगे की तारिख देता था ताकि उन्हें ये काम इतना सरल न लगे..." और उनके इस बयान पर ध्यान दीजिये ज़रा- "मैंने कभी भी अपने समय के संगीतकारों को नही सुना, दूसरे क्या कर रहे हैं मैं जान कर ये जानने की कोशिश नही करता था क्योंकि मैं नही चाहता था कि मेरे संगीत पर उनका या मशहूर होती, चलन में रहती चीज़ों का असर आए. मैं बस अपने ही गीत सुनता हूँ, तब भी और अब भी. एक बात है जिस पर मुझे हमेशा फक्र रहा है वो हैं मेरी इमानदारी अपने संगीत के प्रति, जिसके साथ मैंने कभी समझौता नही किया...". लगता है जैसे ओ पी बस अपने यादगार नग्मों को हम श्रोताओं को देने के लिए ही इस धरती पर आए थे. अन्तिम दो सालों में उन्होंने अपने संगीत को भी सुनना छोड़ दिया था. हाँ पर एक फ़िल्म थी जिसे वो एक दिन में भी कई बार देख लेते थे. १९६५ में आई "ये रात फ़िर न आएगी" के बारे में ओ पी का कहना थे कि इस फ़िल्म को देख कर उन्हें एक अलग ही अनुभूति होती है. नैयर साहब के गीतों से हम आवाज़ की महफ़िल सजाये रखेंगे ये वादा है. फिलहाल आपको छोड़ते हैं इसी फ़िल्म के इस बेहद खूबसूरत गीत के साथ जिसे आवाज़ दी है.....(बताने की ज़रूरत है क्या ?....)




बुधवार, 28 जनवरी 2009

बरकरार है आज भी ओ पी नैयर के संगीत का मदभरा जादू

जीनिअस संगीतकार ओ पी नैयर की दूसरी पुण्यतिथि पर विशेष -

१९५२ में एक फ़िल्म आई थी, -आसमान, जिसमें गीता दत्त ने एक बेहद खूबसूरत गीत गाया था -"देखो जादू भरे मोरे नैन..." यह संगीतकार ओ पी नैयर की पहली फ़िल्म थी, जो पहला गाना इस फ़िल्म के लिए रिकॉर्ड हुआ था वो था "बेवफा जहाँ में वफ़ा ढूँढ़ते रहे..." गायक थे सी एच आत्मा साहब. दो अन्य गीत सी एच आत्मा की आवाज़ में होने थे जो नासिर पर फिल्माए जाने थे और ४ अन्य गीत, गीता ने गाने थे जो नायिका श्यामा पर फिल्मांकित होने थे. फ़िल्म के कुल ८ गीतों में से आखिरी एक गीत जो फ़िल्म की सहनायिका पर चित्रित होना था उसके बोल थे "जब से पी संग नैना लगे...". नैयर ने इस गीत के लिए लता जी को तलब किया पर जब लता जी को ख़बर मिली कि उन्हें एक ऐसा गीत गाने को कहा जा रहा है जो नायिका पर नही फिल्माया जाएगा (ये उन दिनों बहुत बड़ी बात हुआ करती थी) उनके अहम् को धक्का लगा. वो उन दिनों की (और उसके बाद के दिनों की भी) सबसे सफल गायिका थी. लता ने ओ पी के लिए इस गीत को गाने से साफ़ इनकार कर दिया और जब नैयर साहब तक ये बात पहुँची, तो उन्होंने भी एक दृढ़ निश्चय किया, कि वो अपने कैरिअर में कभी भी लता के साथ काम नही करेंगें. ज़रा सोचिये इंडस्ट्री में कौन होगा ऐसा दूसरा, जो अपनी पहली फ़िल्म में ऐसा दबंग फैसला कर ले और लगभग दो दशकों तक जब तक भी उन्होंने फिल्मों में संगीत दिया वो अपने उस फैसले पर अडिग रहे. उस वक्त वो मात्र २५ साल के थे और पहली और आखिरी बार उन्होंने "जब से पी संग..." गीत के लिए चुना गायिका राजकुमारी को.

बेवफा जहाँ में वफ़ा ढूँढ़ते रहे (सुनिए ओ पी का सबसे पहला रेकॉर्डेड गीत)


हालांकि “आसमान” और उसके बाद आयी “छम छमा छम” और “बाज़”, तीनों ही फिल्में बुरी तरह पिट गई. पर गायिका गीता रॉय (दत्त) ने इस नए संगीतकार के हुनर को पहचान लिया था, उन्होंने गुरु दत्त से जब वो अपनी पहली प्रोडक्शन पर काम शुरू करने वाले थे ओ पी की सिफारिश की. गीता के आग्रह को गुरु टाल नही पाये और इस तरह ओ पी को मिली "आर पार". इस फ़िल्म ने नैयर ने गीता के साथ मिलकर वो गीत रचे कि आज तक जिनके रिमिक्सिस बनते और बिकते हैं. और इसी के साथ हिन्दी फिल्मों को मिला एक बेमिसाल संगीतकार. “आर पार” के बाद गुरु दत्त प्रोडक्शन के साथ नैयर ने अपनी हैट ट्रिक पूरी की मिस्टर और मिसिस ५५ (१९५५), और सी ई डी (१९५६) से. अब उनका सिक्का चल निकला था.

सुनिए गीता की मदभरी आवाज़ में "हूँ अभी मैं जवां..."


वो जिनके गीत आज भी हमें दौड़ भाग भरी इस जिंदगी में सकून देते हैं, उस ओ पी नैयर साहब के जीवन मगर फूलों की सेज नही रही कभी, कुछ स्वभाव से भी वो शुद्ध थे, खरे को खरा और खोटे को खोटा कहने से वो कभी नही चूकते थे. शायद यही वजह थी कि उनकी फिल्मी दुनिया में बहुत कम लोगों के साथ पटरी बैठी, यहाँ तक कि उनकी सबसे पसंदीदा गायिका गीता दत्त और आशा के साथ भी एक मोड़ पर आकर उन्होंने रिश्ता तोड़ दिया.

उनके दर्द को ही शायद आवाज़ दे रहे हैं मुकेश यहाँ -


स्कूल कॉलेजों में कभी उनका मन नही लगा था. मात्र 8 वर्ष की आयु में उन्हें लाहोर रेडियो में गाने का अवसर मिला. १० वर्ष की उम्र में वो संगीतकार बन गए पंजाबी फ़िल्म “धुलिया भट्टी” से जिसमें सी एच आत्मा का गाया गीत जिसे एच एम् वी ने रीलीस किया था "प्रीतम आन मिलो..." सुपर हिट साबित हुआ, इस फ़िल्म में उन्होंने एक छोटी सी भूमिका भी की. बँटवारे के बाद वो मुंबई आ गए. १९५२ में "आसमान" से शुरू हुआ संगीत सफर १९९३ में आई "जिद्द" फ़िल्म के साथ ख़तम हुआ. इस A टू Z के बीच ७३ फिल्में आई और ओ पी नैयर अपने कभी न भूल सकने वाले, गुनगुने, दिल के तार बरबस छेड़ते गीतों के साथ संगीत प्रेमियों के जेहन में हमेशा के लिए कैद हो गए. "आखों ही आखों में इशारा हो गया..." क्या ये गीत अपने बनने के आज लगभग ५०-५२ सालों के बाद भी उतना ही तारो ताज़ा नही लगता आपको, भाई हमें तो लगता है -



कितनी अजीब बात है कि आल इंडिया रेडियो ने उनके कुछ गीत ब्रोडकास्ट करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था यह कहकर कि इनके बोल और धुन युवा पीढी को पथभ्रमित करने वाले हैं. हँसी आती है आज सोच कर भी (निखिल भाई गौर कीजिये, आप अकले नही हैं). बाद में रेडियो सीलोन पर उनके गीतों को सुनने की बढती चाहत से हार कर ख़ुद मंत्री महोदय को इस अंकुशता को हटाने के लिए आगे आना पड़ा. मात्र ३० साल की उम्र में उन्हें “रिदम किंग” की उपाधि मिल गई थी. उन्होंने संगीतकार के दर्जे को हमेशा ऊँचा माना और एक लाख रुपये पाने वाले पहले संगीत निर्देशक बने. १९५७ में आई "नया दौर" संगीत के आयाम से देखें तो उनके सफर का "मील का पत्थर" थी. शम्मी कपूर के आने के बाद तो ओ पी नैयर के साथ साथ हिन्दी फ़िल्म संगीत भी जैसे फ़िर से जवान हो उठा. मधुबाला ने तो यहाँ तक कह दिया था कि वो अपना पारिश्रमिक उन निर्माताओं के लिए कम कर देंगीं जो ओ पी को संगीतकार लेंगें. मधुबाला की ६ फिल्मों के लिए ओ पी ने संगीत दिया. वो उन दिनों के सबसे मंहगे संगीतकार होने के बावजूद उनकी मांग सबसे अधिक थी. फ़िल्म के शो रील में उनका नाम अभिनेताओं के नाम से पहले आता था. ऐसा पहले किसी और संगीतकार के लिए नही हुआ था, ओ पी ने ट्रेंड शुरू किया जिसे बाद में बहुत से सफल संगीतकारों ने अपनाया.

फ़िल्म १२ o clock का ये गीत सुनिए -"कैसा जादू..." (गौर कीजियेगा इसमें जब गायिका "तौबा तौबा" बोलती है सुनने वालों के दिल में एक अजीब सी कसक उठती है, यही ओ पी का जादू था)


एक साल ऐसा भी आया जब ओ पी की एक भी फ़िल्म नही आई. वर्ष १९६१ को याद कर ओ पी कहते थे -"मोहब्बत में सारा जहाँ लुट गया था..". दरअसल ओ पी अपनी सबसे पसंदीदा पार्श्व गायिका (आशा) के साथ अपने संबंधों की बात कर रहे थे. १९६२ में उन्होंने शानदार वापसी की फ़िल्म 'एक मुसाफिर एक हसीना" से. इसी दशक में उन्होंने "फ़िर वही दिल लाया हूँ"(१९६३), काश्मीर की कली (१९६४, और "मेरे सनम(१९६५) जैसी फिल्मों के संगीत से शीर्ष पर स्थान बरकरार रखा. एक बार वो शर्मीला टैगोर पर फिल्माए अपने किसी गीत पर उनके अभिनय से खुश नही थे, उन्होंने बढ़ कर शर्मीला को सलाह दे डाली कि मेरे गीतों आप बस खड़े रहकर लब नही हिला सकते ये गाने हरकतों के हैं आपको अपने शरीर के हाव भावों का भी इस्तेमाल करना पड़ेगा. शर्मीला ने उनकी इस सलाह को गांठ बाँध ली और अपनी हर फ़िल्म में इस बात का ख़ास ध्यान रखा. ओ पी का सीमित संगीत ज्ञान कभी भी उनके आडे नही आया फ़िल्म "बहारें फ़िर भी आयेंगीं" के गीत "आपके हसीं रुख पे...." के लिए उन्होंने सारंगी का बहुत सुंदर इस्तेमाल किया.

रफी साहब की आवाज़ में पेश है "आपके हसीन रुख पे..."


पर दशक खत्म होते होते अच्छे संगीत के बावजूद उनकी फिल्में फ्लॉप होने लगी. रफी साहब से भी उनके सम्बन्ध बिगड़ चुके थे. गुरु दत्त की मौत के बाद गीता ने ख़ुद को शराब में डुबो दिया था और १९७२ में उनकी भी दुखद मौत हो गई, उधर आशा के साथ ओ पी के सम्बन्ध एक नाज़ुक दौर से गुजर रहा था. ये उनके लिए बेहद मुश्किल समय था. फ़िल्म "प्राण जाए पर वचन न जाए" में आशा ने उनके लिए गाया "चैन से हमको कभी....". अगस्त १९७२ में आखिरकार ओ पी और आशा ने कभी भी साथ न काम करने का फैसला किया और उसके बाद उन्हें कभी भी एक छत के नीचे एक साथ नही देखा गया. १९७३ में जब आशा को अपने इसी गीत के लिए फ़िल्म फेयर मिला तब वो वहां मौजूद नही थी (ऐसा उन्होंने जानकर ही किया होगा). ओ पी ने उनकी तरफ़ से पुरस्कार ले तो लिया, पर घर लौटते वक्त उन्होंने उस ट्रोफी को अपनी कार से बाहर फैंक दिया. कहते हैं उसके टूटने की गूँज आखिरी दम तक उन्हें सुनाई देती रही. जाहिर है, उसके बाद भी उन्होंने काम किया (लगभग १५० गीतों में) अलग अलग गायिकाओं को आजमाया, पर वो जादू अब खो चुका था. कहने को जनवरी २८, २००७ तक ओ पी जीवित रहे पर संगीतकार ओ पी नैयर को तो हम बहुत पहले ही कभी खो चुके थे….

"चैन से हमको कभी ...." (यकीनन ये आशा जी के गाये सर्वश्रेष्ठ गीतों में से एक है..महसूस कीजिये उस दर्द को जो उन्होंने आवाज़ में घोला है)


(जारी...)



मंगलवार, 27 जनवरी 2009

आनंदम काव्यगोष्ठी की रिकॉर्डिंग

सुप्रसिद्ध कहानीकार उदय प्रकाश के कथापाठ की रिकॉर्डिंग उपलब्ध कराने के साथ ही हमने वादा किया था कि साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों की साबूत रिकॉर्डिंग हम आपको सुनवाते रहेंगे। इसके बाद हमने हिन्द-युग्म के कार्यक्रम 'कथापाठ-एक विमर्श' की भी रिकॉर्डिंग उपलब्ध करवाई।

आज सुनिए साहित्यिक संस्था आनंदम द्वारा प्रत्येक माह के दूसरे रविवार को दिल्ली में आयोजित होने वाली काव्यगोष्ठी के जनवरी अंक की रिकॉर्डिंग। ज़रूर बताइएगा कि आपको कैसा लगा?


इस कार्यक्रम के बहुत से हिस्सों की रिकॉर्डिंग ठीक तरह से नहीं हो पाने के कारण उन्हें सम्पादित कर दिया गया है।



वर्ष २००८ के टॉप ५० हिन्दी फिल्मी गीतों की माला



हिन्द-युग्म की आवाज़ टीम ने वर्ष २००८ में रीलिज हुई हिन्दी फिल्मों के श्रेष्ठ ५० गीतों की एक माला बनाई है। इस वार्षिक गीतमाला को बनाने में श्रोताओं की राय भी सम्मलित की गई हैं। गीत चुनते वक़्त इस बात का ध्यान रखा गया है कि ऐसे गीत रखें जायें जिनकी उम्र लम्बी हो। आप भी सुनें और अपने विचार दें॰॰॰







Countdown 50-41Countdown 40-31Countdown 30-21Countdown 20-11Countdown 10-1





Top 50 Bollywood Songs, Top 50 Hindi Film Songs 2008

रुक जा सुबह तक कि न हो ये रात आखिरी...- मन्ना डे की गैर फिल्मी ग़ज़लें

सुनिए मन्ना डे की ६ दुर्लभ गैर फिल्मी ग़ज़लें

मन्ना डे को कामयाबी आसानी से नहीं मिली। वे कहते हैं:"मैं लड़ना जानता हूँ,किसी भी हालात से जूझना सीखा है मैंने। मैंने सारी ज़िन्दगी मेहनत करी है और अब भी कर रहा हूँ। मैंने कभी हार नहीं मानी। संघर्ष में सबसे अच्छी बात होती है कि वो पल जब सब कुछ खत्म होता सा दिखाई पड़ता है उस पल ही कहीं से हिम्मत और आत्मविश्वास सा आ जाता है जो मुझे हारने नहीं देता। शास्त्रीय संगीत में रुचि रखने वाले हों या उससे अनभिज्ञ,सभी को मेरे गाने पसंद आते हैं। मेरी मेहनत, ट्रेंनिंग और अनुशासन की वजह से लोग मुझे विश्व भर में जानते हैं और सम्मान देते हैं।"

मन्ना डे को इस बात से दुख नहीं होता कि बाकी गायकों के मुकाबले उन्हें कम मौके मिले। उन्होंने लगभग सभी बड़े संगीतकारों के साथ काम किया है। वे बताते हैं कि कईं बार संगीतकार उनसे गाना गवाना चाहते थे परन्तु हर बार संगीतकार ही निर्णय नहीं लेते। फिल्मी जगत में अभिनेताओं के पसंदीदा गायक हुआ करते हैं और गायक भी उसी कलाकार से पहचाने जाते रहे हैं। जैसे,रफी हमेशा नौशाद की पसंद रहे और उन्होंने दिलीप कुमार के अधिकतर गाने गाये। उसी तरह से राजकपूर के गाने मुकेश,देव आनंद और राजेश खन्ना के गाने किशोर कुमार गाया करते थे। मन्ना डे की अद्वितीय प्रतिभा बेकार नहीं गई और उन्हें हमेशा तारीफ व सम्मान मिला। संगीतकारों ने फिल्म में स्थिति के अनुरूप मन्ना डे के लिये गाने बनाये।

मशहूर गाने "लागा चुनरी में दाग, छुपाऊँ कैसे" के लिये मन्ना डे कहते हैं कि ये मेरे मित्र रोशन द्वारा दिया गया एक बेहतरीन गाना है। ये दुर्लभ गीतों में से एक है। मैं कहीं भी जाऊँ, देश अथवा विदेश, ये गाना जरूर गाता हूँ। यह एक कठिन गीत है जिसमें शास्त्रीय संगीत का माधुर्य छिपा हुआ है। ये गीत मेरे दिल और आत्मा से जुड़ा हुआ है। मैं पिछले ६० बरस से यह गा रहा हूँ और मैंने जब भी गाया है, पूरी ईमानदारी से गाया है।

जब उनसे पूछा गया कि अब तक का सबसे कठिन गाना कौन सा लगा, जिसमें सबसे ज्यादा मेहनत और रियाज़ करना पड़ा। उनका जवाब था फिल्म काबुलीवाला से गाना : "ऐ मेरे प्यारे वतन, ऐ मेरे बिछड़े चमन"। ये गाना मुझे गले के एक ही हिस्से गाना था ताकि मैं इस गीत के द्वारा लोगों के दिलों तक इस गाने के भाव पहुँचा सकूँ।

सच में मन्ना, आप इसमें सफल हुए।
पद्मभूषण मन्ना डे भारतीय संगीत के महानतम व्यक्तित्व हैं। उनका जो योगदान भारतीय संगीत में रहा है उसे कोई नहीं भुला सकता। उनकी प्रसिद्धि केवल भारत में ही नहीं रही बल्कि विश्व के हर देश व स्थान में पहुँची जहाँ कहीं भी भारतीय रहते हैं या फिर भारतीय संगीत को चाहने वाले रहते हैं। लोग न केवल उनके संगीत का आदर करते हैं अपितु जिस तरह से वे मेलोडी और काव्य का मिश्रण करते हैं उसके सब कायल हैं।

मन्ना डे को पद्मष्री और पद्म भूषण जैसे सम्मानों से नवाज़ा गया है। मन्ना डे को दिये गये अन्य सम्मान हैं:

* १९६९ में हिन्दी फिल्म "मेरे हुज़ूर" में सर्वोत्तम पार्श्व गायन का राष्ट्रीय फिल्म अवार्ड
* १९७१ में बंगाली फिल्म "निशि पद्म" में सर्वोत्तम पार्श्व गायन का राष्ट्रीय फिल्म अवार्ड
* १९७१ में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री अवार्ड
* १९८५ में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा लता मंगेशकर अवार्ड
* १९८८ में रेनेसां सांस्कृतिक परिषद,ढाका द्वारा माइकल साहित्यो पुरस्कार
* १९९० में मिथुन फैन एसोसियेशन द्वारा श्यामल मित्र अवार्ड
* १९९१ में श्री खेत्र कला प्रकाशिका, पुरी द्वारा संगीत स्वर्णाचुर्र अवार्ड
* १९९३ में पी.सी चंद्र ग्रुप की ओर से पी.सी. चंद्र अवार्ड
* १९९९ में कमला देवी ग्रुप की ओर से कमला देवी रॉय अवार्ड
* २००१ में आनंद बाज़ार समूह द्वारा की ओर से आनंदलोक लाइफटाइम अवार्ड
* २००२ में स्वरालय येसुदास अवार्ड
* २००३ में प.बंगाल सरकार द्वारा अलाउद्दीन खान अवार्ड
* २००४ केरल सरकार द्वारा राष्ट्रीय सम्मान
* २००५ महाराष्ट्र सरकार द्वारा लाईफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड
* २००५ भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण

आइये ज़रा देखते हैं गानों की वो फेहरिस्त जिसको पढ़ने के बाद आपको लगने लगेगा कि मन्ना डे जैसा विभिन्न शैलियों में गाने वाला कलाकार कोई नहीं है। अगर बड़े बड़े साथी कलाकार उनका सम्मान करते थे और यहाँ तक कह डाला कि यह शख्स किसी भी अन्य गायक के गाने बड़ी आसानी से गा सकता है तो यह कहना अतिश्योक्ति नहीं थी। यहाँ लिखे गानों में शायद ही कोई गाना होगा जो आपने नहीं सुना होगा। उनके द्वारा संगीतबद्ध और गाये हुए कुछ गाने निम्न प्रकाशित हैं:

उन्होंने कव्वाली (ये इश्क इश्क है, ए मेरी ज़ोहरा जबीन, यारी है ईमान मेरा), रोमांटिक (प्यार हुआ इकरार हुआ, आजा सनम मधुर, दिल की गिरह खोल दो,ये रात भीगी भीगी, सोच के ये गगन झूमे,मुड़-मुड़ के न देख,ओ चाँद मुस्कराया, शाम ढ्ले जमुना किनारे,ज़िन्दगी है खेल), शास्त्रीय संगीत में (पूछो न कैसे, सुर न सजे, लागा चुनरी में दाग, लपक झपक तू,नाचे मयूरा, केतकी गुलाब जूही,भय भंजना बंदना, भोर आई गया अँधियारा), इमोशनल(ज़िन्दगी कैसी है पहेली, कस्में वादे,दूर है किनारा, नदिया चले रे धारा) गाने तो दर्शकों को दिये ही बल्कि उस के साथ लोगों लोगों थिरकने पर मजबूर कर देने वाले गाने जैसे आओ ट्विस्ट करें,ज़िन्दगी है खेल कोई पास कोई फेल,दुनिया रंग बिरंगी,एक चतुर नार और चुनरी सम्भाल गोरी भी गाये।

देशभक्ति के गीतों की बात करें तो ऐ मेरे वतन के लोगों, जाने वाले सिपाही से पूछो, होके मजबूर, हिन्दुस्तान की कसम जैसे मशहूर गाने उनके नाम रहे। अन्य कुछ बेहतरीन गाने थे "तू प्यार का सागर है, मेरे सब कुछ मेरे गीत, तू है मेरा प्रेमदेवता, हे राम वगैरह। मेरा नाम जोकर के गाने "ऐ भाई जरा देख कर चलो" के लिये उन्हें फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला।

मन्ना के बहुत से फिल्मी गीत हम आपको इस लेख के पहले अंक में सुनवा चुके हैं और आगे भी सुनवाते रहेंगे, पर मन्ना डे की गायकी का एक और पहलू भी है जिससे बारे में बहुत कम कहा सुना गया है. मन्ना डे के गैर फिल्मी ग़ज़लें अपनी ख़ास अदायगी के चलते अपना एक विशिष्ट ही स्थान रखती है, हमें यकीं है मन्ना की जो ग़ज़लें आज हम आपको सुन्वायेंगें उन्हें सुनकर आप भी यही कहेंगे, तो आनंद लीजिये आवाज़ और अंदाज़ के इस खूबसूरत संगम का -

दर्द उठा फ़िर हल्के हल्के....


हैरान हूँ ऐ सनम...


मेरी भी एक मुमताज़ थी...


मुझे समझाने मेरे...


ओ रंग रजवा रंग दे ऐसी चुनरिया ...


और अंत में सुनिए-
रुक जा सुबह तक न हो ये रात आखिरी...


प्रस्तुति - तपन शर्मा

सोमवार, 26 जनवरी 2009

२७ गीतों ने पार किया समीक्षा के पहले चरण का विशाल समुन्दर

दोस्तों, दूसरे सत्र में प्रकाशित हमारे २७ गीतों ने आज अपनी समीक्षा के पहले चरण का पड़ाव पार कर लिया है. अर्थात् ५ समीक्षकों में से ३ ने अपने अंक दे दिए हैं. इस पहले चरण के बाद सभी गीतों की जो अब तक की स्थिति है उसका ब्यौरा आज हम यहाँ प्रस्तुत करने जा रहे हैं. समीक्षा का दूसरा और अन्तिम चरण अभी जारी है. जिसके बाद हम उदघोषणा करेंगें हमारे टॉप १० गीतों का और उनमें से एक होगा हमारा सरताज गीत. आज हम दिसम्बर के दिग्गज गीतों की, तीनों समीक्षकों की समीक्षाएं और अन्तिम अंक तालिका यहाँ प्रस्तुत करने जा रहे हैं पर उससे पहले नवम्बर के नम्बरदार गीतों की जो तीसरी समीक्षा छूट गई थी, पहले उस पर एक नज़र डाल लें.

तीसरे समीक्षक ने नवम्बर के नम्बरदार गीतों के बारे में कुछ यूँ राय रखी है -

गीत # १९. उड़ता परिंदा
गीत अच्‍छा लिखा गया है । संगीत बढिया है । पर गायकी कमज़ोर लगी । एक और बात । उच्‍चारण दोष सुधारना गायकों के लिए बहुत ज़रूरी है । दीवार को दिवार और ख़त को खत कहा है । जिससे रस-भंग हो जाता है ।
गीत--४, धुन और संगीत संयोजन-४, गायकी और आवाज़-३, ओवारोल प्रस्तुति-४, कुल - १५/२०=७.५/१०.
पहले चरण के कुल अंक - २१/३०.

गीत # २० - गीत-वो बुतख़ाना ये मयख़ाना

गीत, गायकी और संगीत सभी बढिया । कहीं कहीं गायकी कमज़ोर लगी ।
गीत--५, धुन और संगीत संयोजन-५, गायकी और आवाज़-४, ओवारोल प्रस्तुति-५, कुल - १९ /२०=९.५/१०.
पहले चरण के कुल अंक - २५.५/३०.

गीत # २१, माहिया -
गीत बहुत अधिक प्रभावित नही करता.
गीत--४, धुन और संगीत संयोजन-३, गायकी और आवाज़-३, ओवारोल प्रस्तुति-३, कुल - १३/२०=६.५/१०.
पहले चरण के कुल अंक - १८.५ /३०.

गीत # २२, - तू रूबरू
गीत के बोल बहुत बढिया हैं । धुन मिक्सिंग अच्‍छी लगी । कहीं कहीं उच्‍चारण की दिक्क़त यहां भी दिखी । पर कुल मिलाकर एक प्रभावी गीत । गायक में बहुत संभावनाएं हैं । बेहद युवा और आकर्षक स्‍वर ।
गीत--५, धुन और संगीत संयोजन-४, गायकी और आवाज़-४, ओवारोल प्रस्तुति-४, कुल - १७/२०=८.५/१०.
पहले चरण के कुल अंक - २४/३०.

चलिए अब बढ़ते हैं दिसम्बर के दिग्गज गीतों की तरफ़, टिपण्णी किसी एक समीक्षक की दे रहे हैं पर अंक तीनों के अलग अलग दिए जा रहे हैं-

गीत # २३, वन वर्ल्ड -हमारी एक सभ्यता

वन वर्ल्‍ड बहुत अच्‍छा लिखा और कंपोज़ किया गया है । बस एक ही कसर रह गयी है । कहीं कहीं क्‍लेरिटी/स्‍पष्‍टता का अभाव है । यही वजह है कि अगर इबारत ना देखें तो कई जगहों पर आते । काश कि इस गाने में स्‍पष्‍टता का ख्‍याल रखा गया होता तो ये एक बेहतर जनगीत का दरजा हासिल कर सकता था ।
पहले समीक्षक - १९/२०
दूसरे समीक्षक - १४.५/२०.
तीसरे समीक्षक - १९/२०.
कुल अंक - २६.५/३०.

गीत # २४, चाँद का आँगन

इस बार के गीत बोलों के मामले में बहुत आगे हैं। इस गीत के बोल कविता जैसे हैं। ऐसे बोलों को स्वरबद्ध करना बहुत ही मुश्किल काम है। लेकिन कुमार आदित्य ने जैसा संगीत दिया है, उसमें बेहतर संयोजन का आभाव होने बावज़ूद बार-बार सुनने का मन होता है। पूरे गीत में बेसिक धुन ही बजती रहती है, फिर भी संगीत को बार-बार सुनना कानों को नहीं थकाता। कुमार आदित्य की आवाज़ बहुत रूखी है, फिर भी इस गीत पर फब रही है।
पहले समीक्षक - २०/२०
दूसरे समीक्षक - १५/२०.
तीसरे समीक्षक - १८/२०.
कुल अंक - २६.५/३०.

गीत # २५, जिस्म कमाने निकल गया है

इस ग़ज़ल के शे'र कमाल के हैं। नाज़िम नक़वी की जितनी तारीफ़ की जाय वह कम है। आदित्य विक्रम का संगीत बढ़िया है। राहत देता ह, लेकिन गायक वह जान नहीं डाल पाया है, वह ट्रीटमेंट नहीं दे पाया है, जिसकी आवश्यकता इस ग़ज़ल को थी। इस ग़ज़ल को सुनने में वह आनंद नहीं है, जो इसे पढ़ने में आता है।
पहले समीक्षक - २०/२०
दूसरे समीक्षक - १५.५/२०.
तीसरे समीक्षक - १४/२०.
कुल अंक - २४.५/३०.

गीत # २६, मुझे वक्त दे मेरी जिंदगी

इस गीत का सबसे मज़बूत पक्ष इसका संगीत और उसका संयोजन है, लेकिन उस स्तर की गायकी नहीं है। हालाँकि गायिका ने इस गीत का संगीत भी दिया है, उस हिसाब के संगीत का मूड उन्हीं भली-भाँति पता था, शायद रियाज़ की कमी हो। गीतकार ने सम मात्राओं का ध्यान नहीं दिया है, तभी गायिका को 'कि ना रेत' को 'किनारेत' की तरह गाना पड़ा है।
पहले समीक्षक - १८/२०
दूसरे समीक्षक - १७/२०.
तीसरे समीक्षक - १६/२०.
कुल अंक - २५.५/३०.

गीत # २७, जो शजर

यह ग़ज़ल इस महीने की सबसे उम्दा प्रस्तुति है। दौर सैफ़ी के शे'रो का तो कोई जवाब ही नहीं। दिल को छू देने वाले शे'रों को जब रफीक़ शेख़ की आवाज़ मिली है तो ग़ज़ल मुकम्मल बन पड़ी है। इस पर क्या कहना, बस सुनते रहें...
पहले समीक्षक - १६/२०
दूसरे समीक्षक - १७/२०.
तीसरे समीक्षक - २०/२०.
कुल अंक - २६.५/३०.

तो लीजिये, अब जानिए कि पहले चरण के बाद किस किस पायदान पर हैं हमारे दूसरे सत्र के २७ नगीने गीत-

तेरा दीवाना हूँ - २७/३०.
वन वर्ल्ड -हमारी एक सभ्यता - २६.५/३०
जो शजर - २६.५/३०
चाँद का आंगन - २६.५/३०
मुझे वक्त दे मेरी जिंदगी- २५.५/३०
हुस्न - २५.५/३०
खुशमिजाज़ मिटटी - २५/३०.
जीत के गीत - २४.५/३०.
सच बोलता है - २४.५/३०.
जिस्म कमाने निकल गया है - २४.५/३०
संगीत दिलों का उत्सव है - २४/३०.
आवारा दिल - २४/३०.
ओ साहिबा - २४/३०
ऐसा नही - २४/३०.
तू रूबरू - २४/३०
सूरज चाँद और सितारे - २२.५/३०.
चले जाना - २१.५/३०.
तेरे चहरे पे - २१/३०.
उड़ता परिंदा - २१/३०
डरना झुकना - २०.५/३०.
बेइंतेहा प्यार - २०.५/३०.
बढे चलो - २०/३०.
ओ मुनिया - १९.५/३०.
मैं नदी - १९/३०.
माहिया - १८.५/३०
राहतें सारी - १८/३०.
मेरे सरकार - १६.५/३०.


आज १५ बार सर उठा कर गर्व से सुनें-गुनें - राष्ट्रीय गान

"उस स्वतंत्रता के होने का कोई महत्व नहीं है जिसमें गलतियाँ करने की छूट सम्मिलित ना हो"-महात्मा गाँधी.
आवाज़ के सभी श्रोताओं को गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें. आज हम आपके लिए लाये हैं एक ख़ास पेशकश. "जन गण मन" के १५ अलग अलग रूप. सबसे पहले सुनिए सामूहिक आवाजों में राष्ट्र वंदन -



31 राज्य, 1618 भाषाएँ, 6400 जातियाँ, 6 धर्म और 29 मुख्य त्योहार लेकिन फिर भी एक महान राष्ट्र।

पंडित हरी प्रसाद चौरसिया -


जन गण मन संस्कृत मिश्रित बंगाली में लिखा गया भारत का राष्ट्रीय गीत है। ये ब्रह्म समाज की एक प्रार्थना के पहले पाँच बन्द हैं जिनके रचियता नोबल पुरस्कार से सम्मानित रविन्द्रनाथ टैगोर हैं।

पंडित भीम सेन जोशी -


सबसे पहले इसे 27 दिसम्बर 1911 को नैशनल कांग्रेस के कलकत्ता सम्मेलन में गाया गया। 1935 में इस गीत को दून स्कूल ने अपने विद्यालय के गीत के रूप में अपनाया।

लता मंगेशकर -


24 जनवरी, 1950 को संविधान द्वारा इसे अधिकारिक रूप से भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया गया। ऐसा माना जाता है कि इसकी वर्तमान धुन को राम सिंह ठाकुर जी के एक गीत से लिया गया है लेकिन इस बारे में विवाद हैं। औपचारिक रूप से राष्ट्रीय गीत को गाने में 48-50 सैकेंड का समय लगता है लेकिन कभी-कभी इसे छोटा कर के सिर्फ इसकी प्रथम और अंतिम पंक्तियों को ही गाया जाता है जिसमें लगभग 20 सैकेंड का समय लगता है ।

उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान, गुलाम मुर्तजा खान और गुलाम कादिर -


भारत ने अपने इतिहास के पिछले 1000 वर्षों में कभी किसी देश पर आक्रमण नहीं किया।
भारत ने संख्याओं का आविष्कार किया। आर्यभट ने 'शून्य' का आविष्कार किया।

भूपेन हजारिका और सादिक खान -


संसार का पहला विश्वविद्यालय 700 ई.पूर्व तक्षशिला में बना था। जहाँ संपूर्ण विश्व से आए हुए 10,500 से ज़्यादा विद्यार्थी 60से ज़्यादा विषयों की शिक्षा ग्रहण करते थे। ई.पूर्व चौथी शताब्दी में बना नालंदा विश्विद्यालय शिक्षा के क्षेत्र में प्राचीन भारत की महान उपलब्धियों में से एक था।
फोर्ब्स पत्रिका के अनुसार कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर के लिए भारत की एक हज़ार साल पुरानी संस्कृत भाषा सबसे उपयुक्त है। आर्युवेद ही चिकित्सा के क्षेत्र में सबसे पुरानी ज्ञात प्रणाली है।

पंडित जसराज -


कभी भारत की गिनती पृथ्वी के सबसे सपन्न साम्राज्यों में होती थी। पश्चिमी संचार माध्यम आधुनिक भारत को वहाँ फैले राजनीतिक भ्रष्टाचार की वजह से गरीबी से जकड़े हुए पिछड़े देश के रूप में दर्शाते हैं।
यंत्र द्वारा दिशा खोजने की कला का जन्म 5000 वर्ष पूर्व सिंधु नदी के क्षेत्र में हुआ था। असल में 'नेवीगेशन' शब्द संस्कृत के 'नवगति' शब्द से उत्पन्न हुआ है। π के मूल्य की गणना सबसे पहले बौधायन द्वारा की गई थी और उन्होंने ही 'प्रमेय' की अवधारणा को समझाया था। ब्रिटिश विद्वानों ने 1999 में अधिकारिक रूप से प्रकाशित किया कि बौधायन के कार्य यूरोपीय गणितज्ञों के उद्भव से बहुत पहले यानी कि छठीं शताब्दी के हैं।

एस पी बाला सुब्रमण्यम -


'बीजगणित' (Algebra),'त्रिकोणमिति'(Trignometry) और 'कैलकुलस' (Calculus) भारत से ही आए थे, 11वीं शताब्दी में श्रीधराचार्य द्वारा 'द्विघात समीकरण' (Quadratic equations ) का निर्माण किया गया। ग्रीक और रोमन के 106 अंकों के मुकाबले भारतीय 1053 अंकों का प्रयोग करते थे।
अमेरिका के Gemological संस्थान के अनुसार 1896तक सिर्फ भारत ही संपूर्ण विश्व के लिए 'हीरों' का एकमात्र स्रोत था। अमेरिका आधारित IEEE ने शिक्षाविदों में एक सदी से फैले संदेह को दूर करते हुए साबित किया है कि बेतार संचार के अग्रणी मारकोनी नहीं बल्कि प्रोफेसर जगदीश चंद्र बोस थे।

जगजीत सिंह -


सिंचाई के लिए जलाशय और बाँध का निर्माण सबसे पहले सौराष्ट्र में हुआ था। शतरंज का आविष्कार भारत में हुआ था। शुश्रुत को शल्य चिकित्सा के पितामह के रूप में जाना जाता है। 2600 वर्ष पहले उनके तथा समकालीन चिकित्सा विज्ञानियों द्वारा Rhinoplasty, सिज़ेरियन वर्ग, मोतियाबिन्द, टूटी हड्डियों और पेशाब की पत्थरियों से सबंधित शल्य क्रियाएँ की गईं। मूर्छित कर इलाज करने की कला का प्राचीन भारत में बखूबी प्रयोग किया जाता था।
जब दुनिया की कई संस्कृतियाँ सिर्फ घुमंतू जीवन व्यतीत करती थी, तब 5000 साल पहले भारतीयों ने सिंधु घाटी (सिंधु घाटी सभ्यता) में हड़प्पा संस्कृति की स्थापना की। मूल्य प्रणाली (Place Value System) तथा दशमलव प्रणाली (Decimal System) को 100 ई.पूर्व भारत में विकसित किया गया था।

बेगम परवीन सुल्ताना -


अल्बर्ट आइंस्टीन- "हम भारतीयों के बहुत ज़्यादा ऋणी हैं कि उन्होंने हमें गिनना सिखाया, जिसके बिना कोई भी लाभप्रद वैज्ञानिक खोज मुमकिन नहीं हो पाती।"

डा. बाला मुरलीकृष्णा -


मार्क ट्वाईन- "मानव जाति का उद्भव भी भारत में हुआ, वाक् कला भी सबसे पहले यहीं पनपी, इतिहास का निर्माण भी यहीं से हुआ, दंतकथाएँ भी यहीं से जन्मी और महान परंपराएँ भी यहीं से प्रारंभ हुई।"

उस्ताद अमजद अली खान, अमन अली बंगेश और अयान अली बंगेश-


रोमेन रोलॉन्ड (एक फ्रांसीसी विद्वान)- अगर पृथ्वी के चेहरे पर कोई ऐसा स्थान मौजूद है जहाँ पर जीवित इनसानों के सभी सपनों (जब से उसने उन्हें देखना आरम्भ किया हैं) को उनका घर मिलता है तो वो इकलौती जगह भारत है।

हरिहरन -


हू शिह (अमेरिका में पूर्व चीनी राजदूत)- बिना एक भी सैनिक को सीमा पार भेजे भारत ने 20 शताब्दियों तक सांस्कृतिक तौर पर चीन पर अपना प्रभुत्व तथा कब्ज़ा जमाए रखा।

उस्ताद सुलतान खान -


फ्रेंकलिन पी. एडम्स- भारत की एक परिभाषा 'गणतंत्र' भी है।

पंडित शिव कुमार शर्मा और राहुल शर्मा -


सच्चा गणतंत्र- पुरुषों को उनके अधिकारों से अधिक और कुछ नहीं चाहिए, महिलाओं को उनके अधिकारों से कम कुछ भी नहीं चाहिए।

सभी वाद्यों का सामूहिक उद्घोष -


जय है...जय है...जय है....जय हिंद
.

अनुवाद द्वारा- राजीव तनेजा

रविवार, 25 जनवरी 2009

पॉडकास्ट कवि सम्मेलन - जनवरी २००९

पॉडकास्टिंग की मदद से बना एक ऑनलाइन कवि सम्मेलन


Doctor Mridul Kirti - image courtesy: www.mridulkirti.com
डॉक्टर मृदुल कीर्ति
कविता प्रेमी श्रोताओं के लिए प्रत्येक मास के अन्तिम रविवार का अर्थ है पॉडकास्ट कवि सम्मेलन। आवाज़ के तत्त्वावधान में इस बार हम लेकर आए हैं सातवाँ ऑनलाइन कवि सम्मेलन। आवाज़ के सभी श्रोताओं और पाठकों को नव वर्ष की शुभ-कामनाओं के साथ प्रस्तुत है २००९ का पहला पॉडकास्ट कवि सम्मलेन। इस बार भी इस ऑनलाइन आयोजन का संयोजन किया है हैरिसबर्ग, अमेरिका से डॉक्टर मृदुल कीर्ति ने।

आवाज़ की ओर से हर महीने प्रस्तुत किए जा रहे इस प्रयास में गहरी दिलचस्पी, सहयोग और आपके प्रेम के लिए हम आपके आभारी हैं। हमें अत्यधिक संख्या में कवितायें प्राप्त हुईं और हमें आशा है कि आप अपना सहयोग इसी प्रकार बनाए रखेंगे। इस बार भी हम बहुत सी कविताओं को उनकी उत्कृष्टता के बावजूद इस माह के कार्यक्रम में शामिल नहीं कर सके हैं और इसके लिए क्षमाप्रार्थी है। कुछ कवितायें अपनी श्रेष्ठता के बावजूद ख़राब रिकार्डिंग के कारण शामिल न हो सकीं। उनके छूट जाने से हमें भी दुःख हुआ है इसलिए हम एक बार फ़िर आपसे अनुरोध करेंगे कि कवितायें भेजते समय कृपया समय-सीमा का ध्यान रखें और यह भी ध्यान रखें कि वे १२८ kbps स्टीरेओ mp3 फॉर्मेट में हों और पृष्ठभूमि में कोई संगीत न हो। ऑडियो फाइल के साथ अपना पूरा नाम, नगर और संक्षिप्त परिचय भी भेजना न भूलें क्योंकि हमारे कार्यक्रम के श्रोता अच्छे कवियों के बारे में जानने को उत्सुक रहते हैं।

प्रबुद्ध श्रोताओं की मांग पर सितम्बर २००८ के सम्मेलन से हमने एक नया खंड शुरू किया है जिसमें हम हिन्दी साहित्य के मूर्धन्य कवियों का संक्षिप्त परिचय और उनकी एक रचना को आप तक लाने का प्रयास करते हैं। जनवरी मास में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जन्म दिन और राष्ट्र के गणतंत्र दिवस के अवसर पर इसी प्रयास के अंतर्गत इस बार हम सुना रहे हैं एक ऐसे कवि को जिन्हें कई मायनों में हिन्दी की खड़ी बोली के अग्रगण्य कवियों में गिना जाता है। जी हाँ, इस बार आपके सामने हैं तेजस्वी राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त। इनकी रचनाएं हिन्दी-भाषियों में समस्त विश्व में पढी और गाई जाती हैं। उनकी सुमधुर रचनाओं का आनंद उठाईये।

पिछले सम्मेलनों की सफलता के बाद हमने आपकी बढ़ी हुई अपेक्षाओं को ध्यान में रखा है। हमें आशा ही नहीं वरन पूर्ण विश्वास है कि इस बार का सम्मलेन आपकी अपेक्षाओं पर खरा उतरेगा और आपका सहयोग हमें इसी जोरशोर से मिलता रहेगा। यदि आप हमारे आने वाले पॉडकास्ट कवि सम्मलेन में भाग लेना चाहते हैं तो अपनी आवाज़ में अपनी कविता/कविताएँ रिकॉर्ड करके podcast.hindyugm@gmail.com पर भेजें। कवितायें भेजते समय कृपया ध्यान रखें कि वे १२८ kbps स्टीरेओ mp3 फॉर्मेट में हों और पृष्ठभूमि में कोई संगीत न हो। आपकी ऑनलाइन न रहने की स्थिति में भी हम आपकी आवाज़ का समुचित इस्तेमाल करने की कोशिश करेंगे। पॉडकास्ट कवि सम्मेलन के अगले अंक का प्रसारण २२ फरवरी २००९ को किया जायेगा और इसमें भाग लेने के लिए रिकॉर्डिंग भेजने की अन्तिम तिथि है १५ फरवरी २००९

नीचे के प्लेयर से सुनें:


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें (ऑडियो फ़ाइल तीन अलग-अलग फ़ॉरमेट में है, अपनी सुविधानुसार कोई एक फ़ॉरमेट चुनें)
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हम सभी कवियों से यह अनुरोध करते हैं कि अपनी आवाज़ में अपनी कविता/कविताएँ रिकॉर्ड करके podcast.hindyugm@gmail.com पर भेजें। आपकी ऑनलाइन न रहने की स्थिति में भी हम आपकी आवाज़ का समुचित इस्तेमाल करने की कोशिश करेंगे।

रिकॉर्डिंग करना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है। हिन्द-युग्म के नियंत्रक शैलेश भारतवासी ने इसी बावत एक पोस्ट लिखी है, उसकी मदद से आप सहज ही रिकॉर्डिंग कर सकेंगे।

अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।

# Podcast Kavi Sammelan. Part 7. Month: January 2009.
कॉपीराइट सूचना: हिंद-युग्म और उसके सभी सह-संस्थानों पर प्रकाशित और प्रसारित रचनाओं, सामग्रियों पर रचनाकार और हिन्द-युग्म का सर्वाधिकार सुरक्षित है.

शनिवार, 24 जनवरी 2009

सुनो कहानी: प्रेमचंद की 'गुल्ली डंडा'

उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी 'गुल्ली डंडा'

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने शन्नो अग्रवाल की आवाज़ में प्रेमचंद की रचना ''दुर्गा का मन्दिर'' का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं प्रेमचंद की अमर कहानी "दुर्गा का मन्दिर", जिसको स्वर दिया है लन्दन निवासी कवयित्री शन्नो अग्रवाल ने। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। कहानी का कुल प्रसारण समय है: 20 मिनट और 30 सेकंड।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ...मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूं
~ मुंशी प्रेमचंद (१८३१-१९३६)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनिए प्रेमचंद की एक नयी कहानी

पिताजी चौके पर बैठे वेग से रोटियों पर अपना क्रोध उतार रहे हैं, अम्माँ की दौड़ केवल द्वार तक है, लेकिन उनकी विचार-धारा में मेरा अंधकारमय भविष्य टूटी हुई नौका की तरह डगमगा रहा है; और मैं हूँ कि पदाने में मस्त हूँ, न नहाने की सुधि है, न खाने की।
(प्रेमचंद की "गुल्ली डंडा" से एक अंश)


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रविवार २५ जनवरी २००९ का आकर्षण - पॉडकास्ट कवि सम्मेलन
शनिवार ३१ जनवरी २००९ - मुंशी प्रेमचंद की एक नयी कहानी



#Twenty Third Story, Gulli Danda: Munsi Premchand/Hindi Audio Book/2009/03. Voice: Shanno Aggarwal

शुक्रवार, 23 जनवरी 2009

यादें जी उठी....मन्ना डे के संग


"दिल का हाल सुने दिलवाला..." की मस्ती हो, या "एक चतुर नार..." में किशोर से नटखट अंदाज़ में मुकाबला करती आवाज़ हो, "ऐ भाई ज़रा देख के चलो.." के अट्टहास में छुपी संजीदगी हो, या "पूछो न कैसे मैंने रैन बितायी...", "लागा चुनरी में दाग...", "केतकी गुलाब जूही..." और "आयो कहाँ से घनश्याम..." जैसे राग आधारित गीतों को लोकप्रिय अंदाज़ में प्रस्तुत करना हो, एक मुक्कमल गायक है जो हमेशा एक "परफेक्ट रेंडरिंग" देता है. जी हाँ आपने सही अंदाजा लगाया. हम बात कर रहे हैं, एक और एकलौते मन्ना डे की.


मन्ना डे का जन्म १ मई १९१९ को पूर्णचंद्र और महामाया डे के यहाँ हुआ। अपने माता-पिता के अलावा वे अपने चाचा संगीताचार्य के.सी. डे से बहुत अधिक प्रभावित थे और वे ही उनके प्रेरणास्रोत भी थे। मन्ना ने अपने छुटपन की पढ़ाई एक छोटे से स्कूल "इंदु बाबुर पाठशाला" से हुई। स्कॉटिश चर्च कालिजियेट स्कूल व स्कॉटिश चर्च कॉलेज से पढ़ाई करने के बाद उन्होंने विद्यासागर कॉलेज से स्नातक की शिक्षा पूरी की। अपने बचपन से ही मन्ना को कुश्ती और मुक्केबाजी का शौक रहा और उन्होंने इन दोनों खेलों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। उनका काफी हँसमुख छवि वाला व्यक्तित्व रहा है और अपने दोस्तों व साथियों से के साथ मजाक करते रहते हैं।

अपने स्कॉटिश चर्च कॉलेज के दिनों में उनकी गायकी की प्रतिभा लोगों के सामने आया। तब वे अपने साथ के विद्यार्थियों को गा कर सुनाया करते थे और उनका मनोरंजन किया करते थे। वे अपने अंकल कृष्ण चंद्र डे और उस्ताद दाबिर खान से गायन की शिक्षा लिया करते थे। यही वो समय था जब उन्होंने तीन साल तक लगातार अंतर-महाविद्यालय गायन-प्रतियोगिताओं में प्रथम स्थान पाया।

१९४२ में मन्ना डे, कृष्णचंद्र के साथ मुंबई आये। वहाँ उन्होंने एक सहायक के तौर अपना काम सम्भला। पहले वे के.सी डे के साथ थे फिर बाद में सचिन देव बर्मन के सहायक बने। बाद में उन्होंने और भी कईं संगीत निर्देशकों के साथ काम किया और फिर अकेले ही संगीत निर्देशन करने लगे। कईं फिल्मों में संगीत निर्देशन का काम अकेले करते हुए भी मन्ना डे ने उस्ताद अमान अली और उस्ताद अब्दुल रहमान खान से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लेना जारी रखा।

मन्ना डे ने १९४३ की "तमन्ना" से पार्श्व गायन के क्षेत्र में कदम रखा। संगीत का निर्देशन किया था कॄष्णचंद्र डे ने और मन्ना के साथ थीं सुरैया। १९५० की "मशाल" में उन्होंने एकल गीत "ऊपर गगन विशाल" गाया जिसको संगीत की मधुर धुनों से सजाया था सचिन देव बर्मन ने।१९५२ में मन्ना डे ने बंगाली और मराठी फिल्म में गाना गाया। ये दोनों फिल्म एक ही नाम "अमर भूपाली" और एक ही कहानी पर आधारित थीं। इसके बाद उन्होंने पार्श्वगायन में अपने पैर जमा लिये।

सुनिए -

"उपर गगन विशाल...."


तू प्यार का सागर है...


ऐ भाई ज़रा देख के चलो...


ज़िन्दगी कैसी है पहेली ...


आयो कहाँ से घनश्याम...


मन्ना डे ने महान शास्त्रीय संगीतकार भीमसेन जोशी के साथ मशहूर गाना,"केतकी गुलाब जूही..." गाया। किशोर कुमार के साथ भी अलग अलग शैली के कईं गीत गाये। जिनमें शामिल हैं "ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे (शोले)" व "एक चतुर नार (पड़ोसन)"। मन्ना डे ने गायक/संगीतकार हेमंत कुमार के साथ बंगाली फिल्मों में कईं गाने एक साथ गाये। फिल्म "संख्यबेला" में उन्होंने लता मंगेशकर के साथ मशहूर गीत "के प्रोथोम कच्चे एसेची" गाया। इसमें कोई दो राय नहीं होनी चाहिये अगर हम ये कहें कि मन्ना डे ने ही भारतीय संगीत में एक नई शैली की शुरुआत की जिसमें भारतीय शास्त्रीय संगीत का पॉप संगीत के साथ मिश्रण किया गया। मन्ना की बहुमुखी प्रतिभा रवींद्र संगीत तक फैली।

उनके पाश्चात्य संगीत के साथ किये गये प्रयोगों से कईं न भूलने वाले गीत तैयार हुए हैं। उन्होंने ३५०० से अधिक गाने रिकार्ड किये हैं। १८ दिसम्बर १९५३ को मन्ना डे ने केरल की सुलोचना कुमारन से विवाह किया। इनकी दो बेटियाँ हुईं। शुरोमा का जन्म १९ अक्टूबर १९५६ और सुमिता का २० जून १९५८ को हुआ।

मुम्बई में ५० साल रहने के बाद मन्ना डे आज बंग्लुरु के कल्याणनगर में रहते हैं। आज भी उनका कोलकाता में घर है और वे आज भी विश्व भर में संगीत के कार्यक्रम करते रहते हैं।

वर्ष २००५ में आनंदा प्रकाशन ने बंगाली उनकी आत्मकथा "जिबोनेर जलासोघोरे" प्रकाशित की। उनकी आत्मकथा को अंग्रेज़ी में पैंगुइन बुक्स ने "Memories Alive" के नाम से छापा तो हिन्दी में इसी प्रकाशन की ओर से "यादें जी उठी" के नाम से प्रकाशित की। मराठी संस्करण "जिबोनेर जलासाघोरे" साहित्य प्रसार केंद्र, पुणे द्वारा प्रकाशित किया गया।

मन्ना डे के जीवन पर आधारित "जिबोनेरे जलासोघोरे" नामक एक अंग्रेज़ी वृतचित्र ३० अप्रैल २००८ को नंदन, कोलकाता में रिलीज़ हुआ। इसका निर्माण "मन्ना डे संगीत अकादमी द्वारा" किया गया। इसका निर्देशन किया डा. सारूपा सान्याल और विपणन का काम सम्भाला सा रे ग म (एच.एम.वी) ने।

रफी साहब ने एक बार प्रेस को कहा था: "आप लोग मेरे गाने सुनते हैं, मैं मन्ना डे के गाने सुनता हूँ"। सचिन देव बर्मन और अनिल बिस्वास जैसे संगीतकारों ने कहा था कि मन्ना डे किसी के भी गाये हुए गाने सरलता से गा सकते हैं। फिर चाहें मोहमम्मद रफी हों, किशोर कुमार, मुकेश या फिर तलत महमूद।

उनके बारे में अधिक जानकारी अगले अंक में--- फिलहाल सुनिये और देखिये उनका यह रोमांटिक गीत फिल्म रात और दिन से।
दिल की गिरह खोल दो.....


(जारी...)

प्रस्तुति - तपन शर्मा "चिन्तक"

गुरुवार, 22 जनवरी 2009

किशोर दा के संगीत का आखिरी दशक और १० सदाबहार प्रेम गीतों का गुलदस्ता

साथियो,
किशोर कुमार के जीवन के आख़िरी दशक (१९८०-१९८७)की कुछ झलकियों के साथ इस बार का किशोर नामा प्रस्तुत है |
उस दशक में किशोर कुमार गायकों में एक अनुभवी और सबसे मशहूर नाम था| लगभग हर गीतकार और संगीतकार के साथ उन्होंने काम किया| उनकी इस विभिन्नता (diversity)के कुछ नमूने -

१९८० - गीत - ओम शान्ति ओम - फ़िल्म - क़र्ज़, संगीत - लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, गीतकार - आनंद बख्शी
१९८२ - गीत - पग घुँघरू बाँध - फ़िल्म - नमक हलाल, संगीत - बप्पी लाहिरी, गीतकार - अनजान
१९८३ - गीत - हमें और जीने की अगर तुम न होते, संगीत - राहुल देव बर्मन, गीतकार - गुलशन बावरा
१९८५ - गीत - सागर किनारे सागर, संगीत - राहुल देव बर्मन, गीतकार - जावेद अख्तर

अभिनेता के रूप में जिन मुख्य फिल्मों में काम किया वे कुछ ऐसे हैं -
चलती का नाम ज़िंदगी(१९८१)
दूर वादियों में कहीं (१९८२)
अपमान (१९८२)
सुन सजना (१९८२)
कौन जीता कौन हारा (१९८७)

संगीतकार के रूप में इन फिल्मों में छाप छोड़ी -
चलती का नाम ज़िंदगी (१९८१)
ममता की छाँव में (१९९०)

हरफनमौला की आख़िरी कोशिश-

१९९० में आयी फ़िल्म -"ममता की छाँव में" दादा की आख़िरी कोशिश साबित हुयी |यह फ़िल्म इस बात को मजबूत करती है कि एक कामियाब कलाकार हमेशा अपने हुनर को जिंदा और जवां रखता है | हरफनमौला किशोर ने इस फ़िल्म में निर्देशन किया,गीत लिखा और गाया भी | उनके रहते यह फ़िल्म पूरी नहीं हो पायी और बाद में उनके बेटे अमित कुमार ने बड़े मेहनत से इसे पूरा किया और इसे यादगार बनाया |इस फ़िल्म में लीना जी और अमित कुमार ने अभिनय भी किया था | दादा के चहिते राजेश खन्ना ने भी इसमे अपनी दादा के साथ अन्तिम छाप छोड़ी |

किशोर की आख़री सौगात-

८० के दशक में किशोर कुमार और संगीतकार बप्पी लहरी की जोड़ी अपने जड़ें ज़मा रही थीं | अफ़सोस, यह सफ़र लंबे समय का नही था | अक्टूबर १२,१९८७ के दिन किशोर ने बप्पी का एक गीत गाया |यह गीत फ़िल्म "वक्त की आवाज़" के लिए आशा भोसले के साथ एक युगल गीत था | गीत था "ये गुरु आ जाओ" |बप्पी लहरी जो दादा को अपना गुरु भी मानते थे, गुरु के लिए आख़िरी गीत दे रहे थे | १३ अक्टूबर १९८७ के दिन, किशोर कुमार एक बड़े ह्रदय अपघात(Heart Attack)से हमेशा के लिए चल दिए | उस समय उनकी उम्र ५८ की थी |अपने अन्तिम दिनों में दादा का मन शहरी जीवन से भर गया सा जान पड़ता था |शहरों के बनावटीपन से दूर रहने वाले किशोर अपने घर "खंडवा" लौटना चाह रहे थे |
उनका मन था कि वे अपनी आवाज़ में अपने रोल मॉडल "कुंदन लाल सहगल" के गीतों की रिकॉर्डिंग कर पेश करें | लेकिन यह सब अधूरा रह गया |

पुरस्कार और सम्मान-

किशोर कुमार को ८० के दशक में इन फिल्मों के लिए फ़िल्म फेअर पुरस्कार मिला |
१. १९८२ - गीत - "पग घुंगरू बाँध", फ़िल्म - नमक हलाल
२. १९८३ - गीत - "हमें और जीने की", फ़िल्म - अगर तुम ना होते
३. १९८4 - गीत - "मंजिले अपनी जगह है", फ़िल्म - शराबी
४. १९८५ - गीत - "सागर किनारे", फ़िल्म - सागर |

इसके अलावा 15 से अधिक बरस उनके नाम पुरस्कार के लिए आते रहें |
यह बात उस वक्त की है जब हिन्दी फ़िल्म जगत काफी जवां हो गया था और कई गायक,कलाकार पैर जमा चुके थे,फ़िर भी दादा अपने आप में एक मिसाल बने रहे |

भारत सरकार ने किशोर कुमार के नाम से डाक टिकट जारी करके उन्हें सम्मान दिया है |

आज भी अमित कुमार स्टेज शो और साक्षात्कार के ज़रिये अपने पिता की बातों को लोगों से बाँटते रहते हैं |
किशोर कुमार के दीवानों की कमी नही हैं,उनके नाम पर आज भी क्लब चलते हैं, संगीत प्रतियोगिता होती रहती है | कलाकारों का एक हुजूम उन्हें अपना प्रेरक मान कर याद करता रहता है |
कुमार सानु, अभिजित और बाबुल सुप्रियो जैसे हिन्दी फिल्मों के पार्श्व गायक दादा के गीतों से सीख ले आगे बढ़ते रहें हैं | किशोर के दुसरे बेटे "सुमित कुमार" ने भी गायकी में कदम बढ़ा दिया है |
इस तरह से किशोर कुमार आज भी हमारे बीच किसी ना किसी सूरत में गाता रहता है, आता रहता है |


कभी गीत -संगीत में सुनायी देता है,
कभी ऐक्टर - डेरक्टर बन दिखाई देता है,
कहीं नहीं गया किशोर कुमार अपना ,
वो तो हमारे दिलों में यहीं - कहीं रहता है
|

सुनते हैं किशोर दा के ये दस रोमांटिक गीत -
१. सागर जैसी आँखों वाली...
२. रात कली एक ख्वाब में आई...
३. तेरे चेहरे में...
४. सिमटी सी शरमाई सी...
५. ये नैना ये काजल...
६. पल भर के लिए...
७ हमें तुमसे प्यार कितना...
८. पल पल दिल के पास...
९. छूकर मेरे मन को...
१०.प्यार दीवाना होता है...



-- अवनीश तिवारी


बुधवार, 21 जनवरी 2009

सुनिए और बूझिये कि आखिर कौन है दिल्ली ६ की ये मसकली

सप्ताह की संगीत सुर्खियाँ (9) स्लमडॉग विशेषांक

स्लम डॉग ने रचा इतिहास
इस सप्ताह की ही नही इस माह की सबसे बड़ी संगीत ख़बर है ऐ आर रहमान का गोल्डन ग्लोब जीतना. आज का ये एपिसोड हम इसी बड़ी ख़बर को समर्पित कर रहे हैं. जिस फ़िल्म के लिए ऐ आर को ये सम्मान मिला है उसका नाम है स्लम डॉग मिलेनिअर. मुंबई के एक झोंपड़ बस्ती में रहने वाले एक साधारण से लड़के की असाधारण सी कहानी है ये फ़िल्म, जो की आधारित है विकास स्वरुप के बहुचर्चित उपन्यास "कोश्चन एंड आंसर्स" पर. फ़िल्म का अधिकतर हिस्सा मुंबई के जुहू और वर्सोवा की झुग्गी बस्तियों में शूट हुआ है. और कुछ कलाकार भी यहीं से लिए गए हैं. नवम्बर २००८ में अमेरिका में प्रर्दशित होने के बाद फ़िल्म अब तक ६४ सम्मान हासिल कर चुकी है जिसमें चार गोल्डन ग्लोब भी शामिल हैं. फ़िल्म दुनिया भर में धूम मचा रही है,और मुंबई के माध्यम से बदलते हिंदुस्तान को और अधिक जानने समझने की विदेशियों की ललक भी अपने चरम पर दिख रही है. पर कुछ लोग हिंदुस्तान को इस तरह "थर्ड वर्ल्ड" बनाकर दुनिया के सामने प्रस्तुत करने को सही भी नही मानते. अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि फ़िल्म इसलिए पसंद की जा रही है क्योंकि विकसित देश भारत का यही रूप देखना चाहते हैं. पर लेखक विकास स्वरुप ऐसा नही मानते. उनका कहना है कि फ़िल्म में स्लम में रहने वालों को दुखी या निराश नही दिखाया गया बल्कि उन्हें ख़ुद को बेहतर बनाने और अपने सपनों को सच करने की कोशिश करते हुए दिखाया गया है, यही उभरते हुए भारत की सच्चाई है. फ़िल्म में एक दृश्य है जहाँ नायक का बड़ा भाई उसे वो इलाका दिखाता हुए कहता है जहाँ कभी उनकी झुग्गी बस्ती हुआ करती थी और जहाँ अब गगनचुम्भी इमारतें खड़ी है,कि -"भाई आज इंडिया दुनिया के मध्य में है और मैं (यानी कि एक आम भारतीय) उस मध्य के मध्य में..." यकीनन ये संवाद अपने आप में बहुत कुछ कह जाता है. बहरहाल हम समझते हैं कि ये वक्त बहस का नही जश्न का है. जब "जय हो" और "रिंगा रिंगा" जैसे गीत अंतर्राष्ट्रीय चार्ट्स पर धूम मचा रहे हों, तो शिकायत किसे हो. अमूमन देखने में आता है कि गोल्डन ग्लोब जीतने वाली फिल्में ऑस्कर में भी अच्छा करती हैं, तो यदि अब हम आपके लिए रहमान के ऑस्कर जीतने की ख़बर भी लेकर आयें तो आश्चर्य मत कीजियेगा



जिक्र उनका जो गुमनाम ही रहे

बात करते हैं इस फ़िल्म से जुड़े कुछ अनजाने हीरोस की. रहमान ने अपने इस सम्मान को जिस शख्स को समर्पित किया है वो हैं उनके साउंड इंजिनीअर श्रीधर. ४ बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित श्रीधर, रहमान के साथ काम कर रहे थे उनकी पहली फ़िल्म "रोजा" से, जब स्लम डॉग बन कर तैयार हुई श्रीधर ने रहमान का धन्येवाद किया कि उन्होंने उनका नाम एक अंतर्राष्ट्रीय एल्बम में दर्ज किया, दिसम्बर २००८ में श्रीधर मात्र ४८ वर्ष की आयु में दुनिया को अलविदा कह गए और उस अद्भुत लम्हें को देखने से वंचित रह गए जब रहमान ने गोल्डन ग्लोब जीता. पर रहमान ने अपने इस साथी के नाम इस सम्मान को कर इस अनजाने हीरो को अपनी श्रद्धाजन्ली दी. इसी तरह के एक और गुमनाम हीरो है मुंबई के राज. जब निर्देशक डैनी बोयल से पूछा गया कि यदि उन्हें २ करोड़ रूपया मिल जायें तो वो क्या करेंगे, तो उनका जवाब था कि वो अपने पहले सह निर्देशक (फ़िल्म के)जो कि राज हैं को दे देंगें, दरअसल राज पिछले कई सालों से मुंबई के गरीब और अनाथ बच्चों के लिए सड़कों पर ही चलते फिरते स्कूल चलाते हैं और उनकी निस्वार्थ सेवा भाव ने ही डैनी को इस फ़िल्म के लिए प्रेरित किया, चूँकि उनका इन बच्चों के संग उठाना बैठना रहता है फ़िल्म के बेहतर बनाने में उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है. राज जैसे लोग आज के इस नए हिंदुस्तान की ताक़त है. जिनका जज्बा आज दुनिया देख रही है.


तन्वी शाह की खुशी का कोई ठिकाना नही

स्लम डॉग के लिए "जय हो" गीत गाने वाली चेन्नई की तन्वी शाह आजकल हवाओं से बात कर रही है. मात्र एक गाने ने उन्हें अन्तराष्ट्रीय स्टार बना दिया है. उनके फ़ोन की घंटी निरंतर बज रही है, और इस युवा गायिका के कदम जमीं पर नही पड़ रहे हैं...क्यों न हो. आखिर जय हो ने वो कर दिखाया है जिसका सपना हर संगीतकर्मी देखता है. तन्वी ने कभी अपनी आवाज़ कराउके रिकॉर्डिंग कर अपने एक दोस्त को दी थी, जिसकी सी डी किसी तरह रहमान तक पहुँच गई. और वो इस तरह "होने दो दिल को फ़ना..."(फ़िल्म-फ़ना) की गायिका बन गई. स्लम डॉग से पहले उन्होंने अपनी आवाज़ का जादू "जाने तू...", "गुरु" और "शिवाजी" जैसी फिल्मों के लिए भी ऐ आर के साथ गा चुकी है....पर कुछ भी कहें "जय हो" को बात ही अलग है.


मिलिए दिल्ली ६ की इस मसकली से

देसी पुरस्कारों में भी रहमान की ही धूम है हाल ही में संपन्न स्क्रीन अवार्ड में रहमान को जोधा अकबर के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीतकार चुना गया. वहीँ फ़िल्म "बचना ऐ हसीनों" के गीत "खुदा जाने..." के लिए इस गीत के गायक (के के), गायिका (शिल्पा राव) और गीतकार अन्विता दास गुप्तन को भी पुरस्कृत किया गया है. इस सप्ताह से हम आपको साप्ताहिक सुर्खियों के साथ साथ एक चुना हुआ सप्ताह का गीत भी सुनवायेंगे. इस सप्ताह का गीत है आजकल सब की जुबां पर चढा हुआ फ़िल्म दिल्ली ६ का - "मसकली....". क्या आप जानते हैं कि कौन है ये "मसकली", मसकली नाम है दिल्ली ६ के एक कबूतर का, जिसके लिए ये पूरा गीत रचा गया है...फ़िल्म के प्रोमोस देख कर लगता है कि राकेश ने "रंग दे बसंती" के बाद एक और शानदार प्रस्तुति दी है...पर फिलहाल तो आप आनंद लें मोहित चौहान (डूबा डूबा फेम) के गाये और प्रसून जोशी के अनोखे मगर खूबसूरत शब्दों से सजे इस लाजवाब गीत का -




मंगलवार, 20 जनवरी 2009

'कथापाठ- एक विमर्श' कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग

सुनिए गौरव सोलंकी, तेजेन्द्र शर्मा, असग़र वजाहत और श्याम सखा का कहानीपाठ


१५ जनवरी २००९ को हिन्द-युग्म ने गाँधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली में 'कथापाठ-एक विमर्श' कार्यक्रम का आयोजन किया था, जिसमें लंदन के वरिष्ठ हिन्दी कहानीकार तेजेन्द्र शर्मा और भारत के युवा कथाकार गौरव सोलंकी का कहानीपाठ हुआ। संचालन हरियाणा के वरिष्ठ हिन्दी साहित्यकार डॉ॰ श्याम सखा 'श्याम' ने किया। प्रसिद्ध कहानीकार असग़र वजाहत मुख्य वक्ता के तौर पर उपस्थित थे। युवा कहानीकार अजय नावरिया और अभिषेक कश्यप ने कहानी और कहानीपाठ पर अपने विचार रखे।

जैसाकि हिन्द-युग्म टीम ने उदय प्रकाश की कहानीपाठ और उसपर नामवर सिंह के वक्तव्य के कार्यक्रम को रिकॉर्ड करके सुनवाया था और यह वादा किया था कि इस तरह के कार्यक्रमों को लेकर उपस्थित होता रहेगा, ताकि वे हिन्दी प्रेमी भी लाभांवित हो सकें, जो किन्हीं कारणों से ऐसे कार्यक्रमों में सम्मिलित नहीं हो पाते।

तो सुनिए और खुद तय करिए कि हिन्द-युग्म द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम कैसा रहा?




दादी जी की चिड़िया- हरिवंश राय बच्चन

आपने हरिवंश राय बच्चन की ६वीं पुण्य तिथि पर हमारी दो प्रस्तुतियाँ पढ़ी-सुनीं। एक प्रविष्टि में जहाँ अमिताभ बच्चन की आवाज़ में बच्चन जी की कविताएँ थीं, वहीं एक पोस्ट में डॉ॰ प्रीति प्रकाश प्रजापति द्वारा कविता 'क्या भुलूँ क्या याद करूँ'। हरिवंश राय बच्चन ने बाल-साहित्य पर भी उल्लेखनीय कार्य किया था। नीलम मिश्रा अपनी आवाज़ में उन्हीं की एक बाल कविता लाई हैं, आप सब के लिए, सुनें-




सोमवार, 19 जनवरी 2009

दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे.... बेगम अख्तर

(पहले अंक से आगे..)

अख्तर बेगम जितनी अच्छी फ़नकार थीं उतनी ही खूबसूरत भी थीं। कई राजे महाराजे उनका साथ पाने के लिए उनके आगे पीछे घूमते थे लेकिन वो टस से मस न होतीं।

अकेलेपन के साथी थे- कोकीन,सिगरेट, शराब और गायकी। इन सब के बावजूद उनकी आवाज पर कभी कोई असर नहीं दीखा। अल्लाह की नेमत कौन छीन सकता था।

1945 में जब उनकी शौहरत अपनी चरम सीमा पर थी उन्हें शायद सच्चा प्यार मिला और उन्हों ने इश्तिआक अहमद अब्बासी, जो पेशे से वकील थे, से निकाह कर लिया और अख्तरी बाई फ़ैजाबादी से बेगम अख्तर बन गयीं। गायकी छोड़ दी और पर्दानशीं हो गयीं। बहुत से लोगों ने उनके गायकी छोड़ देने पर छींटाकशी की,"सौ चूहे खा के बिल्ली हज को चली" लेकिन उन्हों ने अपना घर ऐसे बसाया मानों यही उनकी इबादत हो। पांच साल तक उन्हों ने बाहर की दुनिया में झांक कर भी न देखा। लेकिन जो तकदीर वो लिखा कर लायी थीं उससे कैसे लड़ सकती थीं। वो बिमार रहने लगीं और डाक्टरों ने बताया कि उनकी बिमारी की एक ही वजह है कि वो अपने पहले प्यार, यानी की गायकी से दूर हैं।

मानो कहती हों -
इतना तो ज़िन्दगी में किसी के खलल पड़े...


उनके शौहर की शह पर 1949 में वो एक बार फ़िर अपने पहले प्यार की तरफ़ लौट पड़ीं और ऑल इंडिया रेडियो की लखनऊ शाखा से जुड़ गयीं और मरते दम तक जुड़ी रहीं। उन्हों ने न सिर्फ़ संगीत की दुनिया में वापस कदम रखा बल्कि हिन्दी फ़िल्मों में भी गायकी के साथ साथ अभिनय के क्षेत्र में भी अपना परचम फ़हराया। उनका हिन्दी फ़िल्मों का सफ़र 1933 में शुरु हुआ फ़िल्म 'एक दिन का बादशाह' और 'नल दमयंती' से। फ़िर तो सिलसिला चलता ही रहा, 1934 में मुमताज बेगम, अमीना 1935 में जवानी का नशा, नसीब का चक्कर, 1942 में रोटी। फ़िल्मों से कभी अदाकारा के रूप में तो कभी गायक के रूप में उनका रिश्ता बना ही रहा। सुनते हैं एक ठुमरी उनकी आवाज़ में - जब से श्याम सिधारे...


अब तक दिल में बसा हुआ है। अदाकारा के रूप में उनकी आखरी पेशकश थी सत्यजीत रे की बंगाली फ़िल्म 'जलसा घर' जिसमें उन्हों ने शास्त्रीय गायिका का किरदार निभाया था।

फ़िल्मों के अलावा वो ऑल इंडिया रेडियो पर,और मंच से गाती ही रहती थीं ।सब मिला के उनकी गायी करीब 400 गजलें, दादरा और ठुमरी मिलती हैं। संगीत पर उनकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि ज्यादातर वो शायरी को संगीत का जामा खुद पहनाती थी। ढेरों इनामों से नवाजे जाने के बावजूद लेशमात्र भी दंभ न था और ता उम्र वो मशहूर उस्तादों से सीखती रहीं । एक जज्बा था कि न सिर्फ़ अच्छा गाना है बल्कि वो बेहतर से बेहतर होना चाहिए- परफ़ेक्ट।

यही कारण था कि 1974 में जब अहमदाबाद में वो (अपनी खराब तबियत के बावजूद) मंच पर गा रही थीं वो खुद अपनी गायकी से संतुष्ट नहीं थी और उसे बेहतर बनाने के लिए उन्हों ने अपने ऊपर इतना जोर डाला कि उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा और वो चल पड़ी उस पड़ाव की ओर जहां से कोई लौट कर नहीं आता, जहां कोई साथ नहीं जाता, फ़िर भी अकेलेपन से निजाद मिल ही जाता है। वो गाती गयीं -

मेरे हमसफ़र मेरे हमनवाज मुझे दोस्त बन के दगा न दे...


खूने दिल का जो कुछ....


दीवाना बनाना है तो .....(उस्ताद बिस्मिल्लाह खान साहब की सबसे पसंदीदा ग़ज़ल)


खुशी ने मुझको ठुकराया....


हमार कहा मानो राजाजी (दादरा)


अब छलकते हुए...


खुश हूँ कि मेरा हुस्ने तलब काम तो आया...


और उनके चाहने वालों का दिल कह रहा है-
किस से पूछें हमने कहाँ वो चेहरा-ऐ-रोशन देखा है.....


कहने को बहुत कुछ है,आखिरकार पदमविभूषण से सम्मानित ऐसी नूरी शख्सियत को चंद शब्दों में कैसे बांधा जा सकता है, बस यही कहेगें -
डबडबा आई वो ऑंखें, जो मेरा नाम आया.
इश्क नाकाम सही, फ़िर भी बहुत काम आया.....


प्रस्तुति - अनीता कुमार




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