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Saturday, September 20, 2014

"तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ" - क्यों नहीं माने साहिर इस गीत की अवधि को छोटा करने के सुझाव को?


एक गीत सौ कहानियाँ - 41
 

तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ...




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 41वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'धूल का फूल' के सदाबहार युगल गीत "तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ..." के बारे में। 

बी.आर.चोपड़ा व यश चोपड़ा

हिन्दी फ़िल्म जगत में कई मशहूर कैम्प रहे हैं, जैसे कि राज कपूर कैम्प, बी.आर. चोपड़ा कैम्प, ॠषीकेश मुखर्जी कैम्प आदि। कैम्प का अर्थ है उन कलाकारों का समूह जो हर फ़िल्म में स्थायी रहे। उदाहरणस्वरूप राज कपूर कैम्प में शंकर-जयकिशन, शैलेन्द्र-हसरत और मुकेश स्थायी सदस्य रहे हैं। वैसे ही बी. आर. चोपड़ा कैम्प में साहिर लुधियानवी, रवि और महेन्द्र कपूर ने लम्बी पारी खेली। बी. आर. चोपड़ा द्वारा निर्मित दूसरी फ़िल्म 'नया दौर' में साहिर साहब ने गीत तो लिखे पर संगीतकार थे ओ. पी. नय्यर और गाने भी रफ़ी साहब ने गाये। उनकी अगली फ़िल्म 'साधना' में संगीतकार बने एन. दत्ता, गीतकार साहिर ही रहे। तीसरी फ़िल्म 'धूल का फूल' में साहिर और एन. दत्ता के साथ-साथ नवोदित गायक महेन्द्र कपूर की एन्ट्री हुई चोपड़ा कैम्प में। अगली फ़िल्म 'कानून' में कोई गीत नहीं था। और 1964 में फ़िल्म 'गुमराह' से बी. आर. चोपड़ा के स्थायी संगीतकार बने रवि। और इसी फ़िल्म से चोपड़ा कैम्प में रवि, साहिर लुधियानवी और महेन्द्र कपूर की तिकड़ी बनी जिसने एक लम्बे समय तक एक के बाद एक मशहूर नग़मे श्रोताओं को दिये। 'गुमराह', 'वक़्त', 'आदमी और इंसान', 'हमराज़', 'धुन्ध' आदि फ़िल्मों के लोकप्रिय गीतों से सभी अवगत हैं। आज ज़िक्र है 1959 की फ़िल्म 'धूल का फूल' के मशहूर युगल गीत "तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ..." का। इस फ़िल्म की ख़ास बात यह थी कि यह यश चोपड़ा निर्देशित पहली फ़िल्म थी और अभिनेत्री माला सिन्हा की शुरुआती कामयाब फ़िल्मों में से एक। इस गीत में नायक राजेन्द्र कुमार और माला सिन्हा स्टेज पर यह गीत गा रहे हैं, बल्कि यूँ कहें कि एक सुरीला मुकाबला हो रहा है, सवाल जवाब हो रहे हैं। इस गीत के निर्माण के साथ दो रोचक किस्से जुड़े हुए हैं।

बायें से - यश चोपड़ा, महेन्द्र कपूर, साहिर लुधियानवी, एन. दत्ता
पहला किस्सा है गायक महेन्द्र कपूर से जुड़ा हुआ। हुआ यूँ कि यश चोपड़ा को 'धूल का फूल' निर्देशित करने का मौका उनके बड़े भाई-साहब ने दिया। तो गीतों की रेकॉर्डिंग के लिए स्टुडियो बुक करने के लिए वो उस ज़माने के मशहूर रेकॉर्डिस्ट कौशिक साहब के पास पहुँचे। उसी दिन नवोदित गायक महेन्द्र कपूर ने उसी स्टुडियो में नौशाद के संगीत निर्देशन में 'सोहनी महिवाल' फ़िल्म का एक गीत रेकॉर्ड करवाया था जिसके बोल थे "चाँद छुपा और तारे डूबे..."। फ़िल्म के बाकी गीत रफ़ी साहब की आवाज़ में थे, बस यही गीत महेन्द्र कपूर से गवाया था नौशाद साहब ने क्योंकि महेन्द्र कपूर जिस प्रतियोगिता के विजेता बने थे उसके जज नौशाद साहब थे। पुरस्कारस्वरूप यह मौका उन्होंने दिया था महेन्द्र कपूर को। ख़ैर, तो यश चोपड़ा को कौशिक साहब ने महेन्द्र कपूर का उसी दिन रेकॉर्ड किया हुआ गीत बजा कर सुनवाया और साथ ही यश जी से पूछा कि बताइये ज़रा कि यह गायक कौन हैं? यश चोपड़ा ने कहा कि यह तो रफ़ी साहब की आवाज़ है, और किसकी? कौशिक साहब के यह कहने पर कि इसे रफ़ी साहब ने नहीं बल्कि महेन्द्र कपूर ने गाया है, यश चोपड़ा को यकीन ही नहीं हुआ। पर कौशिक साहब ने जब गीत को बार बार बजाकर सुनवाया तो यश साहब को आवाज़ में थोड़ा फ़र्क महसूस हुआ और मान गये। घर वापस आकर यश चोपड़ा ने बड़े भाई बी. आर. चोपड़ा को जब यह बात बतायी तो बड़े भाई साहब को भी उत्सुकता हुई इस आवाज़ को सुनने की। यश जी ने उनसे यह भी कहा कि वो चाहते हैं कि 'धूल का फूल' में लता जी के साथ "तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ" की जो परिकल्पना बन रही है, उसमें वो महेन्द्र कपूर की आवाज़ लेना चाहते हैं। बी. आर. चोपड़ा मान गये और तब दोनों भाइयों ने मिल कर महेन्द्र कपूर के साथ सम्पर्क स्थापित किया उनके सिनेमाटोग्राफ़र के ज़रिये जिनकी पत्नी महेन्द्र कपूर की माँ की सहेली हुआ करती थीं। टेलीफ़ोन पर न्योता मिलने के बाद महेन्द्र कपूर बी. आर. फ़िल्म्स के दफ़्तर में गये जो उस समय कारदार स्टुडियो के पास हुआ करता था। यश चोपड़ा उन्हें फ़िल्म के संगीतकार दत्ता नाईक, यानी एन. दत्ता के पास ले गये। ख़ूब गाने की रिहर्सल हुई और इस तरह से महेन्द्र कपूर ने पहली बार लता मंगेशकर के साथ युगल गीत गाया। ऐसा सुनने में आया था कि लता जी के साथ गाना है यह जान कर जहाँ एक तरफ़ महेन्द्र कपूर की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था, वहीं दूसरी ओर वो नर्वस भी बहुत हो गये थे लता जी को सामने देख कर। पर लता जी ने जब उन्हें साहस दिया और हौसला बढ़ाया, तब जा कर उन्हें थोड़ी शान्ति मिली। गीत की रेकॉर्डिंग के बाद लता जी ने उनकी तारीफ़ भी की थी। 'धूल का फूल' के सब गाने चल गये, और यहाँ का दस्तूर यही है कि अगर कोई फ़िल्म कामयाब होती है तो अगले फ़िल्म में वही टीम रिपीट की जाती है। और इस तरह से महेन्द्र कपूर को आगे भी बी. आर. फ़िल्म्स में गाने के मौके मिलते चले गये।

साहिर व यश चोपड़ा
और अब आते हैं इस गीत से जुड़े दूसरे किस्से पर। "तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ..." गीत फ़ाइनल रिहर्सल हो कर रेकॉर्डिंग के लिए तैयार हो चुका था। तभी एन. दत्ता के सहायक ने उन्हें बताया कि इस गीत की अवधि ज़रूरत से ज़्यादा लम्बी हो गई है। उस ज़माने में किसी फ़िल्मी गीत की अवधि 3 मिनट से 5 मिनट तक की होती थी, क़व्वाली या कोई ख़ास गीत हो तो ही 6 या 7 मिनट की हो सकती थी, पर ऐसा बहुत कम ही था। ऐसे में "तेरे प्यार का आसरा...", जो कि एक सामान्य रोमांटिक युगल गीत था, इसकी अवधि हो गई थी कुल 6 मिनट और लगभग 40 सेकण्ड। सहायक की बात सुन कर एन. दत्ता को भी लगने लगा कि वाकई यह गीत काफ़ी लम्बा हो गया है। लेकिन किसी की क्या मजाल जो यह बात साहिर लुधियानवी को जाकर कहे। साहिर साहब अपने लिखे किसी भी गीत के साथ कोई छेड़-छाड़, काँट-छाँट या फेर-बदल बिल्कुल पसन्द नहीं करते थे। ऐसे में एन. दत्ता कैसे उन्हे कहें कि गीत के कुछ अन्तरे काटने पड़ेंगे? इसलिए उन्होंने यह बात जाकर यश चोपड़ा को बताई। यश चोपड़ा ने गीत को सुना और उन्हे भी गीत काफ़ी लम्बा लगा, और उन्होंने तय किया कि वो ख़ुद साहिर साहब से बात करेंगे। जब साहिर साहब को उन्होंने बताया कि गीत के कुल सात अन्तरों में से दो अन्तरे कम करने पड़ेंगे तो साहिर ने उन्हें समझाया कि देखिये, यह किसी आम सिचुएशन का युगल गीत नहीं है, यह एक प्रतियोगितामूलक गीत है। स्टेज पर नायक और नायिका के बीच में लड़ाई चल रही है, इसलिए इसका थोड़ा लम्बा होना स्वाभाविक है। गीत को छोटा कर देंगे तो यह प्रतियोगितामूलक गीत नहीं बल्कि इस सिचुएशन का एक महज़ औपचारिक गीत बन कर रह जायेगा। सिचुएशन का इम्पैक्ट ही ख़त्म हो जायेगा। साहिर साहब के समझाने पर भी यश जी जब किन्तु-परन्तु करने लगे तो साहिर साहब ने थोड़े कड़े शब्दों में उनसे कहा कि अगर वाक़ई उन्हे लगता है कि गीत लम्बा हो गया है तो यह गीत उन्हे वापस दे दिया जाये, और इसके बदले वो कोई दूसरा गीत लिख कर दे देंगे, पर यह गीत ऐसे ही जायेगा, किसी भी तरह की कोई कटौती नहीं होगी इसमें। अब यश जी घबरा गये क्योंकि उन्हें यह गीत बहुत पसन्द था। गीत हाथ से निकल जायेगा सोच कर उन्होंने बात को यहीं ख़त्म करने की सोची और साहिर साहब से कहा कि वो इसी गीत को रखेंगे बिना किसी काट-छाँट के। इस तरह से गीत रेकॉर्ड हुआ और बेहद लोकप्रिय भी हुआ। फ़िल्म के पोस्टर पर भी लिखा गया "तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ"। लोग थिएटर से फ़िल्म देख कर निकलते वक़्त इसी गीत को गुनगुनाते हुए पाये गये। बस, इतनी सी है इस गीत की कहानी। लीजिए, अब आप यही गीत सुनिए।

फिल्म - धूल का फूल : 'तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ...' : लता मंगेशकर और महेन्द्र कपूर : संगीत - एन. दत्ता : गीत - साहिर लुधियानवी 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें  cine.paheli@yahoo.com  के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, June 30, 2013

विदुषी मीता पण्डित से सुनिए राम-सिया की होली



स्वरगोष्ठी – 126 में आज

भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति – 6

राग काफी पर आधारित गीत- ‘कासे कहूँ मन की बात...’

  
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति’ की इस छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपको राग-आधारित कुछ ऐसे फिल्मी गीत सुनवा रहे हैं, जो आधी शताब्दी से भी अधिक अवधि बीत जाने के बावजूद सदाबहार गीत के रूप में हमारे बीच प्रतिष्ठित हैं। ये गीत सदाबहार तो हैं, परन्तु इनके संगीतकार हमारी स्मृतियों में धूमिल हो गए हैं। इस श्रृंखला को प्रस्तुत करने का उद्देश्य ही यही है कि इन कालजयी, राग आधारित गीतों के माध्यम से हम कुछ भूले-बिसरे संगीतकारों को स्मरण करें। आज के अंक में हम आपको राग काफी पर आधारित एक मधुर फिल्मी गीत सुनवाएँगे और इस गीत के संगीतकार एन. दत्ता का स्मरण करेंगे। इसके साथ ही सुप्रसिद्ध युवा गायिका विदुषी मीता पण्डित से इसी राग में निबद्ध रस से भरी एक होरी भी सुनेगे।


एन. दत्ता
1959 में बी.आर. चोपड़ा की सफलतम फिल्म ‘धूल का फूल’ प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म के गीत अपनी सरलता और मधुरता के बल पर बेहद लोकप्रिय हुए थे। एन. दत्ता अर्थात दत्ता नाईक इस फिल्म के संगीतकार थे। फिल्म जगत के यशस्वी गीतकार साहिर लुधियानवी के अर्थपूर्ण शब्दों को मधुर धुनों में पिरोने वाले संगीतकारों में रोशन, खय्याम और रवि के साथ एन. दत्ता का नाम लिया जाना आवश्यक है। फिल्मों में पदार्पण से पहले एन. दत्ता ने मुम्बई के देवधर संगीत विद्यालय से संगीत की विधिवत शिक्षा भी ग्रहण की थी। इसके उपरान्त कुछ समय तक फिल्म संगीत का व्यावहारिक प्रशिक्षण पाने के उद्देश्य से संगीतकार गुलाम हैदर और सचिनदेव बर्मन के सहायक के रूप में भी कार्य किया था। स्वतंत्र रूप से संगीत निर्देशन का अवसर उन्हें 1955 में प्रदर्शित दो फिल्मों, ‘मिलाप’ और ‘मैरीन ड्राइव’ में मिला। यह एन. दत्ता का सौभाग्य था कि आरम्भ में ही उन्हें बड़े बैनर की अर्थात राज खोसला की ‘मिलाप’ और जी.पी. सिप्पी की ‘मैरीन ड्राइव’ जैसी फिल्में मिली। इसके अलावा आरम्भ से ही उन्हें सुविख्यात शायर और गीतकार साहिर लुधियानवी का साथ मिला। आगे चल कर साहिर और दत्ता की जोड़ी ने फिल्म संगीत के भण्डार को अनेक मधुर गीतों से समृद्ध किया।

सुधा मल्होत्रा
आरम्भिक दो फिल्मों के बाद एन. दत्ता ने 1956 में ‘चन्द्रकान्ता’, 1957 में ‘मोहिनी’, 1958 में ‘मिस्टर एक्स’ जैसी फिल्मों को विविधतापूर्ण संगीत से सँवारा। इस दौर में फिल्में बेशक बहुत सफल न रहीं, किन्तु दत्ता के संगीत का जादू खूब चला। वर्ष 1958 में दत्ता को बी.आर. चोपड़ा ने अपनी फिल्म ‘साधना’ के संगीत निर्देशन का प्रस्ताव दिया। यह फिल्म खूब चली और दत्ता का संगीत भी। इस फिल्म के कई गीतों में उन्होने रागों का स्पर्श भी किया था। फिल्म ‘साधना’ के स्तरीय संगीत से प्रभावित होकर बी.आर. चोपड़ा ने अपनी अगली फिल्म ‘धूल का फूल’ के संगीत का दायित्व भी दत्ता को सौंपा। इस फिल्म का निर्देशन यश चोपड़ा ने किया था। लोकप्रियता की दृष्टि से इस फिल्म के कई गीत सफल थे किन्तु राग के आधार की दृष्टि से इस फिल्म का ही नहीं, बल्कि अपने दौर का सर्वाधिक सफल गीत था- ‘कासे कहूँ मन की बात...’। इस गीत को दत्ता ने राग काफी के स्वरों का स्पष्ट आधार दिया था। गीत में सितार का अनूठा प्रयोग किया गया है। आरम्भ में राग काफी के स्वरों में छोटा सा आलाप और सरगम तथा अन्त में द्रुत तीनताल में मोहक गत के रूप में सितार का प्रयोग गीत का मुख्य आकर्षण है। यह गीत नृत्य पर फिल्माया गया है। नृत्यांगना हैं नाज़ और परदे पर सितार वादिका की भूमिका में अभिनेत्री पूर्णिमा हैं। दत्ता ने इस गीत में ठुमरी अंग का स्पर्श किया है। साहिर लुधियानवी की पारम्परिक ठुमरी जैसी शब्दावली, राग काफी के स्वरों की चाशनी में पगी इसकी धुन और गायिका सुधा मल्होत्रा की उदात्त आवाज़ इस गीत को कालजयी बना देता है। आइए, पहले हम सब इस गीत को सुनते हैं।


राग - काफी : फिल्म - धूल का फूल : ‘कासे कहूँ मन की बात...’ : संगीत – एन. दत्ता



मीता पण्डित
आइए, अब थोड़ी चर्चा राग काफी की संरचना पर करते हैं। राग काफी, काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में सा रे (कोमल) म प ध नि(कोमल) सां तथा अवरोह में सां नि(कोमल) ध प म (कोमल) रे सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। कभी-कभी वादी कोमल गान्धार और संवादी कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है। दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिय राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी, ध्रुवपद और खयाल की अपेक्षा उपशास्त्रीय संगीत में अधिक प्रयोग किया जाता है। ठुमरियों में प्रायः दोनों गान्धार और दोनों धैवत का प्रयोग भी मिलता है। टप्पा गायन में शुद्ध गान्धार और शुद्ध निषाद का प्रयोग वक्र गति से किया जाता है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है। आइए अब हम आपका साक्षात्कार राग काफी के एक अलग रंग से कराते हैं। विदुषी मीता पण्डित ग्वालियर परम्परा की जानी-मानी युवा गायिका हैं। उन्होने राग काफी के स्वरों में एक होरी प्रस्तुत की है। राधा-कृष्ण की होली तो अत्यन्त प्रसिद्ध हैं, किन्तु मीता जी ने अपनी इस प्रस्तुति में राम और सीता की होली के दृश्य उपस्थित किया है। आप राग काफी की इस होरी का आनन्द लीजिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 


राग काफी होरी : ‘राम सिया फाग मचावत...’ : विदुषी मीता पण्डित




आज की पहेली 

‘स्वरगोष्ठी’ के 126वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक बन्दिश का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 130वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – संगीत रचना के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह किस राग में निबद्ध है?

2 – इस संगीत रचना के ताल का नाम भी बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 128वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से या swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 124वें अंक की पहेली में हमने आपको उस्ताद सुल्तान खाँ की बजाई सारंगी पर आलाप का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग कल्याण अथवा यमन और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- वाद्य सारंगी। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी और जबलपुर की क्षिति तिवारी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति’ के आगामी अंक में हम एक और लोकप्रिय राग पर आधारित एक सदाबहार फिल्मी गीत, इसके विस्मृत संगीतकार और इसी राग में निबद्ध एक मोहक खयाल रचना पर चर्चा करेंगे। अगले अंक में इस श्रृंखला की अगली कड़ी के साथ रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की प्रतीक्षा करेंगे। 

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  
 

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