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Sunday, June 5, 2011

एक राजे का बेटा लेकर उड़ने वाला घोड़ा....सुनिए एक कहानी सहगल साहब की जुबानी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 671/2011/111

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक नई सप्ताह के साथ मैं, सुजॉय चटर्जी, साथी सजीव सारथी के साथ आप सब की ख़िदमत में हाज़िर हूँ। दोस्तों, बचपन में हम सभी नें अपने दादा-दादी, नाना-नानी और माँ-बाप से बहुत सारी किस्से कहानियाँ सुनी हैं, है न? उस उम्र में ये कहानियाँ हमें कभी परियों के साम्राज्य में ले जाते थे तो कभी राजा-रानी की रूप-कथाओं में। कभी भूत-प्रेत की कहानियाँ सुन कर रात को बाथरूम जाने में डर भी लगा होगा आपको। और हम जैसे जैसे बड़े होते जाते हैं, हमारी कहानियाँ भी उम्र और रुचि के साथ साथ बदलती चली जाती है। कहानी-वाचन भी एक तरह की कला है। एक अच्छा कहानी-वाचक सुनने वालों को बाकी सब कुछ भूला कर कहानी में मग्न कर देता है, और कहानी के साथ जैसे वो बहता चला जाता है। हमारी फ़िल्में भी कहानी कहने का एक ज़रिया है। और फ़िल्मों के गीत भी ज़्यादातर समय फ़िल्म की कहानी को ही आगे बढ़ाते हैं। लेकिन कई बार ऐसा भी हुआ है कि कोई फ़िल्मी गीत भी अपने आप में कोई कहानी कहता है। कुछ ऐसे ही गीतों को लेकर, जिनमें छुपी है कोई कहानी, हम आज से एक नई शृंखला की शुरुआत कर रहे हैं। कहानी भरे गीतों का जैसे ही ख़याल आया तो सब से पहले मुझे जो गीत याद आया, वह है फ़िल्म 'जब जब फूल खिले' का "एक था गुल और एक थी बुलबुल"। लेकिन क्योंकि यह गीत 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर आनन्द बक्शी साहब पर केन्द्रित शृंखला में बज चुका है, इसलिए इस शृंखला के लिये इतना सटीक होते हुए भी हम इसे शामिल नहीं कर पा रहे हैं। लेकिन बक्शी साहब की लिखी इस कहानी को सलाम करते हुए हम इस शृंखला का शीर्षक रखते हैं - 'एक था गुल और एक थी बुलबुल'।

इस शृंखला के लिये गीतों की खोज करते हुये मेरे हाथ जो सबसे पुराना गीत लगा, वह है साल १९३७ का। वैसे एक नहीं, वर्ष १९३७ के मुझे दो ऐसे गीत मिले हैं जिनमें कहानी है। और इस शृंखला की पहली दो कड़ियों में ये ही दो गीत आप सुनने जा रहे हैं। शुरु करते हैं पहले सिंगिंग् सुपरस्टार कुंदनलाल सहगल से। १९३७ की फ़िल्म 'प्रेसिडेण्ट' का गीत "इक बंगला बने न्यारा" आप हाल ही में इस स्तंभ में सुन चुके हैं। इस गीत में सहगल साहब सपना देखते हैं उस मिल का मालिक बनने का जिसमें वो एक मज़दूर की हैसियत से काम करते हैं। लेकिन लगता है उनका यह सपना टूट जाता है, उनकी नौकरी चली जाती है, और वो इस बात को अपने परिवार से छुपाने की कोशिश करते हैं। इसी सिचुएशन पर फ़िल्म का अगला गीत है "एक राजे का बेटा लेकर उड़ने वाला घोड़ा"। यह गीत उनकी कोशिश है अपनी नौकरी चले जाने को छुपाने की। किदार शर्मा के लिखे इस गीत को स्वरबद्ध किया है रायचन्द बोराल नें। गीत बच्चों वाला है, जिसमें रूपकथा है, लेकिन फ़िल्म के सिचुएशन के हिसाब से यह ग़मज़दा गीत है क्योंकि नायक की नौकरी चली गई है। इस गीत में जो कहानी है, उसे पूरा तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन जो भी है, गीत उस ज़माने का सुपरहिट गीत रहा है। गीत सुनने से पहले ये रही इस गीत में कही गई कहानी:

एक राजे का बेटा लेकर उड़ने वाला घोड़ा,
देश देश के सैर की ख़ातिर अपने घर से निकला।

उड़ते-उड़ते चलते-चलते थके जो उसके पाँव,
तो इक जगह पर बैठ गया वो देख के ठण्डी छाँव।

इतने में होनी ने अपनी बंसी वहाँ बजायी,
जिसको सुन कर परियों की शहज़ादी दौड़ी आयी।


उसके बाद क्या हुआ, उसकी आप ख़ुद ही कल्पना कर लीजिये, और हो सके तो इस गीत को पूरा लिख कर हमें oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजिये।



क्या आप जानते हैं...
कि संगीतकार रायचन्द बोराल के पिता लालचन्द बोराल अपने ज़माने के मशहूर गायक और पखावजवादक थे।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 2/शृंखला 18
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - शांता आप्टे की आवाज़ है इसमें.
सवाल १ - गीतकार बताएं - ३ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - २ अंक
सवाल ३ - फिल्म के निर्देशक बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
एक बार फिर अमित और अनजाना जी ने शानदार शुरुआत की है, अविनाश जी लगता है इस बार उन्हें अच्छी टक्कर दे पायेंगें. पिछली शृंखला का आत्मविश्वास उनके जरूर काम आएगा, प्रतीक जी को भी बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Thursday, March 31, 2011

एक बंगला बने न्यारा...एक और आशावादी गीत के एल सहगल की आवाज़ में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 625/2010/325

१९३५ में पार्श्वगायन की नीव रखने वाली फ़िल्म 'धूप छाँव' के संगीतकार थे राय चंद बोराल और उनके सहायक थे पंकज मल्लिक साहब। इस फ़िल्म में के. सी. डे, पारुल घोष, सुप्रभा सरकार, उमा शशि और पहाड़ी सान्याल के साथ साथ कुंदन लाल सहगल नें भी गाया था "अंधे की लाठी तू ही है"। सन् '३५ में प्रदर्शित 'देवदास' का ज़िक्र तो हम कल ही कर चुके हैं। इसी साल संगीतकार मिहिरकिरण भट्टाचार्य के संगीत में 'कारवाँ-ए-हयात' में सहगल साहब नें कई ग़ज़लें गायीं। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर जारी है सहगल साहब पर केन्द्रित लघु शृंखला 'मधुकर श्याम हमारे चोर'। १९३६ में एक बार फिर बोराल साहब और पंकज बाबू के संगीत से सजी मशहूर फ़िल्म आई 'करोड़पति', जिसका सहगल साहब का गाया "जगत में प्रेम ही प्रेम भरा है" गीत बहुत लोकप्रिय हुआ। इसी साल तिमिर बरन के संगीत में फ़िल्म 'पुजारिन' का ज़िक्र हम कल की कड़ी में कर चुके हैं। साल १९३७ सहगल साहब के करीयर का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव बना, क्योंकि इसी साल आई फ़िल्म 'प्रेसिडेण्ट'। आज इसी फ़िल्म का एक गीत हम सुनेंगे, लेकिन उससे पहले आइए आज पढ़ें राय चंद बोराल साहब के शब्द सहगल साहब के नाम। "ये अभिनय भी ऊँचा करते थे, और उनकी आवाज़ की तो क्या बात थी, गोल्डन वॊयस जिसे हम कहते हैं, सुननेवालों के दिलों में बहुत असर होता था। न्यु थिएटस के कम्पाउण्ड में एक तालाब था, उसके पास बैठे बैठे एक दिन मैं एक गीत गुनगुना रहा था। इतने में सहगल वहाँ आये, तो मैंने उनसे पूछा कि यह गाना पसंद है? वो बोले, "दादा, आप इस गीत को इसी वक़्त बना दीजिये।" और वह गाना था फ़िल्म 'प्रेसिडेण्ट' का "एक बंगला बने न्यारा"।" जी हाँ दोस्तों, आज हम इसी अनमोल गीत को सुनेंगे। इसी गीत को गायिका गीता दत्त नें भी अपनी 'जयमाला' कार्यक्रम के लिए चुना था। गीता जी की शब्दों में - "मैंने जब संगीत की समझ सम्भाली, तब सुगम संगीत में बहुत अच्छे अच्छे गायक थे - शम्शाद बेगम, ज़ोहराबाई, अमीरबाई कर्नाटकी, राजकुमारी, के.सी. डे, पंकज मल्लिक और के.एल. सहगल। सहगल साहब क्योंकि उत्तर भारतीय होने पर भी बंगला गीत बहुत अच्छी तरह से गा लेते थे, इसलिए मैं उनसे बहुत प्रभावित थी। आरज़ू साहब का यह गीत 'प्रेसिडेण्ट' का, "एक बंगला बने न्यारा", सहगल साहब ने ही गाया है।"

नितिन बोस निर्देशित और रायचंद बोराल स्वरबद्ध 'प्रेसिडेण्ट' में सहगल साहब का गाया "एक बंगला बने न्यारा" न केवल इस फ़िल्म का सब से लोकप्रिय गीत है, बल्कि यह उनके करीयर का भी एक माइलस्टोन गीत रहा है। आज सहगल साहब पर आयोजित कोई भी कार्यक्रम इस गीत के बिना पूरी नहीं होती। यह एक आशावादी गीत है जिसकी धुन में बंगाल के लोक-संगीत की झलक मिलती है। इस गीत का ग्रामोफ़ोन वर्ज़न एक लम्बे प्रील्युड से शुरु होता है, जब कि फ़िल्म में गीत शुरु होता है इन शब्दों से - "रहेगी न बदरिया कारी, होंगे एक दिन सूर्य के दर्शन, वो ही घड़ी अब आयी, तनख्वाह बढ़ गई हमारी, ४०० हर एक महीने, काम किया नहीं गये महीने, फिर भी तनख्वाह पायी"। और इसके बाद गीत शुरु होता है "एक बंगला बने न्यारा"। सहगल साहब की आवाज़ में फ़िल्म का एक और बड़ा ही मशहूर गाना है "एक राज्य का बेटा लेकर उड़ने वाला घोड़ा"। किशोर कुमार नें एक बार अमीन सायानी के किसी कार्यक्रम में अपने बचपन की नकल उतारी थी, उसमें उन्होंने इसी गीत को एक बच्चे की आवाज़ में गाया था। सहगल साहब इस गीत में जिस तरह से हँसते हैं, जिस मासूमीयत से गाते हैं, उनकी दिव्य और नर्म आवाज़ दिल को कितना सुकून दे जाती है, इस गीत को सुन कर ही पता चलता है। पहाड़ी सान्याल के साथ सहगल ने इस फ़िल्म में गाया था "प्रेम का है इस जग में पथ निराला"। सहगल साहब की एकल आवाज़ में "न कोई प्रेम का रोग लगाये, पापी अंग अंग रच जाये" न केवल उस दौर में प्रेमी-प्रेमिकाओं के दिलों को छू लिया था, बल्कि यह गीत एक ट्रेण्डसेटर बना इस भाव पर बनने वाले गीतों का। तो आइए अब सुनते हैं आज का गीत, जिसके गीतकार हैं किदार शर्मा।



क्या आप जानते हैं...
कि १९३५ की फ़िल्म 'कारवाँ-ए-हयात' में सहगल नें राजकुमारी और पहाड़ी सान्याल के साथ एक गीत गाया था "कोई प्रीत की रीत बता दो हमें"।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 5/शृंखला 13
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - सहगल साहब का गाया एक और क्लास्सिक गीत.

सवाल १ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - ३ अंक
सवाल ३ - संगीत कौन हैं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
प्रतीक जी के दर्शन हुए, अमित जी और अंजाना जी भी सही जवाब के साथ उपस्तिथ हुए बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, March 28, 2011

राधे रानी दे डारो ना....गीत उन दिनों का जब सहगल साहब केवल अपने गीतों के गायक के रूप में पर्दे पर आते थे

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 622/2010/322

फ़िल्म जगत के प्रथम सिंगिंग् सुपरस्टार कुंदन लाल सहगल को समर्पित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला 'मधुकर श्याम हमारे चोर' की दूसरी कड़ी में आपका स्वागत है। कल पहली कड़ी में हमने आपको बताया सहगल साहब के शुरुआती दिनों का हाल और सुनवाया उनका गाया पहला ग़ैर फ़िल्मी गीत। आइए आज आपको बताएँ कि उनके करीयर के पहले दो सालों में, यानी १९३२-३३ में उन्होंने किन फ़िल्मों में कौन कौन से यादगार गीत गाये। १९३२ में न्यु थिएटर्स ने सहगल को तीन फ़िल्मों में कास्ट किया; ये फ़िल्में थीं - 'मोहब्बत के आँसू', 'सुबह का तारा' और 'ज़िंदा लाश'। इन तीनों फ़िल्मों में संगीत बोराल साहब का था। 'मोहब्बत के आँसू' में सहगल साहब और अख़्तरी मुरादाबादी के स्वर में कई गीत थे जैसे कि "नवाज़िश चाहिए इतनी ज़मीने कूवे जाना की" और "हम इज़तराबे कल्ब का ख़ुद इंतहा करते"। इन बोलों को पढ़ कर आप अनुमान लगा सकते हैं कि किस तरह की भाषा का इस्तमाल होता होगा उस ज़माने की ग़ज़लों में। ख़ैर, 'सुबह का तारा' फ़िल्म के "न सुरूर हूँ न ख़ुमार हूँ", "खुली है बोतल भरे हैं सागर", "आरज़ू इतनी है अब मेरे दिल-ए-नाशाद की" जैसे गानें ख़ूब चले थे। 'ज़िंदा लाश' फ़िल्म के "सारा आलम धोखा है, यह जीना है", "गुज़रे हाँ यूँ ही कटे दिन रैन", "आँखों में सर रहता है क्यों", "लगी करेजवा में चोट", "जानते हो तुम मुहब्बत किस क़दर इस दिल में है", "सज़ा मिली है मुझे तुमसे दिल लगाने की", "पहले तो शौक में ख़ाक दरे-मैख़ाना बनूँ" गानें भी एक से बढ़ कर एक थे। आज भले इन गीतों को दुनिया भुला चुकी है, लेकिन इनका भी अपना एक ज़माना था।

१९३२ की इन तीनों फ़िल्मों के गीतों ने कुछ ऐसा सर चढ़ के बोला कि अगले साल सहगल और बोराल की जोड़ी ने एक और कीर्तिमान स्थापित किया 'पूरन भगत' फ़िल्म के ज़रिए। न्यु थिएटर्स के मशहूर निर्देशक देबकी बोस निर्देशित यह प्रथम हिंदी फ़िल्म थी। सहगल का जादू कुछ ऐसा चला था कि कोई भूमिका न होते हुए भी सहगल को इस फ़िल्म में सिर्फ़ गीतों के लिए पर्दे पर उतारा गया था। इस फ़िल्म का सब से मशहूर गीत था "राधे रानी दे डारो ना", जो राग यमन कल्याण पर आधारित था, हालाँकि कहीं कहीं पर इसे राग बिहाग पर आधारित भी बताया गया है। आज के अंक को हम इसी गीत से सजा रहे हैं। इसी फ़िल्म का सहगल का गाया अन्य गीत "दिन नीके बीत जात है" भी ख़ूब लोकप्रिय हुआ था। 'पूरन भगत' के मुख्य कलाकारों में थे सी एम् रफ़ीक, अंसारी और के.सी. डे. के सी डे ने भी इस फ़िल्म में कुछ लोकप्रिय गीत गाये। दोस्तों, क्योंकि आज ज़िक्र एक साथ हुआ है सहगल साहब और के.सी. डे साहब का, तो क्यों न के.सी. डे साहब के भतीजे, यानी कि सुप्रसिद्ध पार्श्वगायक मन्ना डे के सहगल साहब से संबंधित कहे हुए शब्द पढें - "सहगल साहब बहुत लोकप्रिय थे। मेरे सारे दोस्त जानते थे कि मेरे चाचा जी, के.सी. डे साहब के साथ उनका रोज़ उठना बैठना है। इसलिए उनकी फ़रमाइश पे मैंने सहगल साहब के कई गानें एक दफ़ा नहीं, बल्कि कई बार गाये होंगे। 'कॊलेज-फ़ंक्शन्स' में उनके गाये गानें गा कर मैंने कई बार इनाम भी जीते।" और अगर आज के भजन की बात करें तो इसके कद्रदानों में संगीतकार रोशन साहब भी शामिल हैं। उनके शब्दों में - "वैसे तो मैं पहले से सुरों के पीछे पागल तो था ही, मगर एक सहगल साहब का भजन था जो मुझे बहुत पसंद था, यह उनका पहला ही गाना था फ़िल्मों के लिए, फ़िल्म थी 'पूरन भगत', मैंने कई बार यह फ़िल्म सिर्फ़ इस भजन के लिए देखी।" तो लीजिए, सुनिए फ़िल्म 'पूरन भगत' से "राधे रानी दे डारो ना"।



क्या आप जानते हैं...
कि अपने १५ वर्षीय करीयर में सहगल साहब ने कुल १८५ गीत गाये, जिनमें १४२ फ़िल्मी और ४३ ग़ैर फ़िल्मी हैं।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 3/शृंखला 13
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - गायक कुंदन लाल सहगल की एक बेहद लोकप्रिय गज़ल.

सवाल १ - किस बेमिसाल शायर की है ये गज़ल - २ अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - इस शायर के नाम पर बनी एक फिल्म में एक और बड़ी गायिका ने यही गज़ल गाई थी, जिसे हम ओल्ड इस गोल्ड में अभी कुछ दिनों पहले सुनाया था, कौन थी वो गायिका - ३ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
सबसे पहले एक स्पष्टीकरण - विकीपीडिया या अन्य वेब साईटों की जानकारियाँ भी हमारे आपके जैसे कद्रदान अपडेट करते हैं, जिनमें गलतियों की संभावना रहती है. हमारे रेफेरेंस अधिकतर लिखी हुई किताबों और विविध भारती के कार्यक्रमों से होते हैं जिन पर हम शायद अधिक विश्वसनीयता रख सकते हैं. जाहिर है पंकज राग और हरमंदिर हमराज़ जैसे दिग्गजों की बातों को हम विकिपीडिया से अधिक तवज्जो देंगें. अब कुछ आप लोगों के संशय भी दूर करें -
१. अंजाना जी, गौर करें कि हरिश्चंद्र बाली का जिक्र हमने भी किया है, पर पहेली जिस गाने के सन्दर्भ में थी उस गीत के संगीतकार पूछे गए थे, जिनका सहगल के करियर में महत्वपूर्ण योगदान था.
२. १९३३ की ये फिल्म शायद ही हम में से किसी ने देखी होगी, जाहिर है उसके कास्ट के बारे में जो जानकारी उपलब्ध है उसी के आधार पर सवाल पूछा गया था, सिद्धार्थ जी की दिए हुए लिंक के अलावा कहीं भी ये नहीं लिखा कि के सी डे ने फिल्म में अतिथि भूमिका की थी, और किसी भी फिल्म में एक दो या इससे भी अधिक प्रमुख किरदार हो सकते हैं, और जब हिंट दिया जा रहा है उनके गायक होने के बारे में भी तो कोई भी व्यक्ति के सी डे तक पहुँच सकता है, और अंजाना जी पहुंचे भी हैं...तो उनके ३ अंक पक्के हैं...हमें इस सवाल में कोई उलझाव नज़र नहीं आता.
देखिये हमारे पास संगीत ज्ञान रखने वाले श्रोताओं की भरमार है जाहिर है पहेलियाँ थोड़ी सी घुमा फिरा कर ही पूछनी पड़ेगी तभी तो हमें कल प्रतीक जी और सिद्धार्थ जी जैसे छुपे हुए धुरंधर दिखे.
अमित जी और हिन्दुस्तानी जी को भी कल के लिए बधाई.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, March 27, 2011

झुलना झुलाए आओ री...महान सहगल को समर्पित इस नयी शृंखला की शुरूआत आर सी बोराल के इस गैर फ़िल्मी गीत से

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 621/2010/321

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोता-पाठकों को हमारा नमस्कार और स्वागत है इस नए सप्ताह में। हिंदी फ़िल्म-संगीत की नीव रखने वाले कलाकारों में एक नाम ऐसा है जिनकी आवाज़ की चमक ३० के दशक से लेकर आज तक वैसा ही कायम है, जो आज भी सुननेवाले को मंत्रमुग्ध कर देता है। इस बेमिसाल फ़नकार का जन्म आज से १०७ साल पहले हुआ और जिनके गुज़रे आज छह दशक बीत चुके हैं। केवल पंद्रह साल लम्बी अपने सांगीतिक जीवन में इस अज़ीम फ़नकार ने अपनी कला की ऐसी सुगंधी बिखेरी है कि आज भी वह महक बरक़रार है दुनिया की फ़िज़ाओं में। और ये अज़ीम फ़नकार और कोई नहीं, ये हैं फ़िल्म जगत के प्रथम 'सिंगिंग् सुपरस्टार' कुंदन लाल सहगल। आगामी ४ अप्रैल को सहगल साहब की १०८-वीं जयंती है; इसी अवसर को केन्द्र में रखते हुए प्रस्तुत है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई लघु शृंखला 'मधुकर श्याम हमारे चोर'। सहगल साहब की आवाज़ और गायन शैली का लोगों पर ऐसा असर हुआ कि पूरा देश उनके दीवाने हो गए, और वो एक प्रेरणा स्तंभ बन गए अन्य उभरते गायकों के लिए। सज्जाद, रोशन और ओ.पी. नय्यर जैसे संगीतकार और तलत महमूद, मुकेश, किशोर कुमार और यहाँ तक कि लता मंगेशकर के एकमात्र प्रेरणास्रोत बन गए सहगल साहब। १९३१ में पहली बोलती फ़िल्म बनी 'आलम आरा', और सहगल साहब का आगमन हुआ उसके दूसरे ही साल १९३२ में, जब उन्होंने न्यु थिएटर्स की फ़िल्म 'मोहब्बत के आँसू' में एक छोटा सा रोल अदा किया।

के.एल. सहगल का जन्म पिता अमीरचंद और माँ केसर कौर के घर ४ अप्रैल १९०४ को जम्मु में हुआ था। बचपन से ही अपनी भोली सूरत की वजह से राम लीला में वे सीता की भूमिका निभाया करते थे। उनकी प्रतिभा को देख कर उनकी माँ उन्हें प्रोत्साहित करती थीं। उन्होंने सूफ़ी संत सलमान यूसुफ़ से सूफ़ियाना रियाज़ सीखा। १२ वर्ष की आयु में उन्होंने महाराजा प्रताप सिंह के दरबार में एक मीरा भजन गा कर बहुत सारी तारीफ़ें बटोरी और महाराजा ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा था कि वो एक बहुत नामी गायक बनेंगे। पिता की मृत्यु के बाद उन पर घर की ज़िम्मेदारी आ गई और वे जलंधर, मुरादाबाद और लखनऊ होते हुए कलकत्ता आ पहुँचे। इसी दौरान उन्होंने कभी सेल्समैन का काम किया, कभी टाइप-राइटर का, तो कभी रेल्वे में टाइम कीपर का। कलकत्ते में ही उनकी मुलाक़ात हो गई अपने जलंधर परिचित संगीतकार हरीशचंद्र बाली से, जो उन्हें न्यु थिएटर्स ले गए और शुरु हो गई उनके जीवन की अगली पारी। १९३२ में 'मोहब्बत के आँसू' में काम करने के बाद १९३३ में उनका पहला ग़ैर-फ़िल्मी रेकॊर्ड जारी हुआ। तो दोस्तों, क्यों न इस शृंखला की शुरुआत हम उसी ग़ैर फ़िल्मी रचना से करें! संगीतकार हैं आर.सी. बोराल। सहगल साहब को लोकप्रियता की चोटी तक पहुँचाने में यदि किसी संगीतकार का नाम लिया जाएगा, तो बोराल साहब का नाम सब से उपर आयेगा।



क्या आप जानते हैं...
कि हरीशचंद्र बाली के सुझाव पर आर.सी. बोराल ने जब सहगल को न्यु थिएटर्स में रख लिया, तब उनकी पारिश्रमिक २०० रुपय प्रति माह तय हुई थी।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 2/शृंखला 13
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - गायक कुंदन लाल सहगल का एक और लोकप्रिय भजन.

सवाल १ - किस फिल्म का है ये गीत - १ अंक
सवाल २ - कौन थे इस फिल्म के नायक जो खुद भी एक जाने माने गायक थे - ३ अंक
सवाल ३ - ये किस निर्देशक की पहली हिंदी फिल्म थी - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी ने शानदार शुरूआत की है, साथ में प्रतीक जी और शरद जी ने भी अपना खाता खोला है, अमित जी हमने अपने सूत्रों से दुबारा कन्फर्म किया है और पंकज राग के तथ्यों पर विश्वास करना ही सही लग रहा है.इन चारों बहनों ने एक ही गीत में अपना स्वर मिलाया था उस गीत में....

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Thursday, March 17, 2011

सांवरिया मन भाये रे....कौन भूल सकता है पहली फीमेल सिंगिंग स्टार कानन देवी के योगदान को

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 615/2010/315

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार! हिंदी सिनेमा की कुछ सशक्त महिला कलाकारों, जिन्होंने सिनेमा में अपनी अमिट छाप छोड़ी और आनेवाली पीढ़ियों के लिए मार्ग-प्रशस्त किया, पर केन्द्रित लघु शृंखला में आज हम ज़िक्र करेंगे फ़िल्म जगत की पहली 'फ़ीमेल सिंगिंग् स्टार' कानन देवी की। कानन देवी शुरुआती दौर की उन अज़ीम फ़नकारों में से थीं जिन्होंने फ़िल्म संगीत के शैशव में उसकी उंगलियाँ पकड़ कर उसे चलना सिखाया। एक ग़रीब घर से ताल्लुख़ रखने वाली कानन बाला को फ़िल्म जगत में अपनी पहचान बनाने के लिए काफ़ी संघर्ष करना पड़ा। बहुत छोटी सी उम्र में ही उन्होंने अपने पिता को खो दिया था और अपनी माँ के साथ अपना घर चलाने के लिए तरह तरह के काम करने लगीं। जब वो केवल १० वर्ष की थीं, उनके एक शुभचिंतक ने उन्हें 'ज्योति स्टुडिओज़' ले गये और 'जयदेव' नामक मूक फ़िल्म में अभिनय करने का मौका दिया। यह १९२६ की बात थी। उसके बाद वो ज्योतिष बनर्जी की 'राधा फ़िल्म्स कंपनी' में शामिल हो गईं और 'चार दरवेश', 'हरि-भक्ति', 'ख़ूनी कौन' और 'माँ' जैसी फ़िल्मों में काम किया। उनके अभिनय और गायन को न्यु थिएटर्स ने पहचाना और पी.सी. बरुआ के मन में कानन बाला को १९३५ की अपनी महत्वाकांक्षी फ़िल्म 'देवदास' में अभिनय करवाने का ख़याल आया। लेकिन यह मनोकामना पूरी न हो सकी। बरुआ साहब ने ही दो साल बाद १९३७ में कानन बाला को मौका दिया फ़िल्म 'मुक्ति' में, जो काफ़ी हिट रही।

फ़िल्म 'मुक्ति' की सफलता के बाद कानन देवी और न्यु थिएटर्स का अनुबंध बढ़ता ही गया। सन् १९३७ में 'विद्यापति' में उनका अभिनय शायद उनके फ़िल्मी सफ़र का सर्वोत्तम अध्याय था जिसने उन्हें न्यु थिएटर्स का 'टॊप स्टार' बना दिया। 'मुक्ति' और 'विद्यापति' के अलावा न्यु थिएटर्स की कुछ और महत्वपूर्ण फ़िल्में जिनमें कानन देवी ने काम किया, वो हैं - 'स्ट्रीट सिंगर', 'जवानी की रीत', 'सपेरा', 'हार-जीत', और 'लगन'। फ़िल्म 'लगन' का पियानो वाला गीत अभी पिछले दिनों ही आप सुन चुके हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर। इन तमाम फ़िल्मों में केवल अभिनय से ही नहीं, अपनी सुरीली आवाज़ से भी उन्होंने लोगों का दिल जीता। कानन देवी ने बचपन में संगीत की कोई मुकम्मल तालीम नहीं ली। न्यु थिएटर्स में शामिल होने के बाद उस्ताद अल्लाह रखा से उन्होंने संगीत सीखा। मेगाफ़ोन ग्रामोफ़ोन कंपनी में उन्हें गायिका की नौकरी मिलने पर वहाँ उन्हें भीष्मदेव चटर्जी से सीखने का मौका मिला। अनादि दस्तिदार से उन्होंने सीखा रबीन्द्र संगीत और फिर रायचंद बोराल ने उन्हें गायकी की बारीकियाँ सिखाकर फ़िल्मीगायन के लिए पूरी तरह से तैयार कर दिया। कानन देवी से जुड़ी कुछ और बातें हम आपको बताएँगे फिर किसी दिन, फ़िल्हाल वक़्त हो चला है उनकी आवाज़ में एक गीत सुनने का। प्रस्तुत है उनकी पहली कामयाब फ़िल्म 'मुक्ति' से यह कामयाब गीत "सांवरिया मन भाये रे"।



क्या आप जानते हैं...
कि १९४८ में कानन देवी बम्बई आ गईं और इसी साल वो आख़िरी बार किसी फ़िल्म में नज़र आईं। यह फ़िल्म थी 'चन्द्रशेखर', जिसमें उनके नायक थे अशोक कुमार।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 06/शृंखला 12
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - गायिका हैं आशा भोसले.

सवाल १ - कौन हैं ये जिनका जिक्र होगा रविवार को - ३ अंक
सवाल २ - गीतकार कौन हैं जो इस फनकारा से संबंधित भी हैं - १ अंक
सवाल ३ - फिल्म की प्रमुख अभिनेत्री कौन है - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
फिर ३-३ अंक बाँट लिए अमित जी और अंजाना जी ने बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, February 14, 2011

तुम बिन कल न आवे मोहे.....पियानो की स्वरलहरियों में कानन की मधुर आवाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 592/2010/292

धुनिक पियानो के आविष्कार का श्रेय दिया जाता है इटली के बार्तोलोमियो क्रिस्तोफ़ोरी (Bartolomeo Chritofori) को, जो साज़ों के देखरेख के काम के लिए नियुक्त थे Ferdinando de' Medici, Grand Prince of Tuscany में। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, जैसा कि कल से हमने पियानो पर केन्द्रित शृंखला की शुरुआत की है, आइए पियानो के विकास संबंधित चर्चा को आगे बढ़ाते हैं। तो बार्तोलोमेओ को हार्प्सिकॊर्ड बनाने में महारथ हासिल थी और पहले की सभी स्ट्रिंग्ड इन्स्ट्रुमेण्ट्स संबंधित तमाम जानकारी उनके पास थी। इस बात की पुष्टि नहीं हो पायी है कि बार्तोलोमियो ने अपना पहला पियानो किस साल निर्मित किया था, लेकिन उपलब्ध तथ्यों से यह सामने आया है कि सन् १७०० से पहले ही उन्होंने पियानो बना लिया था। बार्तोलोमियो का जन्म १६५५ में हुआ था और उनकी मृत्यु हुई थी साल १७३१ में। उनके द्वारा निर्मित पियानो की सब से महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि उन्होंने पियानो के डिज़ाइन की तब तक की मूल त्रुटि का समाधान कर दिया था। पहले के सभी पियानो में हैमर स्ट्रिंग् पर वार करने के बाद उसी से चिपकी रहती थी जिसकी वजह से उत्पन्न ध्वनि कुछ बुझी हुई सी सुनाई पड़ती थी। लेकिन बार्तोलोमियो ने ऐसी तरकीब सूझी कि जिससे हैमर स्ट्रिंग् को स्ट्राइक करने के बाद उससे अलग हो जाएगी। और हैमर अपने पूर्व 'रेस्ट पोज़िशन' पे वापस लौट जाएगी बिना देर तक बाउन्स किए। इससे यह फ़ायदा हुआ कि किसी नोट को जल्दी जल्दी रिपीट करना भी आसान हो गया। बार्तोलोमियो के इस महत्वपूर्ण अभियंतिकी ने पियानो निर्माण का रुख ही मोड़ कर रख दिया। उसके बाद बनने वाले सभी पियानो में उनकी इस मूल तकनीक को अपनाया गया। बार्तोलोमियो क्रिस्तोफ़ोरी के पहले पहले के बनाये हुए साज़ों में पतली स्ट्रिंग्स का इस्तमाल होता था और आधुनिक पियानो के मुकाबले उनसे ध्वनियाँ भी कम शक्तिशाली उत्पन्न होती थी। लेकिन क्लैविकॊर्ड के मुकाबले वो शक्तिशाली थे और ध्वनि को देर तक सस्टेन कर सकते थे। अपने पियानो की ध्वनियों को और ज़्यादा शक्तिशाली बनाने के लिए उन्होंने एक नई साज़ का इजाद किया लेकिन दुर्भाग्यवश इस साज़ की तरफ़ ध्यान कम ही गया तब तक जब तक इटली के किसी लेखक, स्किपिओन माफ़ेइ ने १७११ में एक लेख प्रकाशित किया जिसमें इस नये साज़ के मेकनिज़्म को एक चित्र के माध्यम से समझाया। इस लेख का दूर दूर तक प्रचार हुआ और इस लेख को पढ़ने के बाद अगली पीढ़ी के पियानो निर्माताओं ने पियानो निर्माण का कार्य फिर से शुरु किया।

'पियानो साज़ पर फ़िल्मी परवाज़' शृंखला में कल ३० के दशक का गीत सुनने के बाद आइए आज क़दम रखते हैं ४० के दशक में और आपको सुनवाते हैं 'फ़ादर ऑफ फ़िल्म म्युज़िक डिरेक्टर्स', यानी कि फ़िल्म संगीतकारों के भीष्म पितामह की हैसियत रखने वाले राय चंद बोराल अर्थात आर. सी. बोराल की एक संगीत रचना। यह गीत है १९४१ की फ़िल्म 'लगन' का जिसे कानन देवी ने गाया है। फ़िल्म में सिचुएशन कुछ इस तरह का है कि कानन देवी को सहगल साहब के किसी कविता पर गीत गानें का अनुरोध किया जा रहा है, और कानन देवी पियानो पर बैठ कर यह गीत गाती हैं "तुम बिन कल न आवे मोहे"। इस गीत को लिखा है आरज़ू लखनवी साहब ने। आइए आज कुछ बातें हो जाए आर. सी. बोराल साहब की! १९०३ में तीन भाइयों के बीच सबसे छोटा रायचन्द बोराल का जन्म श्री लाल चन्द बोराल के घर हुआ। लाल चन्द जी अमीर तो थे ही, साथ ही कुशल संगीतज्ञ भी थे। अत: राय चन्द बोराल का मन भी स्वभावत: संगीत की ओर आकृष्ट हुआ। ऒल इण्डिया कॊन्फ़रेन्स का सर्वप्रथम उत्सव भी इनके घर से ही प्रारम्भ हुआ। पिता की मृत्यु के बाद पंडित विश्वनाथ राव से इन्होंने धमार की शिक्षा ली और उस्ताद मसीतुल्लाह ख़ाँ से तबले की। संगीत एवं धनी वातावरण से इनमें सुनहरे भविष्य की कल्पना जगी। किन्तु सफलता इन्हें न्यु थियेटर्स में प्रवेश करने के बाद ही मिली। दोस्तों, ये तमाम बातें मैंने अपनी लाइब्रेरी में संग्रहित 'लिस्नर्स बुलेटिन' पत्रिका के १९७५ के एक अंक से खोज निकाली और इस लेख को लिखा था निर्मल कुमार रवानी ने जो आसानसोल के रहने वाले थे उस वक़्त। राय चन्द बोराल जी के संगीत सफ़र के आगे का हाल हम फिर किसी दिन बताएँगे, आइए अब आज के गीत का आनंद लें कानन देवी की आवाज़ में।



क्या आप जानते हैं...
कि पियानो दरसल संक्षिप्त नाम (abbreviation) है बार्तेलोमेओ क्रिस्तोफ़ोरी के उस साज़ का जिसे 'पियानो ए फ़ोर्ट' (Piano E Forte) कहा जाता था, जिसका अर्थ है 'सॊफ़्ट ऐण्ड लाउड'।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 03/शृंखला 10
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -संगीतकार हैं अनिल बिस्वास .

सवाल १ - किस अभिनेता पर है ये गीत फिल्माया - 2 अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - गीतकार कौन हैं - 3 अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
जहाँ अंजना जी और अमित जी को जहाँ २ अंकों से संतुष्ट होना पड़ा विजय जी चुपके से ३ अंक लूट गए....बधाई....

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
विशेष सहयोग: सुमित चक्रवर्ती


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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