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Saturday, August 29, 2015

चित्रशाला - 03 : फ़िल्म-संगीत जगत में भाई-बहन की जोड़ियाँ

चित्रशाला - 03

फ़िल्म-संगीत जगत में भाई-बहन की जोड़ियाँ




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! प्रस्तुत है फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत के विभिन्न पहलुओं से जुड़े विषयों पर आधारित शोधालेखों का स्तंभ ’चित्रशाला’। आज रक्षाबंधन है, इस पावन अवसर पर हम अपने सभी पाठकों का हार्दिक अभिनन्दन करते हैं। दोस्तों, हिन्दी सिने संगीत जगत में कई भाई-बहन की जोड़ियों ने काम किया है। आज रक्षाबंधन के अवसर पर आइए ’चित्रशाला’ के ज़रिए याद करें कुछ ऐसे भाई-बहनों को जिन्होंने फ़िल्म संगीत को समृद्ध किया है।




क ही परिवार के दो भाई या दो बहनों के फ़िल्म संगीत जगत में काम करने के उदाहरण तो हमें बहुत से मिल जायेंगे, पर एक ही परिवार से एक भाई और एक बहन की जोड़ियों की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती है। फ़िल्म संगीत के शुरुआती दौर की तरफ़ चलें तो सबसे पहले जिस भाई-बहन की जोड़ी हमें याद आती है, वह है सुनहरे दौर के फ़िल्म संगीतकारों में भीष्म-पितामह की हैसियत रखने वाले संगीतकार अनिल बिस्वास और फ़िल्म संगीत की प्रथम पार्श्वगायिका पारुल घोष की जोड़ी। पारुल घोष अनिल दा से दो वर्ष छोटी थीं। भाई बहन दोनों में संगीत के बीज बोये उनकी माँ ने जिन्हें संगीत से बहुत लगाव था। पारुल का विवाह अनिल दा के मित्र और बांसुरी नवाज़ पंडित पन्नालाल घोष से सम्पन्न हुआ और संगीत की धारा बहती चली गई। भाई ने अपनी बहन को अपने द्वारा स्वरबद्ध किए हुए बहुत से गीत गवाए, जिनमें पारुल घोष का सबसे हिट गीत "पपीहा रे मेरे पिया से कहियो जाए" भी शामिल है।

अनिल बिस्वास - पारुल घोष के बाद जिस जोड़ी का ज़िक्र हमारे ज़हन में आता है, वह है पार्श्वगायिका गीता दत्त और कमचर्चित संगीतकार मुकुल रॉय की। मुकुल रॉय जो आजकल महाराष्ट्र के नासिक में रहते हैं, उन्होंने अपनी बहन गीता दत्त की जीवनी "Geeta Dutt - The Skylark" को प्रकाशित करने में लेखिका हेमन्ती बनर्जी की बहुत सहायता की है। मुकुल रॉय अपनी बहन की तरह कामयाब तो नहीं हुए, पर ’सैलाब’, ’डीटेक्टिव’ और ’भेद’ जैसी फ़िल्मों में उनके स्वरबद्ध गीत बहुत लोकप्रिय हुए थे। गीता दत्त की आवाज़ में ’डीटेक्टिव’ का "मुझको तुम जो मिले ये जहान मिल गया" और ’सैलाब’ का "है यह दुनिया कौन सी ऐ दिल" गली गली गूंजा करता था। मुकुल अपनी बहन के बहुत करीब थे और गीता दत्त की ज़िन्दगी में जब निराशा और हताशा ने घर कर लिया था, तब मुकुल ही थे जिन्होंने उनका हमेशा साथ दिया। गुरु दत्त और गीता दत्त की असामयिक मृत्यु के बाद इनकी संतानों - तरुण और अरुण - को मुकुल रॉय ने ही बड़ा किया। एक भाई का अपनी बहन के प्रति निस्वार्थ प्रेम का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है भला!

एक ऐसा परिवार जिसने फ़िल्म संगीत जगत को शायद सर्वाधिक योगदान दिया है, वह है मंगेशकर परिवार। चार बहनों और एक भाई ने मिल कर संगीत का ऐसा ताना-बाना बुना है कि फ़िल्म संगीत का जब भी इतिहास लिखा जाएगा, उसके कम से कम आधे हिस्से में इस परिवार के किसी ना किसी का उल्लेख रहेगा। मंगेशकर परिवार के बारे में नई बात बताने को अब कुछ बाक़ी नहीं बचा है। लता, मीना, आशा, उषा और हृदयनाथ - चार बहनें और एक भाई - स्वाभाविक है कि इन चारों दीदी से हृदयनाथ को अपार प्यार मिला। हालाँकि हृदयनाथ हिन्दी फ़िल्म जगत में ज़्यादा काम नहीं कर सके, पर मराठी और ग़ैर फ़िल्म-संगीत में उनका योगदान उल्लेखनीय है। लता, आशा और उषा ने उनके बहुत सी सुन्दर रचनाओं को कंठ दिया है। मंगेशकर परिवार में भाई-बहन का रिश्ता अगली पीढ़ी में भी जारी रहा। आशा की संताने - हेमन्त और वर्षा - जब संगीतकार और गायिका बनीं तब आशा की ख़ुशियों का ठिकाना न रहा। आशा के शब्दों में, "कोई भी क्षण ज़िन्दगी के ऐसे होते हैं जो भुलाये नहीं जा सकते, बड़े मज़ेदार होते हैं। मेरा लड़का हेमन्त, आप समझते होंगे माँ के लिए बेटा क्या चीज़ होता है, एक दिन वो म्युज़िक डिरेक्टर बन गया और मेरे पास आकर कहने लगा कि यह मेरा गाना है, तुम गाओ। कैसा लगता है ना? जो कल तक इतना सा था, आज वो मुझसे कह रहा है कि मेरा गाना गाओ। फिर उसने अपनी बहन, मेरी बेटी वर्षा से कहने लगा कि तुम्हे भी गाना पड़ेगा। वर्षा बहुत शर्मिली है, उसने कहा कि बड़ी मासी इतना अच्छा गाती है, माँ इतना अच्छा गाती है, मैं नहीं गाऊँगी। लेकिन हेमन्त ने बहुत समझाया और उसका पहला गाना रेकॉर्ड हुआ। मैं स्टुडियो पहुँची तो देखा कि लड़की माइक के सामने खड़ी है और उसका भाई वन-टू बोल रहा है। यह क्षण मैं कभी नहीं भूल सकती। और वह गाना था फ़िल्म ’जादू-टोना’ का "यह गाँव प्यारा-प्यारा..."।" अफ़सोस की बात है कि हेमन्त और वर्षा, दोनों में से किसी को भी सफलता नहीं मिली, और वर्षा ने तो हाल ही में आत्महत्या भी कर ली।

भाई-बहन का रिश्ता हमेशा ख़ून का ही रिश्ता हो यह ज़रूरी नहीं। लता मंगेशकर का मदन मोहन के साथ सगे भाई जैसा ही रिश्ता था। इस रिश्ते की शुरुआत और पहली बार राखी बंधवाने का क़िस्सा लता के शब्दों में कुछ यूं है - "मैं पहली बार मदन भ‍इया से उनका स्वरबद्ध कोई गीत गाने के लिए नहीं बल्कि उनके साथ एक डुएट गीत गाने के लिए मिली थी। मास्टर ग़ुलाम हैदर ने हम दोनो को फ़िल्म ’शहीद’ में एक भाई-बहन के रिश्ते के गीत को गाने के लिए बुलाया था जिसके बोल थे "पिंजरे में बुलबुल बोले मेरा छोटा सा दिल डोले..."। गीत के बाद हम दोनों ने एक दूसरे की तारीफ़ की और तुरन्त हमारे बीच एक जुड़ाव सा हो गया। उन्होंने मुझसे यह वादा लिया कि जब भी वो संगीतकार बनेंगे तो उनकी पहली फ़िल्म में मुझे गाना पड़ेगा। मैंने वादा किया। पर किसी कारण से मैं उनकी पहली फ़िल्म ’आँखें’ में नहीं गा सकी और हमारे मीठे रिश्ते में एक खटास आई। मदन भ‍इया का दिल टूट गया। पर कुछ ही दिनों में मदन भ‍इया हमारे घर आए और कहा कि हमारा रिश्ता भाई-बहन के एक प्यार भरे गीत से शुरु हुआ था, आज रक्षाबंधन है, मेरी कलाई पर यह राखी बाँधो और वादा करो कि हम हमेशा भाई-बहन रहेंगे और तुम हमेशा मेरे लिए गाओगी। उन्हें राखी बाँधते हुए मेरी आँखों से आँसू टपकने लगी।"

संगीत के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण परिवार रहा है पंडित जसराज जी का। सुलक्षणा, विजेता, जतिन और ललित उन्हीं के भतीजी/भतीजे हैं। जब जतिन और ललित फ़िल्म जगत में आए तब तक सुलक्षणा फ़िल्मों से संयास ले चुकी थीं। इसलिए सुलक्षणा द्वारा जतिन-ललित के किसी गीत के गाने की जानकारी नहीं है। छोटी बहन विजेता ने ज़रूर जतिन-ललित के निर्देशन में कुछ गीत गाई हैं जिनमें "जवाँ हो यारों यह तुमको हुआ क्या" (जो जीता वही सिकन्दर) और "सच्ची यह कहानी है" (कभी हाँ कभी ना) चर्चित रहे। मंगेशकर और पंडित परिवार के बाद अब ज़िक्र शिवराम परिवार का। संगीतकार पंडित शिवराम कृष्ण का नाम आज लोग लगभग भुला चुके हैं पर चार पीढ़ियों से उनका परिवार संगीत की सेवा में निरन्तर लगा हुआ है। संगीतकार जोड़ी जुगल किशोर और तिलक राज उन्हीं के बेटे हैं जिन्होंने ’भीगी पलकें’, ’समय की धारा’ आदि फ़िल्मों में संगीत दिया है। ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ को दिए एक साक्षात्कार में जुगल किशोर जी ने अपने परिवार के बारे में बताते हुए अपनी बहनों का भी उल्लेख किया था कुछ इस तरह - "तिलक राज तो मेरा ही छोटा भाई है। बचपन से ही हम दोनों साथ में संगीत की चर्चा भी करते थे और साथ ही में बजाते भी थे। अपने स्कूल के वार्षिक दिवस के कार्यक्रम के लिए दोनों साथ में मिल कर नए गाने कम्पोज़ करते थे और स्टेज पर साथ में गाते थे। हमने अपना ऑरकेस्ट्रा भी बनाया था 'जयश्री ऑरकेस्ट्रा' के नाम से। जयश्री मेरी छोटी बहन है। आपने जयश्री शिवराम का नाम सुना होगा जो एक प्लेबैक सिंगर रही है। 'रामा ओ रामा' फ़िल्म का शीर्षक गीत उसी ने ही गाया था। हम लोग आठ भाई बहने हैं और सभी के सभी फ़िल्म इंडट्री से किसी न किसी रूप में जुड़े हुए हैं। मैं वायलिनिस्ट, कम्पोज़र और सिंगर, तिलक राज कम्पोज़र और सिंगर, मुकेश शिवराम एक सिंगर है, भगवान शिवराम एक रिदम प्लेअर, पूर्णिमा परिहार एक सिंगर, नवीन शिवराम एक कीबोर्ड प्लेअर, तथा जयश्री शिवराम व निशा चौहान सिंगर्स। इस तरह से तीन पीढ़ियों से हमारा परिवार संगीत की सेवा में लगा हुआ है।" अपनी बहन के नाम पर ऑरकेस्ट्रा रखने वाले जुगल किशोर और तिलक राज ने अपनी बहन जयश्री को फ़िल्म ’समय की धारा’ और ’तेरे बिना क्या जीना’ में गीत गवाया था। मशहूर संगीतकार बप्पी लाहिड़ी ने बरसों पहले अपनी बेटी रीमा को लौन्च किया था, और अब हाल में उनके बेटे बप्पा ने भी फ़िल्म जगत में क़दम रख दिया है। नए-नए संगीतकार बने बप्पा लाहिड़ी ने बहन रीमा को अपनी पहली फ़िल्म ’जय वीरू’ में हार्ड कौर के साथ एक गीत गवाया है "ऐसा लश्कारा..."। 

अब तक जितने भी भाई-बहन जोड़ियों की हमने बातें की, उन सब में भाई संगीतकार और बहन गायिका हैं। अब ज़िक्र करते हैं उन भाई-बहन जोड़ियों की जिनमें भाई और बहन दोनो ही गायक/गायिका हैं। पहली जोड़ी है नाज़िया हसन और ज़ोहेब हसन की। नाज़िया और ज़ोहेब, दोनों का बचपन कराची और लंदन में बीता। 70 के दशक के अन्त में दोनो ने साथ मिल कर "संग संग चलें" और "कलियों का मेला" जैसे लोकप्रिय म्युज़िकल शोज़ में गाया। 1976 में दोनो नज़र आये Beyond the Last Mountain फ़िल्म के एक गीत में। नाज़िया हसन की पहली और बेहद कामयाब ऐल्बम ’डिस्को दीवाने’ में ज़ोहेब की भी आवाज़ शामिल थी। इसके बाद ’बूम बूम’ ऐल्बम भी ख़ूब चला, जिसके गाने ’स्टार’ फ़िल्म में लिया गया। बप्पी लाहिड़ी ने नाज़िया और ज़ेहेब से फ़िल्म ’शीला’ में गीत गवाये। नाज़िय को जितनी लोकप्रियता हासिल हुई, भाई ज़ोहेब को उतनी कामयाबी नहीं मिली। अफ़सोस की बात है कि मात्र 35 वर्ष की आयु में नाज़िया हसन इस दुनिया से चल बसीं और भाई-बहन की यह जोड़ी टूट गई। सरहद के इस पार इसी तरह की एक जोड़ी रही है शान और सागरिका की। पार्श्व गायन के क्षेत्र में क़दम जमाने से पहले संगीतकार मानस मुखर्जी के बेटे शान ने अपनी बड़ी बहन सागरिका के साथ मैगनासाउण्ड कंपनी के साथ एक अनुबन्ध किया और कई ग़ैर फ़िल्मी ऐल्बम्स में गाये जिनमें ’नौजवान’ और ’Q – Funk’ ख़ास चर्चित रहे। जिस तरह से बिद्दु ने नाज़िया और ज़ोहेब की जोड़ी को काफ़ी काम दिये, वैसे ही शान और सागरिका से भी बहुत से गीत और रीमिक्स गवाये। शान-सागरिका की जोड़ी भी बहुत ज़्यादा नहीं चल सकी क्योंकि शान पार्श्वगायन में व्यस्त हो गए और सागरिका का भी अपना अलग स्टाइल था। पर भाई-बहन के आपसी रिश्ते में कभी दरार नहीं आई। मशहूर पार्श्वगायिका अलका याज्ञनिक ने अपने भाई समीर याज्ञनिक के साथ मिल कर एक प्राइवेट ऐल्बम ’दिल था यहाँ अभी’ में गीत गाए। अपने भाई को बढ़ावा मिल सके इसी उद्देश्य से अलका ने यह ऐल्बम की जिसके गीत पसन्द तो बहुत किए गए पर समीर के करीयर को सँवारने में यह ऐल्बम असफल रही।

इस तरह से हर दशक में भाई-बहन की जोड़ियाँ हिन्दी फ़िल्म-संगीत जगत में आती रही हैं और शायद आगे भी आती रहेंगी, और यह परम्परा यूं ही चलती रहेगी। रक्षाबन्धन के शुभवसर पर आप सभी को एक बार फिर से बहुत सारी शुभकामनाएँ!


आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिए। आपके सुझावों के आधार पर हम अपने कार्यक्रम निर्धारित करते हैं। आप हमें radioplaybackindia@live.com के पते पर अपने सुझाव, समालोचना और फरमाइशें भेज सकते हैं।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी


Saturday, May 3, 2014

"आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी में आये...", सच में नाज़िया और बिद्दु ने बात बना दी थी इस गीत में


एक गीत सौ कहानियाँ - 30
 

'आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी में आये तो बात बन जाये...' 





'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कम सुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह साप्ताहिक स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 30वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'क़ुर्बानी' के गीत "आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी में आये..." के बारे में।




नाज़िया हसन
बिद्दु
डिस्को, यूरो-डिस्को और इण्डि-पॉप के नीव रखवाने और इन्हें लोकप्रियता की बुलन्दियों तक पहुँचाने में जिन कलाकारों का नाम लिया जाता है, उनमें एक महत्वपूर्ण नाम है बिद्दु का। बिद्दु अप्पय्या का जन्म कर्नाटक में हुआ। 60 के दशक में उन्होंने अपना करीयर एक म्युज़िक बैण्ड के रूप में यहीं से शुरु किया पर जल्द ही इंग्लैण्ड स्थानान्तरित हो गए और एक म्युज़िक प्रोड्युसर के रूप में कार्य करने लगे। पाँच दशक लम्बे उनके करीयर में उन्होंने संगीतकार, गीतकार, गायक और निर्माता की भूमिकाएँ निभाईं और बेहद चर्चित व सफल रहे। उनके द्वारा स्वरबद्ध "आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी में आये..." गीत के बारे में जानने से पहले यह ज़रूरी है कि इस गीत से पहले के उनके संगीत यात्रा पर नज़र डाली जाये। उनके द्वारा निर्मित पहला हिट गीत 1969 में जापानीज़ बैण्ड 'The Tigers' के लिए आया। उसके बाद 1972 में अंग्रेज़ी फ़िल्म 'Embassy' में उनके द्वारा रचा साउण्डट्रैक सराहा गया। इसके बाद उनके शुरुआती डिस्को गीतों ने 70 के दशक के आरम्भिक वर्षों में ब्रिटिश क्लबों में लोकप्रियता हासिल किये। उन्हें पहली बार अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति मिली 1974 में कार्ल डॉगलस द्वारा गाये "Kung Fu Fighting" गीत से जिसे उन्होंने प्रोड्युस और कम्पोज़ किया। दिलचस्प बात है कि उनके इस कम्पोज़िशन का प्रयोग लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने 1980 की फ़िल्म 'राम बलराम' में "यार की ख़बर मिल गई" गीत में किया। हैरत में डालने वाली एक और बात यह है कि "Kung Fu Fighting" के बनने के कई वर्ष पहले, 1966 में, तमिल संगीतकार एम. एस. विश्वनाथन ने तमिल फ़िल्म 'नदोदी' के लिए लगभग इसी धुन पर एक गीत कम्पोज़ किया था जिसके बोल थे "उलगम एलुगुम..."। क्या बिद्दु इस गीत से प्रेरित होकर "Kung Fu Fighting" की रचना की थी, कहना मुश्किल है। पर सच यही है कि इस गीत ने बिद्दु को विश्व भर में मशहूर बना दिया। इस गीत के एक करोड़ रेकॉर्ड्स बिके और यह न केवल एक 'all time best-selling singles' के रूप में मशहूर हुआ बल्कि इसने डिस्को संगीत को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। यूरोप की तरफ़ से अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार के लिए यह पहला डिस्को गीत था, और इसने बिद्दु को सबसे ज़्यादा चर्चित ग़ैर-अमरीकी डान्स-म्युज़िक प्रोड्युसर की उपाधि दिला दी।

फिर इसके बाद बिद्दु कामयाबी की नई-नई ऊँचाइयाँ चढ़ते चले गए। बहुत सारे रेकॉर्ड्स बने, जिनमें कई बेस्ट-सेलर्स भी रहे। 70 के ही दशक के अन्त में पाश्चात्य डिस्को एशिया में भी लोकप्रिय होने लगा। भारत में बप्पी लाहिड़ी ने डिस्को को लोकप्रिय बनाया, 'डिस्को डान्सर' फ़िल्म इसका सर्वाधिक महत्वपूर्ण उदाहरण है। पर उस दौरान भारत में ऐसा कोई कलाकार नहीं था जिसे "डिस्को स्टार" कहा जा सके। और यही वजह 1979 में फ़िल्मकार फ़िरोज़ ख़ान को इंगलैण्ड ले गया बिद्दु के पास। फ़िरोज़ ख़ान चाहते थे कि उनकी अगली फ़िल्म 'कुर्बानी' में एक ऐसा गीत रहे जिसे सुनते ही लोग उससे जुड़ जाये और ज़ुबाँ-ज़ुबाँ पर फ़ौरन चढ़ जाये। फ़िल्म के मुख्य संगीतकार के रूप में कल्याणजी-आनन्दजी काम कर रहे थे, पर फ़िरोज़ ख़ान को जिस गीत की तलाश थी वो नहीं मिल पा रही थी। शुरु-शुरु में बिद्दु किसी हिन्दी फ़िल्मी गीत कपोज़ करने के लिए तैयार नहीं थे, पर सोच विचार के बाद फ़िरोज़ ख़ान के इस ऑफ़र को स्वीकारते हुए कहा कि शायद इससे मेरी माँ, जो कि भारत में है, ख़ुश हो जायेगी। बिद्दु को "आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी में आये" तैयार करने में समय नहीं लगा। इस गीत की धुन उनकी पहली कई धुनों से मेल खाती है। ख़ास कर 1976 की टिना चार्ल्स का हिट गीत "Dance Little Lady Dance" से इस गीत का स्वरूप काफ़ी हद तक मेल खाता है।


नाज़िया और ज़ोहेब
फिरोज खान
इन्हीं दिनो फ़िरोज़ ख़ान के एक दोस्त ने उनकी मुलाक़ात 15-वर्षीया नाज़िया हसन से करवाई लंदन की किसी पार्टी में। जिस तरह से बिद्दु मूल रूप से भारतीय थे, वैसे ही नाज़िया हसन पाक़िस्तानी मूल की थीं, और इंग्लैण्ड में पल-बढ़ रही थीं। 70 के दशक में नाज़िया ने पाक़िस्तान में बतौर बाल-गायिका कई गीत गा चुकी थीं। तो उस पार्टी में ख़ान साहब ने नाज़िया को गाते हुए सुना, उनकी आवाज़ उन्हें पसन्द आई, और नाज़िया से कहा कि वो बिद्दु के पास जा कर एक ऑडिशन दे आये। "आप जैसा कोई..." गीत के लिए जिस आवाज़ की ज़रूरत थी, वह आवाज़ नाज़िया के गले में बिद्दु ने पायी, और फ़ौरन इस गीत के लिए उन्हें चुन लिया। नाज़िया ने यह प्रस्ताव हाथों-हाथ ग्रहण किया। इन्दीवर के लिखे लगभग 3 मिनट 45 सेकण्ड्स अवधि के इस गीत को फ़िल्म में एक आइटम नंबर के रूप में दर्शाया गया और इसे ज़ीनत अमान पर फ़िल्माया गया है। नाज़िया हसन की आवाज़ नैज़ल थी। बिद्दु ने इको ईफ़ैक्ट के लिए इसे बैकट्रैक करने की सोची। लंदन में इस गीत की रेकॉर्डिंग हुई और फ़िल्म-संगीत इतिहास का यह वह पहला गीत था जिसकी रेकॉर्डिंग कुल 24 ट्रैक पर हुई। 1980 में रिलीज़ हुई 'क़ुर्बानी'। फ़िल्म सुपर-डुपर हिट हुई, और इसके गानें भी उतने ही लोकप्रिय हुए। "लैला ओ लैला" और "आप जैसा कोई" गीतों को सर्वाधिक लोकप्रियता मिली। नाज़िया हसन रातों-रात मशहूर हो गईं। सिर्फ़ भारत में ही नहीं, समूचे दक्षिण एशिया में इस गीत ने हलचल पैदा कर दी। उस वर्ष 'बिनाका गीतमाला' के वार्षिक काउण्टडाउन में 'क़ुर्बानी' के कुल चार गीत शामिल थे। 26 और 27 पायदान पर "अल्लाह को प्यारी है क़ुर्बानी" और "क्या देखते हो सूरत तुम्हारी" थे, 6 पर "लैला मैं लैला" तथा 4 पर रहा "आप जैसा कोई..."। इस गीत ने उस वर्ष कई मशहूर गीतों को पीछे छोड़ दिया जैसे कि "परदेसिया यह सच है पिया", "हमें तुमसे प्यार कितना", "छू कर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा", "आनेवाला पल जानेवाला है", "जब छाये मेरा जादू" आदि। उस वर्ष फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ गायिका के लिए जिन पाँच गायिकाओं का नामांकन हुआ, वो सभी नई पौध की गायिकायें थीं। "आप जैसा कोई" के लिए नाज़िया तो थीं ही, इसी फ़िल्म की "लैला मैं लैला" के लिए कंचन, 'आप तो ऐसे न थे' फ़िल्म के "तू इस तरह से मेरी ज़िन्दगी में शामिल है" के लिए हेमलता, 'गृहप्रवेश' फ़िल्म के "पहचान तो थी" के लिए चन्द्राणी मुखर्जी और 'प्यारा दुश्मन' फ़िल्म के "हरि ओम हरि" के लिए उषा उथुप के बीच टक्कर थी। और विजेता बनी नाज़िया हसन। नाज़िया न केवल पहली पाक़िस्तानी गायिका थीं जिसने किसी हिन्दी फ़िल्म के लिए गाया, बल्कि 15 वर्ष की आयु में फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कार जीतने वाली सबसे कम आयु की गायिका होने का रेकॉर्ड भी कायम किया।

"आप जैसा कोई" की अपार सफलता को देखते हुए बिद्दु ने नाज़िया हसन और उनके भाई ज़ोहेब हसन को लेकर एक उर्दू पॉप ऐल्बम बनाने की सोची। इस तरह का कोई ऐल्बम इससे पहले भारतीय उपमहाद्वीप में नहीं आया था। बिद्दु ने नाज़िया और ज़ोहेब को उस समय के अमरीकी लोकप्रिय भाई-बहन जोड़ी 'The Carpenters' जैसी शक्ल देने की कोशिश की। बिद्दु ने "आप जैसा कोई" की तरह कुछ गीत कम्पोज़ कर 'डिस्को दीवाने' नामक ऐल्बम में जारी किया 1981 में। एशिया, दक्षिण अफ़्रीका और दक्षिण अमरीका के देशों में इसने ख़ूब लोकप्रियता हासिल की। तब तक कि यह एशिया की 'बेस्ट-सेलर' ऐल्बम रही है। हर कलाकार का अपना समय होता है, अपना दौर होता है जब वो आसमान की बुलन्दियों को छूता है। बिद्दु और नाज़िया का भी यह वही समय था। डिस्को की लोकप्रियता भी उस वक़्त सर चढ कर बोल रही थी। आज वह दौर गुज़र चुका है। नाज़िया भी अल्लाह को प्यारी हो चुकी हैं बहुत ही कम उम्र में। लेकिन जब-जब डिस्को के दौर का ज़िक्र होगा, तब-तब बिद्दु और नाज़िया हसन के इन गीतों का ज़िक्र होगा। और इस ज़िक्र में "आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी में आये" सबसे उपर आयेगा। बस, इतनी सी है इस गीत की कहानी! अब आप यह गीत सुनिए।



फिल्म - कुर्बानी : 'आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी में आये...' : गायिका - नाज़िया हसन : संगीत - बिद्दू : गीत - इन्दीवर





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खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

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