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Friday, August 11, 2017

गीत अतीत 25 || हर गीत की एक कहानी होती है || कहना ही क्या || बोम्बे || महबूब || ऐ आर रहमान || के एस चित्रा

Geet Ateet 25
Har Geet Kii Ek Kahaani Hoti Hai...
(Silver Jubilee Episode)
Kehna Hi Kya
Bombay
Mehboob 
Also featuring A R Rahman & K S Chitra


"मणि सर ने जैसे मेरा चेहरा पढ़ लिया था, पूछने लगे महबूब क्या बात है , क्या तुम गाने से खुश नहीं हो ?" -    महबूब  

गीत अतीत ; हर गीत की एक कहानी होती है के इस सिल्वर जुबली एपिसोड में पेश है सदाबहार क्लासिक गीत "कहना ही क्या" के बनने की ऐसी दिलचस्प दास्ताँ जिससे बहुत कम ही संगीत प्रेमी वाकिफ होंगें. लीजेंडरी गीतकार महबूब साहब आज हैं हमारे मेहमान. जानिए क्यों हम मनीषा कोइराला को इस गीत में थिरकते देखने से वंचित रह जाते अगर महबूब भाई के सुझाव को मणि रत्नम ने नहीं माना होता, प्ले पर क्लिक करे और अभी सुनें...




डाउनलोड कर के सुनें यहाँ से....

सुनिए इन गीतों की कहानियां भी -
हौले हौले (गैर फ़िल्मी सिंगल)
कागज़ सी है ज़िन्दगी (जीना इसी का नाम है) 
बेखुद (गैर फ़िल्मी सिंगल)
इतना तुम्हें (मशीन) 
आ गया हीरो (आ गया हीरो)
ये मैकदा (गैर फ़िल्मी ग़ज़ल)
पूरी कायनात (पूर्णा)
दम दम (फिल्लौरी)
धीमी (ट्रैपड) 
कारे कारे बदरा (ब्लू माउंटेन्स)
रेज़ा रेज़ा (सलाम मुंबई)

Friday, August 4, 2017

गीत अतीत 24 || हर गीत की एक कहानी होती है || बे नजारा || मॉम || सुदीप जयपुरवाले || ऐ आर रहमान

Geet Ateet 24
Har Geet Kii Ek Kahaani Hoti Hai...
Benazara
Mom
Sudeep Jaipurwale
Also featuring A R Rahman


"जैसे एक्टर कई कई महीने किसी ख़ास फिल्म के लिए अपनी बॉडी पर काम करते हैं, मैंने इस टप्पे को गाने के लिए ६ महीने तक सिर्फ टप्पे का रियाज़ किया है " -    सुदीप जयपुरवाले 

फ़िल्मी गीतों में शास्त्रीय गायन की परंपरा को वापस लेकर आये हैं ऐ आर रहमान, फिल्म "मॉम" की बंदिश "बे नज़ारा" के साथ. इस राग आधारित गीत को स्वरों की बुलंदी दी है सुदीप जयपुरवाले ने. आज गीत अतीत : हर गीत की एक कहानी होती है, में मिलिए सुदीप से और सुनिए इस टप्पा गीत के बनने की कहानी. जानिये क्या कहा था रहमान ने सुदीप के दादा जी के गाये टप्पे को सुनकर. प्ले पर क्लिक करें और सुनें.




डाउनलोड कर के सुनें यहाँ से....

सुनिए इन गीतों की कहानियां भी -
हौले हौले (गैर फ़िल्मी सिंगल)
कागज़ सी है ज़िन्दगी (जीना इसी का नाम है) 
बेखुद (गैर फ़िल्मी सिंगल)
इतना तुम्हें (मशीन) 
आ गया हीरो (आ गया हीरो)
ये मैकदा (गैर फ़िल्मी ग़ज़ल)
पूरी कायनात (पूर्णा)
दम दम (फिल्लौरी)
धीमी (ट्रैपड) 
कारे कारे बदरा (ब्लू माउंटेन्स)
रेज़ा रेज़ा (सलाम मुंबई)

Wednesday, August 3, 2016

"मेरे लिए प्लेबैक सिंगर बनना मतलब रहमान सर के लिए गाना था"-साशा तिरुपति : एक मुलाक़ात ज़रूरी है

एक मुलाकात ज़रूरी है (22)

वैंकोवर से माया नगरी मुंबई तक का सफ़र तय किया, ए आर रहमान के 'गुरु' फिल्म के गीतों को सुनकर प्रेरित हुई बेहद सुरीली आवाज़ की मालकिन गायिका साशा तिरुपति ने. बॉलीवुड में ढेरों हिट गीतों का गाने वाली साशा का ताज़ा गीत अभी हाल ही में रिलीस हुआ है - सरसरिया, बेहद महत्वकांक्षी फिल्म "मोहनजो दारो" की एल्बम से. बेहद दिलचस्प कहानी है साशा की, मिलिए इसी खूबसूरत आवाज़ की धनी गायिका से आज कार्यक्रम "एक मुलाकात ज़रूरी है" में...



एक मुलाकात ज़रूरी है इस एपिसोड को आप यहाँ से डाउनलोड करके भी सुन सकते हैं, लिंक पर राईट क्लीक करें और सेव एस का विकल्प चुनें 

Friday, August 15, 2014

जब रहमान के दिल से निकला नाद वन्दे मातरम का...

पोडकास्ट सिरीस - हिंदी के 50 श्रेष्ठ गैर फ़िल्मी एलबम्स

एपिसोड # 01 - वन्दे मातरम : ए आर रहमान  
स्क्रिप्ट - विश्व दीपक 
प्रस्तोता - सजीव सारथी  


Friday, February 21, 2014

आईये घूम आयें बचपन की गलियों में इन ताज़ा गीतों के संग

ताज़ा सुर ताल - 2014 -07 - बचपन विशेष 

जेब (बाएं) और हनिया 
ताज़ा सुर ताल की एक और कड़ी में आपका स्वागत है, आज जो दो नए गीत हम चुनकर लाये हैं वो यक़ीनन आपको आपके बचपन में लौटा ले जायेगें. हाईवे  के संगीत की चर्चा हमने पिछले अंक में भी की थी, आज भी पहला गीत इसी फिल्म से. दोस्तों बचपन की सबसे खूबसूरत यादों में से एक होती है माँ की मीठी मीठी लोरियाँ जिसे सुनते हुए कब बरबस ही नींद आँखों में समा जाती थी पता भी नहीं चलता था. इन दिनों फिल्मों में लोरियाँ लौट सी आई है, तभी तो राऊडी राठोड  जैसी जबरदस्त व्यवसायिक फिल्मों में भी लोरियाँ सुनने को मिल जाती हैं. पर यकीन मानिये हाईवे की ये लोरी अब तक की सुनी हुई सब लोरियों से अल्हदा है, इस गीत में गीतकार इरशाद की मेहनत खास तौर पे कबीले तारीफ है. सुहा यानी लाल, और साहा यानी खरगोश, माँ अपने लाडले को लाल खरगोश कह कर संबोधित कर रही है, शब्दों का सुन्दर मेल इरशाद ने किया है उसका आनंद लेने के लिए आपको गीत बेहद ध्यान से सुनना पड़ेगा. रहमान की धुन ऐसी कि सुन कर उनके कट्टर आलोचक भी भी उनकी तारीफ किये बिना नहीं रह पायेगें. आखिर यूहीं तो नहीं उन्हें देश का सर्वश्रेष्ठ संगीतकार कहा जाता है. एक और आश्चर्य है अलिया भट्ट की मधुर आवाज़, ये नटखट सी दिखने वाली लड़की इतना सुरीला भी गा सकती है यकीन नहीं होता, वैसे गीत में प्रमुख आवाज़ है पाकिस्तानी गायिका जेब की. ज़बुनिषा बंगेश, हनिया असलम के साथ मिलकर एक संगीत बैंड चलाती है, और उनकी आवाज़ की खनक वाकई बेमिसाल है. मैंने तो जब से ये गीत सुना है मेरे मोबाईल पर यही गीत इन दिनों लूप में चलता रहता है, मुझे यकीन है कि आप को भी ये गीत बचपन की बाहों में ले जायेगा, जहाँ माँ की लोरी में दुनिया समाती थी और बेफिक्र नींदों पलकों पे तारी हो जाया करती थी. लीजिए सुनिए - सुहा साहा...  


प्रीतम 
चलिए आगे बढते हैं बचपन के सपनों की तरफ, जो कुछ चुलबुले से होते हैं तो कुछ बवाले से. शादी के साईड एफ्फेक्ट्स  में दो बहुत ही प्रतिभाशाली और लीक से अलग चलने वाले फरहान अख्तर और विध्या बालन एक साथ आ रहे हैं. फिल्म में संगीत है हिट मशीन प्रीतम दा का. गीत लिखे हैं स्वानंद किरकिरे ने. वैसे इस गीत का एक संस्करण मोहित चौहान की आवाज़ में भी है पर हम आपके लिए लेकर आये हैं नन्हीं गायिका डीवा का गाया ये बच्चों वाला संस्करण, जो बहुत ही प्यारा और मधुर है. गीतकार स्वानंद किरकिरे ने हाल में दिए एक साक्षात्कार में बताया है कि इस गीत को लिखते हुए वो खुद भी रो पड़े थे. वैसे स्वानंद और सपनों का रिश्ता यूँ भी पुराना है. बावरा मन फिर से  चला सपने देखने  ... तो लीजिए आनंद लीजिए इस ताज़ा गीत का भी.  

Friday, February 14, 2014

बॉलीवुड में उतरी नूरां बहनें तो शेखर रव्जिवानी भी पहुंचें माईक के पीछे

ताज़ा सुर ताल # 2014-06


खुद गायक सोनू निगम मानते हैं कि संगीतकार विशाल ओर शेखर न सिर्फ एक बहतरीन संगीतकार जोड़ी है बल्कि दोनों ही बहुत बढ़िया गायक भी है. विशाल तो अन्य बड़े संगीतकारों जैसे शंकर एहसान लॉय और विशाल भारद्वाज के लिए भी गायन कर चुके हैं. आज हम सुनेगें, इस जोड़ी के दूसरे संगीतकार की रूमानी गायिकी. दोस्तों क्या आप जानते हैं कि विशाल दादलानी और शेखर रव्जिवानी को प्यार में कभी कभी  के लिए अलग अलग तौर पर संगीतकार चुना गया था, चूँकि दोनों एक दूसरे से परिचित थे तो इन्होने अपनी अपनी धुनों को एक दूसरे के साथ बांटा और इसी दौरान उन्हें महसूस हुआ कि वो मिलकर कुछ बड़ा धमाल कर सकते हैं. यहीं से शुरुआत हुई विशाल शेखर की ये जोड़ी. ओम शान्ति ओम  के बाद वो शाहरुख के पसंदीदा संगीतकारों में आ गए, और पिछले ही साल चेन्नई एक्सप्रेस  की कामियाबी ने इस समीकरण को और मजबूत कर दिया. शाहरुख के साथ साथ निर्देशक करण जौहर भी उनके खास मुरीद रहे हैं, करण द्वारा निर्मित बहुत सी फिल्मों में विशाल शेखर सुरों का जादू चला चुके हैं. इसी कड़ी की ताज़ा पेशकश है हँसी तो फँसी  जहाँ विशाल शेखर के साथ जुड़े हैं गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य. शेखर ने इस रोमांटिक गीत के लिए अमिताभ से एक कैची शब्द की फरमाईश की. अमिताभ ने उन्हें शब्द दिया बेतहाशा, मगर तभी उन्हें एक और शब्द भी याद आया जहेनसीब , इस शब्द के आस पास जब शेखर ने धुन संवारी तो उन्होंने बेतहाशा को भी मुखड़े में रखा, क्योंकि अमिताभ का सुझाया ये पहला शब्द भी उन्हें बेहद पसंद आया था. तो लीजिए सुनिए जेहनसीब जिसे गाया है खुद शेखर ने, साथ दिया है चिन्मई श्रीपदा ने.
     

आज के एपिसोड का दूसरा गीत वो है जिसका बहुत दिनों से इन्तेज़ार था, तब से, जब से इरशाद कामिल ने फेसबुक पर इस गीत की रिकॉर्डिंग की खबर दी और नूरां बहनों की तारीफ की थी. नूरां बहनें यानी ज्योति और सुल्ताना नाम की दो कमसिन उम्र गायिकाएं, जिनकी आवाज़ और अदायगी बड़े बड़े सूफी गायकों को भी हैरत में डाल चुकी है. ऐसा लगता है जैसे ये आवाजें कई जन्मों से खलाओं में गूँज रही थी, और सदियों का रियाज़ इन्हें कुदरती तौर पर नसीब हो गया हो. एम् टी वी पर जुगनी  गाकर मशहूर हुई नूरां बहनें सीधे ही रहमान के स्टूडियो में दाखिल हुई और पटखा गुडिये  जैसा अनूठा गीत श्रोताओं के लिए तैयार हो गया. ये है फिल्म हाईवे  के लिए रहमान और इरशाद कामिल का तोहफा. वैसे आपको बताते चलें कि पहले इम्तियाज़ अली की इस नई फिल्म के लिए संगीत के नाम पर सिर्फ पार्श्व संगीत तक सीमित रहने का ही इरादा था, पर सौभाग्य से फिल्म की टीम ने इस फैसले को बदल दिया और अब इस एल्बम में है ९ एकदम ताज़े गीत, जिनका जिक्र हम आगे भी करेगें, फिलहाल सुनिए सूफी संगीत का ये जादू. 


Monday, June 17, 2013

जब रहमान और इरशाद साथ साथ आयें तो कोई 'नज़र लाये न' इस जोड़ी को

आर रहमान यानी समकालीन बॉलीवुड संगीत का बेताज बादशाह. लंबे समय तक शीर्ष पर राज करने के बाद रहमान इन दिनों सिर्फ चुनिन्दा फ़िल्में ही कर रहे हैं, यही कारण है कि संगीत प्रेमियों को उनकी हर नई एल्बम का बेसब्री से इंतज़ार रहता है. उनसे उम्मीदें इतनी अधिक बढ़ गयी हैं कि संगीत प्रेमियों को कुछ भी कम स्वीकार्य नहीं होता. ऐसे में उनकी नई प्रस्तुति राँझना  संगीत के कद्रदानों और उनके चहेतों की कसौटी पर कितना खरा उतर पायी है, आईये आज ज़रा इसी बात की तफ्तीश करें. राँझना  में गीत लिखे हैं इरशाद कामिल ने, जिनके साथ रहमान रोक स्टार  में जबरदस्त हिट गीतों की बरसात कर चुके हैं. 
इससे पहले कि हम राँझना  के गीतों की बात करें, हम आपको बता दें कि रहमान का संगीत सामान्य से कुछ अलग रहता है तो उस पर राय बनाने से पहले कम से कम ५-६ बार उन गीतों को अवश्य सुनें. नये गायक जसविंदर सिंह और शिराज उप्पल के स्वरों में शीर्षक गीत एक ऊर्जा से भरा गीत है. धुन बेहद 'कैची' है और संयोजन में रहमान से भारतीय वाद्यों को पाश्चात्य वाद्यों से साथ बेहद खूबसूरती से मिलाया है. इरशाद के शब्द अच्छे हैं.
पखावज और बांसुरी के मधुर स्वरों में मिश्री की तरह घुल जाती है श्रेया घोषाल की आवाज़, बनारसिया  फिल्म के एक प्रमुख पात्र के रूप में शहर बनारस को स्थापित करती है. शब्दों का बहतरीन जाल बिछाया है इरशाद ने यहाँ...तबले की थाप से समां और भी सुरीला हो जाता है जब गीत अंतरे तक आता है...अगला गीत पिया मिलेंगें  एक सूफी रोक्क् गीत है, जहाँ सुखविंदर की आवाज़ एक शांत समुन्दर की तरह फैलती है, रहमान संयोजन को बेहद सरल रखते हैं ताकि गीत के पंच तक आते आते कोरस का स्वर मुखरित होकर सामने आये....अकल के परदे पीछे कर दे  तोहे पिया मिलेंगें ....खूबसूरत अलफ़ाज़...
बनारसिया  की ही तरह एक और भारतीय रंग में रंग गीत है ए सखी  जिसमें चिन्मया, मधुश्री और सहेलियों के मिश्रित स्वरों में संवाद रुपी शब्द रचना हैं गीत की. कभी है वादी कभी संवादी ....जैसे फ्रेस से इरशाद एक खूबसूरत समां बांध देते हैं. गायिकाओं की आवाज़ में शहनाई जैसे वाद्यों के स्वर मुहँ से बनाकर निकलना गीत को और भी सुरीला बना देता है.... अगला गीत नज़र लाये न  रशीद अली और नीति मोहन की आवाजों में एक खूबसूरत रोमांटिक गीत है जहाँ समर्पण और अपने प्रेम को अपने तक समेट कर रखने की भावनाएं निखर कर सामने आती है. 
रहमान और रब्बी शेरगिल पहली बार एक साथ आये हैं तू मन शुधि  में, आरंभिक पर्सियन शब्दों के बाद गीत रब्बी के अनूठे उच्चारण वाले पंजाबी शब्दों में आगे बढ़ता है. मेरे ख़याल से ये एल्बम का सबसे शानदार गीत है. जब रब्बी गाते हैं हमसे वफाएं लेना  तो कदम ही नहीं दिल भी थिरक उठते हैं....खुद रहमान माइक के पीछे आते हैं अगले गीत ऐसे न देखो  के लिए, इस गीत की धुन और संयोजन जाने तू या जाने न  के शीर्षक गीत की याद दिला जाता है. धुन में नयेपन की कमी है पर रहमान की गायिकी उच्चतम स्तर की है जो श्रोताओं को स्वाभाविक ही गीत से जोड़ देता है, पर यहाँ बाज़ी मारी है इरशाद ने, शब्द देखिये - मैं उन लोगों का गीत, जो गीत नहीं सुनते, पतझर का पहला पत्ता , रेगिस्तान में खोया आँसू....वाह....
एक बार फिर बनारस का पार्श्व उभरता है इंस्ट्रूमेंटल लैंड ऑफ शिवा  में, मन्त्रों के उच्चारण की पृष्ठभूमि में ये छोटा सा संगीत का टुकड़ा अगर कुछ और लंबा होता तो आनंद आ जाता. अंतिम गीत तुम तक  में प्रमुख आवाज़ है रशीद अली की. ये गीत भी एक प्रेमी के एकतरफा समर्पण की दास्ताँ है मगर ये समर्पण भी एक जश्न है यहाँ...सरल धुन के चलते ये गीत एल्बम के अन्य गीतों से अधिक लोकप्रिय हो सकता है. भाई हमारी राय में रहमान और इरशाद की ये टीम संगीत प्रेमियों की उम्मीदों पर खरा उतरी  हैं. पर जैसा की हमने पहले कहा कि ये गीत आपसे कुछ सब्र चाहते हैं...ये वो गीत हैं जो धीरे धीरे आपके दिल में उतरेंगें और अगर इस मामले ये सफल रहे जो कि फिल्म की सफलता पर भी बहुत अधिक निर्भर करता है, तो फिर यक़ीनन वहाँ से कभी नहीं उतरेगें. 
एल्बम के बहतरीन गीत -
राँझना , बनारसिया, ए सखी, नज़र लाये न , तू मन शुधि, तुम तक  
हमारी रेटिंग  - ४.६ / ५          


संगीत समीक्षा - सजीव सारथी

आवाज़ - अमित तिवारी 
यदि आप इस समीक्षा को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
  

Friday, January 6, 2012

आज का कलाकार - ए. आर. रहमान- जन्मदिन मुबारक

आज ६ जनवरी जन्मदिन है ए. आर. रहमान का.


जन्म के समय उनका नाम ए एस दिलीप कुमार था जिसे बाद में बदलकर वे ए आर रहमान बने.सुरों के बादशाह रहमान ने हिंदी के अलावा अन्य कई भाषाओं की फिल्मों में भी संगीत दिया है. टाइम्स पत्रिका ने उन्हें मोजार्ट ऑफ मद्रास की उपाधि दी. रहमान गोल्डन ग्लोब अवॉर्ड से सम्मानित होने वाले पहले भारतीय हैं.ए. आर. रहमान ऐसे पहले भारतीय हैं जिन्हें ब्रिटिश भारतीय फिल्म स्लम डॉग मिलेनियर में उनके संगीत के लिए तीन ऑस्कर नामांकन हासिल हुआ.इसी फिल्म के गीत जय हो... के लिए सर्वश्रेष्ठ साउंडट्रैक कंपाइलेशन और सर्वश्रेष्ठ फिल्मी गीत की श्रेणी में दो ग्रैमी पुरस्कार मिले.
रहमान ने संगीत की आगे की शिक्षा मास्टर धनराज से प्राप्त की और मात्र ११ वर्ष की उम्र में अपने बचपन के मित्र शिवमणि के साथ रहमान बैंड रुट्स के लिए की-बोर्ड (सिंथेसाइजर) बजाने का कार्य करते. 

वे इलियाराजा के बैंड के लिए काम करते थे.१९९१ में रहमान ने अपना खुद का म्यूजिक रिकॉर्ड करना शुरु किया.११९२ में उन्हें फिल्म डायरेक्टर मणिरत्नम की फिल्म रोजा में संगीत देने का मौका मिला.उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.आज वे विश्व के टॉप टेन म्यूजिक कंपोजर्स में गिने जाते हैं.उन्होंने तहजीब, बॉम्बे, दिल से, रंगीला, ताल, जींस, पुकार, फिजा, लगान, मंगल पांडे, स्वदेश, रंग दे बसंती, जोधा-अकबर, जाने तू या जाने ना, युवराज, स्लम डॉग मिलेनियर, गजनी जैसी फिल्मों में संगीत दिया है.

ए. आर. रहमान को रेडियो प्लेबैक इंडिया की ओर से जन्मदिन की शुभकामनाएँ उनके ही संगीतबद्ध १० गीतों के माध्यम से.



Wednesday, December 8, 2010

है जिसकी रंगत शज़र-शज़र में, खुदा वही है.. कविता सेठ ने सूफ़ियाना कलाम की रंगत हीं बदल दी है

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #१०५

ससे पहले कि हम आज की महफ़िल की शुरूआत करें, मैं अश्विनी जी (अश्विनी कुमार रॉय) का शुक्रिया अदा करना चाहूँगा। आपने हमें पूरी की पूरी नज़्म समझा दी। नज़्म समझकर हीं यह पता चला कि "और" कितना दर्द छुपा है "छल्ला" में जो हम भाषा न जानने के कारण महसूस नहीं कर पा रहे थे। आभार प्रकट करने के साथ-साथ हम आपसे दरख्वास्त करना चाहेंगे कि महफ़िल को अपना समझें और नियमित हो जाएँ यानि कि ग़ज़ल और शेर लेकर महफ़िल की शामों (एवं सुबहों) को रौशन करने आ जाएँ। आपसे हमें और भी बहुत कुछ सीखना है, जानना है, इसलिए उम्मीद है कि आप हमारी अपील पर गौर करेंगे। धन्यवाद!

आज हम अपनी महफ़िल को उस गायिका की नज़र करने वाले हैं, जो यूँ तो अपनी सूफ़ियाना गायकी के लिए मक़बूल है, लेकिन लोगों ने उन्हें तब जाना, तब पहचाना जब उनका "इकतारा" सिद्दार्थ (सिड) को जगाने के लिए फिल्मी गानों के गलियारे में गूंज उठा। एकबारगी "इकतारा" क्या बजा, फिल्मी गानों और "पुरस्कारों" का रूख हीं मुड़ गया इनकी ओर। २००९ का ऐसा कौन-सा पुरस्कार है, ऐसा कौन-सा सम्मान है, जो इन्हें न मिला हो!

इन्हें सुनकर एक अलग तरह की अनुभूति होती है.. ऐसा लगता है मानो आप खुद "ट्रांस" में चले गए हों और आपके आस-पास की दुनिया स्वर-विहीन हो गई हो.. शांति का वातावरण-सा बुन गया हो कोई... ।

आत्मा में कलम डुबोकर लिखी गई किसी कविता की तरह हीं हैं ये, जिनका नाम है "कविता सेठ"। इनका जन्म उत्तर प्रदेश के बरेली में हुआ, वहीं इनका पालन-पोषण हुआ और वहीं पर स्नातक तक की शिक्षा इन्होंने ग्रहण की। शादी के बाद ये दिल्ली चली आई और फिर ऑल इंडिया रेडिया एवं दूरदर्शन के लिए गाना शुरू कर दिया। इसी दौरान इन्होंने दिल्ली के हीं "गंधर्व महाविद्याल" से "संगीत अलंकार" (संगीत के क्षेत्र में स्नातकोत्तर) की उपाधि प्राप्त की .. साथ हीं साथ दिल्ली विश्वविद्यालय से "हिन्दी साहित्य" में परा-स्नातक की डिग्री भी ग्रहण की। इन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ग्वालियर घराने के "एन डी शर्मा", गंधर्व महाविद्यालय के विनोद एवं दिल्ली घराने के उस्ताद इक़बाल अहमद खान से प्राप्त की है।

इन्होंने बरेली के "खान-कहे नियाज़िया दरगाह" से अपनी हुनर का प्रदर्शन प्रारंभ किया, फिर आगे चलकर ये पब्लिक शोज़ एवं म्युज़िकल कंसर्ट्स में गाने लगीं। कविता मुख्यत: सूफ़ी गाने गाती हैं, अगरचे गीत, ग़ज़ल एवं लोकगीतों में भी महारत हासिल है। इन्होंने देश-विदेश में कई सारी जगहों पर शोज़ किए हैं। ऐसे हीं एक बार मुज़फ़्फ़र अली के अंतरराष्ट्रीय सूफ़ी महोत्सव इंटरनेशल सूफ़ी फ़ेस्टिवल) में इनके प्रदर्शन को देखकर/सुनकर सतीश कौशिक ने इन्हें अपनी फिल्म "वादा" में "ज़िंदगी को मौला" गाने का न्यौता दिया था। आगे चलकर जब ये मुंबई आ गईं तो इन्हें २००६ में अनुराग बसु की फिल्म "गैंगस्टर" में "मुझे मत रोको" गाने का मौका मिला। इस गाने में इनकी गायकी को काफी सराहा गया, लेकिन अभी भी इनका फिल्मों में सही से आना नहीं हुआ था। ये अपने आप को प्राइवेट एलबम्स तक हीं सीमित रखी हुई थीं। इन्होंने "वो एक लम्हा" और "दिल-ए-नादान" नाम के दो सूफ़ी एलबम रीलिज किए। फिर आगे चलकर एक इंडी-पॉप एलबम "हाँ यही प्यार है" और दो सूफ़ी अलबम्स "सूफ़ियाना (२००८)" (जिससे हमने आज की नज़्म ली है) एवं "हज़रत" भी इनकी नाम के साथ जुड़ गए। "सूफ़ियाना" सूफ़ी कवि "रूमी" की रूबाईयों और कलामों पर आधारित है.. कविता ने इन्हें लखनऊ के ८०० साल पुराने "खमन पीर के दरगाह" पर रीलिज किया था।


कुछ महिनों पहले हीं कविता "कारवां" नाम के सूफ़ी बैंड का हिस्सा बनीं हैं, जब एक अंतर्राष्ट्रीय सूफ़ी महोत्सव में इनका ईरान और राजस्थान के सूफ़ी संगीतकारों से मिलना हुआ था। तब से यह समूह सूफ़ी संगीत के प्रचार-प्रसार में पुरज़ोर तरीके से लगा हुआ है। आजकल ये अपने बेटे को भी संगीत की दुनिया में ले आई हैं।

कविता से जब उनके पसंदीदा गायक, संगीतकार, गीतकार के बारे में पूछा गया, तो उनका जवाब कुछ यूँ था: (साभार: प्लैनेट बॉलीवुड)

पसंदीदा गायक: एल्टन जॉन, ए आर रहमान, सुखविंदर, शंकर महादेवन, आबिदा परवीन
पसंदीदा संगीतकार: ए आर रहमान, अमित त्रिवेदी, शंकर-एहसान-लॉय
पसंदीदा गीतकार/शायर: वसीम बरेलवी, ज़िया अल्वी, जावेद अख़्तर, गुलज़ार साहब
पसंदीदा वाद्य-यंत्र: रबाब, डफ़्फ़, बांसुरी, ईरानी डफ़्फ़
पसंदीदा सूफ़ी कवि: कबीरदास, मौलाना रूमी, हज़रत अमिर खुसरो, बाबा बुल्लेशाह
पसंदीदा गीत: ख़्वाजा मेरे ख़्वाजा (जोधा-अकबर)

उनसे जब यह पूछा गया कि नए गायकों को "रियालिटी शोज़" में हिस्सा लेना चाहिए या नहीं, तो उनका जवाब था: "रियालिटी शोज़ के बारे में कभी न सोचें, बल्कि यह सोचें कि "रियालिटी" में उनकी गायकी कितनी अच्छी है। जितना हो सके शास्त्रीय संगीत सीखने की कोशिश करें। कहा भी गया है कि - नगमों से जब फूल खिलेंगे, चुनने वाले चुन लेंगे, सुनने वाले सुन लेंगे, तू अपनी धुन में गाए जा।" वाह! क्या खूब कहा है आपने!

चलिए तो अब आज की नज़्म की ओर रूख करते हैं। कविता को यह नज़्म बेहद पसंद है और उन्हें इस बात का दु:ख भी है कि यह नज़्म बहुत हीं कम लोगों ने सुनी है, लेकिन इस बात की खुशी है कि जिसने भी सुनी है, वह अपने आँसूओं को रोक नहीं पाया है। आखिर नज़्म है हीं कुछ ऐसी! आप यह तो मानेंगे हीं कि सूफ़ियाना कलामों में ख़ुदा को जिस नज़रिये से देखा जाता है, वह नज़रिया बाकी कलामों में शायद हीं नज़र आता है। कविता इसी नज़रिये को अपनी इस नज़्म के माध्यम से हम सबके बीच लेकर आई हैं। "शब को सहर" मे बदलने वाला वह ख़ुदा आखिरकार कैसा लगता है, आप खुद सुनिए:

बदल रहा है जो शब सहर में,
ख़ुदा वही है..

है जिसका जलवा नज़र-नज़र में,
ख़ुदा वही है..

जो फूल खुशबू गुलाब में है,
ज़मीं, ______, आफ़ताब में है,
है जिसकी रंगत शज़र-शज़र में,
खुदा वही है..




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "सांवला" और शेर कुछ यूँ था-

हो छल्ला पाया ये गहने, दुख ज़िंदरी ने सहने,
छल्ला मापे ने रहने, गल सुन सांवला
ढोला,
ओए सार के कित्ते कोला

इस शब्द पर ये सारे शेर/रूबाईयाँ/नज़्म महफ़िल में कहे गए:

मेरा हर लफ़्ज़ लकीर, अहसास स्याही है "आजाद"
चेहरा एक सांवला-सा ग़ज़ल में दिख रहा होगा. -आजाद

सांवले की आमद से हर चीज़ खिल गयी है.
मौसम हुआ है खुशनुमा दुनिया बदल गयी है. -अवध लाल जी

सांवला सभी को मेरा लगे है सजन
मगर मुझे ऐसा लागे जैसे किशन । - शरद तैलंग जी

कोई सांवला यहाँ कोई सफेद है
कोई खुश तो किसी को खेद है
एक खुदा ने बनाया हम सबको
फिर सबके रंगों में क्यों भेद है? - शन्नो जी (जबरदस्त....... )

सांवला सा मन और उजली सी धूप,
बस इसके सिवा कुछ नहीं,कैसा भी हो रूप - नीलम जी

चितचोर सांवला सजन , करता है नित शोर .
नदी पर करे इशारा , आजा मेरी ओर . - मंजु जी

मन के वीरान कोने मैं एक सांवला सा गम
मन के अँधेरे मैं कुछ घुल मिल सा गया है !!
सिसकियों की स्याह गोद मैं
सहमी सहमी सी यादों के
शूल भरे फूलों से कुछ छिल सा गया है !! - अवनींद्र जी

पिछली महफ़िल की शुरूआत हुई सजीव जी के प्रोत्साहन के साथ। आपके बाद शन्नो जी की आमद हुई। अपने बहुचर्चित मज़ाकिया लहजे में शन्नो जी ने फिर से हमें डाँट की खुराक पिलाई, लेकिन हमारे आग्रह करने के बाद उन्होंने गीत को फिर से सुना और अंतत: गायब शब्द की शिनाख्त करने में सफ़ल हुईं। तो इस तरह से कुछ कोशिशों के बाद महफ़िल का गायब शब्द सब के सामने प्रस्तुत हुआ। शन्नो जी, आपने शब्द तो पहचान लिया, लेकिन आपसे एक गलती हो गई। अगर आप उस शब्द पर कोई शेर कह देतीं तो हम "शान-ए-महफ़िल" के खिताब से आप हीं को नवाज़ते। अब चूँकि "साँवला" शब्द पर शेर लेकर पूजा जी सबसे पहले हाज़िर हुईं, इसलिए हम उन्हें हीं "शान-ए-महफ़िल" घोषित करते हैं। पूजा जी के बाद अवध जी, शरद जी , नीलम जी, मंजु जी एवं अवनींद्र जी का महफ़िल में आना हुआ। आप सभी के स्वरचित शेर एवं नज़्म कमाल के हैं। बधाई स्वीकारें! इन सबके बाद शन्नो जी फिर से महफ़िल में आईं, लेकिन इस बार वो खाली हाथ न थीं.. आपकी झोली में तीन-तीन रूबाईयाँ थीं और तीनों एक से बढकर एक। हमारी पिछली महफ़िल की सबसे बड़ी उपलब्धि रही अश्विनी जी का महफ़िल में आना। यूँ तो आपका शुक्रिया हम शुरूआत में हीं कर चुके हैं, लेकिन आपका जितना भी आभार प्रकट किया जाए कम होगा। उम्मीद करता हूँ कि हमारे बाकी मित्र भी भविष्य में इसी तरह हमारी सहायता करेंगे।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, September 28, 2010

अब्बास टायरवाला और रहमान आये साथ एक बार फिर और कहा जवां दिलों से - "कॉल मी दिल..."

ताज़ा सुर ताल ३७/२०१०


सुजॊय - दोस्तों, नमस्कार, और एक बार फिर स्वागत है 'ताज़ा सुर ताल' में। जैसा कि पिछले हफ़्ते विश्व दीपक जी ने थोड़ा सा हिण्ट दिया आज के फ़िल्म के बारे में, कि उनके मनपसंद संगीतकार का संगीत होगा आज की फ़िल्म में, तो चलिए अब वह वक़्त आ गया है कि आपको आज की फ़िल्म का नाम बता दिया जाए। आज हम लेकर आये हैं आने वाली फ़िल्म 'झूठा ही सही' के गानें।

विश्व दीपक - ए. आर. रहमान मेरे मनचाहे संगीतकार हैं, और सिर्फ़ मेरे ही नहीं, आज वो सिर्फ़ इस देश के ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में अपने संगीत के जल्वे बिखेर रहे हैं। वो एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर के संगीतकार बन चुके हैं और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व भी कर रहे हैं। तभी तो राष्ट्रमण्डल खेल के शीर्षक गीत के संगीत के लिए उन्ही को चुना गया है।

सुजॊय - 'झूठा ही सही' अब्बास टायरवाला की फ़िल्म है जिसका निर्माण आइ.बी.सी मोशन पिक्चर्स के बैनर तले हो रही है, जिसके मुख्य कलाकार हैं जॊन एब्राहम और पाखी, जो अब्बास साहब की धर्मपत्नी हैं। सोहेल ख़ान, अरबाज़ ख़ान और नसीरुद्दिन शाह ने भी फ़िल्म में अभिनय किया है और सुनने में आया है कि फ़िल्म में माधवन और नंदना सेन अतिथि कलाकार के रूप में नज़र आयेंगे। १५ अक्तुबर २०१० का दिन निर्धारित किया गया है फ़िल्म की शुभमुक्ति के लिए, यानी कि इस साल का यही होगा दशहरा रिलीज़।

विश्व दीपक - सुना है कि पहले इस फ़िल्म का शीर्षक '1-800-Love' रखा गया था, उसके बाद 'Call Me Dil' रखा गया, लेकिन आख़िर में 'झूठा ही सही' का शीर्षक ही फ़ाइनल हुआ। फ़िल्म के प्रोमोज़ देखते हुए ऐसा लग रहा है कि कहानी में कुछ नई बात ज़रूर होगी। जॊन भी एक नए लुक में नज़र आ रहे हैं इस फ़िल्म में। जहाँ तक फ़िल्म के गीत संगीत का सवाल है, साउण्डट्रैक को अच्छा रेस्पॊन्स मिल रहा है।

सुजॊय - तो आइए गीतों का सिलसिला शुरु करते हैं, पहला गीत सुनवा रहे हैं राशिद अली और श्रेया घोषाल की आवाज़ों में।

गीत - क्राई क्राई


विश्व दीपक - एक संक्रामक ट्रैक जिसे कहा जा सकता है, और शायद इसी वजह से यह गीत एक इन्स्टैण्ट हिट भी बन गया है। वैसे भी शुरु से ही अब्बास टायरवाला इस तरह के कैची शब्दों का इस्तेमाल करते आये हैं। "पप्पु काण्ट डान्स साला" के बाद अब्बास और रहमान फिर एक बार एक ऐसा गीत लेकर आये हैं जिसे जनता ने हाथों हाथ लिया है।

सुजॊय - राशिद अली और श्रेया का कम्बिनेशन भी अच्छा लगा, ख़ास कर जहाँ जहाँ राशिद "no no no, kabhi nahi" कहते हैं, बड़ा ही मज़ेदार लगता है। गाना सीधा सरल है, और इस सरलता की वजह से ही यह हिट हो रहा है। एक बार सुनने के बाद जैसे 'क्राई क्राई' दिमाग़ में बैठ जाता है। राशिद अली की आवाज़ जॊन पर फ़िट बैठी है।

विश्व दीपक - रहमान ने अलग अलग साज़ों का इस्तेमाल किया है इस गीत में। जैसे टुकड़ों में बना है यह गीत, लेकिन हर एक टुकड़ा उतना ही आकर्षक, उतना ही लुभाने वाला।

सुजॊय - आइए अब दूसरे गीत की तरफ़ बढ़ा जाए! सुनते हैं जावेद अली और चिनमयी की आवाज़ों में "मैया यशोदा"।

गीत - मैया यशोदा (जमुना मिक्स)


गीत - मैया यशोदा (टेम्स मिक्स)


विश्व दीपक - एक और अच्छा गाना, एक और सुरीला कम्पोज़िशन। रहमान ने जावेद अली और चिनमयी पर जो भार सौंपा, इन दोनों ने उसका पूरा पूरा मान रखा। चिनमयी को बिना सांस छोड़े एक लम्बा सा लाइन इस गीत में गाना पड़ा, जिसे उन्होंने बहुत ही ख़ूबसूरती से निभाया, अंग्रेज़ी में जिसे कहते हैं 'effortlessly'। "मय्या यशोदा" गीत का आधार वही कृष्ण लीला ही है, लेकिन अंतिम अंतरे में यह एक संदेश भी देता है कि बांटने का। अच्छा लिखा हुआ गाना है और शायद इस साल के नवरात्री में डांडिया खेलने वालों को अपना नया गाना मिल गया।

सुजॊय - और इस गीत के बीच में सितार का वह पीस कितना सुरीला, कितना मधुर सुनाई देता है! "मय्या यशोदा" सुनते ही 'हम साथ साथ हैं' का वह हिट गीत भी याद आ जाता है जिसे अनुराधा पौडवाल, अल्का याज्ञ्निक और कविता कृष्णामूर्ती ने गाया था। लेकिन जावेद और चिनमयी का गाया यह गीत उससे बिल्कुल अलग है। दोनों अपने अपने जगह यूनिक है।

विश्व दीपक - यूनिक तो है, लेकिन इस जौनर में रहमान ने इससे पहले जो गीत बनाया था फ़िल्म 'लगान' के लिए, "राधा कैसे ना जले", उसके मुक़ाबले यह गीत बहुत पीछे है। वैसे यह बत भी सच है कि बार बार "राधा कैसे ना जले" जैसा गीत तो नहीं बन सकता ना! ख़ैर, "मैया यशोदा" के दो वर्ज़न हैं, एक है 'जमुना मिक्स', जिसमें भारतीय बीट्स और भारतीय स्वाद है। बांसुरी, सितार आदि साज़ों का इस्तेमाल, लेकिन पूरा गीत परक्युशन और बेस पर आधारित है। साज़िंदों ने भी कमाल का बजाया है।

सुजॊय - इसी गीत का दूसरा वर्ज़न है 'थेम्स मिक्स', जिसमें रहमान ने कुछ और ज़्यादा परक्युशन और ईलेक्ट्रॊनिक बीट्स का इस्तेमाल किया है। और टेलीफ़ोन के टोन्स को भी मिक्स किया गया है। दोनों को सुनने के बाद आप भी यही कहेंगे कि जमुना थेम्स पर हावी है। आइए अब तीसरे गीत की तरफ़ बढ़ा जाए, यह है "हैलो हैलो" कार्तिक और हेनरी कुरुविला की आवाज़ों में।

गीत - हैलो हैलो


विश्व दीपक - "हैलो हैलो" और उस पर कार्तिक की आवाज़, ऐसे में तो "कार्तिक कॊलिंग कार्तिक" की याद आ जाना ही स्वाभाविक है। औएर वैसे भी दोनों गीतों का मूड एक जैसा है, मतलब वही रिंगटोन न और बीप्स की ध्वनियों का इस्तेमाल।

सुजॊय - कार्तिक ने इस गीत को खुले दिल से गाया है, एक केयरफ़्री अंदाज़ में। रहमान कार्तिक से आजकल अपनी हर फ़िल्म में कम से कम एक गीत ज़रूर गवा रहे हैं। कार्तिक और जावेद अली रहमान के मनपसंद गायक बनते जा रहे हैं ऐसा लग रहा है।

विश्व दीपक - वाक़ई कार्तिक की आवाज़ में एक ताज़गी है, और हिंदी फ़िल्मी नायक के प्राश्वगायन के लिए तो बिल्कुल सटीक है। उनके गाये इस गीत में "मुझे छोड़ दो, मुझे थाम लो, खो जाने दो, मेरा नाम लो, सब ठीक है, जो जाएगा" एक बहुत ही सुंदर प्रवाह में चल पड़ता है। पता नहीं यह गीत लम्बी रेस का घोड़ा बन पाएगा या नहीं, लेकिन फ़िल्हाल तो इसे सुनने में अच्चा ही लग रहा है।

सुजॊय - जहाँ तक साज़ों की बात है, तो इसमें रहमान ने वायलिन और चेलो का इस्तेमाल किया है, टेलीफ़ोन के डायल टोन्स तो हैं ही। और इन सब के पीछे ड्रमिंग्‍ बीट्स। रहमान का वैसे टेलीफ़ोन से नाता पुराना है, याद है न आपको 'हिंदुस्तानी' फ़िल्म का गाना "टेलीफ़ोन धुन में हँसने वाली"? चलिए, आगे बढ़ते हैं और सुनते हैं सोनू निगम की आवाज़ में "दो निशानियाँ"।

गीत - दो निशानियाँ


विश्व दीपक - एक और सुंदर कम्पोज़िशन, और सोनू निगम और रहमान का वही पुराना "दिल से" वाला अंदाज़ वापस आ गया है। एक धीमी लय वाला, कोमल और सोलफ़ुल गीत। पियानो की लगातार बजने वाली ध्वनियाँ गीत के ऒरकेस्ट्रेशन का मुख्य आकर्षण है। थोड़ा सा ग़मगीन अंदाज़ का गाना है लेकिन सोनू ने जिस पैशन के साथ इसे निभाया है, यह इस ऐल्बम का एक महत्वपूर्ण ट्रैक बन गया है यकीनन।

सुजॊय - गीत के बोलों की बात करें तो वो भी सुंदर हैं, गहरे अर्थ वाले हैं, बस एक झटका आपको तब लगा होगा जब इन ख़्वाबों ख़यालों वाले बोलों के बीच भी "फ़ोन" शब्द का ज़िक्र आता है। लेकिन फिर यह गीत के बोलों के साथ इस क़दर घुलमिल गया है कि गीत का अभिन्न अंग बन गया है। इस गीत का एक और वर्ज़न है ऐल्बम में जिसका शीर्षक है 'Heartbreak Reprise'।

विश्व दीपक - टूटे दिल की सदा है यह गीत जो एक मल्हम का काम करती है। "दो निशानियाँ" में सोनू निगम के अलावा बहुत से गायकों ने भी आवाज़ें मिलाई जैसे कि ऋषीकेश कामेरकर, थमसन ऐण्ड्रूज़, नोमान पिण्टो, बियांका गोम्स, डॊमिनिक सेरेजो, समंथा एडवार्ड्स, विविएन पोचा और क्लिण्टन सेरेजो। चलिए आगे निकला जाए, अब की बार आवाज़ श्रेया घोषाल और सुज़ेन डी'मेलो के। "पम प रा", यह है गीत, जो फ़िल्म के दूसरे गीतों की तुलना में एक ऐवरेज गीत है।

सुजॊय - श्रेया और सेज़ेन के गाये इस गीत में ना तो "लट्टू" कर देने वाली कोई बात है और ना ही "ऐ बच्चू" वाला ऐटिट्युड है। चलिए सुनते हैं।

गीत - पम प रा


सुजॊय - इस गीत में जो सब से अच्छी बात है वह है श्रेया की गायकी। उन्हें इस गीत में अपने वोकल रेंज के प्रदर्शन का मौका मिला और उन्होंने साबित भी किया अपने रेंज को, अपने टोनल क्वालिटी को। जैज़ शैली का गाना है, रहमान ने श्रेया से स्कैट सिंगिंग्‍ कर दिखाया है, जिसे श्रेया बख़ूबी निभाया है।

विश्व दीपक - अब अगले गीत में एक नई आवाज़। विजय येसुदास की। क्या ये येसुदास जी के साहबज़ादे हैं? जी हाँ, मेरी तरह आपका अंदाज़ा भी सही है। हिंदी फ़िल्मों के लिए भले उनकी आवाज़ नई हो, लेकिन दक्षिण में ये करीब करीब एक दशक से सक्रीय हैं। बहुत ही अच्छा लग रहा है कि रहमान ने विजय येसुदास से हिंदी गीत गवाया है। येसुदास जी के लिए लोगों के दिलों में बहुत ज़्यादा प्यार है। उनका गाया हर एक गीत उत्कृष्ट रहा है। इसलिए हमे पूरी उम्मीद है कि विजय का भी उसी प्यार से हिंदी फ़िल्म संगीत में स्वागत होगा।

सुजॊय - विजय येसुदास के गाये गीत को पहले सुनते है, फिर गीत की चर्चा करेंगे।

गीत - 'I'll be waiting'


सुजॊय - वाह! अंग्रेज़ी और हिंदी, दोनों के शब्दों को विजय ने आसानी से निभाया है, और एक भाषा से दूसरे भाषा का जो ट्रान्ज़िशन है, उसे भी भली भाँति अंजाम दिया है। अपने पिता की तरह उनकी आवाज़ में भी एक सादगी है, उनके गायन में भी वही सरलता है।

विश्व दीपक - इस गीत को हिंग्लिश कहें तो बेहतर होगा, जैज़ शैली की धुन, लेकिन अंत होता है बड़े ही कोमल तरीके से। गीत की अवधि कम होने की वजह से ऐसा लगता है जैसे दिल नहीं भरा। रहमान सर, आशा है आप अपनी अगली फ़िल्म में भी विजय को मौका देंगे, और हमें मौका देंगे उन्हें सुनने का। और अब हम आपको मौका दे रहे हैं 'झूठा ही सही' फ़िल्म के अंतिम गीत को सुनने का, "call me dil - झूठा ही सही", जिसे गाया है राशिद अली ने।

सुजॊय - जैसा कि शुरु में हमने कहा था कि पहले पहले इस फ़िल्म के शीर्षक के लिए 'Call Me Dil' सोचा गया था, शायद इसीलिए इस गीत को बनाया गया है कि दोनों ही शीर्षक इसमें समा जाये। सुंदर बोल, सुंदर संगीत, सुंदर गायकी, बस इतना ही कहेंगे इस गीत के बारे में।

गीत - call me dil - झूठा ही सही


सुजॊय - हाँ तो दोस्तों, कैसे लगे ये गानें? किसी ख़ास गीत का उल्लेख ना करते हुए मैं इस ऐल्बम को अपनी तरफ़ से ४ की रेटिंग्‍ दे रहा हूँ।

विश्व दीपक -

आवाज़ रेटिंग्स: झूठा हीं सही: ****

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # १०९- चिनमयी ने इसी साल एक और फ़िल्म में गीत गाया है जिसे हमने 'ताज़ा सुर ताल' में शामिल किया है। बताइए कौन सी है वह फ़िल्म?

TST ट्रिविया # ११०- राष्ट्रमण्डल खेल २०१० के लिए ए. आर. रहमान द्वारा रचित गीत के बोल क्या हैं?

TST ट्रिविया # १११- सोनू निगम ने बम्बई आने के बाद सब से पहले संगीतकार उषा खन्ना के संगीत में ऋषीकेश मुखर्जी की एक टीवी धारावाहिक के लिए गीत गाया था। क्या आपको याद है उस धारावाहिक का नाम?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. बेस्ट फ़िल्म ऒन फ़ैमिली वेलफ़ेयर
२. फ़िल्म 'राही' की लोरी "चाँद सो गया, तारे सो गए"।
३. तीन बार।

Tuesday, August 31, 2010

किलिमांजारो में बूम बूम रोबो डा.. रोबोट की हरकतों के साथ हाज़िर है रहमान, शंकर और रजनीकांत की तिकड़ी

ताज़ा सुर ताल ३३/२०१०

सुजॊय - आज है ३१ अगस्त! यानी कि आज 'ताज़ा सुर ताल' इस साल का दो तिहाई सफ़र पूरा कर रहा है। पीछे मुड़ कर देखें तो इस साल बहुत ही कम फ़िल्में ऐसी हैं जिन्होंने बॊक्स ऒफ़िस पर कामयाबी के झंडे गाड़े हैं।

विश्व दीपक - हाँ, लेकिन फ़िल्म संगीत की बात करें तो इन फ़िल्मों के अलावा भी कई फ़िल्मों का संगीत सुरीला रहा है। 'वीर', 'इश्क़िया', 'कार्तिक कॊलिंग‍ कार्तिक', 'आइ हेट लव स्टोरीज़', 'मिस्टर सिंह ऐण्ड मिसेस मेहता', 'वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई' जैसे फ़िल्मों के गानें काफ़ी अच्छे हैं। अब देखते हैं कि २०१० का बेस्ट क्या अभी आना बाक़ी है!

सुजॊय - अच्छा विश्व दीपक जी, क्या आप ने कोई ऐसा कम्प्युटर देखा है जिसका स्पीड १ टेरा हर्ट्ज़ हो, और मेमरी १ ज़ीटा बाइट, जिसका प्रोसेसर पेण्टियम अल्ट्रा कोर मिलेनिया वी-२, और एफ़. एच. पी-४५० मोटर हिराटा, जापान का लगा हो?

विश्व दीपक - अरे अरे ये सब क्या पूछे जा रहे हैं आप? यह 'टी. एस. टी' है भई!

सुजॊय - तभी तो! आज हम जिस फ़िल्म के गानें सुनने जा रहे हैं यह उसी से ताल्लुख़ रखता है। ये जो स्पेसिफ़िकेशन्स मैंने अभी बताए, यह दरसल किसी कम्प्युटर का नहीं, बल्कि एक अत्याधुनिक रोबोट का होगा जिसका निर्माण कर रहे हैं फ़िल्म निर्माता कलानिथि मारन निर्देशक शंकर के साथ मिल कर अपनी महत्वाकांक्षी फ़िल्म 'रोबोट' में।

विश्व दीपक - 'रोबोट' इस देश में बनने वाली सब से महँगी फ़िल्म है और इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं साउथ सुपरस्टार रजनीकांत और ऐश्वर्या राय बच्चन। फ़िल्म में संगीत दिया है ए. आर. रहमान ने और गीतकार हैं स्वानंद किरकिरे। दोस्तों, इससे पहले कि हम 'रोबोट' की बातों को आगे बढ़ाएँ, आइए फ़िल्म का पहला गाना सुन लेते हैं जिसे गाया है ए. आर. रहमान, सुज़ेन, काश और क्रिसी ने।

गीत - नैना मिले


सुजॊय - फ़िल्म की कहानी और प्लॊट के हिसाब से ज़ाहिर है कि इस फ़िल्म के गानें हाइ टेक्नो बीट्स वाले होंगे और गायन शैली भी उसी तरह का रोबोट वाले अंदाज़ का होगा, और अभी अभी जो हमने गीत सुना उसमें इन सभी बातों का पूरा पूरा ख़याल रखा गया है। "नैना मिले, तुम से नैना मिले", स्वानंद किरकिरे के बोलों को ध्यान से सुना जाए तो उनका ख़ास अंदाज़ महसूस किया जा सकता है। लेकिन जैसा कि मैंने कहा कि 'ध्यान से सुना जाए', क्योंकि टेक्नो बीट्स के चलते गीत के बोल पार्श्व में चले गए हैं और संगीत ही सर चढ़ कर बोल रहा है।

विश्व दीपक - वाक़ई एक 'रोबोटिक' गाना है। हाल में एक फ़िल्म आई थी 'लव स्टोरी २०५०' जिसका संगीत भी कुछ इसी तरह का डिमाण्ड करता था। "मिलो ना मिलो" गीत मशहूर हुआ था लेकिन कुल मिलाकर फ़िल्म पिट गई थी। ख़ैर, 'रोबोट' का दूसरा गीत पहले गीत की तुलना में टेक्नो बीट्स के मामले में हल्का है और एक रोमांटिक युगल गीत है मोहित चौहान और श्रेया घोषाल की आवाज़ों में। सुनते हैं फिर चर्चा करते हैं।

गीत - पागल अनुकन (प्यारा तेरा गुस्सा भी)


विश्व दीपक - भले ही एक नर्मोनाज़ुक रूमानीयत से भरा गीत है, लेकिन स्वानंद किरकिरे इसमें भी वैज्ञानिक शब्दों को डालना नहीं भूले हैं। हिंदी सिनेमा का यह पहला गीत है जिसमें "न्युट्रॊन" और "ईलेक्ट्रॊन" शब्दों का इस्तमाल हुआ है।

सुजॊय - आइए अब इस फ़िल्म के प्रमुख किरदार रोबोट का परिचय आप से करवाया जाए। इस ऐण्ड्रो-ह्युमानोएड रोबोट का नाम है 'चिट्टी'। यह एक इंसान है जिसने जन्म नहीं लिया, बल्कि जिसका निर्माण हुआ है। चिट्टी गा सकता है, नाच सकता है, लड़ सकता है, पानी और आग का उस पर कोई असर नहीं होता। वो हर वो सब कुछ कर सकता है जो एक इंसान कर सकता है लेकिन शायद उससे भी बहुत कुछ ज़्यादा। वो विद्युत-चालित है और वो झूठ नहीं बोल सकता। चिट्टी की कुछ विशेषताओं के बारे में हमने आपको बताया, आइए अब सुनते हैं 'चिट्टी डान्स शोकेस'।

विश्व दीपक - 'चिट्टी डान्स शोकेस' एक डान्स नंबर है प्रदीप विजय, प्रवीन मणि, रैग्ज़ और योगी बी. का।

गीत - चिट्टी डान्स शोकेस


सुजॊय - वाक़ई ज़बरदस्त इन्स्ट्रुमेन्टल पीस था। हिप-हॊप डान्स के शौकीनों के लिए बहुत अच्छा पीस है। इस फ़्युज़न ट्रैक का इस्तमाल टीवी पर होने वाले डान्स रियल्टी शोज़ में किया जा सकता है।

विश्व दीपक - और अब एक ऐसा गीत जिसे सुनते हुए आप शायद ९० के दशक में पहुँच जाएँगे। और वह इसलिए कि इसमें आवाज़ें हैं हरिहरण और साधना सरगम की। लेकिन गाने के अंदाज़ में ९० के दशक की कोई छाप नहीं है। यह तो इसी दौर का गीत है। यह गीत दर-असल इस रोबोट की गरिमा और महिमा का बखान करता है। रहमान के शुरुआती दिनों में दक्षिण के फ़िल्मों में वो जिस तरह का संगीत दिया करते थे, इस गीत में कुछ कुछ उस शैली की छाया मिलती है। सुनते हैं "अरिमा अरिमा"।

गीत - अरिमा अरिमा


विश्व दीपकव - स्वानंद किरकिरे ने केवल "ईलेक्ट्रॊन" और "न्युट्रॊन" तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखा, अब एक ऐसा गीत जिसमें किलिमांजारो और मोहंजोदारो का उल्लेख है, और उल्लेख क्या, गीत के मुखड़े में ही ये दो शब्द हैं जिन पर इस गीत को आधार किया गया है। इस तरह के शब्दों के चुनाव का तो यही उद्येश्य हो सकता है कि धुन पहले बनी होगी और उस धुन पर ये शब्द फ़िट किए गए होंगे।

सुजॊय - जावेद अली और चिनमयी का गाया यह गीत एक मस्ती भरा गीत है जिसमें वह रोबोटिक शैली नहीं है, बल्कि तबले का भी इस्तमाल हुआ है। जावेद अली धीरे धीरे कामयाबी की सीढ़ियाँ चढ़ते जा रहे हैं। आज के दौर के गायकों में उन्होंने अपनी एक अलग जगह बना ही ली है और फ़िल्म संगीत संसार में उन्होंने अपने क़दम मज़बूती से जमा लिए हैं। आइए सुनते हैं "किलिमांजारो"।

गीत - किलिमांजारो


विश्व दीपक - फ़िल्म के शुरु में चिट्टी कोई भी काम तो कर सकता है, लेकिन वो इंसान के जज़्बातों को समझ नहीं सकता। उसमें कोई ईमोशन नहीं है। और तभी डॊ. वासी चिट्टी के प्रोसेसर को अपग्रेड करते हैं और उसमें ईमोशन्स का सिम्युलेशन करते हैं यह सोचे बिना कि इसके परिणाम क्या क्या हो सकते हैं। अब चिट्टी महसूस कर सकता है और सब से पहले जो वो महसूस करता है, वह है प्यार। क्या यही प्यार डॊ. वासी के रास्ते पे दीवार बन कर खड़ा हो जाएगा? क्या डो. वासी का क्रिएशन ही उनका विनाश कर देगा? यही कहानी है 'रोबोट' की।

सुजॊय - और अब एक और रोबोटिक नंबर, फिर से टेक्नो बीट्स की भरमार लिए यह है "बोम बूम रोबोडा", जिसे गाया है रैग्ज़, योगी बी., मधुश्री, कीर्ति सगठिया और तन्वी शाह ने। मधुश्री को ए. आर. रहमान ने कई ख़ूबसूरत गीतों में गवाया है। बहुत ही मिठास है उनकी आवाज़ में। यह ताज्जुब की ही बात है कि मुंबई के फ़िल्मी संगीतकार क्यों उनसे गानें नहीं गवाते! ख़ैर, सुनते हैं यह गीत।

गीत - बूम बूम रोबोडा


विश्व दीपक - और अब फ़िल्म का अंतिम गीत "ओ नए इंसान"। श्रीनिवास और खतिजा रहमान का गाया यह गीत है। श्रीनिवास ने बिलकुल रोबोटिक अंदाज़ में यह गाया है। श्रीनिवास ने इस गीत में दो अलग अलग आवाज़ें निकाली हैं, जो एक दूसरे से बिलकुल अलग है। ऒर्केस्ट्रेशन पूरी तरह से ईलेक्ट्रॊनिक है और इस गीत को सुनते हुए एक साइ-फ़ाइ फ़ील आता है।

सुजॊय - और जिन्हें मालूम नहीं है, उन्हें हम यह बताना चाहेंगे कि खतिजा रहमान ए. आर. रहमान की बेटी है जो इस गीत के ज़रिए हिंदी पार्श्व गायन में क़दम रख रही है। चलिए सुनते हैं यह गीत।

गीत - ओ नए इंसान


सुजॊय - हाँ तो विश्व दीपक जी, कैसा रहा इन रोबोटिक गीतों का अनुभव? मुझे तो बुरा नहीं लगा। हाल के कुछ फ़िल्मों में रहमान का जिस तरह का संगीत आ रहा था, ज़्यादातर सूफ़ियाने अंदाज़ का, उससे बिलकुल अलग हट के, बहुत दिनों के बाद इस तरह का संगीत सुनने में आया है। वैसे हाल में 'शिवाजी' में रहमान ने इस तरह का संगीत दिया था, लेकिन हिंदी के श्रोताओं में 'शिवाजी' के गानें कुछ ख़ास असर नहीं कर सके थे। अब देखना है कि 'रोबोट' के गीतों को किस तरह का रेसपॊन्स मिलता है! "पागल अनुकन" और "किलिमांजारो", ये दोनों गीत मुझे सब से ज़्यादा पसंद आए।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, भले हीं गाने सुनने के दौरान मैंने इलेक्ट्रान, प्रोटॉन, किलिमांजारो और मोहनजोदाड़ो जैसे शब्दों के लिए स्वानंद किरकिरे को क्रेडिट दिया था, लेकिन एक बात मेरे दिल में चुभ-सी रही थी.. शुरू में सोचा कि रहने देता हूँ, हर बात कहनी ज़रूरी नहीं होती, लेकिन जब हम समीक्षा हीं कर रहे हैं तो हमें कुछ भी छुपाने का हक़ नहीं मिलता। शायद आपने रोबोट के तमिल वर्ज़न ऐंदिरन के गाने नहीं सुने। मैंने सुने हैं.. गाने के बोल तो समझ नहीं आए लेकिन ऊपर बताए गए शब्द पकड़ में आ गए थे} और जब मैंने हिन्दी के गाने सुने और हिन्दी में उन्हीं शब्दों की पुनरावृत्ति मिली तो मुझे पक्का यकीन हो गया कि गीतकार ने गाने का बस अनुवाद हीं किया है और कुछ नहीं। नहीं तो तमिल का "डा" (बूम बूम रोबो डा), जो हिन्दी के "रे" या "अरे" के समतुल्य है, हिन्दी में भी "डा" हीं क्यों होता। और भी ऐसे बहुत सारे उदाहरण हैं.. जिन्हें सुनने पर मुझे लगा था कि किसी साधारण-से गीतकार से गाने लिखवाए (अनुवाद करवाए) गए हैं। लेकिन गीतकार के रूप में "स्वानंद किरकिरे" का नाम देखकर मुझे झटका-सा लगा। अब जैसा कि आपके साथ हुआ और दूसरे हिन्दी-भाषी श्रोताओं के साथ होने वाला है, हम तो बस हिन्दी के गाने हीं सुनते हैं और उसी को "असल" समझ बैठते हैं। अब यहाँ पर दोषी कौन है, यह तो कहा नहीं जा सकता, लेकिन स्वानंद साहब से मुझे ऐसी उम्मीद न थी। वे "गुलज़ार" और "महबूब" की तरह मिसाल बन सकते थे, जो तमिल के गानों (जिसे वैरामुतु जैसे बड़े कवि/गीतकार लिखा करते हैं) से बोल नहीं उठाते, बल्कि रहमान की धुनों पर अपने नए बोल लिखते हैं। बस इतना है कि स्वानंद साहब से निराश होने के बावजूद रहमान के संगीत के कारण हीं मैं इस एलबम को पसंद कर पा रहा हूँ। सुजॊय जी, आपने इस एलबम के लिए साढे तीन अंक निर्धारित किए थे, लेकिन मैं आधे अंक की कटौती गीतकार के कारण कर रहा हूँ। एक गीतकार/कवि के मन में शब्दों के लिए जो टीस उठती है, वह तो आप समझ हीं सकते हैं.. है ना? खैर.. मैं भी किस भावनात्मक दरिया में बह गया... हाँ तो, आज की समीक्षा को विराम देने का वक्त आ गया है, अगली बार "अनजाना अनजानी" के साथ हम फिर हाज़िर होंगे। तब तक के लिए शुभदिन एवं शुभरात्रि!!

आवाज़ रेटिंग्स: रोबोट: ***

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ९७- हरिहरण और साधना सरगम की आवाज़ में उस मशहूर गीत का मुखड़ा बताइए जिसके एक अंतरे में पंक्ति है "ये दिल बेज़ुबाँ था आज इसको ज़ुबाँ मिल गई, मेरी ज़िंदगी को एक हसीं दास्ताँ मिल गई"?

TST ट्रिविया # ९८- फ़िल्म 'रोबोट' के साउण्डट्रैक में आपने जितनी भी आवाज़ें सुनीं, उनमें से एक गायिका हैं जिनका असली नाम है सुजाता भट्टाचार्य। बताइए इस गायिका को अब हम किस नाम से जानते हैं?

TST ट्रिविया # ९९- परिवार की नाज़ुक आर्थिक स्थिति के चलते ए. आर. रहमान को कक्षा-९ में स्कूल छोड़ना पड़ा था। बताइए रहमान उस वक़्त किस स्कूल में पढ़ रहे थे?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. खुदा जाने (बचना ए हसीनों)
२. ६७
३. इन दोनों फ़िल्मों में विदेशी गीत की धुन का इस्तेमाल किया गया है। 'वी आर फ़मिली' में एल्विस प्रेस्ली के "जेल-हाउस रॊक" तथा 'कल हो ना हो' में रॊय ओरबिसन के "प्रेटी वोमेन"।

एक बार फिर सीमा जी २ सही जवाबों के साथ हाज़िर हुई, बधाई

Tuesday, April 27, 2010

बुल्ले शाह के "रांझा-रांझा" को "रावण" के रंग में रंग दिया रहमान और गुलज़ार ने... साथ है "बीरा" भी

ताज़ा सुर ताल १६/२०१०

सुजॊय - ताज़ा सुर ताल' के एक नए अंक के साथ हम सभी श्रोताओं व पाठकों का हार्दिक स्वागत करते हैं। पिछले हफ़्ते किसी कारण से 'टी.एस.टी' की यह महफ़िल सज नहीं पाई थी। दोस्तों, सजीव जी इन दिनों छुट्टियों के मूड में हैं, इसलिए आज मेरे साथ 'ताज़ा सुर ताल' में उनकी जगह पर हैं विश्व दीपक तन्हा जी। विश्व दीपक जी, वैसे तो आप 'आवाज़' में नए नहीं हैं, लेकिन इस स्तंभ में आप पहली बार मेरे साथ हैं। इसलिए मैं आपका स्वागत करता हूँ।

विश्व दीपक - शुक्रिया सुजॊय जी! मुझे भी बेहद आनंद आ रहा है इस स्तंभ में शामिल हो कर। वैसे मैं एक बार आपकी अनुपस्थिति में फ़िल्म 'रण' के गीत संगीत की चर्चा कर चुका हूँ इसी स्तंभ में। इसलिए यह कह सकते हैं कि यह दूसरी मर्तबा है कि मैं इस स्तंभ में शामिल हूँ बतौर होस्ट और जिस तरह का सजीव जी का मूड है, उस हिसाब से मुझे लगता है कि अगले एक-डेढ महीने तक मैं आपके साथ रहूँगा। खैर यह बताईये कि आज किस फ़िल्म के संगीत की चर्चा करने का इरादा है?

सुजॊय - देखिए इन दिनों जिन फ़िल्मों के प्रोमोज़ और गीतों की झलकियाँ दिखाई व सुनाई दे रहीं हैं, उनमें कुछ नाम हैं 'बदमाश कंपनी', 'हाउसफ़ुल', 'मुस्कुराकर देख ज़रा'। लेकिन इन सब से बिल्कुल अलग हट कर जो फ़िल्म आनेवाली है और जिसके प्रति लोगों की उत्सुक्ता दिन ब दिन बढ़ती सी दिखाई दे रही है, वह फ़िल्म है 'रावण'। ऐसे में इस फ़िल्म की चर्चा इस स्तंभ में अनिवार्य हो जाता है।

विश्व दीपक - बिल्कुल ठीक कहा। मणिरत्नम निर्मित एवं निर्देशित इस फ़िल्म में मुख्य भूमिकाएँ निभाई हैं अभिषेक बच्चन, ऐश्वर्या राय, विक्रम, गोविंदा, प्रियामणि, रविकिशन और निखिल द्विवेदी ने। गुलज़ार के गीत हैं और संगीत ए. आर. रहमान का।

सुजॊय - यानि कि पूरी की पूरी एक ज़बरदस्त टीम। देखना है कि अभिषेक-ऐश के साथ रहमान की तिकड़ी क्या वही कमाल दिखाती है जो कमाल फ़िल्म 'गुरु' में हुआ था!

विश्व दीपक - सिर्फ़ अभि-ऐश के साथ ही क्यों, मणिरत्नम और रहमान की ऐतिहासिक जोड़ी शुरु हुई थी १९९२ में 'रोजा' से। उसके बाद 'बॊम्बे', 'दिल से', 'साथिया', 'युवा' और 'गुरु' जैसी यादगार फ़िल्में। ऐसे में अगर लोगों को 'रावण' के म्युज़िक से उम्मीदें हैं तो वो जायज़ हीं हैं। तो चलिए शुरू करते हैं गीतों का सिलसिला। सुनते हैं पहला गीत और फिर चर्चा आगे बढ़ाते हैं।

गीत: बीरा बीरा


सुजॊय - दरअसल यह गीत फ़िल्म के मुख्य पात्र बीरा (अभिषेक बचन) से संबंधित है। जैसा कि आपने सुना कि गीत की धुन और रीदम ट्राइबल अंदाज़ का है। विजय प्रकाश, मुस्तफ़ा कुटोन और कीर्ति सगठिया का गाया यह गीत हो सकता है कि अलग से सुन कर बहुत ज़्यादा अपील ना करे, लेकिन फ़िल्म की कहानी, पात्र और सिचुयशन के मुताबिक ज़रूर सटीक होगी!

विश्व दीपक - और इस गीत की अवधि भी इतनी कम है कि जब तक इसकी रीदम और धुन ज़हन में चढ़ती है, तब तक गीत समाप्त हो चुका होता है। वैसे इसी तरह का एक गीत गुलज़ार साहब ने "ओंकारा" में भी लिखा था। वहाँ भी मुख्य नायक के इंट्रोडक्शन के लिए एक विशेष गीत की ज़रूरत थी। अलग बात यह है कि वहाँ पर गाने में दो अंतरे थे, लेकिन यहाँ पर गुलज़ार साहब को अपनी बात एक हीं अंतरे में कहनी थी। और मेरे हिसाब से वो इसमें सफ़ल हुए हैं। सुजोय जी, शायद आपने यह ध्यान न दिया हो लेकिन इस गीत में रहमान की भी आवाज़ है, भले हीं उनका नाम सीडी कवर पर नहीं दिखता। यह तो आपको मानना हीं पड़ेगा कि अलग किस्म का संगीत है इसमें और हाँ कुछ-कुछ अफ़्रीकन तो कुछ-कुछ चाईनीज अफ़ेक्ट भी है।

सुजॊय - जी.. मुस्तफ़ा कुटोन का इस्तेमाल रहमान ने शायद इसी कारण से किया है। क्योंकि उनकी आवाज़ में एक्ज़ोटिक टच है।

विश्व दीपक - बहुत हद तक संभव है। चलिए अब आगे बढ़ते हैं और आ जाते है दूसरे गीत पर। पहले गीत से बिल्कुल अलग यह गीत है "बहने दे मुझे बहने दे"। इस गीत को सुनते हुए फ़िल्म 'दिल से' के "सतरंगी रे" की याद आ ही जाती है।

सुजॊय - हाँ, ख़ास कर "बहने दे" "सतरंगी रे" के अंतरे "थोड़ा थोड़ा उन्स हुआ... मुझे मौत की गोद में सोने दे" से कुछ कुछ मिलता जुलता है। और इन दोनों गीतों में रहमान का स्टाइल साफ़ झलकता है। "सतरंगी" सोनू निगम की आवाज़ में था, और यह गीत गाया है कार्तिक ने। कार्तिक से रहमान ने फ़िल्म 'गजनी' में "बहका मैं बहका" गवाया था।

विश्व दीपक - कार्तिक ने हिंदी में बहुत कम गानें गाए हैं, लेकिन जो भी दो चार गानें इन्होने गाए हैं, सभी अच्छे हैं। उन्हे और ज़्यादा मौके मिलने चाहिए। इस गीत में बहुत सी अलग-अलग ध्वनियों का सहारा लिया गया है। कई उतार चढ़ाव को पार करते हुए ६ मिनट के इस गीत में कार्तिक एक ऐसे शख़्स के दिल की ख़्वाहिशें बयान करते हैं जो सारे बंधनों को तोड़ कर एक ज़िंदगी जीना चाहता है जो उसकी उसूलों पर हो।

गीत: बहने दे


सुजॊय - 'रावण' फ़िल्म का तीसरा गीत एक बार फिर "बीरा बीरा" के अंदाज़ का है। सुखविंदर सिंह की आवाज़ में एक ऐटिट्युड है, जो उन्होने कई गीतों में समय समय पर दिखाया है। इस गीत में भी उनकी गायकी का वही ऐटिट्युड भरा अंदाज़ सुनाई देता है। यह गीत है "ठोक दे किल्ली"

विश्व दीपक - इस गीत का संगीत संयोजन भी कमाल का है। ढोलक, पार्श्व में कोरस, शहनाई, और इलेक्ट्रिक गिटार, इन सब के फ़्युज़न से यह गीत एक प्रयोगधर्मी गीत बन गया है, और उस पर गुलज़ार साहब के ग़ैर पारंपरिक बोलों से गीत अनूठा बन गया है। लेकिन यह बात भी सच है कि इस तरह के गानें पूरी तरह से सिचुयशनल होते हैं जो फ़िल्म के परदे पर ही फ़िट बैठते हैं। आम जनता की ज़ुबाँ पर ये गानें मुश्किल से ही चढ पाते हैं।

सुजॊय - दरअसल यह फ़िल्म पर निर्भर करता है कि उसका संगीत किस तरह का होना चाहिए। अगर कहानी और प्लॊट अनुमति नहीं दे रहे हैं, तो संगीतकार भी कुछ ख़ास नहीं कर पाता। कुछ फ़िल्में संगीत के बलबूते पर चलती है और कुछ कहानी, अभिनय के बलबूते। उम्मीद करता हूँ कि यह फिल्म दोनों मायनों में सफ़ल हो।

विश्व दीपक - सुजोय जी, मैं आपकी बातों से इत्तेफ़ाक रखता हूँ। और वैसे भी कोई गाना कितना भी सिचुएशनल क्यों न हो, अगर उस गाने में रहमान और गुलज़ार साहब के नाम जुड़ जाते है, तो उस गाने का असर दूसरे सिचुएशनल गानों से कहीं ज्यादा होता है। जैसे कि इसी गाने को ले लीजिए... गुलज़ार साहब ने बड़े हीं आसान शब्दों (किल्ली, बिल्ली, खिल्ली, दिल्ली... ) में बहुत हीं बड़ी कह दी है.. उदाहरण के लिए यह पंक्ति "अबकी बार हिसाब चुका ले, छिन के ले ले अपना हिस्सा.. अपना खून भी लाल हीं होगा... खोल के देख ले खाल की झिल्ली"।

गीत: ठोक दे किल्ली


विश्व दीपक - चौथा गीत है "रांझा रांझा ना कर हीरे जग बदनामी होये"। रेखा भारद्वाज, जावेद अली और अनुराधा श्रीराम के गाए इस गीत से आपको सुभाष घई की फ़िल्म 'ताल' के संगीत की याद न आ जाए तो कहिएगा। लोक शैली पर बना यह गीत जोशीला भी है, सेन्शुयल भी है, और सूफ़ियाना अंदाज़ का है। लोक संगीत के साथ में मोडर्न बीट्स और गिटार का सुंदर फ़्युज़न किया गया है इस गाने में।

सुजॊय - अनुराधा श्रीराम की आवाज़ बहुत दिनों के बाद सुनने में आई है। गुलज़ार साहब के लोकशैली के बोल बेहद असरदार हैं। वैसे गीत के शुरुआती बोलों(रांझा-रांझा करदी वे मैं आप्पे रांझा होई.. रांझा-रांझा सद्दो नी मैनु हीर न आंके कोई) का क्रेडिट सूफ़ी कवि बाब बुल्ले शाह को दिया गया है। मेरा ख़याल है इस साल के टॊप-१० गीतों में यह गीत शोभा पाएगी, देखते हैं क्या होता है!

विश्व दीपक - जी हाँ, मुझे भी इस गीत से पुरी उम्मीद है। "रेखा भारद्वाज" अपनी आवाज़ से ऐसा मायाजाल बुनती हैं कि उससे बाहर निकलना हम जैसे संगीत के साधकों के लिए संभव नहीं। "रांझा-रांझा" कहते समय उनकी आवाज़ का "हस्कीनेस" चरम पर मालूम पड़ता है। जावेद अली रहमान के पसंदीदा गायक होते जा रहे हैं और इस गाने में रेखा भारद्वाज के साथ इन्हें मौका देकर (जबकि इन दोनों की गायन-शैली पूरी अलग है) रहमान ने जावेद अली में अपना यकीन दर्शाया है। वैसे मैं यह सोच रहा था कि अगर जावेद अली की जगह कैलाश खेर होते तो गाने का सूफ़ियाना असर कमाल का होता। हो सकता है कि रहमान ने कुछ और सोचा हो। चलिए हम यह गाना सुन लेते हैं।

गीत: रांझा रांझा


सुजॊय - 'रावण' का साउंडट्रैक विविधता से भरा है। अब जो पाँचवा गीत हम सुनने जा रहे हैं, वह एक बहुत ही नर्म और कर्णप्रिय गीत है रीना भारद्वाज की आवाज़ में। यह गीत है "खिली रे"। यह एक उपशास्त्रीय संगीत पर आधारित गीत है। इसमें नवीन कुमार की बांसुरी और असद ख़ान का बजाया सितार सुनने को मिलता है। तबले का भी सुंदर प्रयोग हुआ है।

विश्व दीपक - रीना भारद्वाज की आवाज़ बहुत ही मीठी है, पता नहीं उन्हे गायन के ज़्यादा मौके क्यों नहीं मिल पाए हैं। रीना जी ने जितने भी गानें गाए है, वो ज़्यादातर रहमान के लिए ही हैं। फिर एक बार सिचुयशनल गीत होने की वजह से इसकी लोकप्रियता पर प्रशचिन्ह लग जाता है। इस गीत को ऐश्वर्य राय पर फ़िल्माया गया होगा और रीना जी की आवाज़ उन पर बहुत ही फ़िट बैठी है। यानी कि अच्छा प्लेबैक!!

गीत: खिली रे


विश्व दीपक - 'रावण' एल्बम का आख़िरी गीत एक समूहगान है "कटा कटा बकरा"। दरसल यह एक हास्य रस का गीत है। सिचुयशन है कि एक आदमी की शादी हो रही है और उसके दोस्त लोग उसका मज़ाक उड़ाते हुए गा रहे हैं "कटा कटा बकरा"। समूह स्वरों में आप इला अरुण, सपना अवस्थी और कुणाल गांजावाला की आवाज़ें भी महसूस कर सकते हैं।

सुजॊय - इतना हीं नहीं इन तीनों के अलावा इस गाने में आठ और आवाज़े हैं.. लगता है कि रहमान बैकिंग वोकल्स में भी कोई समझौता नहीं करना चाहते। जहाँ तक इला अरुण और सपना अवस्थी की गायकी का सवाल है तो इन दोनों की आवाज़ों में बहुत हद तक समानता है, लेकिन इससे पहले ये दोनों कभी साथ में सुनाई नहीं दी थीं।

विश्व दीपक -इस गीत का मूल भाव कुछ-कुछ फ़िल्म 'रोजा' के "रुकमणि रुकमणि" जैसा लगता है। सुनने मे आया है कि "कटा कटा" गीत के लिए मणिरत्नम ने ५०० डान्सर्स का सहारा लिया है और इस गीत की शूटिंग ५ दिनों में पूरी की गई है। बहुत सारे ड्रम, ढोलक, तालियों की थापें, और शहनाई से इस गाने का संयोजन किया गया है। इसके लिए श्रेय जाता है मशहूर संगीत संयोजक रंजीत बारोट को। क्या आपको इसमें 'जोधा अकबर' के "अज़ीम-ओ-शान शहन्शाह" की झलक मिलती है?

गीत: कटा कटा


"रावण" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****

सुजॊय - तो विश्व दीपक जी, इस सभी ६ गीतों को सुनने के बाद मेरा रवैय्या इस फ़िल्म के साउंडट्रैक के बारे में यह बनता है कि रहमान ने नए क़िस्म का संगीत और संगीत संयोजन हमें दिया है, लेकिन सभी गीत सिचुयशनल होने की वजह से जनता की ज़ुबान पर चढ़ पाना मुश्किल सा लगता है। मेरी व्यक्तिगत पसंद है "रांझा रांझा" गीत। इस फ़िल्म को मेरी तरफ़ से शुभकामनाएँ!!!

विश्व दीपक - आपका अंदेशा बेबुनियाद नहीं है। हो सकता है कि ये गाने फिल्म रीलिज होने के बाद हीं लोगों को पसंद आएँ। लेकिन मेरा हमेशा हीं यह व्यक्तिगत मत रहा है कि रहमान के गाने लोगों की समझ और लोगों की ज़हन पर धीरे-धीरे चढते हैं। इन दिनों रहमान हर फिल्म में कोई नया प्रयोग कर रहे हैं और इस कारण संगीत की मामूली या नहीं के बराबर समझ रखने वाले लोगों को रहमान के ये प्रयोग अटपटे-से लगते हैं। फिर भी मैं हर किसी से यह गुजारिश करूँगा कि बस एक बार(या एक बार भी नहीं) सुनकर इन गानों को खारिज़ न करें। गानों को आप पर असर करने का समय दें, फिर देखना कि आप कैसे इन गानों के दिवाने हो जाते हैं।

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ४६- रीना भारद्वाज ने अपना पहला गीत रहमान की धुन पर ही गाया था। फ़िल्म और गीत बताइए।

TST ट्रिविया # ४७- अनुराधा श्रीरम की गायकी में लोक शैली की झलक हम इससे पहले अनिल कपूर आभिनीत एक फ़िल्म में सुन चुके हैं। फ़िल्म और गीत बताइए।

TST ट्रिविया # ४८- यह अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्य राय की एक फ़िल्म का युगलगीत है। इस गीत के पुरुष गायक ने हृतिक रोशन के करीयर के पहली सुपरहिट फ़िल्म में भी एक धमाकेदार गीत गाया था। गीत के अंतरे में एक लाइन है "जीता था पहले भी मगर युं था लगता, सीने में शायद तेरी कुछ कमी है"। बताइए हम किस गीत की बात कर रहे हैं, फ़िल्म का नाम क्या है, और गायक कौन हैं?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. इन तीनों फ़िल्मों में अभिनेताओं ने गीत गाए हैं, 'जोश' में शहरुख़ ख़ान (अपुन बोला तू मेरी लैला), 'हेल्लो ब्रदर' में सलमान ख़ान (चांदी की डाल पर सोने का मोर), और 'काइट्स' में हृतिक रोशन।
२. फ़िल्म 'अनुभव' के लिए राजेश रोशन ने गाया था "बाहों में आजा, सीने से मेरे तू लग जा सनम, दिल मेरा है बेक़रार"।
३. हृतिक ने ६ वर्ष की आयु में जीतेन्द्र - रीना रॊय अभिनीत फ़िल्म 'आशा' में पहली बार अभिनय किया था।

सीमा जी, आपका जवाब सही है। बधाई स्वीकारें।

Thursday, December 24, 2009

पूरी दुनिया को अपने ताल पर नचाने वाले इन गीतों के साथ मनाईये क्रिसमस और नववर्ष की खुशियाँ

दोस्तों कल है २५ दिसम्बर यानी प्रभु ईसा मसीह का जन्मदिन, जिसे पूरी दुनिया में क्रिसमस के रूप में मनाया जाता है. दूसरी तरफ वर्ष समाप्ति का भी समय है, नववर्ष के स्वागत का भी उल्लास है, ऐसे में हर कोई रोजमर्रा के ताम झाम से कुछ हद छुटकारा पाकर थोड़ी बहुत मस्ती और एन्जॉय करने के बहाने तलाश रहा है. आवाज़ तो हर हाल में आपका मीत ठहरा, तो हमने सोचा कि इन खुशियों भरी पार्टियों में आपके लिए कुछ ऐसे गीत चुन कर बजाये जाएँ, जो किसी देश, प्रदेश या भाषा की दीवारें लांग कर पूरी दुनिया पर कुछ ऐसे छा गए कि पीढ़ियों पीढयों तक लोग उन धुनों पर थिरकते पाए गए. कहते हैं संगीत की कोई भाषा नहीं होती, हमें यकीं है कि इन गीतों के शब्द आपको समझ आये या न आयें, इन्हें सुनकर आपका भी मन झूमने को कर उठेगा.

भारतीय मूल के अपेचे इंडियन सुदूर दक्षिण अमेरिका के निवासी जरूर हैं पर उनकी रगों में दौड़ता भारतीय संगीत ही आखिरकार उनकी पहचान बना. छोटे बाल, हलकी मूछें, कानों में कुंडल, रेग्गे और भांगड़ा का उपयुक्त मिश्रण और अप्पेचे बन गए अंतर्राष्ट्रीय सितारे, अपने एक गीत "चोक देयर" से, ९० के दशक में आया ये विडियो ARRANGED MARRIAGE के नाम से भी जाना जाता है, और उस दौर के लोगों को याद होगा इनमें भारतीय नृत्य करती एक महिला भी थी थी जो अप्पेचे के साथ थिरकी थीं, वाह क्या धूम मचाई थी इस जबरदस्त गीत ने, चलिए आप भी सुनकर देखें-

CHOK THERE (APPECHHE INDIAN)


डेनमार्क की इस गायिका ने रातों रात शोहरत की बुलंदियों को छु लिया अपने जबरदस्त गीत SATURDAY NIGHT से. इस महिला बैंड की मुखिया थी विग्फील्ड के नाम से मशहूर नान, जो एक सफल मॉडल भी थी. इस गीत का भी विडियो सनसनीखेज था. शायद ही किसी वीकेंड पार्टी में इस गीत को बजाया न जाता हो, तब भी और आज भी....लीजिये आप भी झूमिये.

SATURDAY NIGHT (WHIGHFIELD)


दुनिया भर में २० लाख से भी अधिक बिका ये गीत. पीटर आंद्रे ने इसे बनाया ऑस्ट्रेलिया में बैठकर, और इस गीत के बाद उन्हें दुनिया की बड़ी सेलेब्रिटियों में गिना जाने लगा, जी हाँ आपने सही पहचाना, मैं "मिस्टीरीयस गर्ल" की ही बात कर रहा हूँ, अब इस 'रहस्मयी लड़की' का रहस्य तो मोनोलिसा की मुस्कान की तरह रहस्य ही रहा पर गीत ने पूरी दुनिया में जबरदस्त धूम मचाई, सुनिए -

MYSTERIOUS GIRL (PETER ANDRE)


पार्टी गीतों का जिक्र छिड़े और इनकी चर्चा न हो संभव ही नहीं. होलैंड के इस ग्रुप ने पार्टी के दीवानों को एक से बढ़कर एक हिट गीत दिए. पर जो गीत भारत में सबसे अधिक चला वो है "ब्राज़ील", किसी भी देश के नाम पर बना ये शायद सबसे सफल गीत होगा, कहते हैं इस गीत ने ब्राज़ील के पर्यटन को जबदस्त बूम दिया. वेंगाबोय्स मुझे पता नहीं बोयस का ग्रुप था या इसमें लड़कियां भी थी, पर हाँ इनके गीतों का नशा आज भी सर चढ़ कर बोलता है, इसमें कोई शक नहीं, तो सुनिए और जम कर थिरकिये आज.

BRAZIL (VENGABOYS)


इस फनकार का जन्मदिन आज ही के दिन यानी २४ दिसम्बर १९७१ को हुआ, यानी आज रिकी मार्टिन नाम का ये फोनोमिना मना रहा है अपना जन्मदिन, लातिन अमेरिका में जन्में इस गायक/संगीतकार का गाया फ्रेंच (शायद) गीत. उ दोस थ्रेस...जिसका मतलब शायद एक दो तीन होता है, (याद कीजिये तेज़ाब का सुपर हिट गीत, उसके भी शब्द इसी गिनती से शुरू होते हैं), उसके बाद मार्टिन क्या बोलते हैं, कुछ समझ नहीं आता, पर संगीत ऐसा हो तो समझने की दरकार भी क्या है, वैसे इस गीत का एक अंग्रेजी संस्करण भी बना था जिसे FIFA में एंथम के रूप में इस्तेमाल किया गया था. ग्रेमी अवार्ड से सम्मानित रिकी मार्टिन को जन्मदिन की शुभकामनायें देते हुए आईये सुनें ये मस्त गीत

U DES TRES (RICKY MARTIN)


पेडर पेटरसन ने निर्देशित किया था इस गीत के विडियो को, YOU TUBE पर सबसे अधिक देखे गए विडियो का खिताब हासिल है, "एकुआ" के नाम से मशहूर इस बैंड का रचा ये गीत "बार्बी गर्ल" दुनिया भर में खूब सराहा गया, बच्चों में ये आज भी ख़ासा लोकप्रिय है. बुलाकर देखिये अपने नन्हें मुन्नों को कंप्यूटर के आगे और बजाइए ये गीत, देखिये जरूर खुश हो जायेगें...

BARBIE GIRL (AQUA)


इस्लामिक देश अल्जेरिया में जन्में गायक खालिद ने तमाम मुश्किलातों को दरकिनार कर विश्व संगीत में अपनी ख़ास पहचान बनायीं, नब्बे के दशक में आया इनका गीत "दीदी" भारत में इतना मशहूर हुआ कि जितना उन दिनों का कोई फ़िल्मी गीत भी नहीं हुआ था, जाहिर है बहुत से नकली संस्करण भी बने इस बेमिसाल गीत के, व्यक्तिगत तौर पर भी ये मुझे बहुत प्रिय है, इससे मेरी बचपन की ढेरों यादें जो जुडी हैं, अगर आपने पहले इसे नहीं सुना हो तो जरूर सुनिए, अजब सा सम्मोहन है इस संगीत में, और सेक्सोफोन का नशा कुछ ऐसा कि इंसान डूब सा जाता है-

DIDI (KHALID)


और अब अंत में एक ताज़ा तरीन गीत, जिसने वर्ल्ड वाईड हिट होने का खिताब अपने सर किया, मुझे गर्व है कि उसके रचेता मेरी मिटटी के सपूत जनाब ए आर रहमान साहब हैं, गीत को पहचानने का कोई इनाम नहीं मिलेगा, जी हाँ, गुलज़ार के लिखे जय हो के इस नारे ने दुनिया को हिला कर रख दिया, चलिए अब इस वर्ष के साथ साथ इस दशक को भी अलविदा कहने का समय करीब है, तो मिल कर एक सुर में क्यों न बोलें - जय हो हिंदी की, हिंदुस्तान की और हर हिन्दुस्तानी की...

JAI HO (A R RAHMAN/GULZAAR)


एक आलेख में सभी हिट गीतों को शामिल करना मुमकिन नहीं है, कुछ गीत जो झट से जेहन में आये उन्हें इस प्रस्तुति में शामिल कर लिया, वक़्त ने मौका दिया तो अगले साल इन्हीं समय के दौरान कुछ और ऐसे ही दुनिया भर में धूम मचाने वाले गीतों कि लड़ी बनाकर आपके लिए लायेगें हम....तब तक इस फेस्टिवल समय की खुशियों का आनंद लीजिये, झूमिये और नाचिये....

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