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Wednesday, August 5, 2009

एक हजारों में मेरी बहना है...रक्षा बंधन पर शायद हर भाई यही कहता होगा...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 162

"कभी भ‍इया ये बहना न पास होगी, कहीं परदेस बैठी उदास होगी, मिलने की आस होगी, जाने कौन बिछड़ जाये कब भाई बहना, राखी बंधवा ले मेरे वीर"। रक्षाबंधन के पवित्र पर्व के उपलक्ष्य पर हिंद युग्म की तरफ़ से हम आप सभी को दे रहे हैं हार्दिक शुभकामनायें। भाई बहन के पवित्र रिश्ते की डोर को और ज़्यादा मज़बूत करता है यह त्यौहार। राखी उस धागे का नाम है जिस धागे में बसा हुआ है भाई बहन का अटूट स्नेह, भाई का अपनी बहन को हर विपदा से बचाने का प्रण, और बहन का भाई के लिए मंगलकामना। इस त्यौहार को हमारे फ़िल्मकारों ने भी ख़ूब उतारा है सेल्युलायड के परदे पर। गानें भी एक से बढ़कर एक बनें हैं इस पर्व पर। क्योंकि इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर चल रहा है किशोर कुमार के गीतों से सजी लघु शृंखला 'दस रूप ज़िंदगी के और एक आवाज़', जिसके तहत हम जीवन के अलग अलग पहलुओं को किशोर दा की आवाज़ के ज़रिये महसूस कर रहे हैं, तो आज महसूस कीजिए भाई बहन के नाज़ुक-ओ-तरीन रिश्ते को किशोर दा के एक बहुत ही मशहूर गीत के माध्यम से। यह एक ऐसा सदाबहार गीत है भाई बहन के रिश्ते पर, जिस पर वक्त की धुल ज़रा भी नहीं चढ़ पायी है, ठीक वैसे ही जैसे कि भाई बहन के रिश्ते पर कभी कोई आँच नहीं आ सकती। 'हरे रामा हरे कृष्णा' फ़िल्म के इस गीत को आप ने कई कई बार सुना होगा, लेकिन आज इस ख़ास मौके पर इस गीत का महत्व कई गुणा बढ़ जाता है। हमें पूरी उम्मीद है कि आज इस गीत का आप दूसरे दिनों के मुक़ाबले ज़्यादा आनंद उठा पायेंगे।

फ़िल्म 'हरे रामा हरे कृष्णा' सन् १९७१ की फ़िल्म थी जिसके मुख्य कलाकार थे देव आनंद, ज़ीनत अमान और मुमताज़। दोस्तों, यह फ़िल्म उन गिने चुने फ़िल्मों में से है जिनकी कहानी नायक और नायिका के बजाये भाई और बहन के चरित्रों पर केन्द्रित है। भाई बहन के रिश्ते पर कामयाब व्यावसायिक फ़िल्म बनाना आसान काम नहीं है। इसमें फ़िल्मकार के पैसे दाव पर लग जाते हैं। लेकिन देव आनंद ने साहस किया और उनके उसी साहस का नतीजा है कि दर्शकों को इतनी अच्छी भावुक फ़िल्म देखने को मिली। इस फ़िल्म को देख कर किसी की आँखें नम न हुई हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। माँ बाप के अलग हो जाने की वजह से बचपन में एक दूसरे से बिछड़ गये भाई और बहन। भाई तो ज़िंदगी की सही राह पर चला लेकिन बहन भिड़ गयी हिप्पियों के दल में और डुबो दिया अपने को नशे और ख़ानाबदोशी की ज़िंदगी में। नेपाल की गलियों में भटकता हुआ भाई अपनी बहन को ढ़ूंढ ही निकालता है, लेकिन शुरु में बहन बचपन में बिछड़े भाई को पहचान नहीं पाती है। तब भाई वह गीत गाता है जो बचपन में वह उसके लिए गाया करता था (लता मंगेशकर और राहुल देव बर्मन की आवाज़ों में बचपन वाला गीत है)। भाई किस तरह से ग़लत राह पर चल पड़ने वाली बहन को सही दिशा दिखाने की कोशिश करता है, इस गीत के एक एक शब्द में उसी का वर्णन मिलता है। गीत को सुनते हुए बहन भाई को पहचान लेती है, गीत के इन दृश्यों को आप शायद ही सूखी आँखों से देखे होंगे। बहन अपने भाई को अपना परिचय देना तो चाहती है, लेकिन वो इतनी आगे निकल चुकी होती है कि वापस ज़िंदगी में लौटना उसके लिए नामुमकिन हो जाता है। इसलिए वो अपना परिचय छुपाती है और अंत में ख़ुदकुशी कर लेती है। प्रस्तुत गीत फ़िल्म का सब से महत्वपूर्ण गीत है। आनंद बक्शी, राहुल देव बर्मन और किशोर कुमार की तिकड़ी ने एक ऐसा दिल को छू लेनेवाला गीत तैयार किया है कि चाहे कितनी भी बार गीत को सुने, हर बार आँखें भर ही आती हैं। देव आनंद साहब ने ख़ुद इस फ़िल्म की कहानी लिखी और फ़िल्म को निर्देशित भी किया। इस फ़िल्म के लिए देव साहब की जितनी तारीफ़ की जाये कम ही होगी। इसके बाद शायद ही इस तरह की कोई फ़िल्म दोबारा बनी हो! इस फ़िल्म को बहुत ज़्यादा पुरस्कार तो नहीं मिला सिवाय आशा भोंसले के ("दम मारो दम" गीत के लिए फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार), लेकिन असली पुरस्कार है दर्शकों का प्यार जो इस फ़िल्म को भरपूर मिला, और साथ ही इस फ़िल्म के गीत संगीत को भी। तो लीजिए, रक्षाबंधन के इस विशेष अवसर पर सुनिये किशोर दा की आवाज़ में एक भाई के दिल की पुकार। आप सभी को एक बार फिर से रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनायें।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. किशोर दा के गाये बहतरीन गीतों में से एक.
2. कल के गीत का थीम है - "सपने".
3. मुखड़े की तीसरी पंक्ति में शब्द है -"गाँव".

कौन सा है आपकी पसंद का गीत -
अगले रविवार सुबह की कॉफी के लिए लिख भेजिए (कम से कम ५० शब्दों में ) अपनी पसंद को कोई देशभक्ति गीत और उस ख़ास गीत से जुडी अपनी कोई याद का ब्यौरा. हम आपकी पसंद के गीत आपके संस्मरण के साथ प्रस्तुत करने की कोशिश करेंगें.

पिछली पहेली का परिणाम -
रोहित राजपूत जी रूप में हमें मिले एक नए प्रतिभागी...२ अंकों के लिए बधाई रोहित जी, पराग जी अपना ख्याल रखियेगा, सभी श्रोताओं को एक बार फिर इस पावन पर्व की ढेरों शुभकामनायें...

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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