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Sunday, January 1, 2017

स्वागत नववर्ष 2017 : SWARGOSHTHI – 299 : WELCOME NEW YEAR 2017


नववर्ष 2017 पर  सभी पाठकों और श्रोताओं को हार्दिक शुभकामनाएँ 




स्वरगोष्ठी – 299 में आज

महाविजेताओं की प्रस्तुतियाँ – 1

तीसरे महाविजेता प्रफुल्ल पटेल और चौथी महाविजेता हरिणा माधवी की प्रस्तुतियाँ





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का नववर्ष के पहले अंक में हार्दिक अभिनन्दन है। इसी अंक से आपका प्रिय स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ सातवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। विगत छह वर्षों से असंख्य पाठकों, श्रोताओं, संगीत शिक्षकों और वरिष्ठ संगीतज्ञों का प्यार, दुलार और मार्गदर्शन इस स्तम्भ को मिलता रहा है। इन्टरनेट पर शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक, सुगम और फिल्म संगीत विषयक चर्चा का सम्भवतः यह एकमात्र नियमित साप्ताहिक स्तम्भ है, जो विगत छह वर्षों से निरन्तरता बनाए हुए है। इस पुनीत अवसर पर मैं कृष्णमोहन मिश्र, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सम्पादक और संचालक मण्डल के सभी सदस्यों- सजीव सारथी, सुजॉय चटर्जी, अमित तिवारी, अनुराग शर्मा, विश्वदीपक, संज्ञा टण्डन, पूजा अनिल और रीतेश खरे के साथ अपने सभी पाठकों और श्रोताओं के प्रति आभार प्रकट करता हूँ। आज सातवें वर्ष के इस प्रवेशांक से हम ‘स्वरगोष्ठी’ की संगीत पहेली के तीसरे और चौथे महाविजेताओं की प्रस्तुतियों का रसास्वादन कराएँगे। इसके अलावा नववर्ष के इस प्रवेशांक में मांगलिक अवसरों पर परम्परागत रूप से बजने वाले मंगलवाद्य शहनाई का वादन भी प्रस्तुत करेंगे। वादक हैं, भारतरत्न के सर्वोच्च अलंकरण से विभूषित उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ और राग है सर्वप्रिय भैरवी।



उस्ताद  बिस्मिल्लाह  खाँ
‘स्वरगोष्ठी’ का शुभारम्भ ठीक छः वर्ष पूर्व ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ संचालक मण्डल के प्रमुख सदस्य सुजॉय चटर्जी ने रविवार, 2 जनवरी 2011 को किया था। आरम्भ में यह ‘हिन्दयुग्म’ के ‘आवाज़’ मंच पर हमारे अन्य नियमित स्तम्भों के साथ प्रकाशित हुआ करता था। उन दिनों इस स्तम्भ का शीर्षक ‘सुर संगम’ था। दिसम्बर 2011 से हमने ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ नाम से एक अपना नया सामूहिक मंच बनाया और पाठकों के अनुरोध पर जनवरी 2012 से इस स्तम्भ का शीर्षक ‘स्वरगोष्ठी’ कर दिया गया। तब से हम आपसे निरन्तर यहीं मिलते हैं। समय-समय पर आपसे मिले सुझावों के आधार पर हम अपने सभी स्तम्भों के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ में भी संशोधन करते रहते हैं। इस स्तम्भ के प्रवेशांक में सुजॉय जी ने इसके उद्देश्यों पर प्रकाश डाला था। उन्होने लिखा था-

“नये साल के इस पहले रविवार की सुहानी सुबह में मैं, सुजॊय चटर्जी, आप सभी का 'आवाज़' पर स्वागत करता हूँ। यूँ तो हमारी मुलाक़ात नियमित रूप से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर होती रहती है, लेकिन अब से मैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के अलावा हर रविवार की सुबह भी आपसे मुख़ातिब रहूँगा इस नये स्तम्भ में जिसकी हम आज से शुरुआत कर रहे हैं। दोस्तों, प्राचीनतम संगीत की अगर हम बात करें तो वो है हमारा शास्त्रीय संगीत, जिसका उल्लेख हमें वेदों में मिलता है। चार वेदों में सामवेद में संगीत का व्यापक वर्णन मिलता है। इन वैदिक ऋचाओं को सामगान के रूप में गाया जाता था। फिर उससे 'जाति' बनी और फिर आगे चलकर 'राग' बनें। ऐसी मान्यता है कि ये अलग-अलग राग हमारे अलग-अलग 'चक्र' (ऊर्जा विन्दु) को प्रभावित करते हैं। ये अलग-अलग राग आधार बनें शास्त्रीय संगीत का और युगों-युगों से इस देश के सुरसाधक इस परम्परा को निरन्तर आगे बढ़ाते चले जा रहे हैं, हमारी संस्कृति को सहेजते हुए बढ़े जा रहे हैं। संगीत की तमाम धाराओं में सब से महत्वपूर्ण धारा है शास्त्रीय अर्थात रागदारी संगीत। बाकी जितनी तरह का संगीत है, उन सबसे उच्च स्थान पर है अपना रागदारी संगीत। तभी तो संगीत की शिक्षा का अर्थ ही है शास्त्रीय संगीत की शिक्षा। अक्सर साक्षात्कारों में कलाकार इस बात का ज़िक्र करते हैं कि एक अच्छा गायक या संगीतकार बनने के लिए शास्त्रीय संगीत का सीखना बेहद ज़रूरी है। तो दोस्तों, आज से 'आवाज़' पर पहली बार एक ऐसा साप्ताहिक स्तम्भ शुरु हो रहा है जो समर्पित है, भारतीय परम्परागत शास्त्रीय संगीत को। गायन और वादन, यानी साज़ और आवाज़, दोनों को ही बारी-बारी से इसमें शामिल किया जाएगा। भारतीय संगीत से इस स्तम्भ की हम शुरुआत कर रहे हैं, लेकिन आगे चलकर अन्य संगीत शैलियों को भी शामिल करने की उम्मीद रखते हैं।”

तो यह सन्देश हमारे इस स्तम्भ के प्रवेशांक का था। ‘स्वरगोष्ठी’ की कुछ और पुरानी यादों को ताज़ा करने से पहले आज का का चुना हुआ संगीत सुनते हैं। आज ‘स्वरगोष्ठी’ सातवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। हम इस पावन अवसर पर मंगलवाद्य शहनाई का वादन प्रस्तुत कर रहे हैं। इस अंक में हम देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारतरत्न’ से अलंकृत उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई पर बजाया राग भैरवी प्रस्तुत कर रहे हैं।


मंगलध्वनि : राग भैरवी : शहनाई वादन : उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ और साथी


हमारे दल के सर्वाधिक कर्मठ साथी सुजॉय चटर्जी ने ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ की नीव रखी थी। उद्देश्य था, शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत-प्रेमियों को एक ऐसा मंच देना जहाँ किसी कलासाधक, प्रस्तुति अथवा किसी संगीत-विधा पर हम आपसे संवाद कायम कर सकें और आपसे विचारों का आदान-प्रदान कर सकें। आज के 299वें अंक के माध्यम से हम कुछ पुरानी स्मृतियों को ताज़ा कर रहे हैं। जैसा कि पहले ही उल्लेख किया गया है कि इस स्तम्भ की बुनियाद सुजॉय चटर्जी ने रखी थी और आठवें अंक तक अपने आलेखों के माध्यम से अनेक संगीतज्ञों की कृतियों से हमें रससिक्त किया था। नौवें अंक से हमारे एक नये साथी सुमित चक्रवर्ती हमसे जुड़े और आपके अनुरोध पर उन्होने शास्त्रीय, उपशास्त्रीय संगीत के साथ लोक संगीत को भी ‘सुर संगम’ से जोड़ा। सुमित जी ने इस स्तम्भ के 30वें अंक तक आपके लिए बहुविध सामग्री प्रस्तुत की, जिसे आप सब पाठकों-श्रोताओं ने सराहा। इसी बीच मुझ अकिंचन को भी कई विशेष अवसरों पर कुछ अंक प्रस्तुत करने का अवसर मिला। सुमित जी की पारिवारिक और व्यावसायिक व्यस्तता के कारण 31वें अंक से ‘सुर संगम’ का पूर्ण दायित्व मेरे साथियों ने मुझे सौंपा। मुझ पर विश्वास करने के लिए अपने साथियों का मैं आभारी हूँ। साथ ही अपने पाठकों-श्रोताओं का अनमोल प्रोत्साहन भी मुझे मिला, जो आज भी जारी है।

पिछले अंकों में ‘स्वरगोष्ठी’ से असंख्य पाठक, श्रोता, समालोचक और संगीतकार जुड़े। हमें उनका प्यार, दुलार और मार्गदर्शन मिला। उन सभी का नामोल्लेख कर पाना सम्भव नहीं है। ‘स्वरगोष्ठी’ का सबसे रोचक भाग प्रत्येक अंक में प्रकाशित होने वाली ‘संगीत पहेली’ है। इस पहेली में बीते वर्ष के दौरान अनेक संगीत-प्रेमियों ने सहभागिता की। इन सभी उत्तरदाताओं को उनके सही जवाब पर प्रति सप्ताह अंक दिये जाते हैं। वर्ष के अन्त में सभी प्राप्तांकों की गणना की जाती है। 297वें अंक तक की गणना की जा चुकी है। इनमें से सर्वाधिक अंक प्राप्त करने वाले चार महाविजेताओं का चयन कर लिया गया है। आज के इस अंक में हम आपका परिचय पहेली के तीसरे और चौथे महाविजेता से करा रहे हैं। पहले और दूसरे महाविजेताओ की घोषणा और उनकी प्रस्तुतियों का रसास्वादन हम अगले अंक में कराएँगे।

महाविजेता डी .हरिणा माधवी
‘स्वरगोष्ठी’ की संगीत पहेली 2016 की 73 अंक प्राप्त कर चौथी महाविजेता बनीं हैं, हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी। हम उन्हें सहर्ष सम्मानित करते हैं। “संगीत जीवन का विज्ञान है”, इस सिद्धान्त को केवल मानने वाली ही नहीं बल्कि अपने जीवन में उतार लेने वाली हरिणा जी दो विषयों की शिक्षिका का दायित्व निभा रही हैं। हैदराबाद के श्री साईं स्नातकोत्तर महाविद्यालय में विगत 15 वर्षो से स्नातक और स्नातकोत्तर कक्षाओं को लाइफ साइन्स पढ़ा रही हैं। इसके साथ ही स्थानीय वासवी कालेज ऑफ म्यूजिक ऐंड डांस से भी उनका जुड़ाव है, जहाँ विभिन्न आयुवर्ग के विद्यार्थियों का मार्गदर्शन भी करती हैं। हरिणा जी को प्रारम्भिक संगीत शिक्षा अपनी माँ श्रीमती वाणी दुग्गराजू से मिली। आगे चल कर अमरावती, महाराष्ट्र के महिला महाविद्यालय की संगीत विभागाध्यक्ष श्रीमती कमला भोंडे से विधिवत संगीत सीखना शुरू किया। हरिणा जी के बाल्यावस्था के एक और संगीत गुरु एम.वी. प्रधान भी थे, जो एक कुशल तबला वादक भी थे। इनके अलावा हरिणा जी ने गुरु किरण घाटे और आर. डी. जी. कालेज, अकोला के संगीत विभागाध्यक्ष श्री नाथूलाल जायसवाल से भी संगीत सीखा। हरिणा जी ने मुम्बई के अखिल भारतीय गन्धर्व महाविद्यालय से संगीत अलंकार की उपाधि प्राप्त की है। आज के इस विशेष अंक में हम ‘स्वरगोष्ठी के इस अंक के माध्यम से ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी संचालक और सम्पादक मण्डल के सदस्य, शिक्षिका और विदुषी डी. हरिणा माधवी का महाविजेता के रूप में हार्दिक अभिनन्दन करते हैं और आपको हरिणा जी की आवाज़ में राग मारूविहाग में एक खयाल रचना सुनवाते हैं। इलाहाबाद के सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित रामाश्रय झा की यह रचना हरिणा जी द्रुत तीनताल में निबद्ध कर प्रस्तुत कर रही हैं। रचना के बोल हैं, -“मन ले गयो रे साँवरा....”। 

खयाल राग मारूविहाग : “मन ले गयो रे साँवरा...” : डी. हरिणा माधवी


महाविजेता प्रफुल्ल  पटेल 
पहेली प्रतियोगिता में 82 अंक प्राप्त कर तीसरे महाविजेता बने हैं, चेरीहिल (न्युजर्सी) के प्रफुल्ल पटेल। भारतीय शास्त्रीय संगीत में गहरी रुचि रखने वाले प्रफुल्ल पटेल न्यूजर्सी, अमेरिका में रहते हैं। साप्ताहिक स्तम्भ, ‘स्वरगोष्ठी’ को पसन्द करने वाले प्रफुल्ल जी शास्त्रीय संगीत के अलावा भारतीय लोकप्रिय संगीत भी रुचि के साथ सुनते हैं। इस प्रकार के संगीत से उन्हें गहरी रुचि है। परन्तु कहते हैं कि उन्हें पाश्चात्य संगीत ने कभी भी प्रभावित नहीं किया। पेशे से इंजीनियर भारतीय मूल के प्रफुल्ल जी पिछले पचास वर्षों से अमेरिका में रह रहे हैं। प्रफुल्ल जी स्वांतःसुखाय हारमोनियम बजाते हैं और स्वयं गाते भी है, किन्तु बताते हैं कि उनके गायन और वादन का स्तर ‘स्वरगोष्ठी’ में प्रसारित गायन अथवा वादन जैसा नहीं है। जब हमने उनसे उनका गाया अथवा बजाया अथवा उनकी पसन्द का कोई ऑडियो क्लिप भेजने का अनुरोध किया तो उन्होने किसी एक कलाकार को चुनने में असमंजस के कारण संकोच के साथ टाल दिया। ‘स्वरगोष्ठी’ की पहेली में नियमित रूप से भाग लेने वाले प्रफुल्ल जी के संगीत-ज्ञान का अनुमान इस तथ्य से किया जा सकता है कि संगीत पहेली में 82 अंक अर्जित कर उन्होने वार्षिक महाविजेताओ की सूची तीसरे महाविजेता का सम्मान प्राप्त किया है। ‘स्वरगोष्ठी के आज के इस अंक के माध्यम से ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी संचालक और सम्पादक मण्डल के सदस्य, संगीत-प्रेमी प्रफुल्ल पटेल का महाविजेता के रूप में हार्दिक अभिनन्दन करते हैं और अपनी ओर से उनकी अभिरुचि का ध्यान रखते हुए उन्हें ‘हारमोनियम’ और वाद्य के भारतीय संस्करण, ‘संवादिनी’ का युगल वादन प्रस्तुत कर रहे हैं। वादक हैं, पण्डित मनोहर चिमोटे और पण्डित गोविन्दराव पटवर्धन। दोनों महान संगीतज्ञ हारमोनियम और संवादिनी पर राग भैरवी की युगलबन्दी प्रस्तुत कर रहे हैं। आप इस मोहक युगलबन्दी का रसास्वादन कीजिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।
 
राग भैरवी : हारमोनियम-संवादिनी युगलबन्दी : पण्डित मनोहर चिमोटे और पण्डित गोविन्दराव पटवर्धन


संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 299 और 300वें अंक में हम वर्ष 2016 की संगीत पहेली के महाविजेताओं को सम्मानित कर रहे हैं, अतः इस अंक में भी हम आपको कोई संगीत पहेली नहीं दे रहे हैं। अगले अंक में हम पुनः एक नई पहेली के साथ उपस्थित होंगे।

इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 297वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘सन ऑफ इण्डिया’ से एक गीत का अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका – लता मंगेशकर और साथी

इस बार की पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज का यह अंक नववर्ष 2017 का पहला अंक था। इस अंक में हमने आपको संगीत पहेली के तीसरे और चौथे महाविजेता से परिचय कराया। अगले अंक में हम आपका परिचय पहेली के प्रथम और द्वितीय स्थान के महाविजेताओं से कराएँगे। वर्ष 2016 की प्रस्तुतियों को हमारे अनेक पाठकों ने पसन्द किया है। हम उन सबके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

: प्रत्येक शनिवार को सुजॉय चटर्जी का साप्ताहिक स्तम्भ अवश्य देखें 


Sunday, January 3, 2016

स्वागत नववर्ष 2016 : SWARGOSHTHI – 251 : RAG BHAIRAVI AND DHANI




नववर्ष पर सभी पाठकों और श्रोताओं को हार्दिक शुभकामना 




स्वरगोष्ठी – 251 में आज

मंगलध्वनि और चौथे महाविजेता की प्रस्तुति

राग भैरवी में शहनाई और राग धानी में सितार वादन से नववर्ष का अभिनन्दन





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का नए वर्ष के पहले अंक में हार्दिक अभिनन्दन है। इसी अंक से आपका प्रिय स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ छठें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। विगत पाँच वर्षों से हमें असंख्य पाठकों, श्रोताओं, संगीत शिक्षकों और वरिष्ठ संगीतज्ञों का प्यार, दुलार और मार्गदर्शन इस स्तम्भ को मिलता रहा है। इन्टरनेट पर शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक, सुगम और फिल्म संगीत विषयक चर्चा का सम्भवतः यह एकमात्र नियमित साप्ताहिक स्तम्भ है, जो विगत पाँच वर्षों से निरन्तरता बनाए हुए है। इस पुनीत अवसर पर मैं कृष्णमोहन मिश्र, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल के सभी सदस्यों- सजीव सारथी, सुजॉय चटर्जी, अमित तिवारी, अनुराग शर्मा, विश्वदीपक और संज्ञा टण्डन के साथ अपने सभी पाठकों और श्रोताओं प्रति आभार प्रकट करता हूँ। आज छठें वर्ष के इस प्रवेशांक से हम ‘स्वरगोष्ठी’ की पहेली के महाविजेताओं की प्रस्तुतियों का रसास्वादन कराएँगे। इसके अलावा नववर्ष के इस प्रवेशांक में शास्त्रीय मंचों पर और मांगलिक अवसरों पर परम्परागत रूप से सुशोभित होने वाले मंगलवाद्य शहनाई का वादन भी प्रस्तुत करेंगे। वादक हैं, भारतरत्न के सर्वोच्च अलंकरण से विभूषित उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ और राग है सर्वप्रिय भैरवी।

‘स्वरगोष्ठी’ का शुभारम्भ ठीक पाँच वर्ष पूर्व ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ संचालक मण्डल के प्रमुख सदस्य सुजॉय चटर्जी ने रविवार, 2 जनवरी 2011 को किया था। आरम्भ में यह ‘हिन्दयुग्म’ के ‘आवाज़’ मंच पर हमारे अन्य नियमित स्तम्भों के साथ प्रकाशित हुआ करता था। उन दिनों इस स्तम्भ का शीर्षक ‘सुर संगम’ था। दिसम्बर 2011 से हमने ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ नाम से एक नया सामूहिक मंच बनाया और पाठकों के अनुरोध पर जनवरी 2012 से इस स्तम्भ का शीर्षक ‘स्वरगोष्ठी’ कर दिया गया। तब से हम आपसे निरन्तर यहीं मिलते हैं। समय-समय पर आपसे मिले सुझावों के आधार पर हम अपने सभी स्तम्भों के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ में भी संशोधन करते रहते हैं। इस स्तम्भ के प्रवेशांक में सुजॉय जी ने इसके उद्देश्यों पर प्रकाश डाला था। उन्होने लिखा था-

“नये साल के इस पहले रविवार की सुहानी सुबह में मैं, सुजॊय चटर्जी, आप सभी का 'आवाज़' पर स्वागत करता हूँ। यूँ तो हमारी मुलाक़ात नियमित रूप से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर होती रहती है, लेकिन अब से मैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के अलावा हर रविवार की सुबह भी आपसे मुख़ातिब रहूँगा इस नये स्तम्भ में जिसकी हम आज से शुरुआत कर रहे हैं। दोस्तों, प्राचीनतम संगीत की अगर हम बात करें तो वो है हमारा शास्त्रीय संगीत, जिसका उल्लेख हमें वेदों में मिलता है। चार वेदों में सामवेद में संगीत का व्यापक वर्णन मिलता है। इन वैदिक ऋचाओं को सामगान के रूप में गाया जाता था। फिर उससे 'जाति' बनी और फिर आगे चलकर 'राग' बनें। ऐसी मान्यता है कि ये अलग-अलग राग हमारे अलग-अलग 'चक्र' (ऊर्जा विन्दु) को प्रभावित करते हैं। ये अलग-अलग राग आधार बनें शास्त्रीय संगीत का और युगों-युगों से इस देश के सुरसाधक इस परम्परा को निरन्तर आगे बढ़ाते चले जा रहे हैं, हमारी संस्कृति को सहेजते हुए बढ़े जा रहे हैं। संगीत की तमाम धाराओं में सब से महत्वपूर्ण धारा है शास्त्रीय अर्थात रागदारी संगीत। बाकी जितनी तरह का संगीत है, उन सबसे उच्च स्थान पर है अपना रागदारी संगीत। तभी तो संगीत की शिक्षा का अर्थ ही है शास्त्रीय संगीत की शिक्षा। अक्सर साक्षात्कारों में कलाकार इस बात का ज़िक्र करते हैं कि एक अच्छा गायक या संगीतकार बनने के लिए शास्त्रीय संगीत का सीखना बेहद ज़रूरी है। तो दोस्तों, आज से 'आवाज़' पर पहली बार एक ऐसा साप्ताहिक स्तम्भ शुरु हो रहा है जो समर्पित है, भारतीय परम्परागत शास्त्रीय संगीत को। गायन और वादन, यानी साज़ और आवाज़, दोनों को ही बारी-बारी से इसमें शामिल किया जाएगा। भारतीय संगीत से इस स्तम्भ की हम शुरुआत कर रहे हैं, लेकिन आगे चलकर अन्य संगीत शैलियों को भी शामिल करने की उम्मीद रखते हैं...”

तो यह सन्देश हमारे इस स्तम्भ के प्रवेशांक का था। ‘स्वरगोष्ठी’ की कुछ और पुरानी यादों को ताज़ा करने से पहले आज का का चुना हुआ संगीत सुनते हैं। आज ‘स्वरगोष्ठी’ छठें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। इस पावन अवसर पर मंगलवाद्य शहनाई का वादन प्रस्तुत कर रहे हैं। इस अंक में हम देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारतरत्न’ से अलंकृत उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई पर बजाया राग भैरवी प्रस्तुत कर रहे हैं।


मंगलध्वनि : राग भैरवी : शहनाई वादन : उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ



हमारे दल के सर्वाधिक कर्मठ साथी सुजोय चटर्जी ने ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ की नीव रखी थी। उद्देश्य था- शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत-प्रेमियों को एक ऐसा मंच देना जहाँ किसी कलासाधक, प्रस्तुति अथवा किसी संगीत-विधा पर हम आपसे संवाद कायम कर सकें और आपसे विचारों का आदान-प्रदान कर सकें। आज के 251वें अंक के माध्यम से हम कुछ पुरानी स्मृतियों को ताज़ा कर रहे हैं। जैसा कि पहले ही उल्लेख किया गया है कि इस स्तम्भ की बुनियाद सुजॉय चटर्जी ने रखी थी और आठवें अंक तक अपने आलेखों के माध्यम से अनेक संगीतज्ञों की कृतियों से हमें रससिक्त किया था। नौवें अंक से हमारे एक नये साथी सुमित चक्रवर्ती हमसे जुड़े और आपके अनुरोध पर उन्होने शास्त्रीय, उपशास्त्रीय संगीत के साथ लोक संगीत को भी ‘सुर संगम’ से जोड़ा। सुमित जी ने इस स्तम्भ के 30वें अंक तक आपके लिए बहुविध सामग्री प्रस्तुत की, जिसे आप सब पाठकों-श्रोताओं ने सराहा। इसी बीच मुझ अकिंचन को भी कई विशेष अवसरों पर कुछ अंक प्रस्तुत करने का अवसर मिला। सुमित जी की पारिवारिक और व्यावसायिक व्यस्तता के कारण 31वें अंक से ‘सुर संगम’ का पूर्ण दायित्व मेरे साथियों ने मुझे सौंपा। मुझ पर विश्वास करने के लिए अपने साथियों का मैं आभारी हूँ। साथ ही अपने पाठकों-श्रोताओं का अनमोल प्रोत्साहन भी मुझे मिला, जो आज भी जारी है।

पिछले 250 अंकों में ‘स्वरगोष्ठी’ से असंख्य पाठक, श्रोता, समालोचक और संगीतकार जुड़े। हमें उनका प्यार, दुलार और मार्गदर्शन मिला। उन सभी का नामोल्लेख कर पाना सम्भव नहीं है। ‘स्वरगोष्ठी’ का सबसे रोचक भाग प्रत्येक अंक में प्रकाशित होने वाली ‘संगीत पहेली’ है। इस पहेली में गत वर्ष के दौरान अनेक संगीत-प्रेमियों ने सहभागिता की। इन सभी उत्तरदाताओं को उनके सही जवाब पर प्रति सप्ताह अंक दिये गए। वर्ष के अन्त में सभी प्राप्तांकों की गणना की जाती है। 249वें अंक तक की गणना की जा चुकी है। इनमें से सर्वाधिक अंक प्राप्त करने वाले चार महाविजेताओं का चयन कर लिया गया है। प्रथम और द्वितीय महाविजेता के बीच काँटे की टक्कर है। 250वें अंक की पहेली का परिणाम इन दो महाविजेताओं का निर्धारण कर सकेगा। परन्तु तीसरे और चौथे महाविजेता का निर्धारण हो चुका है। आज के इस अंक में हम आपका परिचय पहेली के चौथे महाविजेता से करा रहे हैं। पहले तीन महाविजेताओ की घोषणा और उनकी प्रस्तुतियों का रसास्वादन हम अगले अंक में कराएँगे।

डॉ. किरीट छाया
‘स्वरगोष्ठी’ की संगीत पहेली 2015 के चौथे महाविजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया। किरीट जी पेशे से चिकित्सक हैं और 1971 से अमेरिका में निवास कर रहे हैं। मुम्बई से चिकित्सा विज्ञान से एम.डी. करने के बाद आप सपत्नीक अमेरिका चले गए। बचपन से ही किरीट जी के कानों में संगीत के स्वर स्पर्श करने लगे थे। उनकी बाल्यावस्था और शिक्षा-दीक्षा, संगीतप्रेमी और पारखी मामा-मामी के संरक्षण में बीता। बचपन से ही सुने गए भारतीय शास्त्रीय संगीत के स्वरो के प्रभाव के कारण किरीट जी आज भी संगीत से अनुराग रखते हैं। किरीट जी न तो स्वयं गाते हैं और न बजाते हैं, परन्तु संगीत सुनने के दीवाने हैं। वह इसे अपना सौभाग्य मानते हैं कि उनकी पत्नी को भी संगीत के प्रति लगाव है। नब्बे के दशक के मध्य में किरीट जी ने अमेरिका में रह रहे कुछ संगीत-प्रेमी परिवारों के सहयोग से “रागिनी म्यूजिक सर्कल” नामक संगीत संस्था का गठन किया है। इस संस्था की ओर से समय-समय पर संगीत अनुष्ठानों और संगोष्ठियों का आयोजन किया जाता है। अब तक उस्ताद विलायत खाँ, उस्ताद अमजद अली खाँ, पण्डित अजय चक्रवर्ती, पण्डित मणिलाल नाग, पण्डित बुद्धादित्य मुखर्जी आदि की संगीत सभाओं का आयोजन यह संस्था कर चुकी है। पिछले दिनों विदुषी कौशिकी चक्रवर्ती की संगीत सभा का फिलेडेल्फिया नामक स्थान पर सफलतापूर्वक आयोजन किया गया था। किरीट जी गैस्ट्रोएंटरोंलोजी चिकित्सक के रूप में विगत 40 वर्षों तक लोगों की सेवा करने के बाद पिछले जुलाई में सेवानिवृत्त हुए हैं। सेवानिवृत्ति के बाद किरीट जी अब अपना अधिकांश समय शास्त्रीय संगीत और अपनी अन्य अभिरुचि, फोटोग्राफी और 1950 से 1970 के बीच के हिन्दी फिल्म संगीत को दे रहे हैं।

‘स्वरगोष्ठी’ मंच से डॉ. किरीट छाया का सम्पर्क हमारी एक अन्य नियमित प्रतिभागी विजया राजकोटिया के माध्यम से हुआ है। किरीट जी ने संगीत पहेली में 219वें अंक से भाग लेना आरम्भ किया था। तब से वह निरन्तर हमारे सहभागी हैं और अपने संगीत-प्रेम और स्वरों की समझ के बल पर वर्ष 2015 की संगीत पहेली में चौथे महाविजेता बने हैं। उन्होने इस प्रतियोगिता में 56 अंक अर्जित कर यह सम्मान प्राप्त किया है। रेडियो प्लेबैक इण्डिया परिवार ‘स्वरगोष्ठी’ का आज का यह विशेष अंक उन्हीं के सम्मान में अर्पित करता है। हमारी परम्परा है कि हम जिन्हें सम्मानित करते हैं उनकी कला अथवा उनकी पसन्द का संगीत सुनवाते हैं। लीजिए, अब हम डॉ. किरीट छाया की पसन्द का एक वीडियो प्रस्तुत कर रहे हैं। यूट्यूब के सौजन्य से अब आप इस वीडियो के माध्यम से उस्ताद शाहिद परवेज़ का सितार पर बजाया राग धानी सुनिए और मुझे आज के इस विशेष अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। अगले विशेष अंक में हम पहेली प्रतियोगिता के प्रथम तीन महाविजेताओं को सम्मानित करेंगे।


राग धानी : आलाप और तीनताल की गत : उस्ताद शाहिद परवेज़





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 251 और 252वें अंक में हम वर्ष 2015 की पहेली के महाविजेताओं को सम्मानित कर रहे हैं, अतः इस अंक में हम आपको कोई संगीत पहेली नहीं दे रहे हैं। अगले अंक में हम पुनः एक नई पहेली के साथ उपस्थित होंगे।

इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 249वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको विदुषी परवीन सुलताना की आवाज़ में राग पहाड़ी की ठुमरी गायन का एक अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – पहाड़ी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – कहरवा या जत और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका बेगम परवीन सुलताना

इस बार की पहेली के सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल (एन.जे.) से प्रफुल्ल पटेल और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात  


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज का यह अंक नववर्ष 2016 का पहला अंक था। इस अंक में हमने आपको संगीत पहेली के चौथे महाविजेता से परिचय कराया। अगले अंक में हम आपका परिचय पहेली के प्रथम तीन महाविजेताओं से कराएँगे। वर्ष 2015 की प्रस्तुतियों को हमारे अनेक पाठकों ने पसन्द किया है। हम उन सबके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  





Friday, January 2, 2015

2014 के कमचर्चित सुरीले गीतों की हिट परेड भाग - 2



नववर्ष विशेष

2014 के कमचर्चित सुरीले गीतों की हिट परेड  - भाग 2 

The Unsung Melodies of 2014





रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार और नववर्ष 2015 की हार्दिक शुभकामनाएँ। स्वागत है आप सभी का साल 2015 की प्रथम प्रस्तुति में। आज हम वर्ष के दूसरे दिन आपके मनोरंजन के लिए हम लेकर आए हैं इस विशेष प्रस्तुति का दूसरा भाग। साल 2014 हिन्दी फ़िल्म-संगीत के लिए अच्छा ही कहा जा सकता है; अच्छा इस दृष्टि से कि इस वर्ष जनता को बहुत सारे हिट गीत मिले, जिन पर आज की युवा पीढ़ी ख़ूब थिरकी, डान्स क्लब की शान बने, FM चैनलों पर बार-बार लगातार ये गाने बजे। "बेबी डॉल", "जुम्मे की रात है", "मुझे प्यार ना मिले तो मर जावाँ", "पलट तेरा ध्यान किधर है", "आज ब्लू है पानी पानी", "तूने मारी एन्ट्री यार", "सैटरडे सैटरडे", "दिल से नाचे इण्डिया वाले", जैसे गीत तो जैसे सर चढ़ कर बोले साल भर। लेकिन इन धमाकेदार गीतों की चमक-दमक के पीछे गुमनाम रह गए कुछ ऐसे सुरीले नग़मे जिन्हें अगर लोकप्रियता मिलती तो शायद सुनने वालों को कुछ पलों के लिए सुकून मिलता। कुछ ऐसे ही कमचर्चित पर बेहद सुरीले और अर्थपूर्ण गीतों की हिट परेड लेकर हम उपस्थित हुए हैं आज की इस विशेष प्रस्तुति में। आज के इस अंक में प्रथम सात गीत हम प्रस्तुत कर रहे हैं। हमें आशा है आपको हमारी यह प्रस्तुति पसन्द आएगी। सुनिए और अपनी राय दीजिए। 


7: "अखियाँ तिहारी..." (जल)

फ़िल्म ’जल’ पिछले साल की एक क्रिटिकली ऐक्लेम्ड फ़िल्म थी जिसे देश-विदेश के कई फ़िल्म महोत्सवों में कई पुरस्कार मिले। यहाँ राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला इस फ़िल्म को। इस फ़िल्म से फ़िल्म-संगीतकार बने गायक सोनू निगम। उनके साथ बिक्रम घोष ने इस फ़िल्म में संगीत दिया। फ़िल्म का शीर्षक गीत शुभा मुदगल की आवाज़ में है "जल दे", जिसमें सोनू और बिक्रम ने मारवा और पूरिया जैसे रागों के इस्तमाल के साथ-साथ दुर्लभ साज़ आरमेनियन डुडुक का भी प्रयोग किया जिसकी काफ़ी प्रशंसा हुई। इसी फ़िल्म में उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ाँ साहब और सुज़ेन का गाया "अखियाँ तिहारी" गीत भी तारीफ़-ए-क़ाबिल है जिसे ख़ुद सोनू और बिक्रम ने ही लिखा भी है। यह सोचने वाली ही बात है कि क्यों नहीं चल पाते ऐसे गीत आज के बाज़ार में! ज़रा सुनिए तो इस गीत को!

(नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें और गीत का वीडियो देखें)



6: "तू हँसे तो लगे जैसे कोई झरणा बहता है..." (कहीं है मेरा प्यार)

’विवाह’ और ’एक विवाह ऐसा भी’ से वापसी हुई थी संगीतकार रवीन्द्र जैन की। रवीन्द्र जैन का संगीत हमेशा उत्कृष्ट रहा है। व्यावसायिक्ता के चलते उन्होंने कभी अपने संगीत से समझौता नहीं किया, फिर चाहे उनके गाने चले या ना चले। 80 के दशक में जब फ़िल्म संगीत अपने सबसे बुरे दौर से गुज़र रही थी, तब रवीन्द्र जैन उन चन्द गिने-चुने संगीतकारों में से एक थे जिन्होंने फ़िल्म संगीत के स्तर को उपर बनाये रखने की भरपूर कोशिशें की। 2014 में उनके संगीत से सजी म्युज़िकल फ़िल्म आई ’कहीं है मेरा प्यार’। फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर बुरी तरह पिट गई और फ़िल्म के गाने भी नज़रन्दाज़ हो गए। युं तो फ़िल्म के सभी गीत कर्णप्रिय हैं, पर जो गीत सबसे ज़्यादा दिलो-दिमाग़ पर हावी होता है वह है शान और श्रेया घोषाल का गाया रोमान्टिक युगल गीत "तू हँसे तो लगे जैसे कोई झरणा बहता है"। सुनिए इस गीत को और बह जाइए रवीन्द्र जैन के सुरीले धुनों में।

(नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें और गीत का वीडियो देखें)

https://www.youtube.com/watch?v=S4vOyzH0mkM


5: "जो दिखते हो, वह लगते नहीं..." (क्या दिल्ली क्या लाहौर)

’क्या दिल्ली क्या लाहौर’ 2014 की फ़िल्म रही जो 1948 के हालातों के पार्श्व पर लिखी एक कहानी पर आधारित है। देश-विभाजन पर बनने वाली इस फ़िल्म की ख़ास बात यह है कि फ़िल्म के प्रस्तुतकर्ता के रूप में गुलज़ार का नाम नामावली में दिखाई देता है। गुलज़ार देश के बटवारे के हालातों से गुज़रे हैं, इसलिए उनसे बेहतर इस फ़िल्म के साथ बेहतर न्याय और कौन सकता था भला! करण अरोड़ा निर्मित इस फ़िल्म को निर्देशित किया नवोदित निर्देशक विजय राज़ जो इस फ़िल्म के नायक भी हैं। फ़िल्म के फ़र्स्ट लूक को वाघा सीमा पर प्रदर्शित किया गया था और 2  मई 2014 को पूरे विश्व में यह फ़िल्म रिलीज़ हुई। फ़िल्म को लोगों ने पसन्द ज़रूर किया पर बॉक्स ऑफ़िस पर फ़िल्म पिट गई। गुलज़ार के लिखे गीत, संदेश शान्डिल्य का संगीत भी दब कर रह गया। इस फ़िल्म के जिस गीत को हमने चुना है वह है पाकिस्तानी गायक शफ़क़त अमानत अली का गाया "जो दिखते हो वह लगते नहीं"। इस गीत के बारे में और क्या कहें, यही काफ़ी है कि इसे गुलज़ार ने लिखा है, सुनिए।

(नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें और गीत का वीडियो देखें)



4: "शामें डूबती हैं तेरे ख़यालों में..." (ख़्वाब)

Rahat & Shreya
’ख़्वाब’ ज़ैद अली ख़ान द्वारा निर्देशित व मोराद अली ख़ान निर्मित फ़िल्म है जिसमें नवदीप सिंह और सिमर मोतियानी मुख्य भूमिकाओं में हैं। फ़िल्म में संगीत दिया है संदीप चौटा और सज्जाद अली चान्दवानी ने। 28 मार्च 2014 के दिन सलमान ख़ान के हाथों इस फ़िल्म का म्युज़िक लौन्च भी फ़िल्म को डूबने से बचा नहीं पाया। फ़िल्म में केवल तीन गीत हैं, जिसमें शीर्षक गीत सोनू निगम की आवाज़ में है और संगीतकार हैं संदीप चौटा। पर जो गीत बेहतरीन है वह है राहत फ़तेह अली ख़ान और श्रेया घोषाल की आवाज़ों में "शामेंडूबती हैं तेरे ख़यालों में"। राहत और श्रेया जब भी कभी साथ में गीत गाए हैं, वो सारे गाने कामयाब रहे हैं, और यह गीत भी कोई व्यतिक्रम नहीं है। बड़ा ही कोमल अंदाज़ में गाया हुआ यह गीत जैसे एक आस सी बंधा जाता है कि शायद फ़िल्म-संगीत का वह सुरीला दौर शायद फिर से वापस आ जाए। सुनिए यह गीत अगर आपने पहले कभी नहीं सुना है तो।

(नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें और गीत का वीडियो देखें)


3: "अन्धेरों में ढूंढ़ते हैं टुकड़ा टुकड़ा ज़िन्दगी..." (Children of War)

मृत्युंजय देवरत निर्देशित ’Children of War’ फ़िल्म 1971 के बांगलादेश मुक्ति युद्ध के पार्श्व पर बनी फ़िल्म है। पहले फ़िल्म का शीर्षक ’The Bastard Child' रखा गया था पर IMPPA ने इस शीर्षक को स्वीकृति नहीं दी। फ़िल्म में संगीत था सिद्धान्त माथुर का। इस फ़िल्म को क्रिटिकल अक्लेम मिला है। वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार सुभाष के झा ने लिखा है, "It is impossible to believe that this war epic has been directed by a first-time filmmaker. How can a virgin artiste conceive such a vivid portrait of the rape of a civilization?" गोपाल दत्त के लिखे और संगीतकार सिद्धान्त माथुर के ही गाए फ़िल्म का सबसे अच्छा गीत है "अन्धेरों में ढूंढ़ते हैं टुकड़ा टुकड़ा ज़िन्दगी", जिसे सुनना एक बेहद सुरीला अनुभव रहता है। दीपचन्दी ताल पर कम्पोज़ किया यह गीत शायद फ़िल्म की कहानी और कथन को अपने आप में समेट लेता है। सिद्धान्त की तरो-ताज़ी आवाज़ ने गीत में एक नया रंग भरा है जो शायद किसी स्थापित गायक की आवाज़ नहीं ला पाती। सुनिए और महसूस कीजिए किसी भी युद्द के दौरान बच्चों पर होने वाले शोषण और अत्याचार।

(नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें और गीत का वीडियो देखें)

https://www.youtube.com/watch?v=6LZmULljq4s


2: "मारे नैनवा के बान..." (बाज़ार-ए-हुस्न)

यह वाकई बहुत ही सराहनीय बात है कि 2014 में भी कुछ फ़िल्मकार मुन्शी प्रेमचन्द की कहानी पर फ़िल्म बनाने का जस्बा रखते हैं। इसके लिए निर्माता ए. के. मिश्र की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। प्रेम्चन्द की उर्दू उपन्यास ’बाज़ार-ए-हुस्न’ पर इसी शीर्षक से फ़िल्म बनाई मिश्र जी ने जो 18 जुलाई 2014 को प्रदर्शित हुई। रेशमी घोष, जीत गोस्वामी, ओम पुरी और यशपाल शर्मा अभिनीत इस फ़िल्म की एक और ख़ास बात यह है कि इस फ़िल्म में संगीत दिया है वरिष्ठ और सुरीले संगीतकार ख़य्याम ने। ख़य्याम साहब का संगीत हमेशा ही बड़ा सुकून देता आया है। ठहराव भरे उनके गीत जैसे कुछ पलों के लिए हमारे सारे तनाव दूर कर देते हैं। ’बाज़ार-ए-हुस्न’ के गीतों में भी ख़य्याम साहब का वही जादू सुनाई देता है। सुनिधि चौहान की आवाज़ में फ़िल्म का मुजरा "मारे नैनवा के बान" अपना छाप छोड़ जाती है; चल्ताऊ किस्म के मुजरे बनाने वालों के लिए यह मुजरा एक सबक है कि 2014 में भी स्तरीय मुजरा बनाया जा सकता है। आप भी सुनिए और मस्त हो जाइए इस मुजरे को सुनते हुए...

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https://www.youtube.com/watch?v=QEhI2-8NaPk


1: "जगावे सारी रैना..." (डेढ़ इश्क़िया)

Rekha Bhardwaj
विशाल भारद्वाज की फ़िल्म ’डेढ़ इश्क़िया’ को बॉक्स ऑफ़िस पर ख़ास सफलता नहीं मिली माधुरी दीक्षित और नसीरुद्दीन शाह जैसे मँझे हुए कलाकारों के होते हुए भी। फ़िल्म के गीत संगीत की बात करें तो "हमारी अटरिया" गीत के अलावा बाक़ी सभी गीतों का संगीत विशाल भारद्वाज ने ख़ुद ही तैयार किया है और बोल लिखे हैं गुलज़ार ने। रेखा भारद्वाज के गाए "हमारी अटरिया" दरसल बेग़म अख़्तर का गाया गीत है। राहत फ़तेह अली ख़ान की आवाज़ में "दिल का मिज़ाज इश्क़िया" और "ज़बान जले है" अपनी जगह ठीक है, पर जो गीत स्तर के लिहाज़ से सबसे उपर है, वह है रेखा भार्द्वाज और बिरजु महाराज की आवाज़ों में "जगावे सारी रैना"। शास्त्रीय संगीत की छटा लिए इस गीत में बिरजु महाराज द्वारा गाया हुआ आलाप और ताल, और साथ में सितार और तबले की थाप इस गीत को निस्संदेह वर्ष का सर्वश्रेष्ठ गीतों में से एक बनाता है। क्यों नहीं आया यह गीत किसी भी काउन्ट-डाउन में? क्यों नहीं सुनाई दिया यह गीत किसी भी रेडियो चैनल पर? क्या "जुम्मे की रात है" जैसे गीतों को सुनने की ही रुचि शेष रह गई है आजकल? लीजिए इस गीत को सुनते हुए ज़रा मंथन कीजिए कि क्यों नहीं पब्लिसिटी मिल रही है इस स्तरीय गीतों को।

(नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें और गीत का वीडियो देखें)

https://www.youtube.com/watch?v=WpXb61GsHEU 


तो यह थी नववर्ष की हमारी विशेष प्रस्तुति, आशा है आपको पसन्द आई होगी। अपनी राय टिप्पणी में ज़रूर लिखें। चलते चलते आप सभी को नववर्ष की एक बार फिर से शुभकामनाएँ देते हुए विदा लेता हूँ, नमस्कार।



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र

Thursday, January 1, 2015

2014 के कमचर्चित सुरीले गीतों की हिट परेड - भाग 1



नववर्ष विशेष

2014 के कमचर्चित सुरीले गीतों की हिट परेड  - भाग 1

The Unsung Melodies of 2014





रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार और नववर्ष 2015 की हार्दिक शुभकामनाएँ! स्वागत है आप सभी का साल 2015 की प्रथम प्रस्तुति में। आज वर्ष के पहले और दूसरे दिन आपके मनोरंजन के लिए हम लेकर आए हैं यह विशेष प्रस्तुति। साल 2014 हिन्दी फ़िल्म-संगीत के लिए अच्छा ही कहा जा सकता है; अच्छा इस दृष्टि से कि इस वर्ष जनता को बहुत सारे हिट गीत मिले, जिन पर आज की युवा पीढ़ी ख़ूब थिरकी, डान्स क्लब की शान बने, FM चैनलों पर बार-बार लगातार ये गाने बजे। "बेबी डॉल", "जुम्मे की रात है", "मुझे प्यार ना मिले तो मर जावाँ", "पलट तेरा ध्यान किधर है", "आज ब्लू है पानी पानी", "तूने मारी एन्ट्री यार", "सैटरडे सैटरडे", "दिल से नाचे इण्डिया वाले", जैसे गीत तो जैसे सर चढ़ कर बोले साल भर। लेकिन इन धमाकेदार गीतों की चमक धमक के पीछे गुमनाम रह गए कुछ ऐसे सुरीले नग़मे जिन्हें अगर लोकप्रियता मिलती तो शायद सुनने वालों को कुछ पलों के लिए सुकून मिलता। कुछ ऐसे ही कमचर्चित पर बेहद सुरीले और अर्थपूर्ण गीतों की हिट परेड लेकर हम उपस्थित हुए हैं आज की इस विशेष प्रस्तुति में। आज के इस अंक में अन्तिम सात गीत और कल के अंक में प्रथम सात गीत हम प्रस्तुत कर रहे हैं। हमें आशा है आपको हमारी यह प्रस्तुति पसन्द आएगी। सुनिए और अपनी राय दीजिए।


14: "तेरे बिन हो ना सकेगा गुज़ारा" (परांठे वाली गली)

KK
जनवरी 2014 में प्रदर्शित फ़िल्मों में ’यारियाँ’ और ’जय हो’ की तरफ़ सबका ध्यान केन्द्रित रहा। इन दो फ़िल्मों के गीत-संगीत ने भी काफ़ी धूम मचाई। इसी दौरान एक फ़िल्म आई ’परांठे वाले गली’ जो एक रोमान्टिक कॉमेडी फ़िल्म थी। सचिन गुप्ता निर्देशित तथा अनुज सक्सेना व नेहा पवार अभिनीत इस फ़िल्म में संगीत का दायित्व मिला विक्रम खजुरिआ और वसुन्धरा दास को। विक्रम द्वारा स्वरबद्ध के.के की आवाज़ में एक गीत था "तेरे बिन हो ना सकेगा गुज़ारा", जो सुनने में बेहद कर्णप्रिय है। यह गीत ना तो कभी सुनाई दिया और ना ही इसकी कोई चर्चा हुई। तो सुनिए यह गीत और आप ही निर्णय लीजिए कि आख़िर क्या कमी रह गई थी इस गीत में जो इसकी तरफ़ लोगों का ध्यान और कान नहीं गया।


 
(नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें और गीत का वीडियो देखें)



13: "ओ माँझी रे... आज तो भागे मनवा रे" (Strings of Passion)

संघामित्रा चौधरी निर्देशित फ़िल्म बनी ’Strings of Passion'। जैसा कि शीर्षक से ही प्रतीत होता है कि यह एक संगीत-प्रधान विषय की फ़िल्म है। फ़िल्म की कहानी तीन चरित्र - नील, अमन और अमित की कहानी है जो ’Strings of Passion' नामक एक बैण्ड चलाते हैं, पर ड्रग्स, टूटे रिश्ते और ख़राब माँ-बाप की वजह से उन पर काले बादल मण्डलाने लगते हैं। देव सिकदार इस फ़िल्म के संगीतकार हैं। इस फ़िल्म का एक गीत "ओ माँझी रे... आज तो भागे मनवा रे" ज़रूर आपके मन को मोह लेगा। सुनिए यह गीत जो आधुनिक होते हुए भी लोक-शैली को अपने आप में समाये हुए है। देव सिकदार की तरो-ताज़ी और गंभीर आवाज़ में यह गीत जानदार बन पड़ा है।


(नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें और गीत का वीडियो देखें)



12: "शहर मेरा" (One by Two)

'One by Two' फ़िल्म कब आई कब गई पता भी नहीं चला। शंकर-अहसान-लॉय का संगीत होने के बावजूद फ़िल्म के गीतों पर भी किसी का ध्यान नहीं गया। इस फ़िल्म में Thomas Andrews का गाया एक गीत है "शहर मेरा"। व्हिसल, वायलिन, सैक्सोफ़ोन, पियानो और जैज़ के संगम से यह गीत एक अनोखा गीत बन पड़ा है। गायक के केअर-फ़्री अंदाज़ से गीत युवा-वर्ग को लुभाने में सक्षम हो सकती थी। पर फ़िल्म की असफलता इस गीत को साथ में ले डूबी। अगर आपने यह गीत पहले नहीं सुना है तो आज कम से कम एक बार ज़रूर सुनिए।

(नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें और गीत का वीडियो देखें)



11: "साँसों को जीने का इशारा मिल गया" (ज़िद)

नई पीढ़ी के गायकों में आजकल अरिजीत सिंह की आवाज़ सर चढ़ कर बोल रही है। उनकी पारस आवाज़ जिस किसी भी गीत को छू रही है, वही सोने में तबदील हो रही है। 2014 में अरिजीत के गाए सबसे कामयाब गीत ’हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया’ में "मैं तैनु समझावाँ जी" और ’मैं तेरा हीरो’ का शीर्षक गीत रहा है। अरिजीत की आवाज़ में एक कशिश है जो उन्हें भीड से अलग करती है। सेन्सुअस गीत उनकी आवाज़ में बड़े ही प्रभावशाली सिद्ध हुए हैं। इसी बात को ध्यान में रख कर फ़िल्म ’ज़िद’ के संगीतकार शरीब-तोशी ने उनसे इस फ़िल्म का एक सेन्सुअस गीत गवाया, जिसे उन्होंने बख़ूबी निभाया। इस गीत को सुन कर महेश भट्ट और इमरान हाश्मी की वो तमाम फ़िल्में याद आने लगती हैं जिनमें इस तरह के पुरुष आवाज़ वाले सेन्सुअस गीत हुआ करते थे। तो सुनिए यह गीत और खो जाइए इस गीत की मेलडी में।

(नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें और गीत का वीडियो देखें)



10: "सोनिए..." (Heartless)

Gaurav Dagaonkar
शेखर सुमन ने दूसरी बार अपने बेटे अध्ययन सुमन को लौंच करने के लिए फ़िल्म बनाई ’Heartless' पर इस बार भी क़िस्मत ने उनका साथ नहीं दिया। फ़िल्म डूब गई और साथ ही डूब गया अध्ययन सुमन के हिट फ़िल्म पाने का सपना। इस फ़िल्म के संगीतकार गौरव दगाँवकर ने अच्छा काम किया, पर उनके संगीत की तरफ़ कुछ ख़ास ध्यान नहीं दिया गया। इस फ़िल्म में के.के का गाया एक गीत है "सोनिए" जिसे तवज्जो मिलनी चाहिए थी। गीत सुन कर के.के की ही आवाज़ में फ़िल्म ’अक्सर’ का गीत "सोनिए" याद आ जाती है, पर यह गीत बिल्कुल नया और अलग अंदाज़ का है। यूथ-अपील से भरपूर यह गीत अगर सफल होती तो यंग्‍ जेनरेशन को ख़ूब भाती इसमें कोई संदेह नहीं है। आप भी सुनिए और ख़ुद निर्णय लीजिए।



(नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें और गीत का वीडियो देखें)



9: "मुस्कुराने के बहाने ढूंढ़ती है ज़िन्दगी..." (अनुराधा)

कविता कृष्णमूर्ति एक ऐसी गायिका हैं जिनकी आवाज़ और गायकी उत्कृष्ट होने के बावजूद फ़िल्म संगीतकारों ने उनकी आवाज़ का सही-सही उपयोग नहीं किया। इसका क्या कारण है बताना मुश्किल है। पर जब भी कविता जी को कोई "अच्छा" गीत गाने का मौका मिला, उन्होंने सिद्ध किया कि मधुरता और गायकी में उनकी आवाज़ आज भी सर्वोपरि है। 2014 में एक फ़िल्म बनी ’अनुराधा’ जिसमें उनका गाया एक दार्शनिक गीत है "मुस्कुराने के बहाने ढूंढ़ती है ज़िन्दगी"। कम से कम साज़ों के इस्तमाल की वजह से उनकी आवाज़ खुल कर सामने आयी है इस गीत में और उनकी क्लासिकल मुड़कियों को भी साफ़-साफ़ सुनने का अनुभव होता है इस गीत में। शास्त्रीय रंग होते हुए भी एक आधुनिक अंदाज़ है इस गीत में, जिस वजह से हर जेनरेशन को भा सकता है यह गीत। काश कि इस फ़िल्म और इस गीत पर लोगों का ध्यान गया होता! अफ़सोस! ख़ैर, आज आप इस गीत को सुनिए....

(नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें और गीत का वीडियो देखें)



8: "दिल आजकल मेरी सुनता नहीं..." (पुरानी जीन्स)

Ram Sampath
के.के की आवाज़ इस हिट परेड में बार-बार लौट कर आ रही है, इसी से यह सिद्ध होता है कि कुछ बरस पहले जिस तरह से वो एक अंडर-रेटेड गायक हुआ करते थे, आज भी आलम कुछ बदला नहीं है। के.के कभी लाइम-लाइट में नहीं आते, पर हर साल वो कुछ ऐसे सुरीले गीत गा जाते हैं जो अगर आज नहीं तो कुछ सालों बाद ज़रूर लोग याद करेंगे इनकी मेलडी के लिए। तनुज विरवानी पर फ़िल्माया "दिल आजकल मेरी सुनता नहीं" फ़िल्म ’पुरानी जीन्स’ का सबसे कर्णप्रिय गीत है। राम सम्पथ के संगीत निर्देशन में यह गीत एक बार फिर से युवा-वर्ग का गीत है जो पहले प्यार का वर्णन करने वाले गीतों की श्रेणी का गीत है। हर दौर में इस थीम पर गीत बने हैं और यह गीत इस नए दौर का प्रतिनिधि गीत बन सकता है। सुनते हैं यह गीत।


(नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें और गीत का वीडियो देखें)

https://www.youtube.com/watch?v=5MNyvM3_yio 


तो यह थी नववर्ष की हमारी विशेष प्रस्तुति का पहला भाग। दूसरा भाग कल के अंक में प्रस्तुत किया जाएगा। आशा है आपको हमारी यह कोशिश पसन्द आई होगी। अपनी राय टिप्पणी में ज़रूर लिखें। चलते चलते हाप सभी को नववर्ष की एक बार फिर से शुभकामनाएँ देते हुए विदा लेता हूँ, नमस्कार।



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र

Thursday, January 1, 2009

स्वागत नव वर्ष 2009

नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं

मित्रों,
नव-वर्ष के शुभ अवसर पर आवाज़ और हिंद-युग्म की ओर से आप सभी का हार्दिक अभिनन्दन! ईश्वर आपके इस नए वर्ष में आपको सुख-समृद्धि, आनंद, और सफलता दे. हम सब इस संसार को एक बेहतर स्थान बना सकें. आईये सुनते हैं नव-वर्ष के इस अवसर पर आवाज़ की ओर से एक छोटी सी पेशकश.





यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें (ऑडियो फ़ाइल तीन अलग-अलग फ़ॉरमेट में है, अपनी सुविधानुसार कोई एक फ़ॉरमेट चुनें)
VBR MP364Kbps MP3Ogg Vorbis

स्वागत नव वर्ष [श्रीमती लावण्या शाह]

स्वागत नव वर्ष, है अपार हर्ष, है अपार हर्ष!
बीते दुख भरी निशा, प्रात: हो प्रतीत,
जन जन के भग्न ह्र्दय, होँ पुनः पुनीत

स्वागत नव वर्ष, है अपार हर्ष, है अपार हर्ष!
भेद कर तिमिराँचल फैले आलोकवरण,
भावी का स्वप्न जिये, हो धरा सुरभित

स्वागत नव वर्ष, है अपार हर्ष, है अपार हर्ष!
कोटी जन मनोकामना, हो पुनः विस्तिर्ण,
निर्मल मन शीतल हो, प्रेमानँद प्रमुदित

स्वागत नव वर्ष, है अपार हर्ष, है अपार हर्ष!
ज्योति कण फहरा दो, सुख स्वर्णिम बिखरा दो,
है भावना पुनीत, सदा कृपा करेँ ईश

स्वागत नव वर्ष, है अपार हर्ष, है अपार हर्ष!
*****

नव-वर्ष [डा. महेंद्र भटना़गर] नूतन वर्ष आया है!
अमन का; चैन का उपहार लाया है!
आतंक के माहौल से अब मुक्त होंगे हम,
ऐसा घना अब और छाएगा नहीं भ्रम-तम,
नूतन वर्ष आया है!
मधुर बंधुत्व का विस्तार लाया है!
सौगन्ध है — जन-जन सदा जाग्रत रहेगा अब,
संकल्प है — रक्षित सदा भारत रहेगा अब,
नूतन वर्ष आया है!
सुरक्षा का सुदृढ़ आधार लाया है!

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