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Saturday, November 19, 2016

"इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत...”, बटालवी के इस कविता की क्यों ज़रूरत आन पड़ी ’उड़ता पंजाब’ में?


एक गीत सौ कहानियाँ - 99
 

'इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार।
दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'| इसकी 99-वीं कड़ी में आज जानिए 2016 की फ़िल्म ’उड़ता पंजाब’ के मशहूर गीत "इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत ग़ुम है ग़ुम है...” के बारे में जिसे दिलजीत दोसंझ और शाहिद मालिया ने गाया था। बोल शिव कुमार बटालवी के और संगीत अमित त्रिवेदी का।

कुछ वर्ष पहले फ़िल्म ’लव आजकल’ के मशहूर गीत “अज दिन चढ़ेया तेरे रंग वरगा...” के लिए गीतकार
Shiv Kumar Batalvi
इरशाद कामिल को सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था, यह बात बहुतों को पता है। पर जो बात पंजाब के बाहर बहुत कम लोग जानते हैं, वह यह कि इस गीत का जो मुखड़ा है “अज दिन चढ़ेय तेरे रंग वरगा”, यह दरसल प्रसिद्ध पंजाबी कवि शिव कुमार बटालवी की लिखी कविता की पंक्ति है। ’लव आजकल’ के गीत के लिए बटालवी को कोई क्रेडिट नहीं मिला, पर इस वर्ष की चर्चित फ़िल्म ’उड़ता पंजाब’ में बटालवी की लिखी कविता “इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत” को जब गीत के रूप में पेश किया गया तो उन्हें पूरा-पूरा सम्मान और क्रेडिट दिया गया इस गीत के लिए। शिव कुमार बटालवी पंजाब के पहले आधुनिक कवि माने जाते हैं। उनकी कविताएँ बेहद लोकप्रिय हो जाया करती थीं और लेखन शैली ऐसी थी कि उनकी कविताओं को गीतों के रूप में भी पेश किया जा सकता था। शुरु शुरु में वो ख़ुद ही अपनी कविताओं को गा कर प्रस्तुत करते थे, पर बाद में अन्य गायकों ने भी उनकी कविताओं को ख़ूब गाया। 70 के दशक के शुरुआती किसी वर्ष में बम्बई के शणमुखानन्द हॉल में उन्होंने पहली बार “इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत” गाया था। उस दिन वो मन में एक अवसाद लेकर स्टेज पर गए थे। उनके भीतर यह भावना थी कि कई गए-गुज़रे लेखक और कवि शोहरत की बुलन्दी पर पहुँच चुके हैं जबकि वो दुनिया की नज़रों में आने के लिए कड़ी संघर्ष किए जा रहे हैं। झल्लाकर उन्होंने उस दिन स्टेज पर यह कह दिया कि “आजकल हर कोई कवि है”, और भी अनाप-शनाप कई बातें उन्होंने कही जिसकी वजह से वहाँ बैठी ऑडिएन्स भड़क उठी। तभी उन्होंने गाना शुरु किया “इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत...”। जनता शान्त हो गई और गाना ख़त्म होते ही तालियों की गड़गड़ाहट ने पूरे हॉल पर कब्ज़ा कर लिया। गीत बेहद मशहूर हो गई और कई गायकों ने इसे गाया। महेन्द्र कपूर की आवाज़ में भी यह गीत काफ़ी मशहूर हुआ था। इनके अलावा जगजीत सिंह ज़िरवी और रब्बी शेरगिल के संस्करण भी ख़ूब चर्चित रहे। और अब इस साल 2016 में विवादों से घिरी फ़िल्म ’उड़ता पंजाब’ में भी इसी गीत को दो संसकरणों में पेश किया गया। अमित त्रिवेदी के संगीत में इसे दिलजीत दोसंझ और शाहिद मालिया ने अलग-अलग गाया।


’उड़ता पंजाब’ फ़िल्म में इस कविता की ज़रूरत क्यों आन पड़ी, इस पर चर्चा करते हैं। फ़िल्म के निर्देशक अभिषेक चौबे बताते हैं, “इक कुड़ी इस फ़िल्म में आई अपने बोलों की वजह से और तब आई जब हम फ़िल्म को लिख ही रहे थे। और इस कविता के शब्द भी ऐसे थे कि जो हमारे सिचुएशन पर पूरी तरह से फ़िट बैठ रहे थे।“ संगीतकार अमित त्रिवेदी के शब्दों में, “जब मेरे पास गीत के बोल आए तो मैंने देखा कि पूरे के पूरे चार पन्ने हैं। पूरे चार पन्ने का गीत। फिर हम लोग सब एक साथ बैठे और साथ मिल कर डिसाइड किया कि जो बेस्ट लाइन्स हैं उन्हें हम इस गीत में रखें। कम्पोज़िशन में हमने मूल गीत से पाँच-छह स्केल ऊपर गए और दिलजीत ने ज़बरदस्त निभाया गीत को।“ अभिनेत्री आलिया भट्ट पर फ़िल्माये इस गीत के बारे में वो कहती हैं, “मैं समझती हूँ कि फ़िल्म में मेरे किरदार की पंजाब में आने से पहले की जो जर्नी है और पंजाब आने के बाद उसकी जर्नी कैसी हो गई, इन दोनों चीज़ों को दिखाना ज़रूरी था। इस गीत के ज़रिए इन बातों को उभारा जा सका है।“ इसमें कोई संदेह नहीं कि बटालवी के इस कविता को अमित त्रिवेदी ने एक नया रूप प्रदान किया है सिर्फ़ एक बार नहीं बल्कि दो दो बार। और दोनों संस्करण अपने आप में उम्दा है। शाहिद मालिया का गाया संस्करण ग्राम्य, लोक-आधारित और भावपूर्ण है, जबकि दिलजीत दोसंझ का गाया संस्करण समकालीन (आधुनिक) और मेलोडी-सम्पन्ना है। दोनों की अपनी-अपनी ख़ासियत है, सुनने वाले पर निर्भर करता है कि उसे कौन सा संस्करण पसन्द है! लेकिन जो भी कहें, महेन्द्र कपूर वाले संस्करण का कोई मुकाबला नहीं है।

“इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत” कविता एक गीत के लिए बहुत लम्बी है। इसलिए जब भी इसे गाया गया, कुछ पंक्तियाँ काट दी गई। ’उड़ता पंजाब’ में तो केवल मुखड़ा और कविता का पहला अन्तरा ही लिया गया है। करीब साढ़े चार मिनटों में ही गीत को निपटा दिया गया है, जबकि महेन्द्र कपूर वाले संस्करण में चार अन्तरे (तीन शुरु के और एक आख़िर का) लिया गया है। शिव कुमार बटालवी के गाए मूल गीत में उन्होंने सभी अन्तरे गाये थे। लीजिए पेश है बटालवी की लिखी यह कविता...

इक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत
गुम है गुम है गुम है
साद मुरादी सोहणी फब्बत
गुम है गुम है गुम है

सूरत उसदी परियां वरगी
सीरत दी ओह मरियम लगदी
हसदी है तां फुल्ल झड़दे ने
तुरदी है तां ग़ज़ल है लगदी
लम्म सलम्मी सरूं क़द दी
उम्र अजे है मर के अग्ग दी
पर नैणां दी गल्ल समझदी

गुमियां जन्म जन्म हन ओए
पर लगदै ज्यों कल दी गल्ल है
इयों लगदै ज्यों अज्ज दी गल्ल है
इयों लगदै ज्यों हुण दी गल्ल है
हुणे ता मेरे कोल खड़ी सी
हुणे ता मेरे कोल नहीं है
इह की छल है इह केही भटकण
सोच मेरी हैरान बड़ी है
नज़र मेरी हर ओंदे जांदे
चेहरे दा रंग फोल रही है

ओस कुड़ी नूं टोल रही है
सांझ ढले बाज़ारां दे जद
मोड़ां ते ख़ुशबू उगदी है
वेहल थकावट बेचैनी जद
चौराहियां ते आ जुड़दी है
रौले लिप्पी तनहाई विच
ओस कुड़ी दी थुड़ खांदी है
ओस कुड़ी दी थुड़ दिसदी है
हर छिन मैंनू इयें लगदा है
हर दिन मैंनू इयों लगदा है

ओस कुड़ी नूं मेरी सौंह है
ओस कुड़ी नूं आपणी सौंह है
ओस कुड़ी नूं सब दी सौंह है
ओस कुड़ी नूं रब्ब दी सौंह है
जे किते पढ़दी सुणदी होवे
जिउंदी जां उह मर रही होवे
इक वारी आ के मिल जावे
वफ़ा मेरी नूं दाग़ न लावे
नई तां मैथों जिया न जांदा
गीत कोई लिखिया न जांदा
इक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत
गुम है गुम है गुम है
साद मुरादी सोहणी फब्बत
गुम है गुम है गुम है।



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आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




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