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Thursday, January 5, 2012

हम तो हैं परदेस में देस में निकला होगा चाँद... राही मासूम रज़ा, जगजीत-चित्रा एवं आबिदा परवीन के साथ

"मेरे बिना किस हाल में होगा, कैसा होगा चाँद" - बस इस पंक्ति से हीं राही साहब ने अपने चाँद के दु:ख का पारावार खड़ कर दिया है। चाँद शायरों और कवियों के लिए वैसे हीं हमेशा प्रिय रहा है और इस एक चाँद को हर कलमकार ने अलग-अलग तरीके से पेश किया है। अधिकतर जगहों पर चाँद एक महबूबा है और शायद(?) यहाँ भी वही है।

Thursday, December 18, 2008

एक आम आदमी जिसने भोजपुरी को बना दिया खास...

भिखारी ठाकुर की जयंती पर हमारी संगीतमयी प्रस्तुति

भिखारी ठाकुर
एक आम आदमी के सतह से शिखर तक की बेजोड़ मिसाल हैं भिखारी ठाकुर... बहुत कम लोग होते हैं जो जीते-जी विभूति बन जाते हैं... दरअसल, इस भिखारी ठाकुर की जीवन-यात्रा भिखारी से ठाकुर होने की यात्रा ही है...फर्क सिर्फ यह है कि लीजेंड बनने की यह यात्रा भिखारी ने किसी रुपहले पर्दे पर नहीं असल ज़िंदगी में जिया.

भोजपुरी के नाम पर सस्ता मनोरंजन परोसने की परंपरा भी उतनी ही पुरानी है, जितना भोजपुरी का इतिहास....18 दिसंबर 1887 को छपरा के कुतुबपुर दियारा गांव में एक निम्नवर्गीय नाई परिवार में जन्म लेने वाले भिखारी ठाकुर ने विमुख होती भोजपुरी संस्कृति को नया जीवन दिया.....उन्होंने भोजपुरी संस्कृति को सामीजिक सरोकारों के साथ ऐसा पिरोया कि अभिव्यक्ति की एक धारा भिखारी शैली जानी जाने लगी...आज भी सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार का सशक्त मंच बन कर जहाँ-तहाँ भिखारी ठाकुर के नाटकों की गूंज सुनाई पड़ ही जाती है....
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भिखारी ठाकुर के स्वर में उन्हीं की कविता 'डगरिया जोहता ना".
यह काव्यपाठ 'बिदेसिया' फिल्म से ली गई है
बिदेसिया, गबर-घिचोर, बेटी-बियोग भा बेटी-बेचवा सहित उनके सभी नाटकों में बदलाव को दिशा देने वाले एक सामाजिक चिंतक की व्यथा साफ दिखती है....सबसे बड़ी बात कि उनके नाटकों में पात्र कभी केंद्र में नहीं रहे, हमेशा परिवेश केंद्र में रहा....यही वजह थी कि उनके पात्रों की निजी पीड़ा सार्वभौमिक रुप अख्तियार कर लेती थी... हर नयी शुरुआत को टेढ़ी आंखों से देखने वाले भिखारी के दौर में भी थे...सामाजिक व्यवस्था के ऐसे ठेकेदारों से भिखारी अपने नाटकों के साथ लड़े...वो अक्सर नाटकों में सूत्रधार बनते और अपनी बात बड़े चुटीले अंदाज़ में कह जाते....अपनी महीन मार की मार्फत वो अंतिम समय तक सामाजिक चेतना की अलख जगाते रहे....
कोई उन्हें भरतमुनि की परंपरा का पहला नाटककार मानता हैं तो कोई भोजपुरी का भारतेंदू हरिश्चंद्र.....महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने तो उन्हें "भोजपुरी का शेक्सपियर" की उपाधि दे दी.....इसके अलावा उन्हें कई और उपाधियाँ व सम्मान भी मिले....भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया..... इतना सम्मान मिलने पर भी भिखारी गर्व से फूले नहीं, उन्होंने बस अपना नाटककार ज़िंदा रखा...पूर्वांचल आज भी भिखारी से नाटकों से गुलज़ार है....ये बात अलग है कि सरकारी उपेक्षा का शिकार इनके गांव तक अब भी नाव से ही जाना पड़ता है....

राममुरारी के साथ निखिल आनंद गिरि



सन् १९६३ में भिखारी ठाकुर के अमर नृत्य-नाटक बिदेशिया पर एक फिल्म बनी, इसी नाम से। जिसका संगीत बहुत हिट हुआ। भिखारी ठाकुर का लिखा एक गीत 'हँसी-हँसी पनवा खियौलस बेइमनवा, अ रे बसेला परदेस' जिसे एस॰ एन॰ त्रिपाठी ने संगीतबद्द किया था और मन्ना डे गाया था। बहुत प्रसिद्ध हुआ। हम आज अपने श्रोताओं के लिए वह गीत तो लाये ही हैं, साथ में बिलकुल नये तरह से कम्पोज किया गया यही गीत लाये हैं।

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(फिल्म- बिदेसिया, संगीत- एस॰एन॰ त्रिपाठी, आवाज़- मन्ना डे)

यह प्रस्तुति हिन्द-युग्म से सितम्बर २००८ में जुड़े राजकुमार सिंह की है, जो न्यूयार्क रहते हैं। ये अपने साथियों के साथ मिलकर एक फिल्म बनाने की योजना बना रहे हैं। फिल्म का नाम होगा 'लूंगी, लोटा और सलाम'। राज भिखारी ठाकुर के इस गीत को अपनी फिल्म में रखना चाहते हैं। और यह गीत नये तरीके से तैयार भी हो गया है। 'हँसी-हँसी पनवा' को नया रूप दिया है 'Valley Of Flower' फिल्म के संगीत निर्देशक विवेक अस्थाना ने। गीत को गाया है भोजपुरी गीतों की चर्चित गायिका पूनम जैन ने। हम उम्मीद करते हैं कि यह नया प्रयोग आपको पसंद आयेगा।

इस फिल्म की बातें फिर कभी, पहले आप गीत सुनें।



(फिल्म- लूँगी, लोटा और सलाम (प्रस्तावित) , संगीत- विवेक अस्थाना और राजकुमार सिंह, आवाज़- पूनम जैन)

इस गीत के माध्यम से हम राजकुमार सिंह के साथ मिलकर अमर नाटककार भिखारी ठाकुर को श्रद्धाँजलि देना चाहते हैं।


साथ में पढ़िए भिखारी ठाकुर का दुर्लभ साक्षात्कार

Monday, October 20, 2008

पिया मेहंदी लियादा मोती झील से...जाके सायिकील से न...

मिट्टी के गीत में- कजली गीत

मिर्जापुर उत्तर प्रदेश में एक लोक कथा चलती है, कजली की कथा. ये कथा विस्थापन के दर्द की है. रोजगार की तलाश में शहर गए पति की याद में जल रही है कजली. सावन आया और विरह की पीडा असहनीय होती चली गयी. काले बादल उमड़ घुमड़ छाए. कजली के नैना भी बरसे. बिजली चमक चमक जाए तो जैसे कलेजे पर छुरी सी चले. जब सखी सहेलियां सवान में झूम झूम पिया संग झूले, कजली दूर परदेश में बसे अपने साजन को याद कर तड़प तड़प रह जाए. आह ने गीत का रूप लिया. काजमल माई के चरणों में सर रख जो गीत उसने बुने, उन्ही पीडा के तारों से बने कजरी के लोकप्रिय लोक गीत. सावन में गाये जाने वाले ये लोकगीत अमूमन औरतों द्वारा झुंड बना कर गाये जाते हैं (धुनमुनिया कजरी). कजरी गीत गावों देहातों में इतने लोकप्रिय हैं की हर बार सावन के दौरान क्षेत्रीय कलाकारों द्वारा गाये इन गीतों की cd बाज़ार में आती है और बेहद सुनी और सराही जाती है.

आसाम की वादियों और कश्मीर की घाटियों की सैर के बाद आईये चलते हैं विविधताओं से भरे पूरे प्रदेश, उत्तर प्रदेश की तरफ़. कण कण में संगीत समेटे उत्तर प्रदेश में गाये जाने वाले सावन के गीत कजरी का आनंद लीजिये आज मिटटी के गीत श्रंखला में -

बदरा घुमरी घुमरी घन गरजे... स्वर - रश्मि दत्त व् साथी



सोमा घोष कजरी की विख्यात गायिका हैं...उनकी आवाज़ में ये कजरी सुनें. जरूरी नही की सभी कजरी गीत विरहा के हों जैसे ये गीत,लौट आए पिया से की जानी वाली फरमाईशों का है - "पिया मेहंदी लियादा न मोती झील से जाके सायिकील से न...." यहाँ "सैकील" की घंटी का इस्तेमाल संगीतकार ने बहुत खूबी से किया है, सुनिए -



और अंत में सुनिए ये भोजपुरी कजरी भी "झुलाए गए झुलवा..."



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