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Sunday, November 24, 2019

राग श्री : SWARGOSHTHI – 444 : RAG SHRI






स्वरगोष्ठी – 444 में आज


पूर्वी थाट के राग – 4 : राग श्री


विदुषी श्रुति सडोलिकर से राग श्री में दो खयाल और पारुल घोष से फिल्मी गीत सुनिए




विदुषी श्रुति सड़ोलिकर
पारुल घोष
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वी थाट के राग” की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट, रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से छठा थाट पूर्वी है। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। इस श्रृंखला में हम पूर्वी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। आज के अंक में पूर्वी थाट के जन्य राग श्री पर चर्चा करेंगे। आज हम श्रृंखला के इस चौथे अंक में पहले हम आपको सुप्रसिद्ध विदुषी श्रुति सडोलिकर से इस राग में निबद्ध दो खयाल रचना प्रस्तुत करेंगे और फिर इसी राग पर आधारित एक फिल्मी गीत पारुल घोष के स्वर में सुनवाएँगे। 1951 में प्रदर्शित फिल्म “आन्दोलन” से इन्दीवर रचित और पण्डित पन्नालाल घोष का संगीतबद्ध किया एक गीत – ““प्रभु चरणों में आया पुजारी...” का रसास्वादन भी आप करेंगे।



राग श्री पूर्वी थाट का जन्य राग माना जाता है। इस राग में ऋषभ और धैवत स्वर कोमल तथा मध्यम स्वर तीव्र प्रयोग किया जाता है। आरोह में गान्धार और धैवत स्वर वर्जित होता है जबकि अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। इस प्रकार यह औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग होता है। वादी स्वर कोमल ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। इस राग के गायन-वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय दिन का चौथा अर्थात अन्तिम प्रहर माना जाता है। राग श्री के शास्त्रीय पक्ष को समझने के लिए अब हम आपके लिए इस राग में दो खयाल रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। इसे सुप्रसिद्ध संगीत विदुषी श्रुति सडोलिकर के स्वर में प्रस्तुत किया जा रहा है। यह आडियो क्लिप हमने अलबम “इवनिंग रागाज, भाग 1” से साभार लिया है। प्रस्तुत की जाने वाली खयाल रचनाओं में पहले आप विलम्बित खयाल “कहाँ मैं ढूंढन जाऊँ...” और फिर द्रुत खयाल “सुमिर कर ले आज गुरु को...” का रसास्वादन कर सकते है।

राग श्री : विलम्बित और द्रुत खयाल रचनाएँ : विदुषी श्रुति सडोलिकर


राग श्री एक प्राचीन राग है। प्राचीन काल में जब राग-रागिनी पद्धति प्रचलित थी, तब चारो मतों से राग श्री को एक मुख्य राग माना गया है। यह गम्भीर प्रकृति का राग है। इसकी गणना सन्धिप्रकाश रागों में होती है। राग श्री में कोमल ऋषभ और पंचम स्वरों की पुनरावृत्ति बार-बार की जाती है, किन्तु कोमल ऋषभ स्वर की पुनरावृत्ति करते समय गान्धार स्वर का स्पर्श भी किया जाता है। राग का यह नियम है कि वादी और संवादी स्वरों में षडज-पंचम अथवा षडज-मध्यम संवाद अवश्य होनी चाहिए। राग श्री के वादी-संवादी स्वरों में इन दोनों में से कोई भाव नहीं है। यदि हम इस राग के स्वरूप को ध्यान में रख कर वादी-संवादी चुनने का प्रयास करें तो हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि इसमें कोमल ऋषभ और पंचम के अलावा अन्य कोई स्वर वादी-संवादी नहीं हो सकते। अतः राग मारवा के समान राग श्री के वादी-संवादी के स्वरों को भी राग नियम का अपवाद माना गया है। राग श्री पर आधारित फिल्मी गीत के लिए हमने 1951 में प्रदर्शित फिल्म “आन्दोलन” का एक गीत चुना है। गीत के बोल है; “प्रभु चरणों में आया पुजारी...”। इस गीत को इन्दीवर ने लिखा और सुप्रसिद्ध बाँसुरी वादक पण्डित पन्नालाल घोष ने स्वरबद्ध किया है। गीत में पारुल घोष और साथियों ने स्वर दिया है।

राग श्री : “प्रभु चरणों में आया पुजारी...” : पारुल घोष व साथी : फिल्म – आन्दोलन



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 444वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1952 में प्रदर्शित एक फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस वर्ष की अन्तिम पहेली का उत्तर प्राप्त होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का प्रभाव है?

2 – इस गीत को किस ताल में निबद्ध किया गया है, हमें उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायक का स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 30 नवम्बर, 2019 की मध्यरात्रि तक अपने पते के साथ भेज सकते हैं। इसके बाद आपका उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 446 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 442वें अंक की पहेली में हमने आपके लिए एक रागबद्ध गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा आपसे की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – बसन्त, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – दादरा और तीनताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – आशा भोसले और महेन्द्र कपूर

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और खण्डवा, मध्यप्रदेश से रविचन्द्र जोशी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को दो-दो अंक मिलते हैं। सभी विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

पण्डित श्रीकुमार मिश्र
मित्रों, आज के अंक में सबसे पहले आपको एक शोक-सन्तप्त सूचना देना चाहता हूँ। लखनऊ के जाने-माने संगीतज्ञ, “स्वरगोष्ठी” के सबसे बड़े सहयोगी, सलाहकार और मयूर वीणा के सुप्रसिद्ध वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र गत सप्ताह संगीत-प्रेमियों और बड़ी संख्या में अपने शिष्य-शिष्याओं को छोड़ कर स्वर्गारोहण कर गए। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में डॉ. लालमणि मिश्र और पण्डित प्रदीप दीक्षित ‘नेहरंग’ द्वारा उन्हें संगीत की दीक्षा मिली। वह संगीत मार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के अनुयायी रहे और उनकी संगीत-शिक्षा का पालन भी करते रहे। इसराज वादन की शिक्षा उन्हें अपने पिता से और सुप्रसिद्ध वादक कनक राय त्रिवेदी से मिली। संगीत-शिक्षा पूर्ण करने के बाद उनकी नियुक्ति उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी में संगीत सर्वेक्षक के पद पर हो गई। सेवाकाल के ही दौरान श्रीकुमार जी ने प्राचीन संगीत ग्रन्थों का अध्ययन कर लखनऊ के वाद्य-यंत्र निर्माणकर्त्ता बादशाह खाँ से प्राचीन मयूर वीणा का निर्माण कराया। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने “दुर्लभ वाद्य संगीत कला केन्द्र” की स्थापना की और साधन-विहीन गरीब बच्चों को संगीत-शिक्षा देते रहे। आकाशवाणी और दूरदर्शन के ‘ए’ श्रेणी के कलाकर श्री मिश्र को इस वर्ष दिसम्बर में आयोजित होने वाले समारोह में अकादमी पुरस्कार के लिए चुना गया था। गत वर्ष 3 जून से लेकर 16 सितम्बर तक उनकी लिखी 14 कड़ियों की श्रृंखला “राग से रोगोपचार” का “स्वरगोष्ठी” पर प्रकाशन किया जा चुका है। “स्वरगोष्ठी” परिवार और सभी संगीत-प्रेमियों की ओर से दिवंगत साधक पण्डित श्रीकुमार मिश्र को हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित है।

‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वी थाट के राग” की चौथी कड़ी में आज आपने पूर्वी थाट के जन्य राग श्री का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस शैली के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने सुविख्यात विदुषी श्रुति सडोलिकर के स्वर में इस राग में दो खयाल रचनाओं का रसास्वादन किया। राग श्री पर आधारित रचे गए फिल्मी गीत के उदाहरण के लिए हमने आपके लिए पारुल घोष के युगल स्वर में फिल्म “आन्दोलन” का एक गीत प्रस्तुत किया। अगले अंक में हम एक नई श्रृंखला का शुभारम्भ करेंगे। कुछ तकनीकी समस्या के कारण “स्वरगोष्ठी” की पिछली कुछ कड़ियाँ हम “फेसबुक” पर अपने कुछ मित्र समूह पर साझा नहीं कर पा रहे थे। संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया
राग श्री : SWARGOSHTHI – 444 : RAG SHRI : 24 नवम्बर, 2019

Saturday, October 21, 2017

चित्रकथा - 41: भाई-दूज विशेष: फ़िल्म-संगीत जगत में भाई-बहन की जोड़ियाँ

अंक - 41

भाई-दूज विशेष: फ़िल्म-संगीत जगत में भाई-बहन की जोड़ियाँ


"एक हज़ारों में मेरी बहना है..." 



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! प्रस्तुत है फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत के विभिन्न पहलुओं से जुड़े विषयों पर आधारित शोधालेखों का स्तंभ ’चित्रशाला’। आज रक्षाबंधन है, इस पावन अवसर पर हम अपने सभी पाठकों का हार्दिक अभिनन्दन करते हैं। दोस्तों, हिन्दी सिने संगीत जगत में कई भाई-बहन की जोड़ियों ने काम किया है। आज रक्षाबंधन के अवसर पर आइए ’चित्रशाला’ के ज़रिए याद करें कुछ ऐसे भाई-बहनों को जिन्होंने फ़िल्म संगीत को समृद्ध किया है। तो आइए क्यों ना आज ’चित्रकथा’ के इस अंक में हम याद करें कुछ ऐसी ही भाई-बहन की जोड़ियों को जिन्होंने फ़िल्म-संगीत जगत में अपनी पहचान बनाई हैं, अपनी छाप छोड़ी है।




क ही परिवार के दो भाई या दो बहनों के फ़िल्म संगीत जगत में काम करने के उदाहरण तो हमें बहुत से मिल जायेंगे, पर एक ही परिवार से एक भाई और एक बहन की जोड़ियों की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती है। फ़िल्म संगीत के शुरुआती दौर की तरफ़ चलें तो सबसे पहले जिस भाई-बहन की जोड़ी हमें याद आती है, वह है सुनहरे दौर के फ़िल्म संगीतकारों में भीष्म-पितामह की हैसियत रखने वाले संगीतकार अनिल बिस्वास और फ़िल्म संगीत की प्रथम पार्श्वगायिका पारुल घोष की जोड़ी। पारुल घोष अनिल दा से दो वर्ष छोटी थीं। भाई बहन दोनों में संगीत के बीज बोये उनकी माँ ने जिन्हें संगीत से बहुत लगाव था। पारुल का विवाह अनिल दा के मित्र और बांसुरी नवाज़ पंडित पन्नालाल घोष से सम्पन्न हुआ और संगीत की धारा बहती चली गई। भाई ने अपनी बहन को अपने द्वारा स्वरबद्ध किए हुए बहुत से गीत गवाए, जिनमें पारुल घोष का सबसे हिट गीत "पपीहा रे मेरे पिया से कहियो जाए" भी शामिल है।

अनिल बिस्वास - पारुल घोष के बाद जिस जोड़ी का ज़िक्र हमारे ज़हन में आता है, वह है पार्श्वगायिका गीता दत्त और कमचर्चित संगीतकार मुकुल रॉय की। मुकुल रॉय जो आजकल महाराष्ट्र के नासिक में रहते हैं, उन्होंने अपनी बहन गीता दत्त की जीवनी "Geeta Dutt - The Skylark" को प्रकाशित करने में लेखिका हेमन्ती बनर्जी की बहुत सहायता की है। मुकुल रॉय अपनी बहन की तरह कामयाब तो नहीं हुए, पर ’सैलाब’, ’डीटेक्टिव’ और ’भेद’ जैसी फ़िल्मों में उनके स्वरबद्ध गीत बहुत लोकप्रिय हुए थे। गीता दत्त की आवाज़ में ’डीटेक्टिव’ का "मुझको तुम जो मिले ये जहान मिल गया" और ’सैलाब’ का "है यह दुनिया कौन सी ऐ दिल" गली गली गूंजा करता था। मुकुल अपनी बहन के बहुत करीब थे और गीता दत्त की ज़िन्दगी में जब निराशा और हताशा ने घर कर लिया था, तब मुकुल ही थे जिन्होंने उनका हमेशा साथ दिया। गुरु दत्त और गीता दत्त की असामयिक मृत्यु के बाद इनकी संतानों - तरुण और अरुण - को मुकुल रॉय ने ही बड़ा किया। एक भाई का अपनी बहन के प्रति निस्वार्थ प्रेम का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है भला!

एक ऐसा परिवार जिसने फ़िल्म संगीत जगत को शायद सर्वाधिक योगदान दिया है, वह है मंगेशकर परिवार। चार बहनों और एक भाई ने मिल कर संगीत का ऐसा ताना-बाना बुना है कि फ़िल्म संगीत का जब भी इतिहास लिखा जाएगा, उसके कम से कम आधे हिस्से में इस परिवार के किसी ना किसी का उल्लेख रहेगा। मंगेशकर परिवार के बारे में नई बात बताने को अब कुछ बाक़ी नहीं बचा है। लता, मीना, आशा, उषा और हृदयनाथ - चार बहनें और एक भाई - स्वाभाविक है कि इन चारों दीदी से हृदयनाथ को अपार प्यार मिला। हालाँकि हृदयनाथ हिन्दी फ़िल्म जगत में ज़्यादा काम नहीं कर सके, पर मराठी और ग़ैर फ़िल्म-संगीत में उनका योगदान उल्लेखनीय है। लता, आशा और उषा ने उनके बहुत सी सुन्दर रचनाओं को कंठ दिया है। मंगेशकर परिवार में भाई-बहन का रिश्ता अगली पीढ़ी में भी जारी रहा। आशा की संताने - हेमन्त और वर्षा - जब संगीतकार और गायिका बनीं तब आशा की ख़ुशियों का ठिकाना न रहा। आशा के शब्दों में, "कोई भी क्षण ज़िन्दगी के ऐसे होते हैं जो भुलाये नहीं जा सकते, बड़े मज़ेदार होते हैं। मेरा लड़का हेमन्त, आप समझते होंगे माँ के लिए बेटा क्या चीज़ होता है, एक दिन वो म्युज़िक डिरेक्टर बन गया और मेरे पास आकर कहने लगा कि यह मेरा गाना है, तुम गाओ। कैसा लगता है ना? जो कल तक इतना सा था, आज वो मुझसे कह रहा है कि मेरा गाना गाओ। फिर उसने अपनी बहन, मेरी बेटी वर्षा से कहने लगा कि तुम्हे भी गाना पड़ेगा। वर्षा बहुत शर्मिली है, उसने कहा कि बड़ी मासी इतना अच्छा गाती है, माँ इतना अच्छा गाती है, मैं नहीं गाऊँगी। लेकिन हेमन्त ने बहुत समझाया और उसका पहला गाना रेकॉर्ड हुआ। मैं स्टुडियो पहुँची तो देखा कि लड़की माइक के सामने खड़ी है और उसका भाई वन-टू बोल रहा है। यह क्षण मैं कभी नहीं भूल सकती। और वह गाना था फ़िल्म ’जादू-टोना’ का "यह गाँव प्यारा-प्यारा..."।" अफ़सोस की बात है कि हेमन्त और वर्षा, दोनों में से किसी को भी सफलता नहीं मिली, और वर्षा ने तो हाल ही में आत्महत्या भी कर ली।

भाई-बहन का रिश्ता हमेशा ख़ून का ही रिश्ता हो यह ज़रूरी नहीं। लता मंगेशकर का मदन मोहन के साथ सगे भाई जैसा ही रिश्ता था। इस रिश्ते की शुरुआत और पहली बार राखी बंधवाने का क़िस्सा लता के शब्दों में कुछ यूं है - "मैं पहली बार मदन भ‍इया से उनका स्वरबद्ध कोई गीत गाने के लिए नहीं बल्कि उनके साथ एक डुएट गीत गाने के लिए मिली थी। मास्टर ग़ुलाम हैदर ने हम दोनो को फ़िल्म ’शहीद’ में एक भाई-बहन के रिश्ते के गीत को गाने के लिए बुलाया था जिसके बोल थे "पिंजरे में बुलबुल बोले मेरा छोटा सा दिल डोले..."। गीत के बाद हम दोनों ने एक दूसरे की तारीफ़ की और तुरन्त हमारे बीच एक जुड़ाव सा हो गया। उन्होंने मुझसे यह वादा लिया कि जब भी वो संगीतकार बनेंगे तो उनकी पहली फ़िल्म में मुझे गाना पड़ेगा। मैंने वादा किया। पर किसी कारण से मैं उनकी पहली फ़िल्म ’आँखें’ में नहीं गा सकी और हमारे मीठे रिश्ते में एक खटास आई। मदन भ‍इया का दिल टूट गया। पर कुछ ही दिनों में मदन भ‍इया हमारे घर आए और कहा कि हमारा रिश्ता भाई-बहन के एक प्यार भरे गीत से शुरु हुआ था, आज रक्षाबंधन है, मेरी कलाई पर यह राखी बाँधो और वादा करो कि हम हमेशा भाई-बहन रहेंगे और तुम हमेशा मेरे लिए गाओगी। उन्हें राखी बाँधते हुए मेरी आँखों से आँसू टपकने लगी।"

संगीत के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण परिवार रहा है पंडित जसराज जी का। सुलक्षणा, विजेता, जतिन और ललित उन्हीं के भतीजी/भतीजे हैं। जब जतिन और ललित फ़िल्म जगत में आए तब तक सुलक्षणा फ़िल्मों से संयास ले चुकी थीं। इसलिए सुलक्षणा द्वारा जतिन-ललित के किसी गीत के गाने की जानकारी नहीं है। छोटी बहन विजेता ने ज़रूर जतिन-ललित के निर्देशन में कुछ गीत गाई हैं जिनमें "जवाँ हो यारों यह तुमको हुआ क्या" (जो जीता वही सिकन्दर) और "सच्ची यह कहानी है" (कभी हाँ कभी ना) चर्चित रहे। मंगेशकर और पंडित परिवार के बाद अब ज़िक्र शिवराम परिवार का। संगीतकार पंडित शिवराम कृष्ण का नाम आज लोग लगभग भुला चुके हैं पर चार पीढ़ियों से उनका परिवार संगीत की सेवा में निरन्तर लगा हुआ है। संगीतकार जोड़ी जुगल किशोर और तिलक राज उन्हीं के बेटे हैं जिन्होंने ’भीगी पलकें’, ’समय की धारा’ आदि फ़िल्मों में संगीत दिया है। ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ को दिए एक साक्षात्कार में जुगल किशोर जी ने अपने परिवार के बारे में बताते हुए अपनी बहनों का भी उल्लेख किया था कुछ इस तरह - "तिलक राज तो मेरा ही छोटा भाई है। बचपन से ही हम दोनों साथ में संगीत की चर्चा भी करते थे और साथ ही में बजाते भी थे। अपने स्कूल के वार्षिक दिवस के कार्यक्रम के लिए दोनों साथ में मिल कर नए गाने कम्पोज़ करते थे और स्टेज पर साथ में गाते थे। हमने अपना ऑरकेस्ट्रा भी बनाया था 'जयश्री ऑरकेस्ट्रा' के नाम से। जयश्री मेरी छोटी बहन है। आपने जयश्री शिवराम का नाम सुना होगा जो एक प्लेबैक सिंगर रही है। 'रामा ओ रामा' फ़िल्म का शीर्षक गीत उसी ने ही गाया था। हम लोग आठ भाई बहने हैं और सभी के सभी फ़िल्म इंडट्री से किसी न किसी रूप में जुड़े हुए हैं। मैं वायलिनिस्ट, कम्पोज़र और सिंगर, तिलक राज कम्पोज़र और सिंगर, मुकेश शिवराम एक सिंगर है, भगवान शिवराम एक रिदम प्लेअर, पूर्णिमा परिहार एक सिंगर, नवीन शिवराम एक कीबोर्ड प्लेअर, तथा जयश्री शिवराम व निशा चौहान सिंगर्स। इस तरह से तीन पीढ़ियों से हमारा परिवार संगीत की सेवा में लगा हुआ है।" अपनी बहन के नाम पर ऑरकेस्ट्रा रखने वाले जुगल किशोर और तिलक राज ने अपनी बहन जयश्री को फ़िल्म ’समय की धारा’ और ’तेरे बिना क्या जीना’ में गीत गवाया था। मशहूर संगीतकार बप्पी लाहिड़ी ने बरसों पहले अपनी बेटी रीमा को लौन्च किया था, और अब हाल में उनके बेटे बप्पा ने भी फ़िल्म जगत में क़दम रख दिया है। नए-नए संगीतकार बने बप्पा लाहिड़ी ने बहन रीमा को अपनी पहली फ़िल्म ’जय वीरू’ में हार्ड कौर के साथ एक गीत गवाया है "ऐसा लश्कारा..."। 

अब तक जितने भी भाई-बहन जोड़ियों की हमने बातें की, उन सब में भाई संगीतकार और बहन गायिका हैं। अब ज़िक्र करते हैं उन भाई-बहन जोड़ियों की जिनमें भाई और बहन दोनो ही गायक/गायिका हैं। पहली जोड़ी है नाज़िया हसन और ज़ोहेब हसन की। नाज़िया और ज़ोहेब, दोनों का बचपन कराची और लंदन में बीता। 70 के दशक के अन्त में दोनो ने साथ मिल कर "संग संग चलें" और "कलियों का मेला" जैसे लोकप्रिय म्युज़िकल शोज़ में गाया। 1976 में दोनो नज़र आये Beyond the Last Mountain फ़िल्म के एक गीत में। नाज़िया हसन की पहली और बेहद कामयाब ऐल्बम ’डिस्को दीवाने’ में ज़ोहेब की भी आवाज़ शामिल थी। इसके बाद ’बूम बूम’ ऐल्बम भी ख़ूब चला, जिसके गाने ’स्टार’ फ़िल्म में लिया गया। बप्पी लाहिड़ी ने नाज़िया और ज़ेहेब से फ़िल्म ’शीला’ में गीत गवाये। नाज़िय को जितनी लोकप्रियता हासिल हुई, भाई ज़ोहेब को उतनी कामयाबी नहीं मिली। अफ़सोस की बात है कि मात्र 35 वर्ष की आयु में नाज़िया हसन इस दुनिया से चल बसीं और भाई-बहन की यह जोड़ी टूट गई। सरहद के इस पार इसी तरह की एक जोड़ी रही है शान और सागरिका की। पार्श्व गायन के क्षेत्र में क़दम जमाने से पहले संगीतकार मानस मुखर्जी के बेटे शान ने अपनी बड़ी बहन सागरिका के साथ मैगनासाउण्ड कंपनी के साथ एक अनुबन्ध किया और कई ग़ैर फ़िल्मी ऐल्बम्स में गाये जिनमें ’नौजवान’ और ’Q – Funk’ ख़ास चर्चित रहे। जिस तरह से बिद्दु ने नाज़िया और ज़ोहेब की जोड़ी को काफ़ी काम दिये, वैसे ही शान और सागरिका से भी बहुत से गीत और रीमिक्स गवाये। शान-सागरिका की जोड़ी भी बहुत ज़्यादा नहीं चल सकी क्योंकि शान पार्श्वगायन में व्यस्त हो गए और सागरिका का भी अपना अलग स्टाइल था। पर भाई-बहन के आपसी रिश्ते में कभी दरार नहीं आई। मशहूर पार्श्वगायिका अलका याज्ञनिक ने अपने भाई समीर याज्ञनिक के साथ मिल कर एक प्राइवेट ऐल्बम ’दिल था यहाँ अभी’ में गीत गाए। अपने भाई को बढ़ावा मिल सके इसी उद्देश्य से अलका ने यह ऐल्बम की जिसके गीत पसन्द तो बहुत किए गए पर समीर के करीयर को सँवारने में यह ऐल्बम असफल रही।

इस तरह से हर दशक में भाई-बहन की जोड़ियाँ हिन्दी फ़िल्म-संगीत जगत में आती रही हैं और शायद आगे भी आती रहेंगी, और यह परम्परा यूं ही चलती रहेगी।


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, March 5, 2016

"मैं ख़ुश होना चाहूँ, ख़ुश हो ना सकूँ....", इसी गीत से हुई थी पार्श्वगायन की शुरुआत!


एक गीत सौ कहानियाँ - 77
 

'मैं ख़ुश होना चाहूँ, ख़ुश हो ना सकूँ...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।  इसकी 77-वीं कड़ी में आज जानिए हिन्दी सिनेमा के पहले पार्श्वगायन-युक्त गीत के बारे में। यह गीत है 1935 की फ़िल्म ’धूप छाँव’ का, "मैं ख़ुश होना चाहूँ...", जिसे के. सी. डे, पारुल घोष, सुप्रभा सरकार और हरिमति दुआ ने गाया था। बोल पंडित सुदर्शन के और संगीत राय चन्द बोराल का। 


R C Boral, K. C. Dey, Suprova Sarkar
पार्श्वगायन या ’प्लेबैक’ भारतीय सिनेमा का एक बहुत आम पक्ष है। यह सर्वविदित है कि फ़िल्मी गीतों में अभिनेताओं के लिए गायकों की आवाज़ों के प्रयोग को प्लेबैक या पार्श्वगायन कहते हैं। लेकिन आज की पीढ़ी के बहुत से संगीत रसिकों को शायद यह पता ना हो कि किस तरह से इस पार्श्वगायन की शुरुआत हुई थी। कहाँ से यह विचार किसी के मन में आया था? आज ’एक गीत सौ कहानियाँ’ में पार्श्वगायक के शुरुआत की कहानी पहले पार्श्वगायन-युक्त गीत के साथ प्रस्तुत है। भारतीय सिनेमा में पार्श्वगायन की शुरुआत का श्रेय जाता है संगीतकार राय चन्द बोराल को जो उन दिनों न्यू थिएटर्स से जुड़े हुए थे। उन्होंने ही वर्ष 1935 की फ़िल्म ’धूप छाँव’ में एक समूह गीत में पार्श्वगायन का प्रयोग किया था। नितिन बोस निर्देशित यह ऐतिहासिक फ़िल्म दरसल बंगला में इसी वर्ष निर्मित ’भाग्य चक्र’ फ़िल्म का रीमेक था। इस तरह से भले ’धूप छाँव’ को प्लेबैक-युक्त पहली हिन्दी फ़िल्म मानी जाती है, पर ’भाग्य चक्र’ इस दिशा में पहली भारतीय फ़िल्म थी। ’धूप छाँव’ फ़िल्म के लोकप्रिय गीतों में "अंधे की लाठी तू ही है...", "बाबा मन की आँखें खोल...", "तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफ़िर जाग ज़रा..." और "प्रेम की नैया चली जल में..." शामिल हैं। पर जिस गीत ने पार्श्वगायन की नीव रखी वह था "मैं ख़ुश होना चाहूँ, ख़ुश हो ना सकूँ..." जिसे चार गायक-गायिकाओं ने गाया था - के. सी. डे (मन्ना डे के चाचा), पारुल घोष (अनिल बिस्वास की बहन), सुप्रभा सरकार (उस समय शान्तिनिकेतन की छात्रा) और हरिमति दुआ। इस गीत में नायिका के लिए पार्श्वगायन किया था सुप्रभा सरकार ने, जबकि के. सी. डे ने अपने लिए और अभिनेता अहि सान्याल के लिए गाया था। पारुल और हरिमति ने अपने-अपने लिए गाए। इस तरह से के. सी. डे और सुप्रभा सरकार बने पहले पार्श्वगायक व पहली पार्श्वगायिका।


Nitin Bose & Pankaj Mullick
पंकज राग लिखित महत्वपूर्ण पुस्तक ’धुनों की यात्रा’ में यह बताया गया है कि किस तरह से निर्देशक नितिन बोस के मन में पार्श्वगायन का ख़याल आया था। हुआ यूं कि एक दिन नितिन बोस संगीतकार/गायक पंकज मल्लिक के घर के बाहर अपनी गाड़ी में बैठे-बैठे मल्लिक बाबू का इन्तज़ार कर रहे थे। दोनों को साथ में स्टुडियो जाना था। वो गाड़ी में बैठे हुए हॉर्ण बजा कर पंकज मल्लिक को बुलाए जा रहे थे पर मल्लिक बाबू के कानों में जूं तक नहीं रेंगी क्योंकि वो उस समय अपने एक पसन्दीदा अंग्रेज़ी गीत को ग्रामोफ़ोन प्लेयर पर बजा कर उसके साथ-साथ ज़ोर ज़ोर से गाते जा रहे थे। कुछ समय बाद गीत ख़त्म होने पर जब पंकज मल्लिक ने हॉर्ण की आवाज़ सुनी और भाग कर बाहर गाड़ी में पहुँचे तो गुस्से से तिलमिलाए हुए नितिन बोस ने उनसे इस देरी की वजह पूछी। पूरी बात सुनने पर नितिन बोस के मन यह बात घर कर गई कि पंकज मल्लिक किसी गीत के "साथ-साथ" गा रहे थे। उन्हें यह विचार आया कि क्यों न अभिनेता सिर्फ़ होंठ हिलाए और पीछे से कोई अच्छा गायक गीत को गाए? उस दौरान बन रही बंगला फ़िल्म ’भाग्य चक्र’ के संगीतकार बोराल बाबू को जब उन्होंने यह बात बताई तो बोराल बाबू ने बहुत ही दक्षता के साथ इसको अंजाम दिया, न केवल ’भाग्य चक्र’ में, बल्कि ’धूप छाँव’ में भी। इसमें ध्वनि-मुद्रक (sound recordist) मुकुल बोस (नितिन बोस के भाई) का भी उल्लेखनीय योगदान था। इस तरह से पार्श्वगायन की शुरुआत के लिए केवल राय चन्द बोराल को ही नहीं, बल्कि नितिन बोस, पंकज मल्लिक और मुकुल बोस को भी श्रेय जाता है।



अब सवाल यह है कि पार्श्वगायन की शुरुआत के लिए इसी गीत को क्यों चुना गया? भारतीय सिनेमा के 100 वर्ष पूर्ति पर फ़िल्म इतिहासकार विजय बालाकृष्णन ने एक साक्षात्कार में बताया था कि इस फ़िल्म में एक लम्बा ’स्टेज सीन’ फ़िल्माया जाना था जो एक गीत था। उस ज़माने में किसी एक सीन को एक ही कैमरे से और एक ही शॉट में फ़िल्माया जाता था। इसलिए इस गीत के लिए यह मुश्किल आन पड़ी कि एक तो बहुत लम्बा सीन है, उस पर गीत है। अलग अलग शॉट में फ़िल्माने का मतलब होगा कि अभिनेताओं को यह गीत छोटे-छोटे टुकड़ों में गाना पड़ेगा जिसका असर गीत के प्रवाह में पड़ेगा। इसका एक ही उपाय था कि गाने को पहले रेकॉर्ड कर लिया जाए और फ़िल्मांकन अलग अलग सीन के रूप में हो। तो जब पंकज मल्लिक वाली घटना से नितिन बोस के मन में प्लेबैक का ख़याल आया तब उन्होंने इसका प्रयोग इसी गीत में करने का फ़ैसला किया। हरमन्दिर सिंह ’हमराज़’ द्वारा संकलित ’हिन्दी फ़िल्म गीत कोश’ के अनुसार प्रस्तुत गीत से पार्श्वगायन की शुरुआत हुई थी। इस गीत को एक ड्रामा कंपनी के स्टेज परफ़ॉरमैन्स गीत के रूप में फ़िल्माया गया था। गीत कोश में इसे फ़िल्म के तीसरे गीत के रूप में चिन्हित किया गया था। यह भी उल्लेखनीय तथ्य है कि इस फ़िल्म के गीत क्रमांक-4 "आज मेरो घर मोहन आयो..." का एक भाग इस "मैं ख़ुश होना चाहूँ..." के साथ ही जुड़ा हुआ है जो अहि सान्याल की आवाज़ में है। बाद में गीत क्रमांक-4 को पूर्णत: फ़िल्माया गया है के. सी. डे व अन्य कलाकारों की आवाज़ों में। इस तरह से "मैं ख़ुश होना चाहूँ..." दरअसल दो गीतों का संगम है। 

फिल्म - धूप-छांव : "मैं खुश होना चाहूँ..." : के.सी. डे, पारुल घोष, सुप्रभा सरकार और हरिमति दुआ



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Saturday, August 29, 2015

चित्रशाला - 03 : फ़िल्म-संगीत जगत में भाई-बहन की जोड़ियाँ

चित्रशाला - 03

फ़िल्म-संगीत जगत में भाई-बहन की जोड़ियाँ




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! प्रस्तुत है फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत के विभिन्न पहलुओं से जुड़े विषयों पर आधारित शोधालेखों का स्तंभ ’चित्रशाला’। आज रक्षाबंधन है, इस पावन अवसर पर हम अपने सभी पाठकों का हार्दिक अभिनन्दन करते हैं। दोस्तों, हिन्दी सिने संगीत जगत में कई भाई-बहन की जोड़ियों ने काम किया है। आज रक्षाबंधन के अवसर पर आइए ’चित्रशाला’ के ज़रिए याद करें कुछ ऐसे भाई-बहनों को जिन्होंने फ़िल्म संगीत को समृद्ध किया है।




क ही परिवार के दो भाई या दो बहनों के फ़िल्म संगीत जगत में काम करने के उदाहरण तो हमें बहुत से मिल जायेंगे, पर एक ही परिवार से एक भाई और एक बहन की जोड़ियों की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती है। फ़िल्म संगीत के शुरुआती दौर की तरफ़ चलें तो सबसे पहले जिस भाई-बहन की जोड़ी हमें याद आती है, वह है सुनहरे दौर के फ़िल्म संगीतकारों में भीष्म-पितामह की हैसियत रखने वाले संगीतकार अनिल बिस्वास और फ़िल्म संगीत की प्रथम पार्श्वगायिका पारुल घोष की जोड़ी। पारुल घोष अनिल दा से दो वर्ष छोटी थीं। भाई बहन दोनों में संगीत के बीज बोये उनकी माँ ने जिन्हें संगीत से बहुत लगाव था। पारुल का विवाह अनिल दा के मित्र और बांसुरी नवाज़ पंडित पन्नालाल घोष से सम्पन्न हुआ और संगीत की धारा बहती चली गई। भाई ने अपनी बहन को अपने द्वारा स्वरबद्ध किए हुए बहुत से गीत गवाए, जिनमें पारुल घोष का सबसे हिट गीत "पपीहा रे मेरे पिया से कहियो जाए" भी शामिल है।

अनिल बिस्वास - पारुल घोष के बाद जिस जोड़ी का ज़िक्र हमारे ज़हन में आता है, वह है पार्श्वगायिका गीता दत्त और कमचर्चित संगीतकार मुकुल रॉय की। मुकुल रॉय जो आजकल महाराष्ट्र के नासिक में रहते हैं, उन्होंने अपनी बहन गीता दत्त की जीवनी "Geeta Dutt - The Skylark" को प्रकाशित करने में लेखिका हेमन्ती बनर्जी की बहुत सहायता की है। मुकुल रॉय अपनी बहन की तरह कामयाब तो नहीं हुए, पर ’सैलाब’, ’डीटेक्टिव’ और ’भेद’ जैसी फ़िल्मों में उनके स्वरबद्ध गीत बहुत लोकप्रिय हुए थे। गीता दत्त की आवाज़ में ’डीटेक्टिव’ का "मुझको तुम जो मिले ये जहान मिल गया" और ’सैलाब’ का "है यह दुनिया कौन सी ऐ दिल" गली गली गूंजा करता था। मुकुल अपनी बहन के बहुत करीब थे और गीता दत्त की ज़िन्दगी में जब निराशा और हताशा ने घर कर लिया था, तब मुकुल ही थे जिन्होंने उनका हमेशा साथ दिया। गुरु दत्त और गीता दत्त की असामयिक मृत्यु के बाद इनकी संतानों - तरुण और अरुण - को मुकुल रॉय ने ही बड़ा किया। एक भाई का अपनी बहन के प्रति निस्वार्थ प्रेम का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है भला!

एक ऐसा परिवार जिसने फ़िल्म संगीत जगत को शायद सर्वाधिक योगदान दिया है, वह है मंगेशकर परिवार। चार बहनों और एक भाई ने मिल कर संगीत का ऐसा ताना-बाना बुना है कि फ़िल्म संगीत का जब भी इतिहास लिखा जाएगा, उसके कम से कम आधे हिस्से में इस परिवार के किसी ना किसी का उल्लेख रहेगा। मंगेशकर परिवार के बारे में नई बात बताने को अब कुछ बाक़ी नहीं बचा है। लता, मीना, आशा, उषा और हृदयनाथ - चार बहनें और एक भाई - स्वाभाविक है कि इन चारों दीदी से हृदयनाथ को अपार प्यार मिला। हालाँकि हृदयनाथ हिन्दी फ़िल्म जगत में ज़्यादा काम नहीं कर सके, पर मराठी और ग़ैर फ़िल्म-संगीत में उनका योगदान उल्लेखनीय है। लता, आशा और उषा ने उनके बहुत सी सुन्दर रचनाओं को कंठ दिया है। मंगेशकर परिवार में भाई-बहन का रिश्ता अगली पीढ़ी में भी जारी रहा। आशा की संताने - हेमन्त और वर्षा - जब संगीतकार और गायिका बनीं तब आशा की ख़ुशियों का ठिकाना न रहा। आशा के शब्दों में, "कोई भी क्षण ज़िन्दगी के ऐसे होते हैं जो भुलाये नहीं जा सकते, बड़े मज़ेदार होते हैं। मेरा लड़का हेमन्त, आप समझते होंगे माँ के लिए बेटा क्या चीज़ होता है, एक दिन वो म्युज़िक डिरेक्टर बन गया और मेरे पास आकर कहने लगा कि यह मेरा गाना है, तुम गाओ। कैसा लगता है ना? जो कल तक इतना सा था, आज वो मुझसे कह रहा है कि मेरा गाना गाओ। फिर उसने अपनी बहन, मेरी बेटी वर्षा से कहने लगा कि तुम्हे भी गाना पड़ेगा। वर्षा बहुत शर्मिली है, उसने कहा कि बड़ी मासी इतना अच्छा गाती है, माँ इतना अच्छा गाती है, मैं नहीं गाऊँगी। लेकिन हेमन्त ने बहुत समझाया और उसका पहला गाना रेकॉर्ड हुआ। मैं स्टुडियो पहुँची तो देखा कि लड़की माइक के सामने खड़ी है और उसका भाई वन-टू बोल रहा है। यह क्षण मैं कभी नहीं भूल सकती। और वह गाना था फ़िल्म ’जादू-टोना’ का "यह गाँव प्यारा-प्यारा..."।" अफ़सोस की बात है कि हेमन्त और वर्षा, दोनों में से किसी को भी सफलता नहीं मिली, और वर्षा ने तो हाल ही में आत्महत्या भी कर ली।

भाई-बहन का रिश्ता हमेशा ख़ून का ही रिश्ता हो यह ज़रूरी नहीं। लता मंगेशकर का मदन मोहन के साथ सगे भाई जैसा ही रिश्ता था। इस रिश्ते की शुरुआत और पहली बार राखी बंधवाने का क़िस्सा लता के शब्दों में कुछ यूं है - "मैं पहली बार मदन भ‍इया से उनका स्वरबद्ध कोई गीत गाने के लिए नहीं बल्कि उनके साथ एक डुएट गीत गाने के लिए मिली थी। मास्टर ग़ुलाम हैदर ने हम दोनो को फ़िल्म ’शहीद’ में एक भाई-बहन के रिश्ते के गीत को गाने के लिए बुलाया था जिसके बोल थे "पिंजरे में बुलबुल बोले मेरा छोटा सा दिल डोले..."। गीत के बाद हम दोनों ने एक दूसरे की तारीफ़ की और तुरन्त हमारे बीच एक जुड़ाव सा हो गया। उन्होंने मुझसे यह वादा लिया कि जब भी वो संगीतकार बनेंगे तो उनकी पहली फ़िल्म में मुझे गाना पड़ेगा। मैंने वादा किया। पर किसी कारण से मैं उनकी पहली फ़िल्म ’आँखें’ में नहीं गा सकी और हमारे मीठे रिश्ते में एक खटास आई। मदन भ‍इया का दिल टूट गया। पर कुछ ही दिनों में मदन भ‍इया हमारे घर आए और कहा कि हमारा रिश्ता भाई-बहन के एक प्यार भरे गीत से शुरु हुआ था, आज रक्षाबंधन है, मेरी कलाई पर यह राखी बाँधो और वादा करो कि हम हमेशा भाई-बहन रहेंगे और तुम हमेशा मेरे लिए गाओगी। उन्हें राखी बाँधते हुए मेरी आँखों से आँसू टपकने लगी।"

संगीत के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण परिवार रहा है पंडित जसराज जी का। सुलक्षणा, विजेता, जतिन और ललित उन्हीं के भतीजी/भतीजे हैं। जब जतिन और ललित फ़िल्म जगत में आए तब तक सुलक्षणा फ़िल्मों से संयास ले चुकी थीं। इसलिए सुलक्षणा द्वारा जतिन-ललित के किसी गीत के गाने की जानकारी नहीं है। छोटी बहन विजेता ने ज़रूर जतिन-ललित के निर्देशन में कुछ गीत गाई हैं जिनमें "जवाँ हो यारों यह तुमको हुआ क्या" (जो जीता वही सिकन्दर) और "सच्ची यह कहानी है" (कभी हाँ कभी ना) चर्चित रहे। मंगेशकर और पंडित परिवार के बाद अब ज़िक्र शिवराम परिवार का। संगीतकार पंडित शिवराम कृष्ण का नाम आज लोग लगभग भुला चुके हैं पर चार पीढ़ियों से उनका परिवार संगीत की सेवा में निरन्तर लगा हुआ है। संगीतकार जोड़ी जुगल किशोर और तिलक राज उन्हीं के बेटे हैं जिन्होंने ’भीगी पलकें’, ’समय की धारा’ आदि फ़िल्मों में संगीत दिया है। ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ को दिए एक साक्षात्कार में जुगल किशोर जी ने अपने परिवार के बारे में बताते हुए अपनी बहनों का भी उल्लेख किया था कुछ इस तरह - "तिलक राज तो मेरा ही छोटा भाई है। बचपन से ही हम दोनों साथ में संगीत की चर्चा भी करते थे और साथ ही में बजाते भी थे। अपने स्कूल के वार्षिक दिवस के कार्यक्रम के लिए दोनों साथ में मिल कर नए गाने कम्पोज़ करते थे और स्टेज पर साथ में गाते थे। हमने अपना ऑरकेस्ट्रा भी बनाया था 'जयश्री ऑरकेस्ट्रा' के नाम से। जयश्री मेरी छोटी बहन है। आपने जयश्री शिवराम का नाम सुना होगा जो एक प्लेबैक सिंगर रही है। 'रामा ओ रामा' फ़िल्म का शीर्षक गीत उसी ने ही गाया था। हम लोग आठ भाई बहने हैं और सभी के सभी फ़िल्म इंडट्री से किसी न किसी रूप में जुड़े हुए हैं। मैं वायलिनिस्ट, कम्पोज़र और सिंगर, तिलक राज कम्पोज़र और सिंगर, मुकेश शिवराम एक सिंगर है, भगवान शिवराम एक रिदम प्लेअर, पूर्णिमा परिहार एक सिंगर, नवीन शिवराम एक कीबोर्ड प्लेअर, तथा जयश्री शिवराम व निशा चौहान सिंगर्स। इस तरह से तीन पीढ़ियों से हमारा परिवार संगीत की सेवा में लगा हुआ है।" अपनी बहन के नाम पर ऑरकेस्ट्रा रखने वाले जुगल किशोर और तिलक राज ने अपनी बहन जयश्री को फ़िल्म ’समय की धारा’ और ’तेरे बिना क्या जीना’ में गीत गवाया था। मशहूर संगीतकार बप्पी लाहिड़ी ने बरसों पहले अपनी बेटी रीमा को लौन्च किया था, और अब हाल में उनके बेटे बप्पा ने भी फ़िल्म जगत में क़दम रख दिया है। नए-नए संगीतकार बने बप्पा लाहिड़ी ने बहन रीमा को अपनी पहली फ़िल्म ’जय वीरू’ में हार्ड कौर के साथ एक गीत गवाया है "ऐसा लश्कारा..."। 

अब तक जितने भी भाई-बहन जोड़ियों की हमने बातें की, उन सब में भाई संगीतकार और बहन गायिका हैं। अब ज़िक्र करते हैं उन भाई-बहन जोड़ियों की जिनमें भाई और बहन दोनो ही गायक/गायिका हैं। पहली जोड़ी है नाज़िया हसन और ज़ोहेब हसन की। नाज़िया और ज़ोहेब, दोनों का बचपन कराची और लंदन में बीता। 70 के दशक के अन्त में दोनो ने साथ मिल कर "संग संग चलें" और "कलियों का मेला" जैसे लोकप्रिय म्युज़िकल शोज़ में गाया। 1976 में दोनो नज़र आये Beyond the Last Mountain फ़िल्म के एक गीत में। नाज़िया हसन की पहली और बेहद कामयाब ऐल्बम ’डिस्को दीवाने’ में ज़ोहेब की भी आवाज़ शामिल थी। इसके बाद ’बूम बूम’ ऐल्बम भी ख़ूब चला, जिसके गाने ’स्टार’ फ़िल्म में लिया गया। बप्पी लाहिड़ी ने नाज़िया और ज़ेहेब से फ़िल्म ’शीला’ में गीत गवाये। नाज़िय को जितनी लोकप्रियता हासिल हुई, भाई ज़ोहेब को उतनी कामयाबी नहीं मिली। अफ़सोस की बात है कि मात्र 35 वर्ष की आयु में नाज़िया हसन इस दुनिया से चल बसीं और भाई-बहन की यह जोड़ी टूट गई। सरहद के इस पार इसी तरह की एक जोड़ी रही है शान और सागरिका की। पार्श्व गायन के क्षेत्र में क़दम जमाने से पहले संगीतकार मानस मुखर्जी के बेटे शान ने अपनी बड़ी बहन सागरिका के साथ मैगनासाउण्ड कंपनी के साथ एक अनुबन्ध किया और कई ग़ैर फ़िल्मी ऐल्बम्स में गाये जिनमें ’नौजवान’ और ’Q – Funk’ ख़ास चर्चित रहे। जिस तरह से बिद्दु ने नाज़िया और ज़ोहेब की जोड़ी को काफ़ी काम दिये, वैसे ही शान और सागरिका से भी बहुत से गीत और रीमिक्स गवाये। शान-सागरिका की जोड़ी भी बहुत ज़्यादा नहीं चल सकी क्योंकि शान पार्श्वगायन में व्यस्त हो गए और सागरिका का भी अपना अलग स्टाइल था। पर भाई-बहन के आपसी रिश्ते में कभी दरार नहीं आई। मशहूर पार्श्वगायिका अलका याज्ञनिक ने अपने भाई समीर याज्ञनिक के साथ मिल कर एक प्राइवेट ऐल्बम ’दिल था यहाँ अभी’ में गीत गाए। अपने भाई को बढ़ावा मिल सके इसी उद्देश्य से अलका ने यह ऐल्बम की जिसके गीत पसन्द तो बहुत किए गए पर समीर के करीयर को सँवारने में यह ऐल्बम असफल रही।

इस तरह से हर दशक में भाई-बहन की जोड़ियाँ हिन्दी फ़िल्म-संगीत जगत में आती रही हैं और शायद आगे भी आती रहेंगी, और यह परम्परा यूं ही चलती रहेगी। रक्षाबन्धन के शुभवसर पर आप सभी को एक बार फिर से बहुत सारी शुभकामनाएँ!


आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिए। आपके सुझावों के आधार पर हम अपने कार्यक्रम निर्धारित करते हैं। आप हमें radioplaybackindia@live.com के पते पर अपने सुझाव, समालोचना और फरमाइशें भेज सकते हैं।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी


Thursday, May 23, 2013

‘कारवाँ सिने संगीत का’


भारतीय सिनेमा के सौ साल – 45

कारवाँ सिने-संगीत का

फिल्मों में पार्श्वगायन की शुरुआत : ‘मैं ख़ुश होना चाहूँ, हो न सकूँ...’



 
भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘कारवाँ सिने संगीत का’ में आप सभी सिनेमा-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। आज माह का दूसरा गुरुवार है और इस दिन हम ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ स्तम्भ के अन्तर्गत ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल के सदस्य सुजॉय चटर्जी की प्रकाशित पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ से किसी रोचक प्रसंग का उल्लेख करते हैं। आज के अंक में सुजॉय जी 1935 की फिल्मों में संगीत की स्थिति पर चर्चा आरम्भ कर रहे हैं। 



के. सी. डे
1935 वर्ष को हिंदी सिने-संगीत के इतिहास का एक स्मरणीय वर्ष माना जाएगा। संगीतकार रायचंद बोराल ने, अपने सहायक और संगीतकार पंकज मल्लिक के साथ मिलकर ‘न्यू थिएटर्स’ में प्लेबैक पद्धति, अर्थात पार्श्वगायन की शुरुआत की। पर्दे के बाहर रेकॉर्ड कर बाद में पर्दे पर फ़िल्माया गया पहला गीत था फ़िल्म ‘धूप छाँव’ का, और वह गीत था के. सी. डे का गाया “तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफ़िर जाग ज़रा”। इसी फ़िल्म का अन्य गीत “मन की आँखें खोल बाबा” भी के. सी. डे के गाये लोकप्रिय गीतों में से एक है। इन गीतों से पार्श्वगायन की शुरुआत ज़रूर हुई, पर सही मायने में इन्हें प्लेबैक्ड गीत नहीं कहा जा सकता क्योंकि के. सी. डे के गाये इन गीतों को उन्हीं पर फ़िल्माया गया था। इन गीतों को सुन कर साफ़ महसूस होता है कि इससे पहले के गीतों से इन प्री-रेकॉर्डेड गीतों के स्तर में कितना अंतर है। इस फ़िल्म में सहगल का गाया “अंधे की लाठी तू ही है” और उमा शशि का गाया “प्रेम कहानी सखी सुनत सुहाये चोर चुराये माल” तथा पहाड़ी सान्याल व उमा शशि का गाया युगल गीत “मोरी प्रेम की नैया चली जल में” भी फ़िल्म के चर्चित गाने थे। ‘धूप छाँव’ के गीतकार थे पंडित सुदर्शन। प्लेबैक तकनीक के आने के बाद भी कई वर्षों तक बहुत से अभिनेता गीत गाते रहे, फिर धीरे धीरे अभिनेता और गायक की अलग लग श्रेणी बन गई। आइए, अब हम आपको फिल्म ‘धूप छाँव’ का गीत- “तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफ़िर जाग ज़रा...” सुनवाते हैं। यह गीत के.सी. डे का गाया और उन्हीं पर फिल्माया गया था।


फिल्म धूप छाँव : ‘तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफिर जाग जरा...’ : के.सी. डे


पारुल घोष
‘धूप छाँव’ में ही पारुल घोष, सुप्रभा सरकार और हरिमति का गाया एक गीत था “मैं ख़ुश होना चाहूँ, हो न सकूँ”, जो सही अर्थ में पहला प्लेबैक गीत था। इस तरह से इन तीन गायिकाओं को फ़िल्म-संगीत की प्रथम पार्श्वगायिकाएँ होने का गौरव प्राप्त है। हरमन्दिर सिंह ‘हमराज़’ को दिए एक साक्षात्कार में सुप्रभा सरकार ने पार्श्वगायन की शुरुआत से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए बताया था – “उन्होंने (सुप्रभा सरकार ने) बताया कि फ़िल्मों में उनका प्रवेश 13 वर्ष की आयु में तत्कालीन अभिनेत्री लीला देसाई के भाई के प्रयत्नों से हुआ था। सन्‍ 1935 में जब ‘न्यू थिएटर्स’ द्वारा ‘जीवन मरण’ (बंगला) तथा ‘दुश्मन’ (हिन्दी) का निर्माण शुरु हुआ तब पार्श्वगायन पद्धति का प्रथम उपयोग इसी फ़िल्म में किया जाना था परन्तु फ़िल्म की शूटिंग्‍ के समय, एक दृश्य में पेड़ से नीचे कूदते समय नायिका लीला देसाई की टाँग टूट गई और फ़िल्म का निर्माण रुक गया। इसी बीच फ़िल्म ‘धूप छाँव’ का निर्माण शुरु हुआ। निर्देशक नितिन बोस ने पहले तो सुप्रभा जे की आवाज़ को नामंज़ूर ही कर दिया था, लेकिन एक समूह गीत में सुप्रभा, हरिमती और पारुल घोष की आवाज़ों में रेकॉर्ड किया गया जो कि बाद में प्रथम पार्श्व गीत के रूप में जाना गया।” उधर पंकज मल्लिक ने भी अपनी आत्मकथा में पार्श्वगायन की शुरुआत का दिल्चस्प वर्णन किया है। पंकज राग लिखित किताब ‘धुनों की यात्रा’ से प्राप्त जानकारी के अनुसार – “नितिन बोस स्टुडिओ जाते समय अपनी कार से पंकज मल्लिक के घर से उन्हें लेते हुए जाते थे। एक दिन उनके घर के सामने कई बार हार्न देने पर भी पंकज मल्लिक नहीं मिकले, और काफ़ी देर बाद अपने पिता के बताने पर कि नितिन बोस उनकी बाहर कार में प्रतीक्षा कर रहे हैं, वे हड़बड़ाते हुए बाहर आए और देरी का कारण बताते हुए कहा कि वे अपने मनपसंद अंग्रेज़ी गानों का रेकॉर्ड सुनते हुए गा रहे थे, इसी कारण हॉर्न की आवाज़ नहीं सुन सके। इसी बात पर नितिन बोस को विचार आया कि क्यों न इसी प्रकार पार्श्वगायन लाया जाए। उन्होंने बोराल से चर्चा की और अपने पूरे कौशल के साथ बोराल ने इस विचार को साकार करते हुए इसे ‘धूप छाँव’ में आज़माया।” अब हम आपको फिल्म ‘धूप छाँव’ का वह गीत सुनवाते हैं, जिसे भारतीय सिनेमा का पहला पार्श्वगीत माना गया।


फिल्म धूप छाँव : ‘मैं ख़ुश होना चाहूँ, हो न सकूँ...’ : पारुल घोष, सुप्रभा सरकार और हरिमति


पारुल घोष सुप्रसिद्ध बांसुरीनवाज़ पंडित पन्नालाल घोष की बहन थीं। पारुल घोष की परपोती श्रुति मुर्देश्वर कार्तिक से की हुई मेरी बातचीत में अपनी ‘दीदा’ (बांगला में नानी को दीदा कहते हैं) को याद करते हुए श्रुति ने कहा, “मैं पारुल दीदा की परपोती हूँ। वो मेरे पिताजी की माँ सुधा मुर्देश्वर जी की माँ थीं। मुझे बहुत बहुत गर्व महसूस होता है यह सोचकर कि मैं उनकी परपोती हूँ। मैं हमेशा सोचती हूँ कि काश मैं उनसे मिल पाती। मेरे पिता पंडित आनंद मुर्देश्वर और दादा पंडित देवेन्द्र मुर्देश्वर ने दीदा के बारे में बहुत कुछ बताया है और मेरे पिता जी ने तो मुझे उनके कई गाये हुए गीतों को सिखाया भी है, जो दीदा ने उन्हें उनके बचपन में सिखाया था। मैं उन गीतों के बारे में बहुत जज़्बाती हूँ और वो सब गीत मेरे दिल के बहुत बहुत करीब हैं। मुझे अफ़सोस है कि मैं दीदा से नहीं मिल सकी। काश कि मैं कुछ वर्ष पूर्व जन्म लेती! उनकी लम्बी बीमारी के बाद 13 अगस्त 1977 को बम्बई में निधन हो गया। जैसा कि मैंने बताया कि दादाजी, पिताजी और तमाम रिश्तेदारों से मैंने पारुल दीदा के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था। हमेशा से ही उनकी एक बहुत ही सुंदर तस्वीर मेरे दिल में रही है। एक सुंदर बंगाली चेहरा और एक दिव्य आवाज़ की मालकिन। जब मैं छोटी थी, तब मेरे पिताजी हमेशा कहते थे कि मेरी आवाज़ कुछ कुछ उन्हीं के जैसी है, और मैं यह बात सुन कर ख़ुश हो जाया करती थी। लेकिन अब मैं मानती हूँ कि दीदा के साथ मेरा कोई मुकाबला ही नहीं। वो स्वयं भगवान थीं।”

‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भ ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के अन्तर्गत आज हमने सुजॉय चटर्जी की इसी शीर्षक से प्रकाशित पुस्तक के कुछ पृष्ठ उद्धरित किये हैं। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के आगामी अंक में आपके लिए हम इस पुस्तक के कुछ और रोचक पृष्ठ लेकर उपस्थित होंगे। सुजॉय चटर्जी की पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ प्राप्त करने के लिए तथा अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव के लिए radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेजें।


शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Saturday, February 12, 2011

ओल्ड इस गोल्ड - शनिवार विशेष - एक खास बातचीत में हिंदुस्तान की पहली पार्श्व गायिका पारुल घोष को याद किया उनकी परपोती श्रुति मुर्देश्वर कार्तिक ने

नमस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' की एक और विशेषांक के साथ हम उपस्थित हैं। जैसा कि आप जानते हैं भारत में बोलती फ़िल्मों की शुरुआत सन् १९३१ में हुई थी 'आलम आरा' के साथ। उस वक़्त अभिनेता अपनी ही आवाज़ में गीत भी गाते थे; यानी कि उस वक़्त आज की तरह पार्श्वगायन या प्लेबैक की तकनीक विकसित नहीं हुई थी। पार्श्वगायन की नीव रखी गई साल १९३५ में जब संगीतकार रायचंद बोराल ने कलकत्ते के न्यु थिएटर्स की फ़िल्म 'धूप छाँव' में पहली बार "गायकों" से गानें गवाए। इस फ़िल्म में के. सी. डे के गाये गीत "तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफ़िर जाग ज़रा" को पहला प्लेबैक्ड गीत माना जाता है। गायिकाओं की बात करें तो इसी फ़िल्म में पारुल घोष, सुप्रभा सरकार और साथियों ने भी एक गीत गाया था, और इस तरह से ये दोनों गायिकाओं का नाम पहली बार दर्ज हुआ हिंदी सिनेमा की पार्श्वगायिकाओं की फ़ेहरिस्त में। यह बात आज से ठीक ७५ वर्ष पहले की है। और यह मेरा सौभाग्य ही कहूँगा कि हाल ही में मेरा परिचय हुआ पारुल जी की परपोती श्रुति मुर्देश्वर जी से, और एक अजीब सा रोमांच हो आया यह सोचकर कि श्रुति जी से पारुल जी के बारे में कुछ बातें जाना जा सकता है। मेरे एक बार निवेदन से ही श्रुति जी ने इंटरव्यु के लिए हामी भर दी, और उनसे की हुई बातचीत से आज के इस अंक को हम सजा रहे हैं। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का यह साप्ताहिक विशेषांक समर्पित है हिंदी सिनेमा की प्रथम पार्श्वगायिका स्वर्गीय पारुल घोष जी को।

चित्र: पारुल घोष (सौजन्य: श्रुति मुर्देश्वर कार्तिक)


सुजॊय - श्रुति जी, हिंद-युग्म में आपका बहुत बहुत स्वागत है। हमें कितनी ख़ुशी हो रही है आपको हमारे पाठकों से मिलवा कर कि क्या बताएँ! यह वाक़ई हमारे लिए गर्व और सौभाग्य की बात है हिंदी सिनेमा की प्रथम पार्श्वगायिका स्व: पारुल जी की परपोती से हम उनके बारे में जानने जा रहे हैं। यह बताइए कि आपको कैसा लगता है पारुल जी की बातें करते हुए?

श्रुति - सुजॊय जी, आपको भी बहुत बहुत धन्यवाद। सही मायने में मैं आपका आभारी हूँ क्योंकि यह मेरा पहला इंटरव्यु है जिसमें मैं अपनी दीदा (बंगला में नानी को दीदा कहते हैं) के बारे में बातें करूँगी। मुझे बहुत बहुत गर्व महसूस होता है यह सोचकर कि मैं उनकी परपोती हूँ। मैं हमेशा सोचती हूँ कि काश मैं उनसे मिल पाती। मेरे पिता पंडित आनंद मुर्देश्वर और दादा पंडित देवेन्द्र मुर्देश्वर ने दीदा के बारे में बहुत कुछ बताया है। और मेरे पिता जी ने तो मुझे उनकी गाई हुई कई गीतों को सिखाया भी है, जो दीदा ने उन्हें उनकी बचपन में सिखाया था। मैं उन गीतों के बारे में बहुत जज़्बाती हूँ और वो सब गीत मेरे दिल के बहुत बहुत करीब हैं।

सुजॊय - श्रुति जी, आप पारुल जी की परपोती हैं, यानी कि ग्रेट-ग्रैण्ड डॊटर। इस रिश्ते को ज़रा खुलकर बताएँगी?

श्रुति - मैं पारुल दीदा की परपोती हूँ। वो मेरे पिता जी की माँ सुधा मुर्देश्वर जी की माँ हैं।

सुजॊय - अच्छा अच्छा, यानी कि पारुल जी की बेटी हैं सुधा जी, जिनका देवेन्द्र जी से विवाह हुआ। और आप सुधा जी और देवेन्द्र जी के बेटे आनंद जी की पुत्री हैं।

श्रुति - जी हाँ।

सुजॊय - जैसा कि आपने बताया कि आपने पारुल जी के बारे में अपने दादा जी और पिता जी से बहुत कुछ सुना है, जाना है। तो हमें बताइए कि पारुल जी की किस तरह की छवि आपके मन में उभरती है?

श्रुति - मुझे अफ़सोस है कि मैं दीदा को नहीं मिल सकी। काश कि मैं कुछ वर्ष पूर्व जन्म लेती! उनकी लम्बी बीमारी के बाद १३ अगस्त १९७७ को बम्बई में निधन हो गया। जैसा कि मैंने बताया कि दादाजी, पिताजी और तमाम रिश्तेदारों से मैंने पारुल दीदा के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था। हमेशा से ही उनकी एक बहुत ही सुंदर तस्वीर मेरे दिल में रही है। एक सुंदर बंगाली चेहरा और एक दिव्य आवाज़ की मालकिन। कुछ किस्से थे जैसे कि दीदा खाना बनाते हुए अपनी बेटी सुधा घोष (मेरी दादी) के साथ मेरे पिताजी को गाना सिखाते थे। जब मैं छोटी थी, तब मेरे पिताजी हमेशा कहते थे कि मेरी आवाज़ कुछ कुछ उन्हीं के जैसी है, और मैं यह बात सुन कर ख़ुश हो जाया करती थी। लेकिन अब मैं मानती हूँ कि दीदा के साथ मेरा कोई मुकाबला ही नहीं। वो स्वयं भगवान थीं।

सुजॊय - वाह! आपने बताया कि आपकी आवाज़ पारुल जी की तरह थी, ऐसा आपके पिताजी कहा करते थे। तो क्या आप ख़ुद भी गाती हैं?

श्रुति - जी हाँ, मैं गाती हूँ। मैंने अपने पिताजी से सीखा है और बाद में तुलिका घोष जी से भी संगीत सीखा, जो सुप्रसिद्ध तबलानवाज़ पंडित निखिल घोष जी की पुत्री हैं। वर्तमान में मैं मीडिया से जुड़ी हुई हूँ लेकिन गायन मेरा पैशन है।

सुजॊय - तो क्या आप अपनी गायन को अपना करीयर बनाने की भी सोच रही हैं?

श्रुति - नहीं, ऐसा तो कोई विचार नहीं है, लेकिन अगर कोई अच्छा मौका मिला कि जिससे मैं अपने परिवार के संगीत परम्परा को आगे बढ़ा सकूँ, अगली पीढ़ी तक लेकर जा सकूँ, तो मैं ज़रूर इसे अपना प्रोफ़ेशन बना लूँगी।

सुजॊय - बहुत ख़ूब, हम भी आपको इसकी शुभकामनाएँ देते हैं।

श्रुति - धन्यवाद!

सुजॊय - अच्छा श्रुति जी, वापस आते हैं पारुल जी पर, उनके गीतों की अगर हम बात करें तो १९४३ की फ़िल्म 'क़िस्मत' में उनका गाया "पपीहा रे, मेरे पिया से कहियो जाये" शायद उनका सब से लोकप्रिय गीत रहा है। क्या आप इस गीत को अक्सर गाती हैं, या फिर अपने दोस्तों से, रिश्तेदारों से इस गीत को गाने की फ़रमाइश भी आती होंगी?

श्रुति - इस गीत के साथ तो न जाने कितनी स्मृतियाँ जुड़ी हुई हैं। जब मैं बहुत छोटी थी, तब सब से पहला पहला गीत जो मैंने सीखा था, वह यही गीत था। और जब भी कोई मुझे गीत गाने को कहते, मैं यही गीत गाती रहती। और आज तक यह मेरा पसंदीदा गीत रहा है :-) आप ने ठीक ही अनुमान लगाया कि आज तक मुझे इस गीत की फ़रमाइशें आती हैं, अपने दोस्तों से, परिवार वालों से, और मैं ख़ुशी ख़ुशी इसे गाती भी हूँ। अनिल दादु का बनाया हुआ एक बेहद ख़ूबसूरत कम्पोज़िशन है।

सुजॊय - श्रुति जी, आगे बढ़ने से पहले, आइए इस गीत का यहाँ पर आनंद लिया जाये।

श्रुति - ज़रूर!

गीत - पपीहा रे मेरे पिया से कहियो जाये (किस्मत, १९४३)


सुजॊय - वाह! क्या मधुर आवाज़ और क्या गाया था उन्होंने! भई वाह! और पारुल जी किस स्तर की गायिका थीं, इसका अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि लता मंगेशकर जी ने भी अपनी चर्चित 'श्रद्धाजन्ली' ऐल्बम में पारुल जी को याद करते हुए "पपीहा रे" गाया था।

श्रुति - आपने 'श्रद्धांजली' ऐल्बम की बात छेड़ी, तो मैं आपको बताना चाहूँगी कि 'श्रद्धांजली' ऐल्बम मेरे दिल के बहुत करीब रहा है, क्योंकि यह मुझे मेरे पिताजी ने गिफ़्ट किया था जब मैं स्कूल में थी। और मैं आँखें बंद करके भी इस ऐल्बम में शामिल सभी गीतों को गा सकती हूँ।

सुजॊय - तब तो आपको पता ही होगा कि लता जी ने पारुल जी के बारे में क्या बताया था। लेकिन हम अपने पाठकों के लिए यहाँ बताना चाहेंगे कि लता जी ने कुछ इस तरह से पारुल जी को संबोधित किया था - "पारुल घोष, जानेमाने संगीतकार अनिल बिस्वास जी की बहन, और प्रसिद्ध बांसुरी वादक पंडित पन्नालाल घोष की पत्नी थीं। फ़िल्म गायिका होने के बावजूद वो घर संसार सम्भालने वाली गृहणी भी थीं। उनके जाने के बाद महसूस हुआ कि वक़्त की गर्दिश ने हमसे कैसे कैसे फ़नकार छीन लिए।" तो आइए लता जी की आवाज़ में भी इसी गीत का आनंद हम उठाते हैं।

गीत - पपीहा रे मेरे पिया से कहियो जाये ('श्रद्धांजली', लता मंगेशकर)


सुजॊय - अच्छा श्रुति जी, अनिल दादु का आपने ज़िक्र किया, हमारे कुछ पाठकों को यह मालूम भी होगा, जिन्हें नहीं है, उनके लिए हम यह बता दें कि अनिल बिस्वास जी पारुल जी के बड़े भाई साहब थे। अनिल दा के बचपन के गहरे दोस्त हुआ करते थे पन्ना दा। जी हाँ, वही पन्ना बाबू, जो आगे चलकर सुप्रसिद्ध बांसुरी वादक पंडित पन्नालाल घोष के नाम से जाने गये। अनिल दा ने पन्ना बाबू के साथ अपनी इस दोस्ती को और भी गहरा बनाते हुए अपनी बहन पारुल का हाथ पन्ना बाबू के हाथों सौंप दिया। अच्छा श्रुति जी, और कौन कौन से गानें हैं पारुल जी के जो आपको बेहद पसंद है?

श्रुति - मुझे पुराने गानें पसंद है, ज़्यादातर ग़ज़लें सुनती हूँ, और दीदा के गानें भी बहुत पसंद है। "पपीहा रे" तो पसंद है ही, कुछ और भी हैं जो मेरे पिताजी ने मुझे सिखाया था जो उन्हें पारुल दीदा ने सिखाया था, जिनमें एक है "मैं उनकी बन जाऊँ रे"।

सुजॊय - तो क्यों ना इस गीत को भी यहाँ पर सुनें और अपने पाठकों को सुनवाये?

श्रुति - ज़रूर!

सुजॊय - यह गीत है १९४३ की ही फ़िल्म 'हमारी बात' का, जिसमें अनिल दा का ही संगीत था।

गीत - मैं उनकी बन जाऊँ रे (हमारी बात, १९४३)


सुजॊय - श्रुति जी, मैंने एक वेबसाइट पर पाया कि पारुल जी ने कुल ७५ हिंदी फ़िल्मी गीत गाया है। आपका क्या ख़याल है इस बारे में?

श्रुति - सुजॊय जी, जैसा कि मैंने सुना है कि उस ज़माने में दीदा के गाये गीतों के बहुत से रेकॊर्ड्स ऐसे थे जिनमें उनकी नाम के बजाय उन अभिनेत्रियों के किरदारों के नाम मिलते थे जिन पर वो गीत फ़िल्माये गये थे। इसलिए सटीक सटीक उनके गाये गीतों की संख्या बता पाना मुश्किल है।

सुजॊय - क्या आप उनके हिंदी फ़िल्म संगीत करीयर के बारे में थोड़ा विस्तार से बता सकती हैं? 'धूप छाँव' फ़िल्म का वह कौन सा गीत था जिसने पारुल जी को देश की पहली पार्श्वगायिका बना दी?

श्रुति - सुप्रभा सरकार के साथ गाया हुआ वह गीत था "मैं ख़ुश होना चाहूँ, ख़ुश हो न सकूँ"। उनका गाया हुआ अगला गीत भी एक फ़ीमेल डुएट था १९४१ की फ़िल्म 'कंचन' का, जिसके बोल थे "मोरे मन की नगरिया बसाई रे", जिसे पारुल दीदा ने लीला चिटनिस जी के साथ मिलकर गाया था। फिर १९४२ की फ़िल्म 'बसंत' में उन्होंने बेबी मुम्ताज़, जो बाद में मधुबाला के नाम से मशहूर हुईं, उनके लिए गीत गाया था "एक छोटी सी दुनिया रे, मेरे छोटे से मन में"। १९४२-४३ में 'बसंत', 'क़िस्मत', 'हमारी बात', 'सवाल' जैसी फ़िल्मों में अनिल दादु और पन्ना दादु ने उनसे बहुत सारे गानें गवाए।

सुजॊय - फिर उसी दौरान नौशाद साहब ने भी तो उनसे गाना गवाया था फ़िल्म 'नमस्ते' में?

श्रुति - जी हाँ, एक गीत था "आये भी वो गये भी वो, ख़त्म फ़साना हो गया", और इसी फ़िल्म में जी. एम. दुर्रानी के साथ मिलकर उन्होंने एक हास्य युगल गीत भी गाया था "दिल ना लगे नेक टाइ वाले बाबू"। फिर इसी साल १९४३ में संगीतकार रफ़ीक़ ग़ज़नवी ने भी उनसे गवाये फ़िल्म 'नजमा' में। इस फ़िल्म में फिर एक बार उन्हें फ़ीमेल डुएट्स गाने का मौका मिला। एक डुएट था मुमताज़ के साथ ("भला क्यों ओ हो मगर क्यों") और एक था सितारा जी के साथ ("फ़सल-ए-बहार गाए जा, दीदा-ए-ग़म रुलाये जा")।

सुजॊय - उनकी उपलब्ध फ़िल्मोग्राफ़ी पर नज़र डालें तो पाते हैं कि सब से ज़्यादा और सब से लोकप्रिय गीत उन्होंने १९४२ से १९४७ के बीच गाया है। फिर धीरे धीरे उनके गानें कम होते गये और १९५१ की फ़िल्म 'आंदोलन' में उन्होंने अंतिम बार के लिए गाया था। आपको क्या लगता है कि उन्होंने गाना क्यों छोड़ दिया होगा?

श्रुति - मैं समझती हूँ कि हर कलाकार का अपना दौर होता है, अपना समय होता है जब वो बुलंदी पर होता है। मुझे बहुत ज़्यादा गर्व और ख़ुशी है कि मैं उनकी परपोती हूँ।

सुजॊय - श्रुति जी, बहुत अच्छा लगा आपसे बातें करके, पारुल जी के बारे में आप ने जो बातें बताईं, हमें पूरी उम्मीद है कि पुराने फ़िल्म संगीत के रसिक इसका भरपूर आनंद लिए होंगे, मैं अपनी तरफ़ से, हमारे पाठकों की तरफ़ से, और 'हिंद-युग्म' की तरफ़ से आपको बहुत बहुत धन्यवाद देता हूँ, फिर किसी दिन आप से अनिल दा और पन्ना बाबू के बारे में बातचीत करेंगे, नमस्कार!

श्रुति - शुक्रिया तो मुझे अदा करनी चाहिए जो आपने मुझे यह मौका दिया अपनी पारिवारिक संगीत परम्परा के बारे में कहने का। बहुत बहुत शुक्रिया, नमस्कार!

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तो दोस्तों, आज बस इतना ही, 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नियमित कड़ी में भी जल्द ही आप पारुल जी का गाया हुआ एक और गीत सुनेंगे, ऐसा हम आपको विश्वास दिलाते हैं। आज की यह प्रस्तुति आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा टिप्पणी में लिखकर। आप 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के बारे में अपनी राय और सुझाव हमें ईमेल के द्वारा भी व्यक्त कर सकते हैं oig@hindyugm.com के पते पर। अब इजाज़त दीजिए, कल सुबह 'सुर संगम' के साथ हम फिर उपस्थित होंगे, बने रहिए 'आवाज़' के साथ। नमस्कार!

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