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Wednesday, April 18, 2018

चित्रकथा - 64: हिन्दी फ़िल्मों के महिला गीतकार (भाग-2)

अंक - 64

हिन्दी फ़िल्मों के महिला गीतकार (भाग-2)

"प्यार है अमृत कलश अंबर तले..." 




’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार! फ़िल्म जगत एक ऐसा उद्योग है जो पुरुष-प्रधान है। अभिनेत्रियों और पार्श्वगायिकाओं को कुछ देर के लिए अगर भूल जाएँ तो पायेंगे कि फ़िल्म निर्माण के हर विभाग में महिलाएँ पुरुषों की तुलना में ना के बराबर रही हैं। जहाँ तक फ़िल्मी गीतकारों और संगीतकारों का सवाल है, इन विधाओं में तो महिला कलाकारों की संख्या की गिनती उंगलियों पर की जा सकती है। आज ’चित्रकथा’ में हम एक शोधालेख लेकर आए हैं जिसमें हम बातें करेंगे हिन्दी फ़िल्म जगत के महिला गीतकारों की, और उनके द्वारा लिखे गए यादगार गीतों की। पिछले अंक में इस लेख का पहला भाग प्रस्तुत किया गया था, आज प्रस्तुत है इसका दूसरा भाग।


त्रुटि सुधार

’हिन्दी फ़िल्मों के महिला गीतकार’ लेख के पहले भाग में हमने जद्दन बाई को प्रथम महिला संगीतकार होने की बात कही थी, जो सही नहीं है। सही नाम है इशरत जहाँ। इशरत जहाँ ने 1934 की फ़िल्म ’अद्ल-ए-जहांगीर’ में संगीत दिया था और जद्दन बाई ने 1935 की फ़िल्म ’तलाश-ए-हक़’ में। इस ग़लती की तरफ़ हमारा ध्यान आकर्षित करने के लिए श्री शिशिर कृष्ण शर्मा जी को हम धन्यवाद देते हैं।



पिछले अंक में हमने जद्दन बाई, सरोज मोहिनी नय्यर, निरुपा रॉय, किरण कल्याणी, प्रभा ठाकुर, अमृता प्रीतम, गीतांजलि सिंह, आशा रानी और शबनम करवारी जैसे महिला गीतकारों की बातें की थी। पिछले अंक में शुरुआत जद्दन बाई से हुई थी। यह वह दौर था जब अधिकतर फ़िल्मी गीतों को ग्रामोफ़ोन रिकॉर्ड्स पर उतारे नहीं जाते थे। केवल फ़िल्म के परदे पर ही वो दिखाई व सुनाई देते। इसलिए शुरुआती कुछ वर्षों के बहुत से गीत उपलब्ध नहीं हैं। उस पर उस दौर के अधिकतर ग्रामोफ़ोन रिकॉर्ड्स के कवर पर गीतकार का नाम प्रकाशित नहीं किया गया। इन सब के चलते फ़िल्म संगीत के पहले दौर के गीतकारों के बारे में जानकारी अधूरी ही रह गई। इन्टरनेट के अज्ञात सूत्रों पर ध्यान दें तो महिला गीतकारों में मुन्नी बाई और मिस विमल का नाम दिखाई देता है। लेकिन उनके द्वारा लिखे किसी भी गीत की जानकारी नहीं मिल पायी है। अगर किसी पाठक के पास इन दो कलाकारों के लिखे गीतों की जानकारी हों तो टिप्पणी में अवश्य सूचित करें। 30 के दशक के आख़िर में भाग्यवती राम्या नामक गीतकार ने फ़िल्म ’अधूरी कहानी’ में दो गीत लिखे। वैसे इस फ़िल्म में बहुत से गाने थे जिन्हें जे. एस. कश्यप और प्यारेलाल संतोषी ने लिखे। ज्ञान दत्त के संगीत निर्देशन में भाग्यवती राम्या के लिखे दो गीत थे "मैं चटक मटक की चंदुरी..." और "शुभ घड़ी साहब घर आए जी आज..."। अफ़सोस की बात है कि इन्टरनेट पर फ़िल्म के बाकी सभी गीतों के गायकों की जानकारी दी गई है, केवल इन दो गीतों को छोड़ कर।

डोगरी भाषा की प्रथम आधुनिक कवयित्री पद्मा सचदेव ने हिंदी में भी काफ़ी काम किया है और आज वो एक प्रसिद्ध कवयित्री व उपन्यासकार के रूप में जानी जाती हैं। उनके कविता संग्रह ’मेरी कविता मेरे गीत’ के लिए उन्हें 1971 में ’साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया था। पद्मश्री, कबीर सम्मान व अन्य बहुत पुरस्कारों से सम्मानित पद्मा सचदेव ने कुछ हिन्दी फ़िल्मों के लिए गीत भी लिखे हैं। पहली बार उनका लिखा गीत 1973 की फ़िल्म ’प्रेम पर्बत’ में सुनाई दिया। वेद राही की इस फ़िल्म में संगीत जयदेव का था। हालांकि फ़िल्म का लोकप्रिय गीत था "ये दिल और उनकी निगाहों के साये" जिसे जाँ निसार अख़्तर ने लिखा था, पर पद्मा सचदेव का लिखा "मेरा छोटा सा घर बार मेरे अंगना में, छोटा सा चंदा छोटे-छोटे तारे, रात करे सिंगार मेरे अंगना में..." भी बेहद मधुर व कर्णप्रिय है। लोरी शैली में लिखा यह गीत जैसे एक आदर्श भारतीय नारी के दिल की पुकार है। एक महिला गीतकार से बेहतर इस तरह की रचना भला कौन लिख सकता है। इसके बाद 1978 में पद्मा सचदेव को फिर एक बार मौका मिला राजिन्दर सिंह बेदी निर्देशित फ़िल्म ’आखिन देखी’ में दो गीत लिखने का। फ़िल्म के कुल छह गीतों में शामिल थे एक पारम्परिक रचना, एक तुलसीदास रचना, एक कबीर की रचना, और एक गीत गीतकार राम मूर्ति चतुर्वेदी का लिखा हुआ। बाकी दो गीत पद्मा सचदेव के थे जिनमें से एक गीत फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत सिद्ध हुआ। मोहम्मद रफ़ी और सुलक्षणा पंडित की आवाज़ों में संगीतकार जे. कौशिक के संगीत में यह गीत "सोना रे तुझे कैसे मिलूं, कैसे कैसे मिलूं, अम्बुआ की बगिया झरना के नदिया कहाँ मिलूं, तुझे कैसे मिलूं..." आज भी आय दिन रेडियो पर फ़रमाइशी कार्यक्रमों में सुनाई दे जाता है। उनका लिखा दूसरा गीत सुलक्षणा पंडित की एकल आवाज़ में था - "जीने ना मरने दे हाय दैय्या रे, आफ़त जवानी सीने में धक धक करे हाय दैय्या रे, काफ़र जवानी जीने ना मरने दे..."। इसके बाद 1979 में पद्मा सचदेव ने गीतकार योगेश के साथ मिल कर फ़िल्म ’साहस’ के गीत लिखे जिन्हें स्वरबद्ध किया अमीन संगीत ने। भूपेन्द्र की आवाज़ में "नीला सजीला स अये आसमाँ, ख़्वाबों सी फैली हुई वादियाँ..." को एक कविता के रूप में लिखा गया है जिस पर प्रकृति की सुन्दरता पूरी तरह से हावी है। इसी तरह से दो और काव्यात्मक शैली में लिखे गीत हैं भूपेन्द्र और अनुराधा पौडवाल का गाया "अब तुम हो हमारे और हम भी तुम्हारे हैं, हमें जान से प्यारे मनमीत हमारे हैं..." और भूपेन्द्र व आशा भोसले का गाया "एक घर बनाएँ, सपने सजाएँ, हम यहाँ हम यहाँ, एक होके झूमें, एक होके गाएँ, हम यहाँ हम यहाँ...। दिलराज कौर की आवाज़ में "बाबूजी बाबूजी क्या लोगे, कुछ बोलो ना, ये दिल कब का तेरा हो गया है, बाबूजी बाबूजी क्या लोगे..." गीत को सुन कर ओ. पी. नय्यर के संगीत शैली की याद अ जाती है। एक उल्लेखनीय बात यह है कि 1981 में भी ’साहस’ शीर्षक से फ़िल्म आई थी जिसके संगीतकार थे बप्पी लाहिड़ी। संभवत: 1979 की ’साहस’ प्रदर्शित नहीं हो पायी थी और केवल गीतों को ही जारी कर दिया गया था। और इसी के साथ पद्मा सचदेव ने भी फ़िल्मी गीतकारिता से संयास लेकर अपना पूरा ध्यान साहित्य और काव्य पर लगा दिया। 

1976 में शबनम करवारी के साथ-साथ एक और महिला गीतकार के गीत सुनाई पड़े थे, ये हैं सई परांजपे। ये वो ही पद्मभूषण से सम्मानित सई परांजपे हैं जिनकी ’स्पर्श’, ’कथा’, ’चश्म-ए-बद्दूर’, ’दिशा’, ’पपीहा’ और ’साज़’ जैसी फ़िल्में दर्शकों के दिलों को छू गई थीं। इन सभी फ़िल्मों की वो निर्देशिका थीं। बतौर फ़िल्म निर्देशिका, उनकी पहली फ़िल्म थी ’जादू का शंख’ जो बनी थी 1975 में। इसके अगले ही साल आई फ़िल्म ’सिकंदर’ जो एक बाल-फ़िल्म थी। यह फ़िल्म चार बच्चों की कहानी थी जिन्हें एक कुत्ते के पिल्ले से प्यार हो जाता है। वो उन्हें घर ले आते हैं पर उनके अभिभावक इसकी अनुमति नहीं देते। फिर वो चार बच्चे किस तरह से छुप-छुप कर उसे पालते हैं, यही है इस फ़िल्म की कहानी। इस बाल-फ़िल्म के लिए सई परांजपे ने दो गीत लिखे थे जिन्हें स्वरबद्ध किया भास्कार चंदावरकर ने। सूदेश महाजन और सुरेश वाघ की आवाज़ों में "चार कलंदर एक मुचंदर हम सब का..." और विनीता जोगलेकर का गाया "हुण ला अच्छे बच्चे नहीं जागते..." सई परांजपे के लिखे फ़िल्म के दो गीत रहे। यह सच है कि इसके बाद सई परांजपे ने फिर कभी किसी फ़िल्म के लिए गीत नहीं लिखे जिस वजह से उनके लिखे ये दो फ़िल्मी बाल-गीत बहुत महत्वपूर्ण बन जाते हैं। इसमें कोई शक़ नहीं कि अगर उन्होंने सामाजिक फ़िल्मों के लिए भी गीत लिखे होते, वे बेहद अर्थपूर्ण ही होते। सई परांजपे के साथ जिस महिला गीतकार का नाम लिया जाना चाहिए, वो हैं इंदु जैन। इंदु जैन ने सई परांजपे की कई फ़िल्मों में गीत लिखे हैं। पहला गीत 1981 की फ़िल्म ’चश्म-ए-बद्दूर’ में लिखा था "कहाँ से आए बदरा, घुलता जाए कजरा...", जो आज एक सदाबहार नग़मा बन चुका है। राजमकल के संगीत में जेसुदास और हेमन्ती शुक्ला की गायी राग वृंदावनी सारंग पर आधारित इस रचना के शब्द इतने सुन्दर हैं कि इस गीत को जितनी बार भी सुनें, आनन्द की ही अनुभूति होती है। इस फ़िल्म के अन्य गीतों में एक और उल्लेखनीय गीत रहा है "काली घोड़ी द्वार खड़ी" जिसे भूपेन्द्र और सुलक्षणा पंडित ने गाया है। शास्त्रीयता के साथ साथ हास्य रस भी है इस गीत में। शैलेन्द्र सिंह और हेमन्ती शुक्ला का गाया "इस नदी को मेरा आइना मान लो, कि मोहब्बत का बहता नशा जान लो..." भी एक सुन्दर रचना है लेकिन ताज्जुब की बात है कि इस गीत को अब लोग भुला चुके हैं। इसके बाद 1983 की सई परांजपे की फ़िल्म ’कथा’ के गीत भी इंदु जैन ने ही लिखे। इस फ़िल्म में भी राजकमल का ही संगीत था। हास्य रस पर आधारित फ़िल्म में दो अनोखे गीत थे। अनोखे इस लिहाज़ से कि इन दोनों गीतों को कुल नौ गायकों ने गाया है। सुषमा श्रेष्ठ, हरिहरन, पिनाज़ मसानी, घन्श्याम वासवानी, प्रीति चावला, विराज उपध्याय, नरेन्द्र भंसाली, बद्री पवार और उषा रेगे के गाए ये दो गीत हैं "कौन आया कौन आया" और "क्या हुआ क्या हुआ"। इन दोनों गीतों में मध्यमवर्गीय परिवारों में दूसरों के जीवन और दिनचर्या के प्रति अत्यधिक कौतुहल को हास्य के माध्यम से साकार किया है इंदु जैन ने। फ़िल्म का तीसरा गीत किशोर कुमार की आवाज़ में है - "मैंने तुमसे कुछ नहीं मांगा..." जो अपने समय का हिट गीत रहा है। फ़िल्म का चौथा व अंतिम गीत "तुम सुंदर हो, तुम चंचल हो" में नायिका की ख़ूबसूरती का बेहद ख़ूबसूरती से वर्णन मिलता है। इस गीत को राजकमल, प्रीति सागर और विनी जोगलेकर ने गाया है। ख़ास बात यह भी है कि राजकमल वाला अंश भारतीय शैली में है जबकि प्रीति सागर वाला हिस्सा पश्चिमी रंग का है। गीत के तीसरे अंश में राजकमल और विनी जोगलेकर का एक साथ पश्चिमी नृत्य शैली पर गाया अंश इस गीत को एक अनोखा गीत बना दिया है। सई परांजपे की राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित 1984 की फ़िल्म ’स्पर्श’ के गीत भी इंदु जैन ने ही लिखे। कानु रॉय के संगीत में सुलक्षणा पंडित ने फ़िल्म के सभी तीन गाए। "खाली प्याला धुंधला दर्पण खाली खाली मन, बुझता सूरज जलता चन्दा पतझरी सावन..." में जैसे इंदु जैन ने मनमोहक काव्य की छटा बिखेर दी हों। इसी गीत का विस्तार है "प्याला छलका उजला दर्पण, जगमग मन आंगन..."। और तीसरे गीत के रूप में है बाल-गीत "गीतों की दुनिया में सरगम है हम, फूलों में ख़ुशबू के पर्चम है हम, चलते हैं कदमों में मंज़िल भरे, मुट्ठी में ख़ुशियों की पुंजी धरे, तूफ़ान भी आए कश्ती हैं हम, ताज़ी हवाओं के झोंके हैं हम..."। इस फ़िल्म के बाद इंदु जैन का लिखा कोई भी गीत फ़िल्मों में सुनने को नहीं मिला। यह आश्चर्य की ही बात है कि अब तक जितने भी महिला संगीतकारों की बात हमने की है, वो सभी दो चार फ़िल्मों के बाद फ़िल्मी गीतकारिता से संयास ले लिया। क्या वजह रही होंगी?

हिन्दी साहित्य में महादेवी वर्मा का नाम कौन नहीं जानता! छायावाद के चार लौहस्तंभों में एक हैं महादेवी वर्मा (अन्य तीन स्तंभ हैं सूर्यकांत त्रिपाठी ’निराला’, जयशंकर प्रसाद और सुमित्रानंदन पंत)। उनकी कालजयी काव्य कृतियों में ’यामा’ सर्वोपरि है। उनकी पशुभक्ति का मिसाल हमें ’नीलकंठ’ और ’गौरा’ जैसी सच्ची कहानियों में मिलता है। ’मेरे बचपन के दिन’, ’मधुर मधुर मेरे दीपक जल’ और ’गिल्लु’ सहित उनकी बहुत सी रचनाओं को विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के हिन्दी पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। महादेवी वर्मा के प्रशंसकों ने उन्हें ’आधुनिक युग की मीरा’ नाम से नवाज़ा है। पद्मभूषण, पद्मविभूषण, साहित्य अकादमी फ़ेलोशिप और ज्ञानपीठ जैसे उच्चस्तरीय पुरस्कारों से सम्मानित महादेवी वर्मा ने बस एक फ़िल्म में एक गीत लिखा है। 1986 की यह फ़िल्म थी ’त्रिकोण का चौथा कोण’ जिसका निर्माण व निर्देशन मधुसुदन ने किया था। जयदेव के संगीत से सजी इस फ़िल्म के चार गीतों में से दो गीत महादेवी वर्मा ने लिखे। इनमें से एक गीत है "प्यार है अमृत कलश अंबर तले, प्यार बाँटा जाए जितना बाँट ले..." जिसे शोभा जोशी ने गाया है। बहुत ही सुन्दर रचना और संयोग की बात यह है कि अमृता प्रीतम के लिखे गीत "अंबर की एक पाक सुराही" में भी उसी "अंबर" का उल्लेख है। महादेवी वर्मा का लिखा फ़िल्म का दूसरा गीत रिकॉर्ड तो हुआ था लेकिन फ़िल्माया नहीं गया। छाया गांगुली की आवाज़ में यह गीत है "कैसे उनको पाऊँ आली", जो एक कविता है। जितनी सुन्दरता से जयदेव ने इस सुंदर कविता को सुरों में पिरोया है, उतनी ही ख़ूबसूरती से छाया गांगुली ने इसे गाया है। दरसल इस गीत को पहले आशा भोसले ने एक ग़ैर-फ़िल्मी ऐल्बम के लिए गाया था जिसे जयदेव ने ही स्वरबद्ध किया था। ’त्रिकोण का चौथा कोण’ के निर्माण के समय जयदेव ने महादेवी वर्मा से इस गीत को इस फ़िल्म के लिए भी रिकॉर्ड करने की अनुमति माँगी। महादेवी वर्मा अपनी कविताओं को फ़िल्मों में इस्तमाल के लिए राज़ी नहीं होती थीं, लेकिन इस बार के लिए वो मान गईं। और इस तरह से फ़िल्म संगीत के धरोहर को उनकी इन दो रचनाओं ने समृद्ध किया। 

फ़िल्म ’त्रिकोण का चौथा कोण’ में महादेवी वर्मा के अलावा एक और महिला गीतकार ने एक गीत लिखा। माया गोविंद का लिखा यह गीत है "किया पिया पे क्या जादू"। छाया गांगुली की आवाज़ में "हौले हौले रस घोले बोले मुझसे जिया, किया पिया पे क्या जादू, पर मैंने क्या किया..." में "जिया", "पिया" और "किया" के सुंदर काव्यात्मक प्रयोग न इस गीत को फ़िल्म-संगीत के धरोहर का एक अनोखा गीत बना दिया है। वैसे माया गोविंद की लिखी यह पहली फ़िल्मी रचना नहीं है। कवयित्री, नर्तकी, स्टेज आर्टिस्ट, गायिका, फ़िल्म निर्माता और गीतकार माया गोविंद बहुमुखी प्रतिभा की धनी रही हैं। लखनऊ में जन्मीं माया गोविंद ने अपना पहला फ़िल्मी गीत सीरू दरयानानी की फ़िल्म ’कश्मकश’ के लिए लिखा जो 1973 की फ़िल्म थी। कल्याणजी-आनन्दजी के संगीत में यह फ़िल्म का शीर्षक गीत है "कश्मकश छोड़ दे, दिल से दिल जोड़ दे"। एक कामोत्तेजक गीत के रूप में यह गीत श्रोताओं के दिलों को छू नहीं सका। इसी साल लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के संगीत में फ़िल्म ’जलते बदन’ के सभी चार गीत लिखे माया गोविंद ने। इस फ़िल्म का लता-रफ़ी की युगल आवाज़ों में "वादा भूल ना जाना, हो जानेवाले लौट के आना" अपने ज़माने का मशहूर गीत रहा है, और इस तरह से इसे माया गोविंद का लिखा पहला हिट गीत माना जा सकता है। ’जलते बदन’ रामानन्द सागर की फ़िल्म थी। माया गोविंद की प्रतिभा को निर्माता-निर्देशक आत्मा राम ने भी सराहा, और उन्हें अपनी अगली फ़िल्म ’आरोप’ के गीत लिखने का मौका दिया। इस फ़िल्म में उनके लिखे दो गीत बहुत लोकप्रिय हुए। भूपेन हज़ारिका की धुन पर "नैनों में दर्पण है, दर्पण में कोई, देखूँ जिसे सुबह शाम" गीत को ख़ूब ख्याति मिली। फ़िल्म का एक अन्य गीत "जब से तूने बंसी बजाई रे, बैरन निन्दिया चुराई, मेरे ओ कन्हाई" भी एक बेहद कर्णप्रिय भक्ति रचना है। भूपेन हज़ारिका ने इसे असम के कीर्तन शैली में स्वरबद्ध किया है। इस फ़िल्म में माया गोविंद ने सभी आठ गीत लिखे थे। आत्मा राम ने 1975 में अपनी अगली फ़िल्म ’क़ैद’ के लिए भी माया गोविंद को ही गीतकार चुना और संगीत के लिए बनवाई नितिन-मंगेश की जोड़ी। इस फ़िल्म का किशोर कुमार और साथियों का गाया "ये तो ज़िन्दगी है, कभी ख़ुशी कभी ग़म..." बहुत हिट हुआ था। इसके बाद 1979 में सावन कुमार की फ़िल्म ’सावन को आने दो’ में कई गीतकारों ने गीत लिखे जैसे कि इंदीवर, गौहर कानपुरी, फ़ौक़ जामी, मदन भारती, पूरन कुमार ’होश’ और अभिलाष। एक गीत माया गोविंद ने भी लिखा था इस फ़िल्म में; सुलक्षणा पंडित और येसु दास की आवाज़ों में राजकमल के संगीत में दर्द भरा गीत "ये मत जानियो तुम बिछुड़े मोहे चैन, जैसे बन की लकड़ी सुलगती हो दिन रैन, कजरे की बाती असुवन के तेल में, आली मैं हार गई अँखियों के खेल में..." एक सुन्दर रचना है। 1980 में राजकमल और माया गोविंद की जोड़ी ने फ़िल्म ’पायल की झंकार’ के सभी गीत रचे जो ख़ूब पसन्द किए गए। 1982 में संगीतकार ख़य्याम के साथ काम करते हुए माया गोविंद ने फ़िल्म ’बावरी’ के सभी गीत लिखे जो बहुत पसन्द किए गए। "अब चराग़ों का कोई काम नहीं" (लता- येसु दास), "हे अम्बिके जगदम्बिके हे माँ" (आशा) और "मोरे नैनों में श्याम समाये" (लता) जैसे गीत फ़िल्म संगीत के बदलते मिज़ाज वाले दौर में सुरीले हवा के झोंकों की तरह आए। 1983 में राम लक्ष्मण के संगीत में ’हमसे है ज़माना’ फ़िल्म के लिए भी उन्होंने एक गीत लिखे। 1980 में ’एक बार कहो’ फ़िल्म में बप्पी लाहिड़ी के संगीत में माया गोविंद ने एक गीत लिखे। येसु दास की आवाज़ में यह गीत "चार दिन की ज़िन्दगी है, प्यार के ये दिन, दो गए तेरे मिलने से पहले, दो गए तेरे बिन..." अपने ज़माने की एक बेहद लोकप्रिय रचना है जिसे आज भी बड़े चाव से सुना जाता है। माया गोविंद और बप्पी लाहिड़ी का साथ आगे भी जारी रहा। 1986 की फ़िल्म ’झूठी’ में रबीन्द्र संगीत की छाया लिए लता-किशोर का "चंदा देखे चंदा, तो वो चंदा शरमाये" एक अत्यन्त कर्णप्रिय गीत है। 1993 में ’दलाल’ फ़िल्म में "गुटुर गुटुर" गीत ब्लॉकबस्टर सिद्ध हुआ, लेकिन विवादित भी रहा दोहरे अर्थ की वजह से। 90 और 2000 के दशकों में माया गोविंद के गीतों के स्तर में भारी गिरावट दिखाई दी। "गुटुर गुटुर" के विवाद के बाद फ़िल्म ’नाजायज़’ का "दरवाज़ा खुला छोड़ आई नींद के मारे", ’डिस्को डान्सर’ का "लौंडा बदनाम हुआ" और ’हम तुम्हारे हैं सनम" का "गले में लाल टाई" जैसे सस्ते गीत उनकी झोली से निकले। 2001 में संगीतकार भूपेन हज़ारिका ने बरसों बाद फिर एक बार माया गोविंद से गीत लिखवाए फ़िल्म ’दमन’ में। "सुन सुन गोरिया क्या बोले मेरा कंगना" असमीया लोक धुन पर आधारित सुन्दर रचना है जिसे माया गोविंद ने सुन्दर शब्दों से सजाया। माया गोविंद की लिखी इस दौर की कुछ और लोकप्रिय गीत हैं - "यार को मैंने मुझे यार ने सोने ना दिया" (शीशा), "आँखों में बसे हो तुम, तुम्हे दिल में छुपा लूंगा" (टक्कर), "टहरे हुए पानी में कंकर ना मार सांवरे" (दलाल), "मेरा पिया घर आया ओ राम जी" (याराना), "चुन लिया मैंने तुम्हें" (बेक़ाबू), "आएगी वो आएगी दौड़ी चली आएगी" (अनमोल), "प्यार कर दीदार कर जो चाहे करले, हल्ले हल्ले" (आर या पार), और "मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी" (शीर्षक गीत)। फ़िल्म संगीत के शुरुआती दौर से लेकर 90 के दशक तक जितने भी महिला गीतकार आए, उनमें सबसे अधिक गीत माया गोविंद ने ही लिखे।

यहाँ आकर पूरी होती है ’हिन्दी फ़िल्मों के महिला गीतकार’ लेख की दूसरी कड़ी। इस लेख का तीसरा व अंतिम भाग ’चित्रकथा’ के आने वाले अंक में प्रकाशित की जाएगी।

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, May 5, 2013

रागमाला गीत- ‘काली घोड़ी द्वारे खड़ी...’




स्वरगोष्ठी – 119 में आज



रागों के रंग रागमाला गीत के संग – 5


विकसित होते प्रेम की अनुभूति कराता गीत ‘काली घोड़ी द्वारे खड़ी...’


संगीत-प्रेमियों की साप्ताहिक महफिल ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नये अंक का साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र पुनः उपस्थित हूँ। छठें और सातवें दशक की हिन्दी फिल्मों में कई उल्लेखनीय रागमाला गीतों की रचना हुई थी। नौवें दशक की फिल्मों में रागमाला गीतों की संख्या अपेक्षाकृत कम थी। ‘स्वरगोष्ठी’ के 114वें अंक में हमने आपको 1981 में प्रदर्शित फिल्म ‘उमराव जान’ से लिये गए रागमाला गीत का रसास्वादन कराया था। आज का रागमाला गीत इसी दशक अर्थात 1981 में ही बनी फिल्म ‘चश्मेबद्दूर’ से लिया गया है। इस गीत में मुख्य रूप से राग काफी का अत्यन्त आकर्षक आधार है। जबकि गीत के दूसरे अन्तरे में मालकौंस और तीसरे में भैरवी के स्वरों का भी प्रयोग किया गया है।

येसुदास
रागमाला गीतों में रागों का चयन और उनका क्रम एक निश्चित उद्देश्य से किया जाता है। लघु श्रृंखला ‘रागों के रंग रागमाला गीतों के संग’ के अन्तर्गत अब तक हम आपको ऐसे गीत सुनवा चुके हैं, जिनमें प्रहर के क्रम में अथवा ऋतु परिवर्तन के क्रम में रागों का चयन किया गया था। परन्तु आज हम आपको जो गीत सुनवा रहे हैं, उसमें रागो का चयन फिल्म के प्रसंग के अनुसार किया गया है। आज हम आपको 1981 में प्रदर्शित, मनोरंजक फिल्म ‘चश्मेबद्दूर’ से लिया गया एक रागमाला गीत सुनवाएँगे। सई परांजपे द्वारा निर्देशित यह लोकप्रिय कामेडी अपने परिवार से दूर, छात्रावास में रह कर पढ़ाई कर रहे तीन नौजवानों की कहानी है। इस फिल्म के गीत इन्दु जैन ने लिखे और इन्हें राजकमल ने संगीतबद्ध किये थे। ‘राजश्री’ की फिल्मों में अपने स्तरीय संगीत से पहचाने जाने वाले संगीतकार राजकमल ने फिल्म ‘चश्मेबद्दूर’ के गीतों में रागों का स्पर्श देकर उन्हें स्मरणीय बना दिया। अपने विद्यार्थी-जीवन में राजकमल एक कुशल तबला वादक थे। इसके अलावा लोक संगीत का भी उन्होने गहन अध्ययन किया था। लोक संगीत के अध्ययन के लिए उन्हें सरकारी छात्रवृत्ति भी मिली थी। ‘दोस्त और दुश्मन’ (1971) से अपने फिल्म संगीत के सफर की शुरुआत करने वाले राजकमल को पहली भव्य सफलता ‘राजश्री’ की फिल्म ‘सावन को आने दो’ (1979) में मिली। इस फिल्म के संगीत में पर्याप्त विविधता थी और गीतों में पारिवारिक अभिरुचि का समावेश भी था। रागों का सरल रूपान्तरण भी इनके संगीत के एक विशेषता रही है। फिल्म संगीत में रागों का ग्राह्य प्रयोग उन्होने 1981 की फिल्म ‘चश्मेबद्दूर’ में किया। इस फिल्म के अन्य मधुर गीतों के साथ एक रागमाला गीत- ‘काली घोड़ी द्वारे खड़ी...’ भी था, जिसे येसुदास और हेमन्ती शुक्ला ने स्वर दिया। कवयित्री इन्दु जैन ने इस गीत में चुहलबाजी से युक्त हास्य बुना है।

हेमन्ती शुक्ला
संगीतकार राजकमल ने इस गीत में मुख्य रूप से राग काफी का आधार दिया है। गीत के आधे से अधिक भाग अर्थात गीत का स्थायी और प्रथम दो अन्तरे राग काफी पर आधारित है। गीत के इस भाग का फिल्मांकन ‘सरगम संगीत विद्यालय’ की कक्षा में किया गया है, जहाँ नायिका (दीप्ति नवल) अपने संगीत-गुरु (विनोद नागपाल) से संगीत-शिक्षा प्राप्त कर रही है। स्थायी की पंक्ति में ‘काली घोड़ी’ शब्द का संकेत नायक (फारुख शेख) की दुपहिया (काले रंग की बाइक) की ओर है। इस पंक्ति के अर्थ है कि नायक अब नायिका के निकट आ चुका है। गीत के तीसरे अन्तरे की शुरुआत पहले सरगम और फिर ‘काली घोड़ी पे गोरा सैयाँ चमके...’ पंक्तियों से होती है। इस अन्तरे में राग मालकौंस के स्वरों का प्रयोग है। दृश्य के अनुसार नायिका सड़क पर बस के इन्तजार में खड़ी है, तभी नायक अपनी काली घोड़ी (बाइक) से आता है और उसे बैठा कर चल देता है। इस अन्तरे में ‘काली घोड़ी द्वारे खड़ी’ के स्थान पर ‘काली घोड़ी दौड़ पड़ी...’ शब्दावली का प्रयोग हुआ है। गीत का चौथा अन्तरा- 'लागी चुनरिया उड़ उड़ जाए...' राग भैरवी पर आधारित है। इस अन्तरे में नायक-नायिका के प्रेम को और प्रगाढ़ होते दिखाया गया है। इस प्रकार संगीतकार राजकमल ने प्रसंग के अनुकूल क्रमशः विकसित होते प्रेम सम्बन्धों की अनुभूति कराने के लिए राग काफी, मालकौंस और भैरवी रागों का प्रयोग किया है। फिल्मों के रागमाला गीतों में फिल्म ‘चश्मेबद्दूर’ का यह गीत बेहद मधुर और रोचक भी है। अब आप यह गीत सुनिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

रागमाला गीत : फिल्म ‘चश्मेबद्दूर’ : ‘काली घोड़ी द्वारे खड़ी...’ : येसुदास और हेमन्ती शुक्ला



आज की पहेली 

‘स्वरगोष्ठी’ की 119वीं संगीत पहेली में हम आपको सातवें दशक की एक फिल्म के रागमाला गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको केवल इसी अंश से सम्बन्धित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 121वें अंक में हम सही उत्तर और विजेताओं के नामों की घोषणा करेंगे। 120वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता 122वें अंक में घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीतांश किस राग पर आधारित है?

2 – गीत के इस अंश में प्रयुक्त ताल का नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 121वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 

‘स्वरगोष्ठी’ के 117वें अंक में हमने आपको 1963 में प्रदर्शित भोजपुरी फिल्म 'गंगा मैया तोहें पियरी चढ़ाइबो' के शीर्षक गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- ताल दादरा और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- संगीतकार चित्रगुप्त। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर की क्षिति तिवारी, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ।


झरोखा अगले अंक का 


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों के रंग रागमाला गीत के संग’ का आगामी अंक श्रृंखला का समापन अंक होगा। इस रागमाला गीत में चार रागों की उपस्थिति है और यह एक युगलगीत है। आप भी हमारे आगामी अंकों के लिए भारतीय शास्त्रीय, लोक अथवा फिल्म संगीत से जुड़े नये विषयों, रागों और अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9-30 ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Tuesday, March 22, 2011

कहाँ से आये बदरा....एक से बढ़कर एक खूबसूरत फ़िल्में दी सशक्त निर्देशिका साईं परांजपे ने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 618/2010/318

पार्श्वगायन को छोड़ कर हिंदी फ़िल्म निर्माण के अन्य सभी क्षेत्रों में पुरुषों का ही शुरु से दबदबा रहा है। लेकिन कुछ साहसी और सशक्त महिलाओं नें फ़िल्म निर्माण के सभी क्षेत्रों में क़दम रखा और दूसरों के लिए राह आसान बनायी. ऐसी ही कुछ महत्वपूर्ण महिला कलाकारों को समर्पित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला 'कोमल है कमज़ोर नहीं' में आप सब का हम फिर एक बार स्वागत करते हैं। कल की कड़ी में हमने बातें की मशहूर लेखिका इस्मत चुगताई की, और आज बातें फिर एक बार एक लेखि्का व निर्देशिका की। इन्होंने अपनी कलम को अपना 'साज़' बनाकर ऐसी 'कथा' लिखीं कि वह न केवल सब के मन को 'स्पर्श' कर गईं बल्कि फ़िल्म निर्माण को भी एक नई 'दिशा' दी। उनकी लाजवाब फ़िल्मों को देख कर केवल पढ़े लिखे लोग ही नहीं, बल्कि 'अंगूठा-छाप' लोगों ने भी एक स्वर कहा 'चश्म-ए-बद्दूर'!!! जी हाँ, हम आज बात कर रहे हैं साईं परांजपे की। १९ मार्च १९३८ को लखनऊ मे जन्मीं साईं के पिता थे रशियन वाटरकलर आर्टिस्ट यूरा स्लेप्ट्ज़ोफ़, और उनकी माँ थीं शकुंतला परांजपे, जो ३० और ४० के दशक की हिंदी और मराठी सिनेमा की जानीमानी अभिनेत्री थीं। वी. शांताराम की मशहूर फ़िल्म 'दुनिया न माने' में भी शकुंतला जी ने अभिनय किया था। बाद में शकुंतला जी एक लेखिका व समाज सेविका बनीं और राज्य सभा के लिए भी मनोनीत हुईं। वो १९९१ में पद्मभूषण से सम्मानित की गई। दुर्भाग्यवश सई के जन्म के कुछ दिनों में ही उनके माता-पिता अलग हो गए और सई को उनकी माँ ने बड़ा किया अपने पिता श्री आर. पी. परांजपे के घर में, जो एक प्रसिद्ध गणितज्ञ और शिक्षाविद थे। इस तरह से साईं को बहुत अच्छी शिक्षा मिली और कई शहरों में रहने का मौका भी मिला, जिनमें पुणे का नाम उल्लेखनीय है। बचपन में सई अपने चाचा अच्युत राणाडे के पास जाया करतीं, जो ४० और ५० के दशकों के जानेमाने फ़िल्मकार थे। उन्हीं से साईं को पटकथा लेखन की पहली शिक्षा मिली। साईं ने भी लिखना शुरु किया और केवल आठ वर्ष की आयु में उनकी पहली पुस्तक 'मूलांचा मेवा' (मराठी) प्रकाशित हुई। १९६३ में साईं ने 'नैशनल स्कूल ऒफ़ ड्रामा' से स्नातक की डिग्री प्राप्त की।

साईं परांजपे का करीयर आकाशवाणी पुणे से आरंभ हुआ बतौर उद्घोषिका, और जल्दी ही वहाँ के बाल-कार्यक्रम के माध्यम से लोकप्रियता हासिल कर लीं। साईं ने अपने करीयर में मराठी, हिंदी और अंग्रेज़ी में बहुत से नाटक लिखे और निर्देशित कीं। सई नें न केवल फ़ीचर फ़िल्मों का निर्माण किया बल्कि बच्चों की फ़िल्में और वृत्तचित्रों का भी निर्माण व निर्देशन किया। उनकी लिखी किताबों में ६ किताबों को राष्ट्रीय या राज्य स्तर के पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। दूरदर्शन के लिए साईं ने महत्वपूर्ण योगदान दिया और कई वर्षों तक बतौर प्रोड्युसर व डिरेक्टर जुड़ी रहीं। टीवी के लिए उनकी पहली फ़िल्म 'दि लिट्ल टी शॊप' को तेहरान में 'एशियन ब्रॊडकास्टिंग् युनियन अवार्ड' से सम्मानित किया गया था। बम्बई दूरदर्शन के सर्वप्रथम कार्यक्रम को प्रोड्युस करने का दायित्व उन्हें ही दिया गया था, जो उनके लिए बड़ा सम्मान था। ७० के दशक में साईं को दो बार 'चिल्ड्रेन फ़िल्म सोसायटी ऒफ़ इण्डिया' के सचिव के लिए चुना गया, और उस दौरान उन्होंने चार बाल-फ़िल्में बनाईं, जिनमें 'जादू का शंख' और 'सिकंदर' को पुरस्कृत किया गया था। उनकी पहली फ़ीचर फ़िल्म 'स्पर्श' (१९८०) को उस साल राष्ट्रीय पुरस्कार के साथ साथ अन्य पाँच पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया था। 'स्पर्श' के बाद दो हस्य फ़िल्में उन्होंने बनाईं - 'चश्म-ए-बद्दूर' (१९८१) और 'कथा' (१९८२)। उन्होंने १९८४ में 'अड़ोस-पड़ोस' और १९८५ में 'छोटे-बड़े' जैसी टीवी सीरियल्स बनाये। उनकी अन्य फ़िल्मों में शामिल हैं - 'अंगूठा छाप' (राष्ट्रीय साक्षरता मिशन पर केन्द्रित), 'दिशा' (स्थानांतरित मज़दूरों पर केन्द्रित), 'पपीहा' (जंगल पर केन्द्रित), 'साज़' (दो गायिका बहनों के जीवन की कहानी पर केन्द्रित), और 'चकाचक' (वातावरण-दूषण पर केन्द्रित)। इस तरह से साईं परांजपे एक ऐसी फ़िल्मकार हैं जिन्होंने हमेशा ही अर्थपूर्ण फ़िल्में बनाईं हैं। सन् २००६ में भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया। आइए आज उनको सलाम करते हुए सुनते हैं फ़िल्म 'चश्म-ए-बद्दूर' से एक बड़ा ही मशहूर गीत "कहाँ से आये बदरा, घुलता जाये कजरा"। हमनें इस गीत को इसलिए भी चुना क्योंकि इस गीत को लिखा है एक महिला गीतकार नें। इंदु जैन ने इस गीत को लिखा है और संगीत दिया है राजकमल साहब नें। युगल आवाज़ें हैं हेमंती शुक्ला और येसुदास के। महिला गीतकारों की अगर बात करें तो एक और नाम जो याद आता है, वह है माया गोविंद जी का। तो दोस्तों, 'कोमल है कमज़ोर नहीं' की आज की कड़ी में हमनें जिन महिला कलाकारों का नाम लिया, वो हैं साईं परांजपे, शकुंतला परांजपे , इंदु जैन, माया गोविंद और हेमंती शुक्ला। सुनते हैं राग वृंदावनी सारंग पर आधारित इस सुमधुर गीत को।



क्या आप जानते हैं...
१९९३ में साईं परांजपे की फ़िल्म 'चूड़ियाँ' को 'National Film Award for Best Film on Social Issues' से सम्मानित किया गया था।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 09/शृंखला 12
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - नारी शक्ति की आवाज़ भी है ये गीत.

सवाल १ - हालाँकि एक मशहूर गायिका पे केंद्रित है ये कड़ी, पर इस फिल्म की नायिका का भी इसमें सम्मान है, कौन है ये जबरदस्त लाजवाब अभिनेत्री - ३ अंक
सवाल २ - गीतकार कौन हैं - २ अंक
सवाल ३ - फिल्म के निर्देशक कौन हैं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अवध जी २ अंको की बधाई के साथ जानकारी देने का आभार, अमित जी और अंजाना जी तो हैं ही सदाबहार

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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