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Sunday, October 19, 2008

पहले चरण की दूसरी समीक्षा में कांटे की टक्कर, सितम्बर के सिकंदरों की

सितम्बर के सिकंदर गीत समीक्षा की पहली परीक्षा से गुजर चुके हैं, आईये जानें हमारे दूसरे समीक्षक की क्या राय है इनके बारे में -

पहला गीत खुशमिज़ा़ज मिट्टी

मेरा मानना है कि ये गीत अब तक के सबसे संपूर्ण गीतों में से एक है । इस पर बहस की कोई गुंजाईश ही नहीं है । गायक संगीतकार ने इसके बोलों को बहुत ही संवेदनशीलता के साथ निभाया है । सुबोध साठे को बधाई । गौरव के बोल एक पके हुए गीतकार की कलम से निकले लगते हैं । आवाज़ के सबसे अच्‍छे गीतों में से एक है ये ।

गीत- 5, धुन और संगीत संयोजन—5, गायकी और आवाज़—5, ओवारोल प्रस्तुति—5
कुल अंक 20 / 20 यानी 10 / 10, कुल अंक अब तक (पहली और दूसरी समीक्षा को मिला कर)= 19 /20

दूसरा गीत—राहतें सारी

मुझे लगता है कि इस गाने से किसी भी पक्ष में पूरा न्‍याय नहीं हुआ है । मोहिंदर जी के इस गीत के पहले दो अंतरे अच्‍छे हैं । पर आखिरी दो अंतरे कमजोर लगे । उनमें ‘गेय तत्‍त्‍व’ की कमी नज़र आई । कृष्‍ण राज कुमार ने कोशिश की है कि इस गाने को बहुत ही नाजुक-सा बनाया जाये । पर मुझे लगता है कि इस आग्रह की वजह से गाने के प्रभाव पर बहुत बुरा असर पड़ा है । इस गाने को और चमकाया जा सकता है ।

गीत- 3 धुन और संयोजन- 3 गायकी और आवाज-4 ओवरऑल प्रस्‍तुति- 3
कुल अंक 13 /20 यानी 6.5 / 10, कुल अंक अब तक (पहली और दूसरी समीक्षा को मिला कर)= 11.5 / 20

तीसरा गीत-- ओ मुनिया मेरी गुडिया---

इससे पहले मैं जे एम सोरेन को सुना नहीं था । पर इस गाने को सुनकर मुझे लगा कि वो सही मायनों में रॉक स्‍टार हैं । एक सच्‍चा रॉक स्‍टार सरोकार वाले गीतों की कुशल प्रस्‍तुति करता है । और सोरेन ने यही किया है । एकदम हार्ड म्‍यूजिक के बावजूद इस गाने की संवदेना दबी नहीं है । सजीव का ये गीत उनके बाक़ी गीतों से बेहतर है और एकदम अलग तरह का भी ।

गीत- 5 धुन और संयोजन- 4 गायकी और आवाज़- 4 ओवरॉल प्रस्‍तुति- 5
कुल अंक 18 / 20 यानी 09 / 10, कुल अंक अब तक (पहली और दूसरी समीक्षा को मिला कर)= 17 / 20

चौथा गीत/ग़ज़ल—सच बोलता है

अजीम नवाज़ राही की इस ग़ज़ल के सारे शेर अच्‍छे हैं । एक भी कमज़ोर शेर नहीं है । इसके लिए शायर बधाई का पात्र है । इस ग़ज़ल में इंटरल्‍यूड पर कोरस का प्रयोग अच्‍छा लगा । कुल मिलाकर एक अच्‍छी कंपोज़ीशन और अच्‍छी गायकी ।

रचना- 5 धुन और संयोजन- 4 गायकी और आवाज़- 4 ओवरऑल- 5
कुल अंक 18 / 20 यानी 9 / 10, कुल अंक अब तक (पहली और दूसरी समीक्षा को मिला कर)= 16.5 / 20

चलते चलते -

खुशमिजाज़ मिटटी में दूसरे सप्ताह भी अपनी बढ़त मजबूत रखी है. ओ मुनिया और सच बोलता है भी कसौटी पर खरे उतरे हैं. सितम्बर के सिअकंदेरों की तीसरे और पहले दौर की अन्तिम समीक्षा के साथ हम जल्द ही उपस्थित होंगे.

Sunday, October 5, 2008

सितम्बर के सिकंदरों को पहली भिडंत, समीक्षा के अखाडे में...

सितम्बर के सिकंदरों की पहली समीक्षा -

समीक्षा (खुशमिजाज़ मिटटी )

सितम्बर माह का पहला गीत आया है सुबोध साठे की आवाज़ में "खुशमिजाज़ मिट्टी"। गीत लिखा है गौरव सोलंकी ने और संगीतकार खुद सुबोध साठे हैं। गीत के बोल अच्छी तरह से पिरोये गये हैं। गीत की शुरुआत जिस तरह से टुकड़ों में होती है, उसी तरह संगीतकार ने मेहनत करके टुकड़ों में ही शुरुआत दी है। धीमी शुरुआत के बावजूद सुबोध साठे के स्वर मजबूती से जमे हुए नज़र आते हैं। वे एक परिपक्व संगीतकार की तरह गीत की "स्पीड" को "मेण्टेन" करते हुए चलते हैं। असल में गीत का दूसरा और तीसरा अन्तरा अधिक प्रभावशाली बन पड़ा है, बनिस्बत पहले अन्तरे के, क्योंकि दूसरा अन्तरा आते-आते गीत अपनी पूरी रवानी पर आ जाता है। ध्वनि और संगीत संयोजन तो बेहतरीन बन पड़ा ही है इसका वीडियो संस्करण भी अच्छा बना है। कुल मिलाकर एक पूर्ण-परिपक्व और बेहतरीन प्रस्तुति है। गीत के लिये 4 अंक (एक अंक काटने की वजह यह कि गीत की शुरुआत और भी बेहतर हो सकती थी), आवाज और गायकी के लिये 5 अंक (गीत की सीमाओं को देखते हुए शानदार प्रयास के लिये), ध्वनि संयोजन और संगीत के लिये 4 अंक और कुल मिलाकर देखा जाये तो प्रस्तुति को 5 में से पूरे 5 अंक देता हूँ। गौरव सोलंकी और सुबोध साठे का भविष्य बेहद उज्जवल नज़र आता है।

कुल अंक १८/२० यानी ९ / १०

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समीक्षा (राहतें सारी...)



सितम्बर माह का दूसरा गीत है "राहतें सारी…" लिखा है मोहिन्दर कुमार ने और गाया तथा संगीतबद्ध किया है नये गायक कृष्ण कुमार ने। परिचय में बताया गया है कि कृष्ण कुमार पिछले 14 सालों से कर्नाटक संगीत की शिक्षा ले रहे हैं, लेकिन यह नहीं पता चला कि उन्होंने अब तक कितने गीतों को संगीतबद्ध किया है। गीत को आवाज़ देना और उसे ध्वनि संयोजन करना और संगीत देना दोनों अलग-अलग विधाऐं हैं, यह ज़रूरी नहीं कि जो अच्छा गायक हो वह अच्छा संगीतकार भी हो, और ठीक इसके उलट भी यही नियम लागू होता है। भारतीय फ़िल्म संगीत में ऐसे अनेकों उदाहरण भरे पड़े हैं, जिसमें गायकों ने संगीतकार बनने की कोशिश की लेकिन जल्दी ही उनकी समझ में आ गया कि यह उनका क्षेत्र नहीं है, और यही कुछ संगीतकारों के साथ भी हुआ है, जो गायक बनना चाहते थे। इस गीत में कृष्ण कुमार लगभग इसी "ऊहापोह" (Dilema) में फ़ँसे हुए दिखते हैं। मोहिन्दर कुमार की कविता तो उम्दा स्तर की है, यहाँ तक कि गायक की आवाज़ भी ठीक-ठाक लगती है, लेकिन सर्वाधिक निराश किया है संगीत संयोजन और ध्वन्यांकन ने। शुरु से आखिर तक गीत एक अस्पष्ट सी "श्रवणबद्धता" (Audibility) में चलता है। संगीत के पीछे आवाज़ बहुत दबी हुई आती है, कृष्ण कुमार चाहते तो संगीत का कम उपयोग करके आवाज़ को (माइक पास लाकर) थोड़ा खुला हुआ कर सकते थे, लेकिन ऐसा नहीं किया गया और समूचा गीत बेहद अस्पष्ट सा लगा। कृष्ण कुमार अभी बहुत युवा हैं, उनकी संगीत दीक्षा भी चल रही है, उन्हें सिर्फ़ अपने गायकी पर ध्यान देना उचित होगा। कोई अन्य गुणी संगीतकार उनकी आवाज़ का और भी बेहतरीन उपयोग कर सकेगा, क्योंकि शास्त्रीय "बेस" तो उनकी आवाज़ में मौजूद है ही। इस गीत में बोल के लिये 4 अंक, संगीत संयोजन के लिये 2 अंक और आवाज़ और उच्चारण के लिये मैं सिर्फ़ 2 अंक दूँगा,यदि "ओवर-ऑल" अंक दिये जायें तो इस गीत को 5 में से 2 अंक ही देना उचित होगा। आवाज़ और संगीत शिक्षा को देखते हुए कृष्ण कुमार से और भी उम्मीदें हैं, लेकिन इस गीत ने निराश ही किया है।

कुल अंक १०/२० यानी ५ / १०

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समीक्षा (ओ मुनिया )

माह का तीसरा गीत है "ओ मुनिया…" गाया और संगीतबद्ध किया है सोरेन ने और लिखा है सजीव ने…
एक प्रोफ़ेशनल गीत कैसा होना चाहिये यह इसका उत्तम उदाहरण है। तेज संगीत, गीत की तेज गति, स्टूडियो में की गई बेहतर रिकॉर्डिंग और स्पष्ट आवाज़ के कारण यह गीत एकदम शानदार बन पड़ा है। गीत के बोल सजीव ने उम्दा लिखे हैं जिसमें "मुनिया" को आधुनिक ज़माने की नसीहत है ही, साथ में उसके प्रति "केयर" और "आत्मीय प्यार" भी गीत में छलकता है। साईट पर गीत के लिये प्रस्तुत ग्राफ़िक में बम विस्फ़ोट में घायल हुए व्यक्ति और विलाप करती हुई माँ की तस्वीर दिखाई देती है, इसकी कोई आवश्यकता नहीं नज़र आती। यह चित्र इस गीत की मूल भावना से मेल नहीं खाते। बहरहाल, गीत की धुन "कैची" है, युवाओं की पसन्द की है, तत्काल ज़बान पर चढ़ने वाली है। सोरेन की आवाज़ और उच्चारण में स्पष्टता है। चूँकि यह गीत तेज़ गति के संगीत के साथ चलता है, इसलिये इसमें गायक को सिर्फ़ साथ में बहते जाना था, जो कि सोरेन ने बखूबी किया है। अब देखना यह होगा कि किसी शान्त गीत में जिसमें "क्लासिकल" का बेस हो, सोरेन किस तरह का प्रस्तुतीकरण दे पाते हैं… फ़िलहाल इस गीत के बोलों के लिये 5 में से 4, संगीत संयोजन के लिये भी 5 में से साढ़े 3, आवाज़ और ध्वन्यांकन के लिये (ज़ाहिर है कि इसमें तकनीक का साथ भी शामिल है) साढ़े 4 अंक देता हूँ, इस प्रकार यदि गीत का ओवर-ऑल परफ़ॉर्मेंस देखा जाये तो इस अच्छे गीत को 5 में से 4.25 अंक दिये जा सकते हैं।

कुल अंक १६/२० यानी ८ / १०

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समीक्षा 4 (सच बोलता है )

अज़ीम जी लिखी हुई यह गज़ल बेहतरीन अश्आर का एक नमूना है, साथ ही इसे मखमली आवाज़ देने वाले रफ़ीक शेख भी एक जानी-पहचानी आवाज़ बन चुके हैं। समीक्षा के लिये प्रस्तुत गज़ल में यदि एक अंतरा (तीसरा वाला) कम भी होता तो चल जाता, बल्कि गज़ल और अधिक प्रभावशाली हो जाती, क्योंकि इसका आखिरी पैरा "जानलेवा" है। इसी प्रकार रफ़ीक शेख की आवाज़ मोहम्मद अज़ीज़ से मिलती-जुलती लगी, उन्होंने इस गज़ल को बिलकुल प्रोफ़ेशनल तरीके से गाया है, संगीत में अंतरे के बीच का इंटरल्यूड कुछ खास प्रभावित नहीं करता, बल्कि कहीं-कहीं तो वह बेहद सादा सा लगता है। गज़ल के मूड को गायक ने तो बेहतरीन तरीके से निभाया लेकिन संगीत ने उसे थोड़ा कमज़ोर सा कर दिया है। रफ़ीक की आवाज़ बेहतरीन है और यही इस गज़ल का सबसे सशक्त पहलू बनकर उभरी है। गीत पक्ष को 5 में से साढ़े तीन, संगीत पक्ष को 5 में से 3 और गायकी पक्ष को 5 में से साढ़े 4 अंक दिये जा सकते हैं। इस प्रकार ओवरऑल परफ़ॉरमेंस के हिसाब से यह गज़ल "अच्छी"(४.५ /५) की श्रेणी में रखी जाना चाहिये।

कुल अंक १५/२० यानी ७.५ / १०

चलते चलते

खुशमिजाज़ मिटटी की टीम को बधाई, देखना दिलचस्प होगा कि यह गीत आने वाले हफ्तों में भी यह बढ़त बना कर रख पायेगा या नही. ओ मुनिया और सच बोलता है भी कम पीछे नही है हैं दौड़ में...फिलहाल के लिए इतना ही.

Friday, September 12, 2008

दोस्तों ने निभा दी दुश्मनी प्यार से...

दूसरे सत्र के ग्यारहवें गीत का विश्वव्यापी उदघाटन आज.

ग्यारहवें गीत के साथ हम दुनिया के सामने ला रहे हैं एक और नौजवान संगीतकार कृष्ण राज कुमार को, जो मात्र २२ वर्ष के हैं, और जिन्होंने अभी-अभी अपने B.Tech की पढ़ाई पूरी की है, पिछले १४ सालों से कर्नाटक गायन की दीक्षा ले रहे हैं. कृष्ण का परिचय हिंद युग्म से, "पहला सुर" के संगीतकार निरन कुमार ने कराया, कृष्ण कुमार जिस दिन हिंद युग्म के कविता पृष्ट पर आए, उसी दिन युग्म के वरिष्ट कवि मोहिंदर कुमार की ताजी कविता प्रकाशित हुई थी, कृष्ण ने उसी कविता / गीत को स्वरबद्ध करने का हमसे आग्रह किया.

लगभग डेढ़ महीने तक इस पर काम करने के बाद उन्होंने इस गीत को मुक्कमल कर अपनी आवाज़ में हमें भेजा, जिसे हम आज आपके समक्ष लेकर हाज़िर हुए हैं, हम चाहेंगे कि आप इस नए, प्रतिभावान संगीतकार/गायक को अपना प्रोत्साहन और मार्गदर्शन अवश्य दें.

गीत को सुनने के लिए प्लेयर पर क्लिक करें -



With this new song, we are introducing another new singer / composer from Cochi, Krishna Raj Kumar, lyrics are provided by another Vattern poet from Hind Yugm, Mohinder Kumar, the song is more like a poetry about relationships and the hard facts of life. We hope you will like this presentation, give your guidance to this young composer, so that he can better himself for the future.

Click on the player to listen to this brand new song



Lyrics - गीत के बोल

राहतें सारी आ गई हिस्से में उनके
और उजाले दामन के सितारे हो गये
चांद मेरा बादलों में खो गया है
कौन जाने इस घटा की क्या वजह है

आखिरी छोर तक जायेगा साथ मेरे
और फ़िर वो साया भी मेरा न होगा
ख्वाबों के लिये हैं ये सातों आसमान
हकीकत के लिये पथरीली सतह है


राहों से मंजिलों का पता पूछता है
बीच राह में गुमराह राही हो गया है
कौन जाने गुजरे पडाव मंजिलें हों
भूलना ही हार को असली फ़तह है

दोस्तों ने निभा दी दुश्मनी प्यार से
सोचने को अब बाकी क्या बचा है
राह शोलों पर भी चल कर कट जायेगी
इस दिल मे जख्मों के लिये जगह है...

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SONG # 11, SEASON # 02, "RAHATEN SAARI" OPENED ON 12/09/2008, ON AWAAZ, HIND YUGM.
Music @ Hind Yugm, Where music is a passion


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