Showing posts with label vaani jayraam. Show all posts
Showing posts with label vaani jayraam. Show all posts

Sunday, August 19, 2012

वर्षा ऋतु के रंग : मल्हार अंग के रागों के संग – समापन कड़ी

    
    
स्वरगोष्ठी – ८४ में आज

‘चतुर्भुज झूलत श्याम हिंडोला...’ : मल्हार अंग के कुछ अप्रचलित राग

र्षा ऋतु के संगीत पर केन्द्रित ‘स्वरगोष्ठी’ की यह श्रृंखला विगत सात सप्ताह से जारी है। परन्तु ऐसा प्रतीत हो रहा है कि अब इस ऋतु ने भी विराम लेने का मन बना लिया है। अतः हम भी इस श्रृंखला को आज के अंक से विराम देने जा रहे हैं। पिछले अंकों में आपने मल्हार अंग के विविध रागों और वर्षा ऋतु की मनभावन कजरी गीतों का रसास्वादन किया था। आज इस श्रृंखला के समापन अंक में मल्हार अंग के कुछ अप्रचलित रागों पर चर्चा करेंगे और संगीत-जगत के कुछ शीर्षस्थ कलासाधकों से इन रागों में निबद्ध रचनाओं का रसास्वादन भी करेंगे।
पण्डित सवाई गन्धर्व 

मल्हार अंग का एक मधुर राग है- नट मल्हार। आजकल यह राग बहुत कम सुनाई देता है। यह राग नट और मल्हार अंग के मेल से बना है। इसे विलावल थाट का राग माना जाता है। इस राग में दोनों निषाद का प्रयोग होता है, शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयुक्त होते हैं। इसका वादी मध्यम और संवादी षडज होता है। इसराज और मयूर वीणा-वादक पं. श्रीकुमार मिश्र के अनुसार इस राग के गायन-वादन में नट अंग की स्वर-संगति, सा रे s रे ग s ग म रे... मियाँ की मल्हार की, म रे प नि(कोमल) ध नि सां ध नि(कोमल) म प... तथा गौड़ मल्हार की स्वर संगति, म प ध नि सां s ध प म... की जाती है। इस राग के माध्यम से नायिका की विकल मनःस्थिति का सम्प्रेषण भावपूर्ण ढंग से की जा सकती है। प्रायः मध्य लय की रचनाएँ इस राग में बड़ी भली लगती है।

आइए अब आपको राग नट मल्हार की एक दुर्लभ रिकार्डिंग सुनवाते है। इसे बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक दशकों के सुविख्यात विद्वान पण्डित सवाई गन्धर्व अर्थात पण्डित रामचन्द्र गणेश कुण्डगोलकर ने स्वर दिया है। पण्डित गन्धर्व किराना घराना के संवाहक उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के शिष्य और पण्डित भीमसेन जोशी, विदुषी गंगुबाई हंगल, पण्डित फिरोज दस्तूर, पण्डित वासवराज राजगुरु आदि महान संगीतज्ञों के गुरु थे। राग नट मल्हार की मध्य लय, तीनताल में यह मोहक रचना आप भी सुनिए।

राग नट मल्हार : ‘बनरा बन आया...’ : पण्डित सवाई गन्धर्व



मल्हार का ही एक प्रकार है, राग जयन्त या जयन्ती मल्हार। इसके नाम से आभास हो जाता है कि यह राग
पण्डित विनायकराव पटवर्धन
जैजैवन्ती और मियाँ की मल्हार का मिश्रण है। यह काफी थाट का राग माना जाता है। इसमें दोनों गांधार और दोनों निषाद का प्रयोग होता है। इसका वादी ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। राग के आरोह के स्वर हैं- सा, रे प, म प नि(कोमल) ध नि सां, तथा अवरोह के स्वर हैं- सां ध नि(कोमल) म प, प म ग रे ग(कोमल) रे सा। पं. श्रीकुमार मिश्र के अनुसार राग जयन्त मल्हार के दोनों रागों का कलात्मक और भावात्मक मिश्रण क्लिष्ट व विशिष्ट प्रक्रिया है। पूर्वाङ्ग में जैजैवन्ती का करुण व विनयपूर्ण भक्तिभाव परिलक्षित होता है, जबकि उत्तराङ्ग में मियाँ की मल्हार, वर्षा के तरल भावों के साथ समर्पित, पुकारयुक्त व आनन्द से परिपूर्ण भावों का सृजन करने में सक्षम होता है। इस राग में भी मध्यलय की रचनाएँ अच्छी लगती हैं।

आपको सुनवाने के लिए हमने राग जयन्त मल्हार की एक प्राचीन किन्तु मोहक बन्दिश का चयन किया है। अपने समय के बहुआयामी संगीतज्ञ पण्डित विनायकराव पटवर्धन ने इस रचना को स्वर दिया है। पण्डित पटवर्धन ने न केवल रागदारी संगीत के क्षेत्र में, बल्कि सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर में भी अपना अनमोल योगदान किया था। लीजिए, राग जयन्त मल्हार की तीनताल में निबद्ध यह रचना आप भी सुनिए।

राग जयन्त मल्हार : ‘ऋतु आई सावन की...’ : पण्डित विनायकराव पटवर्धन



राग जयन्त मल्हार का उपयोग फिल्म-संगीत में एकमात्र संगीतकार बसन्त देसाई ने ही किया था। उन्हें मल्हार अंग के राग अत्यन्त प्रिय थे। उनके द्वारा स्वरबद्ध गीतों की सूची में मल्हार की विविधता के स्पष्ट दर्शन होते हैं। १९७५ में बसन्त देसाई की संगीतबद्ध फिल्म ‘शक’ प्रदर्शित हुई थी। यह उनकी संगीतबद्ध अन्तिम फिल्म थी। फिल्म के प्रदर्शन से पहले ही एक लिफ्ट दुर्घटना में उनका निधन हो गया था। फिल्म ‘शक’ में श्री देसाई ने गुलजार के लिखे एक गीत- ‘मेहा बरसने लगा है...’ को राग जयन्त मल्हार के स्वरों में ढाल कर कर्णप्रिय रूप दिया है। आशा भोसले के स्वरों में आप भी यह गीत सुनिए-

फिल्म शक : ‘मेहा बरसने लगा है आज की रात...’ : संगीत – बसन्त देसाई



पं. भीमसेन जोशी
मल्हार अंग के विभिन्न रागों के क्रम में अब हम आपसे कुछ ऐसे रागों की चर्चा करते हैं, जिन्हें आजकल शायद ही गाया-बजाया जाता है। इन रागों में निबद्ध रचनाएँ हम आपको सुनवाएँगे, किन्तु इनके बारे में जानकारी देने का दायित्व हम संगीत के जानकार और प्रयोक्ता पाठकों को सौंपते हैं। इन रागों के बारे में जानकारी आप नीचे दिए गए पते पर मेल कीजिए। आपके भेजे विवरण आगामी अंकों में आपके परिचय के साथ प्रकाशित करेंगे। तो आइए अब सुनते हैं, मल्हार अंग के कुछ अप्रचलित रागों की रचनाएँ। सबसे पहले हम आपको सुनवाते है, पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में राग छाया मल्हार की एक मोहक बन्दिश-

राग छाया मल्हार : ‘सखी श्याम नहीं आए...’ : पण्डित भीमसेन जोशी


पण्डित जसराज

मल्हार का एक और अप्रचलित प्रकार है, राग चरजू की मल्हार। इस राग के बारे में भी आपसे जानकारी पाने की हमें प्रतीक्षा रहेगी। अब हम आपको राग चरजू की मल्हार में निबद्ध एक मोहक रचना सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित जसराज के स्वरों में सुनवाते है।

राग चरजू की मल्हार : ‘चतुर्भुज झूलत श्याम हिंडोला...’ : पण्डित जसराज



और अब अन्त में हम आपको १९७९ में प्रदर्शित फिल्म ‘मीरा’ का एक गीत सुनवाते हैं। गीतकार गुलजार द्वारा निर्देशित इस फिल्म में भक्त कवयित्री मीराबाई का जीवन-दर्शन रेखांकित किया गया था। मीराबाई की जीवनगाथा में उन्हीं के पदों को विश्वविख्यात सितार-वादक पण्डित रविशंकर ने संगीतबद्ध किया था। मीरा के इन पदों में एक पद है- ‘बादल देख डरी मैं...’, जिसे पण्डित रविशंकर ने राग मीराबाई की मल्हार में स्वरबद्ध किया है और इसे स्वर दिया है, गायिका वाणी जयराम ने।

राग मीराबाई की मल्हार : ‘बादल देख डरी हो श्याम...’ : वाणी जयराम 



फिल्म ‘मीरा’ के इस गीत की रिकार्डिंग सुप्रसिद्ध लेखिका और रेडियो प्लेबैक इण्डिया की शुभचिन्तक श्रीमती इन्दु पुरी गोस्वामी ने भेजी थी। उनके प्रति आभार व्यक्त करते हुए अब हम आज के इस अंक को यहीं विराम देते हैं।

आज की पहेली

आज की ‘संगीत-पहेली’ में हम आपको एक सुविख्यात वादक कलाकार की आवाज़ में गायन का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ९०वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।



१_ संगीत के इस अंश में गायन स्वर किस विख्यात भारतीय वादक कलाकार का है?

२_ संगीत का यह अंश किस राग की ओर संकेत करता है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ८६वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com पर अपना सन्देश भेज सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के ८२वें अंक की पहेली में हमने आपको एक बेहद लोकप्रिय कजरी गीत का अंतरा सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- “कैसे खेले जइबू सावन में कजरिया, बदरिया घेरि आइल ननदी...” और दूसरे का सही उत्तर है- ताल कहरवा। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जबलपुर की क्षिति तिवारी और मीरजापुर (उ.प्र.) के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। इन्हें मिलते हैं २-२ अंक। तीनों प्रतिभागियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में हमने वर्षा ऋतु के प्रचलित गीत, संगीत और रागों की श्रृंखला को विराम दिया है। अगले अंक में तंत्र वाद्य के राष्ट्रीय ही नहीं अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त कलासाधक का स्मरण करेंगे। आगामी २८ अगस्त को इनकी जयन्ती भी मनाई जाएगी। इस अवसर पर हम उन्हें स्मरण करेंगे और भावभीनी संगीतांजलि अर्पित करेंगे। अगले रविवार को प्रातः ९-३० पर आयोजित अपनी इस गोष्ठी में आप हमारे सहभागी बनिए। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।

कृष्णमोहन मिश्र

Sunday, July 15, 2012

वर्षा ऋतु के रंग : मल्हार अंग के रागों का संग- 2


स्वरगोष्ठी – ७९ में आज

मियाँ की मल्हार : ‘बोले रे पपीहरा...’


‘स्वरगोष्ठी’ के अन्तर्गत जारी लघु श्रृंखला ‘वर्षा ऋतु के रंग : मल्हार अंग के रागों का संग’ के दूसरे अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का स्वागत, आज राग ‘मियाँ की मल्हार’ की स्वर-वर्षा के साथ करता हूँ। मल्हार अंग के रागों में राग मेघ मल्हार, मेघों का आह्वान करने, मेघाच्छन्न आकाश का चित्रण करने और वर्षा ऋतु की आहट देने में सक्षम राग माना जाता है। वहीं दूसरी ओर राग मियाँ की मल्हार, वर्षा ऋतु की चरम अवस्था के सौन्दर्य की अनुभूति कराने पूर्ण समर्थ है। यह राग वर्तमान में वर्षा ऋतु के रागों में सर्वाधिक प्रचलित और लोकप्रिय है। सुप्रसिद्ध इसराज और मयूरी वीणा वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र के अनुसार- राग मियाँ की मल्हार की सशक्त स्वरात्मक परमाणु शक्ति, बादलों के परमाणुओं को झकझोरने में समर्थ है।

राग मियाँ की मल्हार तानसेन के प्रिय रागों में से एक है। कुछ विद्वानों का मत है कि तानसेन ने कोमल गान्धार तथा शुद्ध और कोमल निषाद का प्रयोग कर इस राग का सृजन किया था। अकबर के दरबार में तानसेन को सम्मान देने के लिए उन्हें ‘मियाँ तानसेन’ नाम से सम्बोधित किया जाता था। इस राग से उनके जुड़ाव के कारण ही मल्हार के इस प्रकार को ‘मियाँ की मल्हार’ कहा जाने लगा। इस राग के बारे में चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले आइए सुनते हैं, राग मियाँ की मल्हार में एक भावपूर्ण रचना। आपके लिए हम प्रस्तुत कर रहे हैं, विदुषी किशोरी अमोनकर के स्वर में द्रुत एक ताल में निबद्ध, मियाँ की मल्हार की एक रचना-

मियाँ की मल्हार : ‘उमड़ घुमड़ गरज गरज...’ : किशोरी अमोनकर



राग मियाँ की मल्हार के बारे में हमें जानकारी देते हुए जाने-माने इसराज और मयूरी वीणा वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र ने हमें बताया कि यह राग काफी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। आरोह और अवरोह में दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। राग मियाँ की मल्हार के स्वरों का ढाँचा कुछ इस प्रकार बनता है कि कोमल निषाद एक श्रुति ऊपर लगने लगता है। इसी प्रकार कोमल गान्धार, ऋषभ से लगभग ढाई श्रुति ऊपर की अनुभूति कराता है। इस राग में गान्धार स्वर का प्रयोग अत्यन्त सावधानी से करना पड़ता है। राग की कुछ अन्य विशेषताओं पर हम चर्चा जारी रखेंगे, परन्तु आइए, पहले सुनते हैं, सारंगी पर उस्ताद अब्दुल लतीफ़ खाँ का बजाया राग मियाँ की मल्हार का एक अंश।

मियाँ की मल्हार : सारंगी वादन : उस्ताद अब्दुल लतीफ़ खाँ



राग मियाँ की मल्हार को गाते-बजाते समय राग बहार से बचाना पड़ता है। परन्तु कोमल गान्धार का सही प्रयोग किया जाए तो इस दुविधा से मुक्त हुआ जा सकता है। इन दोनों रागों को एक के बाद दूसरे का गायन-वादन कठिन होता है, किन्तु उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने एक बार यह प्रयोग कर श्रोताओं को चमत्कृत कर दिया था। इस राग में गमक की तानें बहुत अच्छी लगती है। आइए यहाँ थोड़ा विराम लेकर राग मियाँ के मल्हार का एक और उदाहरण सुनते हैं। विश्वविख्यात फ़िल्मकार सत्यजीत रे ने १९५९ में भारतीय संगीत की दशा-दिशा को रेखांकित करती बांग्ला फिल्म ‘जलसाघर’ का निर्माण किया था। इस फिल्म में गायन, वादन और नर्तन के कई उत्कृष्ट कलासाधकों की प्रस्तुतियाँ शामिल की गईं थीं। इन्हीं में एक थे, उस्ताद सलामत अली खाँ, जिन्होने फिल्म में राग मियाँ की मल्हार की एक रचना तीनताल में निबद्ध कर प्रस्तुत की थी। लीजिए, आप भी सुनिए-

मियाँ की मल्हार : ‘जलरस बूँदन बरसे...’ : फिल्म – जलसाघर : उस्ताद सलामत अली खाँ



वर्षा ऋतु के प्राकृतिक सौन्दर्य को स्वरों के माध्यम से अभिव्यक्त करने की अनूठी क्षमता राग मियाँ की मल्हार में होती है। इसके साथ ही इस राग का स्वर-संयोजन, पावस के उमड़ते-घुमड़ते मेघ द्वारा विरहिणी नायिका के हृदय में मिलन की आशा जागृत होने की अनुभूति भी कराते हैं। कई फिल्म- संगीतकारों ने इस राग पर आधारित कुछ यादगार गीत तैयार किये हैं। इन्हीं में से आज हम आपके लिए दो गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। ये गीत राग मियाँ की मल्हार के स्वरों पर आधारित तो हैं ही, इन गीतों के बोल में वर्षा ऋतु का सार्थक चित्रण भी हुआ है। पहले प्रस्तुत है- १९९८ में प्रदर्शित फिल्म ‘साज’ का गीत, जिसे कविता कृष्णमूर्ति ने तीनताल में गाया है। इसके बाद सुनिए- १९७१ की फिल्म ‘गुड्डी’ का बेहद लोकप्रिय गीत, जिसे बसन्त देसाई ने स्वरबद्ध किया है और वाणी जयराम ने कहरवा ताल में गाया है। आप ये दोनों गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक से यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।

मियाँ की मल्हार : ‘बादल घुमड़ घिर आए...’ : फिल्म – साज : कविता कृष्णमूर्ति



मियाँ की मल्हार : ‘बोले रे पपीहरा...’ : फिल्म – गुड्डी : वाणी जयराम



आज की पहेली

आज की संगीत-पहेली में हम आपको सुनवा रहे हैं, कण्ठ-संगीत का एक अंश। इसे सुन कर आपको हमारे दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ८०वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले पाठक/श्रोता हमारी तीसरी पहेली श्रृंखला के ‘विजेता’ होंगे।



१ - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

२ – इस गीत की गायिका कौन हैं?


आप अपने उत्तर हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर भेजें। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ८१वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा swargoshthi@gmail.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के ७७वें अंक में हमने आपको फिल्म चश्मेबद्दूर का गीत- ‘कहाँ से आए बदरा...’ का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मेघ मल्हार और दूसरे का उत्तर है- गायिका हेमन्ती शुक्ला। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर मीरजापुर (उ.प्र.) के डॉ. पी.के. त्रिपाठी, जबलपुर की क्षिति तिवारी और लखनऊ के प्रकाश गोविन्द ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, इस वर्ष मानसून का आगमन कुछ विलम्ब से हुआ है, किन्तु देश के अधिकतर भागों में अच्छी वर्षा हो रही है। इधर आपके प्रिय स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में भी मल्हार अंग के रागों की स्वर-वर्षा जारी है। अब तक आपने मेघ मल्हार और मियाँ की मल्हार का आनन्द प्राप्त किया है। अगले अंक से हम मल्हार का एक और प्रकार लेकर आपकी महफिल में उपस्थित होंगे। रविवार को प्रातः ९-३० बजे आप और हम ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में पुनः मिलेंगे। तब तक के लिए हमें विराम लेने की अनुमति दीजिए।

कृष्णमोहन मिश्र

Sunday, February 27, 2011

हमको मन की शक्ति देना मन विजय करें....विश्व कप के लिए लड़ रहे सभी प्रतिभागियों के नाम आवाज़ का पैगाम

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 601/2010/301

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आप सभी का बहुत बहुत स्वागत है। दोस्तों, पिछले बृहस्पतिवार १७ फ़रवरी को २०११ विश्वकप क्रिकेट का ढाका में भव्य शुभारंभ हुआ और इन दिनों 'क्रिकेट फ़ीवर' से केवल हमारा देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया ग्रस्त है। दक्षिण एशिया और तमाम कॊमन-वेल्थ देशों में क्रिकेट सब से लोकप्रिय खेल है और हमारे देश में तो साहब आलम कुछ ऐसा है कि फ़िल्मी नायक नायिकाओं से भी ज़्यादा लोकप्रिय हैं क्रिकेट के खिलाड़ी। ऐसे मे ज़ाहिर सी बात है कि क्रिकेट विश्वकप को लेकर किस तरह का रोमांच हावी रहता होगा हम सब पर। और जब यह विश्वकप हमारे देश में ही आयोजित हो रही हो, ऐसे में तो बात कुछ और ही ख़ास हो जाती है। इण्डियन पब्लिक की इसी दीवानगी के मद्दे नज़र हाल ही में 'पटियाला हाउस' फ़िल्म रिलीज़ हुई है जिसकी कहानी भी एक क्रिकेटर के इर्द गिर्द है। ऐसे में इस क्रिकेट-बुख़ार की गरमाहट 'ओल्ड इज़ गोल्ड' को ना लगे, ऐसा कैसे हो सकता है! विश्वकप क्रिकेट २०११ में भाग लेने वाले सभी खिलाड़ियों को शुभकामना हेतु आज से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर हम शुरु कर रहे हैं हमारी ख़ास लघु शृंखला 'खेल खेल में'। इस शृंखला के केन्द्र में रहेगा क्रिकेट, और विश्वकप से जुड़ी तमाम जानकारियाँ हम आपको देंगे अगले दस अंकों में, साथ ही साथ खिलाड़ियों और खेल-प्रेमियों के हौसले को बढ़ाने के लिए हम पेश करेंगे दस लाजावाब गानें। २०११ आइ.सी.सी क्रिकेट वर्ल्ड कप दसवाँ विश्वकप है और इस विश्वकप की मेज़बानी कर रहे है भारत, श्रीलंका और बांगलादेश। बांगलादेश में आयोजित होने वाला यह पहला विश्वकप है। मेज़बानी के लिए पाकिस्तान का नाम भी पहले पहले शामिल था, लेकिन २००९ में श्रीलंका क्रिकेट टीम पर लाहौर में हुए हमले के मद्देनज़र आइ.सी.सी ने पाकिस्तान को मेज़बानी से दूर ही रखा। यहाँ तक कि शुरु शुरु में ऒर्गनाइज़िंग कमिटी का मुख्यालय लाहौर में हुआ करता था, लेकिन बाद में उसे भी मुंबई स्थानांतरित कर लिया गया। पाकिस्तान में १४ मैच खेले जाने थे जिनमें एक सेमी-फ़ाइनल भी शामिल था। इन १४ में से ८ भारत, ४ श्रीलंका और २ बांगलादेश के पास चले गये।

दोस्तों, जब भी दो देशों के बीच में किसी खेल या प्रतियोगिता की बात आती है, तो राष्ट्रीयता की भावना उत्पन्न होती है। ज़रा सोचिए कि भारत के साथ किसी अन्य देश का मुकाबला चल रहा है, तो कैसा महसूस होता है आपको? देश-प्रेम की भावना जगती है न? बिल्कुल जगती है। और हम अपने देश को सपोर्ट भी करते हैं दिलो जान से और क्यों न करें, बल्कि करना ही चाहिए। लेकिन हमारी जो यह शृंखला है न, इसमें हम हार-जीत और केवल अपने देश को सपोर्ट करने की भावनाओं से उपर उठकर एक सच्चे खिलाड़ी की भावना, यानी कि 'ट्रू स्पोर्ट्स्मैनस्पिरिट' दर्शाते हुए सभी प्रतिभागी देशों के सभी खिलाड़ियों को शुभकामनाएँ देंगे और साथ ही स्पोर्ट्स्मैनशिप की विशेषताओं के बारे में चर्चा भी करेंगे, जीवन में खेलकूद के महत्व पर भी रोशनी डाली जाएगी। आज जिस गीत से इस शृंखला का आग़ाज़ हो रहा है, उसमें कुछ इसी तरह का दर्शन छुपा हुआ है। इस भजन में ईश्वर से यही प्रार्थना की जा रही है कि हम पहले अपने पर जीत हासिल करें, फिर औरों पर जीत के बारे में सोचें। सच्ची जीत होती है मानव मन को जीतना। किसी को चोट पहुँचाकर अर्जित जीत में वह आनंद नहीं जो आनंद किसी के दिल को जीत कर मिलती है। "हमको मन की शक्ति देना मन विजय करें, दूसरों की जय से पहले ख़ुद को जय करें", वाणी जयराम और साथियों की आवाज़ों में यह है गुलज़ार साहब की लिखी प्रार्थना जिसका संगीत तैयार किया है वसंत देसाई ने १९७१ की फ़िल्म 'गुड्डी' के लिए। इस फ़िल्म का "बोले रे पपीहरा" आपने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की २२७-वीं कड़ी में सुना था। दोस्तों, "हमको मन की शक्ति देना" एक ऐसी प्रार्थना है जिसे आज भी स्कूलों में बच्चों से गवाया जाता है, और शायद यह सब से महत्वपूर्ण बच्चों द्वारा प्रस्तुत फ़िल्मी प्रार्थना है। वसंत देसाई साहब ने ही इससे पहले 'दो आँखें बारह हाथ' के लिए "ऐ मालिक तेरे बंदे हम" की रचना की थी और 'गुड्डी' में उन्होने अपने ही रेकॊर्ड को तोड़ा। देखिए दोस्तों, देसाई साहब ने अपने पर ही विजय प्राप्त की न? असली जीत तो अपने रेकॊर्ड को आप तोड़ने में ही है। हर मनुष्य को चाहिए कि वो अपने ही स्तर को उपर, और उपर बढ़ाता चले। ख़ुद से ही प्रतियोगिता करें, ना कि औरों से। और आज के इस अंक का भाव भी कुछ कुछ इसी तरह का है। और शायद 'पटियाला हाउस' फ़िल्म से भी कुछ कुछ इसी तरह का संदेश हमें ग्रहण करना चाहिए। २०११ क्रिकेट विश्वकप के सभी प्रतिभागी खिलाड़ियों के लिए यही है हमारी प्रार्थना...

हम को मन की शक्ति देना मन विजय करें,
दूसरों की जय से पहले ख़ुद को जय करें।

भेदभाव अपने दिल से साफ़ कर सके,
दोस्तों से भूल हो तो माफ़ कर सके,
झूठ से बचे रहें सच का दम भरें,
दूसरों की जय से पहले ख़ुद को जय करें।

मुश्किलें पड़े तो हम पे इतना कर्म कर,
साथ दें तो धर्म का चलें तो धर्म कर,
ख़ुद पे हौसला रहे बदी से ना डरें,
दूसरों की जय से पहले ख़ुद को जय करें।



क्या आप जानते हैं...
कि वसंत देसाई ने १९३२ की फ़िल्म 'अयोध्या का राजा' में पहली बार गीत गाया था।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 02/शृंखला 11
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -इस युगल गीत में एक आवाज़ है आशा जी की.

सवाल १ - पुरुष गायक बताएं - २ अंक
सवाल २ - किस अभिनेता- अभिनेत्री पर है ये गीत - ३ अंक
सवाल ३ - गीतकार बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
एक बार फिर अंजाना जी और अमित जी ने शानदार शुरूआत की है, अक्सर अंजाना जी कहीं कोई छोटी सी चूक कर जाते हैं और बाज़ी हार जाते हैं, इस बार संभलके खेलिएगा, शुभकामनाओं के लिए धन्येवाद, हाँ अमित जी आप के नाम ४ श्रृंखलाएं हैं...विजय जी और अनीता जी भी हैं मैदान में इस बार...मज़ा आएगा...वैसे आप सभी धुरंधरों के लिए अब संगीतमय कुश्ती का एक और खेल मौजूद है, अब से हमारी सुर संगम शृंखला में भी आप पूछे गए सवाल का सही जवाब देकर विजयी बन सकते हैं, क्लिक कीजिए यहाँ

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
विशेष सहयोग: सुमित चक्रवर्ती


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ