सोमवार, 30 नवंबर 2009

जब बादल लहराया...झूम झूम के गाया...अभिनेत्री श्यामा के लिए गीता दत्त ने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 276

जिस तरह से गीता दत्त और हेलेन की जोड़ी को अमरत्व प्रदान करने में बस एक सुपरहिट गीत "मेरा नाम चिन चिन चू" ही काफ़ी था, जिसकी धुन बनाई थी रीदम किंग् ओ. पी. नय्यर साहब ने, ठीक वैसे ही गीता जी के साथ अभिनेत्री श्यामा का नाम भी 'आर पार' के गीतों और एक और सदाबहार गीत "ऐ दिल मुझे बता दे" के साथ जुड़ा जा सकता है। जी हाँ, आज 'गीतांजली' में ज़िक्र गीता दत्त और श्यामा का। श्यामा ने अपना करीयर शुरु किया श्यामा ज़ुत्शी के नाम से जब कि उनका असली नाम था बेबी ख़ुर्शीद। 'आर पार' में अपार कामयाबी हासिल करने से पहले श्यामा को एक लम्बा संघर्ष करना पड़ा था। उन्होने अपना सफ़र १९४८ में फ़िल्म 'जल्सा' से शुरु किया था। वो बहुत सारी कामयाब फ़िल्मों में सह-अभिनेत्री के किरदारों में नज़र आईं जैसे कि 'शायर' में सुरैय्या के साथ, 'शबनम' में कामिनी कौशल के साथ, 'नाच' में फिर एक बार सुरैय्या के साथ, 'जान पहचान' में नरगिस के साथ और 'तराना' में मधुबाला के साथ। अनुमान लगाया जाता है कि गीता रॉय की आवाज़ में श्यामा पर फ़िल्माया हुआ पहला गीत १९४९ की फ़िल्म 'दिल्लगी' का होना चाहिए, जिसके बोल थे "तू मेरा चाँद मैं तेरी चांदनी"। अब आप यह कह उठेंगे कि यह तो सुरैय्या और श्याम ने गाया था! जी हाँ, लेकिन फ़िल्म में इस गीत का एक मिनट का एक वर्ज़न भी था जिसे गीता रॉय ने गाया था और जो श्यामा पर फ़िल्माया गया था। लेकिन बदक़िस्मती से यह वर्ज़न ग्रामोफ़ोन रिकार्ड पर जारी नहीं किया गया। इस तरह से गीता रॉय का गाया श्यामा पर फ़िल्माया हुआ पहले रिलीज़्ड गीत थे फ़िल्म 'आसमान' और 'श्रीमतीजी' में जो बनी थीं १९५२ में ओ. पी. नय्यर के संगीत निर्देशन में।

और इसके बाद बहुत जल्द ही गीता दत्त ने श्यामा पर एक ऐसा गीत गाया जो आज एक कालजयी गीत बन कर रह गया है। याद है ना आपको "ना ये चाँद होगा ना तारे रहेंगे", फ़िल्म 'शर्त' में? इस गीत को तो हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर भी सुनवा चुके हैं। और इसी साल, यानी कि १९५४ में आई फ़िल्म 'आर पार' जिसने पुराने सारे रिकार्ड्स तोड़ दिए। मुन्नी कबीर ने अपनी किताब "Guru Dutt : A Life in Cinema" में लिखा है - "Geeta Bali was first considered for the role of Nikki, but when she pulled out of the film, Geeta Dutt suggested that Shyama take the part." युं तो 'आर पार' के सारे गानें सुपरहिट हैं, लेकिन श्यामा पर जो तीन गानें फ़िल्माए गये वो हैं "जा जा जा जा बेवफ़ा", "सुन सुन सुन सुन ज़ालिमा" और "ये लो मैं हारी पिया"। आगे चलकर नय्यर साहब ने और भी कई गानें श्यामा के लिए बनाए जिन्हे गाया गीता दत्त ने ही। १९५५ में 'मुसाफ़िरख़ाना', १९५६ में 'मक्खीचूस', 'छूमंतर' और 'भाई भाई' तथा १९५७ में 'माई बाप' जैसी फ़िल्मों में गीता दत्त ने श्यामा का पार्श्वगायन किया। मदन मोहन के संगीत निर्देशन में गीता जी ने जो अपना सब से लोकप्रिय गीत गाया था फ़िल्म 'भाई भाई' में, वह श्यामा पर ही फ़िल्माया गया था। हमने उपर जितने भी फ़िल्मों का ज़िक्र किया, उनके अलावा गीता जी ने और जिन जिन फ़िल्मों में श्यामा का प्लेबैक किया उनके नाम हैं - निशाना ('५०), सावधान ('५४), जॊनी वाकर ('५७), हिल स्टेशन ('५७), बंदी ('५७), पंचायत ('५८), चंदन ('५८), दुनिया झुकती है ('६०), अपना घर ('६०) तथा ज़बक ('६१)। लेकिन आज हम गीता-श्यामा की जोड़ी के नाम जिस गीत को कर रहे हैं वह है १९५६ की फ़िल्म 'छू मंतर' का, जिसे नय्यर साहब की धुन पर जान निसार अख़्तर ने लिखा था। सुनते हैं "जब बादल लहराया, जिया झूम झूम के गाया"। तो आप भी सुनिए और झूम जाइए।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. ये गीत जिस अभिनेत्री पर है उन्हें उनके फिल्मों में योगदान के लिए वर्ष २००९ में पदम् श्री से सम्मानित किया गया था.
२. इस मस्ती भरे गीत को लिखा जान निसार अख्तर ने.
३. मुखड़े में इस शब्द की पुनरावर्ती है -"अभी".इस पहेली को बूझने के आपको मिलेंगें २ की बजाय ३ अंक. यानी कि एक अंक का बोनस...पराग जी इस प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले सकेंगें.

पिछली पहेली का परिणाम -
भाई आज तो हमारे लिए बहुत ख़ुशी का दिन है, पाबला जी ने दूसरा सही जवाब देकर अपना खाता ४ अंकों तक पहुंचा ही लिया....बधाई जनाब, इंदु जी आप कैसे चूक गयीं. अवध जी आशा है आपके समाधान हो गया होगा.

खोज - पराग सांकला
आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

जाणा जोगी दे नाल मैं... कैलाश खेर के गैर फ़िल्मी संगीत का सफरनामा कैलाश "यात्रा" में

ताजा सुर ताल TST (37)

दोस्तो, ताजा सुर ताल यानी TST पर आपके लिए है एक ख़ास मौका और एक नयी चुनौती भी. TST के हर एपिसोड में आपके लिए होंगें तीन नए गीत. और हर गीत के बाद हम आपको देंगें एक ट्रिविया यानी हर एपिसोड में होंगें ३ ट्रिविया, हर ट्रिविया के सही जवाब देने वाले हर पहले श्रोता की मिलेंगें २ अंक. ये प्रतियोगिता दिसम्बर माह के दूसरे सप्ताह तक चलेगी, यानी 5 अक्टूबर से १४ दिसम्बर तक, यानी TST के ४० वें एपिसोड तक. जिसके समापन पर जिस श्रोता के होंगें सबसे अधिक अंक, वो चुनेगा आवाज़ की वार्षिक गीतमाला के 60 गीतों में से पहली 10 पायदानों पर बजने वाले गीत. इसके अलावा आवाज़ पर उस विजेता का एक ख़ास इंटरव्यू भी होगा जिसमें उनके संगीत और उनकी पसंद आदि पर विस्तार से चर्चा होगी. तो दोस्तों कमर कस लीजिये खेलने के लिए ये नया खेल- "कौन बनेगा TST ट्रिविया का सिकंदर"

TST ट्रिविया प्रतियोगिता में अब तक-

पिछले एपिसोड में, सीमा जी back with a bang....बहुत बढ़िया...आप विजेता हैं, बिना शक... बधाई


सुजॉय - गुड मॊर्निंग् सजीव! और बताइए वीकेंड कैसा रहा?

सजीव - वेरी गुड मॊर्निंग् सुजॉय, और अपने सभी पाठकों को भी गुड मॊर्निंग्! वीकेंड अच्छा ही रहा और आजकल सर्दियाँ भी पड़ने लगी है दिल्ली में, तो मौसम बड़ा गुलबी गुलाबी सा हो गया है।

सुजॉय - आज एक नए सप्ताह की शुरुआत हो रही है, तो बताइए कि क्या सोचा है आज के 'ताज़ा सुर ताल' के लिए?

सजीव - आज हम फिर से रुख़ करेंगे ग़ैर फ़िल्म संगीत की तरफ़। शायद तुम्हे मालूम होगा कि कैलाश खेर की नई ऐल्बम आई है 'यात्रा'। तो क्यों ना आज इसी ऐल्बम की चर्चा की जाए और इस ऐल्बम से कुछ गानें सुना जाए!

सुजॉय - ज़रूर! वैसे मैने भी सुना तो है इसके बारे में, लेकिन मैने यह भी सुना है कि दरअसल यह ऐल्बम अंतर्राष्ट्रीय श्रोताओं के लिए बनाया गया है जिसमें कुछ नए गीतों के साथ साथ कैलाश खेर के पुराने हिट गीतों को भी शामिल किया गया है जिनका शायद पहले अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ज़्यादा प्रचार प्रसार नहीं हुआ था।

सजीव - कैलाश खेर उन गायकों में से हैं जो फ़िल्म और ग़ैर फ़िल्म संगीत, दोनों में ही समान रूप से सक्रीय रहे हैं। और उनके गीतों की खासियत रही है कि जल्दी ही लोगों की ज़ुबाँ पर चढ़ जाया करते हैं। तुमने सच कहा कि यह अंतर्राष्ट्रीय ऒडियन्स के लिए बनाया गया ऐल्बम है। बल्कि इस तरह का उनका यह पहला ऐल्बम है। इसका पूरा नाम है यात्रा - नोमैडिक सोल्स, और इसका विमोचन हुआ है अभी हाल ही में १५ सितंबर के दिन।

सुजॉय - कैलाश खेर और उनके इस ऐल्बम की चर्चा हम जारी रखेंगे, लेकिन उससे पहले यहाँ पर हम एक गीत सुनेंगे।

गीत: कैसे मैं कहूँ...kaise main kahun (yatra)


सजीव - इस ऐल्बम में जिन पुराने गीतों को शामिल किया गया है, उन्हे इंटरनैशनल लुक्स देने के लिए रीमास्टर किया गया है। लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं कि कुछ निरर्थक बीट्स और ट्रैक्स डाल कर उन्हे दूषित किया गया है। बल्कि अगर आप ने ऒरिजिनल वर्ज़न अगर नहीं सुन रखा है तो आप यह समझ भी नहीं पाएँगे कि आख़िर ऐसा क्या किया गया है इन गीतों के साथ।

सुजॉय - अभी जो हमने गीत सुना, वैसे तो गाने का रीदम, संगीत सयोजन, सब कुछ थिरकता हुआ सा सुनाई देत है, लेकिन दरअसल इस गीत में प्यार हो जाने पर जो बेक़रारी होती है, जो बेताबी होती है, उसी का ज़िक्र है।

सजीव - हाँ, और कैलाश खेर की आवाज़ ही कुछ ऐसी है कि गाने में कुछ अलग ही निखार आ जाता है। अब दूसरे गीत को ले लो, "जोबण छलके", जिसका आधार है राजस्थानी लोक संगीत। कैलाश खेर की सूफ़ीयाना अंदाज़ और साथ में राजस्थानी मिट्टी की ख़ुशबू, क्या बात है! आओ इस गीत को सुना जाए!

गीत: जोबण छलके...joban chalke (yatra)


सुजॉय - एक और गीत जिसका इंटरनैशनल वर्ज़न इस ऐल्बम में शामिल किया गया है, वह है "झूमो रे"। यह एक भक्ति रचना है, ध्यान से सुनकर इसके बोलों के महत्व को समझा जा सकता है। "तेरी काया नगर में राम राम, तू जंगल जंगल क्या ढ़ूंढे, तेरे रोम रोम में राम राम, तू पत्थर पे सर क्यों मारे"। भगवान इंसान के मन में बसता है, न कि मंदिरों में या पत्थर की मूरतों में।

सजीव - इतना ही नहीं, यह भी कहा गया है कि "मंदिर तोड़ो, मस्जिद तोड़ो, इसमें नहीं कोई ख़ता है, लेकिन दिल मत तोड़ो किसी का बंदे ये घर ख़ुदा का है"। भाव वही है।

सुजॉय - बहुत अच्छी बातें कही गई है, मुझे तो फ़िल्म 'बॊबी' का वह गीत याद आ गया नरेन्द्र चंचल का गाया हुआ - "बेशक़ मंदिर मस्जिद तोड़ो, पर प्यार भरा दिल किसी का ना तोड़ो"।

सजीव - बाबा बुल्ले शाह को याद करते हुए चलो यह गीत सुनते हैं।

गीत: झूमो रे...jhoomo re (yatra)


सजीव - अरे सुजॉय, कहाँ खो गए?

सुजॉय - ओ हो, सजीव, मैं तो बिल्कुल किसी और ही जगत में चला गया था। ईश्वर की इबादत कुछ इस तरह से हो रहा था कि मैं तो सुनते सुनते जैसे बिल्कुल ट्रान्स में चला गया था।

सजीव - बिल्कुल ठीक कहा! इसे ही कहते हैं सूफ़ीयाना अंदाज़। इसी तरह का संगीत ही हमें भगवान से जोड़ती है। चलो, अब आगे बढ़ते हैं और अब सुनते हैं कैलाश खेर का बहुत ही जाना पहचाना, और उतना ही सुपरहिट गीत "तेरी दीवानी"। इस गीत को तो इस ऐल्बम में शामिल करना ही था।

सुजॉय - हाँ, और अब इस गीत के बारे में कुछ कहने की ज़रूरत नहीं। मुझे बस इतना कहना है कि हाल में टीवी पर जितने भी टैलेंट हंट शोज़ हुए हैं, हर सीज़न में किसी ना किसी प्रतिभागी ने एक बार इस गीत को ज़रूर गाया है।

सजीव - हाँ और एक बात ये एक वाध्य रहित यानी कि हार्मोनिकल संस्करण है गीत का, विदेशों में ये प्रक्रिया बहुत मशहूर है, यहाँ गायक को ट्रैक की मर्यादाओं से निकल कर आवाज़ को खुल कर गाने का मौका मिल जाता है, कैलाश की आवाज़ में मात्र इस संसकरण के लिए ही इस अल्बम को ख़रीदा जा सकता है.

गीत: तेरी दीवानी...teri deewani (yatra)


सजीव - और अब आज का पाँचवाँ और अंतिम गीत, "जाणा जोगी दे नाल नी"।

सुजॉय - इस गीत की शुरुआत होती है एक बहुत ही उत्कृष्ट मीरा श्लोक से। "कागा सब तन खाइयो, चुन चुन खाइयो मांस, दो नैना मत खाइयो मोहे पिया मिलन की आस"। मीराबाई कहतीं हैं कि हे कागा (कौवा), तू मेरे मरने के बाद मेरे शरीर का हर अंग खा लेना, लेकिन मेरी दो आँखों को छोड़ देना क्यों कि मुझे मरने के बाद भी अपने कृष्ण से मिलने की आस बाक़ी रहेगी"। सजीव, इससे बेहतर प्रेम का उदाहरण और भला क्या हो सकता है, क्यों?

सजीव - सही बात है, मीराबाई इस धरती की सब से महान कवियत्री रहीं हैं और उनके भजनों के तो क्या कहने। इस गीत में कैलाश ने इस श्लोक को शामिल कर इस गीत का मान ही बढ़ दिया है। 'यात्रा' ऐल्बम, जैसा कि नाम है, इसमे जोगियों की बातें हैं, जोगी जो आत्मा से बंजारे हैं, दुनिया को अपने अमर उपदेश देते हुए यहाँ से वहाँ निरंतर भटकते रहते हैं। ऐसे ही नोमैडिक सोल्स को समर्पित है यह ऐल्बम। तो चलो, आज का आख़िरी गीत सुन लिया जाए। उम्मीद है सभी को ये गानें पसंद आये होंगे।

सुजॉय - एक बात और, इन गीतों को बस एक ही बार सुन कर छोड़ मत दीजिएगा, ये गानें ऐसे हैं जिन्हे बार बार सुन कर ही उनका मज़ा लिया जा सकता है।

गीत: जाणा जोगी दे नाल...jaana jogi de naal(kailash kher)


और अब समय है ट्रिविया का

TST ट्रिविया # 34. बालावस्था में कैलाश खेर एक गुरु की तलाश में अपने घर से भाग कर दिल्ली आ गए थे। बताइए कि उनका घर कहाँ पे था।

TST ट्रिविया # 35. कैलासा बैंड में कैलाश खेर के साथी रहे हैं दो भाई जो कैलाश के गीतों में पाश्चात्य संगीत का फ़्युज़न करते हैं। इन दो भाइयों के नाम बताइए।

TST ट्रिविया # 36. अगर आमिर ख़ान को कैलाश खेर के साथ आप "चाँद सिफ़ारिश" गीत से जोड़ सकते हैं तो किस गीत से आप उन्हे शाहरुख़ ख़ान से जोड़ेंगे?


"यात्रा" अल्बम को आवाज़ रेटिंग ***
चूँकि सभी गीत (एक आध को छोड़कर) पहले ही काफी सुने गुने जा चुके हैं, तो एल्बम कुछ नया लेकर नहीं आती, जिस कंपनी ने इसे प्रकाशित किया है उनके लिए कैषा के गाये गीत ही रखे गए हैं, जबकि उनके सबसे सफल एल्बम "कैलासा" जिसमें "सैयां" और "जाना जोगी दे नाल" जैसे गीत थे उनकी कमी खल रही है.

आवाज़ की टीम ने इस अल्बम को दी है अपनी रेटिंग. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसे लगे? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत अल्बम को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

शुभकामनाएँ....


अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

रविवार, 29 नवंबर 2009

सर्दी की धूप में फुरसत का दिन और कविताओं की चुस्की

एक वैश्विक कवि सम्मेलन

Rashmi Prabha
रश्मि प्रभा
Khushboo
खुश्बू
पूरे उत्तर भारत में सर्दी अपनी तमाम विविधताओं के साथ उतर चुकी है। लगातार धूप की तपिश और बरसाती मौसम की उमस से व्याकुल लोगों के लिए सुख और संतोष के दिन। और वैसे में भी रविवार का दिन। छुट्टी का दिन। फुरसत का दिन। और चूँकि माह का आखिरी रविवार है तो उम्मीद की जा सकती है कि वेतन भी मिल गया होगा। हालाँकि महँगाई अधिक है, फिर भी हम यही कहेंगे कि इस खास रविवार के लिए चाय के प्रबंध कर लेने भर का पैसा ज़रूर बचाये रखें, क्योंकि रश्मि प्रभा आज लेकर आती हैं, कवि सम्म्मेलन का विशेष कार्यक्रम। हिन्द-युग्म तो एक वैश्विक मंच है, वैसे केवल उत्तर भारतीय श्रोताओं की चिंता करना बेमानी होगी। हम मानते हैं कि उत्तर भारतीयों का हर मौसम की क्रूरता और अपनत्व से जितना सामीप्य है, उतना शायद दुनिया के दूसरे भूभागीयों का नहीं। वैसे हिन्द-युग्म के श्रोता दुनिया भर के 150 से भी अधिक देशों फैले हैं, तो यदि हम यह भी उम्मीद करें कि कहीं-कहीं भीषण गर्मी होगी, कहीं तूफान होगा तो भी यह तो हमारा विश्वास है कि रश्मि प्रभा के संचालन से उन्हें बहुत राहत मिलेगी।

अब बातों के संसार से बाहर निकल, चलते हैं वागर्थों की दुनिया में-



प्रतिभागी कवि- माधुरीलता पाण्डेय, शरद तैलंग, किशोर कुमार खोरेन्द्र, सुषमा श्रीवास्तव, रिज़वाना कश्यप 'शमा'।


संचालन- रश्मि प्रभा

तकनीक- खुश्बू


यदि आप इसे सुविधानुसार सुनना चाहते हैं तो कृपया नीचे के लिंकों से डाउनलोड करें-
WMAMP3




आप भी इस कवि सम्मेलन का हिस्सा बनें

दिसम्बर अंक से हम कवि सम्मेलन का नया रूप लेकर हाज़िर होंगे। हिन्द-युग्म फरवरी 2007 से एक विशेष विषय पर कविता-लेखन 'काव्य-पल्लवन' का आयोजन करता है। हम फरवरी 2007 में हो चुके काव्य-पल्लवन का विषय दिसम्बर 2009 के पॉडकास्ट कवि सम्मेलन के लिए चुन रहे हैं। विषय है- 'आधुनिक विकास और गाँव'। यह काव्य-पल्लवन यहाँ पढ़ें। आप भी इसी विषय पर अपनी कविता लिखें और रिकॉर्ड करें। रश्मि प्रभा के साथ यदि आप भी अतिथि संचालक होना चाहते हैं तो हमें लिखें।

1॰ अपनी साफ आवाज़ में अपनी कविता/कविताएँ रिकॉर्ड करके भेजें।
2॰ जिस कविता की रिकॉर्डिंग आप भेज रहे हैं, उसे लिखित रूप में भी भेजें।
3॰ अधिकतम 10 वाक्यों का अपना परिचय भेजें, जिसमें पेशा, स्थान, अभिरूचियाँ ज़रूर अंकित करें।
4॰ अपना फोन नं॰ भी भेजें ताकि आवश्यकता पड़ने पर हम तुरंत संपर्क कर सकें।
5॰ कवितायें भेजते समय कृपया ध्यान रखें कि वे 128 kbps स्टीरेओ mp3 फॉर्मेट में हों और पृष्ठभूमि में कोई संगीत न हो।
6॰ उपर्युक्त सामग्री भेजने के लिए ईमेल पता- podcast.hindyugm@gmail.com
7. दिसम्बर 2009 अंक के लिए कविता की रिकॉर्डिंग भेजने की आखिरी तिथि- 20 दिसम्बर 2009
8. दिसम्बर 2009 अंक का पॉडकास्ट सम्मेलन रविवार, 27 दिसम्बर 2009 को प्रसारित होगा।


रिकॉर्डिंग करना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है। हमारे ऑनलाइन ट्यूटोरियल की मदद से आप सहज ही रिकॉर्डिंग कर सकेंगे। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।

# Podcast Kavi Sammelan. Part 17. Month: November 2009.
कॉपीराइट सूचना: हिंद-युग्म और उसके सभी सह-संस्थानों पर प्रकाशित और प्रसारित रचनाओं, सामग्रियों पर रचनाकार और हिन्द-युग्म का सर्वाधिकार सुरक्षित है।

शनिवार, 28 नवंबर 2009

सुनो कहानी: अनुराग शर्मा लिखित हत्या की राजनीति

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने शरद तैलंग की आवाज़ में रबीन्द्र नाथ ठाकुर की हृदयस्पर्शी कहानी "तोते की कहानी" का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं अनुराग शर्मा की एक कहानी "हत्या की राजनीति", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

कहानी का कुल प्रसारण समय 6 मिनट 21 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

इस कथा का टेक्स्ट बर्ग वार्ता ब्लॉग पर उपलब्ध है।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



पतझड़ में पत्ते गिरैं, मन आकुल हो जाय। गिरा हुआ पत्ता कभी, फ़िर वापस ना आय।।
~ अनुराग शर्मा

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी

गरीबों को उसके खेतों में बेगार तो करनी ही पड़ती थी, उनकी बहू बेटियाँ भी सुरक्षित नहीं थी।
(अनुराग शर्मा की "ह्त्या की राजनीति" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
VBR MP3

#Fourty Eighth Story, Hatya Ki Rajniti: Anurag Sharma/Hindi Audio Book/2009/42. Voice: Anurag Sharma

शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

धड़कने लगा दिल नज़र झुक गयी....नूतन की अदाकारी और गीता दत्त से स्वर, दुर्लभ संयोग

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 275

'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर इन दिनों आप सुन रहे हैं पार्श्वगायिका गीता दत्त के गाए हुए कुछ सुरीले सुमधुर गीत जो दस अलग अलग अभिनेत्रियों पर फ़िल्माए गए हैं। इन गीतों को चुनकर और इनके बारे में तमाम जानकारियाँ इकट्ठा कर हमें भेजा है पराग सांकला जी ने और उन्ही की कोशिश का यह नतीजा है कि गुज़रे ज़माने के ये अनमोल नग़में आप तक इस रूप में पहुँच रहे हैं। नरगिस, मीना कुमारी, कल्पना कार्तिक और मधुबाला के बाद आज बारी है अदाकारा नूतन की। नूतन भी हिंदी फ़िल्म जगत की एक नामचीन अदाकारा रहीं हैं जिनके अभिनय का लोहा हर किसी ने माना है। हल्के फुल्के फ़िल्में हों या फिर संजीदे और भावुक फ़िल्में, हर फ़िल्म में वो अपनी अमिट छाप छोड़ जाती थीं। उनके अभिनय से सजी तमाम फ़िल्में आज क्लासिक फ़िल्मों में जगह बना चुकी है। वो एकमात्र ऐसी अभिनेत्री हैं जिन्होने ५ बार फ़िल्मफ़ेयर के तहत सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीता। नूतन मधुबाला, नरगिस या मीना कुमरी की तरह बहुत ज़्यादा ख़ूबसूरत या ग्लैमरस नहीं थीं, लेकिन उनकी सादगी के ही लोग दीवाने थे। उनकी ख़ूबसूरती उनके अंदर थी जो उनके स्वभाव और अभिनय में फूट पड़ती। नूतन अभिनेत्री शोभना समर्थ की ज्येष्ठ पुत्री थीं। उन्हे अपना पहला बड़ा ब्रेक मिला था १९५५ की फ़िल्म 'सीमा' में, जिसके लिए उन्हे फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार भी मिला था। उसके तुरंत बाद देव आनंद के साथ 'पेयिंग् गेस्ट' जैसी हास्य फ़िल्म करके सब को हैरान कर दिया उन्होने। १९५९ में राज कपूर की फ़िल्म 'अनाड़ी' और बिमल रॉय की फ़िल्म 'सुजाता' में उन्हे ख़ूब सराहना मिली। उनके अभिनय से सजी कुछ उल्लेखनीय फ़िल्मों के नाम हैं - सीमा, सुजाता, बंदिनी, दिल ही तो है, पेयिंग् गेस्ट, अनाड़ी, नाम, मेरी जंग, आदि। युं तो नूतन अच्छा गाती भी थीं, फ़िल्म 'छबिली' में उन्होने गीत भी गाए थे। लेकिन क्योंकि सिलसिला जारी है गीता दत्त के गाए गीत सुनने का, तो आज नूतन पर फ़िल्माया हुआ जो गीत हम चुनकर लाए हैं वह है फ़िल्म 'हीर' का।

१९५४ में बनीं फ़िल्म 'हीर' के मुख्य कलाकार थे प्रदीप कुमार और नूतन। यह फ़िल्मिस्तान की फ़िल्म थी जिसका निर्देशन किया था हमीद बट ने। फ़िल्म में संगीत था अनिल बिस्वास का, जिनके संगीत में इस साल किशोर कुमार व माला सिंहा अभिनीत फ़िल्म 'पैसा ही पैसा' भी प्रदर्शित हुई थी। 'हीर' उन अल्पसंख्यक फ़िल्मों में से एक है जिनमें नूतन नायिका हों और गीता जी ने गीत गाए हों। कहा जाता है कि गुरु दत्त नहीं चाहते थे कि गीता जी इस फ़िल्म में गाए क्योंकि उन्हे अनिल दा पसंद नहीं थे। लेकिन गीता जी की ज़िद के आगे उन्हे झुकना पड़ा और इस तरह से अनिल दा ने इस फ़िल्म में कुछ यादगार गीत रचे गीता जी के लिए। गीता दत्त इस फ़िल्म में कुल ३ एकल और एक हेमन्त कुमार के साथ युगल गीत गाये। आज सुनिए उनकी एकल आवाज़ में "धड़कने लगा दिल नज़र झुक गईं"। युं तो गीता दत्त ने नूतन की चर्चित फ़िल्म 'सुजाता' में भी दो गीत गाये थे लेकिन उनमें से एक शशिकला पर ("बचपन के दिन भी क्या दिन थे") और दूसरा सुलोचना पर ("नन्ही कली सोने चली हवा धीरे आना") फ़िल्माया गया था। १९६० की फ़िल्म 'मंज़िल' में उन्होने नूतन के लिए "चुपके से मिले प्यासे प्यासे" गाया और 'छबिली' में उन्होने गाया "यारों किसी से ना कहना"। तो इन सब जानकारियों के बाद अब वक़्त हो चुका है आज का गीत सुनने का, तो सुनते हैं फ़िल्म 'हीर' का यह गीत जिसे लिखा है मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. जिस अभिनेत्री पर ये गीत फिल्माया गया है उनका असली नाम बेबी खुर्शीद था, पर फ़िल्मी नाम कुछ और...
२. संगीतकार हैं ओ पी नय्यर साहब.
३. मुखड़े में शब्द है -"झूम"..इस पहेली को बूझने के आपको मिलेंगें २ की बजाय ३ अंक. यानी कि एक अंक का बोनस...पराग जी इस प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले सकेंगें.

पिछली पहेली का परिणाम -
इंदु जी आप तो बहुत बढ़िया खेल रही हैं १५ अंकों तक पहुँचने में आपको लगे मात्र ५ दिन, बहुत बढ़िया, हम आपको बता दें कि हमारे कुछ दिग्गज जो जीत चुके हैं अब तक, उन्हें जवाब देने की मनाही है, यही कारण है कि आपको अकेलापन खल रहा है, याद रखिये ३०१ वें एपिसोड से नए सिरे से सबके अंक शुरू होंगें, तो आपके पास अब २५ ही सवाल हैं जिनसे आप ५० के आंकडे पर आ सकती हैं, ५० अंक होने पर ही आपको गेस्ट होस्टबनने का मौका मिलेगा....तो मैदान बिलकुल मत छोडिये...

नोट - ओल्ड इस गोल्ड का अगला एपिसोड आप ३० तारीख़ यानि सोमवार को सुन पायेंगें...तब तक के लिए इज़ाज़त.

खोज - पराग सांकला
आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

स्वप्न साकार होते हैं...... चाँद शुक्ला हदियाबादी

हम अपने आवाज़ के दुनिया के दोस्तों को समय-समय में भाषा-साहित्य, कला-संस्कृति जगत के कर्मवीरों से मिलवाते रहते हैं। और जब भी बात इंटरनेट पर इस दिशा में हो रहे सकारात्मक प्रयासों की होती है तो वेबमंच रेडियो सबरंग डॉट कॉम के संस्थापक चाँद शुक्ला हमारी आँखों के सामने आ जाते हैं। आज इन्हीं से रूबर होते हैं सुधा ओम ढींगरा की इनसे हुई एक गुफ्तगु के माध्यम से-


हदियाबाद, फगवाड़ा, पंजाब में एक बालक विविध भारती सुनता हुआ अक्सर कल्पना की दुनिया में पहुँच जाता और आकाशवाणी के संसार में खो जाता। उसे लगता कि उसकी आवाज़ भी रेडियो से आ रही है और जनता सुन रही है। इस स्वप्न का आनन्द लेते हुए वह किशोरावस्था से युवावस्था में पहुँच गया। कई बार उसे महसूस होता कि स्वप्न सच कहाँ होते हैं। पर फिर कहीं से एक आशा की किरण कौंध जाती, सपने साकार होते हैं। पढ़ाई पूरी कर, संघर्ष और चुनौतियों का सामना करते हुए वह युवक अमेरिका, जर्मन घूमते हुए डेनमार्क आ गया। उस समय पूरे यूरोप ने कम्युनिटी रेडियो की स्वीकृति दे दी थी। डेनमार्क पहला ऐसा देश है, जहाँ 1983 में कम्युनिटी रेडियोज़ की स्थापना हुई। कोई भी लाईसैंस ले कर रेडियो प्रोग्राम शुरू कर सकता था। कई लोगों ने अपने राज्य, अपने शहर, अपने एरिया में रेडियो प्रोग्राम शुरू कर लिए। युवक को अपने बचपन का सपना साकार होता महसूस हुआ। उसने ग्रास रूट ऑर्गेनाईजेशन 98.9 एफ़.एम से अपने कार्यक्रम के लिए समय माँगा और उन्होंने उस युवक की बात मान कर भारतीय प्रोग्राम के तहत उसे साथ ले लिया। अगस्त 1989 में उसने अनेकता में एकता का प्रतीक रेडियो सबरंग का प्रसारण शुरू किया। उस समय रेडियो सबरंग की रेंज 40-50 किलोमीटर होती थी और भारतीय, पाकिस्तानी, बंगलादेशी कहने का भाव हिन्दी, उर्दू समझते वाले सभी इस प्रोग्राम को सुनते, यह प्रोग्राम बहुत पापुलर हुआ। 15 वर्ष यह कार्यक्रम चला और बहुत से प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित लोगों से फ़ोन पर सीधा सम्पर्क स्थापित कर रेडियो पर प्रसारण होता था। आज मैं आप की मुलाकात कई भाषाओं में परांगत उस व्यक्तित्व और आवाज़ से करवा रही हूँ जिसे सुनने को लोग लालायित रहते हैं और जिसकी स्वप्नशील आँखों और कल्पना ने वेब रेडियो सबरंग का रूप धरा-- अध्यक्ष Global Community Radio Broadcasters एवं डायरेक्टर वेब रेडियो सबरंग--नाम है चाँद शुक्ला 'हदियाबादी'.

चाँद जी, यह बताएँ कि रेडियो सबरंग वेब रेडियो सबरंग में कब और कैसे परिवर्तित हुआ?

सुधा जी, ऍफ़.एम रेडियो की जब रेंज कम हो गई तो महसूस हुआ कि हमारे श्रोता ही हमें सुन नहीं पा रहे तो हमने इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लाने का फैसला किया. पिछले कई वर्षों से नियमित प्रसारित होने वाला 'रेडियो सबरंग' ही हमने वेब रेडियो सबरंग में परिवर्तित कर दिया. यह वैश्विक समुदाय को एकजुट करने का एक सराहनीय और अनूठा प्रयास है. यह अनेकता में एकता का प्रतीक है। साहित्य और भाषा का एक ऐसा रेडियो वेब है जिसने अपनी सार्थक और प्रासंगिक सामग्री के कारण हिन्दी भाषा प्रेमियों के मध्य समस्त संसार में अपनी अलग पहचान बनाई है ।

विदेशों में अपनी भाषा में कुछ भी करने के लिए काफी चुनौतियों का सामना करता पड़ता है --आप को भी आई होंगी?

तकनीक ना जानने की कठिनाईयाँ आईं, आवाज़ तो हम दे सकते थे, लेकिन उसे मिक्सर से बाहर कैसे निकालना है यह चुनौती थी, पर ग्रास रूट ऑर्गेनाईजेशन वालों ने तकनीकि जानकार मुहैया करवाए. हमने इसे बारीकी से समझा और फिर कार्यक्रम चल निकला. मैंने इसमें दुनिया की नामवर हस्तियों के इंटरव्यू लिए -नेता, अभिनेता, पत्रकार, लेखक, कवि, शायर, कलाकार.

आप ने जिन हस्तियों के इंटरव्यू लिए हैं कुछेक नाम बताएँगे..हालाँकि नामों की लिस्ट तो बहुत लम्बी होगी...

जी, साहिबा --ज्ञानी ज़ैल सिंह, गुलाम नबी आज़ाद, सुषमा स्वराज, अरुण जेतली, किरण बेदी, अमृता प्रीतम , कुलदीप नैय्यर , आशा भोंसले, मन्ना डे , नुसरत फतेह अली , मेंहदी हसन, सुरिन्द्र कौर, सबरी ब्रदर्स, सुरेश वाडेकर, नरेन्द्र चंचल आदि...आदि

चाँद जी, वेब रेडियो सबरंग है क्या?

'रेडियो सबरंग' (डेनमार्क) से संचालित होने वाला हिन्दी साहित्य और भाषा का एक ऐसा रेडियो वेब है जिसने अपनी सार्थक और प्रासंगिक सामग्री के कारण हिन्दी भाषा प्रेमियों के मध्य समस्त संसार में अपनी अलग पहचान बनाई है । 'रेडियो सबरंग' में श्रोताओं के लिए 'सुर संगीत ' , 'कलामे- शायर ' ,'सुनो कहानी' तथा ' भूले बिसरे गीत ' जैसी वशिष्ट सामग्री को बेहद रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है । 'सुर संगीत' में श्रोता सुरीले गीतों तथा कविताओं का आनन्द ले सकते हैं. कवि /गीतकारों द्वारा रचित गीतों को बहुत मधुर संगीत में स्वरबद्ध करके प्रस्तुत किया गया है. जिसमें विश्वभर के सुप्रसिद्ध कवियों और गीतकारों की रचनाएँ स्वरबद्ध की गई हैं. कलामे शायर – इसमें विशेष बात यह है कि आप रचनाओं को स्वयं शायर/कवि की आवाज़ में सुनने का आनंद उठा सकते हैं .सुनो कहानी- 'रेडियो सबरंग' में हम कहानीकार को स्वयं की आवाज़ में कहानी सुनाते सुनेगें . यह बेहद रोमांचकारी अनुभव है. भूले- बिसरे गीत- इस के द्वारा हिन्दी फ़िल्मों के सदाबहार गीतों को प्रस्तुत किया गया है . अभी बहुत से कहानीकार, कवि, शायर इसमें आप और देखेंगे. कार्य धीरे -धीरे प्रगति कर रहा है. अपने वर्तमान स्वरुप में ' रेडियो सबरंग' साहित्य की विभिन्न विधाओं के रचनात्मक प्रस्तुतीकरण के कारण पूरे संसार में सुना और सराहा जा रहा है . कुल मिलाकर विदेश की धरती पर हिंदी भाषा को समर्पित 'रेडियो सबरंग' ने पूरे वैश्विक समुदाय को हिंदी भाषा और साहित्य के द्वारा एक सूत्र में बांधने का उल्लेखनीय कार्य किया हैं.

चाँद जी, आलोचक रेडियो सबरंग पर दोष लगते हैं कि इसमें अधिकतर मंचीय कवि/शायर हैं. समकालीन साहित्य दूर है. आप की चुनाव पद्धति क्या है?

मोहतरमा, नए पुराने हम नहीं देखते. हमने वैश्विक समुदाय से कई लोगों को अवसर दिया है और आगे भी देंगे. चुनाव पद्धति कहें या प्रणाली हम दमदार रचना /कलाम, अभिव्यक्ति और लुभावनी आवाज़ जो लोगों के दिलों को छू ले, ढूँढते हैं. आकर्षित करने वाले साहित्यकार जिन्हें लोग सुनने के लिए हमारे रेडियो पर आएँ, हम चाहते हैं. समकालीन साहित्य की बात करूँ तो कुछ नाम ले रहा हूँ - एस.आर. हरनोट, सूरज प्रकाश, इला प्रसाद, सुभाष नीरव, तेजेन्द्र शर्मा, सुधा ओम ढींगरा आदि क्या समकालीन साहित्यकार नहीं हैं..अभी तो शुरुआत है कुल तीन वर्ष ही हुए हैं और बड़ी कठिनाईयाँ आईं हैं. आगे -आगे देखिये होता है क्या ? हम भिन्न-भिन्न रूचि के लोगों के लिए हर तरह की सामग्री देना चाहते हैं. आखिर यह वैश्विक समुदाय की प्रस्तुति है और पूरे विश्व के लोगों के लिए है.

भविष्य में आप की योजनाएँ क्या हैं? वेब रेडियो सबरंग को आप कहाँ देखना चाहते हैं?

इनसे मिलें नया मंच शुरू करना चाहता हूँ जिसमें ऍफ़.एम रेडियो सबरंग की तरह बड़े -बड़े साहित्यकारों के फ़ोन पर इंटरव्यू ले कर लगाना चाहता हूँ , कलामे शायर और सुनो कहानी की तरह.
अभी तो अंतर्राष्ट्रीय सामग्री आ रही है. बाकि श्रोता जो सुझाव देंगे, उसके अनुसार इसे रंग रूप देते रहेंगे. परिवर्तन जीवन का नियम है. यह लोगों का अपना रेडियो है और उनकी राय का ध्यान रखा जायेगा.

कोई और स्वप्न जो अधूरा हो....?

मैडम, जब मैं डेनमार्क आया था तो एफ़. ऍम रेडियो को सुनकर सोचता था कि काश! भारत में भी ऐसा हो सके. तब मैंने और स्वर्गीय शमशेर सिंह शेर ने पंजाब केसरी के तत्त्वाधान में जालन्धर और दिल्ली में प्रेस काँफ्रैंसेस की थीं, और एफ़. ऍम रेडियो शरू करने के लिए एक पत्थर उछाला था, नारा बुलन्द किया था.. काम तो प्रसार भारती ने किया पर मुझे ख़ुशी है कि मेरा यह सपना भी पूरा हुआ- पूरे भारत में एफ़. ऍम रेडियो सुना जाता है...

बातचीत और प्रस्तुति-- सुधा ओम ढींगरा

गुरुवार, 26 नवंबर 2009

दर्शन प्यासी आई दासी...मधुबाला की विनती को स्वर दिए गीता दत्त ने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 274

'गीतांजली' में आज बारी है हिंदी फ़िल्म जगत की सब से ख़ूबसूरत अभिनेत्री मधुबाला पर फ़िल्माए गए गीता रॉय के गाए एक गीत की। गीत का ज़िक्र हम थोड़ी देर में करेंगे, पहले मधुबाला से जुड़ी कुछ बातें हो जाए! मधुबाला का असली नाम था मुमताज़ जहाँ बेग़म दहल्वी। उनका जन्म दिल्ली में एक रूढ़ी वादी पश्तून मुस्लिम परिवार में हुआ था। ११ बच्चों वाले परिवार की वो पाँचवीं औलाद थीं। अपने समकालीन नरगिस और मीना कुमारी की तरह वो भी हिंदी सिनेमा की एक बेहतरीन अभिनेत्री के रूप में जानी गईं। अपने नाम की तरह ही उन्होने चारों तरफ़ अपनी की शहद घोली जिसकी मिठास आज की पीढ़ी के लोग भी चखते हैं। मधुबाला की पहली फ़िल्म थी 'बसंत' जो बनी थी सन् '४२ में। इस फ़िल्म में उन्होने नायिका मुमताज़ शांति की बेटी का किरदार निभाया था। उन्हे पहला बड़ा ब्रेक मिला किदार शर्मा की फ़िल्म 'नीलकमल' में जिसमें उनके नायक थे राज कपूर, जिनकी भी बतौर नायक वह पहली फ़िल्म थी। 'नीलकमल' आई थी सन् '४७ में और इसी फ़िल्म से मुमताज़ बन गईं मधुबाला। उस समय उनकी आयु केवल १४ वर्ष ही थी। इसी फ़िल्म में गायिका गीता रॉय ने राजकुमारी और मुकेश के साथ साथ कई गीत गाए लेकिन इनमें से गीता जी का गाया हुआ कोई भी गीत मधुबाला के होठों पर नहीं सजे। अपने परिवार की आर्थिक अवस्था को बेहतर बनाने के लिए मधुबाला ने पहले ४ सालों में लगभग २४ फ़िल्मो में अभिनय किया था। यह सिलसिला जारी रहा और बाद में उन्हे इस बात का अफ़सोस भी रहा कि मजबूरी में उन्हे बहुत सारी ऐसी फ़िल्में भी करनी पड़ी जो उन्हे नहीं करनी चाहिए थी। क्वांटिटी की ख़ातिर उन्हे क्वालिटी के साथ समझौता करना पड़ा था। आज गीता रॉय की आवाज़ में मधुबाला पर फ़िल्माया हुआ जो गीत हम आप तक पहुँचा रहे हैं पराग सांकला जी के सौजन्य से वह है फ़िल्म 'संगदिल' का गीत "दर्शन प्यासी आई दासी जगमग दीप जलाए"।

भारतीय आदर्श नारी के किरदार में मधुबाला का अभिनय 'संगदिल' में सराहनीय था। 'संगदिल' Charlotte Bronte की क्लासिक Jane Eyre पर आधारित थी। कहानी कुछ इस तरह की थी कि बचपन के दो साथी बिछड़ जाते हैं और अलग अलग दुनिया में बड़े होते हैं। नायिका बनती है एक पुजारन और नायक जायदाद से बेदखल हुआ ठाकुर। क़िस्मत दोनों को फिर से पास लाती है। सब कुछ ठीक होने लगता है लेकिन क्या होता है जब नायिका को पता चलता है नायक के काले गहरे राज़, यही है इस फ़िल्म की कहानी। इस फ़िल्म का निर्देशन किया था राय चंद तलवार ने और संगीत दिया सज्जाद हुसैन साहब ने। इस फ़िल्म से तलत साहब का गाया "ये हवा ये रात ये चांदनी" आप इस महफ़िल में सुन चुके हैं। गीता रॉय ने सज्जाद साहब के लिए १९४७ की फ़िल्म 'मेरे भगवान' में दो गीत और उसी साल 'क़सम' फ़िल्म में कुल ५ एकल गीत गाये। फ़िल्म 'क़सम' की रिलीज़ को लेकर थोड़ा सा संशय रहा है। १९५० की फ़िल्म 'खेल' में सज्जाद साहब ने गीता जी से गवाया था "साजन दिन बहुरे हमारे"। 'संगदिल' में आख़िरी बार गीता जी और सज्जाद साहब का साथ हुआ। इस फ़िल्म में आशा भोसले के साथ गीता रॊय ने गाया था "धरती से दूर गोरे बादलों के पार आजा, आजा बसा लें नया संसार"। लेकिन जो गीत सज्जाद साहब और गीता जी की सब से उत्कृष्ट कृति मानी जा सकती है, वह है इस फ़िल्म का आज का प्रस्तुत भजन "दर्शन प्यासी आई दासी जगमग दीप जलाए, प्रभु चरण की धूल मिले तो जीवन में सुख आए"। राजेन्द्र कृष्ण के लिखे इस भजन में एक अजीब सी कैफियत है, ऐसा लगता है कि जैसे बिल्कुल गिड़गिड़ाकर भगवान से दर्शन माँग रही है। बहुत ही सच्चा मालूम होता है भगवान से यह निवेदन, आइए सुनते हैं।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. ये गीत उस अभिनेत्री पर फिल्माया गया है जिन्हें सबसे अधिक बार फिल्म फेयर पुरस्कार पाने का गौरव प्राप्त है.
२. गीतकार हैं मजरूह साहब.
३. मुखड़े की पहली पंक्ति में है शब्द -"नज़र".इस पहेली को बूझने के आपको मिलेंगें २ की बजाय ३ अंक. यानी कि एक अंक का बोनस...पराग जी इस प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले सकेंगें.

पिछली पहेली का परिणाम -
इंदु जी, चार दिन पहले आपका स्कोर ० था, और आज आप हैं १२ अंकों पर, जबरदस्त प्रदर्शन...बधाई....अब शरद जी को कोई टक्कर का मिला है :)

खोज - पराग सांकला
आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

...और एक सितारा डूब गया....लेखक/निर्देशक अबरार अल्वी को अंतिम सलाम

"वो मेरे खासमखास सलीम आरिफ के चाचा थे, दरअसल फिल्मों में मेरे सबसे शुरूआती कामों में से एक उनकी लिखी हुई स्क्रिप्ट्स के लिए संवाद लिखने का ही था. हम दोनों ने उन दिनों काफी समय साथ गुजरा था, वे उम्र भर गुरु दत्त से ही जुड़े रहे, गुरु दत्त और उनके भाई आत्मा राम के आलावा शायद ही किसी के लिए उन्होंने लेखन किया हो, मैं जानकी कुटीर में बसे उनके घर के आस पास से जब भी गुजरता था, रुक कर उन्हें सलाम करने अवश्य जाता था, इंडस्ट्री का एक और स्तम्भ गिर गया है"- ये कहना है गुलज़ार साहब का, और वो बात कर रहे थे इंडस्ट्री के जाने माने स्क्रीन लेखक अबरार अल्वी के बारे में, जिनका पिछले सप्ताह ८२ साल की उम्र में देहांत हो गया. वाकई फिल्म जगत का एक और सितारा डूब गया.

वैसे अबरार साहब का अधिकतम काम गुरु दत्त के साथ ही रहा, और गुरु दत्त ने ही उन पर "साहब बीबी और गुलाम" का निर्देशन सौंपा. इस लम्बी जुगलबंदी की शुरुआत "जाल" के सेट पर हुई, जब गुरु दत्त किसी दृश्य के फिल्म्कांकन को लेकर असमंजस में थे और अबरार ने उन्हें रास्ता दिखाया, गुरु उनसे इतने प्रभवित हुए की अगली फिल्म "आर पार" के लेखन के लिए उन्हें अनुबंधित कर लिया. तब से अबरार, गुरु के होकर रह गए. "कागज़ के फूल" की तबाह करने वाली असफलता ने गुरु दत्त को तोड़ कर रख दिया था, शायद उन्हें अपने नाम पर भी भरोसा नहीं रहा था, तब उन्होंने "साहब बीबी और गुलाम" के निर्देशन की बागडोर दी अबरार के हाथों में, अबरार ने अपनी इस फिल्म में सब कुछ झोंक दिया, आज भी ये एक फिल्म काफी है, अबरार का नाम इंडस्ट्री में कायम रखने के लिए. अपनी इस क्लासिक फिल्म के लिए उन्हें फिल्म फेयर सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार भी मिला. फिल्म को राष्ट्रपति का रजत सम्मान तो मिला ही, १९६३ में बर्लिन फिल्म समारोह में स्क्रीनिंग और ओस्कार के लिए भारतीय फिल्म के रूप में प्रविष्ठित होने का गौरव भी. पर चूँकि फिल्म गुरु दत्त फिल्म्स के बैनर पर बनी थी, विवाद उठा कि कहीं वास्तव में इस फिल्म का निर्देशन कहीं गुरुदत्त ने तो नहीं किया था, हालाँकि गुरुदत्त ने कभी ऐसा कोई दावा नहीं किया, पर अबरार ने खुद एक बार ये स्वीकार किया कि फिल्म के गीत गुरुदत्त ने फिल्माए थे.

अबरार ने गुरुदत्त से अलग भी लेखन में कुछ महत्वपूर्ण फ़िल्में की जैसे संघर्ष, सूरज, छोटी सी मुलाकात, मनोरंजन, शिकार और साथी, पर उनका नाम आते ही जिक्र आता है गुरु दत्त का, और ख़याल आता है, प्यासा, कागज़ के फूल, चौदहवीं का चाँद और साहिब बीबी और गुलाम जैसी क्लासिक फिल्मों का. शाहरुख़ खान अभिनीत विफल फिल्म "गुड्डू" संभवता उनकी अंतिम फिल्म रही...उनकी ३ बेटियां और २ बेटे हैं...उनकी पत्नी और उनके परिवार को ही नहीं वरन पूरी फिल्म इंडस्ट्री को आज इस अनुभवी और गहरी चोट करने वाले स्क्रीन के कलम योद्धा के जाने का गम है. अबरार साहब को तमाम युग्म परिवार की भाव भीनी श्रद्धाजंली.

बुधवार, 25 नवंबर 2009

आज की रात पिया दिल ना तोड़ो....अभिनेत्री कल्पना कार्तिक की पहली फिल्म में गाया था गीता दत्त ने इसे

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 273

'ओल्ड इज़ गोल्ड' में इन दिनों सज रही है गीता दत्त के गाए गीतों की 'गीतांजली', जिन्हे चुन कर और जिन पर शोध कर हमें भेजा है गीता जी के गीतों के अनन्य भक्त पराग सांकला जी ने। आज गीता जी की आवाज़ जिस अभिनेत्री पर सजने जा रही है वो हैं कल्पना कार्तिक। कल्पना कार्तिक का असली नाम था मोना सिंह, जो अपनी कॊलेज के दिनों में 'मिस शिमला' चुनी गईं थीं। अभिनेता देव आनंद से उनकी मुलाक़ात हुई और १९५४ में रूस में उन दोनों ने शादी कर ली। लेकिन ऐसा भी सुना जाता है कि उन दोनों की पहली मुलाक़ात फ़िल्म 'बाज़ी' के सेट पर हुई थी और 'टैक्सी ड्राइवर' के सेट पर शूटिंग् के दरमियान उन दोनों ने शादी की थी। लेकिन ऐसी कोई भी तस्वीर मौजूद नहीं है जो सच साबित कर सके। कल्पना कार्तिक ने अपनी फ़िल्मों में देव साहब के साथ ही काम किया। ५० के दशक में उनकी अभिनय से सजी कुल ५ फ़िल्में आईं। पहली फ़िल्म थी बाज़ी, जो बनी १९५१ में। बाक़ी चार फ़िल्मों के नाम हैं आंधियाँ ('५२), टैक्सी ड्राइवर ('५४), हाउस नंबर ४४ ('५४), और नौ दो ग्यारह ('५७)। दोस्तों, 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर आप 'बाज़ी', 'टैक्सी ड्राइवर' और 'हाउस नंबर ४४' के गीत सुन चुके हैं हाल ही में साहिर लुधियानवी व सचिन देव बर्मन पर केन्द्रित विशेष शृंखला के अंतर्गत। आज एक बार फिर से हम सुनेंगे फ़िल्म 'बाज़ी' से एक गीत। दरसल 'बाज़ी' में गीता जी के गाए एक से एक सुपरहिट गीत हैं जिनके बारे में हमने आपको साहिर-सचिनदा वाली शृंखला में ही बताया था। आज का गीत है "आज की रात पिया दिल ना तोड़ो, दिल की बात पिया मान लो"।

फ़िल्म 'बाज़ी' में जब गीता रॉय ने गीत गाए थे तब उनकी उम्र कुछ २०-२१ वर्ष की रही होगी। सचिन देव बर्मन ने गीता रॊय को ४० के आख़िर से लेकर ५० के दशक के बीचों बीच तक बहुत से ऐसे गानें गवाये जो कालजयी बन गए हैं। इसी फ़िल्म 'बाज़ी' के दौरान गीता रॉय और गुरु दत्त साहब में भी प्रेम हुआ और इन दोनों ने भी शादी कर ली। इस तरह से यह फ़िल्म आज गवाह है एक नहीं बल्कि दो दो प्रेम कहानियों की। फ़िल्म 'बाज़ी' में गुरु दत्त एक गेस्ट अपीयरन्स में भी नज़र आए थे। बर्मन दादा ने गीता जी से कुल ६ गीत गवाए थे इस फ़िल्म में जो एक दूसरे से बहुत अलग अंदाज़ वाले थे। इस फ़िल्म के बाक़ी गीत ज़्यादातर पाश्चात्य संगीत पर आधारित हैं लेकिन यह गीत पूरी तरह से इस धरती से जुड़ा हुआ है और बेहद मीठा व सुरीला है। यह फ़िल्म ना केवल कल्पना कार्तिक की पहली फ़िल्म थी, बल्कि इस फ़िल्म ने कई और कलाकारों के करीयर में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जैसे कि देव आनंद, गुरु दत्त, गीता रॉय, साहिर लुधियानवी और सचिन दा की भी। गीत सुनवाने से पहले इस गीत से जुड़ी एक और ख़ास बात। १९५३ में एक फ़िल्म आई थी 'जीवन ज्योति' जिसमें बर्मन दादा का संगीत था। इस फ़िल्म में उन्होने गीता रॉय और साथियों से एक पेपी नंबर गवाया था "देखो देखो नजर लग जाए ना, बैरन की नजर लग जाए ना"। इस गीत की एक उल्लेखनीय बात यह है कि इसकी इंटर्ल्युड की धुन "आज की रात पिया" की ही धुन है। कभी मौका मिला तो ज़रूर सुनिएगा। और अब वक़्त हो चला है आपको आज का गीत सुनवाने का। पेश-ए-ख़िदमत है कल्पना कार्तिक पर फ़िल्माया हुआ गीता रॉय की आवाज़ का जादू।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. ये गीत गाया गीता दत्त ने मधुबाला के लिए.
२. ये फिल्म क्लासिक Jane Eyre पर आधारित थी.
३. इस भजन के मुखड़े में शब्द है -"जगमग".इस पहेली को बूझने के आपको मिलेंगें २ की बजाय ३ अंक. यानी कि एक अंक का बोनस...पराग जी इस प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले सकेंगें.

पिछली पहेली का परिणाम -
इंदु जी एक के बाद एक तीन सही जवाब देकर आपने कमा लिए हैं ९ अंक...बहुत बधाई...राज जी आपने इतना कुछ कह दिया, हम तो बस कृतज्ञ हैं, और कुछ नहीं कह पायेंगें..दिलीप जी कोशिश करने वालों की हार नहीं होती....शरद जी और पाबला जी....आपकी हाजरी सही पायी गयी...

खोज - पराग सांकला
आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

मंगलवार, 24 नवंबर 2009

सखी री मेरा मन नाचे....जब मीना कुमारी के अंदाज़ को मिला गीता दत्त की आवाज़ का साथ

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 272

गीता दत्त के गाए गीतों की ख़ास शृंखला 'गीतांजली' की दूसरी कड़ी में आप सभी का हार्दिक स्वागत है। इस शृंखला के तहत आप पराग सांकला जी के चुने गीता जी के गाए दस ऐसे गानें सुन रहे हैं इन दिनों जो दस अलग अलग अभिनेत्रियों पर फ़िल्माए गए हैं। कल पहली कड़ी में नरगिस पर फ़िल्माया हुआ 'जोगन' फ़िल्म से एक मीरा भजन आपने सुना, आज की अभिनेत्री हैं मीना कुमारी। इससे पहले की हम उस गीत का ज़िक्र करें जो आज हम आप को सुनवा रहे हैं, आइए पहले कुछ बातें हो जाए मीना जी के बारे में। महजबीन के नाम से जन्मी मीना कुमारी भारतीय सिनेमा की 'लीजेन्डरी ट्रैजेडी क्वीन' रहीं हैं जो आज भी लोगों के दिलों में बसती हैं। अपनी तमाम फ़िल्मों में भावुक और मर्मस्पर्शी अभिनय की वजह से उनके द्वारा निभाया हुआ हर किरदार जीवंत हो उठता था। अभिनय के साथ साथ वो एक लाजवाब शायरा भी थीं और अपने एकाकी और दुख भरे दिनों में उन्होने एक से एक बेहतरीन ग़ज़लें लिखी हैं। उन्होने अपनी आवाज़ में अपनी शायरी का एक ऐल्बम भी रिकार्ड करवाया था जो उनके जीवन का एक सपना था। १९३९ से लेकर मृत्यु पर्यन्त, यानी कि १९७२ तक उन्होने लगभग १०० फ़िल्मों में अभिनय किया। उनके फ़िल्मी करीयर की शुरुआत पौराणिक फ़िल्मों से हुई जैसे कि 'हनुमान पाताल विजय', 'श्री गणेश महिमा' वगेरह। १९५० की फ़िल्म 'सनम' में वो सुरैय्या के साथ सह-नायिका के चरित्र में नज़र आईं। १९५२ में 'बैजु बावरा' की कामयाबी के बाद उन्होने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनके अभिनय से सजी 'बहू बेग़म', 'चित्रलेखा', 'फूल और पत्थर', 'काजल', 'पाक़ीज़ा' और न जाने कितनी ऐसी यादगार फ़िल्में हैं जिन्हे मीना जी के अभिनय ने चार चाँद लगा दिए हैं। ख़ैर, अब हम आते हैं आज के गीत पर। जैसा कि हमने कहा कि शुरु शुरु में मीना कुमारी ने कई पौराणिक फ़िल्मों में अभिनय किया था। तो क्यों ना गीता जी की आवाज़ में एक ऐसी ही फ़िल्म का गीत सुना जाए। पराग जी के प्रयास से हम आप तक पहुँचा रहे हैं गीता रॉय की आवाज़ में फ़िल्म 'श्री गणेश महिमा' का एक बड़ा ही प्यारा सा गीत जो मीना कुमारी पर फ़िल्माया गया था, और जिसके बोल हैं "सखी री मेरा मन नाचे, मेरा तन नाचे, नस नस में छाया है प्यार"।

जिन फ़िल्मों में गीता रॉय (दत्त) ने मीना कुमारी का पार्श्वगायन किया था, उनके नाम हैं - वीर घटोतकच ('४९), श्री गणेश महिमा ('५०), मग़रूर ('५०), हमारा घर ('५०), लक्ष्मी नारायण ('५१), 'हनुमान पाताल विजय ('५१), तमाशा ('५२), परिनीता ('५३), बादबान ('५४), सवेरा ('५८), शरारत ('५९) और साहिब बीवी और ग़ुलाम ('६२)। श्री गणेश महिमा 'बसंत पिक्चर्स' की फ़िल्म थी जिसका निर्देशन किया था होमी वाडिया ने। मीना कुमारी और महिपाल अभिनीत इस फ़िल्म में संगीत दिया था पौराणिक और ऐतिहासिक फ़िल्मों में संगीत देने के लिए मशहूर संगीतकार एस. एन. त्रिपाठी, जो इस फ़िल्म में कई और फ़िल्मों की तरह एक चरित्र अभिनेता की हैसीयत से भी नज़र आए। इस फ़िल्म में गानें लिखे अंजुम जयपुरी ने। अंजुम साहब भी ज़्यादातर पौराणिक, ऐतिहासिक और स्टंट फ़िल्मों के ही गानें लिखे हैं। भारतीय शास्त्रीय संगीत और साज़ों के इस्तेमाल के लिए त्रिपाठी जी जाने जाते हैं। अपने संगीत के माध्यम से वो एक पूरा का पूरा युग लोगों की आँखों के सामने प्रस्तुत कर देते थे। जिस फ़िल्म में जिस पीरीयड की कहानी होती, उसमे संगीत भी वैसा ही होता। गीता जी की आवाज़ में यह गीत अत्यंत कर्णप्रिय है और इस ख़ुशमिज़ाज गीत को उन्होने उसी ख़ुशमिज़ाज अंदाज़ में गाया है, जिसे सुन कर सुननेवाला भी ख़ुश हो जाए। तो लीजिए प्रस्तुत है मीना कुमारी के होंठों पर सजी गीता रॉय की आवाज़, फ़िल्म 'श्री गणेश महिमा' का यह सुरीला गीत।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. यहाँ गीता दत्त का प्लेबैक है कल्पना कार्तिक के लिए.
२. इस फिल्म में इस मशहूर निर्देशक ने एक अतिथि भूमिका भी की थी.
३. मुखड़े की पहली पंक्ति में शब्द है -"पिया".इस पहेली को बूझने के आपको मिलेंगें २ की बजाय ३ अंक. यानी कि एक अंक का बोनस...पराग जी इस प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले सकेंगें.

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह वाह इंदु जी, कैच जरा मुश्किल था पर आपने दूसरी कोशिश में सही जवाब लपक ही लिया....और बड़े बड़े धुरंधर सर खपाते रह गए....बधाई आपको...६ अंक हुए आपके. दिलीप जी और पाबला जी सर खपाई के लिए आपको भी बधाई :). राज जी, जब भी आपकी टिपण्णी आती है मन खुश हो जाता है, लगता है जैसे कहीं न कहीं हमारी मेहनत सार्थक हो रही है. साहिल भाई कहाँ थे इतने दिनों...श्याम जी और निर्मला जी, धन्येवाद...

खोज - पराग सांकला
आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

गीतों भरी कहानी का दूसरा अंक

गुनगुनाते लम्हे- 2

3 नवम्बर 2009 से हमने आवाज़ पर एक नये कार्यक्रम गीतों भरी कहानी की शुरूआत की है। जिसमें फिल्मी गीतों के माध्यम से एक कहानी को गुनते और बुनते हैं। आज हम इसका दूसरा अंक लेकर हाज़िर हैं। कहानी है रेणु सिन्हा की, स्वर है अपराजिता कल्याणी की और तकनीकी संचालन खुश्बू ने किया है।

इस बार हमने समय का ख्याल रखा है। जल्दी से सुन भी लेंगे और गुन भी लेंगे।

अपनी राय ज़रूर दें।




'गुनगुनाते लम्हे' टीम
आवाज़/एंकरिंगकहानीतकनीक
Aprajita KalyaniRenu SinhaKhushboo
अपराजिता कल्याणीरेणु सिन्हाखुश्बू

सोमवार, 23 नवंबर 2009

ए री मैं तो प्रेम दीवानी....मीरा के रंग रंगी गीता दत्त की आवाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 271

२३ नवंबर १९३०। स्थान बंगाल का फ़रीदपुर, जो आज बंगलादेश का हिस्सा है। एक ज़मीनदार परिवार में जन्म हुआ था एक बच्ची का। १९४२ के आसपास वो परिवार साम्प्रदायिक दंगों से अपने आप को बचते बचाते आ पहुँची बम्बई नगरी। लाखों की सम्पत्ति और ज़मीन जायदाद को युंही छोड़कर बम्बई आ पहुँचे इस परिवार ने दो कमरे का एक मकान भाड़े पर लिया। गायन प्रतिभा होने की वजह से यह बच्ची हीरेन्द्रनाथ नंदी से संगीत की तालीम ले रही थी। दिन गुज़रते गए और यह बच्ची भी बड़ी होती गई। १६ वर्ष की आयु में एक रोज़ यह लड़की अपने घर पर रियाज़ कर रही थी जब उसके घर के नीचे से गुज़र रहे थे फ़िल्म संगीतकार पंडित हनुमान प्रसाद। उसकी गायन और आवाज़ से वो इतने प्रभावित हुए कि वो कौतुहल वश सीधे उसके घर में जा पहुँचे। पंडित हनुमान प्रसाद से उसकी यह मुलाक़ात उसकी क़िस्मत को हमेशा हमेशा के लिए बदलकर रख दी। पंडित प्रसाद ने फ़िल्म 'भक्त प्रह्लाद' में इस लड़की को पहला मौका दिया और इस तरह से फ़िल्म जगत को मिली एक लाजवाब पार्श्व गायिका के रूप में गीता रॉय, जो आगे चलकर गीता दत्त के नाम से मशहूर हुईं। दोस्तों, आज २३ नवंबर, गीता जी के जनम दिवस के उपलक्ष पर हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर शुरु कर रहे हैं दस कड़ियों की एक ख़ास लघु शृंखला 'गीतांजली'। गीता दत्त के चाहने वालो की जब बात चलती है, तो इंटरनेट से जुड़े संगीत रसिकों को सब से पहले जिस शख्स का नाम याद आता है वो हैं हमारे अतिपरिचित पराग सांकला जी। गीता जी के गीतों के प्रति उनका प्रेम, जुनून और शोध सराहनीय रहा है। और इसीलिए प्रस्तुत शृंखला के लिए उनसे बेहतर भला और कौन होता जो गीता जी के गाए १० गानें चुनें और उनसे संबंधित जानकारियाँ भी हमें उपलब्ध कराएँ। और उन्होने बहुत ही आग्रह के साथ हमारे इस अनुरोध को ठीक वैसे ही पूरा किया जैसा हमने चाहा था। तो आज से अगले दस दिनों तक हम सुनेंगे पराग जी के चुने हुए गीता जी के गाए १० ऐसे गानें जो फ़िल्माए गये हैं सुनहरे दौर के दस अलग अलग अभिनेत्रियों पर। इस पूरी शृंखला के लिए शोध कार्य पराग जी ने ही किया है, हमने तो बस उनके द्वारा उपलब्ध कराई हुई जानकारी का हिंदी में अनुवाद किया है।

जब गीता रॉय शुरु शुरु में आईं थीं तो उन्होने कई फ़िल्मों में भक्ति रचनाएँ गाईं थीं। उनकी आवाज़ में भक्ति गीत इतने पुर-असर हुआ करते थे कि उन रचनाओं को सुनते हुए ऐसा लगता था कि जैसे ईश्वर से सम्पर्क स्थापित हो रहा हो! तो क्यों ना हम 'गीतांजली' की शुरुआत एक भक्ति रचना के साथ ही करें। और ऐसे में १९५० की फ़िल्म 'जोगन' का ज़िक्र करना अनिवार्य हो जाता है। जी हाँ, आज गीता जी की आवाज़ सज रही है नरगिस के होंठों पर। रणजीत मूवीटोन की इस फ़िल्म का निर्देशन किया था किदार शर्मा ने और नायक बने दिलीप कुमार। संगीतकार बुलो सी. रानी के करीयर की सब से चर्चित फ़िल्म रही 'जोगन' जिसमें उन्होने एक से एक मीरा भजन स्वरबद्ध किए जो गीता जी की आवाज़ पाकर धन्य हो गए। "घूंघट के पट खोल रे", "मत जा मत जा जोगी", "ए री मैं तो प्रेम दीवानी", "प्यारे दर्शन दीजो आए" और "मैं तो गिरिधर के घर जाऊँ" जैसे मीरा भजन एक बार फिर से जीवित हो उठे। मीरा भजनों के अतिरिक्त इस फ़िल्म में किदार शर्मा, पंडित इंद्र और हिम्मतराय शर्मा ने भी कुछ गीत लिखे। लेकिन आज हम सुनेंगे मीरा भजन "ए री मैं तो प्रेम दीवानी, मेरो दर्द ना जाने कोई"। पाठकों की जानकारी के लिए हम बता दें कि इस फ़िल्म का "मत जा जोगी" भजन गीता जी के पसंदीदा १० गीतों की फ़ेहरिस्त में शोभा पाता है जो उन्होने जारी किया था सन् १९५७ में। दोस्तों, क्योंकि आज गीता जी के साथ साथ ज़िक्र हो रहा है अभिनेत्री नरगिस जी का, तो उनके बारे में भी हम कुछ बताना चाहेंगे। नरगिस हिंदी सिनेमा के इतिहास का एक चमकता हुआ सितारा हैं जिन्होने सिनेमा के विकास में और सिनेमा को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। १९३५ में बाल कलाकार के रूप में फ़िल्म 'तलाश-ए-हक़' में पहली बार नज़र आईं थीं, लेकिन उनका अभिनय का सफ़र सही मायने में शुरु हुआ सन् १९४२ में फ़िल्म 'तमन्ना' के साथ। ४० और ५० के दशकों में वो छाईं रहीं। युं तो वो एक डॊक्टर बनना चाहती थीं, लेकिन क़िस्मत उन्हे फ़िल्म जगत में ले आई। उनकी यादगार फ़िल्मों में शामिल है 'बरसात', 'अंदाज़', 'जोगन', 'आवारा', 'दीदार', 'श्री ४२०', 'चोरी चोरी' और इन सब से उपर १९५७ की फ़िल्म 'मदर इंडिया'। १९५८ में सुनिल दत्त से विवाह के पश्चात उन्होने अपना फ़िल्मी सफ़र समाप्त कर दिया और अपना पूरा ध्यान अपने परिवार पे लगा दिया। कैंसर की बीमारी ने उन्हे घेर लिया और ३ मई १९८१ को उन्होने इस संसार को अलविदा कह दिया। और इसके ठीक ५ दिन बाद, ७ मई १९८१ को प्रदर्शित हुई उनके बेटे संजय दत्त की पहली फ़िल्म 'रॉकी'। इस फ़िल्म के प्रीमीयर ईवेंट में एक सीट ख़ाली रखी गई थी नरगिस के लिए। और आइए अब सुनते हैं नरगिस पर फ़िल्माया गीता रॉय की आवाज़ में फ़िल्म 'जोगन' से यह मीरा भजन जिसे सुनते हुए आप एक दैवीय लोक में पहुँच जाएँगे। आज गीता जी के जनम दिवस पर हम हिंद-युग्म की तरफ़ से उन्हे अर्पित कर रहे हैं अपने विनम्र श्रद्धा सुमन!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. ये गीत है गीता जी का गाया मीना कुमारी के लिए.
२. गीतकार हैं अंजुम जयपुरी.
३. मुखड़े में शब्द है - "नस".इस पहेली को बूझने के आपको मिलेंगें २ की बजाय ३ अंक. यानी कि एक अंक का बोनस...पराग जी इस प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले सकेंगें.

पिछली पहेली का परिणाम -

नयी विजेता हमें मिली है इंदु जी के रूप में, इंदु जी आपका खता खुला है ३ अंकों से, बधाई, अवध जी आपने बहुत ही दिलचस्प बात बताई, क्या शांति माथुर के बारे में आपके पास और कोई जानकारी उपलब्ध है ? मतलब वो इन दिनों कहाँ है क्या कर रही हैं आदि, उनके बारे में हम सब बहुत कम जानते हैं...पाबला जी और निर्मला जी आभार..

खोज - पराग सांकला
आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

विंटेज इल्लायाराजा का संगीत है "पा" में और अमिताभ गा रहे हैं १३ साल के बालक की आवाज़ में...

ताजा सुर ताल TST (36)

दोस्तो, ताजा सुर ताल यानी TST पर आपके लिए है एक ख़ास मौका और एक नयी चुनौती भी. TST के हर एपिसोड में आपके लिए होंगें तीन नए गीत. और हर गीत के बाद हम आपको देंगें एक ट्रिविया यानी हर एपिसोड में होंगें ३ ट्रिविया, हर ट्रिविया के सही जवाब देने वाले हर पहले श्रोता की मिलेंगें २ अंक. ये प्रतियोगिता दिसम्बर माह के दूसरे सप्ताह तक चलेगी, यानी 5 अक्टूबर से १४ दिसम्बर तक, यानी TST के ४० वें एपिसोड तक. जिसके समापन पर जिस श्रोता के होंगें सबसे अधिक अंक, वो चुनेगा आवाज़ की वार्षिक गीतमाला के 60 गीतों में से पहली 10 पायदानों पर बजने वाले गीत. इसके अलावा आवाज़ पर उस विजेता का एक ख़ास इंटरव्यू भी होगा जिसमें उनके संगीत और उनकी पसंद आदि पर विस्तार से चर्चा होगी. तो दोस्तों कमर कस लीजिये खेलने के लिए ये नया खेल- "कौन बनेगा TST ट्रिविया का सिकंदर"

TST ट्रिविया प्रतियोगिता में अब तक-

पिछले एपिसोड में, सीमा जी आश्चर्य, आप जवाब लेकर उपस्थित नहीं हुई, ३ में से मात्र एक जवाब सही आया और वो भी विश्व दीपक तन्हा जी का, तन्हा जी का स्कोर हुआ १६...दूसरे सवाल में जिन फिल्मों के नाम दिए गए थे उन सबमें सोनू निगम-श्रेया घोषाल के युगल गीत थे, और तीसरे सवाल का जवाब है विविध भारती इंदोर स्टेशन....तो चलिए अब बढ़ते हैं आज के एपिसोड की तरफ


सुजॉय - सजीव, आज का 'ताज़ा सुर ताल' बहुत ही ख़ास है, है न?

सजीव - बिल्कुल सुजॉय, आज हम उस फ़िल्म के चर्चा करेंगे और उस फ़िल्म के गानें सुनेंगे जो आजकल सब से ज़्यादा चर्चा में है और जिसका लोग बेसबरी से इंतेज़ार कर रहे हैं, और जिसमें अमिताभ बच्चन ने एक अद्‍भुत भूमिका निभाई है।

सुजॉय - हमारे पाठक भी समझ चुके होंगे कि हम फ़िल्म 'पा' की बात कर रहे हैं। आजकल टीवी पर प्रोमोज़ आ रहे हैं इस फ़िल्म के जिसमें बिग बी को हम एक बड़े ही हैरतंगेज़ लुक्स में दिख रहे हैं। सजीव, क्या आपको पता है कि इस तरह के लुक्स के पीछे आख़िर माजरा क्या है?

सजीव - मैने सुना है कि यह एक तरह की बीमारी है जिसकी वजह से समय से पहले ही आदमी बूढ़ा हो जाता है। यानी कि यह एक जेनेटिक डिसोर्डर है जिसकी वजह से accelerated ageing हो जाती है।

सुजॉय - अच्छा, तभी अमिताभ बच्चन एक छोटे बच्चे की भूमिका में है जो शक्ल से बूढ़ा दिखता है!

सजीव - बिल्कुल! वो एक १३ साल का बच्चा है जो मानसिक तौर से भी १३ साल का ही है, लेकिन शारीरिक रूप से ५ गुणा ज़्यादा आयु का दिखता है। बावजूद इसके वो एक ख़ुशमिज़ाज बच्चा है। इस फ़िल्म में अभिषेक बच्चन बनें हैं उनके पिता और विद्या बालन बनीं हैं बिग बी की मम्मी। बहुत ही इंटरेस्टिंग् है, क्यों?

सुजॉय - सही है! और इस फ़िल्म को लिखा व निर्देशित किया है आर. बालकी ने। अच्छा सजीव, बातें हम जारी रखेंगे, लेकिन उससे पहले यहाँ पर इस फ़िल्म का एक गीत सुन लेते हैं पहले।

गीत - गुमसुम गुम गुमसुम हो क्यों gumsum gumsum ho kyon (paa)



सजीव - गीत तो हमने सुन लिया, अब इस फ़िल्म के संगीत पक्ष की थोड़ी सी चर्चा की जाए। इस फ़िल्म में संगीत है इलय्याराजा का, जिनकी हाल में 'चल चलें' फ़िल्म आई थी। यह फ़िल्म तो नहीं चली, अब देखना यह है कि 'पा' के गानें लोग किस तरह से ग्रहण करते हैं। वैसे यह जो गीत अभी हमने सुना वह दरअसल एक मलयालम गीत है एस.जानकी की आवाज़ में जिसके बोल हैं -"तुम्बी वा...", ये गीत हालाँकि बेहद पुराना है पर आज भी बड़े शौक से सुना जाता है और इसे वहां एक क्लासिक सोंग का दर्जा हासिल है, चूँकि मैं मलयालम समझता हूँ तो बता दूं "तुम्बी" एक उड़ने वाला कीट होता है जिसे उत्तर भारत में बच्चे "हैलीकॉप्टर" कहते हैं, उसके पंख कुछ ऐसे चलते हैं हैं हैलीकॉप्टर का पंखा....वहाँ इस गीत को नायिका बच्चों को मनाने के लिए गा रही है और यहाँ शायद बच्चे बड़ों को मना रहे हैं...:)

सुजॉय - और इस हिंदी संस्करण में भी वही दक्षिणी फ़्लेवर मौजूद है। कर्नाटक शैली और पाश्चात्य जैज़ के फ़्युज़न का प्रयोग इलय्याराजा ने किया है। इसमें पियानो पर बजाया हुआ एक सुंदर जैज़ सोलो सुना जा सकता है, जो बड़ी ही सरलता से वापस शास्त्रीय रंग में रंग जाता है। कुल मिलाकर कुछ नया सुना जा सकता है। अच्छा, इस गीत में आवाज़ें किनकी है, मैं तो पहचान नहीं पाया।

सजीव - इसे दो युवा गायकों ने गाए हैं, ये हैं भवतारिणी और श्रवण। चलो अब एक समूहगीत सुनते हैं इस फ़िल्म से। जैसे कि मैनें कहा समूहगीत, तो दरसल यह एक बच्चों का ग्रूप सॊंग् है। वायलिन ही मुख्य साज़ है और एक प्रार्थना की तरह सुनाई देता है।

गीत - हल्के से बोले कल के नज़ारे...halke se bole..(paa)



सुजॉय - सचमुच it was short and sweet! अच्छा सजीव, इस फ़िल्म में अमिताभ बच्चन ने भी एक गीत गाया है। क्यों ना उस गीत को अब यहाँ सुन लिया जाए!

सजीव - ज़रूर, यही तो इस फ़िल्म का सब से अनोखा गीत है। इस गीत में बच्चन साहब एक ऐसे छोटे बच्चे की तरह आवाज़ निकालते हैं जो इस तरह की बीमारी से पीड़ित है। बच्चन साहब के क्या कहने, वो जो भी करते हैं पूरे पर्फ़ेक्शन के साथ करते हैं, जिसके उपर कुछ भी समालोचना फीकी ही लगती है।

सुजॉय - वाक़ई, इस गीत में उन्होने कुछ ऐसे एक्स्प्रेशन्स और जज़्बात भरे हैं कि सुनने वाला हैरान रह जाता है। यह फ़िल्म का शीर्षक गीत है और इस गीत की चर्चा में इसके संगीत या संगीत संयोजन के बारे में चर्चा निरर्थक है। यह गीत पूरी तरह से बिग बी का गीत है। दिल को छू लेने वाला यह गीत एक नेरेशन की तरह आगे बढ़ता जाता है।

सजीव - और गीतकार स्वानंद किरकिरे के बोल भी उतने ही असरदार! चलो सुनते हैं, हमारे श्रोता भी इसे सुनने के लिए अब बेताब हो रहे होंगे!

गीत - मेरे पा...mere paa (paa)



सुजॉय - वाह! सचमुच क्या गाया है बच्चन साहब ने!

सजीव - और अब आगे बढ़ते हुए हम आते हैं इस फ़िल्म के सब से महत्वपूर्ण गीत की तरफ़। यह है शिल्पा राव की आवाज़ में 'उड़ी उड़ी हाँ उड़ी मैं फिर उड़ी इत्तीफ़ाक़ से"।

सुजॉय - यही गीत शान की आवाज़ में भी है जिसमें है "गली मुड़ी"। शिल्पा राव वाला गीत ग्लैमरस है और रीदम भी तेज़ है, जब कि शान वाला वर्ज़न कोमल है और रीदम भी स्लो है। शान ने इस तरह का गीत शायद पहले नहीं गाया होगा। कुल मिलाकर अच्छी धुन है।

सजीव - तो फिर चलो, आज सुनिता राव वाला वर्ज़न सुनते हैं।

गीत - उड़ी उड़ी हाँ उड़ी मैं इत्तीफ़ाक़ से... udi udi main udi (paa)



सजीव - वैसे मुझे ये फिल्म के बाकी गीतों से मूड और मिजाज़ में बहुत अलग सा लगा....कुछ बहुत मज़ा मज़ा नहीं आया... खैर अब आज का आख़िरी गीत। इस फ़िल्म में सुनिधि चौहान ने एक गीत गाया है "हिचकी हिचकी"। इलय्याराजा की धुनें हमेशा ही कुछ अलग हट के होता आया है। और इस गीत को पूरा का पूरा उन्होने रूपक ताल पर बनाया है।

सुजॉय - सिर्फ़ संगीत ही नहीं, इसके बोलों में भी काफ़ी कारीगरी की है स्वानंद किरकिरे ने। और सुनिधि की आवाज़ का बहुत ही अलग इस्तेमाल इलय्याराजा साहब ने किया है। सुनिधि ने अपनी आवाज़ को बहुत दबाकर गाया है। आमतौर पर हम उनकी जिस तरह की बुलंद आवाज़ से वाक़िफ़ हैं, उससे बिल्कुल ही अलग आवाज़ इस गीत में सुनाई देता है। कुल मिलाकर एक अच्छा गीत है। लेकिन सजीव, एक बात भी है, क्योंकि इस फ़िल्म की कहानी बिल्कुल ही अलग है, यानी कि ग़ैर-पारंपरिक है, इसलिए इस तरह के फ़िल्मों में जो गानें होते हैं वो बहुत ज़्यादा हिट नहीं होते हैं, लेकिन फ़िल्म बहुत कामयाब रहती है। फ़िल्म की कहानी इतनी ज़्यादा मज़बूत होती है कि लोगों का ध्यान फ़िल्म के गीतों से ज़्यादा फ़िल्म पर ही टिकी रहती है।

सजीव - चलो यह तो वक़्त ही बताएगा कि यह फ़िल्म ज़्यादा चली या कि इसके गानें। अब हम सुन लेते हैं इस फ़िल्म का पाँचवाँ और इस पेशकश का अंतिम गाना।

गीत - हिचकी हिचकी...hichki hichki (paa)



और अब समय है ट्रिविया का ....

TST ट्रिविया # 31- 'पा' के अतिरिक्त आर. बालकी ने अमिताभ बच्चन को और किस फ़िल्म में डिरेक्ट किया था?

TST ट्रिविया # 32- फ़िल्म 'पा' के निर्देशक आर. बालकी का पूरा नाम क्या है?

TST ट्रिविया # 33- इलय्याराजा उनका असली नाम नहीं है। उनके नाम के साथ 'राजा' शब्द उनके एक संगीत शिक्षक ने जोड़ा था तथा बाद में 'इलय्याराजा' नाम तमिल के एक फ़िल्म निर्देशक ने रखा था। बताइए उस संगीत शिक्षक और उस तमिल फ़िल्म निर्देशक के नाम।


"पा" अल्बम को आवाज़ रेटिंग ***
अल्बम का मुख्य आकर्षण अमिताभ की आवाज़ में "मेरे पा" गीत ही है, "गुमसुम गुमसुम" एक सुरीली मेलोडी है....पर बोल उतने प्रभावी नहीं है....कुल मिला कर अल्बम औसत ही है....और फिल्म की सफलता पर ही संगीत की सफलता निर्भर है.

आवाज़ की टीम ने इस अल्बम को दी है अपनी रेटिंग. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसे लगे? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत अल्बम को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

शुभकामनाएँ....



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

रविवार, 22 नवंबर 2009

लकड़ी की काठी, काठी पे घोडा...करीब २५ सालों के बाद भी ये गीत बच्चों के मन को वैसा ही भाता है जैसा पहले...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 270

दोस्तों, पिछले ९ दिनों से हम इस महफ़िल में कुछ बेहद चर्चित बच्चों वाले फ़िल्मी गीत सुनते चले आ रहे हैं, और आज हम आ पहुँचे हैं इस नन्हे मुन्ने शृंखला 'बचपन के दिन भुला ना देना' की अंतिम कड़ी पर। यूँ तो 'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला में हम ८० के दशक के गानें शामिल नहीं करते, क्योंकि 'ओल्ड इज़ गोल्ड' सलाम करती है फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर को जो ४० के दशक के मध्य भाग से लेकर ७० के दशक के आख़िर तक साधारणत: माना जता है। लेकिन बच्चों वाले गीतों की जब बात चलती है तो एक ऐसी फ़िल्म है जिसके ज़िक्र के बग़ैर, या यूँ कहिए कि जिस फ़िल्म के एक गीत के ज़िक्र के बग़ैर अगर चर्चा समाप्त कर दी जाए तो वह चर्चा अधूरी ही रह जाएगी। यह फ़िल्म है सन् १९८३ में प्रदर्शित शेखर कपूर निर्देशित फ़िल्म 'मासूम' और वह गीत है "लकड़ी की काठी, काठी पे घोड़ा"। इस गीत को अगर हम इस शृंखला में शामिल न करें तो यह शृंखला भी काफ़ी हद तक अधूरी रह जाएगी। यह सच है कि ५०, ६० और ७० के दशकों के कई और बच्चों वाले गीतों को हम शामिल नहीं कर सके हैं, लेकिन इस गीत से मुंह मोड़ने को जी नहीं चाहता। तो चलिए, आज सारे नियमों और 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के क़ायदे कानूनों को एक तरफ़ रखते हुए सुनते हैं यह सदाबहार गीत जो फूटे थे गुलज़ार साहब की क़लम से। हमने यह शृंखला शुरु की थी १९६० की फ़िल्म 'मासूम' के गीत से और आज इसका समापन हो रहा है १९८३ की फ़िल्म 'मासूम' के गाने से।

१९८३ की 'मासूम' के प्रोड्युसर्स थे चंदा दत्त और देवी दत्त। परिपक्व किरदारों में थे नसीरुद्दिन शाह, शबाना आज़्मी व सुप्रिया पाठक, तथा बाल कलाकारों में थे उर्मिला मातोंडकर, जुगल हंसराज और आराधना। जितना अच्छा अभिनय बड़े अभिनेताओं ने किए, उतनी ही तारीफ़ें बटोरी इन तीनों बाल कलाकारों ने। बताने की ज़रूरत नहीं कि इनमें से दो आगे चलकर हीरो हीरोइन बनें। गुलज़ार के लिखे गीतों को स्वरबद्ध किए राहुल देव बर्मन ने। इस फ़िल्म को निर्देशक शेखर कपूर ने बहुत ही जज़्बाती ट्रीटमेंट दिया है। और बच्चों वाले गीतों के मामले में गुलज़ार साहब तो एक्स्पर्ट हैं ही। याद है ना फ़िल्म 'किताब' का गीत जो हाल ही में आपने सुने, और साथ ही फ़िल्म 'परिचय' का गीत "सा रे के सा रे गा मा को लेकर गाते चले"। इसे भी बहुत जल्द आप इस महफ़िल में सुन पाएँगे। लेकिन आज बात "लकड़ी की काठी" की। गुलज़ार साहब की ख़ासीयत रही है कि किसी आम बात या किसी मामूली चीज़ या जगह को वे इस तरह से पेश करते हैं अपने गीतों में कि उसके बाद वह चीज़ या जगह आम नहीं रह जाती। अब इसी गीत में देखिए उन्होने लिखा है "घोड़ा अपना तगड़ा है, देखो कितनी चर्बी है, चरता है महरोली में पर घोड़ा अपना अरबी है"। जिन्हे मालूम नहीं है उनके लिए बता दें कि महरोली दिल्ली और गुड़गाँव के बीच आनेवाली एक जगह का नाम है, जिसे दिल्ली से बाहर शायद ही किसी को पता होगा। लेकिन इस छोटी सी जगह के नाम को भी कितनी दक्षता से प्रस्तुत किया गया है इस गीत में। यह तो बस एक उदाहरण था, इस तरह के उदारहणों का ज़िक्र शुरु करेंगे तो सुबह हो जाएगी पर गुलज़ार साहब के इन उदाहरण और उपमाओं का ज़िक्र ख़त्म नहीं होगा। "लकड़ी की काठी" को तीन बाल गायिकाओं ने गाया था। ये हैं गौरी बापट, वनिता मिश्रा और गुरप्रीत कौर। इनमें से गौरी बापट ने बड़ी होकर पार्श्वगायन किया है। सन् २००३ की फ़िल्म 'जानशीन' में इन्होने कुछ गानें गाए हैं। ख़ैर, आज बात 'मासूम' की। इस फ़िल्म ने उस साल के तमाम फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीते थे, जैसे कि नसीरुद्दिन शाह (सर्वश्रेष्ठ अभिनेता), गुलज़ार (सर्वश्रेष्ठ गीतकार - "तुझसे नाराज़ नहीं ज़िंदगी"), राहुल देव बर्मन (सर्वश्रेष्ठ संगीतकार), आरती मुखर्जी (सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायिका - "दो नैना और एक कहानी") तथा शेखर कपूर को सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म - क्रिटिक्स का पुरस्कार मिला था। तो लीजिए अब यह गीत सुनिए और इस शृंखला 'बचपन के दिन भुला ना देना' के बारे में अपनी राय लिख भेजना ना भूलिएगा। युं तो और भी बहुत सारे बच्चों वाले गानें हैं, लेकिन इस शृंखला में हमारी कोशिश यही रही कि बच्चों के अलग अलग पहलुओं को छूते हुए उन गीतों को शामिल की जाए जिन्हे बाल कलाकारों ने ही गाए और पर्दे पर भी बाल कलाकारों ने ही लिप-सिंक किए। लता, आशा, रफ़ी, मुकेश, सुमन कल्याणपुर और कमल बारोट को एक तरफ़ रखते हुए हमने जिन बाल अवाज़ों से आपका परिचय करवाया वो हैं रानू मुखर्जी, शांति माथुर, पद्मिनी कोल्हापुरी, शिवांगी कोल्हापुरी, सुषमा श्रेष्ठ, प्रतिभा, गौरी बापट, वनिता मिश्रा और गुरप्रीत कौर। इसी के साथ दीजिए मुझे इजाज़त और इंतज़ार कीजिए कल से शुरु होने वाली एक नई लघु शंखला का। नमस्ते!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. कल से शुरू होगी एक नयी शृंखला जो समर्पित है उस अमर गायिका को जिनकी कल जयंती है
२. ये भजन है नायिका नर्गिस पर फिल्माया हुआ.
३. मुखड़े की पहली पंक्ति में शब्द है -"प्रेम". एक बात और इस पहेली को बूझने के आपको मिलेंगें २ की बजाय ३ अंक. यानी कि एक अंक का बोनस...पराग जी इस प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले सकेंगें.

पिछली पहेली का परिणाम -

दिलीप जी १२ अनोकों पर आ गए हैं आप, बधाई...बी एस पाबला जी बहुत दिनों बाद लौटे, पोटली में गीत के बोल भी लाये और तमाम जानकारियाँ भी...कहाँ थे जनाब...:), अवध जी, आप भी यदि समय से आयें तो यक़ीनन विजेता बन सकते हैं, श्याम जी आपकी सादगी को पूरे १०० में से १००अंक...

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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